What do we expect from Self-realisation?

Caxton Hall, London (England)

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परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी,

‘हम आत्म साक्षात्कार से क्या 

अपेक्षा रखते हैं’

कैक्सटन हॉल, लंदन (यू.के.)

27 अक्टूबर, 1980

अभी हाल में, मैं आपको आत्म-साक्षात्कार के पश्चात हमारे भीतर की प्रगति के बारे में बता रही थी।

अंकुरण बहुत सरलता से होता है। कुंडलिनी बहुत सरलता से ऊपर उठती है, ब्रह्मरंध्र को भी बहुत सरलता से छेदती है। यह वास्तव में, जैसा कि आप इसे कहते हैं, ‘सहज’ है। यह एक जबरदस्त घटना है। लोगों को आत्म साक्षात्कार  प्राप्त करने में हजारों वर्ष लग जाते हैं। यह भी एक सच्चाई है। उन्हें बार-बार जन्म लेना पड़ा, और बहुत कम चुने हुए लोगों को ही आत्मसाक्षात्कार मिला।

लेकिन आज, जैसा कि मैंने कहा, कई फूलों के फल बनने का समय आ गया है।

तो यह घटना ज्यादा समय नहीं लेती है। यह कई लोगों में बस ‘तत्क्षण’ का काम है। लेकिन जिस विकास के बारे में मैं पिछली बार बात कर रही थी, मैंने आत्म-साक्षात्कार पर बात समाप्त की – आत्म-साक्षात्कार क्या है, और हम आत्म-साक्षात्कार से क्या अपेक्षा करते हैं। 

जैसा कि आप जानते हैं, पहली चीज़ जो आपके साथ घटित होती है, जब कुंडलिनी ऊपर उठती है, आप शारीरिक रूप से बेहतर महसूस करने लगते हैं। आपके स्वास्थ्य में सुधार होता है। यद्यपि कुंडलिनी मध्य भाग में सुषुम्ना के अंदर सबसे मध्य नाड़ी, जिसे ब्रह्म नाड़ी कहा जाता है, से उठती है। और पहली चीज़ जो घटित होती है, वह ये है, कि भौतिक प्राणी की सहायता होती है। वह हर चक्र का अंतरतम केंद्र नहीं है। प्रत्येक चक्र का अंतरतम केंद्र आध्यात्मिक है। लेकिन यह कैसे? सबसे पहले भौतिक प्राणी को मदद प्राप्त होती है? ये देखना बहुत दिलचस्प है।

कुंडलिनी कई चक्रों से होकर उठती है, आज्ञा से होकर गुजरती है, ब्रह्मरंध्र से होकर गुजरती है, और सर्वव्यापी शक्ति के साथ एक हो जाती है। तो पहली चीज़ जिसे ज्ञात होता है, वह है सदाशिव का स्थान, आपके सिर के ऊपर आपकी आत्मा का स्थान है। परन्तु आत्मा आप के हृदय में है। 

तो पहली जागृति या आत्मज्ञान आपके मस्तिष्क में घटित होता है। यह देखने योग्य बहुत महत्वपूर्ण बिंदु है। आपके मस्तिष्क में चेतन मन रहता है, जिसका अर्थ है वर्तमान, और जब यह जाग्रत होता है, तो इसका मतलब है कि आपकी चेतना जागृत होती है। आपको अपनी चेतना में, अपने चित्त में आत्मज्ञान मिलता है। जैसा कि मैंने पिछली बार आपको बताया था, कि सबसे पहले आप का चित्त जागृत होता है। तो आप अपने चित्त से जान सकते हैं, की दूसरे व्यक्तियों के साथ क्या समस्या है। आप जान सकते की कौन से चक्रों में पकड़ आ रही है। आप के कौन से चक्रों में पकड़ आ रही है। तो शारीरिक स्तर पर आप जानते हैं कि क्या हो रहा है। ये, हम जो कहते हैं, ये वर्तमान है।

हम अपने स्थूल अस्तित्व को जाग्रत होता हुआ अनुभव करते हैं। हम उन्हे अपनी उंगलियों पर अनुभव कर सकते हैं। पर जब आप के अस्तित्व में कुंडलिनी उठती है, वो सीधे ब्रह्मरंध पर जाती है। बेशक अगर वहां कोई रुकावट है, तो वो रुक जाती है, और इशारा करने का प्रयास करती है। उस समय यदि वह सफल नहीं होती है, उदाहरण के लिए आपको लीवर की समस्या है, तो वह आएगी, और लीवर की समस्या पर धड़कते हुए आपको बताएगी, कि लीवर में कुछ गड़बड़ है। इसीलिए एक सहज योगी को बाहर से चैतन्य देना पड़ता है। 

जब कुंडलिनी आज्ञा से ऊपर उठती है, तो वह ब्रह्मरंध्र तक जाती है और छेदन करती है। लेकिन जब वह आज्ञा से आगे नहीं जा पाती, तो वह यहीं फैल जाती है। वह यहां भी फैल सकती है। और फिर वह नीचे की ओर बहने लगती है, या आप कह सकते हैं कि वह इस क्षेत्र को आराम देना शुरू कर देती है, जिसे मूर्धा (मस्तिष्क) कहा जाता है, और इस तरह वह आज्ञा चक्र में अधिक जगह बनाती है। और यह फैलाव भौतिक अस्तित्व के बाहरी पक्ष में काम करता है।

इसके अलावा जब वह किसी ऐसे व्यक्ति में भेदन करती है, जिसका व्यक्तित्व सरल है, जो इतना जटिल नहीं है, तो पहली बात जो घटित होती है, कि ईश्वरीय कृपा उसके दोनों ओर से बरसने शुरू हो जाती है। और ये कृपा इड़ा और पिंगला में बहने लगती है। फिर वह नीचे आती है, जिससे वह इड़ा और पिंगला की आपूर्ति करती है। ईश्वरीय कृपा, कुंडलिनी नहीं है, आपको इन दोनों चीजों में भ्रमित नहीं होना चाहिए। उसके छेदन के कारण, वहाँ एक छिद्र बन जाता है और ईश्वरीय कृपा नीचे बहने लगती है, और वह, मुझे कहना चाहिए कि स्वयं कृपा, सभी केंद्रों को बाहर से भरण करती है। तो, सबसे पहले शारीरिक अस्तित्व में सुधार होता है।

दूसरा मैं अब बाहर से अंदर जा रही हूं, दूसरा मानसिक अस्तित्व है। अब मानसिक अस्तित्व हमारी चेतना से भी संबंधित है, हमारी समझ की भावना, बुद्धि और उन सभी चीजों से भी। जब ईश्वरीय कृपा हमारे भीतर अधिक से अधिक प्रवाहित होने लगती है, तब हमारा मानसिक अस्तित्व जाग्रत हो जाता है। जब मानसिक अस्तित्व जाग्रत हो जाती है, तो आप अन्य व्यक्तियों के केंद्रों को महसूस करना शुरू कर देते हैं। कुछ लोग जिन्हें आप जानते हैं वे स्वत: ठीक हो जाते हैं। उन्हें चैतन्य महसूस नहीं होता, कुछ भी नहीं, बस वे ठीक महसूस करते हैं। वे कैंसर, इत्यादि, सभी प्रकार की चीजों से ठीक हो जाते हैं। लेकिन उन्हें चैतन्य नहीं मिलता, उन्हें कोई अनुभूति नहीं होती, वे यह पता नहीं लगा पाते, कि यह चक्र है या वह चक्र, उन्हें कोई अनुभूति नहीं होती।

तो पहली चीज़ जो किसी के साथ घटित होगी वह है शारीरिक उपहार, शारीरिक अस्तित्व में सुधार – वह ईश्वर की कृपा है, क्योंकि यदि आप ठीक नहीं हैं, यदि आपको कुछ पीड़ाएँ, कुछ परेशानियाँ और कुछ बीमारियाँ हैं, तो आप ईश्वर और आत्मा पर कैसे ध्यान देंगे? यह बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे पहले कि बात मानसिक स्व की आए, कुछ और भी घटित होता है, कि जब कुंडलिनी छेदती है, तो ईश्वरीय कृपा का आगमन सबसे पहले नाभि से शुरू होकर निचले केंद्रों तक आता है। और नाभि एक बड़ी भारी चूषक है, नाभि चैतन्य को चूसना शुरू कर देती है, या आप ईश्वरीय कृपा कह सकते हैं, और सबसे पहले नाभि जाग्रत होने लगती है।

नाभि से स्वाधिष्ठान चक्र उठता है, जो गोल-गोल घूमता है, जो नाभि से जुड़ा होता है, इसलिए यह स्वाधिष्ठान की ओर प्रवाहित होती है, और फिर स्वाधिष्ठान भी अपने आप काम करना शुरू कर देता है। स्वाधिष्ठान जितना संभव हो उतना अंदर खींचता है और सभी केंद्रों, मेरा मतलब है कि सभी अंगों का काम करता है, जिन्हें इसके द्वारा आपूर्ति की जाती है। लेकिन नाभि, जब इसे अतिरिक्त कृपा प्राप्त होती है, तो यह खुलना शुरू हो जाती है, और इसके खुलने से हमें बहुत स्थूल आर्थिक जीवन में भी मदद मिलती है – आपको आर्थिक रूप से मदद मिलती है। मान लीजिए यदि आप आर्थिक रूप से बिल्कुल निराश हैं, तो आप ईश्वर पर भी ध्यान नहीं देंगे। इसलिए यह ईश्वर की जिम्मेदारी है, कि वह पहले आपको थोड़ा सा आर्थिक कल्याण दें। 

जैसे मुझे एक पत्र मिला, और टेप में भी उन्होंने किसी ऐसे किसी के बारे में उल्लेख किया है, जो ऑस्ट्रेलिया से भारत आना चाहती थीं। उन्हे आत्म साक्षात्कार प्राप्त हुआ, उन्हे बहुत बेहतर महसूस हुआ, और वह भारत आना चाहती थीं। लेकिन उसके पास आने के लिए पैसे नहीं थे, और उन में वो इच्छा थी। अपनी उस इच्छा के कारण, उन्होंने अपनी आत्मा पर पूरा ध्यान नहीं दिया होगा। और इस प्रकार हमारी आर्थिक इच्छाएँ संतुष्ट होती हैं। और उसकी बेटी को पता चला, उसके पास एक कंगन, बहुत सारे कंगन और बहुत सी चीज़ें थीं, और वह उन्हें किसी प्रकार के कार्यक्रम जो बच्चों के लिए है, में बेचने के लिए एक जंबल सेल में गई। और उन्हें पता चला कि उसके पास मौजूद कंगनों में से एक, जिसे वह कबाड़ समझ रही थी, आश्चर्यजनक रूप से सोने का था। और उसने इसे पंद्रह सौ डॉलर में बेच दिया। वह इसे बीस सेंट में बेचने जा रही थी, आप देखिए, (हँसते हुए)। और बिल्कुल सटीक वही राशि थी, जो उन दोनों की यात्रा के लिए आवश्यक थी!

