Attention

London (England)

1980-05-26 Talk to Sahaja Yogis, Attention, Questions on Joy, Dreams, 75' Download subtitles: EN,FI,FR,HU,LT,PT,ROView subtitles:
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                                    चित्त

 डॉलिस हिल, लंदन (इंग्लैंड)

 26 मई 1980 

आज मैं आपसे चित्त के बारे में बात करने जा रही हूं: चित्त क्या है, चित्त की गतिविधि क्या है और हमारे चित्त के उत्थान की क्या विधि और तरीके हैं। इसे व्यापक तरीकों से रखें। ठीक है? लेकिन जब मैं ये सारी बातें कह रही हूं तो आपको पता होना चाहिए कि मैं आपसे व्यक्तिगत रूप से बात कर रही हूं – यह दूसरों के बारे में नहीं है। व्यक्ति हमेशा सबसे पहले ऐसा करता है, की जब मैं आपसे बात कर रही  होती हूं, तो आप यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि माताजी किस के बारे में बोल रही हैं! यह अपने चित्त को भटकाने का सबसे अच्छा तरीका है। यदि आप अपना चित्त स्वयं पर लगाऐ कि, “यह मेरे और मेरे लिए और केवल मेरे लिए है,” तो इसका प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि [ये मेरे शब्द] मंत्र हैं। परन्तु इस प्रकार इसे व्यर्थ कर दिया जाता है क्योंकि जो कुछ भी आपको दिया जाता है उसे आप उसे किसी दूसरे व्यक्ति पर डाल देते है।

तो, आपके पास जो चित्त है,  वह वास्तविकता को जानने का एकमात्र तरीका है। आपका अपना चित्त महत्वपूर्ण है, न कि दूसरों का चित्त या दूसरों पर आपका चित्त! यह स्पष्ट रूप से समझा जाना चाहिए। यदि आप इस बात को समझ जाएँ कि पूरी चीज का उपभोग अपने चित्त के माध्यम से अपने उच्च अवस्था तक उत्थान के लिए आपके द्वारा किया जाना है,  तो, यह काम करेगा। अन्यथा, यह ऐसा हुआ है की,  जो भोजन आप को दिया गया वह भोजन किसी अन्य व्यक्ति को स्थान्तरित कर दिया गया हो जो की पोषित हो रहा है, जबकि आपको कुछ भी नहीं मिल रहा है। और वह व्यक्ति भी शायद पोषित नहीं हो सकता है, क्योंकि उसे पता ही नहीं है कि आप यह उस व्यक्ति के पास भेज रहे हैं।

इसलिए आज, जैसा कि मैं आपसे चित्त के बारे में बात करने जा रही हूं, आपको सुनिश्चित करना चाहिए कि आपका चित्त उस सब को ग्रहण करे जो मैं कह रही हूं। यह किसी और के लिए नहीं है। आप बेहतर तरीके से, निर्विचार जागरूकता में बैठते हैं, यह सबसे अच्छा तरीका है, ताकि यह आपके अंदर चला जाए। अन्यथा आप जानते हैं की यह एक व्याख्यान की तरह है कि तुमने मेरी बात सुनी पर, कोई असर नहीं हुआ। मेरा हर व्याख्यान आपको रूपांतरित करेगा, क्योंकि आखिरकार, मैं बोल रही हूं।

लेकिन चूँकि आप हमेशा, दूसरों के बारे में सोचते हैं और, आप हर समय अपनी समस्याओं के बारे में सोचते हैं – कुछ फालतू चल रहा है, जिसके बारे में आप चिंतित हैं – और चित्त इतना अधिक बोझिल है कि जो कुछ भी आपको कहा जाता है वह आपके अंदर नहीं जाता है। इसलिए, अभी, इसका उपयोग चौकस होकर करें और यह जानते हुए कि इन सभी निरर्थक बातों का कोई मूल्य नहीं है। यह आपका चित्त है जिसे ऊपर उठना है और प्रगति करना है। तो, चित्त ही तुम्हारे अस्तित्व का पूर्ण चित्र फलक है — चित्त एक पूरा कैनवास है। आप के अस्तित्व का पूरा कैनवास चित्त ही है। यह दूसरी बात है की ,आप इसमें कितना गए या, आपने इसे कितना खोजा है, आपने इसे कितना ऊपर उठाया है। 

अटेंशन चित्त है और ईश्वर चित्त है।

यह एक अलग बात है की ,आपका चित्त कितना प्रकाशित हुआ है। लेकिन यदि आप उस हद तक प्रबुद्ध हो जाते हैं तो आपका चित्त भगवान है – । यह एक कैनवास [चित्र-फलक]की तरह है। आप कह सकते हैं कि यह एक कैनवास की तरह है, जो एक फिल्म प्रदर्शन के लिए फैला हुआ है, और आप कह सकते हैं कि, आप के चित्त का जो कुछ भी रवैया, आकर्षण, अथवा गतिविधि है वैसा इस कैनवास पर दिखता है। मुझे नहीं पता कि अंग्रेजी भाषा में ‘वृत्ति’ के लिए क्या शब्द है। aptitude उपयुक्त शब्द नहीं है, लेकिन एक व्यक्ति आदी हो जाता है, या उसका ध्यान किसी विशेष तरफ खींच जाता है – मुझे नहीं पता अगर अंग्रेजी भाषा में  ‘वृत्ति’ के लिए ऐसा कोई शब्द है। क्या आप कोई शब्द सुझा सकते हैं? तो हमारा चित्त शुरुआत में बस एक शुद्ध, पूरी तरह से साफ़ कैनवास है जो हमारे तीन गुणों द्वारा कार्यान्वित होता है। और, जैसा कि आप जानते हैं, तीन गुण आपके पास आते हैं एक आपके अतीत से, एक आपके भविष्य के बोध से और एक वर्तमान से। अब तक, किसी विशेष चीज़ या किसी विशेष अवसर के बारे में आपके अनुभव जो भी रहे हैं, अब तक आपकी स्मृति में पूरी तरह से दर्ज है।

उदाहरण के लिए, यदि आप काले रंग को देखते हैं। जैसे ही आप इस काले रंग को देखते हैं, आपकी याद में काले रंग से सम्बंधित जो सब कुछ जो दर्ज किया गया है इस में से काफी कुछ उभर करके सामने आ जाता है। इसका मतलब है, जैसे ही आप इसे अपने चित्त से देखते हैं, चित्त लिप्त हो जाता है, या आप कह सकते हैं कि चित्त इस काले रंग के बारे में सभी स्मृतियों से रंग जाता है। और फिर जिस तरह से आप का चित्त प्रभावित हुआ है उसी के अनुसार आपकी गतिविधि होती है।

उदाहरण के लिए, अभी अभी इन लपटों से कुछ जल गया था। अब, आप सभी इससे अवगत हो गए। अगली बार जब भी आप एक लौ देखेंगे, पहली बात यह होगी कि आप इसके बारे में सतर्क रहेंगे। यह फिर से होने नहीं जा रहा है, लेकिन आपको पूरी  स्मृति आएगी और आप सतर्क रहने की कोशिश करेंगे या दूसरों को चेतावनी देंगे, क्योंकि जैसे ही आप उसे देखेंगे, आपका चित्त इस बात से अवगत हो जाएगा क्योंकि आपके चित्त का वह कैनवास स्वतः अपने पिछले अनुभवों के माध्यम से, कैनवास पर प्रस्तुत करना शुरू कर देगा। यह एक जीवंत कैनवास है।

या हो सकता है कि अगर आपकी पूर्व निर्धारित सोच अथवा भविष्य सम्बन्धी कुछ विचार हों। उदाहरण के लिए, आपने अवश्य किसी के बारे में सोच रखा हो कि, “अगर मैं उस आदमी से मिलता हूं तो मैं उसे इस तरह बताऊंगा।” जैसे ही आप उस आदमी से मिलेंगे, आपके चित्त में उस व्यक्ति के बारे में वे सब विचार उभरने लगेंगे, और आप उसी के अनुसार उसे संबोधित करना शुरू कर देंगे।

यह सब आपके भीतर संग्रहीत है, चाहे वह भविष्य के बारे में हो या अतीत के बारे में हो। यह उस बुदबुदाई प्रक्रिया के माध्यम से चित्त पर उभरने लगता है  जो की आप के आकर्षित होने के स्वभाव पर निर्भर है, की आप कहाँ आकर्षित होते हैं| जिसे वृत्ति कहा जाता है, लेकिन मुझे नहीं पता कि आप इसे अंग्रेजी भाषा में क्या कहते हैं। मुझे नहीं पता कि क्या है, आप किस चीज के आदी रहे हैं (प्रवृत्ति)।

