1st Day of Navaratri: Innocence and Virginity

Temple of All Faiths, Hampstead (England)

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                नवरात्रि पूजा, “अबोधिता और कौमार्य”

सभी आस्थाओं का मंदिर, हैम्पस्टेड, लंदन (इंग्लैंड)

17 अक्टूबर 1982

 आज, यह बहुत अच्छी बात है कि हम इंग्लैंड में वर्जिन (कुँवारी) की पूजा मना रहे हैं। जैसा कि आप जानते हैं, सहज योग के अनुसार, इंग्लैंड हृदय है जहां शिव की आत्मा निवास करती है। और यह कि वर्जिन (कौमार्य) को उच्च मान्यता और सम्मान किया जाना चाहिए और इंग्लैंड में पूजा की जानी चाहिए, मुझे लगता है कि सभी सहज योगियों के लिए यह एक बड़ा सम्मान है।

अब किसी को यह सोचना होगा कि कुँवारी को इतना महत्व क्यों दिया जाता है। क्यों एक कुँवारी का उस हद तक सम्मान किया जाता है। कुँवारी की शक्तियां क्या हैं?

कि वह उस महिमा के एक बच्चे को गर्भ में धारण कर सकती है जो कि ईसा-मसीह थे, कि वह अपने शरीर से श्री गणेश को बना सके, कि वह अपने बच्चों की अबोध, गतिशील शक्ति की रक्षा कर सके जो निरहंकारी हैं, जो नहीं जानते कि अहंकार क्या है। तो यह महान बल और शक्ति उस शख्सियत में निवास करती है जिसके पास बहुत सारे “गुरु पुण्य” [गुरु गुण] हैं, जिन्होंने पिछले जन्मों में बहुत सारे अच्छे काम किए हैं, जिन्होंने हमेशा यह समझा है कि कौमार्य किसी भी अन्य शक्ति की तुलना में ऊँची शक्ति है और जो कौमार्य और शुद्धता की उसके सभी प्रयासों और देखभाल के साथ रक्षा करेगी। जैसा कि आप जानते हैं कि हमारे शरीर के भीतर उसे कुंडलिनी के रूप में रखा गया है, जिसका अर्थ है कि वह कुँवारी है। वह अछूती है, आत्मा बनने की इच्छा निष्कलंक “निर्मल” है। उसमे कोई दोष नहीं है, उसकी प्रतीक्षा शुद्ध है। परमात्मा के साथ एकाकार होने के अलावा और कोई इच्छा नहीं है। अन्य सभी इच्छाएं समाप्त हो जाती हैं।

मेरे लिए पश्चिमी देश में इस विषय पर बात करना बहुत कठिन है। यह लज्जाजनक है। मैं नहीं चाहती कि आप में से कोई भी, चाहे पुरुष हो या महिला, अपने मन में कोई अपराध बोध पैदा करे। क्योंकि यह एक चीज सबसे बड़ा दोष है जैसा कि आप जानते हैं, बाद में यह अपराध बोध विपरीत दिशा में काम करता है। यह किसी काम का नहीं है। लेकिन जब हम समझते हैं कि हमें ये समस्याएं हैं, तो हमें इसके बारे में विनम्र होना होगा। दोषी नहीं बल्कि विनम्र।

यदि आप इसके बारे में विनम्र नहीं हैं, बल्कि सहज योग से आपको क्या मिला है, इसकी मांग करने के लिए आक्रामक हैं और हर समय इसके बारे में शिकायती हैं, जबकि यह नहीं देखते कि आपके अपने पुण्य क्या हैं, तो आप किस लायक हैं? हर दोष के बावजूद तुम्हारी कुण्डलिनी उठाई गई है। आप यह जानते हैं। तुम सौभाग्यशाली हो। इसलिए शिकायत करने या आक्रामक होने के बजाय, आपको पता होना चाहिए कि यह आपके उपर एक महान ‘एहसान’ है। सबसे बड़ा उपकार; कि तुम्हे पूरी तरह से क्षमा कर दिया गया है, कि यह महान आशीर्वाद तुम्हें दिया गया है। और उस अवस्था तक पहुंचने के लिए आपको कड़ी मेहनत करनी होगी। इसके बारे में दोषी महसूस करने के बजाय विनम्र होना चाहिए, आभारी होना चाहिए। कि हमने जो भी किया है, खुद के साथ पूरी तरह से खेला उसके बावजूद।- आज भी हम भगवान के देव के रूप में बैठे हैं। “सोमरस” [देवताओं का पेय] जो कि “चरण अमृत” [कमल के पैर अमृत] है, वह पानी है जो माँ के चरण को धोता है, केवल आप ही को इसे पीने की अनुमति है, केवल देवों को। आप उस श्रेणी में बैठे हैं, और कैसे आप मांगे करने वाले हो सकते हैं?

