What is a Sahaja Yogi, Morning Seminar

Old Arlesford Place, Arlesford (England)

1980-05-17 What Is A Sahaja Yogi, Winchester, Version 2, 55' Download subtitles: EN,ITView subtitles:
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आपको पता होना चाहिए कि सहज योग एक जीवंत क्रिया है। ठीक उसी प्रकार की क्रिया जिससे एक बीज़, वृक्ष में अंकुरित होता है। यह एक जीवंत क्रिया है। तो यह परमात्मा का काम है। मेरा मतलब है, यह उन्हें करना है। यह आपका कार्य नहीं है । बीज को अंकुरित करना उनका काम है। 

लेकिन समस्या इसलिए आती है क्योंकि इस अवस्था में जहां मनुष्य एक बीज़ है, उसके पास स्वतंत्रता है। उनके पास स्वतंत्रता है। इस स्वतंत्रता के साथ, वह ईश्वर की अभिव्यक्ति को, उनके कार्य को बिगाड़ सकता है। 

तो पहली चीज जो हमें याद रखनी चाहिए कि इसके बारे में हमें विवेक होना चाहिए। तो पहली बात विवेक की यह है कि यह परमात्मा है जो यह कार्य करेंगे। हम यह नहीं कर सकते। आप बीज़ अंकुरित नहीं कर सकते, फिर आप अपना बीज भी कैसे अंकुरित करेंगे? और इस विवेक में हमें एक चीज़ याद रखनी और  जाननी चाहिए, अपने अंदर, कि आप पूरी क्रिया के अंग प्रत्यंग हैं। हालांकि आपके पास अपनी ‌स्वतंत्रता है, स्वतंत्रता भी इस क्रिया का अंग प्रत्यंग हैं। आप परमात्मा से अलग नहीं है, आपका कोई दूसरा अस्तित्व नहीं है। आप उस पूरी क्रिया के अंग प्रत्यंग हैं । ठीक है ? 

तो यह सोचना कि आपको इसके बारे में भी कुछ तय करना है- यह भी गलत है। आप उसी मशीनरी में हैं जहां आप इस अवस्था में लाए गए हैं जहां आप को पूर्ण स्वतंत्रता है अपनी उत्क्रांति के लिए।‌ तो इस स्तर पर जहां आप को पूर्ण स्वतंत्रता है, आपको यह जानना चाहिए कि यह जो स्वतंत्रता दी गई है , वह उसके मूल्य को समझने के लिए दी गई। और इस स्वतंत्रता में आपको यह जानना चाहिए कि आपके लिए क्या गौरवशाली है। एक बार आप यह समझ लें, आप अपने को बोलें – “अब देखो, मुझे कुछ और बनना है और इसलिए परमात्मा ने यह किया है। और मुझे बस इतना करना है कि मुझे पूर्ण तरह से परमात्मा की इच्छा के साथ समन्वय , सहयोग और समर्पण करना है ताकि मैं बन जाऊं। यह पहली तैयारी है जो हमें करनी है।

इस समर्पण में, आप महानतम कार्य करेंगे क्योंकि ऐसा करके आप उनके कार्य में बाधा नहीं डालेंगे। जब तक आप समर्पण नहीं करेंगे आप में विवेक नहीं आ सकता। तो सबसे पहले आप यह चीज को समझिए अपने थोड़े से विवेक के द्वारा और फिर आप में पूर्ण विवेक आएगा। सबसे पहले आप अपने थोड़े से विवेक के द्वारा समझिए कि बिना समर्पण के आप परमात्मा के कार्य में रुकावट डाल रहे हैं । वह जानते हैं कि आपके लिए क्या अच्छा है। वे आपको सर्वोच्च देना चाहते हैं जो आप स्वयं हासिल नहीं कर सकते। वह आपको सर्वोत्तम देने वाले हैं। अगर आप उसको पाना चाहेंगे तो आप नहीं पा सकते। ‌ यह उनका कार्य है, उनका दान है, जैसा आप कहते हैं उनका उपहार आपके लिए है। ऐसे में आप को पता होना चाहिए कि इसे प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि उनके काम को कार्यान्वित होने दें।  

अब आप जब समर्पण के बारे में सोचते हैं, सबसे पहले मस्तिष्क काम करना शुरू कर देता है कि “मैं क्या समर्पण करूं”। आप सोचते हैं अपना भौतिक धन समर्पण करना- यह उनको नहीं चाहिए। यह सब धन उन्होंने आपको दिया है, वह इसका क्या करेंगे। यह उनके पैरों की धूल के बराबर भी नहीं है। तो यह कोई मदद करने वाला नहीं है। कभी-कभी आप महसूस करेंगे कि “मुझे अपनी बुद्धिमता देनी चाहिए।” यही मांगा गया है। कोई भी आपके मूर्ख़ और बेवकूफ लोगों को पाना नहीं चाहता। तो अपनी बुद्धिमता का भी त्याग मत कीजिए। फिर कुछ लोग सोचते हैं कि “मैं अपना दिल दे दूं” कुछ लोग ऐसा कहते हैं। हमें हृदयहीन लोग नहीं चाहिए । कुछ लोग कहेंगे कि “मां, हम दूसरों के साथ अपने रिश्ते छोड़ देंगे”। इसकी भी जरूरत नहीं है। क्योंकि आपका ह्रदय वही होना चाहिए जहां वह है और प्रकाश को आपके दिल में आना है। आप अपना दिल किसको दे सकते हैं? क्योंकि जिसने आप को दिल दिया है उनको ही दिल वापस देने का क्या फायदा ? नहीं क्या? जिसने आपको बुद्धिमता दी है उसे ही वापस देने का क्या फायदा ? ऐसा कुछ जो आपने खुद से हासिल किया है, वह आपको समर्पित करना है। और जो आपने हासिल किया है वह है आपका अहंकार और प्रति-अहंकार। जो आपने हासिल किया वह कुछ नहीं है पर आपका अहंकार है । और यह अहंकार आपको छोड़ना होगा जो कि कठिन काम है । 

अहंकार, यदि पैसे या भौतिक चीजों से आता है तो बेहतर है कि आप कुछ भौतिक चीजें त्याग दें, ईश्वर को नहीं बल्कि किसी अन्य को दे दे। यह बेहतर है, यदि भौतिक चीजों से अहंकार पैदा हो रहा है। यदि आपकी बुद्धिमता अहंकार को पैदा कर रही है कि आपको लगता है कि आपके पास ज्यादा बुद्धि है, बेहतर होगा कि उसको थोड़ा नीचे ले आए।  इसमें आपको निर्णय करना होगा और खुद को देखना होगा कि मुझे किस कारण से अहंकार आता है। 