वृत्ति एक बहुत ही तटस्थ शब्द है। इसका कोई बुरा मतलब नहीं है। इसका मतलब है कि आप कहां आकर्षित हैं। वृत्ति का अर्थ है एक स्वभाव जिस के कारण से आप आकर्षित होते हैं। और जो तुम्हारा स्वभाव है, वह वैसा ही काम करता है। उदाहरण के लिए, यदि आप किसी व्यक्ति को अंधेपन से चलते हुए देखते हैं, – वह चीजों को नहीं देख सकता है – एक व्यक्ति उससे नाराज हो सकता है, दूसरे को उस व्यक्ति के लिए दया आ सकती है, तीसरा उसकी मदद करने के लिए आगे आ सकता है। यह वृत्ति है, यह स्वभाव है, जिसे आपने अपने तीन गुणों के माध्यम से विकसित किया है। इसीलिए आपकी पहचान इस चित्त से की जाती है और जब आप आपकी इस वृत्ति, आपके स्वभाव से पहचाने जाते हैं, तब भी आप गलत ढंग से पहचाने जाते हैं। आइए हम किसी ऐसे व्यक्ति का मामला लें जो पहले बाधित रहा हो। अब सहज योग में आने से उसकी बाधा समाप्त हो जाती है। लेकिन यह स्मृति मस्तिष्क में बनी रहती है कि वह बाधित था । और अगर किसी व्यक्ति में याददाश्त अधिक मजबूत है, लेफ्ट साइड मजबूत है, तो वह यादें हावी हो जाती है, और जैसे ही वह व्यक्ति किसी के संपर्क में आता है, जिसका पिछली बातों से कुछ लेना-देना है, यह छु जाता है। और पूरी बात तुम्हारे भीतर से उभरने लगती है और तुम्हें लगता है कि तुम फिर से बाधा में हो। यह प्रतिक्रिया उस स्मृति की वजह से है। यह झूठी है। यह स्मृति है जो आपको बताती है, “ओह, आप फिर से बाधित हैं!” क्योंकि आपका बायाँ हिस्सा कमजोर है, इसका मतलब है कि आप हमेशा अपनी यादों में जीते रहते हैं। आपकी याददाश्त आप से भी अधिक मजबूत है। यदि आप स्वयम को अपनी याददाश्त से ज्यादा मजबूत बना सकते हैं, तो आपको कुछ भी नहीं पकड़ सकता है।

लेकिन जब आप आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर लेते हैं, तब भी आप उस मनःस्थिति से तादात्म्य नहीं कर पाते हैं, जिसमें आप अपने अहंकार और प्रति अहंकार को मिथ्या के रूप में देखें। आप फिर भी अपने अहंकार और प्रति अहंकार में फंस जाते हैं, और इसीलिए आपका चित्त अभी भी समस्या ग्रस्त  है। एक निर्दोष बच्चे के सादे सरल चित्त में, वह सब कुछ प्रत्यक्ष देखता है, यानि की किसी चीज का वास्तविक अनुभव -एक बच्चे के लिए-क्योंकि उसके पास कोई स्मृति नहीं है। इसलिए उसे जलन के अनुभव के लिए अपना हाथ जलाना होगा। उसे ठंडा जानने के लिए है, उसे कुछ ठंडा स्पर्श करना होगा। उनकी स्मृति अभी तक निर्मित नहीं हुई है। तो इसके वास्तविक अनुभव में वह जीता है। लेकिन वह वास्तविक अनुभव स्मृति बन जाता है। और एक बार स्मृति मजबूत हो जाने के बाद, पूरा व्यक्तित्व याददाश्त से प्रभावित होता है। सभी प्रकार की सभी आदते जड़ताएँ उसी के माध्यम से आते हैं; आपका पढ़ना, यहां तक कि पूरा वातावरण आप तक आ सकता है। आप देखते हैं, कभी-कभी आप एक विशेष साबुन को सूंघते हैं, या कहें एक गुलाब, आप इसे सूंघते हैं – फिर ऐसे गुलाब को सूंघने की सभी यादें, कभी-कभी, आपके पास आती हैं और आप कभी-कभी, शायद कभी-कभी, बहुत ख़ुशी महसूस कर सकते हैं या दुखी, जो भी स्थिति हो सकती है। तो आप खुश या दुखी महसूस कर सकते हैं। क्योंकि, आपके पास जो भी अनुभव हैं, उन्होंने आपको एक स्मृति दी है।

संभव है कि इस स्मृति ने आपको एक प्रति-अहंकार दिया हो, या आपको एक अहंकार दिया हो। इसकी जांच की जा सकती है कि क्या यह एक अहंकार या प्रति-अहंकार रहा है, ऐसा हो सकता है कि, यदि यह अहंकार था तो आपको खुशी महसूस हुई होगी। यदि यह आपके अहंकार को संतुष्ट करता है तो आप बहुत खुश महसूस करते हैं। यदि यह ऐसा नहीं है, अगर यह प्रति-अहंकार है, यदि आप इससे दबे हुए हैं, तो आप बहुत दुखी महसूस करते हैं। इसलिए खुशी या दुःख दोनों चीजें ऐसी अवस्थाएँ हैं जहाँ आप अभी भी असत्य पर हैं, अब भी कल्पना मौजूद हैं। आपको अभी भी इसके परे जाना है। इसलिए यदि आप किसी स्थिति के बारे में खुश महसूस करते हैं, तो आपको पता होना चाहिए कि आप केवल आत्मसाक्षात्कार के पहले वाली ख़ुशी पर हैं, क्योंकि यह आपके अहंकार को फुलने के लिए कुछ सहायता कर रहा है। और अगर आप दुखी हैं, तो आपको पता होना चाहिए कि आपके अहं पर किसी तरह का दमन है और कोई प्रति-अहंकार विकसित हो रहा है। 

तो दोनों ही स्थितियाँ आपके लिए मददगार नहीं रही हैं, विकास के लिए आपकी कोई मदद नहीं करतीं, सिवाय इसके कि ये दोनों संस्था इतनी विकसित हो गई हैं कि आप वास्तविक अनुभव से दूर हैं। वास्तविक अनुभव बंद हो जाता है क्योंकि आपका चित्त इतना अधिक गड़बड़ा जाता है।

तो यदि आप एक तरफ – बाएं हाथ की तरफ गति करते हैं – आपका चित्त डर के साथ दर्द , नाखुश से, असहायता से, निराशा से धुंधला जाता है। दूसरी तरफ, अगर आप दाहिने हाथ की तरफ बहुत ज्यादा लिप्त हैं -थोड़ा सा भी -आप उत्तेजित, उत्साहित, अति-हावी होने लगते हैं।

बाईं ओर का रंग नीला है। और नीला रंग काला होने लगता है। दाहिने हाथ की ओर, यह पीले,  शुरुआत में हल्के पीले रंग लिए है, या कहें सुनहरी, फिर पीला, फिर नारंगी और फिर लाल हैं।

तो आप दाहिने बाजू  आक्रामकता में जाते हैं। बायीं ओर कह सकते हैं की आप पूर्ण उर्जा विहीन की स्थिति में जाते हैं, या एक ऐसी अवस्था जहां आप स्वयम को एक पूर्ण जकड़ी हुई अवस्था मे अपने आप से अलग पाते हैं । तो एक तरफ तो आप पूरी तरह से बर्फीले जमे हुए हो जाते हैं, दूसरी तरफ आप पूरी तरह से गर्म हो जाते हैं। ये दोनों चीजें फिर से, गलत दिशा में गति हैं।

यहां तक कि जब चित्त मध्य में रखा जाता है – कि आप अपना चित्त अधिकतर मध्य में रखते हैं – वहां भी, क्योंकि यह बहुत संवेदनशील बिंदु है, यह वहां नहीं रुकता  है। उदाहरण के लिए कहें , जब आग का उपयोग करते हैं, तो हम इसका उपयोग  घर को जलाने के लिए कर सकते हैं। उसी तरह हम धुंआ पैदा करने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन हम इस अग्नि का उपयोग इसके उचित तरीके से भी कर सकते हैं, अगर हम इसका उपयोग, इसके उचित अनुपात में, खाना पकाने के लिए [या] प्रकाश देने के लिए करते हैं। यदि यह बहुत अधिक है, तो यह एक बड़ी आग की तरह जल सकता है। यदि यह बहुत कम है, तो यह धुएं की तरह जल सकता है। लेकिन मध्य में जब आप जानते हैं कि इसे कैसे संतुलित करना है, तो आप इसे अपने उद्देश्य के लिए उपयोग कर सकते हैं – खाना पकाने के लिए या प्रकाश देने के लिए, और फिर पूजा के लिए भी।

तो उसी तरह जब हम वास्तव में अपने गुणों को ठीक से संतुलित करते हैं, तो हम धीरे-धीरे पूरी स्थिति के स्वामी बन जाते हैं। चित्त उन चीजों में नहीं खिंच जाता है जो हम करते आ रहे हैं या जिसे हमने अपनी यादों, अनुभवों या किसी अन्य तरीके से  समझा है, और ना ही यह  बहुत ज्यादा दायीं बाजू की तरफ खींचा जाता है, ताकि हम किसी पर दबाव डालें या हावी होने की कोशिश करें, क्योंकि अगर आप बहुत ज्यादा उस तरफ चले जाते हैं, तो आपने देखा कि यह खून बन जाता है। लोगों के लिए यह समझना मुश्किल है कि कैसे, जब लोग बहुत धर्मांध हो जाते हैं, जैसे कि अब ईरान, गतिविधि  दायीं बाजू की है  – सभी धर्मान्धता , वह सब, सब कुछ – अब रक्तपात। ईसाइयों ने भी यही किया। भारत में ब्राह्मणों ने ऐसा ही किया। बौद्धों ने भी ऐसा ही किया, [भले ही] उन्होंने अहिंसा की बात की, उन्होंने खून-खराबा किया,  क्योंकि गतिविधि दाहिने बाजू की शुरू हुई।

बाएं बाजू की गतिविधि आपको बहुत धूर्त और अंधेरे तरीकों पर ले जाएगी। इसलिए दाएं बाजू वाले लोग -जैसे बड़े राष्ट्र जिन्हें विकसित राष्ट्र माना जाता है -वे युद्ध को उचित ठहराते हैं। “हमारे पास एक दूसरे का सामना करने के लिए हथियार होना चाहिए।” लेकिन आप सभी, एक-दूसरे, भगवान के दृष्टिकोण से एक ही लोग हैं! तुम क्यों लड़ रहे हो? जब परमेश्वर आपसे पूछता है, “तुम क्यों लड़ रहे हो, क्या जरूरत है? आप क्यों नहीं ठीक से बैठते और एक-दूसरे को सुनते हो? आप किस बारे में लड़ रहे हैं? आप जमीन के बारे में लड़ रहे हैं। क्या यह आपके पिता की भूमि है? यह भगवान की है! भगवान ने यह जमीन बनाई है। तुम क्यों लड़ रहे हो? 

