What are we inside?

Carrs Lane Church Centre, Birmingham (England)

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                      हम अंदर क्या हैं? 

पब्लिक प्रोग्राम,

 कैरस लेन चर्च सेंटर, कैर्स लेन, बर्मिंघम बी४ ७एसएक्स (इंग्लैंड), ९ अगस्त १९८०।

मुझे देर से आने के लिए वास्तव में खेद है लेकिन केवल आपके ग्रैंड होटल ने ही मुझे देरी करवाई | हमने पैंतालीस मिनट पहले से चाय का आर्डर दिया था और वे हमारे लिए चाय नहीं बना सके! अब हमारे यहाँ क्या हो रहा है? हमें यह समझना होगा कि इस आधुनिक समय में लोग सामान्य नहीं हैं। कहीं न कहीं उनके साथ कुछ गलत हो रहा है। और शायद हमारे भीतर कुछ गंभीर हो रहा है, जो बाहर ऐसा सामूहिक प्रभाव दे रहा है।

अब परेशानी यह है कि हम नहीं जानते कि हम अंदर क्या हैं। जब तक हम यह नहीं जान लेते कि हम क्या हैं, जब तक हमारे भीतर प्रकाश नहीं होगा, तब तक हम यह नहीं समझ सकते कि हमारे साथ समस्या क्या है। हम जो कुछ भी हमारी सीमित जागरूकता से जानते हैं उसे स्वीकार करते हैं। क्योंकि मानव जागरूकता उस फलदायी स्थिति तक नहीं पहुंची है जहां कोई यह कह सके कि, “मैं निश्चित रूप से जानता हूं कि यह मेरा उपयोग है। मैं निश्चित रूप से जानता हूं कि मैं यहां क्यों हूं। मैं निश्चित रूप से जानता हूं, मेरा उद्देश्य क्या है – मैं अमीबा अवस्था से मनुष्य क्यों बना; मुझे इंसान बनाने के लिए प्रकृति ने ये सब मुसीबतें क्यों उठाईं।

हम इन सवालों के जवाब बिल्कुल नहीं दे पाए हैं। लेकिन इंसान का दिमाग ऐसा है कि वह हर चीज से समझौता कर लेता है।

तुम देखो, यह एक छोटी सीप की तरह है जिसे अपने छोटे से घर, खोल के अंदर एक रेत कण मिल जाता है। तो वह कहता हैं, “ठीक है, अब मैं ज्यादा परेशान नहीं होने वाला। ठीक है।” तो वह उस रेत कण की उस छोटी सी सतह के चारों ओर बुनता चला जाता है, चाहे वह कुछ भी हो, जो उसे परेशान कर रहा है। फिर किसी हरकत से उसे थोड़ी और प्रेरणा मिलती है, फिर वह बार-बार ऐसे ही कार्यशील रहता है। इस तरह हम इस दुनिया में ज्यादातर समय रहते हैं और हम सोचते हैं, “ओह! हम दुनिया के शीर्ष पर हैं। हमारे साथ कुछ भी गलत नहीं है,” जब तक हम किसी ऐसी चीज का सामना नहीं करते जो विनाशकारी है। कोई आपदा हमें झकझोर देती है और फिर, “ओह! ये कैसे हुआ?” जैसे युद्ध । जब तक हम युद्ध के मुकाम तक नहीं पहुंच जाते, हम कई तरह से युद्ध की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन जब हम पर युद्ध छिड़ जाता है तो हम सदमे में आ जाते हैं और कहते हैं, “हे भगवान! क्या हुआ?”

आज युद्ध हमारे भीतर है, हमारे भीतर है, बाहर नहीं। हम यह महसूस नहीं कर रहे हैं कि यह हमारे भीतर कैसे निर्माण कर रहा है। उदाहरण के लिए, कैंसर हमारे भीतर का शारीरिक युद्ध है। हमें इसकी जानकारी नहीं है। हम अपने शरीर को वैसे ही स्वीकार करते हैं जैसे वह है। कल हम डॉक्टर के पास जाते हैं और वह कहते हैं, “आपको कैंसर हो गया है।” तो, हम अवसाद में आ जाते हैं! – समाप्त! हम यह नहीं समझ पाते कि, यह कैसे हुआ, क्यों हुआ है, हमने अपने साथ क्या किया है?

एक अन्य व्यक्ति सामान्य उद्देश्यों के लिए ठीक है। अचानक, मनोवैज्ञानिक कहता है कि, “बेहतर होगा कि तुम मानसिक चिकित्सालय  में जाओ।” और हम वहाँ हैं! हम अपने आप को एक मानसिक चिकित्सालय में पाते हैं और हम सोच रहे होते हैं कि, ” समझदार माना जाने वाला मैं, यहाँ कैसे हूँ?!”

तब आपको कुछ ऐसे लोग मिलते हैं जो अपनी आध्यात्मिकता या अन्य सभी खोज कर रहे हैं। वे सोचते हैं, “ओह, हमें यह उपलब्धि हो गयी है, हमें वह मिल गया है। हमें यह पाना चाहिए और अब हम दुनिया में शीर्ष पर हैं!” और आप खुद को कहां पाते हैं? आपने अपना सारा पैसा, सब कुछ खो दिया है। तुम कहीं नहीं हो। तुम अकेले पड़ गए हो। तुम खंडित हो। आपका अपने समाज से कोई संबंध नहीं है। जैसे आप आए हैं, आपने अपने समाज में कोई योगदान नहीं दिया है, अपने लिए भी कुछ नहीं जोड़ा है और अपना जीवन ऐसे ही समाप्त कर लिया है।

हमने जिस प्रकृति से लिया है उसे हमने कुछ नहीं दिया, जिस समाज में हम रह रहे हैं कुछ नहीं, जिस देश में हम रह रहे को कुछ भी नहीं दिया, ब्रह्मांड को कुछ भी नहीं जिसने हमें बनाया है, और ईश्वर को कुछ भी नहीं दिया है जिसने हमें बनाया है। क्योंकि ईश्वर के नाम पर भी मैंने ऐसा धोखा-धड़ी होते देखा है। इस दुनिया में हर तरह का धोखा चल रहा है: आप सोच भी नहीं सकते कि लोग इस तरह की चीजों को लेकर कितनी दूर जा सकते हैं! वे पैसा कमाना चाहते हैं। वे हर तरह की बात शुरू करेंगे, “ओह, यहाँ एक जगह है। तुम जाओगे तो रोग मुक्त हो जाओगे।” हजारों लोग वहां जा रहे होंगे लेकिन यह सब धोखा है! ज़रा कल्पना करें! सारा पैसा खत्म हो गया, सब कुछ। आप पाते हैं कि, “ओह, आपने कुछ हासिल नहीं किया है।”

तब आप सोचते हैं कि, “ठीक है, चलो कुछ मज़ा करते हैं!” कम से कम आपके पास करने के लिए कुछ नहीं है, “चलो कुछ मज़ा करें!” तो मस्ती के लिए जो आईडिया है वो भी बहुत अजीब है क्योंकि मजे की बात यह है कि हम अपनी प्रतिष्ठा कैसे छोड़ देते हैं। आप देखते हैं मस्ती का मतलब है: आज मैंने देखा… हम एक दुकान पर गए और हमने मुख्य सड़क से एक कोण पर पार्क किया था और एक बड़ा पब था जहाँ कुछ लड़के, युवा लड़के, अच्छे, अच्छे लड़के, कुछ बियर या कुछ ले रहे थे। तभी एक लड़की आई और एक जगह कार खड़ी कर दी। जब वह चली गई तो वे अपने पब से नीचे उतरे – वे बालकनी पर थे, नीचे आए, उस लड़की की कार उठाई, वास्तव में उठा लिया, उन सभी ने, उसे दूसरी तरफ रख दिया और उसी तरह की कार उसके स्थान पर रख दी । ऐसा करने में उन्हें लगभग आधा घंटा लगा। और उन्हें लगा कि वे मज़े कर रहे हैं: हँसना, मज़ाक करना, यह बात, वह चीज़। ऐसी मूर्खतापूर्ण मस्ती आपको कैसे प्रसन्न कर सकती है? यह मूर्खता है। वक्त बर्बाद करना। मूर्खता। मेरा मतलब है, मैं एक छोटे लड़के को ऐसा करते हुए समझ सकती हूँ। लेकिन इसके पीछे कुछ कुटिलता है। जैसे कि वे ग्रसित थे, मुझे लगा। उन्हें नहीं पता था कि लड़की बेवजह कितनी परेशान होगी। इसके विपरीत, यदि उन्होंने इतना प्रयास किसी का भला करने का किया होता तब इसका आनंद अधिक स्थायी होता|