अब कोई कहेगा, कि यह कैसे काम करता है? यह चमत्कारी है, मैं बस इतना ही कह सकती हूं, क्योंकि मशीनरी ऐसी है। आपके भीतर कृपा का प्रवाह नाभि में लक्ष्मी सिद्धांत को सूचित करता है। नाभि उन्हें बस दिखाती है, कि ये कहां है। किसी को उठकर उन्हें (नाभि चक्र चार्ट में) दिखाना होगा, डगलस? या कोई? डगलस (फ्राई) यहां आइए। यही तो है वो! और इसमें लक्ष्मी की देवी है, वह आपके कल्याण की देवी है। और यही कृष्ण ने कहा है, “योगक्षेम वहाम्यम्” ”जब योग होता है, यानी जब कुंडलिनी ब्रह्मरंध्र को भेदती है, तो मैं आपकी कल्याण की देखभाल करता हूं।” वह देखभाल कैसे करते हैं? लक्ष्मी के माध्यम से! अब यह सर्वव्यापी देवी है। वह मनुष्यों में भी विद्यमान है, और वह भौतिक वस्तुओं में भी विद्यमान है। यह इतनी शानदार बात है, कि आप इन बातों को मानवीय स्तर पर नहीं समझा सकते, वाकई यह बहुत मुश्किल है। केवल एक चीज जो आप स्वयं देख सकते हैं, कि यह कैसे काम करती है। यह बहुत जबरदस्त है। जैसे यदि आपको एक चींटी को मानव सभ्यता के बारे में समझाना हो तो यह कठिन होगा – उसी प्रकार यह भी है। आप देखिए यह बहुत कठिन है।

इंसानों को अपनी तर्कशक्ति पर बहुत गर्व है, और मुझे यह असंभव लगता है, कि उन्हे कैसे समझाया जाए, लेकिन यह उसी तरह से काम करता है। आप केवल इसकी कार्यप्रणाली देख सकते हैं। लेकिन अगर आपको अपनी तर्क शक्ति पर गर्व है, आप इसके साथ आगे बढ़ते हैं, तो आप क्या कर सकते हैं? लेकिन आप स्वयं देखें, कि यह कैसे काम करता है। 

तो दूसरी परत जो वास्तव में बेहतर हुई है, वह है आपका आर्थिक अस्तित्व। बहुत सारे लोग जो यहां हैं उनकी आर्थिक रूप से मदद की गई है। कल्याण आ गया है, वास्तविक कल्याण, संतुष्टि के अलावा। लेकिन जैसा कि मैंने कहा, यह सीमा पार नहीं करता, जैसे आप मिस्टर फोर्ड नहीं बन जाते! क्योंकि यह एक प्रकार का व्यवहार है जो असहज है, इतना अमीर होना, मेरा मतलब है कि यह बेतुका, अशिष्ट है!

आप जो हैं उससे बेहतर तो बनते हैं, लेकिन सर्वश्रेष्ठ नहीं, क्योंकि आपको मध्य में संतुष्टि के बिंदु पर रहना होता है। और हर किसी को आपका आनंद लेना है, और आपको हर किसी का आनंद लेना है। लेकिन मान लीजिए, कि यदि आप वस्तुओं की सख्त और समस्याग्रस्त स्तिथि में हैं, तो आप भगवान पर ध्यान नहीं दे सकते हैं, और ये वे समझते हैं – कि आप ध्यान नहीं दे सकते।

यदि आपको शारीरिक समस्या है, यदि आपको कैंसर है, तो आप कैसे कह सकते हैं कि, “आप अपनी आत्मा पर ध्यान दें,” जब आपको कैंसर हो? मेरा मतलब है, ऐसा शरीर! आख़िरकार यदि यह पूरा घर ढहने वाला है, तो आप यहाँ ध्यान नहीं कर सकते। तो सबसे पहले शारीरिक स्थिरता स्थापित होती है, और बाद में आर्थिक  स्थिरता स्थापित होती है। और ऐसे कई कारक हैं, जो स्वचालित रूप से आर्थिक स्थिरता कार्यान्वित करते हैं।

उनमें से पहला यह है कि, एक बार जब आप अपनी आत्मा को पा लेते हैं, तो आप स्वचालित रूप से अपनी आदतों को छोड़ देते हैं। इनमें से अधिकतर आदतें आपकी नाभि से आती हैं, क्योंकि नाभि चक्र से आपको अपनी खोज मिलती है। और आप सोचते हैं, जब आपकी आदत है, आप अपनी खुशी तलाश रहे हैं। मेरा मतलब है, कई लोगों ने कहा है, “माँ, लेकिन मैं अपने व्हिस्की के गिलास का आनंद लेता हूँ।” उन्होंने मुझसे कई बार कहा है। या, “मैं यहाँ-वहाँ थोड़ी सवारी का आनंद लेता हूँ,” किसी ने कहा है कि, “माँ, मैं कुछ केंसिंग्टन महिलाओं का आनंद लेता हूँ।” आप देखिए, कुछ इस तरह की बात है। लेकिन एक बार जब आप अपनी आत्मा का आनंद लेना शुरू कर देते हैं, तो यह सब ख़त्म हो जाता है। आपका सारा ध्यान प्रबुद्ध हो जाता है, और आपकी प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं। आप उन चीज़ों का आनंद नहीं लेते जिनका आप पहले आनंद ले रहे थे, इसलिए आप उन्हें करते ही नहीं हैं। मेरा मतलब है, मुझे आपको यह बताने की ज़रूरत नहीं है, “पीजिए मत! आप अब ऐसा मत करिए!” मुझे आपको यह बताने की ज़रूरत नहीं है, कि आप धूम्रपान न करें। आप ऐसा करते ही नहीं।

लेकिन कुछ बहुत कमज़ोर लोग हैं, बेहद कमज़ोर, मेरा मतलब है, बहुत, बहुत कमज़ोर लोग। उन्हें समय लगता है, मैं जानती हूं। वे पैर घसीट कर चलते हैं, और बहुत धीमी गति से चलने वाले प्राणी हैं, लेकिन सभी नहीं। मैं कहूंगी कि बहुत कम संख्या में लोग हैं, और अधिकांश लोग, बस चीज़ें त्याग देते हैं। आप बस छोड़ देते हैं। तो आप स्वचालित रूप से पैसा बचाना शुरू कर देते हैं, क्योंकि पैसा रेस में या पब में या अन्य आदतों में चला जाता था, जो बेकार हैं। आप जानते हैं कि वे बेकार हैं धूम्रपान, नशीली दवाएं, ऐसी कोई भी मूर्खतापूर्ण चीजें जिन पर आप पैसा बर्बाद कर रहे हैं। 

और आप इस पैसे को किसी बेहतर चीज़ में लगाना शुरू कर देते हैं, कुछ ऐसा जो आपको अधिक आनंद, अधिक खुशी और शाश्वत प्रकृति देता है यह कुछ समय का नहीं, कि पिछली रात को पिया, और भोर को सब खत्म! आपको एक ऐसा पेय मिलता है जो कभी खत्म नहीं होता, जिसका आप हर समय आनंद लेते हैं। आप ऐसे  नशे में धुत हो जाते हो। 

 

क्योंकि मैंने अपने जीवन में देखा है, यह एक तथाकथित परिष्कृत संभ्रांत जीवन है। आप देखिए, सामान्य लोगों की तुलना में लोग कहीं अधिक शराब पीते हैं। और वे मुझसे पूछते हैं, “आप शराब क्यों नहीं पीतीं?” मैं कहती हूँ, “मैं पहले से ही नशे में हूँ! जिस दिन मेरा जन्म हुआ मैं इतनी नशे में थी, कि अब अगर मुझे और पीना पड़ेगा तो मैं गिर जाऊंगी, इसलिए बेहतर होगा कि मुझसे न पूछा जाए!” वे मेरी इस बात से काफी डरे हुए हैं। मैंने कहा, “मैं वास्तव में पहले से ही पूरी तरह से नशे में हूँ!” तो वे मेरी ओर देखने लगते हैं! और वे मुझे कभी भी अपने से कम जोश में नहीं पाते। असल में मैं हमेशा उनसे थोड़ा ज्यादा ही होती हूं, इसलिए वे मुझे ऐसा करने के लिए कभी मजबूर नहीं करते। 

लेकिन ये चीजें अपने आप छूट जाती हैं। मुझे आपको यह बताने की ज़रूरत नहीं है, कि आपको छोड़ना होगा, क्योंकि अधिकांश चीजें जो आपने इसलिए की हैं, क्योंकि आप कुछ खोज रहे हैं। आप जानते हैं, ऐसे लोग हैं, मैंने उनसे पूछा, “आप ऐसा क्यों करते हैं?” उन्होंने कहा, “हम प्रेम तलाश रहे हैं।” मैंने कहा, “कैसे? आप को इस तरह प्रेम कैसे मिल सकता है?” या कोई कहेगा कि, “मैं ईश्वर को खोज रहा हूँ।” ऐसे कई लोग हैं जो ड्रग्स ले रहे हैं, मेरा मतलब है, वास्तव में, सिर्फ खोज के लिए। लेकिन जब उन्हें वह मिल जाता है, जिसकी वे तलाश कर रहे थे, तो वे ड्रग्स नहीं लेते हैं। लेकिन यह अतिरिक्त मुद्दों में से एक है, मैं बस इसे थोड़ा हल्का करने की कोशिश कर रही थी।

लेकिन मुख्यतः होता यह है, कि असल में आपके भीतर लक्ष्मी का तत्त्व, कल्याण का तत्त्व जागृत हो जाता है। और यदि आप मेरा एक टेप सुनें, जिसमें मैंने बताया है कि लक्ष्मी क्या है, और कैसे वे प्रतीक बनती हैं। यह लक्ष्मी जी की एक बहुत ही सुंदर तस्वीर है, जिसे महान द्रष्टाओं ने हमारे सामने रखा है, कि आख़िर वो एक माँ है। वो एक माँ है। 

जो व्यक्ति धनवान है उन्हे मातृवत् होना ही पड़ेगा, लेकिन यहाँ आप पाते हैं, पूरी दुनिया में मैंने देखा है, कि जिनके पास थोड़ा भी पैसा होता है, उनकी नाक इसी तरह ऊपर हो जाती है, और यदि आप उन्हें नीचे से देखते हैं तो वे भेड़ियों की तरह दिखते हैं, माताओं की तरह नहीं! सबसे आश्चर्य की बात हैं! 