आपको खुद को विनम्र करना होगा। अपने अतीत को देखकर,  हमने जो भी गलतियाँ की हैं, उसमें मैं आपके साथ हूँ, ताकि आप दोषी महसूस ना करें। जैसा कि मैंने तुमसे कहा था, यह बहुत लज्जाजनक है, लेकिन कृपया स्वयं का सामना करने का प्रयास करें। हम जैसे हैं वैसे ही हमें खुद का सामना करना होगा।

भारतीयों का लाभ यह है कि कुंडलिनी वहां मौजूद है। इसलिए भारतीय जो कुछ भी करें, वे हमेशा जानते हैं कि यह गलत है। उनके लिए पुण्य पुण्य है, चाहे वे गुणी न हों। सत्यधर्मिता धार्मिकता है, चाहे वे न हों। वे जानते हैं, हर समय वे इस बात से अवगत रहते हैं कि वे गलत कर रहे हैं। वे ऐसा नहीं कहते कि: “इसमें क्या गलत है?” न ही वे ऐसी बातों का प्रस्ताव करते हैं जो स्पष्ट रूप से गलत हैं और कौमार्य के खिलाफ, उदात्तता के खिलाफ, देवत्व के खिलाफ हैं। शैतानी बातें, वे कभी यह घोषणा नहीं करते कि यह परमेश्वर है। वे पाखंडी हैं, ठीक है; लेकिन वे हर समय जानते हैं कि ये चीजें गलत हैं। पूरा समाज ऐसा ही है। क्योंकि कुंडलिनी वहीं रहती है।

जब हम अपनी मासूमियत और कौमार्य खो देते हैं, तो हमारे साथ पहली बात यह होती है कि हम अहंकार-उन्मुख हो जाते हैं, और हम सोचने लगते हैं कि “इसमें क्या गलत है?” आपकी शक्ति आपकी कुंडलिनी है और वह कौमार्य है। वह आपकी शक्ति है। वह आपकी ताकत है। आपकी अबोधिता  ही आपकी ताकत है, जिस दिन आपने इसे खो दिया, उसी दिन हमने मूल पाप किया। तो हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि हमें इसके बारे में बहुत विनम्र होना चाहिए, और हमें कुछ हासिल करना होगा। क्या? राज्य और किसी प्रकार का विलासी जीवन नहीं, बल्कि शिव की इस पवित्र भूमि में एक आसन।

शिव क्षमा हैं, वे सभी को क्षमा करते हैं, यहां तक ​​कि राक्षसों [दाईं ओर के शैतानी लोगों] को भी क्षमा किया जा सकता है, लेकिन क्या उन्हें आत्मसाक्षात्कार दिया जा सकता है? यहां तक ​​कि पिशाच [बाएं पक्ष के शैतानी लोग] को भी माफ किया जा सकता है, लेकिन क्या उन्हें आत्मसाक्षात्कार किया जा सकता है? क्षमा एक अलग बिंदु है। एक पहलू है क्षमा, ताकि वे लंबे समय रह सकें, शिव की क्षमा के कारण वे लंबे समय तक जीवित रह सकें। तो क्या हुआ? लेकिन कितना नीरस जीवन है! और जो लोग निर्दोष नहीं हैं वे कभी आनंद देने वाले नहीं हो सकते। वे स्वयं दुखी प्राणी हैं और सभी को दुखी करते हैं।

अहंकार बच्चों जैसा गुण नहीं है। हमें बच्चों की तरह बनना है। और यहाँ तक कि, जब तुम नहीं थे, तब भी तुम्हें साक्षात्कार दिया गया था। लेकिन अब आप देवों के साथ बैठें हैं बल्कि उनसे भी ऊंचे|