लेकिन इंसानों के साथ यही समस्या है, कि वे पहचानते नहीं, जानते नहीं। उनका कोई ठिकाना नहीं है। वे थाह नहीं पा रहे हैं कि वे कहां हैं, कहां बहे जा रहे हैं। जब तक कोई चीज उन्हें परेशान नहीं कर रही है, वे उसी तर्ज पर चलते रहते हैं। बेशक, आधुनिक समय में, इन सबके बावजूद, एक बड़ी खोज़ चल रही है। लोग खोज के साथ पैदा होते हैं। बच्चे खोज के साथ पैदा होते हैं। बचपन से, वे पाते हैं कि कुछ गड़बड़ है। वे कभी-कभी अपने परिवार में भी पाते हैं, जैसे कि उनके माता-पिता, उनके रिश्ते बेहद संकीर्ण सोच वाले हैं, वे बहुत अजीब हैं। वे समाज में कुछ लोगों को बेहद आक्रामक पाते हैं। या हर तरह की चीजें उन्हें मिलती हैं। और फिर वे अपनी आंखें खोलते हैं और वे तुलनात्मक दृष्टी से देखने लगते हैं, “क्या मैं भी उनमें से एक हूं? क्या मैं उन जैसा एक बनने जा रहा हूँ?” तब अपेक्षाकृत वे देखने लगते हैं, “नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, यह जीवन नहीं है। कुछ गड़बड़ है।” क्योंकि ये लोग जो इस तरह पैदा हुए हैं, वे एक अलग क्षमता के हैं, एक अलग स्वभाव के हैं, एक बहुत ही अलग गुण के हैं।

लेकिन जब वे सांसारिक जीवन में आ जाते हैं और जब वे अन्य लोगों को इतनी आसानी से स्वीकार कर लेते हैं तो वे भी धीरे-धीरे अपनी गुणवत्ता खो देते हैं। वे यह भी स्वीकार कर लेते हैं कि, “ओह, ठीक है, जो कुछ था वह अहंकार था। तो यह हममें बहुत अधिक अहंकार था। यह हमारे भीतर एक विशाल अहंकार था। हम अहंकार के वशीभूत हो गए थे,” तो वे कहते हैं, “ठीक है। चलिये वापस चलते हैं।” आप आदिम बनने की कोशिश करते हैं। अब तुम आदिम नहीं हो सकते क्योंकि आपका मस्तिष्क आदिम नहीं है। आपका मस्तिष्क अति विकसित है। यदि तुम प्रयत्न भी कर लो तो तुम आदिम नहीं हो सकते क्योंकि आदिम मनुष्य में सोचने की प्रक्रिया बहुत कम होती है। जबकि आप जो करते हैं, यह आपका जीवन अन्य कुछ भी नहीं बल्कि केवल सोच, सोच, सोच, सोच, सोच है! जैसे, सोच के दो सींग हर समय आप में से बाहर निकल रहे है और आपके चारों ओर एक वृत बना रहे है! आप आदिम कैसे बन सकते हैं? तो यह भी हमारे भीतर केवल धारणाएं हैं या विश्वास है कि हम वह बन जाएंगे।

विश्वासों से, तुम नहीं बनते। मान लीजिए मैंने खुद को आश्वस्त कर लिया है कि मैं इंग्लैंड की रानी हूं। क्या मैं बन जाऊंगी? या मुझे एक विचार आता है, एक विचार की कल्पना करती हूं, कि मैं यह हूं और वह हूं। क्या मैं बन जाऊंगी? मुझे बनना होगा! मेरा मतलब है कि यह समझना इतना आसान है, है ना। यह इतना व्यावहारिक है। देखिए, अगर मैं आपसे कहूं कि आपको चाय पीनी है, तो ठीक है। तब तुम कहोगे, ‘मैंने कभी अपनी चाय नहीं पी। चाय के बारे में क्या?” जब तक आप इसे पी नहीं लेते तब तक,  आपका इसे पीना बाकी है| लेकिन आप कहेंगे, “नहीं। ठीक है, जब तक मैंने कहा कि मैं अपनी चाय पी लूँगा, तब तक यह ठीक है।” जैसे कि, मैं पहले ही पी चुका हूं। हमारे मन में इस प्रकार की भ्रांति है: कि इसे किए बिना हम इसके बारे में काफी संतुष्ट महसूस करते हैं। और इसे कलियुग का महान भ्रम कहा जाता है, जिसे ‘महामाया’ कहा जाता है।  मनुष्य को सबसे बड़ा भ्रम यही है कि, वह जो नहीं है उसी बात का भरोसा दिलाया जाता है। ऐसी स्थिति को वे कई बार मान्य कर लेते हैं। एक नाटक में यह ठीक है कि, अगर,  आप एक बहुत बड़े नायक को देख रहे हैं, जैसे नेपोलियन लड़ रहा है और वेलिंगटन लड़ रहा है। अचानक आपको लगता है, “ओह, मैं नेपोलियन हूँ!” शायद, ठीक है।

लेकिन हमें ऐसी धारणाएं वास्तविक जीवन में भी हो जाती हैं, जो वास्तव में असत्य हैं, जो हम खुद नहीं हैं।

तो हम मुद्दे पर आते हैं – हम क्या हैं? असल में हम क्या हैं? अगर ये कल्पनायें और धारणाएं हैं, तो हम क्या हैं? सच में, हम क्या हैं? और हम और कुछ नहीं बल्कि आत्मा हैं। अपने भीतर हम, उस शाश्वत अस्तित्व का प्रतिबिंब हैं, जिसे ‘आत्मा’, आत्मा कहा जाता है। हम वही हैं। अन्य सभी धारणा अर्थहीन है। उदाहरण के लिए, एक दीया है, जिसमें प्रकाश नहीं है – आप उसका क्या करेंगे? मान लीजिए कि एक ट्यूब है जिसमें प्रकाश नहीं है – आप इसके बारे में क्या सोचते हैं? मान लीजिए कि यह मशीन ( माइक्रोफोन)यहाँ है और यह काम नहीं करती – आप इसे क्या कहते हैं? एक कबाड़! उसी तरह, अगर हम अपने भीतर उस प्रकाश को नहीं खोज पाते हैं, अगर हम उस प्रकाश से खुद को प्रबुद्ध नहीं करते हैं, तो हम अपना अर्थ, अपना उद्देश्य नहीं खोज रहे हैं। हम अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं, या तो अपने अहंकार से या अपनी कंडीशनिंग से।

कंडीशनिंग का, निश्चित रूप से, कुछ ही समय में सरलता से पता लगाया जा सकता है। इस बाईं ओर की नाड़ी जिसे इड़ा नाड़ी कहा जाता है, के माध्यम से होने वाली कंडीशनिंग का पता लगाना बहुत आसान है। यह हमारे भीतर एक सूक्ष्म चैनल है जिसे ‘इड़ा नाड़ी’ कहा जाता है। यह हमें प्राप्त वह शक्ति है, जिससे की हम इच्छा करते हैं। संस्कृत में, इसे ‘महाकाली शक्ति’ कहा जाता है। इच्छा की शक्ति, जिससे हम कामना करते हैं। इच्छा में कोई मूर्त यथार्थ बात ही नहीं होती। लोग इंग्लैंड के राजा बनने की इच्छा कर सकते हैं लेकिन ऐसा नहीं है, है ना। यह बस एक इच्छा है। तो इसी के माध्यम से इच्छा शक्ति आती है जिसे ‘महाकाली’ कहा जाता है। यह शक्ति ‘इडा’ नामक नाड़ी में प्रवाहित होती है। अब, नाम संस्कृत में हैं। परेशानी यह है कि,  यह सब हजारों साल पहले ऋषियों द्वारा खोजा गया था जिन्होंने इसे संस्कृत नाम दिया था। साथ ही इसका कुछ अर्थ यह भी है कि ये नाम उन्हें अचेतन से मिले हैं। तो ये संस्कृत नाम नहीं हैं बल्कि वास्तव में उस चीज़ के नाम हैं। तो यह इड़ा नाड़ी है जो हमारे भीतर इच्छा शक्ति को अभिव्यक्त करती है। इसे ‘चंद्र नाड़ी’ भी कहा जाता है जिसका अर्थ है चंद्रमा की रेखा।

दाहिनी ओर, आप एक और शक्ति देखते हैं जिसके द्वारा हम कार्य करते हैं, क्रिया की शक्ति; महासरस्वती कहा जाता है, शक्ति जो हमारे भीतर कार्य करने की शक्ति के रूप में निवास करती है। हम दो तरह से कार्य करते हैं। और कार्य करने, सोचने की शक्ति भी। जैसे हमें जो करना होता है, हम उसी के बारे में सोचते हैं। तो, इसे दो हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है: एक जब हम अपनी शारीरिक क्षमताओं के कारण कार्य करते हैं, और जब हम सोचते हैं, हमारी तर्कसंगत क्षमता के कारण।

तो ये दोनों शक्तियाँ बहुत सूक्ष्म रूप से हमारे भीतर निवास करती हैं। और बाहर वे स्वयं को स्थूल रूप में दो अनुकंपी तंत्रिका तंत्र sympathetic nervous systems के रूप में व्यक्त करते हैं, जिन्हें बायां और दायां अनुकंपी तंत्रिका तंत्र कहा जाता है। बायाँ अनुकंपी तंत्रिका तंत्र द्वारा, हम सभी कंडीशनिंग को स्वीकार करते हैं, जिसे फ्रायड ने कंडीशनिंग के रूप में वर्णित किया है, क्योंकि यह आपको आपके अतीत में ले जाता है। तो यह आपके अतीत की रेखा का प्रतिनिधित्व करता है।

