The manifestation of the Spirit

Aston La Scala Nice, Nice (France)

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सार्वजनिक कार्यक्रम दिवस 2, 22 फरवरी 1980, नाइस, फ्रांस

कल मैंने आपको हमारे भीतर की अवशिष्ट शक्ति के बारे में बताया जो कि “सैक्रम बोन” (त्रिकोणाकार अस्थि) में रहती है। इस शक्ति को कुंडलिनी कहा जाता है। यह वही शक्ति है जो ऊपर को चढ़ती है इन उर्जा केंद्रों में से होती हुई और हमें हमारा आत्मसाक्षात्कार दिलाती है, हमारा पुनर्जन्म। मैंने आपको यह भी बताया है कि कई लोगों में आप देख सकते हैं इस कुंडलिनी के स्पंदन को स्पष्ट रूप से अपनी खुली आँखों द्वारा। 

आप देख भी सकते हैं इसका ऊपर की ओर चढ़ना विभिन्न चक्रों में, इस चक्र तक। आप अपने सिर पर भी स्पंदन को अनुभव कर सकते हैं। और आप – बाद में भी, जब यह इस क्षेत्र का भेदन करती है – आप अनुभव कर सकते हैं ठंडी हवा का बहना अपने हाथ से । यह आपकी आत्मा की ऊर्जा है। हम कह सकते हैं कि यह अभिव्यक्ति है आत्मा की ।

इस प्रकार आप एक नए आयाम में प्रवेश करते हैं सामूहिक चेतना के । आप सामूहिक रूप से जाग्रत हो जाते हैं। आप दूसरों को अनुभव करना शुरू कर देते हैं अपनी उंगलियों पर । वास्तव में, ये सभी पाँच उंगलियाँ – साथही, छह और सात, बिंदु – हमारे भीतर के चक्र हैं। आप प्रबुद्ध हो जाते हैं – क्योंकि आप उन्हें यहाँ अनुभव कर सकते हैं और कभी-कभी भीतर भी। कुछ लोग हाथों पर इसे अनुभव नहीं कर पाते हैं, और कुछ लोगों ने कल कुछ समय तक इसे अनुभव नहीं किया था। परन्तु उन्होंने निश्चित रूप से अपने सिर पर अनुभव किया था।

अब, आप को यह जानना चाहिए कि ये वही ज्ञान है जो कई भारतीयों के माध्यम से विदित हुआ है। आदि शंकराचार्य, उन्होंने बहुत विस्तार से लिखा है कुंडलिनी जागरण के बारे में और इसकी अभिव्यक्ति के बारे में। उन्होंने इन सभी चक्रों का वर्णन किया है। ये केंद्र हमारे भीतर निर्मित होते हैं हमारे उत्थान की प्रक्रिया के दौरान, लम्बवत तरीके से । परन्तु एक क्षैतिज तरीके से, आपकी सूक्ष्मता बढ़ती है विभिन्न भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक क्षेत्रों में ।

सहज योग का अर्थ है:- “सह” का अर्थ है “साथ”, और “ज” का अर्थ है “जन्मा”।

आज मैं आपको उन गुरुओं के बारे में अधिक नहीं बताऊंगी जो पश्चिमी लोगों का शोषण करने का प्रयत्न कर रहे हैं। क्योंकि आप आध्यात्मिक रूप से बहुत भोले हैं और बहुत महान साधक हैं, आप कई जन्मों से खोज रहे हैं – और जब उन्हें आपकी तलाश के बारे में पता चला, तो उन्होंने उद्यम शुरू किए। परन्तु ईसा मसीह हैं आपके सामने समझने के लिए। उन्होंने कभी कोई उद्यम नहीं चलाया। उन्होंने कभी कोई पाठ्यक्रम नहीं चलाया। उन्होंने कभी किसी से कोई पैसा नहीं लिया। क्यों नहीं हमें उनसे सबक लेना चाहिए?  एक बढ़ई के बेटे थे, वह बढ़ई की तरह रहते थे। कृष्ण एक राजा थे, वह एक राजा की तरह रहते थे। वे आपके पैसौं पर रहने वाले परजीवी नहीं हैं। परन्तु किसी कारण से, आप बहुत भोले थे इन सूक्ष्म चीजों को समझने के लिए ।