तो हमारा अलंकार क्या है? यह नम्रता है। यह सादगी है। ना की,  चतुराई, अहंकार, दूसरों को नीचा दिखाना, दिखावा, बल्कि पूर्ण समर्पण, अपने सभी अहंकारी गुणों को त्याग देना।

अपने भीतर कौमार्य का पुनर्जन्म होने दें। आज से आप सभी को संकल्प लेना है, यह हमारे लिए नव वर्ष का दिन है- कि हम सब अपने भयानक स्वभाव, आधिपत्य वाले स्वभाव, मुखर व्यवहार, अहंकार-उन्मुख कठोरता, दबंगता को त्याग देंगे। मुझे नहीं पता कि इसका क्या उपयोग है। जब तक आप इसे समर्पित नहीं करते, कौमार्य के देवता, श्री गणेश, आपके आज्ञा चक्र का ताज नहीं बन पाएंगे। हमने अब तक जो कुछ भी किया है, उसने हमें बस इतना ही देना चाहिए: यदि हमारा अतीत हमें यह विचार दे सकता है कि हमें एक दूसरे के साथ, सभी सहजयोगियों के साथ कितना विनम्र होना चाहिए, हमें कितना दयालु होना चाहिए, कितना प्रेमपूर्ण, कितना सार्वभौमिक होना चाहिए .

कुँवारी उन विचारों को स्वीकार नहीं कर सकती जो सार्वभौमिक नहीं हैं, वह नहीं कर सकती! यह कुँवारी का प्रतिक है क्योंकि वह स्वभाव से सार्वभौमिक है। सभी कट्टरता, सभी जातिवाद, जाति व्यवस्था, ये सभी चीजें जो कृत्रिम रूप से पुरुष को पुरुष से, महिला को महिला से, राष्ट्र को राष्ट्र से अलग करती हैं, जैसे ही आप निर्दोष हो जाएंगे, सब खत्म हो जाएगा। लेकिन आप जबरन वैचारिक परिवर्तन करके नहीं बन सकते, आप नहीं बन सकते। कुंडलिनी जागरण के द्वारा, निश्चित रूप से, आप कर सकते हैं। लेकिन इसे बनाए रखने के लिए, अपनी जड़ों को तलाशने के लिए आपकी प्रगति अंदर की ओर होनी चाहिए न कि बाहर की ओर। वह “मूल” है। वह तुम्हारे अस्तित्व की जड़ है। वह आपकी सभी जड़ों को प्रकट करती है। तो आपका चित्त अपनी जड़ों की ओर होना चाहिए न कि अपने ताने की तरफ, आप वह रहे हैं। अपने आप का सामना करें, और अब अपनी जड़ें विकसित करें। सारा पश्चिमी समाज बिना जड़ों के है, आप इसे देख सकते हैं। हमने अपनी जड़ें खो दी हैं; आइए इसका सामना पश्चिमी लोगों के रूप में करें, जैसा कि मैं भी आज आपके साथ हूं। हमें अपनी जड़ें तलाशनी होंगी।

देखो, जिस वृक्ष की जड़ें नहीं होतीं, वह सूख जाता है, कोई छाया नहीं देता, बाद में वह सूखा भयानक मरणासन्न वृक्ष बन जाता है। जब वह मरता है तो किसी पर गिर जाता है। उसमें काँटे उगते हैं, सब सूखी चीज़ों से काँटे बनते हैं। यह एक रेगिस्तान की तरह है, जहां केवल कांटे ही उग सकते हैं। जब सारा समाज इतना मूर्ख हो जाता है कि एक दूसरे से घृणा करता है, भौतिकतावादी है, तो वहां गुलाब नहीं उगेंगे, वहां कमल नहीं उगेंगे, जबकि आप इस देश के कमल हैं। ठीक है, तुम कीचड़ में पैदा हुए हो, लेकिन अब अपने स्व में वापस आ जाओ। तुम खुबसूरत हो। आप कमल के समान हैं, इस कीचड़ में गिरे, कीचड़ बने, जिससे आप अपने सच्चे स्वरूप के कारण प्रकट हुए हो। तब तुम अब कमल हो गए हो, लेकिन कोई सुगंध नहीं है। सुगंध के बिना कमल, कोई समझ नहीं सकता। कमल में सुगंध होनी चाहिए। वो महक जो इस कीचड़ की गंदगी को दूर कर देगी।

भारतीयों की तुलना में आपको बहुत अधिक विकसित होना होगा। इसके विपरीत लोगों का अहंकार मुझे चकित करता है। वे इसके बारे में शिकायत करना शुरू करते हैं, उसके बारे में शिकायत करते हैं, अन्य बातों की शिकायत करते हैं। वे अपने बारे में क्या सोचते हैं? तुम कौन हो?