”लेकिन आपका चित्त इस तरह है कि आप तुरंत सोचते हैं, “ओह, यह भूमि मेरी है, यह मेरी मातृभूमि है, यह मेरी पितृ भूमि है, यह मेरी भ्रातृभूमि है।” लेकिन आपकी उस जमीन का क्या जो आपके भीतर है? क्या यह तुम्हारी अपनी नहीं है!

इसलिए अगर आप इन लोगों से कहते भी जाएँ कि हमें कोई युद्ध नहीं करना चाहिए तो वे नहीं सुनेंगे। बोध ही एकमात्र रास्ता है। बोध द्वारा आपका चित्त ऊंचा हो जाता है और उस स्तर से अलग ही हो जाता है जहां से ये चीजें अंदर आती हैं। क्या अब आप मेरी बात समझ रहे हैं? स्तर ऊँचा हो जाता है, चित्त उच्च अवस्था में जाता है। दायीं बाजु की गतिविधि से आपको विक्षेप, भ्रम हो जाता है। पहले आपको भ्रम हो जाता है। प्रत्येक बुद्धिजीवी, कितना भी प्रतिभाशाली हो, वह भ्रमित है। और जितना अधिक वह उलझन में होता है, उतना ही अधिक वह खुद को मुखर करता है क्योंकि वह भ्रमित है, वह खुद के बारे में सुनिश्चित नहीं है, इसलिए वह दावा करता है, “यह बात है; ऐसी बात है। ” मेरा मतलब है, अगर ऐसा ही है, तो आपको इस पर जोर क्यों देना पड़ना चाहिए? लेकिन वह जोर देकर कहता है, “यह बात है!” तब समझें कि अब वह पागल खाने की ओर जा रहा है – बिल्कुल! और जिस तरह से वह दावा करता है, और हर समय इसके बारे में बात करता है, इसका मतलब है कि वह निश्चित नहीं है। वह एक बाधित व्यक्तित्व की तरह हो जाता है। जब वह अपने दिमाग के माध्यम से सब कुछ समझाता है कि “यह बात है। यह सही है। हम सभी को यह करना चाहिए, यह वही है … “और वह कई अन्य लोगों को जो उसकी ही तरह भ्रमित हैं कायल करता है । वे उसी पर निर्भर हैं। वह एक नेता बन जाता है क्योंकि, आप देखते हैं, वे बहुत अधिक भ्रमित होते हैं और वे किसी ऐसे व्यक्ति को खोज लेते हैं जो बाहरी रूप से इतना भ्रमित नहीं होता है इसलिए वे उस पर चिपक जाते हैं, और वे सभी युद्ध या किसी प्रकार का रक्तपात या ऐसा ही कुछ में लग जाते हैं -वे खून देखना चाहते हैं। वे हृदयहीन, धैर्यहीन, दयाहीन हो जाते हैं, आप कह सकते हैं -करुणा, प्रेम रहित लोग। दूसरी गतिविधि ब्लू साइड है, नीली चांदनी की तरह है। तो, रूमानियत की शुरूआत के लिए | चांदनी में बैठ कर, तुम देखते हो! विचार लॉर्ड बायरन की तरह से आने लगते हैं। और वे आपके चित्त में आते हैं – तब यह आपके साथ बहुत मजबूत जुनून बन जाता है। आपको लगता है, “ओह, मुझे अब भी, मुझे अपने प्यार का पता लगाना है!” और आप अपने प्यार और इस और उस की तलाश में आगे बढ़ते हैं। ये बातें वास्तव में आनंद नहीं दे रही हैं। इसीलिए इतनी सारी कविताएँ लिखी गई हैं कि, “प्रेम सबसे दर्दनाक चीज़ है, यह मृत्यु से भी बदतर है,” और सभी प्रकार की कविताएँ इस तरह लिखी जाती हैं कि तो फिर आप इसमें क्यों पड़े? मेरा मतलब है, यह पहले से ही लिख दिया गया है, किताबों के बाद किताबें, फिर भी आप इसमें क्यों आते हैं? (हँसते हुए) आपको इसके बारे में पहले ही चेतावनी दे दी जाती है कि, “प्यार के पीछे मत पड़ो, प्यार धोखा है, प्यार यह है, वह है, यह बहुत अस्थायी है, यह बहुत क्षण भंगुर है ।”

संयोग से, अगर कोई, किसी ऐसे बहुत ही मधुर व्यक्ति से शादी करके, एक बिंदु पर रुक सकता है, और यह महसूस करता है कि प्यार और शादी और ये सभी चीजें मध्य की हैं, रसोई घर या मंदिर में आग की तरह हैं: इसकी देखरेख करें और इसके साथ कुछ अति नहीं करता है। तब हो सकता है कि इसका उपयोग हो सके।

उसी तरह से सूर्य नाडी की दाईं ओर की गति। अगर लोगों को लगता है कि, हां, सूरज महत्वपूर्ण है, तो हमें घर में सूरज रखना होगा, लेकिन आपको नग्न होकर सूर्य का अपमान नहीं करना है और अपनी त्वचा का कैंसर प्राप्त नहीं करना है! सूर्य आपकी त्वचा के कैंसर के लिए नहीं है! लेकिन अगर आप इसे अति करते हैं, तो भी यह खतरनाक है। एक व्यक्ति बहुत ज्यादा योजना बना कर कार्य कर के खुद को उघाड़ रहा है, और यह सब कर रहा है, बहुत बड़ी कठिनाइयों में उतर सकता है। तो आपको उस तरफ और इस तरफ भी संतुलन बनाना होगा और आपको मध्य में, संतुलन में होना होगा, । 

अब यह शब्द ‘संतुलन’ हमारे दैनिक जीवन में मौजूद नहीं है। यह केवल कल्पना में मौजूद है या तथाकथित वैज्ञानिक अनुसंधान में हो सकता है। लेकिन जहां तक इंसानों का सवाल है, वे नहीं जानते कि संतुलन क्या है। इस वजह से, हालांकि आत्मसाक्षात्कार के बाद चित्त, ऊपर आता है, फिर भी वे  इस तरफ या उस तरफ से अपनी वृत्ति के अनुसार सिर्फ अधोगति की तरफ जाते हैं, और अभी भी जब उन में ये गलत पहचान काम करती है, तो वे फिर से अपने चित्त से नीचे जाने के लिए प्रवृत्त होते हैं और फिर से वही पुरानी चीजें उभरती हैं जिनसे अब उस व्यक्ति को अपने मन में खाली हो जाना चाहिए और यह सोचना चाहिए कि, “हमने वह सब छोड़ दिया है, अब हम वहां क्यों हैं?” उस सभी भार को बाहर निकाल कर के व्यक्ति को हल्का हो जाना चाहिए, क्योंकि आप यहां अपना चित्त ऊंचा अधिक ऊँचा उठाने के लिए हैं, ताकि आप एक ऐसी स्थिति पर आएं जहां आप ईश्वर के चित्त से एकाकार हो जाएं।

पहले से ही आपका चित्त प्रकाशित है चूँकि आप चित्त के माध्यम से आप देख सकते हैं कि आपमें क्या दोष है, आप देख सकते हैं कि दूसरों में क्या दोष है और आप देख सकते हैं कि आप स्वयम के साथ कहाँ तक हैं। लेकिन प्रगति मंद हो जाती है क्योंकि आप नहीं जानते हैं कि यह चित्त शुद्ध स्वरूप है और जो भी आप इस चित्त में लाते हैं वो सब मिथ्या है, अवास्तविक है | यदि आप इस अवास्तविक को धीरे-धीरे छोड़ते हैं, और हर चीज को साक्षी भाव से केवल देखते हुए एक मिथ्या मान कर व्यवहार करते हैं और दुखी या खुश होने पर निर्भर नही रहते तब आपका चित्त एक उड़ान लेगा और उच्च स्तर पर स्थित हो जायेगा| इसके बजाय, हर पल आप इस तरह या उस तरह से गति करते हैं -ऐसा चलता रहता है और तब उत्थान बहुत कम होता है । जब आप सत्वगुण में भी प्रगति करते हैं, तो आप उस स्थिति में और भी बदतर हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप कहते हैं कि, “मैं सत्त्वगुणी होने की कोशिश कर रहा हूँ।” सत्वगुणी में ऐसा होता है कि आप हर चीज को अपनी समझ से देखने,परखने लगते हैं –  चैतन्य के माध्यम की बजाय अपनी बुद्धि की समझ के माध्यम से: जैसे की, “ओह! क्या हमें किसी तरह से अपना चित्त यहाँ से हटा नहीं लेना चाहिए? ” “क्या हमें इसे नहीं छोड़ देना चाहिए”?  “क्या हमें दानदाता होना चाहिए”? “क्या हमें जाना चाहिए और, लोगों की सेवा करनी चाहिए?” ऐसे लोग हैं जो सोचते हैं कि, “ओह, हम कुछ महान करने जा रहे हैं”! – अपनी मोक्षगामी सेना की तरह। उन्हें स्वयम निर्वाण पाने दो! मुझे नहीं पता कि वे किस उद्धार के लिए जा रहे हैं। तो ये विचार – मैं कह रही हूँ – सत्वगुण का विचार भी आप की प्रगति समाप्त कर सकता है और वास्तव में हमेशा के लिए नीचे ही जकड़ कर रख सकता है, और वह भी इतने धूर्त तरीके से, इतने गोपनीय तरीके से आपके भीतर काम कर सकता है, हम कह सकते हैं की,  आपको यह महसूस नहीं होगा।