ठीक है, जो भी हुआ सो हुआ। आपको प्राप्त करना होगा अपना आत्मसाक्षात्कार । यह आपका अधिकार है। आपकी खोज में, आपको इसे प्राप्त करना होगा। परन्तु इसे एक वास्तविकीकरण होना पड़ेगा, न कि केवल बातें। यह आपके अंदर घटित होना है, और इसमें डरने की कोई बात नहीं है।

कुछ लोगों ने इतनी बड़ी किताबें लिखी हैं कुंडलिनी के बारे में । वे एक शब्द भी नहीं जानते हैं कुंडलिनी के बारे में! एक सज्जन ने चर्चा की है सैकड़ों पृष्ठों पर कि कुंडलिनी पेट में है या मस्तिष्क में। एक अन्य व्यक्ति ने एक शोध संस्थान बनाया है। आप अपने अहंकार के साथ क्या शोध कर सकते हैं? आत्मसाक्षात्कार से पहले, आप जो भी करते हैं, आप अपने अहंकार के माध्यम से करते हैं।

ईश्वर को जानने के लिए, आपको अपनी आत्मा को जानना चाहिए। आप ईश्वर को नहीं जान सकते बिना अपनी आत्मा को जाने । उसे पहले प्राप्त करना होगा। भारत और दुनिया भर के सभी महान संतों ने ऐसा ही लिखा है। इंग्लैंड में एक महान कवि हुए थे जिनका नाम विलियम ब्लेक था; उन्होंने बहुत अच्छी बातें लिखी हैं आत्मसाक्षात्कार के बारे में । अब आपके लिए यह समझना आवश्यक है कि यह एक घटना है जो घटित होनी चाहिए। और अन्यथा इसका कोई अर्थ नहीं है। मैं आपको समझाऊंगी कि कैसे ईश्वर ने आपको इतनी सुंदरता से बनाया है और कैसे आपको अपना दूसरा जन्म मिलेगा।

पहली बात, आपको पता होनी चाहिए: जो प्रकाश प्रबुद्ध है, केवल वही अन्य किसी प्रकाश को प्रबुद्ध कर सकता है। उदाहरण के लिए, एक मोमबत्ती है जो प्रकाशित है – वह एक और मोमबत्ती को प्रकाशित कर सकती है जो प्रकाशित नहीं है । परन्तु अगर यह, प्रकाशित नहीं है, तो यह दूसरी मोमबत्ती के लिए क्या कर सकती है? अब, मोमबत्ती को इसी तरह से बनाया गया है। मोमबत्ती बस तैयार है प्रकाशित होने के लिए । केवल एक चीज़ जो करना है वह यह है कि इस मोमबत्ती को उस के साथ में रख दें और उसे प्रकाशित करें । ठीक उसी तरह, आपका यंत्र बिल्कुल तैयार है प्रबुद्ध होने के लिए ।

जैसा कि कल मैंने कहा था, कि अगर मैं आपसे कहूँ कि इस क्षेत्र में बहुत अधिक संगीत है और आप सुन नहीं सकते हैं, परन्तु यदि आप एक टेलीविजन लगाते हैं, तो आप यहाँ तक कि चित्रों को भी देख सकते हैं। कल इतने सारे लोगों को यहाँ अपना आत्मसाक्षात्कार प्राप्त हुआ। व्यावहारिक रूप से उनमें से अधिकांश को। यह एक उल्लेखनीय बात है जो हो रही है। क्योंकि यह खिलने का समय है। कई फल पकने वाले और परिपक्व होने वाले हैं क्योंकि परिवर्तन होने वाला है।