क्योंकि जड़ें विकसित नहीं होती हैं। एक बार जब आप अपनी जड़ें विकसित कर लेंगे, तो तुरंत आपके स्वभाव में नम्रता आने लगेगी।  विनम्रता कृत्रिम भी होती है, जो हृदय से नहीं। हृदय से तभी आएगी जब तुम पवित्र हो जाओगे, तुम निर्दोष हो जाओगे।

अबोधिता का मतलब केवल नैतिकता नहीं है, इसका मतलब केवल यही नहीं है। बहुत से लोग सोचते हैं कि यदि आप एक नैतिक व्यक्ति हैं-नहीं। इसका अर्थ एक गैर-भौतिकता वादी रवैया भी है।

लोगों के लिए कालीन अपने बच्चों से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। सुबह से शाम तक वे कुछ बेतुकी चीज़ों को बचाने के लिए कठोर बातें कह रहे होंगे जो यहाँ स्थायी रूप से रहने वाली हैं। भौतिकतावाद चोट देता है, यह वही है जो आपको चोट पहुंचाता है, आपकी अबोधिता को। यदि भौतिकतावाद का उद्देश्य है दूसरों को सुख देने के लिए चीजों को बनाना, दूसरों को अमृत के प्याले के रूप में पेश करना, iयदि भौतिकता वाद वह प्याला है जो प्रेम का अमृत देता है, तो ठीक है। लेकिन तुम प्याला नहीं खाते, है ना? मेरे लिए भौतिकतावाद ऐसा लगता है जैसे लोग प्याला खा रहे हैं, अमृत नहीं! प्याला अधिक महत्वपूर्ण है या अमृत? मान लीजिए कि एक सोने का प्याला है और उसके अंदर जहर रखा गया है, क्या आप इसे लेंगे क्योंकि यह सोने के प्याले में है? यदि आप इसे लेते हैं, तो निश्चित रूप से, मेरे लिए सोने का मूल्य  अधिक होगा। क्या कोई सोने के प्याले में जानबूझ कर जहर खाएगा क्योंकि वह सोने में है? कोई सामान्य बुद्धि नहीं है! बिलकुल कोई सामान्य विवेक  नहीं है! कि, भौतिक चीजें आपको खुशी नहीं दे सकतीं, यही अर्थशास्त्र का मूल सिद्धांत है।

मैंने अपने जीवनकाल में देखा है कि कोई भी भौतिक वस्तु आपको सबसे बड़ी खुशी तब देती है जब आप उसे किसी को दे सकते हैं। मैंने हमेशा ऐसा देखा है। मुझे लेने से ज्यादा देने में मजा आता है। मेरा मतलब है कि आप कभी-कभी कुछ देने की कोशिश करते हैं, और देखते हैं कि आप कितना आनंदित महसूस करते हैं। बेशक, ऐसा इसलिए नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि आप इससे छुटकारा पाना चाहते हैं! [हँसी]

दरअसल, यह शायद उसी के लिए किया जाता है। क्योंकि आपके पास जो कुछ भी है वह वैसे भी सिरदर्द है- यहां तक ​​कि सूक्ष्मतम रूप भी। कोई भी परिग्रह किसी अधीनता के समान है। यह गुलामी है। यह आपकी स्वतंत्रता को विकसित होने से रोकता है। लेकिन यह हाथों हाथ चलता है। आप जानते हैं, लोग मुझसे पूछते हैं: “ये लोग जो इतने संपन्न हैं, इतने कंजूस कैसे हैं? वे इतने कंजूस क्यों हैं?” लोग नहीं समझ सकते, आप जानते हैं। एक ‘पैसे ‘ के लिए भी यदि यह अधिक महंगा हो जाये , तो पूरा इंग्लैंड जल जाएगा, आप देखिए। हर समय जो कुछ भी आप सुनते हैं वह इस के अलावा अन्य कुछ भी नहीं होता है कि – इस चीज़ और उस में इतने प्रतिशत वृद्धि, और वे इसके लिए हड़ताल करने जा रहे हैं। मुझे समझ में नहीं आता, क्या अब तुम उन सबका हिसाब रखते हो?