ऐसे सभी विचार, दूसरों की मदद करने के, परोपकारी बनना की, “चलो एक दान संघ बनाते है!” – सब नष्ट! एक बार जब आप एक चैरिटी एसोसिएशन में काम करते हैं, तो आपका चित्त वहीँ नष्ट हो जाता है। लेकिन अगर आपका चित्त ऊँचा जाता है – जैसे के मेरा चित्त है। मैं कुछ और नहीं, बस परोपकार ही हूँ ! मेरा मतलब है मैं क्या हूँ? यह सिर्फ बहता है। तुम स्वयम ही दान बन जाते हो। तो एक आत्मसाक्षात्कारी और गैर आत्मसाक्षात्कारी के बीच का फर्क है, ‘ऐसा चित्त’ जो आपको मिथ्या को वास्तविकता बता रहा था वह अब चला गया है, अब ऊँचा उठ गया है। वह देख सकता हैं कि यह मिथ्या है। चित्त स्पष्ट रूप से देख सकता है कि यह मिथ्या है, और आप स्वयम यह देख सकते हैं और आप खुद को उनसे दूर कर सकते हैं। यह, निश्चित रूप से, मुझे आपको एक धक्का देना है, इसमें कोई संदेह नहीं है, और मैं उस पर कड़ी मेहनत कर रही हूं ताकि आपको धक्का दिया जा सके। लेकिन आपको यह भी पता होना चाहिए कि अवास्तविक चीजों को निकल बाहर करना चाहिए, अन्यथा आप विकसित नहीं होंगे। सभी अवास्तविक चीजों को छोड़ देना चाहिए। और इसे करने का सबसे अच्छा तरीका निर्विचार जागरूकता में होना है क्योंकि जैसे ही आप इन तीनों गुणों को पार करते हैं आप निर्विचार रूप से जागरूक हो जाते हैं। आपको आज्ञा को पार करना होगा। एक बार जब आप आज्ञा को पार कर लेते हैं, तो ये तीन गुण, पूरी तरह से एक ऐसी स्थिति में चले जाते हैं, जहाँ आप गुणातीत हैं, आप गुणों से परे हैं।

तो आप कुछ भी विचारपूर्वक नहीं करते हैं, लेकिन यह सिर्फ होता है।लेकिन  पश्चिम के रोगों में से एक है विश्लेषण। आप क्या विश्लेषण कर रहे हैं? आप क्या विश्लेषण कर रहे हैं? आप खुद से पूछिए। मुझे पुरे विश्लेषण पर जो की चल रहा होता है, हंसी लगती है। देखो, वे बैठेंगे, एक बाल निकालेंगे, बालों को सौ में विभाजित करेंगे! और महान विश्लेषक वहाँ बैठे हैं! वे यह भी नहीं कह सकते हैं कि गुणसूत्रों में स्पिंडल क्रिया कैसे होती है और, मेरा तात्पर्य है कि उस सूक्ष्म स्तर पर चीजों पर काम किया जाता है। वे यह नहीं बता सकते है कि एक कोशिका कैसे विभाजित होती है। वे यहां बैठकर क्या विश्लेषण कर रहे हैं?

अब, उन्होंने एक उद्देश्य के लिए विश्लेषण किया है -ईश्वर के लिए भी किया है। उनके विश्लेषण के माध्यम से अब मेरी बातें दर्ज हैं। उनके विश्लेषण के माध्यम से मैं टीवी पर जा सकती हूं, यदि वे मुझे किसी भी समय अनुमति देते हैं, चूँकि विश्लेषण के कारण [यह] मेरे लिए उपयुक्त नहीं है, वे अनुमति नहीं दे सकते हैं, वे नहीं कर सकते हैं, यह शीघ्र हो सकता है। लेकिन, उदाहरण के लिए, यदि आपने इन चीजों की खोज नहीं की होती – उदाहरण के लिए इसे इस तरह लें -और विज्ञान की खोज नहीं की गई थी, तो कम से कम आपका चित्त बेहतर होता। विज्ञान की वजह से आपका चित्त भी असमंजस में है। इसलिए मैं नहीं जानती कि किसकी प्रशंसा करनी चाहिए,  विज्ञान हो या आदिम स्वभाव।जब आपने विज्ञान तक तरक्की की, तो आप हमेशा की तरह एक और अति पर पहुंच गए। जब तक आपने अपना पूरा चित्त जला कर राख ना कर लिया, तब तक आप संतुष्ट नहीं थे। मेरा मतलब है कि अगर आपने विज्ञान में अपना संतुलन बनाए रखा होता तो इससे भी मदद मिलती, लेकिन वहाँ संतुलन खो गया। इंसान को कुछ भी दे दो और वे जानते हैं कि इससे सबसे बुरा कैसे बना सकते है। वे अति पर जाएंगे। आप उन्हें एक घोड़ा देते हैं, वे साधारण सैर या सरपट नहीं जा सकते, उनको एक डबल सरपट चाहिए, जब तक कि वे गिरकर मर न जाएं! आप देखिये वे हमेशा भागदौड में रहते हैं ।

तो पहली बात यह है कि अपने आप को स्थिर करना है और अपने आप को यह बताना है कि, “अब इन सभी अवास्तविक चीजों को मैं अपने ध्यान में नहीं आने दूंगा।” ये सब बातें मिथ्या के अलावा और कुछ नहीं हैं। लेकिन आप मिथ्या को बहुत अधिक महत्व दे रहे हैं। आप उन्हें इतनी गंभीरता से ले रहे हैं।

वे सिर्फ अवास्तविक हैं। अब, मेरा मतलब है, जब आपको आत्मसाक्षात्कार हो जाता है तो आप उन लोगों पर हंसते हैं जो सिर्फ एक चांदनी रात पर दीवाने हो जाते हैं। ठीक है? लेकिन जो साथी ऐसा कर रहा है, उससे पूछें, वह कहेगा, “आप बेदिल हैं, आपको कोई भावना नहीं है!” (हँसी) वह आपको इस में से एक बड़ी कविता देगा। आप इन लोगों में से किसी को भी देखें, जो एक ऊँचे घोड़े की सवारी कर रहे हैं, जो मामलों के शीर्ष अधिकारी हैं, और आप महसूस करेंगे की आप उन पर हंस सकते हैं । लेकिन वे सोचेंगे कि, “आप बेकार हैं, आप कोई काम नहीं कर रहे हैं, आप किसी काम के नहीं अपितु बेकार हैं।”तो अब आपके लिए, चूँकि आप अब प्रबुद्ध हैं, यह समझना है कि हमारा चित्त उच्च और उच्चतर अवस्था पर जाना है। अब आत्मसाक्षात्कार में वास्तव में क्या हुआ है? आपकी कुंडलिनी चढ़ गई है और ऊपर आ गई है, आप कह सकते हैं, एक छोटे, पतले बाल, एक बाल की तरह, और इसने आपके सहस्रार को तोड़ दिया है और अब कृपा आप में बह रही है। लेकिन यह एक बहुत छोटी घटना है, जो निश्चित रूप से बहुत दुरुह कार्य है, इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन यह घटित हो चुका है।  आपने अभी इस तरह विस्तार नहीं किया है। आपके चक्र केवल मध्य से छेदे गए हैं, लेकिन बाकी का चित्त अभी भी वैसा ही बरकरार है। वास्तव में यह इतना बरकरार है, कि आपको यह महसूस भी नहीं होता है कि यह छेदा गया है। अब आपको इसका विस्तार करना है, इसे खोलना है, ताकि कुंडलिनी के और अधिक रेशे उठ सकें और आपका चित्त, जो इन चक्रों में है, फैलता है। फैलाव के द्वारा यह सारी अवास्तविकता जो बाजुओं में भी है निकल बाहर करता है|  हर चक्र पर हमारा चित्त है, जो इस लाइट के माध्यम से चक्र को प्रकाशित कर रहा है। लेकिन यह प्रकाश आप के द्वारा इकठ्ठा किये गए अंधेरे के अनूपात में बहुत कम है।विशेष रूप से पश्चिम के लोगों के लिए, मैं कहूंगी, आपका असमंजस, आपको उनसे छुटकारा पाना चाहिए। लेकिन फिर भी तुम शिनाख्त करते हो । क्योंकि अगर मैं आपसे कुछ भी पूछूं [जैसे], “आप कैसे हैं?” मतलब क्या ? मतलब आप अभी भी भ्रमित हैं। ठीक है?