और यह लक्ष्मी जो माँ है, एक सफेद साड़ी पहनती है, बहुत सुरुचिपूर्ण सुंदर, सुनहरे बॉर्डर वाली। यह दर्शाता है कि वह अपनी शानो-शौकत और दिखावे इत्यादि से लोगों पर धाक नहीं डालतीं। वह कमल पर खड़ी है। कल्पना कीजिए कि कोई मनुष्य कमल पर खड़ा है! इसका मतलब है कि वह दूसरों के प्रति अपने व्यवहार में बहुत हल्की है। वह इतनी नाजुक है, वह लोगों को इतनी कोमलता से छूती हैं, कि लोगों को दुख नहीं होता, उन पर किसी भी तरह से लोगों की दौलत का दबाव नहीं होता। लेकिन आप जानते हैं कि लोग इसके बिल्कुल विपरीत है, यदि आप तथाकथित ‘अमीर’ आप देखिए! भयंकर! अगर कोई यहाँ आ रहा है, तो मैं तो उस दरवाजे से बाहर निकलना चाहूंगी। वे दबाव बनाने की कोशिश करते हैं, क्योंकि उनके पास पैसा है। आप देखिए, अगर कोई बड़ी-बड़ी बातें करने लगे, तो आप समझ लीजिए, 99% उसने जरूर कोई घुड़दौड़ जीती होगी!

यह दबाव डालना इस बात का संकेत है, कि वह लक्ष्मीपति नहीं है, उसका लक्ष्मी से कोई लेना-देना नहीं है। वे (लक्ष्मीपति) तो बहुत दयालु होते हैं। मैंने ऐसे लोग देखे हैं। मैंने ऐसे कुछ लोगों को देखा है। मैंने इंग्लैंड में एक को देखा है, आप जानकर आश्चर्यचकित रह जायेंगे। मैंने उसे बस एक बार देखा है। वह एक सज्जन व्यक्ति थे, जो कुछ हद तक लॉर्ड या कुछ ऐसे ही थे, और बाद में वह भारत आये और वह एक वायसराय (लॉर्ड माउंटबेटन) थे। और एक और सज्जन थे, जो हमारे बहुत परिचित थे। एक बार उनकी मुलाकात उनसे (लॉर्ड माउंटबेटन) एक ट्रेन में हुई थी, जो लेट हो गई थी या कुछ हो गया था, और उन्हें दूसरे स्टेशन पर उतरना पड़ा, और वे किसी तरह एक साथ आ गए। और वह इतने सरल, इतने अच्छे और इतने मददगार थे, कि इस सज्जन को उसने अपना लिया। उन्होंने कहा, “अब बेहतर होगा कि आप मेरे घर चलें, क्योंकि अब कोई ट्रेन नहीं है, आप मेरे घर आ जाएं।” जब वह उसके घर गया तो उसे आश्चर्य हुआ कि घर महल जैसा था! और फिर उन्होंने उसे बताया कि वह कौन थे, और वह चकित रह गया! और उन्होंने उसका बैग भी उठाया। इतना सीधा-सादा आदमी और फिर, जब इस व्यक्ति ने मुझे बताया कि ऐसा कोई व्यक्ति है, तो वह दोबारा भारत आया, फिर वह उसे मुझसे मिलवाने लाया। लेकिन अब वह नहीं रहे, वह सज्जन मर चुके हैं (आई आर ए बम द्वारा मारा गया)। लेकिन वह भारत के बहुत बड़े आदमी थे और बहुत बड़े आदमी थे, लेकिन बहुत सीधे आदमी थे! इतने सरल व्यक्ति!

तो यही कल्याण का महत्व है। तो जब एक सहज योगी कल्याणमय हो जाता है, उसका कल्याण हो जाता है, तो उसमें ये सभी गुण आ जाते हैं, कि वह दूसरों पर यह प्रभाव नहीं डालता, कि उसके पास संपत्ति है या उसके पास पैसा है, और उसे दूसरों पर दबाव डालना चाहिए। यदि वह वास्तव में एक अच्छा सहज योगी है, तो वह सबसे विनम्र होगा और वह बहुत उदार होगा, क्योंकि उनके (श्री लक्ष्मी देवी के) हाथ में, एक हाथ ऐसा है। बायां हाथ इस तरह है, इसका मतलब है कि वह उदार है, वह दे रही है। हर समय वह दे रही है। वह कुछ ले नहीं रही है, वह दे रही है। और इस प्रकार ऐसा व्यक्ति हर समय देता रहता है।

मैंने ऐसे लोगों को देखा है, जो सहज योग में आने के उपरांत बहुत आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, और कंजूस होते हैं, या दूसरों पर अत्याचार करने की कोशिश करते हैं, अपनी संपत्तियां खो देते हैं, और अपना पैसा खो देते हैं और वास्तव में बहुत कष्ट पाते हैं, अन्यथा उन्हें सिखाने का कोई तरीका नहीं है।

तो उन (श्री लक्ष्मी देवी) के हाथ से उदारता बहती है, और दूसरा हाथ ऐसा है, जिसका अर्थ है, कि वह लोगों को सुरक्षा देती हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो निर्भर होते हैं, आश्रित होते हैं, जो बस निर्भर होते हैं, जिनसे ऐसा व्यक्ति कोई पैसा नहीं लेता, वे बस वहां रहते हैं। ये प्रणालियाँ अभी भी भारत में हैं। जो लोग संपन्न होते हैं, उनके पास हमेशा लगभग दो, तीन लोग ऐसे होते हैं, जिन को इनका आश्रय प्राप्त होता है। भारत में अभी भी कई जगहों पर ये व्यवस्था काम कर रही है। मेरा मतलब है, मेरे पिता के घर में हम, हमेशा याद करते हैं, कि हमारे पास ऐसे लोग थे। वे शिक्षित थे, और उन्हें मेरे पिता ने निःशुल्क, बिल्कुल निःशुल्क शिक्षा और उच्च शिक्षा दी। लेकिन उन्हें कभी यह महसूस नहीं हुआ, कि वे कोई और हैं। उनके साथ उतना ही सम्मान और गरिमा के साथ व्यवहार किया जाता था, जितना हमारे साथ किया जाता था। लेकिन वह जीवन का हिस्सा था, उसे करना ही होता था। यही आश्रय है, कि कुछ लोग आप पर निर्भर रहें।

इंग्लैंड में भी मैंने देखा है कि लोगों के पास बिल्लियाँ, कुत्ते, ऐसी चीज़ें हैं, आप देखिए। वे बिल्लियों और कुत्तों पर थोड़ा बहुत खर्च करते हैं। लेकिन इंसानों पर खर्च करना बेहतर है। मैं बिल्लियों और कुत्तों का क्या करूंगी? क्या मैं उन्हें आत्म साक्षात्कार दे सकती हूं? (हंसते हुए) मनुष्यों की देखभाल करना, बिल्ली और कुत्तों की इतनी ज्यादा देखभाल करने के ज्यादा बेहतर है! लेकिन मैंने देखा है कि जब वे बिल्लियों और कुत्तों के साथ व्यवहार करते हैं, तो वे बहुत खुश लोग होते हैं, लेकिन इंसानों के साथ वे बहुत दुखी होते हैं, मुझे नहीं पता क्यों! यदि आपने बी.बी.सी. वगैरह में देखा होगा, जहां ये विज्ञापन होते हैं, तो मैंने कभी-कभी टेलीविजन पर देखा है, आप एक व्यक्ति को बिल्ली रखते हुए देखते हैं, वह हमेशा मुस्कुराती रहेगी, और मजाक करती रहेगी। और जिसके भी बच्चे हों, वह बहुत दुखी दिखती है! (हंसते हुए) ऐसा नहीं होना चाहिए। आप पर कोई न कोई आश्रित अवश्य होना ही चाहिए।

प्रत्येक पैसे को मापना महत्वपूर्ण नहीं है, (जैसे) दो पी (£0.02) माँगना महत्वपूर्ण नहीं है – “मैंने आपको कल दिया था, क्या आप मुझे दो पी लौटाएँगे?” ऐसा होना एक सहज योगी को शोभा नहीं देता। अगर बात इस हद तक आती है, तो ठीक है, कुछ पैसे दे दीजिए – इसके बारे में भूल जाइए। यह आपकी बहुत मदद करता है, यह आपकी बहुत मदद करता है। 