अगर कोई मुझसे पूछे कि इस चीनी की कीमत यहाँ या वहां क्या है, तो मुझे नहीं पता, लेकिन मैं बस इतना जानूंगी कि यह दूसरी जगह से सस्ती है। क्योंकि मैं निर्दोष हूं। मुझे हमेशा चीजें बिल्कुल सस्ती मिलती हैं, मैंने देखा है कि मुझे हमेशा चीजें सबसे सस्ती मिलती हैं। क्योंकि मैं बहुत मासूम हूँ। मेरी अबोधिता मुझे उन जगहों पर ले जाती है जहां यह सबसे सस्ता है और मुझे सबसे ज्यादा खुशी मिलती है क्योंकि मैं इसे दे सकती हूं। मैं देना जानती हूं।

इस तरह मैं कहूंगी, आपकी आत्मा की वास्तविक शक्ति, जो कि कौमार्य है, के कारण आपने आनंद की भावना भी खो दी है। तुम खुशी के हत्यारे हो, सुबह से शाम तक तुम एक-दूसरे के आनंद को मार रहे हो-कठोर बात कह कर, देखो, इसी जुबान से।

मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ रही थी क्योंकि मुझे पता था कि यह तुम्हें थोड़ा परेशान करेगा, इसलिए मैं इसे वहीं रख रही थी, कि तुम्हारा मन इतना परेशान न हो। मेरी हथेलियों में, तुम देखो, बहुत ध्यान से मैं तुम्हारे हृदय को वहाँ रखने के लिए पकड़ रही थी ताकि तुम्हें चोट न लगे। क्योंकि यह कठोर नहीं था, लेकिन यह सत्य था, जो कठोर था। लेकिन फिर भी, अपनी हथेलियों में, मैंने उसे सावधानी से पकड़ रखा था, ताकि आप इसके बारे में आहत न हो।

तो किसी को चोट पहुँचाने के लिए, बस अपनी जीभ खोलो और किसी को भी चोट पहुँचाओ, कोई व्यक्ति यह नहीं समझता कि,  आप अपने भीतर कितनी नफरत की लहरें पैदा कर रहे हैं। मुझे लोगों से प्रेम करने के लिए चौबीस घंटे पर्याप्त नहीं हैं। अब, मैं साठ साल की हो जाऊंगी, मुझे नहीं लगता कि मैंने इन साठ वर्षों से न्याय किया है क्योंकि मैं लोगों से उतना प्यार नहीं कर पायी जितना मैं चाहती थी। प्रवाह इतना तेज है कि मेरा शरीर उस प्रवाह से पीड़ित है और कभी-कभी मैं खुद को कोसती हूँ कि: “मैं अपने भीतर इतना प्यार क्यों ढोऊं?” और पूजा के साथ थोड़ा उत्साह भी। तुम्हें पता है कि मेरे साथ क्या होता है, मैं कांपती हूं। कभी तुम मुझे पूजा के लिए बुला रहे हो, अब क्या होगा? तब कोई प्रश्न पूछ सकता है, कभी-कभी: “माँ, क्या हमने आपके स्पंदनों को शोषित नहीं किया?” ऐसा होना निश्चित ही है, लेकिन मैं यह कहना नहीं चाहती। क्योंकि यदि मैं ऐसा कहूं तो तुम्हारी विशुद्धि पकड़ में आ जाएगी। फिर से तुम कम शोषित करोगे। यह एक बहुत ही नाजुक काम है जो मुझे करना है। आप पहले से ही घायल लोग हैं क्योंकि आपने खुद को घायल कर लिया है। किसी ने तुम्हारा यह नुकसान नहीं किया है, तुम लोगों ने खुद को बहुत अच्छी तरह से घायल किया है। आपने हर संभव तरीके से खुद को चोट पहुंचाने की कोशिश की है। अब चोट के कारण, अपराध बोध अंतर्निहित है और तुम दूसरों को चोट पहुँचा रहे हो। यह समझना बहुत ही सरल है। इसलिए खुद को चोट न पहुंचाएं, खुद को चोट पहुंचाने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन याद रखें कि किसी के प्रति कठोर होने का हमारा कोई काम नहीं है। हमें प्यारे इंसान बनना है। हमें दयालु लोग बनना होगा।

