Shri Yogeshwara Puja

Chelsham Road Ashram, London (England)

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(परम पूज्य श्रीमाताजी, श्रीकृष्ण पूजा, चेल्शम रोड, लंदन, 15 अगस्त, 1982)

एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि वह योगेश्वर हैं और जो बात हमें समझनी है वह यह है कि जब तक आप योगेश्वर के मार्ग का अनुसरण नहीं करते तब तक स्वयं को पूर्णतया स्थापित नहीं कर सकते हैं। श्रीकृष्ण ने कहा सर्वधर्माणां परितज्य मामेकम् शरणम् व्रज। अपने सभी संबंधियों व संबंधों जैसे अपने भाई, पत्नी, बहनों …. को छोड़कर केवल मुझ एक कृष्ण को भज … देखिये ये सब धर्म हैं जैसे स्त्रीधर्म ….
अर्थात एक स्त्री का धर्म क्या है। इसी प्रकार से हम कह सकते हैं राष्ट्रधर्म। आज भारत की स्वतंत्रता का भी दिन है। तो हमारा राष्ट्रधर्म भी है …. हम देशभक्त लोग हैं। अपने देश के लिये प्रेम होना ही राष्ट्रधर्म है। इसके बाद समाजधर्म आता है … अर्थात समाज के प्रति आपका कर्तव्य। इसके बाद पति धर्म इसका अर्थ है पति का पत्नी के प्रति कर्तव्य, पत्नी का पति के प्रति कर्तव्य। सभी के
कर्तव्य धर्म कहलाते हैं। लेकिन उन्होंने कहा इन सभी धर्मों को छोड़कर … अपने कर्तव्यों को छोड़कर पूर्णतया मुझको समर्पित हो जाओ … सर्वधर्माणां परितज्य मामेकम् शरणम् व्रज।
चूंकि अब आप सामूहिक व्यक्तित्व बन गये हैं … आपका उनके साथ ऐक्य हो गया है … और वही आपके धर्मों की …. कर्तव्यों की रक्षा कर रहे हैं। वहीं उनकी ओर दृष्टि किये हुये हैं … वही उनको शुद्ध कर रहे हैं अतः आपको स्वयं को उनको पूर्णतया समर्पित कर देना चाहिये। उन्होंने उस समय ये बात केवल अर्जुन को बताई अन्य किसी को नहीं … क्योंकि उस समय के लोगों में इस बात को ग्रहण करने की योग्यता ही
नहीं थी या फिर उन्होंने अन्य लोगों से यह बात बताना उचित नहीं समझा। लेकिन मैं इस बात को आप लोगों को बताना बिल्कुल उचित समझती हूं। इसलिये मैं कहती हूं कि अन्य सभी कर्तव्यों को छोड़कर अपनी सामूहिकता का कर्तव्य निभाइये।
लेकिन वह योगेश्वर हैं यही एक मुख्य बिंदु है। उनके प्रति अपना कर्तव्य निभाने के लिये सबसे पहले आपके अंदर योगेश्वर जैसी पावनता होनी चाहिये। उनको उच्चावस्था की आवश्यकता नहीं थी वह उन्नत ही थे। वह उच्चावस्था के स्त्रोत थे। उन्हें मनुष्य की क्षुद्रता से उच्चावस्था प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं थी। उन्हें स्वयं को माया से उन्नत बनाने के लिये कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं
थी। विशेषकर पश्चिम में हमने अपने लिये नर्क की व्यवस्था कर ली है … एक वास्तविक नर्क की….. उनके अंदर सभी प्रकार के वीभत्स विचार हैं। योगेश्वर के लिये ये कुछ भी नहीं बल्कि माया है … पूर्णतया कीचड़। वे इस बात को कभी समझ ही नहीं सकते कि इस प्रकार की वीभत्स बातें किस प्रकार से संभव हो सकती हैं। उनके लिये ये बाते आघात पंहुचाने वाली हैं।
उनके जन्मदिन के अवसर पर मैं बताना चाहती हूं कि अगर आज उनको जन्म लेना पड़ता तो वह तुरंत ही वापस चले जाते। वो कहते नहीं …. नहीं मुझे इनसे कुछ भी लेना देना नहीं है … बहुत हुआ। और अगर उन्हें पश्चिमी संस्कृति के लोगों से मिलना पड़ता तो संभवतया उन्हें गहरा आघात पंहुचता। वो कहते अरे भगवान ….नहीं…. नहीं मैं यहां नहीं आना चाहता। जिस समय उन्होंने जन्म लिया था उस समय भी धर्म नहीं था
पर फिर भी उस समय ऐसे लोग थे जो सही और गलत में भेद कर सकते थे और आज जैसी बेसिर पैर की चीजें तो उस समय थी ही नहीं। वह योगेश्वर के रूप में आये एक शुद्ध एव पावन व्यक्ति के रूप में।
अतः इस सबका नैतिक आधार यह है कि आपके आदर्श श्रीकृष्ण हैं न कि आप…. लोगों के आदर्श हैं। यही सबसे बड़ी गलती सहजयोगी करते हैं। वे समझते हैं कि वे ही अब श्रीकृष्ण बन गये हैं या कोई अन्य महान व्यक्तित्व बन गये हैं और उनके अंदर किसी आदर्श को ही उन्होंने आत्मसात् कर लिया है। लेकिन ऐसा नहीं है। यही चीज हमें समझनी है कि आपको श्रीकृष्ण जैसे आदर्श तक पंहुचना है। आपकी निगाहें और शरीर
की प्रत्येक गति इसी आदर्श की ओर होनी चाहिये। लेकिन इससे पहले यदि आप किसी प्रकार की विकृतियों और बेहूदा अश्लील बातों में पड़े तो समझ लीजिये कि आप बुरी तरह से पतन की ओर जा रहे हैं और आपके ऊपर कोई बाधा कार्य कर करही है। वे एक आदर्श हैं …. वे सब अवतरण हैं। आप अवतरण नहीं हैं …. और न ही आप अवतरण बन सकते हैं। लेकिन वे तो प्रकाश हैं और जिस मार्ग पर आप चल रहे हैं वे उस मार्ग को प्रकाशित
करते हैं। वे आपको उस क्षेत्र में ले जा रहे हैं जहां के वे राजा हैं और भगवान भी हैं।