जैसा कि मैंने कल आपको बताया था, आप एक फूल को फल में नहीं बदल सकते। यह किया जाता है प्रकृति द्वारा । आप तकनीक नहीं जानते हैं। आप इसे प्राप्त भी नहीं कर सकते, यह सहज ही होता है।

…छोटे बच्चे को आगे आने दें, अगर वह चाहता है तो। वह मुझे नहीं देख पा रहा। वह मुझे नहीं देख पा रहा।

आपको बच्चों जैसा बनना है, यह एक तथ्य है। यदि आप बहुत जटिल हैं, तो यह कार्य नहीं करेगा। यदि आप बच्चों की तरह हैं, तो यह बहुत तेजी से कार्य करता है।

तो, हमारे भीतर रखा गया है उन सात चक्रों को, जो मैं आपको दिखा रही हूँ। कल मैंने आपको बताया था, पहले चक्र के बारे में, जो रखवाली कर रहा है कुंडलिनी कि मूल लिपि की । यह चक्र है अबोधिता का। और यह अबोधिता, पहला तत्व है जीवन का । परन्तु जब कुंडलिनी उठती है, तो वह उस चक्र के ऊपर से उठती है। पहले चक्र पर, आप कह सकते हैं, हम कार्बन के अणु थे, शुरुआत में। कार्बन अणु का अवलंब या धर्म, यह है कि उसकी चार संयोजन क्षमताएं हैं। उसकी चार संयोजन क्षमताओं के कारण, यह अन्य तत्वों के साथ मिलकर निर्माण करता है जीवन का ।

उसके ऊपर, चक्र है सृजनात्मकता का, यहाँ । यह अपनी शक्ति प्राप्त करता है पीली रेखा से, जो उत्तरदायी है हमारी क्रियाशक्ति के लिए । यह क्रिया शक्ति है; इसे आप प्राण शक्ति भी कह सकते हैं। यह शक्ति हमें हमारी सोचने की शक्ति देती है और हमें अपने शरीर के माध्यम से कार्य करने की शक्ति भी देती है। जिस नाड़ी के माध्यम से यह बहती है उसे संस्कृत भाषा में पिंगला नाड़ी कहते हैं। यह सूक्ष्म नाड़ी है, रीढ़ की हड्डी के भीतर और मस्तिष्क के भीतर भी। और बाह्य में, यह सूक्ष्म नाड़ी स्थूल ढंग से बांयी परा तंत्रिका तंत्र के रूप में व्यक्त होती है। नहीं, मुझे क्षमा करें, दांयी तंत्रिका के रूप में ।

बाईं ओर, आप नीले रंग की एक और नाड़ी देख सकते हैं, जिसका अर्थ है यह अंतिम चक्र। इस नाड़ी को इड़ा नाड़ी कहा जाता है। यह आपूर्ति करती है हमारी भावनात्मक ऊर्जा की । यह हमें हमारा अस्तित्व देती है। यह संबंधित है हमारे भूतकाल के साथ, हमारी झूठी मर्यादाओं के साथ । यह वही मन है जिसके बारे में मनोवैज्ञानिक प्रायः बात करते हैं। परन्तु वे अत्यन्त अपरिपक्व लोग हैं। वे बहुत कम जानते हैं; वह भी, केवल एक के बारे में … नाडिय़ों में से एक के बारे में । और उन्होंने पश्चिम के लोगों के लिए भयानक समस्याएं पैदा की हैं।

