Guru Puja, The Statutes of the Lord

Temple of All Faiths, Hampstead (England)

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लेकिन आज मैं आपको गुरू बनने का अधिकार देती हूं ताकि आपके अपने चरित्र और व्यक्तित्व से ….. जिस प्रकार से अपने जीवन में आप सहजयोग करते हैं और इसके प्रकाश को फैलाते हैं उससे लोग आपका अनुसरण करने लगेंगे और आप उनके हृदय में परमात्मा का विधान स्थापित कर सकेंगे और उन्हें मुक्ति दे पायेंगे और उन्हें मोक्ष प्रदान कर पायेंगे क्योंकि आपको भी मोक्ष प्राप्त हो चुका है। आप परमात्मा के चैनल हैं…. बिना इन चैनलों के यह सर्वव्याप्त शक्ति कार्यान्वित नहीं हो सकती है … इसकी प्रणाली ही ऐसी है। यदि आप सूरज को देखें तो पायेंगे कि इसका प्रकाश इसकी किरणों के माध्यम से फैलता है। आपके हृदय से रक्त आपकी धमनियों के माध्यम से बहता है। वे छोटी से छोटी होती जाती हैं। आप भी उन्हीं धमनियों की तरह से हैं जिनमें से मेरे प्रेम का रक्त सभी लोगों में प्रवाहित हो सकेगा। यदि ये धमनियां छिन्न-भिन्न होंगी तो ये प्रवाह लोगों तक नहीं पंहुच पायेगा ….. और इसी कारण आप सब लोग इतने महत्वपूर्ण हैं। जितनी बड़ी ये धमनी होगी उतने ही अधिक लोगों को ये आच्छादित कर पायेगी। इस कारण भी आप सब लोग अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
गुरू को अत्यंत गरिमामय होना चाहिये … जैसा कि मैंने आपको पिछली बार बताया था कि गुरू का अर्थ है वजन …. अर्थात गुरूत्व। आपके अंदर एक प्रकार का गुरूत्व होना चाहिये …. आपके अंदर एक प्रकार का वजन होना चाहिये ….. वजन का अर्थ है आपके चरित्र का वजन …. आपकी गरिमा का वजन … आपके व्यवहार का वजन …. आपकी आत्था और प्रकाश का वजन। आप उच्छृंखलता से … दंभ … अश्लील भाषा…सस्ते मजाक… क्रोध के कारण गुरू नहीं बनते हैं … आपको इन सबका पूरी तरह से त्याग कर देना चाहिये। अपने माधुर्य …. अपनी मीठी बोली से आपको लोगों को अपनी ओर आकर्षित करना है.. … ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार से मधु से भरे हुये फूल मधुमक्खियों को आकर्षित करते हैं … उसी प्रकार से आपको भी लोगों को आकर्षित करने में सक्षम होना चाहिये। लेकिन आपको इसके बारे में गर्व भी अनुभव करना चाहिये ….. लोगों के प्रति आपके अंदर सहानुभूति भी होनी चाहिये और आपको उनकी देखभाल भी करना चाहिये। संक्षेप में मुझे बताना है कि आपको इस दिशा में कितना कार्य करना है। आपको अपना भवसागर एकदम स्वच्छ रखना है। सबसे पहले आपको मालूम होना चाहिये कि भवसागर उन गलत गुरूओं के कारण पकड़ता है जिनको आपने कभी अपना गुरू बनाया था। आपको गुरू बनाने से पहले उस गुरू के विषय में सब कुछ जान लेना चाहिये। अपने गुरू के चरित्र के विषय में जानने का प्रयास करें। लेकिन ये कार्य काफी कठिन भी है क्योंकि आपकी गुरू अत्यंत भ्रमित करने वाली हैं …. वह महामाया हैं … अतः उनके बारे में मालूम करना अत्यंत कठिन है। उनका व्यवहार एकदम सामान्य है और कई बार ये आपको काफी हैरानी में डाल देता है। लेकिन देखें कि किस प्रकार से छोटी-छोटी बातों में …. उनका व्यवहार किस प्रकार से रहता है … किस प्रकार से उनके प्रेम की अभिव्यक्ति होती है….. इन सब चीजों को याद करने का प्रयास करें। उनकी क्षमाशीलताको याद करने का प्रयास करें। तभी आप जान पायेंगे कि आपकी गुरू वो हैं