आपने कितना पैसा उधार दिया है, इस पर सावधानी से दृष्टि रखते हैं। आपने कितना दिया है, इसकी तुलना में इस बात पर अधिक चिंतित होना बेहतर है, कि आपने कितना लिया है। इससे बहुत मदद मिलती है। यह एक ऐसी चीज़ है, जिसे जीवन में महसूस करना होगा, कि यह कितनी मदद करती है। मैंने स्वयं अपने जीवन में देखा है, कि इससे कितनी बार मदद मिली है। मेरा मतलब है, कि वास्तव में आपके आसपास लोग होते हैं। ये पांच रुपए और दस रुपए का मामला है। ये इतना महत्वपूर्ण होता है, तब कुछ लोगों के लिए किसी खास समय पर, और इसका बहुत अद्भुत प्रभाव होता है! मेरा मतलब है, कभी-कभी पांच रुपये चुकाकर आप लाखों का इंसान पा सकते हैं, यह इस तरह से काम करता है। इसलिए अधिक देने का प्रयास करें, और फिर आप एक सहज योगी के रूप में अधिक प्राप्त करेंगे। याद रखें कि अब आप लक्ष्मी से जुड़े हुए हैं। आप जितने अधिक उदार होंगे, आपको उतना अधिक मिलेगा। जब आप छोटे दिमाग के होते हैं, तो आपको उनका आशीर्वाद प्राप्त नहीं होता है। आप को देना होगा, आप को देना होगा। एक बार जब आप देना (दान, आश्रय) आरंभ करते हैं, तो यह प्रवाहित होने लगता है, ठहराव खत्म हो जाता है, और प्रवाह आना शुरू हो जाता है, अन्यथा आप बंध कर रह जाते हैं, जब आप का हाथ तंग रहता है, जैसा कहा जाता है। 

अंग्रेजी भाषा में बहुत सारे अच्छे शब्द हैं, हालाँकि अब वे अपना अर्थ खो रहे हैं! वे इसे कहते हैं कि आप बहुत हैं, मुझे नहीं पता कि बहुत, ‘ बहुत कंजूस’ होने के लिए कुछ नए शब्द होने चाहिए, कुछ अच्छे शब्द, आप जानते हैं, जिसका मतलब कंजूस नहीं है बल्कि कुछ l ‘किफायती’ या कुछ शानदार होना चाहिए। लेकिन वास्तव में कृपणता, कृपणता है, इसे आप जो चाहें नाम दें, यह भयानक है। और किसी को कृपणता नहीं अपनानी चाहिए, यह एक अभिशाप है जो मैं आप से कहती हूं, यह एक बीमारी है, यह कोढ़ के समान है, जिससे नफरत की जानी चाहिए। उदार बनने का प्रयास करें।

अब उसकी उदारता शायद, मैं नहीं जानती, शायद धन की उदारता, कुछ लोगों के लिए कठिन नहीं है। लेकिन दूसरों को कुछ अच्छा कहने की उदारता दुर्लभ है। आप किसी को अच्छी पोशाक में देखते हैं, आपको इतना उदार होना चाहिए कि कहें, “ओह, यह शानदार है, यह सुंदर है।” क्या गलत है? परंतु ईर्ष्या वह लक्ष्मी के बिलकुल विरुद्ध जाती है। ये बेहतर है की अन्य लोग उसे पहने हुए हैं। आप इसके लिए भुगतान नहीं करते हैं, और आप इसका आनंद लेते हैं। (हंसने का स्वर) आप देखिए यह बहुत तार्किक है। आप देखिए, अगर यह हॉल आपका है तो इसे ठीक रखना आपके लिए सिरदर्द होगा, है ना? मेरा मतलब है, कि उन लोगों की कल्पना करें जो इसके मालिक हैं, और उन्हें सही रखना होता है, क्योंकि हर कोई आएगा और आलोचना करेगा, “यह अच्छा नहीं है, वह अच्छा नहीं है।” लेकिन यहां रहना अच्छा है, जब यह आपका नहीं है, इसका आनंद लेना। यह बहुत सरल है। बस इसका आनंद लेने का प्रयास करें, लोगों के प्रति उदार बनें, उनके प्रति दयालु बनें। इस उदारता की कमी है। जब इसकी शुरूआत होती है, तो भावनात्मक अस्तित्व का अन्तःकरण आलोकित होने लगता है।

भौतिक कल्याण के सूक्ष्म पक्ष पर जाएँ, और आप भावनात्मक चीज़ों में जाना शुरू कर देंगे। छोटी, छोटी चीजें काम करती हैं, बहुत छोटी। यह बहुत प्यारा है। हमारे पास इस तरह की थोड़ी सी मिठास व्यक्त करने के बहुत सारे उदाहरण हैं। और दूसरों को अच्छी बातें कहने की यह उदारता, सभी सहज योगियों में आनी चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, कि यह अतिशयोक्ति है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि यह एक बफर के रूप में कार्य करता है। फिर अजनबियों का डर, पड़ोसियों का डर, दूसरे इंसानों का डर, आप जानते हैं। हर इंसान अब ऐसा हो गया है, कि वह दूसरे इंसान को आते हुए देखता है, वह पीछे हट जाता है। कल्पना करिए! सबसे पहले, मेरा मतलब है, लगभग पचास साल पहले यह कुत्तों की तरह था; अगर कोई इंसान किसी दूसरे इंसान को देखता तो खुश हो कर चिल्लाने लगता था! अब यह बिलकुल उल्टा हो गया है। तो, अपने ही भाई का, अपने सगे-संबंधियों का, अपने ही अभिन्न अंग का डर। 

वे आपके अपने हैं, आप नहीं जानते, वे आपके अस्तित्व का अभिन्न अंग हैं, आप इसे महसूस कर सकते हैं, सहज योग के बाद आप इसे महसूस कर सकते हैं, मुझे आपको बताने की ज़रूरत नहीं है। आप उन्हें अपने भीतर महसूस कर सकते हैं, वे आपके भीतर हैं। और फिर कुछ मीठा कहने की मिठास, कुछ मीठा कहने की मिठास इतनी अच्छी है, इतनी लाभकारी है, अपने आप में, इतनी फायदेमंद है।

शक्ति की गति सदैव इसी दिशा में होती है। अगर मैं आप को प्यार देती हूं, तो प्यार मेरे पास वापस आ जाता है। अगर मैं आप को नफरत देती हूं, तो नफरत मेरे पास वापस आ जाती है। और हर चीज को दोगुना कर दें। अगर मैं आपको प्रेम दूं, मान लीजिए एक यूनिट, तो मुझे सात यूनिट प्यार मिल सकता है। लेकिन अगर मैं आप को एक यूनिट की नफरत दूं तो वह भी नफरत की सात इकाइयां तुम्हारे पास आ जाती हैं। गणित पूरा हो गया। 

इसलिए यह समझने की कोशिश करें, कि भावनात्मक रूप से, आपको अपनी भौतिक कल्याण को समझना होगा। अपनी भौतिक कल्याण को भावनात्मक रूप से कैसे व्यक्त करें यह एक बहुत ही प्यारी चीज़ है। मैं आपको गेविन का उदाहरण दूंगी, क्योंकि मैं उस बहुत प्यारी घटना को नहीं भूल सकती। एक दिन हमने कुछ लोगों को बुलाया था, आप देखिए, मुझे नहीं पता था कि उसके घर पर इतने लोग आएंगे। और उसके पास एक घर है लेकिन, मेरा मतलब है, इतना बड़ा नहीं। तो वहाँ लगभग पचास लोग थे। और मैंने उससे कहा, “उनके लिए कुछ भोजन तैयार करो।” लेकिन मैंने सोचा कि पचास लोगों के लिए वह तैयार नहीं हो सकता था, ज़्यादा से ज़्यादा दस लोगों के लिए! इसलिए मैं काफी शर्मिंदा थी, और मैं लोगों के चले जाने का इंतजार कर रही थी। मैंने यह नहीं कहा, “रात के खाने के लिए रुकें,” या कुछ भी, “बेचारा गेविन, उसने पचास लोगों के लिए खाना कैसे बनाया होगा?” और जब वे गायब हो गए, तो लगभग पाँच, छह ही बचे थे। मैंने कहा, “चलो अब खाना खाते हैं!” वह बहुत दुखी था और इधर-उधर देख रहा था। मैंने कहा, “क्या हुआ?” लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। तो मैं उस रात उसके घर में सोई। अगली सुबह मैं उठी – फिर भी वह बहुत बेचैन था। अगले दिन मैंने कहा, “क्या बात है? आपके दिमाग में क्या चल रहा है?” उसने कहा, “माँ, आपने उन सबको चले जाने के लिए क्यों कहा? मैंने उन सभी पचास लोगों के लिए रात का खाना तैयार किया था?” इस बात ने मुझे ऐसे आनंद से भर दिया, जिसकी आप कल्पना नहीं कर सकते! प्रचंड आनंद, प्रचंड आनंद! मेरा मतलब यह है कि मैं ऐसी चीज़ों से उबर नहीं सकती, आप जानिए! 