यदि आप अपने अहंकार को देखना शुरू कर सकते हैं, आपको आश्चर्य होगा कि कोई भी निरर्थक चीज इसको बढ़ा सकती है और इस को घटा भी सकती है। यह बिना कारण आहत हो सकती है । यह इतना महत्वपूर्ण हो जाता है। 

फिर इसका प्रति-अहंकार भी आता है। वह भी आपको छोड़ना होगा। इस प्रति-अहंकार में आप के अनुबंधन हो सकते है, गलत गुरु और बचपन के अनुबंधन के कारण। उदाहरण के लिए, यदि कोई ईसाई है, उसके लिए पादरी ही सब कुछ है, या कोई हिंदू है, उसके लिए एक विशेष मंदिर ही सब कुछ है। यह सब अनुबंधन है। यह सब अनुबंधन क्यों है, क्योंकि उसका सच खोजे बिना, आपने उन्हें वैसे ही स्वीकार कर लिया है। यह साधारण बात है। 

यदि आप इनके बारे में सच्चाई पता लगा सके, आप इनका त्याग कर देंगे ‌। आप कर सकते हैं और नहीं भी। ऐसे बहुत से लोग हैं जो सच्चाई जानते हैं फिर भी वह छोड़ नहीं पाते। मनुष्य एक जटिल प्राणी है । अगर उन्हें सच्चाई पता भी है फिर भी वह त्याग नहीं करेंगे। लेकिन मान लीजिए कि आप इन सबके बारे में सच्चाई पता लगाने का प्रयास करते हैं, तो भी आप त्याग कर सकते हैं और नहीं भी। लेकिन पूरी चीज़ पर वापस जाकर हर एक चीज का पता लगाने के लिए, अनुसूची बनाने से कि सुबह में यह खोज लूंगा, शाम को मैं यह खोज लूंगा, आपका पूरा जीवन एक एक सच्चाई पता लगाने में ही निकल जाएगा और अंत में आप पाएंगे कि आप अपनी कब्र तक पहुंच गए हैं। तो यह प्रक्रिया भी आपकी मदद करने वाली नहीं है। परमात्मा की कृपा से आप सब आत्मसाक्षात्कारी हैं आप एक सेकंड में पता लगा सकते हैं आप अनुबंधन की तरफ हैं या नहीं। अगर आपका बायां पक्ष पकड़ रहा है, तो आप आदतों के वश में है। अगर आपका दायां पक्ष पकड़ रहा है तो आप अहंकार यात्रा पर हैं। ठीक है। तो अब आप एक बहुत सरल तरीका जानते हैं कि चैतन्य के जरिए आप यह पता लगा सकते हैं कि आप में अहंकार है या प्रति-अहंकार या फिर आप डाँवा डोल हैं। 

यह सबसे बड़ी चीज है जो कि हमें मिली है क्योंकि यह है मेरी तैयारी है । मेरी सबसे पहली तैयारी यह है कि आपको आत्मसाक्षात्कार दूं। पहले आप को आत्म साक्षात्कार दूं। एक बार आपको बोध हो जाता है, फिर मुझे ज्यादा कहने की जरूरत नहीं पड़ती। 

यदि आपकी बाईं ओर पकड़ है, तो आपको दर्द होगा, ऐसे वैसे। यदि आपकी दाएं ओर पकड़ है, तो आपको स्वास्थ्य या किसी चीज की समस्या होगी। तो आप मेरे पास आएंगे और मैं आपको बता सकूंगी। यह मेरी स्वयं की तैयारी है कि आपको सचेत और जागरूक बनाना है, ताकि आपके पास प्रकाश हो यह सब देखने के लिए। अब आपकी तैयारी हर समय इस जागरूकता का उपयोग करने की होनी चाहिए। भविष्य में, मैं आपको यह बोलूंगी कि इस ज्ञान का हर समय उपयोग करें जो कि आप भूल जाते हैं।   तो पहली चीज है कि यह तैयारी हमारे लिए कर दी गई है- हमारे पास चैतन्य है। हमारे पास ज्ञान है इसको सत्यापित करने के लिए और हमें इसका उपयोग करना चाहिए कि हम एक नए आयाम में है। यदि आपके पास यह स्वीकृति है, तो आप का मूल्यांकन बेहतर होगा। लेकिन यह स्वीकृति ही गायब है। 

अब संस्कृत में एक शब्द है “अभ्यास” कि वह चीज प्रतिदिन करना जो कि आप याद रखें कि आप आत्मसाक्षात्कारी हैं और आपकी जागरूकता सामान्य जन की तरह नहीं है। तो पहली तैयारी यह है कि आप अपने को तैयार करें और अपने आप को बोलें कि आपके पास एक नई जागरूकता है, खुद को जताने के लिए है। आप देखते हैं कि विश्वविद्यालय में, जब आप ग्रेजुएट होते हैं, तो उसके लिए एक समारोह आयोजित किया जाता है। आपको एक गाउन के साथ जाना होता है और वह आपको एक प्रमाण पत्र  वैगरह देंगे । यह क्यों जरूरी है ? क्योंकि आप भूल सकते हैं कि आप ग्रेजुएट हैं। हाँ ! और वास्तव में आपके साथ यही होता है कि आप भूल जाते हैं कि आप आत्मसाक्षात्कारी हैं। मेरा मतलब है हमने एक आयोजन किया और मतलब सब कुछ किया यह साबित करने के लिए कि आप आत्मसाक्षात्कारी आत्मा हैं। लेकिन यही हमारे लोगों  में गायब है कि वे  नहीं समझ पाते कि वे  आत्मसाक्षात्कारी आत्मा हैं और वे  ऐसे स्तर पर हैं जहाँ  और कोई नहीं है। दो बार पैदा हुए लोग हैं जो कि बहुत दुर्लभ है। शायद ही आप ऐसे लोग पाएंगे जो दो बार पैदा हुए हैं। मेरा मतलब है कि सारे जीवन मुझे कोई नहीं मिला, सिवाय मेरे पिता के और एक-दो इधर उधर। उनकी गिनती नहीं होनी चाहिए क्योंकि मैंने मेरे पिता खुद ही चुने। तो यदि आप अपनी बुद्धिमता को परिचित कराते हैं कि ” मैं एक आत्मसाक्षात्कारी आत्मा हूं” तो आप देखेंगे कि आपकी प्राथमिकताएं बहुत जल्दी से बदल रही हैं । मान लीजिए कोई आपको बहुत बड़ी संपत्ति या दौलत देता है, तुरंत आप उसकी ओर सचेत हो जाएंगे और आपकी चाल बदल जाएगी। जब आप विद्यार्थी होते हैं तो आप ऐसे चलते हैं, आपको डिग्री मिलती है तो अचानक आपकी चाल बदल जाती है। आपके आत्मसाक्षात्कार के बाद कैसा? 