जिनको प्राप्त करने की कई लोगों ने इच्छा की …… जो सभी गुरूओं का स्त्रोत हैं। ब्रह्मा विष्णु और महेश की भी उन जैसी गुरू को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा रही है और वे सब आपसे ईर्ष्या करते होंगे। लेकिन ये गुरू भ्रांतिस्वरूपा हैं अतः अपने भवसागर को सुधारने के लिये कहें कि माँ आप ही हमारी गुरू हैं। इस भ्रांतिस्वरूप के कारण आपके अंदर वह भय …. वह डर …. वह सम्मान नहीं है जो इस गुरू के लिये आवश्यक है …. और इसीलिये आपका गुरू तत्व स्थापित नहीं है। जब तक आपके अंदर वह भय नहीं है तब तक आपका गुरू तत्व विकसित नहीं हो सकता है। इसमें आप किसी प्रकार की छूट नहीं ले सकते हैं। मैं आपको स्वयं बता रही हूं ….. कि मैं अत्यंत भ्रांतिस्वरूपा हूं। अगले ही क्षण मैं आपको हंसा दूंगी और इसके बारे में भूल भी जाऊंगी … क्योंकि मैं आपकी स्वतंत्रता की …. पूर्ण स्वतंत्रता की परीक्षा लेती हूं। मैं आपके साथ ऐसा खेल खेलती हूं कि आप एकदम भूल जायेंगे कि मैं आपकी गुरू हूं।
अतः सबसे पहले आपको अपने गुरू के बारे में मालूम करना चाहिये। उनको अपने हृदय में बिठाइये। मेरे कहने का मतलब है कि वैसे आपकी गुरू अत्यंत महान हैं …. शानदार हैं। मैं सोचती हूं कि काश मेरी भी कोई ऐसी ही गुरू होती। आपकी गुरू निरीच्छ …. और पापविहीन हैं …पूर्णतया पापविहीन हैं। मैं जो कुछ भी करती हूं वह मेरे लिये पाप नहीं है। मैं किसी को भी मार सकती हूं … मैं चाहे जो कुछ भी करूं … मैं आपको सच कह रही हूं कि ये सत्य है। मैं चाहे जो कुछ भी करूं वह पाप और पुण्य से परे है लेकिन मैं इसका खयाल रखती हूं कि आप लोगों की उपस्थिति में ऐसा कोई भी कार्य न करूं जिससे आप लोग भी ऐसा ही करने लगें क्योंकि ये भी मेरा एक गुण है।
निःसंदेह आपकी गुरू सर्वोच्च हैं लेकिन फिर भी आपको मालूम होना चाहिये कि अभी आपके पास ये उच्च स्तरीय शक्तियां नहीं हैं। मैं इन सब चीजों से परे हूं। मुझे मालूम नहीं है कि प्रलोभन क्या चीज हैं …. कुछ भी नहीं। मेरा मतलब है कि मुझे जो कुछ भी अच्छा लगता है वो मैं करती हूं … ये मेरी इच्छा है। लेकिन इसके बावजूद भी मैंने स्वयं को एकदम सामान्य बनाया है। क्योंकि मुझे आपके सामने स्वयं को ऐसा दिखाना है कि आप समझ सकें कि गुरू के विधान (Statutes) क्या हैं। मैं ही सारे विधानों को बनाने वाली हूं ….हूं कि नहीं? आप ही के कारण मैं ये सब कार्य करती रहती हूं और आपको सिखाती रहती हूं क्योंकि आप सब अभी छोटे बच्चे हैं।
इसी प्रकार से आप लोगों को याद रखना चाहिये कि जब आप दूसरे लोगों से सहजयोग के बारे में बात करते हैं तो याद रखें कि वे आपको सारे समय देखते रहते हैं और वे समझने की कोशिश करेंगे कि आप सहजयोग में कितने गहरे हैं। जिस प्रकार से मैं आपको समझने का प्रयत्न करती हूं इसी प्रकार से आप भी उनको समझने का प्रयास करें। जैसे मैं आपको प्रेम करती हूं वैसे ही आप भी उनको प्रेम करने का प्रयास करें। निश्चित रूप से मैं आपको प्रेम करती हूं … निःसंदेह लेकिन मैं निर्ममा भी हूं …. मैं प्रेम से परे हूं … ये एकदम भिन्न प्रकार की अवस्था है।