और मैंने अभी ऐसे बहुत से सहजयोगियों को, बहुत बहुत प्यारे व्यक्तियों को, देखा है। एक और है ग्रेगवार, एक और बहुत प्यारे व्यक्ति, आप जानते हैं, जिस तरह से वह दूसरों के लिए कुछ करते हैं। कभी-कभी वह जिस तरह से काम करते हैं, वह बहुत प्यारा होता है, और वह वास्तव में जानते हैं, कि छोटी, छोटी चीजों में खुद को मधुरता से कैसे व्यक्त किया जाए। यह बहुत आश्चर्य की बात है कि लोग कितने सुंदर हैं, और वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए इन भौतिक चीज़ों का उपयोग कैसे कर रहे हैं।

वस्तुएं केवल भावनाओं के लिए है, आप देखिए। मेरी माँ का एक सिद्धांत था, कि यदि उनके पास छह साड़ियाँ हों, तो वह सातवीं साड़ी दे देंगी। उन्होंने छह रखी थीं। इससे अधिक की जरूरत नहीं, आप देखिए। और वह एक महान सिद्धांतों वाली महिला थीं, मुझे कहना होगा, क्योंकि वह अपनी साड़ियाँ खुद कातती थीं। आप कल्पना कर सकते हैं! और वह खुद भी वही पहनती थी। और वह एक बहुत अमीर आदमी की पत्नी थी, मेरा मतलब है कि उन्हें पैसे की कोई समस्या नहीं थी, लेकिन यह उसका सिद्धांत था, वह ऐसे ही रहती थी। और उन्होंने कहा कि, “क्या? मुझे छह की ज़रूरत है, इससे ज़्यादा मुझे ज़रूरत नहीं है,” क्योंकि यह सूती साड़ियाँ हैं, आप देखिए, इसलिए एक साड़ी आप धोती हैं और दूसरी पहनती हैं, और आप इसे बस प्रेस कर सकती हैं। हमारे घर में ऐसे लोग थे, जो उसके लिए ऐसा कर सकते थे। उसने कहा, “छह से अधिक की कोई आवश्यकता नहीं है।” और एक को वह कुछ अवसरों के लिए अपने पास रखती थीं, आप देखिए, एक महंगी साड़ी अगर उन्हें किसी शादी वगैरह में जाना है, बस इतना ही। इसलिए सातवाँ हिस्सा (देने के लिए) रखा गया और छह में से, अगर उसे एक और मिलता तो वह उसे किसी को दान कर देती। आप देखिए, वह केवल छह तक ही रखती थीं, यह उसका सिद्धांत था, और उन्होंने अपना जीवन बहुत अच्छी तरह से प्रबंधित किया।

और मैं भी कुछ ज्यादा ही उदार व्यक्ति थी, और वह हमेशा मेरी उदारता का समर्थन करती थी, वह हमेशा इसका समर्थन करती थी। और वह बहुत खुश हुई, जब उसे पता चला, कि मैं अपने घर आने वाले लोगों को बहुत सारी चीजें दे देती थी, और वह कहती थी, ‘ओह, यह बहुत अच्छा है, उसे ऐसा करना चाहिए।’ हर कोई कहता था कि, “ऐसा करना चाहिए”। वो हमेशा ऐसे कामों के लिए मुझे प्रोत्साहित करती थीं, जो मैं करती थी।

लेकिन मैंने पाया, कि सभी चीजों का मूल्य केवल तभी है, जब मैं उन्हें (दूसरों को) दे सकती हूं, अन्यथा उनका कोई मूल्य नहीं है। और मैं सिर्फ वही चीज रखती हूं, जो मुझे उपहार स्वरूप दी गई है, बाकी सब मेरे हाथ से बहुत आसानी से निकल कर लोगों में चला जाता है। कोई भी जो कहे, ‘मुझे ये पसंद है।’ ‘ठीक है! ले लीजिए! मुझे बहुत खुशी होती है उनको यह देते हुए और ये वास्तव में बहुत लाभकारी है। अब वह व्यक्ति सोचता है, “मैं आप को (इसके बदले में) क्या लौटाऊँ?” मैंने कहा, “अब कृपया! ऐसा नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि आप पहले से ही जानते हैं, आइए और देखिए, यह घर वस्तुओं से भरा हुआ है, और मुझे नहीं पता कि उनसे कैसे छुटकारा पाया जाए।”

अगर मैं खुद कुछ भी खरीदती हूं, बेशक मैं कुछ भी नहीं कमाती हूं, तो यह मेरे पति के पैसे से होता है, मैं इसे देने की कोशिश करती हूं। यह बहुत अच्छा है, यह सचमुच बहुत अच्छा है। आख़िर घर में इन चीज़ों का क्या काम? आप उनका क्या करेंगे? मैं मेरा मतलब है, यदि आपके पास व्यक्तिगत पुरालेख बनाना चाहते हैं, तो आप रख सकते है! आप देखिए, कुछ इस तरह, यह खरीदी गई चीज़ वहां रख देना, यह खरीदी गई चीज़ वहां रख देना। लेकिन आम तौर पर आप क्या करते हैं? तो इस प्रकार की उदारता हमारे अंदर विकसित करनी होगी। उदारता का सौंदर्यशास्त्र देखना होगा। आप दूसरों को चीजें कैसे देते हैं, और आप अपने भावनात्मक अस्तित्व को कैसे व्यक्त करते हैं।

जो लोग अहंकार उन्मुखता के कारण भावनात्मक रूप से शुष्क हैं, उनके लिए ये बातें सीखना बहुत महत्वपूर्ण है। इससे उन्हें कुछ भावनात्मक पक्ष भी मिलेगा। ये उन लोगों के लिए बहुत जरूरी है, जो अपनी भावनाओं, अपनी खुशी को ज्यादा महसूस नहीं करते हैं। उन्हें ऐसा करने का प्रयास करना चाहिए, तब वे इसे बहुत महसूस करने लगेंगे। तब हमारे भीतर भावनात्मक पक्ष प्रबुद्ध हो जाता है, अनुग्रह भावनात्मक पक्ष तक प्रवाहित होने लगता है। भावनात्मक पक्ष में सबसे पहले शुद्धि होती है। यह बहुत महत्वपूर्ण है।

एक सुंदर भावनात्मक जीवन जीने के लिए, आप के पास पवित्र विचार होने चाहिएं, अन्यथा आप कभी भी भावनात्मक रूप से ठीक नहीं हो सकते। आप देखिए, जैसे एक पेड़ में पत्तियां होनी चाहिए, जड़ होनी चाहिए, फल होने चाहिए, आपको फूलों को उचित स्थान पर होना चाहिये। जैसे आपके घर में आपके पास एक अतिथि कक्ष होना चाहिए, आपके पास एक शयन कक्ष होना चाहिए, आपके पास एक स्नानघर होना चाहिए, सब कुछ अलग अलग। आप उन्हें पूर्ण रूप से नहीं रखते, उसे आप क्या कहते हैं, एक मिक्सर में? ऐसे तो नहीं बनाते हो ना? आप अपना स्नानघर अतिथि कक्ष में तो नहीं रखते। रखते हैं? मेरा मतलब है कि कुछ लोग इसे आरंभ कर सकते हैं, जैसा विक्षेप उनमें है, आज कल के दौर में! लेकिन आम तौर पर आप ऐसा नहीं करते। हमें अपने भावनात्मक जीवन में शुद्ध भाव रखना चाहिए। बहन के प्यार की पवित्रता, भाई के प्यार की पवित्रता, पत्नी के प्यार की पवित्रता। उदाहरण के लिए बेवफाई-  बेवफाई अशुद्धता है। बेवफाई तब आती है जब अशुद्धता होती है। निष्ठा के बिना वैवाहिक जीवन सुखी नहीं हो सकता। यही वैवाहिक जीवन का आधार है। आप देखिए, “मुझे पसंद है” यह “मुझे ये पसंद है” बात कहना अशुद्धता है। आपके अंदर की अशुद्धि इसे पसंद करती है।

धीरे-धीरे, आत्म साक्षात्कार के पश्चात, आप अपने भीतर उस पवित्रता को विकसित करना शुरू कर देते हैं। आप समझने लगते हैं, कि ये आपके भाई-बहन हैं। जैसे ही आपका भावनात्मक जीवन बेहतर होने लगता है आपकी अबोधिता जागने लगती है। आप समझे, यह आपकी अबोधिता से जुड़ा है। बाईं नाडी आपकी अबोधिता से जुड़ी है। और फिर यह खिलना शुरू हो जाती है, और आप सचमुच अबोध हो जाते हैं।

अब व्यावहारिक पक्ष देखें। आप किसी के घर जाते हैं, उस सज्जन की सुंदर पत्नी है। अब अगर पत्नी पर आपकी बुरी नजर है, आप कैसे आनंद ले सकते हैं? आप आनंद नहीं ले सकते, पति आनंद नहीं ले सकता, पत्नी आनंद नहीं ले सकती, हर समय एक डर बना रहता है। हो सकता है पत्नी आपके साथ भाग जाये, या शायद कुछ हो जाये। पूरा घर बर्बाद हो जायेगा, मेरा मतलब है, आप बहुत विध्वंसक हैं! तथाकथित ‘आकर्षक’ पुरुष और ‘आकर्षक’ महिलाएँ बस एक-दूसरे के जीवन को नष्ट कर रहे हैं। वे कहाँ पहुंचते हैं? सभी अनाथालयों में! एक महिला सात बार शादी करती है, एक पति आठ बार शादी करता है। ये सभी बूढ़े अनाथालय (वृद्धाश्रम) में हैं और बच्चे दूसरे अनाथालय में हैं। आप देखिए, आप अपने मन में इस प्रकार की अशुद्धता के द्वारा अनाथालयों का निर्माण कर रहे हैं।

लेकिन मेरे ये बातें बताने से, आप मुझ पर विश्वास नहीं करने वाले हैं, न ही आप ऐसा कर सकते हैं, लेकिन जब ऐसा होता है। किंतु जब ऐसा होता है, जब ये होता है तो अबोधिता, शुद्ध प्रेम का आनंद, जब कोई अन्य अशुद्धता नहीं, बल्कि भाइयों, बहनों के लिए शुद्ध प्रेम होता है। मेरा मतलब है, यहां, मैंने देखा है कि लोग एक दूसरे को, पुरुषों को, गले भी नहीं लगाते हैं। यह सबसे आश्चर्यजनक है, मेरा मतलब है, हमारे लिए यह कुछ ऐसा है, जिसे कोई समझ नहीं सकता। 

हमारे मस्तिष्क में इतनी मलिनता घर कर गई है, कि हर आदमी, क्या वह इसी तरह गलत है? जब हम यहाँ आये, तो मेरे पति हर आदमी को गले लगाते थे। मैंने उससे कहा, “ऐसा मत करिए, लोग आप पर हंसेंगे!” उन्होंने कहा, “सचमुच?” उन्होंने कहा, “लेकिन हर कोई ऐसा नहीं है, शायद एक व्यक्ति।” मैंने कहा,”नहीं, उन्हें लगता है, कि हर कोई ऐसा ही है।” आप देखिए, उन्हें एक व्यक्ति में जो भी रोगी मिला, उन्हें लगता है कि हर कोई वैसा ही है। ये मनोवैज्ञानिक जो एक असामान्य व्यक्ति में पढ़ते हैं, वही सब में देखने की कोशिश करते हैं! हर कोई ऐसा नहीं होता! मेरा मतलब यह है, कि यह समझने में कोई बुराई नहीं है, कि केवल एक प्रतिशत लोग ही रोगजन्य हैं, जो इन मनोवैज्ञानिकों के पास जाते हैं! बाकी जो लोग खराब हुए हैं, वे स्वयं मनोवैज्ञानिकों के कारण हैं! वे विचार देते हैं, “तुम में अपराधबोध है, तुम में अपराध बोध है, तुम में अपराध बोध है।” यदि आपके पास नहीं है, तो भी आपके पास यह होगा! (हंसी) वे आपके दिमाग में विचार डालते जाते हैं। यह सब बौद्धिक विस्तार माना जाता है, चाहे आप इसे कुछ भी कहें, आप देखिए, यह सब बकवास है!