[किसी अन्य योगी से- आपको देखकर यहां खुशी हुई, परमात्मा आपको आशीर्वाद दे। ]

आपके आत्मसाक्षात्कार के बारे में क्या? अब आपको अपना आत्मसाक्षात्कार मिल गया है तो आप इसके बारे में क्या कर रहे हैं? पहली तैयारी है कि आपको यह पहचानना होगा कि आप आत्मसाक्षात्कारी हैं। हमको एक अलग तरीके से बात करनी होगी क्योंकि हम आत्मसाक्षात्कारी हैं । हम लोग एक भिन्न ज्ञान के लोग हैं। एक अलग जागरूकता के लोग हैं जैसे कि मैंने आपको बताया। अब देखिए यह एक बहुत सुंदर इमारत है और हम इससे इतना प्रभावित हैं, सुंदर दिख रही है। इतने अच्छे से बनाया गया है, इतनी सुंदरता से और मनुष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, ठीक है? लेकिन परमात्मा के लिए एक छोटी हरी पत्ती, इस इमारत और ऐसी कई इमारतों से ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि वह पत्ती जीवित है और एक पक्षी जो कि ज्यादा जागरूक है, ज्यादा महत्वपूर्ण है इस पत्ती से । तो आप जो मनुष्य हैं जो कि इतने जागरूक हैं, वे  परमात्मा के लिए कितने महत्वपूर्ण होंगे ? स्वयं परमात्मा को आप में कितनी रुचि होगी, ज़रा सोचिए। एक बार आप इस बात को पहचान लेते हैं, तो आप यह भी जान जाएंगे कि आप ईश्वरीय योजना में कितने महत्वपूर्ण हैं। विश्व की योजना की बात नहीं कर रही हूं । यह ईश्वरीय योजना है। उनके आशीर्वाद की सारी ताकतें और उनके  सारे सिपाही, आपके साथ हैं, आपकी मदद के लिए, आप को सहारा देने के लिए, आपको वह सब देने के लिए जो आप चाहते हैं। आप एक मंच पर है और वह आप की देखभाल कर रहे हैं। मेरा मतलब है कि अब आप एक मंच पर प्रवेश कर चुके हैं।

लेकिन मैं सहजयोगियों  को देखती हूं, एक बार उनको ‌आत्मसाक्षात्कार मिल जाता है, तो मुझे पता नहीं कि उन्हें क्या हो जाता है कि  अगर वह अपना अहंकार त्याग देते हैं , वह ऐसे बन जाते हैं जैसे कि… क्या बोलूं कि…केले ।‌ आप में से हर एक ईश्वर द्वारा बनाए गए विशेष हैं। अब आप खुद को देखें, अपने बारे में सोचें। आप वह लोग हैं जो जीवन के बारे में इतना सब जानते हैं। यहां तक कि यदि आप में थोड़ी सी पकड़ भी आ जाती है, कोई बात नहीं। लेकिन आपको पता है आप में पकड़ आ गई है। आप ही सोचिए। 

तो यह दूसरी तैयारी है, यह समझने की है कि स्वयं परम् पिता परमेश्वर आपके लिए चिंतित हैं । उसने सबको आपकी मदद के लिए भेजा है “आगे जाओ”। तो आपको अपने पैसों की चिंता करने की जरूरत नहीं है, और किसी चीज की चिंता करने की जरूरत नहीं है। तो तीसरी बात खुद ब खुद आ जाती है कि आपको इन सब चीजों की चिंता करने की जरूरत नहीं है। इन सब की देखभाल की जाएगी। आप सबकी देखभाल की गई है, आप जानते हैं। हर किसी की मदद की गई है। यदि आप जानते हैं वे सर्वशक्तिमान हैं और वह करुणामयी   हैं, और आप उनकी करुणा में आ गए हैं – ज़रा सोचिए ! अपने आप को उस  बिंदु पर स्थापित कीजिए। यह एक तैयारी है जो कि करनी है कि ये परमात्मा हैं जिन्होंने आपको यह सब दिया है। और फिर आधुनिक सहजयोगी विशेष रूप से आशीर्वादित हैं क्योंकि उनके पास “वॉकी टॉकी” है। उनकी किसी भी समस्या को व्यक्तिगत रुप से हल किया जाता है। ऐसा आशीर्वाद पहले कभी नहीं था। 