कन्फ्यूजन जाना चाहिए। एक भ्रम यह था कि, “यह बोध है या नहीं?” मुझे आशा है कि अब आप लोगों के साथ यह समाप्त हो चूका है। कम से कम अब आप मानते हैं कि यह आत्म बोध है। मुझे लोगों को बताना पड़ता था, “नहीं, तुम अब आत्म-साक्षात्कारी हो, तुम हो!” फिर भी वे [a] जैक-इन-द-बॉक्स की तरह उछलते, आप देखते हैं। वे कहेंगे, “नहीं,  माँ  हम नहीं हैं!” आप कैसे कहते हैं कि यह बोध है? “हम इस आत्मसाक्षात्कार से ऐसी या वैसी अपेक्षा करते हैं  कि यदि हम आत्मसाक्षात्कारी है तो हमें दरवाजे से बाहर उड़ रहे होना चाहिए,” या ऐसा ही कुछ निरर्थक सा है। भगवान का शुक्र है, ये विचार दूर हो गए हैं।

लेकिन जब हम आत्मसाक्षात्कार पाते हैं, तो प्रकाश होता है जो हम में आ गया है, हमें केवल अवास्तविकता से अपना ध्यान अलग करके इसे विकसित करना है। यह सब मिथ्या है। मैं भी आपके साथ भी खेलती हूं, क्योंकि जब तक और जहाँ तक आप सुनिश्चित नहीं होते हैं, तब तक मैं आपको अपने बारे में गलत विचार नहीं देने वाली हूं। मैं यह देखना चाहती हूं कि आपका चित्त अभी तक कितना विचलित  है, और मुझे पता है कि अभी भी आप सुनिश्चित नहीं हैं, अभी भी आप खुद पर यकीन नहीं कर रहे हैं, इसीलिए आत्मविश्वास नहीं है।

सबसे पहले आपको सीखना होगा कि कैसे ड्राइव करें, फिर आपका परीक्षण किया जाता है। एक साथ पांच पत्थर रखे जाएंगे, उनके बीच दूरी केवल इतनी ही होगी कि मुश्किल से ही कोई कार उनके बीच से गुजर पाए और साथी कहें, “आप इसे घुमा-फिर कर लाएं!” और आप ऐसा नहीं कर सकते। क्यों? इस प्रकार वह आपको निपुण  बनाता है। आपको चित्त पर निपुणता तब आएगी जब आप यह देखना शुरू कर देंगे कि जो आपको परेशान करता है, वह सब अवास्तविक है। यह  मिथ्या है जो आपको परेशान करता है। बस इसे फेंक दो। बस इसे फेंक दें और समझें कि आप शाश्वत हैं, कि आप शाश्वत जीवन हैं, कि केवल अज्ञानता ही वो चीज है जो आपको इससे दूर रखती है, और इस  अज्ञान को समझना बहुत सरल है: कि आपने असत्य को सत्य मान लिया है। बस इसे छोड़ दें! यह सब मिथ्या है!  आपका चित्त इस तरह उठेगा की आप चकित होंगे और आप को अक्सर डराने वाली या उत्तेजित करने वाली इन सभी निरर्थक चीजों को आप देखेंगे, जो बाहर निकल जाएंगी, और आप बस इस पर मुस्कुराएंगे। और केवल तभी आप पूरी तरह स्वयम का आनंद लेने जा रहे हैं क्योंकि आपका चित्त पूरी तरह से स्वयं के आनंद में डूब जाएगा। मैं कह रही हूँ आप करेंगे, मैं कहती हूँ कि आप पहले से ही उस आनंद में सराबोर हैं। इसे बनाये रखें।

अब, यह कैसे करना है? दरअसल, हर दिन के जीवन में, अतीत की स्मृति को कैसे मारना है? अतीत की स्मृति को मारने के लिए नई यादें संजोना चाहिए। आपको याद रखना चाहिए जब आपको अपना पहला आत्मसाक्षात्कार  मिला था – हमेशा इसके बारे में सोचें। जब भी कोई ऐसी पुराणी बातें याद आती हैं तब, आपको यह सोचने की कोशिश करनी चाहिए कि आपको अपना आत्मसाक्षात्कार कैसे हुआ। कोई भी स्मृति जो परेशान करने वाली या उत्तेजित करने वाली होती है, आप बस यह याद रखने की कोशिश करे कि आत्मसाक्षात्कार कैसे हुआ है। जब आप किसी चीज़ के बारे में या गुस्सा, या आक्रामक महसूस करते हैं, तो बस यह याद रखने की कोशिश करें कि आपको समर्पण का आनंद कैसा महसूस हुआ। बस आत्मसमर्पण करने के,डूब जाने के उस आनंद के बारे में सोचो। इसलिए नई यादों का निर्माण किया जाना चाहिए। यदि आप नई यादों का निर्माण शुरू करते हैं, तो आप ऐसे क्षणों को स्थापित करने के लिए क्षणों को इकट्ठा करना शुरू कर देंगे, जिनमें ऐसी यादें हैं। जैसे एक घटना जब आपने किसी की मदद करने की कोशिश की,  आपने किसी की कुंडलिनी उठा दी।अब समस्या यह होगी कि जब आप दूसरों की कुंडलिनी उठा रहे होंगे, तो आप निर्विचार जागरूकता में होंगे – कोई भी विचार नहीं होगा – और विचार ही एकमात्र चीज है जो प्रभावित करती है। लेकिन[उस समय आप कुंडलिनी को ऊपर उठाने के आनंद को रिकॉर्ड कर सकते हैं।

यदि आप दूसरों की कुंडलिनी उठाने के आनंद को रिकॉर्ड कर सकते हैं, तो आप महसूस करेंगे कि इन खूबसूरत क्षणों का एक नया धन जमा हो जाएगा। और वे सभी क्षण जो आपको भ्रम या भय या तथाकथित ख़ुशी और दुःख दे रहे थे छुट जाएंगे और शुद्ध आनंद बना रहेगा। क्योंकि अब आपके पास जो भी अनुभव हैं उनमें से अधिकांश आनंद के हैं। आनन्द का कोई विचार नहीं है। यह सिर्फ एक प्रत्यक्ष अनुभव है। इसीलिए मैंने कहा कि आप अपनी आँखें खुली रखें।मुझे उम्मीद है कि आप समझ जाएंगे कि मेरा क्या मतलब है।

ईश्वर आप सबको आशीर्वादित करें

मुझे लगता है कि आज हम ध्यान करें। शायद यह ध्यान हमें मदद करेगा कृपया अपनी आँखें बंद करें|

(रिकॉर्डिंग में विराम).. 

आप सभी , इन चीजों को ,  आग पर डाल दीजिये। डगलस [फ्राई], इन दोनों को, इन चीजों को आग पर ले जाओ।

(रिकॉर्डिंग में विराम)… 

…यहाँ या वहाँ ध्यान दिए बिना या चिंता किए बिना। चिंता और ये सभी चीजें विक्षेप  हैं, सब भ्रम हैं, भ्रम से आती हैं। आपने मेरे बारे में जाना है कि मैं एक मुद्रा में नौ घंटे बैठ सकती हूं। मेरा मतलब है कि मैंने ऐसा किया है, लेकिन मैं इससे भी ज्यादा कर सकती हूं। तो एक बैठक विकसित करना है, कुछ समय के लिए एक बैठने की मुद्रा  है। आपको किसी स्थान पर बैठना होगा। ठीक है? ऐसा करने का प्रयास करना चाहिए, और इसके लिए जो भी आवश्यक है वह किया जाना चाहिए क्योंकि यह एकमात्र तरीका है जो आप कर सकते हैं। यदि आप चल रहे हैं, तब आपका चित्त भी  चारो तरफ घूमेगा ओर जाएगा। वैसे भी, अगर कोई गतिविधि है तो समय, स्थान की भूमिका आती है। लेकिन अगर आप स्थित हो सकते हैं, अगर आप एक जगह हो बैठ सकते है।

और इसीलिए माँ की तस्वीर मदद करती है। अगर आप लगातार सुकून भरी नजरों से फोटो देख सकते हैं, तो हर समय घूरकर नहीं बल्कि सुकून भरी निगाहों से। आप अपनी आँखें सम्मान के साथ बंद कर सकते हैं  तब फिर से आप अपनी आँखें खोल सकते हैं। यह स्थिति को स्थिर करना – आपको आश्चर्य होगा कि आपका चित्त धीरे-धीरे कैसे उठेगा, आप इसे महसूस करेंगे।

बस अब आप सभी निर्विचार जागरूकता में हैं इसलिए ध्यान में जाएं। नहीं, यदि आप नीचे नहीं बैठ सकते हैं तो आप कुर्सी ले सकते हैं। लेकिन जैसा कि मैंने कहा, कपड़े थोड़े हल्के होने चाहिए।

ठीक है, अपने हाथ मेरी ओर रखो।

आपको लगभग पांच मिनट के लिए बैठना होगा। मैं तुम्हें ज्यादा देर नहीं बैठने को कहूँगी। लेकिन मुझे आशा है कि अगली बार आप बैठने के समय आप इसे विकसित करेंगे। मुझे लगता है दिल पर दाहिना हाथ मदद करेगा। हृदय पर दाहिना हाथ।अब इसे दिल से करो। करो – यह – अपने – दिल से। हृदय पर दाहिना हाथ। भीतर सोचो, “मैं अनन्त जीवन हूँ, मैं आत्मा हूँ”अपनी साँसे रोको। अब छोड़ें।

इस समय जब आप अपनी सांस रोकते हैं तो आपको पता होना चाहिए कि मैं ब्रह्मांड की माँ और सबसे शक्तिशाली व्यक्तित्व हूं। और मैं तुम्हारी माँ हूँ और तुम सब संरक्षित हो।

अपनी साँसे रोको । हा! छोडिये। अच्छा।

हममम।मुझे कहना होगा आप अभी भी बच्चे हैं । क्या आप नहीं जानते कि मैं बहुत शक्तिशाली हूं? क्या मुझे आपको बताना पड़ेगा ? छोटे बच्चे भी जानते हैं।ठीक है? आराम करें। चलो कुछ संगीत और कुछ है। अब, कहीं भी कोई सवाल?