जो व्यक्ति जो पाप नहीं करता है आप कहते हैं, “ओह, उसने पाप किया होगा,” अब उसे नहीं पता कि क्या करना है वह आएगा और कहेगा, “ठीक है बाबा, मैंने पाप किया है, अब मुझे अपराध स्वीकार करना होगा। तो मुझे कबूल करना होगा, हाँ मैंने पाप किया है।” वे (मनोवैज्ञानिक) इसी तरह खेलते रहते हैं। वे बस आपको बनाने की कोशिश करते हैं और यह सब, और फिर वे आपको तोड़ देते हैं, आपको पूरी तरह से चकनाचूर कर देते हैं। और फिर आप सोचते हैं, “ओह, मैं अब तक जीवित लोगों में सब से अधिक पापी व्यक्ति हूं!” यदि आप इतने पापी होते, तो क्या आपको लगता है कि आपको सबसे पहले आत्मसाक्षात्कार मिलेगा? सबसे पहले अपने आप से यह प्रश्न पूछें, “मुझे आत्मसाक्षात्कार कैसे प्राप्त हुआ? मुझे चैतन्य कैसे महसूस हुआ? यदि मैं इतना पापी होता, तो मैं इसे कैसे प्राप्त कर सकता था?” इन मनोवैज्ञानिकों के इन सभी विचारों को फेंक दो, और कह दो कि हम तुम पर विश्वास नहीं करते!

आप देखिए, ऐसे बहुत कम लोग हैं जो वास्तव में मूल रूप से पापी हैं। मैं आपको बताती हूं, बहुत ही दुर्लभ, मैंने अब तक किसी को भी नहीं देखा है, सिवाय इन भयानक गुरुओं के, जो प्रसिद्ध हैं! आख़िरकार ये वो लोग हैं जो राक्षस हैं, वे इंसान नहीं हैं, आप देखिए, तो यह एक अलग श्रेणी है। लेकिन, अन्यथा, मैंने मूल रूप से ऐसा कोई व्यक्ति नहीं देखा है, जिसमें कुछ भी अच्छा न हो। क्योंकि हर किसी के पास आत्मा है। और निश्चित रूप से आत्मा सभी पापों को मिलाकर कहीं अधिक उच्च और अधिक गतिशील है। यहाँ और वहाँ ये छोटे, छोटे पाप क्या हैं? आप क्या कर रहे हो? और इसमें स्वयं को अपराधी महसूस करने वाली कोई बात नहीं है। आख़िरकार आप आत्मसाक्षात्कारी लोग हैं, आप संत हैं। आपका सम्मान किया जाना चाहिए। आपको सबसे पहले खुद का सम्मान करना होगा। आप सभी संत हैं, क्या आपको इसका एहसास है?

एक बार आप को अहसास हो जाता है, कि आप लोग संत हैं, आप संतों जैसा व्यवहार करना आरम्भ कर देते हैं। संत कैसा व्यवहार करते हैं। आप स्वयं को इस समझ के स्तर पर स्थापित कर लेंगे, कि आप वास्तव में संत हैं, अन्यथा आपको चैतन्य नहीं मिलेगा। जाइए और इनमें से किसी से भी पूंछिये! वे आप को बताएंगे। चैतन्य, केवल वे लोग ही प्राप्त करते हैं जो संत हैं। भारत में जब लोग मर जाते हैं, सभी को जलाते हैं, संतो को नहीं, आत्म साक्षात्कारियों को नहीं जलाते उनका सम्मान होता है।

कहा जाता है, कि जब संत आप के घर आते हैं, वो दिन त्योहार का दिन होता है। और आप सभी वो हैं, तो ये न सोचें कि आप ये नहीं कर सकते, और आप में ये दोषी भाव है, और आप में ये बातें हैं। उस तरह का कुछ भी नहीं है! आप शुद्ध आत्मा हैं! इसके बारे में बहुत उदार बनिए! बेशक, मेरा मतलब है, इन चीजों में बहुत अधिक लिप्तता, भावनात्मक जीवन भी, आपको ठहराव की स्थिति में ले जा सकता है। जैसे मैंने लोगों को यह कहते हुए सुना है कि, “हमारे बीच बहुत प्यार है।” लेकिन इसमें भी विवेकशील होना होगा। क्या यह आपको सार्वभौमिक बनाता है या यह आपको स्थानीय बनाता है? आप देखिए, जैसे अंग्रेज़ों के लिए अंग्रेज़, भारतीयों के लिए भारतीय, ख़त्म! यदि वह प्रेम आपको सार्वभौमिक बनाता है, जिसके द्वारा आप दयालु बातें कहते हैं, जिसके द्वारा आप अन्य लोगों के प्रेम, उनके चैतन्य का आनंद लेते हैं। वे चाहे किसी भी पंथ, नस्ल के हों, दुनिया के किसी भी हिस्से से हों, वे सहज योगी हैं, यदि आप उनका आनंद लेने लगें, तो जान लें कि वह प्रेम है। यह इसे किसी भी तरह से स्थानीयकृत नहीं किया जाना चाहिए। यदि कोई समूह बन रहा है, तो जान लें कि यह प्रेम नहीं है, यह दिव्यता नहीं है, यह दिव्यता नहीं है। दिव्यता सार्वभौमिक है, यह हर चीज़ को, हर चीज़ को अपने में समाहित कर लेती है। इसमें किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं है। यह केवल बुरे और अच्छे, अधर्मी और धर्मी, मसीह और मसीह-विरोधी, ईश्वर और ईश्वर-विरोधी के बीच भेदभाव करता है। लेकिन यह इन तीन स्तरों यानी शारीरिक रूप, मानसिक दृष्टिकोण या मानसिक विकास या भावनात्मक अभिव्यक्ति पर भेदभाव नहीं करता है।

कुछ लोग भावनात्मक रूप से बहुत अभिव्यंजक होते हैं। मैं कहूंगी कि अंग्रेज स्वभाव से शायद कम अभिव्यंजक हैं, यही उन का स्वभाव है। भारतीय बेहद अभिव्यंजक हैं। यदि आप भारत में, किसी गाँव में, मान लीजिए, आप राहुरी (महाराष्ट्र) में जाते हैं, तो वे आपको बस अपने आलिंगन में ले लेंगे और रोना और खुशी से चिल्लाना शुरू कर देंगे। मेरा मतलब है, आप आश्चर्यचकित होंगे कि वे आपसे कितना प्यार करेंगे, मेरा मतलब है, कल्पना करें! और उनके लिए यह ऐसा होगा, भले ही उन्हें आपके सुचारू रूप से चलने के लिए खुद को जमीन पर फैलाना पड़े, उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी, ताकि आपको भारत की भयानक सड़कों का अहसास न हो। उस तरह की जबरदस्त भावनाएं, अभिव्यक्ति आप हैरान रह जाएंगे। आप अभिभूत हो जाएंगे, और कभी-कभी चौंक भी जाएंगे, आप जानते हैं, वे किस तरह से हैं। 

लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि अंग्रेज प्रेम नहीं करते। वे अपने तरीके से प्यार करते हैं। वे इसे समझते हैं। तो ऐसा ही ये होना चाहिए, सभी  रंग, सभी प्रकार, सभी क्रमपरिवर्तन, संयोजन को, सभी को गले लगाने वाला। क्योंकि यह विविधता भगवान ने सुंदरता पैदा करने के लिए बनाई है, और सभी किस्मों को स्वीकार किया जाना चाहिए। कल्पना कीजिए कि आप सभी एक जैसे दिख रहे हैं, यह कैसा दिखेगा? भयानक और उबाऊ! हर पत्ता अलग है, फिर इंसानों का क्या? लेकिन उस अंतर में आत्मा की एकता है, और यदि आप उस एकता को महसूस कर सकते हैं, तो आप भावनात्मक रूप से बिल्कुल सही हैं, और आप एक आत्म साक्षात्कारी हैं।

और सबसे आखिर में, सब से महत्वपूर्ण आप की आत्मा है, आत्मा जो आप के हृदय में वास करती है। यह सारी सुंदरता तभी महसूस होती है, जब आपकी आत्मा में प्रकाश होता है, अन्यथा आप इस सारी सुंदरता को नहीं देख सकते। आप इसका आनंद नहीं ले सकते। आत्मा वह हीरा है जो आपके शरीर, मन और आपकी भावनाओं की इस खूबसूरत अंगूठी पर चमकता है। यह सबसे महत्वपूर्ण बात है। इसे हासिल करना है, पूरी तरह से अपने अस्तित्व में लीन होना है।वह अवस्था आप सभी को प्राप्त होनी चाहिए। 