फ्रायड की तरह : वह कहता है कि आपको स्वयं को झूठी मर्यादाओं से मुक्त करने का प्रयास करना चाहिए। जब आप स्वयं को झूठी मर्यादाओं से मुक्त करने का प्रयास करते हैं, आपको अपने अहंकार का उपयोग करना पड़ता है, जिसका अर्थ है आपका दाहिना भाग। आपको जाना पड़ता है क्रिया में, या कार्य में । इसके फलस्वरूप, आप वहाँ एक अहंकार विकसित करते हैं, वह सफेद रंग का गुब्बारा। और यदि आप बहुत अधिक कार्य करते हैं बाएं पक्ष कि ओर, तो आपका प्रति अहंकार विकसित होता है। इसलिए, आप जिस प्रकार से भी प्रयास करें, आप मध्य में नहीं जा सकते।

उदाहरण के लिए, यह दूसरा चक्र उत्तरदायी है, परिवर्तित करने के लिए आपकी वसा कोशिकाओं को आपके मस्तिष्क के उपयोग हेतु । यदि आप बहुत अधिक सोचते हैं, तो यह अपने अन्य कार्यों की उपेक्षा करता है। इसे देखभाल करनी होती है यकृत (लिवर) के ऊपरी हिस्से की, अग्न्याशयकी, प्लीहाकी, गुर्दे और गर्भाशय की । बेचारे को दिन-रात काम करना पड़ता है क्योंकि आप हर समय सोचते रहते हैं। तब आप … परिणामस्वरूप, आप यकृत में ख़राबी विकसित करते हैं। ऊपर से, आप बहुत अधिक मदिरापान करते हैं। बेचारा यकृत थक जाता है। यह सब आत्मनाशी है। 

यकृत को बहुत आवश्यक काम करने होते हैं। यह दूर करता है शरीर कि सारी विषाक्तता को उष्णता के रूप में।  उष्णता को पानी में निकलना चाहिए। परन्तु जब आप मदिरा लेते हैं, तो यह पानी के रूप को बदल देता है। पानी इस तरह हो जाता है: ऑक्सीजन यहाँ ऊपर और हाइड्रोजन यहाँ। यह किसी भी प्रकार की उष्णता को ग्रहण नहीं करता! यही चीज़ कर्क रोग में भी होती है। कर्क रोग वाले लोग कभी उष्णता अनुभव नहीं करते हैं, कभी बुख़ार नहीं होता । परन्तु वे सिर को बहुत गर्म अनुभव करते हैं। अब, उसी तरह, प्लीहा और अग्न्याशय अव्यवस्थित हो जाते हैं, और लोग पीले हो जाते हैं –

पीला, प्लीहा के साथ, और अग्न्याशय के साथ आपको मधुमेह हो जाता है। उसी तरह, आप बीमारियाँ विकसित करते हैं । 

… न न न न , अग्न्याशय आपको मधुमेह देता है, और प्लीहा, आप जानते हैं, आपको रक्तहीनता देता है। इससे आपका स्वभाव भी बहुत चिड़चिड़ा हो जाता है, और आप निराशावादी भी हो सकते हैं। जीवन की सारी खुशियाँ दूर हो जाती हैं आपके चेहरों से । आप वास्तव में तब बहुत उबाऊ हो जाते हैं। आप बैठकर एक-दूसरे के साथ का आनंद नहीं ले सकते हैं बिना एक कप व्हिस्की हाथ में लिए । कोई घनिष्ठता स्थापित नहीं होती मनुष्यों के बीच । आपको सिनेमा में जाना पड़ता है एक साथ, या आपको एक डिस्कोथेक जाना होता है एक साथ, परन्तु आप समझदारी से बात नहीं कर सकते पाँच मिनट से अधिक। आपके मध्य कुछ संस्थाएं ​​होनी चाहिए आपको एक-दूसरे से बचाने के लिए । अन्यथा झगड़े और तलाक होते हैं।

मनुष्य सबसे बड़ी रचना है ईश्वर के प्रेम की । उन्हें जानना होगा कि ईश्वर का प्रेम क्या है। परन्तु जब वे परमेश्वर के प्रेम के बारे में सोचते हैं, तो भी, वे बस भ्रमित हो जाते हैं। यह शुद्ध दिव्य आशीर्वाद है। यह केवल आप में से उत्सर्जित होता है। यह केवल देता है, यह किसी चीज़ कि अपेक्षा नहीं करता है। हमारे स्वयं के अवलंब की स्थापना बहुत महत्वपूर्ण है।