लेकिन मुद्दा अहंकार का है। शुरुआत में आपने देखा कि यह अहंकार है। अगर आप में अहंकार है, तो आप यह स्वीकार ही नहीं करेंगे कि आप एक आत्मसाक्षात्कारी आत्मा हैं। सोचिए, कितनी नासमझी है। यदि आप में प्रति-अहंकार है तो भी आप स्वीकार नहीं करेंगे। आप उसी दशा में आ जाएंगे जहां पर आप पहले थे। आप कभी नहीं स्वीकार करेंगे कि आप आत्मसाक्षात्कारी हैं यदि आपको प्रति अहंकार है। आप कभी स्वीकार नहीं करेंगे- ” यह कैसे हो सकता है मां? आखिरकार मैं एक साधारण व्यक्ति हूं, मैं दूसरों को ठीक कैसे कर सकता हूं, मैं दूसरों को आत्मसाक्षात्कार कैसे दे सकता हूं, यह मुमकिन नहीं है”   इस तरह की विनम्रता बेकार है। यह तो ऐसी बात हो गई जैसे कि एक फ़ौजी बोले कि मैं कैसे मार सकता हूं? यह तो यह बात हो गई। इस तरह की विनम्रता का कोई अर्थ नहीं है – “मैं कैसे कर सकता हूं मां, मैं क्या कर सकता हूं? मैं अच्छा नहीं हूं, किसी काम का नहीं हूं।” इस प्रकार की भाषा को त्याग देना चाहिए। अगर यह अहंकार होता है तो यह और भी बुरा होता है।आप अपने आपको हानि पहुंचा सकते हैं और सहज योग को भी हानि पहुंचा सकते हैं,बहुत तीव्र। अहंकारी लोग बेहद कठिन होते हैं, वह ऐसे अवरोध होते हैं क्योंकि वह अपनी बुद्धिमता और समझ के माध्यम से ऐसे वैसे सब कुछ करने की कोशिश करते हैं और इस तरह की जुगत चलती रहती है, और आप उन्हें फिर वापस लाने की कोशिश करते हैं, और वह चले जाते हैं। यह उबाऊ है,आप जानते हैं,बहुत उबाऊ है। क्योंकि आप जानते हैं मैं नाटक देख रही हूं। मान लीजिए यह एक चाय का कप है और मैं चाहती हूं कि यह आप इसे पीयें । अब कप को आपके होठों तक ले जाने के बीच में आप इसे दूर धकेल देते हैं , हर बार इसे दूर धकेल देते हैं, तो मैं कैसे इसे आपके होठों तक लाऊं? यह बहुत उबाऊ है। और यह अहंकारी प्रवृत्ति, आश्चर्यजनक रूप से पश्चिमी देशों में बहुत प्रचलित है। और मुझे समझ नहीं आता,वह बिना तर्क किए, सभी  प्रकार की गंदगी, सभी प्रकार की विकृतियों तक ले सकते हैं। किसी भी प्रकार की विकृति और बोलेंगे कि ” इसमें गलत क्या है?” लेकिन उनके लिए सबसे खराब चीज़ इस तथ्य को स्वीकार करना है कि वह सहज योग के माध्यम से आत्मसाक्षात्कारी हैं। वह सत्य के अलावा और सब कुछ ले लेंगे। यह अहंकार ऐसा है जैसे आपके सर पर घोड़ा बैठा हुआ है। आपको घोड़े पर बैठना है और घोड़ा आपके सर पर बैठा है। आप घोड़े का भार उठा रहे हैं – जरा सोचिए | यह सब चीज़ में क्या समझदारी है?  

यदि आप अपना विश्लेषण करना शुरू कर दे तो आप एक अलग ही यात्रा पर निकल जाते हैं। आप ऐसे यात्री हैं जैसे कि “जैक इन द बॉक्स”(एक प्रकार का खिलौना जिसमें स्प्रिंग लगी होती है) क्योंकि आप एक के बाद एक यात्रा करे जा रहे हैं जैसे कि एक स्प्रिंग। देखिए, जब आप अपना अहंकार देखने की कोशिश करते हैं तो आप प्रति-अहंकार की यात्रा पर चले जाते हैं। आप अपने प्रति-अहंकार को देखने की कोशिश करते हैं तो आप अपने अहंकार की यात्रा पर चले जाते हैं। मेरा मतलब है एक आदमी जो इस यात्रा से उस यात्रा या इस गलती से उस गलती पर उछलता रहता है, वह ऐसा आदमी है, जो हमेशा यात्रा कर रहा होता है और उसे नहीं पता होता अब उसे नीचे उतरना है या आगे जाना है। यह ऐसा है। मन की आदत इतनी अहंकारी होती है कि आप किसी भी बात पर सवार हो जाते हैं। लेकिन बात यह है कि आप यात्रा नहीं करते लेकिन यह अहंकार आपको इस यात्रा पर ले जाता है। जब भी कोई ऐसी बात सामने आती है तो यह आपको पकड़ लेती है और प्रगति बहुत धीमी हो जाती है। 

अब देवत्व के साथ परेशानी यह है कि उसके अपने शिष्टाचार/नवाचार  हैं। अगर राजा को आपके घर आना है तो आपको जाना होगा और राजा को आमंत्रित करना होगा। राजा आपको नहीं लिखते हैं कि “कृपया मुझे आमंत्रित कीजिए” क्या वह करते हैं? आखिरकार वह राजा हैं । और वह लोगों से विनती नहीं करता कि  “कृपा करके मुझे आमंत्रित कीजिए।” यह श्रीमान अहंकार उम्मीद करता है कि देवता आपको आमंत्रित करें। परमात्मा तुम्हें लाने के लिए अपने नियम से हटकर कार्य करें। सरल शब्दों में, अहंकार,  किसी का स्वयं की कीमत के बारे में बिल्कुल गलत विचारों के अलावा कुछ भी नहीं है, जिसके द्वारा आप सोचते हैं कि “मैं सब कुछ हूं” आप क्या हैं? अब प्रति अहंकार में ना जाए कि “हम क्या हैं?” कुछ भी तो नहीं! हम एक बीज को अंकुरित भी नहीं कर सकते। 

हर दिन के जीवन में आप इसे स्पष्ट रूप से देख सकते हैं, अहंकार कैसे कूदता है। मान लीजिए कोई कहता है कि ” अंग्रेजों में यह गुण है” व्यक्ति बहुत खुश हो जाता है “ओह क्या तारीफ है ! क्या तारीफ की है अंग्रेजों के लिए।” “हम तो अंग्रेज हैं ” 

कोई कहता है कि ” अंग्रेजों में इन गुणों की कमी है” बस खत्म। आप बिल्कुल… फिर वह व्यक्ति इस दुनिया का सबसे खराब व्यक्ति है। सबसे पहले तो आपको पता होना चाहिए कि ना तो आप अंग्रेज हैं ना ही भारतीय ना कुछ। आप बस मनुष्य हैं। अज्ञानता इस अहंकार के लिए जिम्मेदार है। यह आपके बारे में पूर्ण अज्ञानता है जो आपको अहंकार देती है। इसलिए एक बार जब हम प्रकाश की ओर जा रहे हैं तो हमें पता होना चाहिए कि हमारी क्या बाधाएं हैं- यह तैयारी है। यह हमारी अज्ञानता है हमारे  ही बारे में, इसलिए हम अपने आप को देखेंगे। अज्ञानता की वजह से, अहंकार और प्रति अहंकार हम पर आ गया है इसलिए हम इन से कोई सरोकार नहीं रखेंगे। मान लीजिए आपको हिमालय पर जाना है। ठीक है? वहां आप एक अभियान के लिए जा रहे हैं।  आपसे सबसे हल्के सामान लेकर जाने की उम्मीद होती है। आप टिफिन के तीन समान, इसके चार सामान, उसके पांच सामान, वहां सोने के लिए छोटा सा बिस्तर, यह सब लेकर नहीं जाते। यह सब छोड़कर जाते हैं। ठीक उसी प्रकार, जब आप अपने को जानने के अभियान पर निकल रहे हैं, जो कुछ भी आप पर वजन है, उसे उतार देना चाहिए। तो वापस से हम अहंकार और प्रति-अहंकार पर आते हैं। दरअसल ये दोनों भयानक हाथी हैं जिन्हें नीचे ज़मीन पर रखा जाना चाहिए। इसलिए हम अपना अध्ययन स्वयं करते हैं। देखिए यह सब तैयारी की जरूरत है क्योंकि पहले से ही हम इस तरफ या उस तरफ बहुत ज्यादा जा चुके हैं। तो तैयारी आपको नीचे लाने के लिए है- “यहां साथ आओ, अब आप मध्य में खड़े हो।” या हम आपको नीचे लाते हैं और आप मध्य में खड़े हो तैयारी और कुछ भी नहीं, बस आपको नीचे लाने की है।