लेकिन विकास, अगर बाहर ठीक नहीं है, तो अंदर का विकास उस कमज़ोर बाहरी व्यक्ति द्वारा नहीं किया जा सकता है। यह इतनी मजबूत चीज़ है, कि आध्यात्मिक जीवन बहुत मजबूत चीज़ है। यह बहुत गतिशील है, यह बहुत शक्तिशाली है। कभी-कभी, आप जानते हैं, यह मुझ पर पूरी तरह से हावी हो जाता है। मेरा मतलब है, मुझे खुद पर नियंत्रण रखना होगा। प्यार बस अस्तित्व से फूट पड़ता है, और बस मैं इसे देना चाहती हूं, लेकिन मैं सोचती हूं, कि क्या आप इसे सहन कर पाएंगे, इसलिए मुझे इसे थोड़ा नियंत्रित करना होगा, क्योंकि वह बाढ़ सहन नहीं की जा सकती है।

तो आप को अपने बाह्य को समृद्ध करना होगा, अपने आंतरिक सौंदर्य को सहन करने के लिए। और जितना अधिक आप इसे समृद्ध करेंगे, जितना अधिक आप इसे मजबूत बनाएंगे, उतना ही यह चमकेगा। यह एक साथ इसलिए है, क्योंकि व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि आत्मा प्रेम है, सारी बुद्धिमत्ता है, सारी जागरूकता है, और वह आपकी समस्या को जानती है। यह धीरे-धीरे चमकती है। यह (आत्मा) देखती है कि आप कितनी दूर तक सहन कर सकते हैं, कितनी दूर तक जा सकते हैं। 

फिर आत्म साक्षात्कार के उपरांत जब आप अपने बाह्य का ध्यान रखना शुरू करते हैं, तो अंतर अपने आप चमकने लगता है। लेकिन चित्त अपनी आत्मा की ओर होना चाहिए। ये सभी बाहरी गुण आत्मा को इतना आनंद देने वाले हैं, आप कल्पना नहीं कर सकते। उन्हें आजमाइए! आप स्वयं आनंद उठाएंगे। हम स्वयं का ज्यादा आनंद नहीं ले पाए हैं। अगर हम ऐसा कर सकते तो हम जेलों से भी नहीं बचते, मेरा मतलब है कि मैं एक जेल में भी खुश रहूंगी, मैं आप को बताऊं, क्योंकि मैं वहां स्वयं में बेहतर आनंद ले सकती हूं! लेकिन एक बात है, जब आप इसे दूसरों के साथ साझा नहीं कर सकते तो आप खुद का इतना आनंद नहीं ले सकते, है न? वैसा ही हो जाता है। बिना साझा किये आप अपना आनंद नहीं उठा सकते। और यही सभी सहज योगियों के साथ होना चाहिए। उस स्तर पर आपको आना चाहिए। हमें उस स्तर पर होना चाहिए। अपना स्तर ऊंचा रखने का प्रयास करें, यह महत्वपूर्ण है। 

कभी-कभी आप नीचे आ जाते हैं, दूसरों की आलोचना करने लगते हैं। दूसरे भी सही नहीं हैं, उदाहरण के लिए, कोई किसी को गंदा, गंदा, ऐसा कुछ देखता है। जो व्यक्ति गंदा है, गन्दा है, निःसंदेह उस व्यक्ति के साथ कुछ गड़बड़ है, इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन उस व्यक्ति पर दया की जानी चाहिए। कम से कम उसे तो साफ़-सुथरा रहना चाहिए। मेरा मतलब है, यह न्यूनतम से न्यूनतम है। लेकिन इसके बजाय, अगर आप उस व्यक्ति की आलोचना करना शुरू कर देते हैं, तो आप अपनी भाषा में भी गंदे हो जाते हैं, अपने दिमाग में और हर चीज में गंदे हो जाते हैं। तो ऐसा करना ही क्यों है? इसे छोड़िए! उस व्यक्ति को अपने आप सुधरने दो, उसे देखना होगा कि वह साफ-सुथरा रहे, स्वच्छ रहे, समझदार होना होगा। यह उस व्यक्ति को स्वयं देखना है, आपको नहीं। 

आपका चित्त कहाँ है? भारत में यह एक आदत है, सभी माता-पिता बच्चों को खड़े देखते है और   पूछते हैं, “तुम्हारा चित्त कहाँ है?” “मेरा चित्त कहाँ है?” ठीक है। फिर वह वहीं खड़ा है, “तुम्हारा चित्त कहाँ है?” वह फिर से निगरानी में रहेगा, “मेरा चित्त कहाँ है?” हमें अपना चित्त का ध्यान रखना है, बस इतना ही। “मेरा चित्त कहाँ है? क्या यह आत्मा पर है?”

अगली बार में आत्मा के विषय पर ज्यादा बताऊंगी। मुझे आशा है आप समझ गए होंगे, कि अपना आंतरिक अस्तित्व का विकास करना कितना आवश्यक है। अपने मानसिक अस्तित्व में अहंकारी स्वभाव पर बहुत अधिक नियंत्रण रखना होगा।

मैंने ऐसे लोग देखे हैं जो बाएं से दाएं चले जाते हैं, और अहंकारी बन जाते हैं। जो दाएं से बाएं और चले जाते हैं, वो भयभीत रहते हैं। इन सभी पार्श्व गतिविधियों को केंद्र में लाना होगा। 

आपको यह समझना होगा, कि बुनियादी बातों से हमें ऊपर उठना है। लोगों के पास हर चीज़ के लिए स्पष्टीकरण है! किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं है। किसको समझा रहे हो? आप अपने आप को समझा रहे हैं। आप अपने आप को आंक रहे हैं। आप को स्वयं को आंकना है! आप किसे समझा रहे है? माताजी को? उन्हे किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं है। मैं, शायद, सब कुछ जानती हूँ, शायद। लेकिन मैं आपकी किसी भी तरह से निंदा नहीं करती हूं। मैं नहीं चाहती, कि किसी भी तरह आपकी निंदा हो, मैं क्यों ऐसा चाहूं? आख़िरकार आप सभी संत हैं। मेरे लिए यह सबसे बड़ी संतुष्टि है। लेकिन आपके विकास के लिए, मैं चाहती हूं कि आप समझें कि आप संत हैं, और आपको उस बिंदु तक आना होगा। संतों को आत्म – अनुशासित रहना होगा। किसी को उन्हे बताना नहीं होगा, अपने आप को अनुशासित करें। अपने आप से कहें, “मैं अब एक संत हूं।” यह बढ़ने का कितना अच्छा अवसर है! क्या अवसर है! और लोग आप पर तभी विश्वास करेंगे, जब आप वास्तव में भीतर से संत होंगे, और बाहर से भी संत होंगे।

सहज योग में लोग आसानी से अंदर से संत बन जाते हैं, और बाहर से संत नहीं बनते। लेकिन अन्य प्रणालियों में उन्हें पहले बाहर से बनाया जाता है। आप देखिए, उन्हें पच्चीस वर्षों तक केवल मंदिर की धुलाई के काम में लगाया जाता है खत्म! फिर उनसे अगले पच्चीस साल तक कुछ और कराया जाता है। जब वे मरने के करीब होंगे, तब वे कहेंगे, “ठीक है, अगली बार हम तुम्हें आत्मसाक्षात्कार देंगे।” ऐसा होता है! लेकिन यहां, अंदर से आपने वास्तव में अपना बोध प्राप्त कर लिया है, इसमें कोई संदेह नहीं है, और आपके पास सुधार की अधिक संभावनाएं हैं। मैंने यही सोचा था, “इस जीवनकाल में मैं अपने पास आने वाले सभी लोगों को आत्मसाक्षात्कार दूंगी” – देखते हैं।” और आप मेरे साहसिक कदम के साथ पूरा न्याय करेंगे, क्योंकि अब आपको यह मिल गया है। यह बहुत तेजी से काम करेगा। इसे कार्यान्वित करना होगा। यह एकमात्र तरीका था जिससे यह तेजी से काम कर सकता था, बजाय इस के कि आपको सबसे पहले, हर दिन खुद को धोना होगा, चार बजे उठो और अपने को मिलिट्री वालों जैसा बनाओ। मैंने कहा, “नहीं, चलो इस तरह से प्रयास करें।” और यह हो गया, यह हो रहा है, यह बहुत सरल है।

तब आत्म-अनुशासन अवश्य आरंभ होना चाहिए। और आपको अपनी रोशनी, जो अभी-अभी जली है, को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए, इसे एक सुंदर प्रकाश, स्वच्छ प्रकाश और उदार, प्रकाश देने वाला, प्रेम का प्रकाश बनाने के लिए। मुझे यकीन है कि यह काम करेगा। 

अपने मानक ऊंचे रखिए! नीचे मत गिरिए! अपना ध्यान उचित दिशा में लगाएं। जैसा कि आप जानते हैं, यह सब भविष्यवाणी हो चुकी है। ब्लेक ने इसकी भविष्यवाणी की है। जितना अधिक मैंने किताब पढ़ी, उतना ही अधिक मुझे विश्वास हो गया, कि इंग्लैंड येरुशलम बनने जा रहा है। अब इसके बारे में सोचिए! किसी भी तरह की सुस्ती की अनुमति नहीं है। जबकि मुझे लगता है, कि आस्ट्रेलियाई बहुत तेजी से आगे आ रहे हैं। आपको ब्लेक की भविष्यवाणी को साबित करना होगा।

परमात्मा आप को आशिर्वादित करें! आप सभी को!

कूली, क्या आप कृपया मुझे थोड़ा पानी दे सकते हैं? बच्चों को देखो!!

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! 

गेविन, क्या आप किसी भी समय, तीन दिनों के लिए एक सेमिनार की व्यवस्था कर सकते हैं, तो मैं अपना भारत जाना स्थगित सकती हूँ, चूँकि कभी कभी मैं सेमिनार करना चाहूंगी।

गेविन: हमें  सुसैक्स में जगह मिल सकती है, मुझे लगता है कि यह बारहवीं है, नहीं ग्यारहवीं से तेरहवीं तक, यह सप्ताह के मध्य का समय है। हमारे पास लगभग पैंतालीस से पचास लोग हो सकते हैं।

श्री माताजी: हमारे पास और भी हैं। मैं इसे कहीं शनिवार, रविवार को रखना चाहूंगी।

गेविन: हम कहीं न कहीं ढूंढ सकते हैं, लेकिन सप्ताहांत के लिए इन स्थानों का मिलना मुश्किल है। हम अभी भी प्रयास कर रहे हैं।

श्री माताजी: मुझे लगता है, किसी भी जगह, जैसे ब्राइटन या कुछ और, आपको यह मिल सकता है, या या नाव किराए पर क्यों नहीं लेते? क्या यह अच्छा विचार नहीं है?