दाहिना बाजु पक्ष आपको भविष्य देता है। यही वह है जो हमें भविष्य का विचार देता है। उदाहरण के लिए, जानवरों को भविष्य के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती है। वे ज्यादातर अपनी कंडीशनिंग के साथ रहते हैं। केवल उनका बायां हिस्सा ही वास्तव में विकसित होता है, इतना ही कि पीनियल ग्रंथि, जो हमारे मस्तिष्क में होती है, जो हमारे बाएं हिस्से को नियंत्रित करती है, इंसानों की तुलना में जानवरों में अधिक विकसित होती है। फिर एक इंसान के रूप में आपका दायाँ साइड काम करना शुरू कर देता है चूँकि हम सोचते हैं, हम बोलते हैं, और हम भविष्य के बारे में सोचते हैं, इसलिए राइट साइड का विकास होता है।

कंडीशनिंग के साथ, आप एक प्रति-अहंकार विकसित करते हैं जिसके द्वारा आप एक ऐसे व्यक्ति हो सकते हैं जो बहुत भयभीत है, जो दूसरों से आक्रामकता झेलता है, जो बहुत ही वश में है, अति-वशीभूत है। आप अपने कर्तव्यों से दूर भागते हैं। आप चीजों से पलायन करते हैं। बहुत सी चीजें हैं यदि आप बाईं ओर अतिविकसित हों। लेकिन अगर आप अतिविकसित हों राइट साइड में तो आप उस भयानक पीली चीज को पित्त की तरह विकसित करते हैं जिसे मिस्टर ईगो कहा जाता है। और यह अहंकार आज हर जगह काफी प्रचलित है और एक बड़ी समस्या है क्योंकि आत्मसाक्षात्कार के बाद हम इसे देखना शुरू कर देते हैं और फिर हमें नहीं पता कि हंसना है या रोना है जिस तरह से चीजें काम करती हैं।

तो दूसरों के प्रति हमारे अजीब व्यवहार के लिए भी  यह अहंकार जिम्मेदार है। अब अहंकार की समस्या यह है कि लोगों को इसका पता तब तक नहीं लगता जब तक कि वे वास्तव में बुरी तरह पीड़ित न हों जाएँ। क्योंकि अहंकार एक ऐसी चीज है जो उस व्यक्ति को उतनी परेशानी नहीं देता, जितनी समाज को। समाज को देता है। उदाहरण के लिए, ऐसी जगह या ऐसा समुदाय जहां अहंकार व्याप्त है, परिवार टूटेंगे और समाज टूटेंगे, लोग बेहद अहंकारी और तकलीफ़देह होंगे और वे वही होंगे जो दूसरे देशों पर हर तरह के आक्रमण करेंगे। और वे किसी को उन पर आक्रमण करने न देंगे। वे अन्य लोगों को दबा देंगे। यह श्रीमान अहंकार काम कर रहा है। तो तुम अहंकार की गलती नहीं खोजते।

समाज द्वारा ही इतनी सारी चीजों से अहंकार को विकसित किया जा सकता है। जैसा कि आपने देखा होगा, वे हमेशा कहते हैं कि, “यदि आप इस पोशाक को पहनेंगे तो आप बहुत अच्छे लगेंगे।” अब आप सोचते हैं, “आह, यही वह है जो की मुझे अपनाना चाहिए। ओह, वह मेरे लिए है!”  अहंकार से घिरे समाज में अहंकार को हर तरह से सिर पर चढ़ाया जा सकता है।

अब यह कहना कि अहंकार बेहतर है या प्रति अहंकार बेहतर है, मैं कहती हूं कि दोनों समान हैं, क्योंकि दोनों आपको वास्तविकता से दूर ले जाते हैं।

जबकि वास्तविकता मध्य में है, सबसे खूबसूरत चीज है, और वह आप हैं। ये कृत्रिम हैं, दो गुब्बारे। उन्हें कुछ ही समय में पंचर किया जा सकता है और आप स्व हो सकते हैं। वे सिर्फ आपको नीचे गिराने की कोशिश कर रहे हैं। चाहे वह अहंकार हो या प्रति-अहंकार, वे आपकी आत्मा को छिपा रहे हैं, जो आपके हृदय में है।

अब हमारे भीतर एक व्यवस्था है, जिसे भगवान ने हमारे भीतर बनाया है, बहुत सुंदर – क्योंकि उसने हमारे भीतर सब कुछ बनाया है। हमने अपने भीतर कुछ भी नहीं बनाया है। यदि आप चाहते हैं कि एक बाल भी बढ़े, तो हम उसे उगा नहीं सकते! मेरा मतलब वह सब कुछ है जो उसने किया है। हमने अपने बारे में या प्रकृति के बारे में कुछ नहीं किया है। हम एक फूल को फल में परिवर्तित नहीं कर सकते, यह हमारी स्थिति है। लेकिन मिस्टर ईगो के वहां होने के कारण हम सोचते हैं कि, हमारा कोई पार नहीं है, आप देखिए। क्योंकि वह (अहंकार)हमें महसूस कराता है, “ओह! हम महान हैं!” कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं, “भगवान कैसे हो सकते हैं? आखिर हमने ये किया है, हमने वो किया है!” अब, मैं उनसे पूछती हूँ, “तुमने क्या किया है? कुर्सी को टेबल और टेबल को कुर्सी में बदलने के अलावा!” और फिर कुर्सी तुम्हारे सिर पर बैठ जाती है और मेज भी तुम्हारे सिर पर बैठ जाती है क्योंकि तुम उनके बिना नहीं रह सकते।

पदार्थ, जिसको कि, निर्जीव को निर्जीव में परिवर्तित किया है, वह हमें आदतें भी दे रहा है। तो हमने कुछ नहीं किया! यह सोचना कि हमने कुछ हासिल कर लिया है, वास्तव में मूर्खता है। लेकिन प्रकृति में देखें, हर जगह देखें – परमात्मा का जीवंत कार्य इतना स्पष्ट है। कितनी ज़बरदस्त शक्ति इसे कार्यान्वित कर रही है। आखिर तुम अमीबा से ही इंसान बने हो। आप कैसे बन गए हैं? कोई ज़बरदस्त शक्ति रही होगी जिसने ऐसा किया होगा। और वह शक्ति क्या है? वही हमें बनना है।

अब हमारे भीतर भी वह विशेष चीज है जिसे ‘कुंडलिनी’ कहा जाता है जो हमारे भीतर साढ़े तीन कुंडल में शक्ति है, जो हमारी अंकुरण शक्ति है। इस शक्ति को हमें जगाना है।

यदि यह शक्ति जागृत कर दी जाती है, तो वह मध्य में, वर्तमान में उत्थान कर के, इन सभी केंद्रों को एकीकृत करती है: एक, दो, तीन, चार, पांच, छह, सात केंद्र। वे सभी हमारे भीतर हमारे सात अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं; हमारे विकास का विकास की प्रक्रिया में, मील के पत्थर की तरह, उन सभी को एकीकृत करते हुए, उन्हें प्रबुद्ध करते हुए प्रतिनिधित्व भी करते हैं| और वह हमें उस मुकाम तक ले जाती है जहां हम बन जाते हैं, मैं फिर कहती हूं ‘हम बन जाते हैं’ हम मान नहीं लेते। यह एक अवधारणा नहीं है। तुम बन जाते हो। तुम वह हो जाते हो | तुम आत्मा बन जाते हो। आप आत्मसाक्षात्कारी हो जाते हैं। आपको बोध प्राप्त होता है। यह सिर्फ इसके बारे में बात करना भर नहीं है। यह हो जाना ही है।

अगर ऐसा नहीं होता है, माना कि,  यह मेरे अपने बच्चों के साथ नहीं होता है, मैं कहूंगी, “ऐसा नहीं होता है। मैं इसमें क्या कर सकती हूँ? मैं तुम्हारा बीज अंकुरित नहीं कर सकती!” बीज को अंकुरित होना है और अंकुरण घटित  होना  चाहिए। यह प्लास्टिक का बीज नहीं है। वह असली बीज है। और हर असली बीज अंकुरित होना चाहिए। और हर असली बीज को अंकुरित किया जा सकता है। लेकिन जब तक वह अंकुरित न हो जाए, हम यह नहीं कह सकते कि वह ऐसा हुआ है। अब बीज का अंकुरण कुंडलिनी के उठने, इन सभी चक्रों से गुज़रते हुए और इस क्षेत्र में भेदन करके होता है जिसे फॉन्टानेल हड्डी कहा जाता है।