तो हम अहंकार की ओर बढ़ते हैं और देखते हैं अहंकार का  सूक्ष्म,  अधिक सूक्ष्म और सूक्ष्मतर रूप क्या है। यहां तक कि प्रति-अहंकार में भी सूक्ष्म, अधिक सूक्ष्म और सूक्ष्मतर रूप है। 

अहंकार को समझने के लिए आपको देखना चाहिए कि आप जीवन के बारे में क्या योजनाएं बनाते हैं? यह बहुत सरल है। आपकी आगे की क्या योजनाएं हैं? प्रति अहंकार को समझने के लिए आपको देखना चाहिए कि आप को सबसे ज्यादा क्या प्रभावित करता है, क्या आपको बहुत दुखी करता है। या फिर आप बोल सकते हैं कि आपको क्या बहुत खुशी देता है और क्या बहुत दुखी करता है। दोनों चीजें सुख और दुख, इन दो पेड़ों की छाया है-एक अहंकार और दूसरे प्रति अहंकार। बस अपने आप को देखिए। आपको बहुत ज्यादा क्या प्रसन्न करता है- अच्छे कपड़े? अच्छा रहन सहन? या फिर जब आपका नाम किसी पुस्तक में छपता है या ऐसी निरर्थक चीजें जो आपको हंसाती हैं, आप देखें! आपको क्या दुखी करता है? जब किसी प्रकार से आपका दिल टूटता है और वैसे ही कुछ? इस प्रकार की सब बकवास। 

दोनों चीजें आप स्वयं नहीं हैं। यह बिल्कुल आपसे बाहर हैं । तो अंदर क्या है, यह जानने के लिए, जो बाहरी है उसको निकालना होगा। अगर आपको फल का स्वाद लेना है, तो उसके आवरण को निकाल देते हैं , उसको छील देते हैं। ठीक उसी प्रकार यह भी छील देना चाहिए। अब यह आपको अपने भीतर और बाहर भी देखना चाहिए। आप इसे स्पष्ट रूप से देख सकते हैं, यह बहुत आसान है। आप दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, आपका  दूसरों के साथ क्या रिश्ता है। यह शायद बाहर से जानना ज्यादा आसान है बजाय अंदर के। जब आप दूसरों से बात करते हैं, तो आपका क्या प्रभाव पड़ता है? आप दूसरों द्वारा सराहना पाते हैं या नहीं? सहयोगियों के बीच? आप सहयोगियों के रूप में एक दूसरे सहजयोगी का सम्मान करते हैं या नहीं? क्या आप उम्मीद करते हैं कि जिस स्तर पर आप हैं दूसरे भी सहजयोगी भी पहुंचेंगे और उन्हें उचित सम्मान देना चाहिए? और आपको यह भी देखना चाहिए कि जब कोई दूसरा सहजयोगी जिसने कुछ हासिल किया है या जो बेहतर स्तर पर है, तो आपको ऊपर खींचने की कोशिश करता है- आपको यह पसंद है या आप इसका विरोध करते हैं इसके बारे में परेशान होते हैं? यदि आपसे कोई कहता है- “ऐसे किया जाना चाहिए वैसे किया जाना चाहिए” – क्या आप इसे ऐसे लेते हैं जैसे कि उसने आपके साथ दुर्व्यवहार किया है? अगर कोई आपको सहजयोग के बारे में बता रहा है तो आपको सामान्य रूप से उसका आभारी होना चाहिए। सहज योग से संबंधित आप मुझे कुछ भी बात बताते है तो मैं आपकी आभारी होती हूं, कोई भी बात। मुझे ऐसे भी बताते हैं कि “मां, शायद यह ठीक नहीं रहेगा, आप देखिए मनुष्य ऐसे ही हैं।” मैं इसे स्वीकार करती हूं और आपकी इच्छाओं के अनुसार करती हूं। आप इसे पसंद करते हैं या नहीं?  इस तरह से आप अपने अहंकार का पता लगाएंगे। यह केवल आपका श्रीमान अहंकार है। दरअसल यह बेहतर होगा कि कोई दूसरा व्यक्ति आपसे और आपके अहंकार, दोनों से लड़े। यदि आप से कोई बोले कि “यह करना चाहिए” “अच्छा, ऐसा करता रहा हूं। ठीक है। तुम आओ मेरी मदद करो। तुम मुझे खींच लो। इसका हल कर दो। कोशिश करो और मेरी मदद करो। मैं भयानक हूं।” यदि आप ऐसा करते हैं, तो यह तरीका है जिससे आप अपने अहंकार पर काबू पा सकते हैं। लेकिन अगर दूसरा व्यक्ति कहे ” आप बहुत अच्छे हैं। ठीक है आप जैसा चाहे वैसा करें” और फिर आप बहुत खुश महसूस करते हैं। यह व्यक्ति इतना ठीक नहीं है और ना आप ठीक हैं। क्योंकि आपको लोगों को खींचना होगा। उदाहरण के लिए आप समझे कि आप किसी संकट में है, आप एक आपात स्थिति में है, लोग डूब रहे हैं और कुछ लोग उन्हें बाहर निकालने की कोशिश कर रहे हैं, वे खुद आधे रास्ते नीचे हैं और आधे रास्ते ऊपर, वे आपको बाहर खींचने की कोशिश कर रहे हैं, उस समय अगर वह कहते हैं, “आप मेरा हाथ पकड़ो” यदि आप इसके बारे में परेशान होते हैं, तो आप समझदार नहीं है। अब, सहज योग में नेता जैसा कुछ नहीं है। मेरा मतलब है किसी को नेता के रूप में नियुक्त नहीं किया गया है। कोई भी ऐसा करता है तो वह नीचे चला जाता है। लेकिन भीतर एक अंतर्जात नेतृत्व का गुण है ऐसा व्यक्ति अत्यंत विनम्र और अनुकूल होता है, और आकर्षक और प्रभावशाली भी होता है, प्रभावशाली होना भी चाहिए। और किसी को इस चीज़ का बुरा नहीं मानना चाहिए क्योंकि अगर वह कहता है कि “जाओ और यह चुरा लो” या “तुम जाओ और ऐसी बेकार की चीजों से जुड़ जाओ”, तो बेशक वह गलत है। अगर वह यह कहे कि आप को “सहजयोग में आपको ऊंचा उठना है” और अगर वह यह हावी होकर भी कहे, तो मेरा मतलब है यह तो बहुत अच्छी बात है। मान लीजिए आपके पड़ोस में कोई है जो हमेशा आपकी आलोचना करता है, तो एक तरह से यह आशीर्वाद है क्योंकि यदि कोई आपकी आलोचना कर रहा है, तो वह हमें सही करने की कोशिश कर रहा है। मतलब हमें यह कबूल करना चाहिए और इसका बुरा नहीं मानना चाहिए मान लीजिए कोई आपके बारे में कुछ बोल रहा है और यदि वह सत्य नहीं है, इसके बारे में बुरा मानने वाली क्या बात है? अगर वह आपके बारे में झूठ बोल रहा है, तो इसमें डरने की कोई बात नहीं है। अगर वह सत्य बोल रहा है तो आपको शुक्रगुजार होना चाहिए। कभी कभी सच बहुत कड़ा हो सकता है,  बहुत बहुत खराब हो सकता है। लेकिन अच्छी बात है। मराठी में एक कहावत है- “जो व्यक्ति आपके दोष बताएं, जो निंदक है, उसका घर नजदीक में वही बनाए रखिए। ऐसे आदमी का घर पास रखो जो आपकी निंदा करता हो। ताकि आप अपने दोषों को जाने, आप देखिए, यदि आप अपने आप को सुधार करते है तो यह बुद्धिमान रवैया है। क्योंकि आप अपने आप को सही नहीं कर सकते, तब एक दर्पण रखिए, जिसके द्वारा आप अपने आप को ठीक करते हैं। 