ऐसे मनोवैज्ञानिक भी हैं जो आपकी कठोरता के लिए आपको स्पष्टीकरण देने के लिए आगे आए हैं, कि: “आपकी इच्छा-शक्ति मजबूत होनी चाहिए। अगर आप इस तरह बात नहीं करेंगे तो दूसरे फायदा उठाएंगे।’ पश्चिमी लोगों का फायदा कौन उठा सकता है? यह बेतुका है, बिल्कुल बेतुका है! जिन लोगों ने दुनिया भर में अन्याय किया है, वे ऐसी बात कहें, यह बेतुका है। मैं समझ नहीं पा रही हूं कि वे इस तरह का स्पष्टीकरण कैसे दे सकते हैं!

लेकिन अब समय आ गया है। आप वे लोग हैं जो आपके अच्छे व्यवहार से परमेश्वर के मन को बदलने वाले हैं। क्रोधी परमेश्वर, आप उन्हें प्रसन्न करने जा रहे हैं। आप उस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने जा रहे हैं जो परमात्मा  की करुणा में बेकरार है। उसकी करुणा के लिए प्रार्थना करो! क्या आप इसके लायक हैं? यदि आप इसके लायक नहीं हैं, तो इस पश्चिमी दुनिया में कौन लायक होगा – आप मुझे बताएं- आज? आप ही इसके लिए चुने गए हैं, विशेष रूप से इसके लिए तैयार हैं, एक क्षेत्र बनाने के लिए ताकि  बाकी लोगों के लिए करुणा के देवता को जगाया जा सके।

अहंकार, आपने सहज योग के प्रसार में देखा है, क्या हुआ: हमारे पास एक कार्यक्रम था जहां हमारे पास एक हजार लोग थे। अगले अनुवर्ती कार्यक्रम के लिए केवल तीन हैं। यह अजीब बात है। मैंने अपना अधिकांश कीमती समय इस देश में और पश्चिम में बिताया है। इसके बावजूद, अहंकार कभी-कभी मुझे चकरा देता है। एक दूसरे के बीच अहंकार, मेरे प्रति भी कभी-कभी वे इतने अहंकारी होते हैं, मैं किसी को भी अपने लिए इतना अभिमानी नहीं मान सकती, जैसे वे हैं। जिस तरह से वे मुझसे बात करते हैं, जिस तरह से वे मेरे प्रति व्यवहार करते हैं, मैं समझ नहीं पा रही हूं कि वे ऐसे कैसे हो सकते हैं।

यह वैसे भी कहीं भी, कभी भी हो सकता है, खासकर महिलाओं में। मैं चकित थी, मैं बेल्जियम गयी, और मैंने पाया कि बेल्जियम की गृहिणियां ब्रिटिश गृहिणियों से भी बदतर थीं। आह! भीषण, भयानक महिलाएं! आह! बस भयानक! बिल्कुल। आप नहीं जानते कि उनसे कैसे निपटना है, यह बहुत भयानक है! वे पूरे घर को अपने हाथों में नियंत्रित करती हैं, मुझे नहीं पता कैसे| बस, मैं नहीं जानती कि वे इसे कैसे करती हैं। इतनी अहंकार उन्मुख, मैं चकित हूँ! लेकिन अगर आप अमेरिका जाते हैं, तो अमेरिकी महिलाएं बाबा हैं, वे अमेज़ोनिक (बड़ी तगड़ी योद्धा जैसी महिला )हैं! भयंकर! तुम बस समझ नहीं पाते, कोई प्यार नहीं, कोई स्नेह नहीं, कुछ भी नहीं। दिखावा, हर समय उनकी भौतिक चीजों के बारे में बात करना, बिल्कुल शुष्क छड़ें, मैं आपको बताती हूं। और वे बोध चाहते हैं, और वे महान और ऐसा और वैसा बनना चाहते हैं। मुझे नहीं पता। वे क्या हैं?