अब आप जानते हैं कि आप ‘बपतिस्मा’ प्राप्त कर चुके हैं। यहाँ इस हड्डी का बपतिस्मा हुआ है। लेकिन कोई नहीं जानता कि इस बपतिस्मा का क्या अर्थ है। क्राइस्ट ने कहा है, “आपको फिर से जन्म लेना होगा।” अब कितने चर्च वह काम कर रहे हैं? यहाँ पर केवल तथाकथित वरदान देने से, क्या आपको अपनी कुण्डलिनी का जागरण प्राप्त होता है? मेरा मतलब है, चलो इसका सामना करते हैं! इन थियोलॉजिकल कॉलेजों और थियो (ईश्वर) विशेषज्ञों में से किसी एक के पास जाकर कि, क्या वे यह प्रभाव पैदा कर सकते हैं? क्योंकि यह कॉलेज अलग है। यह परमात्मा का कॉलेज है।  एक विशेष प्रकार की पोशाक और गाउन पहनने और बहुत गंभीरता से खड़े होने और कहने से आपका अधिकार नहीं आता है, “ठीक है, मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ!” आप होते कौन हैं आशीर्वाद देने वाले? ऐसा मजाक चल रहा है! मेरा मतलब है, उनके पास कोई अधिकार नहीं है, उनके पास कोई अधिकार नहीं है, उनके पास कोई तकनीक नहीं है।

ऐसा ही भारत में हिंदुओं के बारे में भी है : मेरा मतलब है, अगर आप सोचते हैं कि हिंदू संवेदनशील लोग हैं, तो कहते हुए मुझे दुःख है की आप गलत हैं| हमारे पास ब्राह्मण के रूप में ठग, पूर्ण ठग हैं। वे ब्राह्मण नहीं हैं, वे वास्तव में भारत में पैदा हुए रोमन सैनिक हैं। आप उनके चेहरे देखें। बनारस में, विशेष रूप से वे रोमन लोगों की तरह दिखते हैं! वे बेहद बेईमान और आक्रामक हैं। ईश्वर के नाम पर यह सब ठगी चल रही है।

लेकिन जब किसी ऐसे व्यक्ति के सामने, जो एक अधिकृत व्यक्ति है, कुंडलिनी वास्तव में उठती है, तो आप अपनी खुली आंखों से त्रिकोणीय हड्डी में कुंडलिनी के स्पंदन को देख सकते हैं, यहां तक ​​कि इसके ऊपर, जहां कहीं भी हो। अब यहाँ बहुत से लोग हैं जिन्होंने देखा है। लंदन में, हमारे पास बहुत से लोग हैं जिन्होंने इसे देखा है। लेकिन, अभी भी अहंकार का सवाल काफी है; यह काफी है क्योंकि लोग इस पर विश्वास नहीं कर सकते हैं। वे बस इस पर विश्वास नहीं करना चाहते हैं। वे अपनी बकवास जारी रखना चाहते हैं। वे इसे प्राप्त नहीं करना चाहते हैं। और साथ ही, वे महसूस करते हैं, “माताजी ही क्यों? उन्हें ही ऐसा क्यों करना चाहिए?” मेरा मतलब है, मैंने कहा, “अब अगर यह मेरी बारी है, तो मुझे क्या करना चाहिए? अब बेहतर हो की आप इसे करें!” यदि आप मेरी जगह ले सकते हैं, तो मुझे आराम फरमाने में बहुत खुशी होगी। अब, आप जानते हैं कि मैं महीनों से लगातार यात्रा कर रही हूं, यात्रा कर रही हूं। अब पुर्तगाल, मैं पुर्तगाल से आयी, फिर यह कार्यक्रम, वह कार्यक्रम और यह बहुत अधिक है! लेकिन मुझे क्या लगता है कि अगर यह मेरा काम है, तो मुझे यह करना चाहिए, है ना? और आपका जो भी काम है वो आपको करना चाहिए! मेरा मतलब है, मुझे ऐसा नहीं लगता। आप और भी बहुत सी बातें जानते हैं जोकि,  मैं नहीं जानती। मैं गाड़ी चलाना भी नहीं जानती! मैं बहुत सी चीजों में बहुत अनाड़ी हूँ! तो मुझे बुरा नहीं लगता। अगर मैं कुंडलिनी का काम जानती हूं तो आपको इतना बुरा क्यों लगे? इसके अलावा, मैं इसे प्यार से करती हूं; सिर्फ प्यार, प्यार के सिवा कुछ नहीं। उस प्यार में मुझे भी ढेर सारी खुशियां मिलती हैं और वही जरूरी है।

मैं तो इसी मकसद से आयी हूं। इसे करना जरुरी है। अगर ऐसा नहीं किया गया तो इस मानव जाति का क्या होने वाला है? विनाश के अलावा और कुछ नहीं, आप इसे स्पष्ट रूप से देख सकते हैं, स्पष्ट लिखा दिख रहा है। यह कोई तुच्छ बात नहीं है कि हमें परवाह छोड़ देना चाहिए। हमें यह समझना होगा कि हमें रूपांतरित होना है। पूरी मानव जाति को परिवर्तित होना होगा। और यह आज का अंतिम निर्णय है। यह शुरू किया जा चुका है। आप अपनी कुंडलिनी से आंके जाने वाले हैं। कैसे? भगवान आपका वजन नहीं करने जा रहे हैं कि, आप कितने सेर (1.25 किग्रा के बराबर भारतीय माप) का वजन रखते हैं। जैसे आपके यहां सौंदर्य प्रतियोगिताएं होती हैं।

यह कुंडलिनी है, जो यह बताएगी कि आप कहाँ तक हैं। मैंने आने से पहले बर्मिंघम में लोगों को देखा है। मैंने पाया, मुझे खेद है, लेकिन बर्मिंघम में मैंने देखा है कि लोग बहुत तुच्छ हैं। वे मेरे कार्यक्रम में आते हैं, उनको बोध प्राप्ति होती है – समाप्त! उन्हें इसकी परवाह नहीं है, यह देखने के लिए कि यह क्या है, उन्हें क्या करना है, उन्हें यह क्यों मिला है। यह क्राइस्ट के दृष्टांत की तरह है कि: आप कुछ बीज यहां फेंकते हैं और कुछ बीज वहां और इतने सारे बर्बाद हो जाते हैं।

यह मानवीय उदासीनता और आत्म-सम्मान की कमी की एक ऐसी दुखद कहानी है। बिल्कुल, बहुत ही दुखद कहानी है। आप नहीं जानते कि हम किसका सामना कर रहे हैं। और इसलिए लोग इतने सस्ते तरीके से अपनी जान से खेलते हैं। यह सबसे आश्चर्यजनक है। कल उनके बच्चे उन्हें सबक सिखाने जा रहे हैं! और मुझे नहीं पता कि आपके बच्चों के साथ क्या होने वाला है।

तो अब, मुझे आपसे अनुरोध करना है कि आप इसके बारे में चौकस रहें, इसे प्राप्त करें, इसे अपनाये,  अपने भीतर इसे रखें और अपने बारे में और आत्मा के बारे में सभी ज्ञान को जानें।

आत्मसाक्षात्कार देना बहुत सरल बात है लेकिन इसे बनाए रखना विशेष कर इस देश में बहुत कठिन है। तो, आपके लिए, बोध के बाद प्रयास करना आवश्यक है, पहले नहीं। इसके पहले आप नहीं कर सकते। इससे पहले कोई अन्य इसे कार्यान्वित करेगा। लेकिन बोध के बाद, आपको अपनी देखभाल करनी होगी, अपने अस्तित्व की देखभाल करनी होगी। यही तुम्हें सुनिश्चित करना है, यही तुम्हें पाना है।

अब कुछ लोग कुछ अन्य चीजों में जा चुके हैं जैसे मैं अब ‘टीएम’ (ट्रान्सेंडैंटल ‘मेडिटेशन’) कहूंगी। मैं पुर्तगाल गयी थी। मुझे आश्चर्य हुआ कि लड़कों के पास कुछ नहीं था। वे नहीं जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं। वे नहीं जानते थे कि उनके पास कोई अनुभूति नहीं है, कुछ भी नहीं है। वे नहीं जानते थे कि उन्हें बोध प्राप्त हुआ है अथवा नहीं, मुझे आत्मसाक्षात्कार दिया गया था या नहीं। उनमें कोई संवेदनशीलता नहीं थी, उनमें कोई जागरूकता विकसित नहीं हुई थी, कुछ भी नहीं! वे जो कुछ कर रहे थे वह कोई ‘मंत्र’ कह रहा था, और उस मंत्र को कहकर वे वास्तव में अपने भीतर की सभी संवेदनाओं को काट रहे थे क्योंकि ये कृत्रिम चीजें थीं। मेरा मतलब है, आप कर सकते हैं। मंत्र क्यों लें? यहां तक ​​कि अगर आप कहते हैं, “पत्थर, पत्थर, पत्थर, पत्थर, पत्थर, पत्थर,” और तीन महीने तक कहते रहें, तो आप पागलखाने में होंगे। और इस टीएम से लोग अब मिर्गी के रोगी के रूप में आ रहे हैं। हमारे यहां दो लोग हैं जो मिर्गी के साथ आए हैं।