गेविन: हम देखते हैं कि हम क्या कर सकते हैं।

श्री माताजी: क्या यह एक अच्छा विचार नहीं है? दरअसल मैं एक जहाज़ की तलाश में थी। यदि शिपिंग कॉर्पोरेशन के जहाजों में से एक आ गया हो, मैंने सोचा कि हम जाएंगे और एक जहाज में रहेंगे, यह एक अच्छा विचार होगा, क्योंकि यह हमेशा लगभग तीन चार दिनों के लिए वहां होता है। लेकिन इस महीने कोई जहाज नहीं आ रहा है, अन्यथा हम यह कर सकते थे। आप दो दिनों के लिए एक नाव किराए पर ले सकते हैं, एक बड़ी नाव जिसमें हम सभी शनिवार, रविवार को रह सकते हैं। हमें वहां होना चाहिए, यह महत्वपूर्ण है।’ जाने से पहले मैं कुछ पेंच ठीक करना चाहूंगी।

मेरा मतलब है, यदि आप चाहें तो आप इसे थेम्स नदी पर आयोजित कर सकते हैं, या ब्राइटन, क्या आपके पास नावें या सामान हैं? नहीं? जरा पता करिए! तो इसका समाधान किया जा सके, और फिर मैं तदनुसार अपने जाने की व्यवस्था करूंगी। अगर ऐसा कोई कार्यक्रम होगा, तो मैं उसे स्थगित कर दूंगी। लेकिन मैं जितनी जल्दी संभव हो जानना चाहूंगी।

जैसा कि मैंने आपको पहले बताया है, कि सहज योग की कोई तकनीक नहीं है। यह एक स्वतःस्फूर्त घटना है, जो घटित होती है। अब फूल फल बन जाता है, इसकी कोई तकनीक नहीं है, लेकिन कार्य करने के लिए सूरज को आना पड़ता है, आप देखिए, और वह तकनीक हमारी समझ से परे है। इसी प्रकार ये होता है – सिर्फ परिवर्तन। लेकिन बाद में आपको पता होना चाहिए कि इसे कैसे संवारना है और कैसे बनाए रखना है, बस इतना ही। एक बार इसका प्रबंधन हो जाए, इसे कार्यान्वित किया जा सकता है। बहुत से लोगों ने ऐसा किया है, और आपको भी ऐसा करने में सक्षम होना चाहिए। लेकिन कोशिश करें कि दूसरों को न देखें। पहले अपने आप को देखिये। यह बहुत महत्वपूर्ण है। वह बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यदि आप अपने हाथ मेरी ओर ऐसे ही रख सकें, और अपनी आंखें बंद कर सकें, तो बस अपनी आंखें बंद कर लीजिए! 

यदि आपके हाथ कांप रहे हैं या आपका शरीर कांप रहा है या आपकी आंखें फड़क रही हैं, मेरा मतलब पलकें हैं, तो आप अपनी आंखें खोलें और बस मुझे देखें, बस मेरे माथे को देखें।

क्या आप किसी गुरु या किसी अन्य के पास गये हैं? कोई भी नहीं? आप क्या काम करते हैं?

साधक: मैं एक क्लर्क हूँ!

श्री माताजी: आह, ये बात है! आह, दाहिना भाग बहुत अधिक उपयोग किया गया है। इस पर काम करना चाहिए। क्या आप कांप भी रहे हैं? नहीं? आप को ठंडी हवा आ रही है? यह बहुत अच्छा है। आप को आ रही है? अभी नहीं? किसी भी उंगली में नहीं? कौन सी? क्या आप किसी गुरु या किसी अन्य के पास गए थे? क्या आप गए थे उसके पास? किसी गुरु के या अन्य के? अध्यात्मवादी या किसी अन्य के पास? नहीं?

क्या आप को ठंडी हवा आ रही है? बढ़िया! दोनों पैरों को सीधा रखें! विश्राम करें! आप को मिल रहा है? बढ़िया! अपनी आँखें बंद करिए और आनंद लीजिए!

अब बेहतर है। बस ऐसा ही करिए! यह दाहिनी ओर अधिक है, एक समस्या है। ऐसा इसलिए है क्योंकि बहुत अधिक सोचना, सोचना, सोचना! इसलिए असंतुलन…बहुत अधिक सोचने से भी असंतुलन मिलता है, आप देखिए। हर समय आप सोच रहे हैं, सोच रहे हैं, सोच रहे हैं। इससे आपको परेशानी होती है। इसे काम करना चाहिए।

देखिए, अपना बायाँ हाथ पेट पर, बीच में, हाँ रखिए। अब अपना दाहिना हाथ मेरी ओर इस प्रकार रखो। अब कांपना कम होगा। इसे वहां रखिए ताकि आपको आराम मिले। यह धीरे-धीरे कम हो जाएगा। 

आप ने देखा? यह और कुछ नहीं, बल्कि अंदर की घबराहट है, जिसे बाहर निकलना ही है। आप देख रहे हैं, कि सोचने से तंत्रिकाओं को बहुत अधिक यातना मिली है। (हँसना)

अब यह बेहतर है, आराम मिल रहा है। बहुत बेहतर, देखा? इस में आराम आ जाएगा। शान्ति आयेगी।

ऐना, मैं बायीं ओर कुछ नये लोगों को देख रही हूँ। जरा देखिए, यदि वे पार लोग है, वे सभी। जरा इनमें से कुछ लोगों को देखिए जो वहां मौजूद हैं। हाँ, जरा देखिए! क्या आप को वहां ठंडी हवा आई? क्या आपके हाथ में ठंडी हवा है? क्या कहा आपने? आपको आ गई?

साधक: हाँ!

श्री माताजी: बढ़िया! बढ़िया!

क्या वे ब्राइटन से हैं? क्या आप ब्राइटन से आये हैं? नहीं! बढ़िया! जेसन, जरा देखिए तो क्या उन्हें सिर पर भी ठंडी हवा आ रही है। इस तरफ, क्या नये लोग हैं? आप को ठंडी हवा आई?

साधक: कहा नहीं जा सकता!

श्री माताजी: ठीक है, यह इतना आता है कि आप इसके बारे में आश्वस्त हो जायेंगे, ठीक है? बस इस पर काम करिए! आप कार्यान्वित कर सकते हैं!

वहाँ भी! पीटर, आप के सामने वहां, जरा देखिए कोई है। पीछे कोई बैठा है क्या? वह पहली बार आया है?

आप कैसी हैं, एना? बेहतर?

उसे यह प्राप्त हो गया है। अब बेहतर? यह बेहतर है। अभी तक वहीँ? कम, लेकिन बहुत कम। बस ऐसे ही करिए! बस इसे फेंक दीजिए! इसे बाहर जाना होगा। अब, आइए देखिए! जरा कल्पना कीजिए! इसे फिर से फेंक दीजिए, यह भयानक है।

वहाँ कौन है? आप बस उसे बाएँ से दाएँ, उसके लिए बाएँ से दाएँ करें! रूथ आइए, बाएँ से दाएँ ओर रखिए, हां, वे ऐसा करेंगे। आप अपना दाहिना हाथ रखिए, हाँ।

क्या अब आप बेहतर हैं? क्या आपको कोई ठंडी हवा महसूस हो रही है?

आपने क्लर्क के रूप में कितने वर्षों तक काम किया है?

क्लर्क: बारह!

श्री माताजी: (हँसते हुए) उसकी विशुद्धि और मध्य हृदय का ख्याल रखें। वो बिल्कुल ठीक हो जायेगा। हाँ! विशुद्धि और मध्य हृदय!

बहुत बढ़िया, वे बहुत बढ़िया लोग हैं। ठीक है, क्या वह ठीक है? क्या? अपना बायाँ हाथ यहाँ रखिए। ठीक है? थोड़ा सा और दोनों पैरों को जमीन पर ऐसे सीधा रखें तो बेहतर होगा। इस प्रकार, दोनो पैर। हां, चलो देखते हैं। 

वह बिलकुल ठीक है, मुझे लगता है, उसे यह प्राप्त हो गया है। वह बिल्कुल ठीक हैं।

इस सज्जन का कैसा है? बाएँ से दाएँ। यह अच्छा है कि आप मुझसे मिलने आये। वास्तव में, क्योंकि आप जानते हैं, आपके दिमाग पर इस तरह के जबरदस्त दबाव के साथ, कुछ भी हो सकता था। यह अभी भी वहां है। वो रहेगा।

आप देखिए, इसी तरह से लोगों को ये सारी परेशानियाँ हो जाती हैं, जैसे मधुमेह। फिर भी अगर वे उसकी नहीं सुनते, तो उन्हें हृदय की समस्या हो सकती है। फिर आपको बाईं ओर अन्य समस्याएं मिलती हैं, आप देखिए। यहां तक ​​कि इसके कारण लकवा भी हो सकता है। इस तरह काम करना, इसके बारे में चिंता करना बहुत बुरी बात है।

क्या आप ठीक हैं? ये कार्यान्वित हो जाएगा।  क्या बात है, जॉन?

जॉन वटकिंसन: नाभि।

श्री माताजी: नाभि? नाभि! अपने बाएँ हाथ को पेट पर रखें। पेट, हाँ! उनकी क्या स्तिथि है?

योगिनी: बाईं नाभि।

श्री माताजी: क्या आप विवाहित हैं?

साधक: नहीं।

श्री माताजी: आप विवाह नहीं करना चाहते?

साधक: मैं एक विधुर हूँ। 

श्री माताजी: ये कब की बात है?

साधक: लगभग आठ वर्ष पहले।