योगी: मेरा एक सवाल है। क्या आप आनंद और खुशी के बीच अंतर बता सकते हैं?

श्री माताजी: ओह! बहुत सरल आप जानते हैं। आनंद में ख़ुशी और दुःख जैसी दोहरी चीज़ नहीं है आनंद विलक्षण है, निरपेक्ष है। यह पूर्ण है। यह निर्विचार है। पूर्ण संतुष्टि है। खुशी में हमेशा नाखुशी की छाया रहती है,सिक्के के दो पक्ष है, एक सिक्के के दो पहलु । सुख के बाद दुःख , दुःख के बाद सुख होगा। यह एक सापेक्ष शब्दावली है। लेकिन आनंद परम है, निरपेक्ष है। यह सोच से परे है। यह आनंद है।

योगी: यह तृप्ति की तरह है।

श्री माताजी: तृप्ति अभी भी सापेक्ष हो सकता है। लेकिन यह सब एक आनन्द में निहित है, ऐसा है जहाँ आप कुछ भी नहीं पूछते हैं, आप बस वहीं हैं। यह तो बस प्रसारित होता है। बस निकलता है। आप कुछ भी नहीं चाहते हैं, यह बस बह निकला। इसका आपकी बुद्धिमत्ता से कोई लेना-देना नहीं है, इसे आपकी बुद्धिमत्ता के माध्यम से नहीं समझा जा सकता है। यह परे है, आप इसे महसूस करते हैं।हम्म। जेरेमी?जेरेमी: हम सपने क्यों देखते हैं?  क्या हमें सपना देता है?

श्री माताजी: सपने? अब क्या आप सपने देख रहे हैं: सामान्य तरीके से हमारी चेतना के तीन चरण होते हैं – न कि चौथा (तुर्या) जो कि, अब, आप चौथे में हैं – लेकिन आम तौर पर तीन चरण होते हैं। और तीसरे चरण को सुषुप्ति कहा जाता है, जहां आप एक अवस्था में होते हैं जहां आप गहरी नींद में होते हैं। उस समय आप अचेतन के संपर्क में आते हैं, अचेतन वास्तव में आपके चित्त में प्रवेश करता है, और आपको उसी से जानकारी मिलनी शुरू हो जाती है। लेकिन एक व्यक्ति जो अभी तक आत्मसाक्षात्कारी नहीं हुआ है, वह अभी तक उस अवस्था में जागृत नहीं है, इस अर्थ में कि, जो कुछ भी वह रिकॉर्ड करता है वह फिर से बादल की तरह से ढँक जाता है जाता है जब वह उन चरणों के माध्यम से वापस आ रहा होता है … वह अवचेतन क्षेत्रों से होता हुआ वापस आता है,  हम कह सकते हैं, बहुत सारे क्षेत्र कि उसी के अंदर स्थित उन सभी अचेतन क्षेत्रों से बाहर आ जाता है, और उसके भीतर के अवचेतन क्षेत्र, और फिर वह होश में आता है।

इसलिए बहुत सारी चीजें इस पर छा जाती हैं, जैसे इसे ढँक दिया गया है, इसलिए  सपने की व्याख्या या स्मृति भी काफी भ्रामक हो सकती है। लेकिन बोध के बाद आप और भी गहरे छूते हैं क्योंकि आप अचेतन में प्रवेश करते हैं। ऐसा नहीं है कि अचेतन को कुछ भी करना है, लेकिन तुम अचेतन में प्रवेश करते हो। आपका चित्त ध्यान में जाता है और यह जो देखता है वही रिकार्ड करता है। जितना अधिक आपका बोध होगा, स्वप्न स्थिति दूर हो जाएगी। उदाहरण के लिए मैं कभी सपने नहीं देखती। मेरा मतलब है कि वास्तव में मैं स्वप्न में ही हूं।  इस अर्थ में मैं कभी सपने नहीं देखती कि जब मैं यह तथाकथित सपना देख रही होती हूं, तो मैं वास्तव में वहां काम कर रही होती हूं। और मैं इसे दूसरों के साथ सत्यापित कर सकती हूं कि मैं उसके साथ उस समय थी। वह कहते हैं, “हां, ऐसा हुआ।” तो, आप देखते हैं, यह मेरी एक अलग अवस्था राज्य है। लेकिन वास्तव में ऐसा होता है, आपका कभी कोई सपना नहीं होता, आप हमेशा वास्तविकता में होते हैं। लेकिन यह एक अलग बात है। लेकिन उस अचेतन से आप जो भी रिकॉर्ड करते हैं , कम से कम अपना होना चाहिए। लेकिन ज्यादातर लोगों के सपने बादलों की तरह ढंके होते है, इसलिए सपने का कोई मतलब नहीं है।

लेकिन सहज योग के साथ अपने सपनों में भी आप इतने प्रबुद्ध होते हैं कि, आप देखते हैं कि अचेतन को वास्तव में क्या कहना है। जो भ्रमित नहीं है, जो बादल सम ढंका नहीं है, जो बिलकुल उसी तरह है जैसे कि तुम जागृत हो। मेरा मतलब है, उदाहरण के लिए,  कई बार, आप मुझे,सपने में देख सकते हैं। और आपको मुझसे सुझाव मिलेंगे। मेरा मतलब है, मैं केवल सपनों के माध्यम से काम करती हूं, अचेतन के माध्यम से। लेकिन कुछ लोग हमेशा कहेंगे, “ओह, मैंने आपको कहीं देखा है। मैंने आपको कई बार देखा है। मुझे नहीं पता कि मैंने कहाँ देखा है। क्या आप न्यूयॉर्क में थी? ” मैंने कहा नहीं।” “तब मैंने आपको कहाँ देखा था?” उन्होंने मुझे अपनी नींद में देखा, आप देखें। लेकिन वे सम्बन्ध नहीं जोड़ पाते है कि, यह नींद में था कि,  उन्होंने मुझे देखा था। वे आत्मसाक्षात्कारी लोग नहीं हैं लेकिन उन्होंने मुझे देखा है।

सहज योगिनी: क्या आप लोगों को उनकी नींद में आत्मसाक्षात्कार दिला सकते हैं?श्री माताजी: नहीं। मैं नहीं कर सकती। मैं उन लोगों को भी आत्मसाक्षात्कार नहीं देना चाहती जब वे मेरे सामने, या तो मेरी तस्वीर या सहज योगी के सामने नहीं आ रहे हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। क्योंकि सहज योग में मान्यता एकमात्र बिंदु है। आधुनिक सहज योग केवल मुझे पहचानने पर ही काम करने वाला है। यदि आप मुझे नहीं पहचानते हैं, तो यह कारगर नहीं होगा। यही एकमात्र रास्ता है। यही एकमात्र कुंजी है। क्योंकि अभी तक आपने कभी मान्य नहीं किया है। केवल मान्यता के आधार पर आपकी सभी पिछली चीजों को माफ कर दिया जाएगा, सब कुछ किया जाएगा। लेकिन अगर आप मुझे मान्य करने से इनकार करते हैं या आप इसके साथ धीमी गति से चलते हैं, तो आपकी प्रगति धीमी हो जाएगी। जो मैंने आपको खुलकर बताया है। हालांकि यह बताने में बहुत लज्जा आती है , लेकिन मुझे आपको बताना होगा। यह सच है।

इसलिए, सपने में आप बोध नहीं दे सकते। लेकिन सपने में आप उस स्थिति को देख सकते हैं जिसमें वह चीज दे रहा है, आपको कैसे देना चाहिए। आपके समाधान आपको सुझाए जाएंगे, कि किसी विशेष व्यक्ति से कैसे संपर्क करें। लेकिन आप किसी को अहसास नहीं दे सकते। उन्हें यह जानना ही होगा कि माताजी निर्मला देवी के माध्यम से उन्हें अहसास हुआ है। जैसा कि यह है, जब आप उन्हें आत्मसाक्षात्कार  देते हैं, तो उन्हें इसकी कोई कद्र नहीं होती है। यदि वे मुझे नहीं जानते हैं, तो उनके लिए इसकी कोई कद्र नहीं होगी।

लेकिन मैं फिर भी सुझाव दूंगी कि किसी को सपनों का बहुत अधिक विश्लेषण नहीं करना चाहिए।

फिर से वही समस्या शुरू होगी। क्योंकि मुझे पता है कि युंग और इन सभी लोगों ने ऐसा किया था। लेकिन यह सब उस स्तर पर सही था क्योंकि वे आत्मसाक्षात्कारी 

 लोग नहीं थे, या उन्हें बहुत ही भ्रांत तरीके से बोध प्राप्त हुआ , इस अर्थ में कि उन्हें खुद पर यकीन नहीं था। लेकिन आप लोग सपने को लेकर इतना परेशान नहीं हो। सपने आपको एक समस्या का समाधान देने के लिए आपके पास आ रहे हैं। अचेतन आपको सपनों में मदद कर रहा है। उदाहरण के लिए, जब मैं भारत जाती हूं तो उनमें से ज्यादातर का सपना होता है कि मां आ रही हैं। मेरा मतलब है कि यह इस तरह से कार्य करता हैं, जैसे टेलीविज़न ?