लेकिन मैंने उनसे कहा, “तुम अपना मंत्र क्यों नहीं बताते?” उन्होंने कहा, “आप क्यों जानना चाहती हैं?” मैंने कहा, “क्योंकि तुम उस कंडीशनिंग के अधीन हो जिसे मुझे हटाना है। मैं पहले से ही जानती हूं, लेकिन आपको मुझे साहस दिखाने के लिए कहना होगा कि आप इससे छुटकारा पाना चाहते हैं। ” उन्होंने कहा, “यह एक रहस्य है।” मैंने कहा, “यह राज कैसे हो सकता है?” प्रकृति में रहस्य क्या है? क्या आपने कुछ देखा? सागर देखें। फूल देखें। जो सबसे अच्छा वह खुला है। बिल्कुल पूरा ब्रह्म, पूरा सत्य खुला है। यदि यह खुला नहीं है, तो यह सत्य नहीं है। यदि छिपा है तो सत्य कैसे हो सकता है? सत्य प्रकाश है। यह पारदर्शी होना चाहिए, बिल्कुल स्पष्ट होना चाहिए।

लेकिन यह गोपनीयता का धंधा केवल ठगों और माफियाओं और इस तरह की चीजों के साथ ही हो सकता है, क्योंकि वे डरते हैं। वे परमेश्वर की मूर्तियों से, उसके नियमों से डरते हैं। इसलिए यह एक रहस्य है।

प्रकृति में या किसी ईश्वर के कार्य में, किसी भी महापुरुष के जीवन में, क्या रहस्य था? वे पहाड़ियों और पहाड़ों की चोटी पर खड़े थे और चिल्ला रहे थे, “जागृत हो जाओ, हे अंधों!” मसीह के जीवन में गुप्त रूप से क्या किया गया था, मैं जानना चाहती हूँ। क्या उसके जीवनकाल में कुछ गुप्त था? इस तरह की गोपनीयता क्यों काम कर रही है? लोग क्यों नहीं समझते?

यह महत्वपूर्ण है कि मनुष्य को पता होना चाहिए कि उनके परिवर्तन का समय आ गया है; परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने के लिए; ईश्वर के राज्य के नागरिक होने के लिए; देवदूतों और उनके सर्वव्यापी दिव्य प्रेम द्वारा देखभाल पाने के लिए।

वह एक पिता है जो करुणा और प्रेम है। वह हमारे सभी पापों और सब कुछ को क्षमा कर देता है क्योंकि वह चाहता है कि हम उसकी सारी शक्तियाँ और उसकी सारी सुंदरता प्राप्त करें। आप उस तरह के पिता को नहीं समझ सकते जो बिल्कुल, बेसब्री से आपकी प्रतीक्षा कर रहा है, जो इतना चिंतित है। और हर चीज में से उसकी यही एकमात्र चिंता है कि, “मेरे बच्चे मुझे कब जानेंगे?”

इस स्तर पर, जब हम उन चीजों से चिपके रहते हैं, जो बेकार और बकवास हैं। आपको पता होना चाहिए कि, “हम अपनी जागरूकता में क्या जानते थे?” यह एकमात्र सवाल है जो आपको खुद से पूछना चाहिए। क्या मुझे पता है कि इस व्यक्ति के साथ क्या मामला है? क्या मुझे पता है कि मेरे साथ क्या मामला है? रोशनी होगी तो पता चलेगा। मैं खुद के साथ-साथ दूसरे व्यक्ति को भी जानूंगा। मान लीजिए कि आपके हाथ में प्रकाश है, आप स्वयं को देखते हैं और आप दूसरे व्यक्ति को देखते हैं। लेकिन अगर आपके भीतर प्रकाश है, तो आप अपना प्रकाश देखते हैं और अपने प्रकाश में आप दूसरे व्यक्ति को देखते हैं। आत्मसाक्षात्कार में ऐसा ही होता है कि आप सामूहिक रूप से जागरूक हो जाते हैं, आप सामूहिक रूप से जागरूक हो जाते हैं। मैं फिर कहती हूं, आप वास्तविकता में उस जागरूकता में उतर जाते हैं। ऐसा नहीं है कि मैं आपको बताती हूं कि, आप सभी भाई-बहन हैं, लेकिन आपके साथ ऐसा होता है कि आप दूसरों को अपनी उंगलियों पर महसूस करने लगते हैं। यह एक बहुत ही गतिशील बात है जो आप सभी के साथ होनी चाहिए।

यह कोई संयोग नहीं है कि मैं यहाँ हूँ। ऐसा लगता है क्योंकि मेरे पति इस पद के लिए चुने गए और मुझे भारत से आना पड़ा। लेकिन यह संयोग नहीं है। यह इस महान देश के लिए सम्मान है कि मुझे यहां रहना पड़ा और अपने अंग्रेज बच्चों को पुरस्कार कि मुझे आपकी देखभाल के लिए यहां होना पड़ा। क्योंकि मुझे आपको बताना होगा, मैंने बहुत से लोगों को बताया है, और मुझे आपको बताना चाहिए – बेशक इससे आपको अहंकार नहीं होना चाहिए, लेकिन एक साधारण बात है – कि अंग्रेजी युवा पूरी दुनिया में सबसे अच्छे हैं। सभी युवाओं में वे समझदार, विद्वान, बुद्धिमान, तार्किक हैं। यदि आप उन्हें तर्क देते हैं, तो वे समझदार हैं। लेकिन बर्मिंघम के लिए मैं अभी कुछ नहीं कह सकती। आइए देखें कि यह कैसे काम करता है। हमारे पास कुछ बहुत अच्छे ऊँचे लोग हैं, बहुत महान लोग हैं लेकिन कुछ। कुल मिलाकर इंग्लैंड पूरे ब्रह्मांड का हृदय है। यहीं से सब कुछ घूमता है।

आपको इस देश की कोई जानकारी नहीं है। आपको इस देश की कोई इज्जत नहीं है। जिस तरह से हमने यहां अपनी मातृभूमि पर अत्याचार किया है। काश लोग जान पाते। वह अपने भीतर पीड़ा भोग रही है। विलियम ब्लेक रोया है, वह यरुशलम के लिए रोया है और यही बात मैं कर रही हूं। वह उस दृष्टिकोण से देख सकता था क्योंकि वह वह संवेदनशील था।

वह एक आत्मसाक्षात्कारी व्यक्ति था, और वह इतना संवेदनशील था कि, वह इसे महसूस कर सका था। और उसी तरह से इस देश की महिमा के बारे में उन्होंने वर्णन किया है, उसी तरह से उन्होंने बात की है।

यह सारी जड़ता, यह सारी आलस्य, ये सब शाप जो इस देश में बस रहे हैं, हमारी मूर्खता और बेवकूफी के कारण हैं। आप सबसे गतिशील लोग हैं। और इतना ही नहीं, अध्यात्म में आप बहुत गतिशील हैं। अपने आध्यात्मिक कार्य के लिए, आप बहुत, बहुत गतिशील हो सकते हैं। आप ही हैं जो बकवास की सारी बेड़ियों को फेंकने वाले हैं और आप ही हैं जो पूरी दुनिया के लिए एक खूबसूरत रंगभूमि बनाने जा रहे हैं।

इसलिए मैं यहां हूं। मैं यहां छह साल से हूं, आपको विश्वास नहीं होगा। और फिर से मैं यहां छह साल के लिए हूं, शायद, मुझे उम्मीद है। मुझे उम्मीद है कि इस देश में जहां अंग्रेज, जो मेरे बच्चे हैं, जो अतीत के संत हैं, पैदा हुए हैं, उन सभी हिस्सों में कुछ ठोस किया जाएगा। इसे प्राप्त करें और इसमें स्थापित हो जाएं और अहंकार में ऊर्जा बर्बाद न करें जो आपके पूर्वजों ने की थी: जो बेतुके थे, उन्होंने बस अपना जीवन बर्बाद कर दिया! क्योंकि तुम वही नहीं हो। आप अलग लोग हैं। आप लोग हैं, बहुत अलग। आपकी आकांक्षाएं अलग हैं। बेशक अतीत में भी कुछ महान लोग हुए थे, मैं ऐसा नहीं कह रही हूं, लेकिन उतने नहीं जितने आज हैं। लेकिन अगर वे जीवन की सांसारिक समझ का पालन करने की कोशिश करेंगे तो वे खो जाएंगे। यह बहुत सूक्ष्म है, बहुत ऊँचा है।

जब तक आपको बोध नहीं हो जाता, आप समझ नहीं सकते कि मैं क्या कह रही हूं। कृष्ण ने कहा है, “यः पश्यति स पश्यति (भगवद गीता ५.५) (अर्थ) “जो देख सकता है, वही देख सकता है,” तो अंधे से बात करने का क्या फायदा?