मेरा मतलब है आपको ऐसे व्यक्ति का शुक्रगुजार होना चाहिए जो आपकी निंदा करता है। यदि झूठी प्रशंसा करके वह आपको पूरी तरह से नष्ट करने जा रहा है, तो आपको क्या फायदा होगा? झूठे गुरु यही तो कर रहे हैं। वह सभी आपको सिर चढ़ा रहे हैं और आप को नष्ट कर रहे हैं और अंत में आपको पता चलता है कि आप मूर्ख बनाए गए हैं।

इसलिए यदि आप उस स्थिति को स्वीकार करते हैं जिसमें आप कहते हैं, “ठीक है अगर यह सत्य है, तो यह मेरे अहंकार के लिए बहुत बेहतर है और यदि वह सत्य नहीं है तो इतना महत्वपूर्ण नहीं।” ऐसा रवैया सहज योग में बहुत मददगार है, स्वयं के प्रति बहुत समझदार रवैया है। और जब आप इस रवैया के साथ आगे बढ़ेंगे, तो आप आश्चर्यचकित हो जाएंगे कि लोग क्या कहते हैं, इससे आप आसानी से आहत नहीं होंगे । आप परेशान नहीं होंगे। आप जानते हैं लोग मेरी कितनी आलोचना करते हैं, और सब प्रकार की बातें करते हैं, और मुझसे बहस करते हैं, और मैं परेशान नहीं हूं क्योंकि मुझे पता है वह मूर्ख है। उसमें क्या है? भले ही वह मेरी प्रशंसा करें, इसमें क्या है? आखिरकार वे जो भी प्रशंसा करते हैं वह मेरा स्वभाव है, इतना महान कुछ भी नहीं। देखिए इस से कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं सिर्फ अपने चक्रों को काम करते हुए देख रही हूं। मैं इसकी परवाह नहीं करती। ठीक उसी प्रकार आपके साथ भी होगा और आप परेशान नहीं होंगे। आप का भार उतारने  में मदद करेगा। यह आपके भार को उतारने में मदद करेगा। 

और इसका दुखद भाग, उसमें हमें अपने आप को इस तरह से तैयार करना है- ‘कि कुछ भी मुझे दुखी नहीं कर सकता।”अगर मैं आत्मसाक्षात्कारी हूं तो मुझे क्या दुखी कर सकता है? मान लीजिए एक ठोस उदाहरण ले- कि आप किसी से शादी करना चाहते हैं- और आप पाते हैं कि उस व्यक्ति ने दुर्व्यवहार किया या आप उससे शादी नहीं कर सकते, तो क्या हुआ? “मैं यहां हूं। मुझे मेरा मूल्य पता है।” तो आपका मूल्य, आपका आत्मसम्मान ऐसा होना चाहिए कि कुछ भी आपको दुखी नहीं कर सकता। यह सब एक नाटक चल रहा है। यह सभी एक ड्रामा है। लेकिन इन चीजों को आपकी महान बुद्धिमता द्वारा स्वीकार करना चाहिए क्योंकि मैं क्या पाती हूं कि पश्चिमी दिमाग के साथ कठिनाई यह है कि इनमें बहुत अधिक बुद्धि है, बहुत ज्यादा विकसित हैं । तो यह ऐसी चिकनी सतह है जिस पर कुछ नहीं टिकता। पहली सरल बात यह है कि आप आत्मसाक्षात्कारी आत्मा हैं , जिसे किसी तरह यहां स्थापित होना चाहिए और अपनी बुद्धि को कहना कि आप आत्मसाक्षात्कारी हैं। सब अपने ह्रदय से विश्वास करें ना कि बुद्धि से। पहली बात यह कि आपको अपनी बुद्धिमता को बतानी है कि  आप आत्मसाक्षात्कारी हैं और यह भी कि ” मुझे कुछ भी दुखी नहीं कर सकता और कुछ भी मुझे बेवकूफ नहीं बना सकता।” 