इन परिस्थितियों में आप लोग मुझसे अच्छे हैं… मुझसे काफी अच्छे हैं क्योंकि कोई गुरू कभी उस सीमा तक नहीं जा सकता है। इसके अलावा मैं सभी शक्तियों का स्त्रोत भी हूं। अतः आप भी मुझसे जो चाहे वो शक्तियां प्राप्त कर सकते हैं। मैं निरीच्छ हूं … लेकिन आपकी जो भी इच्छायें होंगी उन्हें पूर्ण किया जायेगा। यहां तक कि मेरे लिये भी आपको इच्छा करना पड़ती है …. जरा दखिये … कि मैं आप लोगों से किस तरह से बंधी हुई हूं। जब तक आप मेरे अच्छे स्वास्थ्य की कामना नहीं करते हैं तब तक मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं होगा … ये इस सीमा तक है। लेकिन मेरे लिये क्या अच्छा स्वास्थ्य और क्या खराब स्वास्थ्य? इन सुंदर परिस्थितियों में आपको खूब फलना फूलना चाहिये। आपको गुरू बनने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिये।
अब आपके भवसागर को स्थापित किया जाना चाहिये। सबसे पहले आपको अपने गुरू को जानना चाहिये कि वह आपके प्रत्येक चक्र पर कार्य कर रहीं हैं … जरा कल्पना कीजिये तो! आपकी गुरू कितनी महान हैं । ऐसा करने से ही आपके अंदर आत्मविश्वास आने लगेगा। आपकी गुरू इतनी महान हैं ….. कि सभी को इतनी आसानी से आत्मसाक्षात्कार प्राप्त हो रहा है। यदि आप किसी धनवान व्यक्ति के पास धन के लिये जांये तो वो आपको एक कौड़ी भी नहीं दे पायेगा। लेकिन आपकी गुरू इतनी शक्तिशाली हैं कि उनसे आपको अपनी शक्तियां चुटकियों में प्राप्त होने लगती हैं। आपको इस बात से प्रसन्न होना चाहिये … अत्यंत प्रसन्न होना चाहिये कि आपको ये सब शक्तियां प्राप्त हो चुकी हैं। कम से कम जो सहजयोग में काफी समय से हैं उन्हें इस बात का पता होगा। जो आज पहली बार आये होंगे वे मेरे लेक्चर से थोड़ा सा भ्रमित भी हो सकते हैं। आप सभी को निश्चित रूप से पता है कि ये है क्या।
आपको अपने गुरू की शक्तियों को समझने के लिये आपको मालूम होना चाहिये कि आपकी गुरू कौन है …. साक्षात आदि-शक्ति। हे परमात्मा …… इस पर विश्वास करना कितना कठिन है….. तब अपने भवसागर को स्थापित करिये। एक गुरू अपने सिर को किसी के सामने नहीं झुकाता … खासकर मेरे शिष्य …. सिवाय अपने माता पिता और बहन के सामने किसी के सामने सिर नहीं झुकाते हैं। देखिये किन्हीं-किन्ही रिश्तों में सिर झुकाना भी पड़ता है … तो वहां पर सिर झुकाइये …. पर अन्य किसी के सामने नहीं। दूसरी बात आपकी गुरू बहुत महान लोगों की माँ रही हैं। उन लोगों के विषय में सोचने मात्र से ही आप लोगों का गुरू तत्व स्थापित हो सकता है। मेरे कितने महान बच्चे थे …. कितने महान व्यक्तित्व। उनका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता है …. वे अनेक थे … एक के बाद एक। आप भी उसी परंपरा का ही अंग हैं…. मेरे शिष्य हैं। उन्हें अपना आदर्श मानिये। उनका अनुसरण करिये …. उनके बारे में पढ़ें, उनको समझिये … उन्होंने क्या कहा था …. उन्होंने किस प्रकार से इतनी ऊँचाइयां प्राप्त कीं। उनको पहचानें…. उनका आदर करें। आपका गुरू तत्व स्थापित हो जायेगा।
अपने अंदर के विधानों को आत्मसात करिये और इस पर गौरवान्वत हों। उन लोगों से बिल्कुल भी भ्रमित न हों जो केवल बातें करते हैं ….बहुत से लोग बातें करते रहते हैं। पर हम लोग उन सभी लोगों को अपनी ओर खींच लेंगे। सबसे पहले हमें अपने गुरूत्व को स्थापित करना होगा। जिस प्रकार से धरती माँ प्रत्येक को अपनी ओर …. धरती का ओर खींच लेती है … उसी प्रकार से हम लोग भी उन सब को अपनी ओर खींच लेंगे। आज आप सबको …. अपनी आत्मा को वचन देना होगा कि आप सब अपनी माँ को गौरवान्वित करने वाले गुरू बनेंगे ।
परमात्मा आपको धन्य करें।