और मैं मिस्टर मस्कारो (जिन्होंने भगवद गीता का अंग्रेजी में अनुवाद किया) को मिलने गयी, आपने उनका नाम कैम्ब्रिज से सुना होगा और, आआह, प्यार और सब कुछ! जिस तरह से उन्होंने खुद को और बिल्कुल सरेंडर कर दिया। और उन्होंने कहा, “माँ, या सह पश्यति सा पश्यति!” जो देख सकता है वही देख सकता है। आपको कितने देख सकते हैं? क्या वे आपको देख सकते हैं?” मैंने कहा, “मुझे खेद है, इतने नहीं। मुझे उनके लिए खेद है।” उन्होंने कहा, “मेरा एक दोस्त है जिसके पास नोबेल पुरस्कार है और उसने इस चीज को विकसित किया है, और उसे नोबेल पुरस्कार मिला है। ओह, वह कितना अंधा है, वह कितना अंधा है! वह नहीं जानता कि उसे यह शक्ति किसने दी है, उसे यह कैसे मिली है। यह ब्रह्मांड किसने बनाया है, वह नहीं जानता। लेकिन तुम उससे कैसे बात कर सकते हो?” मैंने कहा, “वह आएगा। वह तब आएगा जब बहुत सारे होंगे। तब वे सोचने लगते हैं, “ओह, कितने चले गए? चलो हम भी अनुसरण करें!’”

लेकिन परिवर्तन ही एकमात्र तरीका है जो सबसे अधिक आश्वस्त करने वाला है।

यदि आप में कोई परिवर्तन नहीं है, तो कौन सहज योग में या मुझ पर विश्वास करने वाला है? मुझे व्यक्तिगत रूप से जानने वाले कई लोगों की तरह  जो कहते हैं कि “आप अद्वितीय हैं। आप दूसरे लोगों से अलग हैं। लेकिन हम विश्वास नहीं कर सकते कि आप लोगों को रूपांतरित कर सकती हैं।” मैं रूपांतरित नहीं हो रहा हूं। वहाँ पहले से ही सभी व्यवस्थाएँ हैं! सारे तार वहाँ है, बस प्लग को मेन से जोड़ने के लिए! मैं बस इतना ही कर रही हूं। मैं उन्हें रूपांतरित नहीं कर रही हूँ! आप बस इसके लिए तैयार हों और यह काम करता है।

तो कृपया अपना आत्मसाक्षात्कार पायें | बनाए रखें। और उस महिमा को प्राप्त करो जो तुम्हारे लिए है।

परम,आत्मा आपको आशिर्वादित करें।

कृपया प्रश्न करें। बेतुका नहीं, “मैं एक तांत्रिक की किताब में पढ़ता हूं…” वगैरह ।  मैं किसी पुस्तकालय और किसी भी विवादास्पद बिंदु उस सब पर पर चर्चा नहीं करना चाहती। कृपया कुछ समझदार पूछें। और मुझे लगता है कि आपको पता चल जाएगा कि क्या पूछना है।

धन्यवाद। आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

बिना किसी डर के, मैं तुम्हारी माँ हूँ। मैं कोई गुरु नहीं हूं। बिल्कुल, मैं तुम्हारी माँ हूँ। आप ही अपने गुरु हैं। केवल एक चीज है मुझे आपको आपके गुरु पद की चाबियां देनी हैं, बस।

बस मुझसे एक बहुत ही सरल प्रश्न पूछें, जो सरलता से आता है, जटिल नहीं।

कितने! मुझे कहना होगा कि हमारे पास पचास लोग हैं। अभी मैं एक शादी में गयी थी| कल्पना कीजिए, पचास लोगों को बोध देने के लिए। और इतना अधिक प्यार। आप नहीं जानते कि कितना। और इतनी महान मान्यता है। मेरा मतलब है, मैं उन लोगों पर चकित थी| मुझे लगता है कि गरीबी एक तरह से वरदान है।

अद्भुत लोग, बहुत सुंदर।

प्रश्न कृपया।

मेरा मतलब है, आप में से बहुत से लोग सोच नहीं सकते क्योंकि आपकी कुंडलिनी ने इसे (आज्ञा चक्र) पार कर लिया है। जब यह आज्ञा को पार कर जाती है, तो आप सोच नहीं सकते। तुम निर्विचार जागरूकता में चले जाते हो, इसलिए तुम सोच ही नहीं सकते। आप चाहें तो सोच भी नहीं सकते, यही समस्या है। तो जरा सोचने की कोशिश करो!

यह तुम्हारी अपनी कुंडलिनी है जो रूपांतरित कर रही है।

ऑस्ट्रेलिया में आज, मुझे ऑस्ट्रेलिया से एक ट्रंक कॉल आया और उन्होंने कहा, “माँ, हमें किसी भी बारे में कुछ भी कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती है। बस कुंडलिनी ही काम करती है!” अब इन आस्ट्रेलियाई लोगों को अपराधी वगैरह  माना जाना था! कल्पना कीजिए कि उनके बच्चे ऐसे चमत्कार कर रहे हैं! आपकी जानकारी के लिए बता दे कि इंग्लैंड की तुलना में बहुत अधिक।

दो लड़के भारत आए, उनमें से दो, और उन्हें अब दो सौ लोग मिल गए हैं।

हम्म, यह क्या है, यह क्या है?(कोई सवाल पूछता है।) वह क्या कह रहा है? “मैं, मैं, मैं” मैं केवल “मैं, मैं, मैं” सुनता हूं।

योगी: वे कहते हैं कि बर्मिंघम में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें वे जानते हैं, जो ऐसा ही महसूस करते हैं, कि उन्होंने हार मान ली है। वे निराश होकर हार मान चुके हैं।

श्री माताजी : निराशा क्या है? क्या यह यहाँ कुछ बेचा जा रहा है? तुम्हारी सारी वृत्ति अहंकार की है। हमें निराशा है, खुद से या मुझ से ?

योगी: नहीं, वह कहा रहा है, दूसरे लोग , उसे नहीं। लोगों को वह जानता है।

श्री माताजी : वे क्या निराश हैं?

साधक : वे सिर्फ जीवन और विभिन्न चीजों के बारे में बात करते हैं, आप जानते हैं। चीजें कार्यान्वित नहीं होती हैं।

श्री माताजी: यह क्या है? उनसे संबंधित। नहीं, है ना?

साधक : हमारे आस-पास बहुत से लोग महसूस करते हैं कि कितना भ्रमित और भ्रष्ट और अन्य चीजें, आप जानती हैं। और हम उनका हिस्सा हैं। जैसा अभी jमैं हूं, मैं आपको सच बताता हूं, मैं गिर रहा हूं और मुझे यह पसंद नहीं है। यह यहाँ, मेरे लिए,  मेरे लिए यह एक आखिरी मौके की तरह है, आप जानती हैं, इस दुनिया को समझने की कोशिश कर रहा हूँ।

श्री माताजी: ठीक है। तुम बहुत अच्छे लड़के हो। और यह काम करना चाहिए। अब आपने जो कहा वह सही है लेकिन अगर आप किसी से प्यार करना चाहते हैं तो भी लोग इसे पसंद नहीं करते हैं। आप देखिए, वे नफरत करना चाहते हैं। यह संभव है। मैं नहीं कहती। लेकिन अब लोगों को प्यार करने वाला कैसे बनाये ? यहां तक ​​कि जब हम किसी से प्रेम करते हैं, तब भी हम उस तरह से प्रेम नहीं करते जैसा वह दिव्य होना चाहिए। ईश्वरीय प्रेम कुछ ऐसा है जैसे पेड़ में उपर चढ़ता हुआ रस। वह पेड़ के हर हिस्से में जाता है, सभी फूलों में जाता है, किसी से लिप्त नहीं होता है और वापस आ जाता है। मान लीजिए कि,  यह एक फूल से लिप्त हो जाता है, “यह मेरा फूल है, मेरा बच्चा, मेरा बेटा, मेरा समुदाय, मेरा, मेरा, मेरा।” ठीक है? यह मर जायेगा। वृक्ष मर जायेगा , फूल समाप्त हो गया । ठीक है?

तो ईश्वरीय प्रेम सर्वव्यापी है। यह हर समय मौजूद रहता है। यह हमारे भीतर व्यक्त करता है। लेकिन फिर भी हम इसे महसूस नहीं कर रहे हैं। जैसे मैं कहूंगी कि यहां ईथर है। यहां बहुत सारे दृश्य और दृश्यावली हैं, लेकिन हम देख नहीं पाते। जब आप बस एक टेलीविजन ‘प्लग इन’ करते हैं, तो आप उन्हें देखना, पकड़ना शुरू करते हैं। उसी तरह आपका टेलीविजन अभी तक प्लग नहीं किया गया है, इसलिए लोग निराश हैं। आप वास्तव में अपने आप में निराश हैं क्योंकि आप पाते हैं कि, “यह उपकरण किस लिए है?” कभी-कभी यह किसी से प्यार पाता है। कभी-कभी कोई इसे दुतकारता है। कोई कभी-कभी गुमराह करने की कोशिश करता है। कोई इसे पुचकारना चाहता है। यह किस प्रकार का यंत्र है?