अवलंब। यह धर्म है, जैसा कि मैंने पहले ही कहा है; आंतरिक धर्म, आप कह सकते हैं। अवलंब। आंतरिक, जैसे कार्बन में चार संयोजन क्षमताएं हैं, हमारे स्वयं के दस अवलंब (धर्म) है। यह हरा क्षेत्र उस स्थान को दर्शाता है, जहाँ आदिगुरूओं का जन्म हुआ है, हमें वह धर्म प्रदान करने के लिए । कल मैंने आपको उनके बारे में बताया था।

इसलिए कहा गया है कि “मध्य में रहो, अति में मत जाओ।” परन्तु मनुष्य की एक विशेष प्रवृत्ति होती है विषय से भटक जाने की। यदि खोजने की बात आती है, तो वे उस सीमा तक जाएंगे कि वे किसी योग्य नहीं रहेंगे। मैं कुछ लोगों से मिली जो मेरे पास आए थे, उन्होंने अपनी जीभ काट ली थी, जो कुत्तों की जीभ की तरह हिल रही थी। उनमें से कुछ की आँखे बाहर की ओर निकलती हुई थी, उनमें से कुछ के विकृत अंग थे अधिक प्राणायाम के कारण । यदि वे हठ योग करेंगे, तो वे केवल कंकाल बन जाएंगे। यदि वे उपवास करेंगे, तो वे सीधे कब्र में पहुँच जाएंगे।

किसने आपसे कहा है ये सब करने के लिए? बस नष्ट करने के लिए अपने अस्तित्व के इस सुंदर मंदिर को? आपको केवल मध्य में प्रतीक्षा करनी चाहिए थी इतना व्यग्र होने के स्थान पर । वह ईश्वर, जिन्होनें आपको इतनी सुंदरता से बनाया है, इसके बारे में कुछ तो करेंगे। उन्होंने  आपको अमीबा अवस्था से मनुष्य बनाया है, और वे आपको और ऊँचा बनाने वाले हैं । यह उनकी समस्या है, आपकी नहीं। आपने स्वयं को नहीं बनाया है । यदि वे इसके बारे में कुछ नहीं करते हैं, तो उनका कोई अर्थ नहीं होगा। उनकी रचना समाप्त हो जाएगी। यदि वे सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं, तो वे इसके बारे में कुछ करेंगे।

परन्तु यह होता है क्योंकि हमें लगता है कि हम भी इसके बारे में कुछ कर सकते हैं।  परन्तु यह सब न्यायशास्त्रवत आना चाहिए आपके साथ कि आप कुछ भी नहीं करते हैं। आप क्या करते हैं? यदि कोई पेड़ मर जाता है, तो आप एक कुर्सी बनाते हैं। आपको लगता है कि आपने बहुत महान काम किया है। आपने एक मृत रूप को दूसरे मृत रूप में बदल दिया है। यह ऐसा है जैसे बच्चे रेत में खेलते हैं। आपने कौन से जीवित कार्य किए हैं? क्या आप एक फूल को फल में बदल सकते हैं? कम से कम बच्चे अपने खेल में लिप्त नहीं होते। परन्तु आप सभी चीजों को इतनी गंभीरता से करते हैं कि यह बहुत आश्चर्यजनक है। इस भवन की रचना में कुछ भी महान नहीं है वे सभी मृत हैं।