सहज योगी: मैंने पहली बार यहां आने के बाद आप का सपना देखा था।

श्री माताजी: आपके यहाँ आने के बाद? उसके पहले नही? लेकिन ऐसे लोग हैं जो मेरे पास आए हैं क्योंकि उन्होंने मेरे बारे में भी सपना देखा था। अब, यह एक अच्छी बात है। मेरे बारे में सपने देखने का मतलब है कि आप बहुत गहरे गए हैं। आप देखिए, सत्यापन आता है।

सहज योगी: जब मैं यहां था, तब आपने इस आंख पर हाथ रखा था, जब मैंने इसके बारे में सपना देखा था। यह ऐसा था जैसे कि उसमें से कुछ निकाला गया हो, जैसे कुछ क्रिस्टल। और यह फर्श पर गिर गया और उसके इस तरह के पैर उग गए और भाग गया। (हँसी)।

श्री माताजी: क्या हुआ? आपने क्या महसूस किया?

सहज योगी: मैं सिरदर्द से पीड़ित था और उस समय से मुझे नही रहा।

श्री माताजी: आप देखिये! यह सच है। यह सच है। मेरा मतलब है, वास्तव में ऐसा ही किया जाता है। मैं आपको एक और उदाहरण बताती हूँ, इसका एक बहुत ही ठोस उदाहरण है।एक आदमी जो सहज योग में आया करता था और उसमें बहुत गहरा था। एक दिन वह था- आप देखिए कि रजनीश के कुछ शिष्य उसे नुकसान पहुँचाना चाहते थे। तो, उन्होंने उसे बुलाया और उन्होंने कहा, “हम आपको एक पान (पत्ता) पेश  करेंगे” , कि चलो हम खाते हैं और ऐसा सब। और उन्होंने वास्तव में उसे मंत्रमुग्ध कर दिया और उसे एक पान दिया। उसने पान खाया। यह सब उस कार्यक्रम के बाद हुआ, लगभग 10.30 या तो कहें और वह अपने अवचेतन क्षेत्रों में चला गया। लेकिन उसे थोड़ा होश आ रहा था।

और फिर वे उसे टैक्सी में ले गए और उसकी पिटाई करने के लिए। लेकिन वे पीट नहीं सके, आप देखें? वह देख पाया था कि वे उसे पीटने आते थे और उनके हाथ किसी ने पकड़ लिए होते थे। उसको वह पिटाई बिल्कुल भी महसूस नहीं हुई। और वह होश में आता था, फिर बेहोश, और फिर वह बिलकुल होश में आया, देखिये |उसने देखा कि वे उसे पीट रहे थे और वे कह रहे थे कि उन्हें दर्द हो रहा था जैसे कि पीटा जा रहा हो लेकिन वह कभी पीटा नहीं गया। और फिर उन्होंने उसे एक जगह छोड़ दिया। और उन्होंने उसकी चेन, एक सोने की चेन, और उसकी उंगलियों में एक असली माणिक की एक अंगूठी निकाली, उन्होंने वह सब निकाल लिया, और उन्होंने उसे कहीं एक जगह छोड़ दिया।

और फिर वह वहाँ से अपने घर के लिए पूरे रास्ते चल कर गया। तो, मैंने उसके साथ यह सब होते देखा और ऐसा की मैं इन लोगों को थप्पड़ मारने, पटकने वगैरह की कोशिश कर रही थी। मैंने वह सब देखा,  मैं इसे कर रही थी, आप देखिए। तो, सुबह जल्दी  मैं छह बजे उठी  और मैंने उसके घर फोन किया और मैंने कहा, “अब वह कैसा है?

उसकी पत्नी ने कहा, “वह बहुत देर से आया। मेरा मतलब है कि वह वास्तव में सुबह के समय करीब पाँच बजे आया था। और अब वह सो रहा है। ”

 मैंने कहा, “उसे सोने दो। कल रात उनका बहुत बुरा समय रहा और उन्हें बहुत तकलीफ हुई और इन रजनीश के लोगों ने उन्हें बहुत परेशान किया, ”मैंने उससे कहा।वह काफी हैरान थी, आप देखें। वह इन सब बातों को नहीं जानती थी! 

जब वह उठा तो उसने पूछा, “आप कहाँ गए थे?” और उसने इसके बारे में सारी कहानी बताई।

 फिर उसने मुझे फोन किया और उसने कहा, “माँ, आप मुझे बचाने के लिए वहां थीं!” मैंने कहा, “बिलकुल ठीक है।” देखिये,मैंने उसे बताया, लेकिन आम तौर पर मैं आपको नहीं बताती, लेकिन उस दिन, मैं सिर्फ यह पता लगाना चाहती थी।

फिर उन्होंने कहा कि, “मैंने अपनी अंगूठी खो दी है जो मुझे मेरे पिता द्वारा दी गई थी और मैं वास्तव में इसके बारे में दुखी हूं।” तो,

 मैंने कहा, “सब ठीक है तुम इसे पा जाओगे। दोनों चीजें आपको मिलने वाली हैं। ” और जब वह सीढ़ी से नीचे उतर रहा था, तो उसे वहां एक लाल रंग की एक गठरी पड़ी मिली।

 और उसकी पत्नी ने कहा, “यह लाल बंडल यहाँ किसलिए पड़ा है?” तो, उन्होंने इसे उठाया। अंदर रिंग थी और अंदर उसकी चेन थी।

 फिर उसने तुरंत मुझे फोन किया, “माँ मुझे दोनों चीजें मिल गई हैं, तुमने कैसे प्रबंधित किया?”

 तुम देखो यह किया जा सकता है।तो, यह सब उनके लिए किया गया था क्योंकि, आप देखिए, कोई भी इसे कर सकता है। ऐसा हो भी सकता है। लेकिन आपको पता होना चाहिए कि सब कुछ ब्रह्म की शक्ति के माध्यम से किया जाता है, जो की आदि शक्ति का प्रताप है। यह सब उसी के माध्यम से किया गया है बाकी सब कल्पनाएँ  है! यदि आप असत्य से भयभीत नहीं हैं, और यदि आपकी पहचान मिथ्या नहीं है, तो आप इससे परे हैं! लेकिन आप अभी भी इससे पहचाने जाते हैं। यही समस्या है।

सहज योगी: माना की आप वैज्ञानिक हैं, तो क्या आप कह रहे हैं कि आपको वैज्ञानिक काम जारी नहीं रखना चाहिए?

श्री माताजी: नहीं, नहीं, नहीं। यदि आप एक वैज्ञानिक हैं, तो आत्मसाक्षात्कार होने के बाद, आप को ऐसा करना चाहिए की विज्ञान और वास्तविकता को साथ में लाना चाहिए। आप विज्ञान और आत्मसाक्षात्कार को एक साथ समझा सकते हैं। आपको वैज्ञानिक तरीके से आत्मसाक्षात्कार को समझाना होगा। यह आपका प्रयास होना चाहिए, एक नई दिशा, क्योंकि आप ने जान लिया है कि, आप आत्मसाक्षात्कारी हैं, आपको पता चला है कि सर्वव्यापी शक्ति है, अब, यदि आप इसे वैज्ञानिक भाषा में रख सकते हैं, तो आप उनसे बात कर सकते हैं। तो वह ज्ञान व्यर्थ नहीं जाता है। मान लें कि आप एक भूविज्ञानी हैं, तो आप बोध के माध्यम से,भूविज्ञान की कई चीजों को समझा सकते हैं जिसकी आपने अभी तक व्याख्या नहीं की है। तो आप वास्तव में विज्ञान को ही पूर्णता देते हैं ! ऐसे कई सवाल हैं जिनका वे जवाब नहीं दे पाते है। हर बात, राजनीति, सब कुछ – यह क्यों विफल रही है, क्या हुआ है, क्या कारण है – सब कुछ सहज योग के विज्ञान के माध्यम से समझाया जा सकता है। सब कुछ! क्यों यह काम करता है, क्यों यह काम नहीं करता है, क्या चीज है, क्या विफलता है – सब कुछ समझाया जा सकता है। मानव व्यवहार, सब कुछ। तो अपने ज्ञान का उपयोग उस ज्ञान को प्रकाशित करने के लिए करें जो अज्ञानता से आच्छादित है।

उदाहरण के लिए, अब देखें, आपने फिल्मों, सिनेमाघरों को विकसित किया है, यह -वह इसका सहज योग के लिए उपयोग करें। सहज योग के लिए आप इसका उपयोग कैसे कर सकते हैं, आपको इसके विधि और तरीके ढूंढने की कोशिश करनी चाहिए। मान लीजिए कि आप एक नाटककार हैं: नाटकों का उपयोग करें। सहज योग पर एक नाटक करें। उस पर अपना दिमाग लगाएं और आप ऐसा कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए, कोई पत्रकारिता में एक कोर्स कर रहा है, तो उसे सहज योग का प्रचार करने के लिए अपनी पत्रकारिता का उपयोग करना चाहिए।आपको भूविज्ञान   या अन्य किसी भी विषय को सहज योग के प्रकाश में खोज करने की कोशिश करनी चाहिए जो वैज्ञानिकों द्वारा, भूवैज्ञानिकों द्वारा, मनोचिकित्सकों द्वारा, सभी के द्वारा अब तक छोड़ दिया जा रहा है, क्योंकि यह सब विज्ञान है ऐसा है जो अलग-थलग है , जो अंधेरे में है, जिसका पूर्ण से कोई संबंध नहीं है।