अगर यह तीन बातें आपकी बुद्धिमत्ता पर बैठ जाती है, तो बाकी सब मैं देख लूंगी। अगर यह तीन बातें आप अपनी बुद्धिमता पर ठीक कर ले, तो आपको आश्चर्य होगा कि आप बहुत ही प्रेम करने वाले व्यक्ति बन जाएंगे, दूसरों के लिए अत्यंत विचारशील। यह सब स्वतः कार्यान्वित होगा। क्योंकि आप देखें जब आपकी बुद्धिमत्ता ऐसी होती है, कुछ भी अंदर नहीं जाता है- तो आप हमेशा दूसरों के बारे में चिंतित रहते हैं। या तो आप दूसरों से भयभीत होते हैं या फिर दूसरों पर आक्रमक रहते हैं। आप सीधे आगे नहीं जा सकते। ऐसा ही होता है। अगर आप यह तीन बातें को स्पष्ट रूप से समझ लें… 

योगिनी:- कोई भी ऐसा नहीं करता।

श्री माताजी: यह कहती है कि “कोई भी ऐसा नहीं करता है।” यही तो समस्या है। बिल्कुल! यह कितनी व्यवहारिक है। यह बहुत व्यवहारिक है, आप देखिए। अभी-अभी गाड़ी में यह बोल रही थी- “हर कोई जो करना चाहिए उससे अलग ही करता है। जैसे कि यह बोली- “वे शादी करेंगे, आपको शादी करनी होगी। और अपनी पत्नी अपने पति और अपने बच्चो से आनंद प्राप्त करो। लेकिन वह सब करेंगे सिवाय इसके। यह ऐसा है। आप देखिए कोई भी ऐसा नहीं करता। यह बहुत व्यावहारिक है आप ऐसा करें तो। माताजी को सुनना, वह चीज नहीं है जो मैं चाहती हूं, मैं चाहती हूं कि आप करें, इसको करना मुख्य है। बैठ जाए और अपनी बुद्धिमता को, अपनी बुद्धि को बोले- “श्रीमान बुद्धि, अब आप कृपया सुने- यह मेरे साथ हुआ है और ऐसा मैं हूं। मैं एक आत्मसाक्षात्कारी हूं और अन्य किसी चीज से मुझे मुग्ध नहीं होना चाहिए, और कुछ भी मुझे दुखी नहीं कर सकता।” बस इतना ही। कोई भी मुझे चोट नहीं पहुंचा सकता। अन्यथा आप “आआहहहह, आआहहहह” ऐसे, दो तरह से हो जाते हैं। कभी भी सीधे तरीके से नहीं, जहां आप सिर्फ करुणा और प्रेम है । बिल्कुल अपने ऊपर निर्भर बिल्कुल। और फिर तुम्हारे साथ मैं हूं।   और आप उन ऋषियों का सोचें जिनके पास मार्गदर्शन के लिए कोई नहीं था, कोई भी कुछ बताने के लिए नहीं था, किसी से बात करने के लिए नहीं था। आपकी सारी ग्रंथियां वगैरह मैं तोड़ रही हूं। आपको कुछ भी नहीं करना लेकिन केवल एक चीज़ कि आप खुद की ग्रंथियां, अपनी स्वयं की गांठें ना बनाएं। यदि आप नहीं बनाते हैं, तो चीजें काम करेंगी। यह एक बहुत सरल तैयारी है। इसलिए मुझे बताने की जरूरत नहीं है कि “अपने भाइयों और बहनों को प्यार करो और यह और वह।” अन्यथा दूसरे ढंग शुरू हो जाते हैं। लेकिन आप सिर्फ अपनी बुद्धि को कहिए। यह बुद्धि को प्रकाशित करना है। अगर ऐसी बुद्धि आपके अंदर आती है तो यह विवेक है। यह कि कोई मुझ पर हंस रहा है या हर कोई मेरा मजाक उड़ा रहा है या कोई मुझ पर हावी होने की कोशिश कर रहा है- यह सभी भय और सभी आक्रामकता, चुटकियों में गायब हो जाएंगे। लेकिन अब आप एक फूल हैं और आप सुगंधित है और खुशबू बह रही है और आपके पास कई मधुमक्खियां आने वाली हैं, जो कि आप हैं! यह शुरुआत है।

अपने आप को इस तरह बताते जाएं। यदि आप ऐसा कर सकते हैं, अगर आप अपनी बुद्धिमता को इस स्तर पर ला सकते हैं, ना ज्यादा ऊंचा ना ज्यादा नीचा, लेकिन मध्य में, कुछ ही समय में सब कुछ ठीक किया जा सकता है। अब जब मैं आप लोगों के साथ रह रही हूं, आपकी कुंडलिनियों से गुजर रही हूं, यह सब, मैं बस यही बात पाती हूं आप अपनी बुद्धिमता को यह नहीं बताते। ताकि आप सभी प्रकार की कट्टरता, सारे भय और यह, और अंधविश्वास सभी प्रकार की बेकार चीजों को त्याग दें। क्योंकि कुछ भी आपको नुकसान नहीं पहुंचा सकता। कोई भी सितारे आप को नुकसान नहीं पहुंचा सकते, ना कि आपका विज्ञान आपको हानि पहुंचा सकता है, आप किस समय पैदा हुए, कुछ भी आपको नुकसान नहीं पहुंचा सकता क्योंकि आप इनके परे पर हैं। तो ज्योतिषी खत्म हो गई है, जन्मकुंडली समाप्त हो गई है। और सारी चीजें… और आपकी ऐसी क्या अन्य चीजें हैं? 