कुछ चीज़ें है, अवश्य ही, जब आप कुछ सुंदर करते हैं, जब आप इसे ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए कर रहे होते हैं, उन्हें दिखाने के लिए कि आप सौंदर्य कि रचना कर सकते हैं, प्रतिबिंब जैसे । जैसा कि आपके यहाँ चार्ट्रेस में एक सुंदर चर्च  है, जो बहुत सुंदर था – यह केवल उन्हें गौरवान्वित करने के लिए है । परन्तु आप  आत्मसाक्षात्कार नहीं दे सकते, आप दीक्षा नहीं दे सकते। वह सब कृत्रिम है। आप कृत्रिम चीज़ें कर सकते हैं, परन्तु ईश्वर द्वारा निर्मित चीज़ें वास्तविक हैं।

आत्मसाक्षात्कार के बाद आप जीवित क्रिया करते हैं: आप कुंडलिनी को उठा सकते हैं अपने हाथों से, आप लोगों को आत्मसाक्षात्कार दे सकते हैं। यदि आप चैतन्य देते हैं, कहिए, एक फूल को, तो वह ज़्यादा लंबे समय के लिए जीवित रहेगा। भारत में, हमारे कुछ सहज योगी हैं जो प्राध्यापक हैं कृषि विश्वविद्यालय में । उन्होंने इन चैतन्य लहरियों के साथ प्रयोग किया है। उन्हें पता चला है कि यदि आप चैतन्य युक्त जल देते हैं मिट्टी को और उस की फसल लेते हैं, तो यह कभी-कभी दस गुना अधिक होती है! यह बीस गुना नहीं होगी –  अत्याधिक – परन्तु यह इष्टतम होगी मध्य में । जहाँ वे नारियल नहीं उगा सकते थे, चैतन्य युक्त नारियल के द्वारा वे उगा रहे हैं।

हम हल कर सकते हैं गरीबी की सभी समस्याओं को यदि हम सहज योग का सहारा लें। परन्तु आपको मिस्टर फोर्ड के जैसा बनने के लिए नहीं माँगना है। वह अत्यधिक धनवान हैं… परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने के लिए । ऐसे लोग पागल होते हैं! वे  कबाड़ पे कबाड़ इकट्ठा करते चले जाते हैं। उनमें कोई सुंदरता नहीं है। तो, आत्मसाक्षात्कार के बाद आप समझते हैं कि अति क्या है।

हमारे भीतर, अन्य चेतनाएं भी हैं। बाईं ओर के लिए—-इस इड़ा नाड़ी के बाईं ओर यदि आप बढ़ते हैं, तो यहाँ सामूहिक अवचेतन का बोध होता है। दायीं ओर, यदि आप अत्यधिक दाहिने ओर जाते हैं, तो सामूहिक पराचेतन का क्षेत्र है। कुंडलिनी अचेतन है। और निचले हिस्से की हमें चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है, यह नर्क है। आपके सिर के ऊपर सामूहिक चेतना है। यही हमें प्राप्त करना है। हमें सामूहिक रूप से जागरूक बनना होगा।

यदि आप बाएं हाथ की ओर बहुत अधिक बढ़ते हैं, तो आप पर बाएं हाथ के सत्त्वों द्वारा हमला किया जाता है जो इस सामूहिक अवचेतन में विद्यमान हैं। कल मैंने आपको बताया था कि मैंने बीबीसी का एक कार्यक्रम देखा था जिसमें उन्होंने कहा था कि कैंसर में, आप पर कुछ ऐसे क्षेत्रों से हमला किया जाता है जो उत्पत्ति से ही आप में निर्मित हैं। अज्ञात क्षेत्र। सहज योग एकमात्र तरीका है जिससे आप कैंसर का इलाज कर सकते हैं और इसे रोक सकते हैं। क्योंकि आप पराचेतन में जाते हैं। जब ऐसा कोई केंद्र होता है, तो दाएं हाथ की ऊर्जाएं आपके शरीर से ऊर्जाएं खींचती हैं। 