लेकिन तब आप एक ऐसे बिंदु पर पहुंच जाते हैं जहां आप आत्मा बन जाते हैं, और आत्मा स्वयं का आनंद लेती है। आत्मा के पास जो आनंद है वह हर समय स्वयं का आनंद ले रहा है। हमारी आत्मा स्वयं का आनंद ले रही है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरा आपसे प्यार करता है या नहीं। यह परवाह नहीं करता है। आपके हृदय स्थित आत्मा खुद का आनंद लेती है। ठीक है? लेकिन क्या होता है कि,  हमें इसकी जानकारी नहीं है। तो जब यह बात (आत्मसाक्षात्कार)आपके साथ होती है, तो आपका चित्त आत्मा के उस आनंद से प्रबुद्ध हो जाता है और आप आनंद लेते हैं। आप बिलकुल एक अलग व्यक्ति बन जाते हैं। आप यह सब भूल जाते हैं। ये सभी भेदभाव, बकवास, सब कुछ ऐसे ही छूट जाता है क्योंकि आप वह विश्वव्यापी प्राणी बन जाते हैं।

यह केवल बातचीत नहीं है, मेरे बच्चे, ऐसा हो रहा है। यह होना ही है। जब ऐसा होगा तो आप देखेंगे कि पूरी दुनिया बदल जाएगी। इसे बदलना होगा।

आखिर परमात्मा ने कभी थडी जगह यहाँ ,थोड़ी जगह वहां इस तरह निर्माण नहीं किया है उन्होंने एक ब्रह्मांड और एक दुनिया बनाई। यह इंसान ने पागलपन से, उन्होंने इसे बदल डाला है| “अब यह तुम्हारा क्षेत्र है, यह मेरा है!” यह सब झूठ है! मेरे लिए यह एक मिथक है।

तुम्हें पता है, आखिर तक मुझे पुर्तगाल जाना था। मैंने अपना वीज़ा नहीं लिया था – क्या आप कल्पना कर सकते हैं? – सुबह में। फिर उन्होंने मुझसे पूछा, “आपके वीजा के बारे में क्या?” मैंने कहा, “क्या वीजा?” “पुर्तगाल के लिए।” मैंने कहा, “मैं कभी नहीं किया। क्या मुझे वीजा लेना होगा?” उन्होंने कहा, “बेशक आपको वीजा लेना होगा!” तो सुबह में, आप देखिए, हर किसी को वीजा लेने के लिए मेरे पति के कार्यालय से भागना पड़ता है। मैं बस ऐसे ही यात्रा करती हूं। मैंने सोचा, ” ज़रूरत क्या है?” एक अपराधी की तरह अपने  पासपोर्ट का नंबर और सब कुछ ले जाते रहो। क्या यह अजीब नहीं है? मेरे जैसे व्यक्ति के बारे में कल्पना कीजिए जो मानवीय मामलों में बिल्कुल अनाड़ी है। यह बेतुका है। इसे क्यों जारी रखा जाए? आखिरकार, हम सभी एक ईश्वर द्वारा, एक पृथ्वी पर, पूर्ण एक समान में बनाए गए मनुष्य हैं।

हम उस एक आदिम सत्ता के अभिन्न अंग हैं। हम उस महान अस्तित्व के उस शरीर की कोशिकाएँ हैं। और हम खंडित हैं। इसलिए, एक बार जब आप को ज्ञान हो जाता है कि आप उसी के अंग-प्रत्यंग हैं, तो आपका विखंडन दूर हो जाता है और आप वह बन जाते हैं। तुम वह हो जाओ। तब आपकी सुरक्षा की सारी भावना स्थापित हो जाती है, आपका सारा स्वाभिमान स्थापित हो जाता है, आपकी सारी महिमा आपके पास आ जाती है और आप इसे बांटना शुरू कर देते हैं।

मैं कहती हूं कि, यह पूंजीवाद का साम्यवाद में मिलन बिंदु है। जब आपके पास कोई पूंजीवाद नहीं है तो इसका मतलब है कि आपके पास अपनी कोई पूंजी नहीं है।

आखिर ये सभी पूंजी, सब गायब हो जाएगा। यह बेकार है। लेकिन आपकी आत्मा की पूंजी, जब आपके पास होती है, तो आप वितरित करते हैं। आप देते हैं। यही सबसे बड़ा साम्यवाद है। आप इसके बिना नहीं रह सकते। आपको अपना प्यार बांटना होगा। देखो अगर मुझे कोई इंसान नहीं मिला तो मुझे कुछ पौधे या कुछ या कुछ फूल मिलेंगे, मैं उनसे प्यार करने की कोशिश करूंगी। यह इस प्रकार है। ठीक है? आप बस इंतजार कीजिए और देखिए।

और आप उन सभी को प्राप्त करते हैं जो बिना किसी कारण के निराश हैं। उनके कनेक्शन अभी भी ढीले हैं। मुझे बस उन्हें थोड़ा कसना होगा। ठीक है? ( हस रहा)

निराश न हों मेरे बच्चे,  वास्तविकता बहुत सुंदर है। यह अभी हमारे सामने पड़ा है। चिंता मत करो। सब कुछ ठीक होने जा रहा है। ठीक है?

परमात्मा आपका भला करे।

अब कोई और सवाल? कहने के लिए कितनी मीठी है, है न?

आप कुछ सवाल पूछना चाहते हैं?

महिला साधक : क्या आप हमें मृत्यु के बारे में बता सकते हैं?

श्री माताजी: मृत्यु?

महिला साधक: हाँ

श्री माताजी : अब, सब चीज़ों में से यही क्यों?  ठीक है, मैं आपको बताती हूँ।

मृत्यु का कोई अस्तित्व मौजूद नहीं है। मौत जैसा कुछ नहीं है। हम पांच कोकूनों से बने हैं, आप देखिए। उनमें से एक भोजन का कोकून है जिसे अन्नमय कोष ( भोजन से बना) कहा जाता है। मृत्यु में केवल वही छूटता है। और हमारे भीतर स्थित थोड़ा सा पानी भी गिर जाता है। शेष बाकी रह जाता है। मरने के लिए कुछ नहीं! काश हम मर जाते लेकिन हम नहीं कर पाते! (हँसते हुए) यह सिर्फ कपड़े का बदलाव है! जैसे जब मैं बर्मिंघम आयी, तो मैंने होटल में अपने कपड़े बदले और यहां आयी: तरोताजा होने के लिए, नया होने के लिए। यह ऐसा ही है। जैसे-जैसे हमारे कपड़े गंदे हो जाते हैं, हम उन्हें बदलते हैं, या पुराने हो जाते हैं, हम इसे बदल देते हैं। बस इतना ही।

मृत्यु मौजूद नहीं है, यह एक मिथक है। लेकिन हम मानते हैं – आप देखिए, यह एक और धारणा है – कि मरने से हम समस्या का समाधान करते हैं। जैसे हमारे पास कुछ स्वीडिश लड़कियां थीं, बहुत छोटी, सत्रह साल की लड़कियां और उनमें एक मृत शरीर की तरह के वायब्रेशन थे ! मैं हैरान थी। मैंने उन्हें अपने घर में बुलाया और कहा, “तुम्हारे साथ क्या मामला है? तुम्हारे वायब्रेशन ऐसे क्यों हैं? तुम क्या कर रही हो ? तुम समय कैसे गुजारती हो ?” उन्होंने कहा, “माँ, हमारी मुख्य बात यह है कि हम आत्महत्या करने की योजना बना रहे हैं!” क्या तुम कल्पना कर सकती हो? स्वीडन, सबसे समृद्ध देश। फूलों की तरह खिल रही सत्रह वर्ष की कन्याओं को अपनी मृत्यु के बारे में सोचना चाहिए। क्यों? क्योंकि जो नहीं मरता, वह तुम्हारी आत्मा है। आप अपनी आत्मा की तलाश करते हैं। लोग इस लिए  मृत्यु चाहते हैं क्योंकि उन्हें वह शाश्वत वस्तु नहीं मिली है। कुछ भी नहीं मरता। यह एक मिथक है। आपको जीवन और शाश्वत जीवन के बारे में सोचना चाहिए।