अब आप देखिये आपकी आग यहाँ ठीक है? अब, जब मैं अपना हाथ वहाँ रखती हूँ , तब ऐसा होता है की यह आग प्रबुद्ध हो जाती है।  तो, यह शक्ति आप से या आप में से किसी के भी अंदर से जो की आत्मसाक्षात्कारी है, जो कुछ भी आपके भीतर है जो की  आग से जलाया जा सकता है, उसे खिंच लेती है और उसे जला देती है। आपने इस अग्नि का अज्ञान में विश्लेषण किया था, लेकिन अब आप प्रबुद्ध हैं। मैंने भारत में कुछ वैज्ञानिकों को बोध दिलाया जो कृषि पर काम कर रहे थे। उन्होंने कृषि के लिए चैतन्य का उपयोग करना शुरू किया और वे आश्चर्यचकित थे कि वे दस गुना अधिक उपज दे सकते हैं। मेरा मतलब है, आप जो चीजें उत्पादित हो रही हैं उनके बीच के गुणात्मकता अंतर को देख सकते हैं और वे उस पर जबरदस्त काम कर रहे हैं। वे नतीजे और चीजें प्रकाशित करेंगे और वे ऐसा कर रहे हैं।

आप यह भी देख सकते हैं कि जैसे एक परमाणु के नाभिक पर चैतन्य कैसे काम करता है। उसे मेसोट्रोन (परमाणु नाभिक में बलों के लिए जिम्मेदार एक प्राथमिक कण) के माध्यम से कार्यान्वित किया जाएगा।यदि आप उन्हें माइक्रोस्कोप के नीचे देखते हैं,आप पाएंगे कि, मेसोट्रोन तुरंत उस पर प्रतिक्रिया करेंगे चूँकि वे मनमाने हैं और आप चकित होंगे आप उन्हें अपने चैतन्य के माध्यम से संभाल सकते हैं और कुशलता से प्रयोग कर सकते हैं।  यदि आप इसमें जाना चाहते हैं तो आप इसमें जा सकते हैं, क्योंकि सबसे पहले आपको इन भयानक लोगों को समझाना होगा कि और क्या कुछ हो सकता है, और बाकी सब कुछ छोड़ कर और बस इसे स्वीकार करें, इसके भीतर रहें। हम बिना विज्ञान की सहायता के लोगों को निरोगी कर रहें है। हम बिना किसी विज्ञान के पागल लोगों को ठीक कर रहे हैं। आखिर, सब कुछ इंसान की भलाई के लिए है। हम खाद्य समस्या में सुधार कर रहे हैं। हम भौतिक समस्या में भी सुधार कर रहे हैं, मेरा मतलब है कि उनमें लक्ष्मी तत्व में सुधार हुआ है। ये सभी काम किए जा सकते हैं। और वैज्ञानिक दिखा सकते हैं कि जो पूर्ण से संबंधित नहीं है, ऐसा चरम पर ले जाने वाला विज्ञान हमें विनाश की तरफ ले जा सकता है।

यदि आप एक ही दिशा में चलते जाते हैं, एक तरफ़ा गति, तो, यह बस वापस घूम कर और आपके पास वापस आता है। लेकिन अगर आप पूर्ण से संबंधित हैं, तो आप जानते हैं कि इसे कैसे संतुलित करना है, अन्यथा नाक बढ़ने लगती है या कान बढ़ना शुरू होते हैं – यह घातक है। विज्ञान, आधुनिक विज्ञान की वृद्धि नुकसान दायक  है। यहां तक कि  उदाहरण के लिए,पृथ्वी पर, यदि पृथ्वी का कोई एक हिस्सा एक तरफा बढ़ना शुरू हो जाए , संपूर्ण संतुलन और साम्य पृथ्वी से चला जाएगा, क्या ऐसा नहीं है! मेरा मतलब है कि यदि आप प्रकृति को उसकी वास्तविक पूर्णता में देखते हैं तो आपको वहां ऐसे संतुलन का अस्तित्व दिखाई देगा। विज्ञान सिर्फ एक दिशा में एक अंधे घोड़े की तरह चलता है। क्या फायदा है? जब आप परमाणु में जाते हैं और परमाणु से आप परमाणु ऊर्जा में जाते हैं और वहां से विनाश वाले भाग में पहुँच जाते हैं।

लेकिन अगर आपने सत्य और पूर्ण को रखा होता, तो आप उस दूर तक नहीं गए होते। ठीक है, यह हमारे लिए उपयोगी है, इसका उपयोग करें। विश्लेषण आपको नष्ट कर देता है, हमारे सभी चरित्र को नष्ट कर देता है, सब कुछ। यदि आप केवल अपना स्वयम का ही विश्लेषण करना शुरू करते हैं, तो आप नष्ट हो जाएंगे। अपने आप को एक पूर्णता के रूप में ले लो। ऐसे लोग हैं जिन्हें मैंने जाना है जो मेरा भी विश्लेषण करते हैं। ऐसे मूर्ख, महा- मुर्ख मैंने देखे हैं। हा, हैं। यह बहुत ही शानदार है, जिस तरह से इंसान छोटी-छोटी बुद्धि के साथ जाता है! सहज योग में वे कुछ भी नहीं समझा सकते हैं। जब आपके पास खोजने के लिए उच्च विज्ञान होता है, तो निचले विज्ञानों को भूल जाते हैं। मेरा मतलब है, जब आप एक मेंढक थे, तो आप केवल उस कुएं के बारे में चिंतित थे जहां आप रहते थे लेकिन अब आज आप एक इंसान हैं, आप अन्य चीजों के बारे में चिंतित हैं। अब, यदि आप एक महा-मानव बन जाते हैं, तो आपको उच्च विज्ञान के बारे में चिंतित होना चाहिए।

अब आपने विज्ञान के माध्यम से जो हासिल किया है हम सहज योग के माध्यम से एक सेकंड में प्राप्त कर सकते हैं। आपका भौतिक कल्याण हो सकता है, एक सेकंड में हम इसे सुधार सकते हैं। यदि आपको अपना आत्मसाक्षात्कार मिलता है, तो भौतिक रूप से आप बेहतर होंगे।

वे ज्यादातर लोगों को उन्होंने कोमा, मृत या पागल और गए-गुजरे मामलों के रूप में घोषित करते हैं … वे किसी भी प्रकार के गंभीर इलाज नहीं कर पाए हैं। एक बार जब वह पागल खाने में जाता है तो वह बस एक लाश के रूप में [बाहर] आता है। वह कभी भी एक समझदार व्यक्ति के रूप में वापस नहीं आता है। आपके विज्ञान ने अब तक क्या हासिल किया है? और किस तरीके से? कुछ भी ले लो: राजनीतिक समस्याओं, कुछ भी। आप राजनीतिक में कोशिश करते हैं, जैसे लोकतंत्र  -आपने लोकतंत्र बनाया है। आप साम्यवाद रखना चाहते थे -यह सभी को मारने के अलावा कुछ नहीं है। सबकुछ उल्टा-पुल्टा है।

हैलो! क्या हाल है? तुम यहाँ आओ यहाँ आओ! आप पिताजी आए हैं?

बच्चा: हाँ।

श्री माताजी: वह कहाँ है?

बच्चा: वहाँ में।

श्री माताजी: ओह, मैं देखती हूं, मैं देखती हूं। बैठो, बैठो, बैठो। अच्छा!अब कोई और सवाल?

क्या हमें कुछ संगीत चाहिए?

योगी: माँ, आपके नाम ‘श्री भगवती’ का सही अर्थ क्या है? मैंने नाम के कई अलग-अलग अनुवाद को एक-दूसरे से पूरी तरह अलग देखा है।

श्री माताजी: आप देखते हैं, ’भ’ ‘ग’: “भग” का अर्थ है एक साथ छह चीजें। वे भगवान के छह गुण हैं और भगवती भगवान की शक्ति है, यही कारण है कि भगवती कहा जाता है। ईश्वर के छः मूल गुण। पहली अबोधिता है, दूसरी रचनात्मकता है, तीसरा है … भार-रहित, लेकिन पोषक। देखिये, यदि आप माली और भूमि माता को साथ रखें  तो जो उनकी गुणवत्ता है,  विकास के लिए पोषण,देखभाल होता है, जिसे ‘पालनहार’ कहा जाता है। अंग्रेजी में कहीं एक शब्द होना चाहिए। ‘पैट्रन’? लेकिन ‘संरक्षक’ का मतलब यह सब नहीं है, क्या ऐसा नहीं है।

योगी: Husbandry?

श्री माताजी: Husbandry? Husbandry? एक मजाकिया शब्द है! (हँसी)

योगी: Paternal  माता  Paternal

‘श्री माताजी: लेकिन, आप देखिए यह मातृत्व भी है।

योगिनी:  Guardian?श्री माताजी: Guardian केवल नियंत्रक हैं। आप इन सभी चीजों को एक साथ रखते हुए देखें ‘पालनहार’ 

योगी: Sustainer.।

श्री माताजी: जीविका भी है। लेकिन दया, नियंत्रण, देखभाल के बाद, निराई। उस की सारी सुंदरता और अपनी रचना को देखने का आनंद। विकास। वह जो हमारे विकास को संभव बनाता है। तब वह सर्वशक्तिमान है। सर्वशक्तिमान। कोई भी उससे अधिक शक्तिशाली नहीं है। वह सबसे शक्तिशाली है और उसमे सब कुछ शामिल है। वह सर्वव्यापी है और वह सब कुछ जानता है – सर्वरूपा। वह सब कुछ जानता है, सर्वज्ञ। यह ‘भग’ है। और भगवती भगवान की शक्ति है। भगवती के बिना भगवान का कोई अर्थ नहीं है। यह चाँद और चाँदनी की तरह है, यह सूरज और सूरज की रोशनी की तरह है। आप अंतर नहीं कर सकते। वे सिर्फ और सिर्फ एक हैं।

योगी: क्या भगवती आदि शक्ति है?

श्री माताजी: आदि शक्ति भगवती के समान हैं। उसे कई नामों से बुलाया जाता है। उनमें से एक निर्मला भी हैं।