जब बाएँ और दाएँ हाथ की अनुकंपी तंत्रिका गतिशील हो जाती है, तो चीज़ें बहुत तीव्र हो जाती है और थकावट बहुत अधिक हो जाती है। जब यह बहुत अधिक थक जाता है, तो यह शुष्क हो जाता है और बाहर की ओर निकलने लगता है। फ़िर समग्र के साथ संबंध टूट जाता है। एक कोशिका स्वयं ही कार्यान्वित होने लगती है। वह अहंकारी हो जाती है, वह कहती है: “क्या गलत है?” वह एक अनोखी कोशिका बन जाती है। वह दुर्दम हो जाती है; वह अन्य पर हावी होने लगती है और अन्य कोशिकाओं को भी सम्मोहित कर देती है।

अन्य कोशिकाओं को वश में करना और सम्मोहित करना । सहज योग में, जब कुंडलिनी उठती है, तो वह आपका चित्त परा-चेतन तक ले जाती है। जैसे साड़ी में: जब आप इसे बाहर धकेलते हैं, तो साड़ी कैसे ऊपर  खिंच जाती है। आपका चित्त बाईं और दाईं ओर से एकत्र किया जाता है। और कुंडलिनी सहस्रार को छेदती है। अर्थात् ब्रह्म  … इसे ब्रह्मरंध्र कहा जाता है, जिसका अर्थ है “ब्रह्म में छिद्र”। ये चैतन्य ही ब्रह्म है।

अब, हमला वास्तव में अधिकतर बाईं ओर से होता है, यही चीज़ मैंने कैंसर में देखी है। यह दुखद है, परन्तु कुछ गुरु ऐसा कर रहे हैं। वे कई शिष्यों में बाएं कैंसर का आरम्भ कर रहे हैं। उनमें से कुछ उन्हें सम्मोहित कर देते हैं, जिससे वे मिरगी से ग्रस्त हो जाते हैं। किसी को उस सम्मोहन के माध्यम से मिर्गी हो सकती है और हिस्टीरिया, विषाद, डर जैसी चीज़ें भी। कुछ गुरुओं ने शिष्यों को इतना भयभीत कर दिया है कि वे लहसुन से भी डरने लगे हैं। और दाएं पक्ष वाले लोग कुछ ऐसे हैं जैसे एलएसडी (ड्रग)

दाएं-पक्षीय पराचेतन – हमले एलएसडी जैसे हैं। दायां पक्ष हमारे सभी तत्व हैं, पंच तत्व। तो आपको दिखाई देना शुरू होती है रोशनी या समुद्र का मतिभ्रम और यह सब, आपको लगता है कि आप समुद्र बन रहे हैं, आप प्रकाश बनते जा रहे हैं, इस तरह की निरर्थकता । कई लोग जो मुझे भी देखते हैं जब उन्होंने एलएसडी लिया होता है, वे केवल प्रकाश देखते हैं, वे मुझे नहीं देखते हैं। मैरी के कुछ दोस्तों को यह अनुभव हुआ था।

इसलिए आपको भूतकाल में नहीं होना चाहिए या भविष्य में बल्कि मध्य में, वर्तमान में होना चाहिए। मध्य एक बहुत छोटा भाग है। क्योंकि एक विचार उठता है और नीचे गिरता है, और दूसरा विचार उठता है और गिर जाता है। बीच में बहुत कम अंतराल है। उस अंतराल को ‘विलम्ब’ कहा जाता है संस्कृत भाषा में। यदि यह अंतराल बढ़ता है, तो आप वर्तमान में हो सकते हैं। तो जो विचार पीछे चला गया वह भूतकाल बन जाता है, और जो आ रहा है वह भविष्य है। एक विचार  प्रति अहंकार से आता है, और दूसरा अहंकार से आता है। कुंडलिनी उन दोनों को अवशोषित करती है, और आप मध्य में आ जाते हैं।