योगी: कर्मा

श्री माताजी: कर्मा समाप्त हो गए।

योगी: हस्तरेखा विज्ञान

श्री माताजी: हस्तरेखा विज्ञान समाप्त हो गया है।

योगी: जैविक पुनर्जन्म 

श्री माताजी: जैविक पुनर्जन्म समाप्त। जैविक पुनर्जन्म समाप्त हो गया है, यह सब। मेरा मतलब है आप इन सब के परे हैं। और फिर इसका दूसरा सिरा- सारे प्रेम प्रसंग समाप्त हो गए हैं। प्रेम संबंधों का सारा भय समाप्त। यह सब समाप्त, बकवास। अब केवल प्रेम है। अब जो भी आपको मिलेगा, उस व्यक्ति को प्रेम करेंगे और वह आपको प्रेम करेगा। अगर वह देखभाल नहीं करता और प्यार नहीं करता, तो कोई फर्क नहीं पड़ता तब तुम प्रेम करते हो, बस समाप्त। सारी अपेक्षाएं खत्म, सारी अपेक्षाएं खुशी पाने की खत्म हो गई है। आनंद अकेला है और अपेक्षा रहित है। जब आप आनंद में होते हैं तो आप उस अवस्था में होते हैं जब कोई हलचल नहीं होती। आप बस वहां हैं। तो इन दोनों भावनाओं से छुटकारा पाएं- “मैं बहुत खुश हूं”

“अब मैं आनंद में हूं”। अब मैं आनंद में स्थापित हूं, और यह अब मुझे अपने अंदर विकसित करना है, ना कि मेरे पुराने तरीके। यह मृत है, समाप्त हो गया है। जब पेड़ के पत्ते झड़ जाते हैं, तो लोग उनसे दोबारा उठकर और पेड़ से चिपक जाने की दुबारा अपेक्षा नहीं करते! ठीक उसी प्रकार जो खत्म हो गया सो खत्म हो गया। अब हमारे भीतर जो आ रहा है उसको विकसित होने दो और इसका पोषण अभी होना है- वह आनंद, वह गरिमापूर्ण राजसी, आंतरिक सौंदर्य है। तब आप परेशान नहीं होंगे या परवाह नहीं करेंगे कि दूसरों को आपके बारे में क्या कहना है। यह होगा। यह होगा अगर आप अपनी बुद्धिमता पर डाल देंगे। और लोग आप में यह देखेंगे कि आप कुछ भी अजीब नहीं करते, आप कुछ भी गलत नहीं करते। लोग आपको पसंद करते हैं। यहां तक कि जो लोग आत्मसाक्षात्कारी नहीं है, वह भी आपकी गरिमा को देखेंगे, आप कितने प्रतिष्ठित हैं क्योंकि आपको आपकी खुद की समझ है। यह बहुत सरल है लेकिन जैसा कि इन्होंने बोला कि ऐसा कोई नहीं करता। अपनी बुद्धिमत्ता को बताइए। अब भी मैं पाती हूं कि कुछ लोगों के अंदर वह आनंद रिस रहा है। लेकिन आपको उसमें समृद्ध होना है। आपको उसमें आना होगा, सब छोड़कर जो निरर्थक है। नहीं तो आप ऐसे ही बाहर चले जाएंगे। इसके लिए शायद ही कुछ समय या कुछ अन्य लगता है। जो भी गलत किया जा चुका है, गलत हो चुका है, बस समाप्त। बस समाप्त होने के लिए क्योंकि यह सब खत्म हो चुका है, तो इसके बारे में क्यों परेशान हो? बस खत्म करने के लिए। क्योंकि अगर मैं आपको कठोर लहजे के साथ कुछ कहूं तो यह वहां पर नहीं टिकेगा। अगर मैं इसको नाजुक ढंग से करती हूं, तो भी यह कारगर नहीं होगा,  क्योंकि जैसा कि मैंने आपको बताया, यह एक पॉलिश है। इस पॉलिश को निकालिए और पॉलिश क्या है? मानदंडों की सभी समझ पॉलिश है, जीवन के मानदंडों की सभी समझ। क्योंकि आपने सोचा था कि अगर आप इस स्थिति में होते तो आप खुश होते, इसलिए आप ऐसा कर रहे हैं। क्योंकि आपने सोचा था कि अगर आप ऐसा करेंगे, तो डर है, यह बाईं ओर की समस्या है। लेकिन मन की सारी समझ को, आप अपने प्रकाश से, ज्ञान से, साफ़ कर देते हैं, तो आप चकित हो जाएंगे कि यह बात पूरी तरह से आप में जम जाएगी। यह विवेक आप में चिपक जाएगा।

सब पुरानी बकवास को भूल जाइए। बहुत सी चीजें आपने खुद हल की हैं, आपको पता है इतनी सारी चीजें पहले जो बेकार की थी।‌ इन सभी विचारों की पहचान हासिल की जानी चाहिए, हासिल की जानी चाहिए यह बात है। आप जानते हैं यह सब निरर्थक है। लेकिन हासिल किया जाना चाहिए। यह तैयारी है। देखिए, आपके पास प्रकाश है, आपके पास अब हलचल है। आप उसमें जा रहे हैं, लेकिन यहां प्रकाश नहीं है। यह डोलता है, कभी-कभी इस तरह गिरता है, उस तरह गिरता है। यदि आप अपने प्रकाश को स्थिर कर ले, बस इस समझ के माध्यम से कि जो भी मानदंड पहले थे, वे अज्ञानता के कारण थे और अब हमें स्वयं के मानदंड बनाने हैं कि सहजयोगी  क्या है।‌ और यह मानदंड मैं आपको बताऊंगी कि कैसे यह मानदंड आप में आएंगे जैसे कि विश्वास, आध्यात्मिकता पर पूरी निर्भरता, चैतन्य पर पूरी निर्भरता। नए जीवन के इन सभी मानदंडों को हमें स्वीकार करना होगा। लेकिन इन्हें हासिल करना होगा, मेरा मतलब है कि इनकी उपलब्धि, और ना कि बस एक भाषण में समझना। इसलिए मैं आपको इनके बारे में शाम को बताऊंगी और कल मैं बताऊंगी वास्तविक बनने के बारे में, ठीक है? धन्यवाद।

परमात्मा आपको आशीर्वादित करें।

श्री माताजी: अभी कहते जाओ, अब आप खुल रहे हो? 

श्री माताजी: आप अपने पद पर स्थित नहीं होना चाहते, यह समस्या है। बेहतर? यही तो मैं कह रही हूं। आप देखिए, यह बाहर निकल रहा है। सिर्फ बोलिए- “कुछ नहीं हो सकता। कोई भी भूत मुझे पकड़ नहीं सकता। मैं भूतों को पकड़ सकता हूं।” यह सच है।

योगी: दोपहर का खाना लग गया है

श्री माताजी: हं? 

योगिनी: क्या आप यहां अपना लंच इनके साथ लेना चाहते हैं, मां?

श्री माताजी: अन्यथा?

योगी: भोजन कक्ष में।

योगी २: मुझे नहीं पता।

योगी: वह बोल रहे है भोजन कक्ष में।

श्री माताजी: हं ?

योगिनी: भोजन कक्ष में यह बहुत अच्छा है।

श्री माताजी: अच्छा है या नहीं, मैं इसे आप लोगों के साथ करूंगी।