यदि हम वास्तव में संवेदनशील होना चाहते हैं, तो हमें वास्तव में मृत्यु के बारे में नहीं सोचना चाहिए क्योंकि तब हम बाईं तरफ , अवचेतन पर, फिर सामूहिक अवचेतन में जाते हैं। इन की तरह, आपने देखा होगा कि ये अलौकिकता के व्यवसाय चल रहे हैं, और फिर आप उनके द्वारा ग्रसित हो सकते हैं और आप बहुत परेशानी में पड़ सकते हैं। अब व्यावहारिक रूप से हर दिन मैं उन्हें हजारों की संख्या में निकाल रही हूँ , क्या आप कल्पना कर सकते हैं? कल मैं एक ऐसे स्थान पर गयी थी जहाँ वे सब बहुत अच्छी तरह से स्थापित थे, वहाँ कुछ पुराने जॉनी अभी भी बैठे थे। मैंने कहा, “अब, तुम क्यों नहीं यहाँ से जाते और जन्म लेते हो? या अपने-अपने स्थानों पर चले जाओ?” वे बस जाना ही नहीं चाहते।  जिसे आप कहते हैं, ये आत्माएं और ऐसी चीजें के रूप में वे कार्य करते हैं। तो ये सब बातें भूल जाओ। हमें वर्तमान में जीना है क्योंकि यह सबसे खूबसूरत चीज है, बिल्कुल सुंदरता। मृत्यु में क्या है? इतना गंभीर होने की कोई बात नहीं है। प्रसन्नता जीवन की निशानी है।

आप सब किस बात से इतना परेशान हैं? आपकी समस्या क्या है? अब मुझे बताओ। सभी समस्याओं को हल किया जा सकता है यदि आप अपनी बोध की प्राप्ति करते हैं, मेरा विश्वास करो, यहां तक ​​​​कि तथाकथित भौतिक समस्याएं भी। उस हद तक नहीं। आप श्रीमान फोर्ड नहीं बनेंगे लेकिन आप संतुष्ट आत्माएं होंगे और आपके पास पर्याप्त होगा। “योग क्षेम वहाम्यहं”, कृष्ण ने कहा है। (अर्थ) “जब आप अपना योग प्राप्त करते हैं, तो मैं आपके  कल्याण की देखभाल करता हूं।” आपका शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आपकी भौतिक पक्ष, वह सब कुछ की वे देखभाल करते है। ठीक है? यह सुनिश्चित है!

साधक : अब कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह आपके पास किस तरह से आता है और यह सच है, आप उस व्यक्ति को पहचानते हैं।

श्री माताजी: आप पहचानते हैं? इसके लिए परमात्मा आपको आशीर्वाद दें। आप बहुत संवेदनशील हैं क्योंकि लोग नहीं पहचान पाते हैं। यदि उन्होंने पहचान लिया होता, तो उन्होंने ईसा-मसीह को क्रूस पर क्यों चढ़ाया? जरा कल्पना कीजिए कि ये ठग जिन्हें हम इतना पैसा दे रहे हैं और लोग उनके पास जा रहे हैं, और बेहूदा लोग, कैसे वे आपकी महिलाओं का उपयोग कर रहे हैं और हर तरह का जीवन जी रहे हैं, और कैसे हमने अपनी पूरी ताकत के साथ उनके सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। बुद्धि और तर्कसंगतता | और ईसा-मसीह के लिए? हमने उसे जो दिया वह एक क्रॉस है?

वास्तव में सत्य को समझने के लिए आपके पास एक उचित संवेदनशीलता होनी चाहिए। वरना आम तौर पर लोग अनाड़ी होते हैं। यदि कोई व्यक्ति दो सींगों के साथ आता है, तो वह उस व्यक्ति को सामान्य व्यक्ति से अधिक पसंद करता है। बस किसी व्यक्ति के पास एक सर्कस हो, तुम्हें पता है! सर्कस चालू है।

सत्य एक ऐसी चीज है जिसके लिए किसी श्रंगार की आवश्यकता नहीं है – कुछ भी नहीं। यह अपने आप चमकता है। और आपके इंग्लैंड की इस भूमि पर इन बच्चों की तरह कई आत्मसाक्षात्कारी -आत्माओं का जन्म हुआ है। वे सभी जन्मजात आत्मसाक्षात्कारी हैं और उनमें संवेदनशीलता हैं और उनमें से कुछ कुंडलिनी के ज्ञान के साथ पैदा होते हैं – कई, कई। आप नहीं जानते कि इस देश में कितने गतिशील लोग जन्म लेने जा रहे हैं|

बहुत गतिशील। हम पहले ही लंदन में एक बहुत ही गतिशील व्यक्ति का जन्म पा चुके हैं। इन बच्चों से पूछो। उन्हें ठंडी हवा मिल रही होगी। मेरे बच्चों क्या तुन्हें ठंडी हवा मिल रही है? हाथ में? क्या वह है? वह क्या कह रहा है?

योगिनी: ज्यादा ठंडी नहीं

श्री माताजी: बहुत अच्छा नहीं है? लेकिन फिर भी आ रहा है, है ना? देखिए वे कभी संतुष्ट नहीं होंगे क्योंकि अन्य स्पंदन भी यहां हैं।

अब, तुम्हारा क्या? चलो देखते हैं। अभी देखें, अभी नहीं? ऐसे ही हाथ रखें। चलो देखते हैं?

कृपया इस तरह हाथ रखें। बस ऐसे ही। दोनों पैरों को सीधा रखें और आराम से बैठ जाएं लेकिन थोड़ी सी सजगता के साथ। सीधे, इस तरह। सिर्फ इस तरह। आप इसे अपनी उंगलियों से प्राप्त करना शुरू करते हैं। और जब कुंडलिनी उठती है तो उसे निमंत्रण भेजा जाता है।

और अब अपनी आँखें बंद करो। कृपया अपनी आंखें बंद करें।

अब क्या होता है कि आप अपनी उंगलियों के माध्यम से अपने हाथ पर ठंडी हवा महसूस करने लगते हैं। एक प्रकार की ठंडी हवा जिसे “होली घोस्ट की ठंडी हवा” के रूप में जाना जाता है। वह पहली बात है, वह पहला लक्षण है।

अपने दोनों पैरों को जमीन पर टिका लें। यदि संभव हो तो जमीन को छूना चाहिए। अगर वे छू नहीं पाते हैं, तो यह ठीक है, लेकिन आम तौर पर उन्हें छुना चाहिए। और पैर थोड़ा अलग-अलग।

अपनी आँखें मत खोलो। बस उन्हें बंद रखें। यह ठीक रहेगा।

मत सोचो।  सोचो मत ।

विचार समाप्त होना चाहिए। यदि यह नहीं रुकें है तो अपनी आँखें खोलो और मुझे देखो। अगर कोई विचार नहीं आ रहा है तो ठीक है। बस अपनी आँखें खोलो और बिना सोचे मुझे देखो। तुम कर सकते हो।

बेहतर?

बिना विचारे मुझे देख लो।

एक हम्सा चक्र की पकड़ है।

अब गिरावट और उस सब के बारे में चिंता मत करो। ठीक है?

किसी भी चीज के लिए दोषी महसूस न करें। क्योंकि मैं प्रेम के सागर की बात कर रही हूं। तुम देखो, तुम सागर के सामने खड़े हो। अब तेरा कसूर क्या है? यह सिर्फ एक कल्पना है। ठीक है? अब भूल जाओ।

अपनी आँखें बंद करें।

अब किसी दोष या ऐसी किसी बात के बारे में मत सोचो। यह एक बेतुकी बात है, बिल्कुल बेमानी है क्योंकि क्षमा के सागर की तुलना में अपराध बोध क्या है? बस इसे भूल जाओ। आप इसे अभी प्राप्त करने जा रहे हैं। इसे स्वतंत्र रूप से वितरित किया जा रहा है। यह आपका अपना है।

अपनी निंदा मत करो।

यह भगवान का मंदिर है। अपने आप से प्यार करो, सबसे पहले, सम्मान करो।

अब बेहतर।

अपनी आँखें बंद करो मेरे बच्चे। अपनी आँखें बंद करें।

सब कुछ समझने के लिए आपको इसे प्राप्त करना होगा।

हमें दूसरों को माफ करना होगा। बस माफ कर दो। हमें पता होना चाहिए कि यह एक मिथक है। यदि हम क्षमा नहीं करते हैं, तो भी, हम केवल स्वयं को प्रताड़ित कर रहे हैं। हम किसी और को प्रताड़ित नहीं कर रहे हैं। बस सबको माफ कर दो। बस कहो, “मैं क्षमा करता हूँ।” तभी हम क्षमा मांग सकते हैं, है न?

आप बस क्षमा करें और फिर भगवान से क्षमा मांगें, कि, “गलती से अगर मैंने कोई गलती की है, किसी भी तरह की आक्रामकता या किसी यातना, या कुछ भी – कृपया मुझे क्षमा करें।” और वह क्षमा करता है। बस माफ कर दो।

उसकी क्षमा मांगो और वह क्षमा कर देगा। कुछ नहीं चाहिए। बस इसके लिए प्रार्थना करें और वह इसे करेगा। लेकिन अपनी निंदा न करें क्योंकि आपके पिता, सर्वशक्तिमान भगवान ने आपको बनाया है और वह कोई गलती नहीं कर सकते। हो सकता है कि आपने कुछ गलत किया हो लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता।

साक्षात शिव पार्वती, ॐ साक्षत शिव पार्वती, ॐ साक्षात शिव पार्वती

ॐ साक्षात आत्मां, ॐ साक्षात आत्माम।

कृपया अब अपने हृदय पर ध्यान दें। और बस इतना कहो, “मैं आत्मा हूँ।”