 आप वर्तमान बन जाते हैं। फ़िर आपकी भाषा बदल जाती है। आपके हाथ शक्ति को प्रसारित करने लगते हैं। तब आप कहते हैं: ” वह आ रहा है, वह जा रहा है, यह बढ़ रहा है, यह गिर रहा है।” आप तीसरी भाषा, तृतीय पुरुष में बोलते हैं, प्रथम पुरुष में नहीं: “मैं यह करता हूँ।” आप कहते हैं, “यह काम नहीं करता है, माँ।” फ़िर आप कहते हैं, “यह काम कर रहा है, यह आ रहा है।” इसका तात्पर्य है कि आप अकर्मी बन जाते हैं, क्रियाहीन । यह बस प्रसारित करता है।

यही आपके साथ होना है । और फ़िर आपको चक्रों के बारे में सब कुछ पता होना चाहिए। आपको पता होना चाहिए कि उसे कैसे चलाना है, आपको पता होना चाहिए कि कैसे उसमें दक्ष होना है। आपको विशेषज्ञ होना चाहिए। यदि आप … यदि आप विशेषज्ञ नहीं बनते हैं, तो आप प्रसन्न भी नहीं होंगे।,

यह एक ऐसी आनन्द देने वाली चीज़ है । और सहज योग एक ऐसा जोकर है जो आपको हँसाता है। क्योंकि आप सब कुछ साक्षी स्वरूप देखना शुरू कर देते हैं। पूरा नाटक समाप्त हो जाता है, आप अब नाटक में भागीदार नहीं हैं। और आप आश्चर्यचकित हैं कि परमेश्वर का खेल कैसे कार्यान्वित होता है, उनकी माया हमारे साथ कैसे खेलती है। जीवन एक ऐसा आनंद बन जाता है। आप सभी को परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना है।

मैंने आपको बताया है कि ‘अन्तिम निर्णय’ शुरू हो चुका है। यह कुंडलिनी जागरण के माध्यम से ही होने वाला है। क्या परमात्मा आपको किसी तराज़ू पर रखने जा रहे हैं? कुंडलिनी केंद्रीय बिंदु है, सूचक, जो दिखाएगा कि आप कितनी दूर तक बाएं और दाएं गए हैं। और आप अपने आप को सही कर लेंगे। क्योंकि आप स्वयं से बाहर आ जाएंगे और अपनी आत्मा के साथ एक हो जाएंगे, जो कि आपका वास्तविक स्वरूप है। और आप सब कुछ जान जाएंगे अपने बारे में और दूसरों के बारे में ।

मुझे बहुत खुशी है कि आज इतने सारे लोग हैं, और मुझे विश्वास है कि आज यह और भी अच्छे ढंग से कार्यान्वित होगा । कल मैं आपको अन्य चक्रों के बारे में बताऊंगी और यह भी कि आत्मसाक्षात्कार के बाद क्या करना है। यह बहुत अधिक महत्वपूर्ण है पश्चिम में क्योंकि यहाँ कई पूर्वकल्पित विचार हैं आत्मसाक्षात्कार के बारे में और ईश्वर के बारे में । परमात्मा जो हैं वे हैं। आप परमेश्वर के बारे में अपनी धारणा नहीं बना सकते। आत्मा जो है वह है। परन्तु जो ये जानते हैं, वे  सरल लोग हैं वहीं रहने के लिए।  उदाहरण के लिए, अगर मुझे पता है कि यही वह हॉल है जहाँ मुझे आना है, मैं यहाँ आकर बैठ जाउंगी ।

श्री माताजी [आदमी को]: आप बिल्कुल ठीक हैं, चिंता न करें। वे क्या नष्ट कर सकते हैं? वे आपकी आत्मा को नष्ट नहीं कर सकते। यह अविनाशी है। मैं इसे आप में देख सकती हूँ।। ये केवल बादल हैं। आप देखिए? और वे … ये केवल बादल हैं। बादल सूर्य को नष्ट नहीं कर सकते। तुम चिंता मत करो, यह कार्यान्वित होने वाला है।