आज विशेष रूप से कौमार्य का दिन है। मुझे वास्तव में इस देश की महिलाओं से बहुत उम्मीदें हैं, खासकर। यहां पुरुष बिल्कुल बात नहीं करते हैं, आप देखिए कि,  बेल्जियम का नमूना सबसे खराब था, कोई भी आदमी एक शब्द भी नहीं बोलता था! वे बात नहीं कर सकते हैं, बस बेचारे बंद हैं। वे बात नहीं करते हैं, गले दबे हए हैं, महिलाओं द्वारा पूरी तरह से दबाव में हैं, मेरा विश्वास करो। भयंकर! उस देश का क्या होने वाला है, आप देखिए? जहां पुरुष बात नहीं कर सकते और महिलाएं बात करती हैं। यह भयावह है, आइए इसका सामना करते हैं। उन्होंने, ‘वहां की महिलाओं’ ने क्या हासिल किया है? कम से कम भारत में तो हमारी प्रधानमंत्री एक महिला हैं। वे क्या हैं? किसी काम की नहीं, बेकार, सिर्फ घर में बर्तन धोना और दिखावा करना। मैं बस नहीं समझ पाती। वे किन बलिदानों तक जा सकती हैं? किसी नारी की पहचान इस बात से होती है की वह कितने बलिदान देती है। यह एक चुनौती है, मैं आपको बताती हूं, आप सभी आत्मसाक्षात्कारी महिलाओं को सुनिश्चित करना है कि, आप अपने आप को विनम्र करें। जब तक आप विनम्र नहीं होंगी तब तक आपकी गुणवत्ता में सुधार नहीं हो सकता है। आप हर बात पर जोर देती हैं। किस लिए? जब हम इतने अहंकारी और इतने दबंग होते हैं तो कुँवारी (वर्जिन) की पूजा करना असंभव है।

कुँवारी (वर्जिन) एक सरल महिला है। वह बेहद सरल हैं। वह आपकी योजनाएं, और सब कुछ जो इतना महत्वपूर्ण है, नहीं समझती हैं। उसका महत्व उसका कौमार्य है, जिसे वह जानती है, और वह किसी को भी इसे छूने की अनुमति नहीं देगी। यही उसकी गुणवत्ता है, यही उसकी संपत्ति है, यही उसकी महानता है। और वह विनम्र इसलिए है क्योंकि वह किसी से डरती नहीं। वह आक्रामक नहीं है। लेकिन वह किसी को आक्रमक नहीं होने देती; कोई भी असली कुँवारी (वर्जिन) पर हमला करने की हिम्मत नहीं करता।

सहज योग में अब एक नया पृष्ठ शुरू किया गया है। मुझे आप सभी को इसके बारे में चेतावनी देनी चाहिए। सहज योग के साथ बहुत अधिक स्वतंत्रता न लें। आप किसी और पर नहीं बल्कि खुद पर अहसान कर रहे हैं, सावधान रहें। मेरी चेतावनियों को हमेशा गंभीरता से लें। अब तुम ‘सब’ को बहुत अच्छे से उत्थान करना है। सिर्फ मेरी पूजा करने से ही आपको मदद नहीं मिलेगी, मैं आपको इतना ही बता सकती हूं। बेहतर हो अब आप अपनी स्वयं की पूजा करें। आपको अपने भीतर अपने सभी देवताओं की पूजा करनी होगी। उन्हें शुद्ध करें।

सबसे पहले नम्रता, अबोधिता, सादगी के देवता और देवी हैं।

उनकी पूजा करो। जब तक आप उनकी पूजा नहीं कर सकते, तब तक आप आगे नहीं जा सकते, आपकी रक्षा नहीं होगी। मैं फिर से कहती हूं कि एक नया पृष्ठ चालू कर दिया गया है। सहज योग के साथ स्वतंत्रता मत लो। इसने आप पर सभी आशीर्वाद बरसाए हैं। आपने दिन के उजाले को देखा है। लेकिन रात के लिए तैयार रहें। किसी को भी छूट लेने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अपने आप को सुधारने का प्रयास करें।

कोई और शिकायत बाज़ी नहीं। यदि आप इस तरह से आश्रम में नहीं रह सकते हैं, तो बेहतर होगा कि आप इससे बाहर निकल जाएं। यह आपकी सुविधा के लिए नहीं है। किसी को आपकी जरूरत नहीं है। यह मेरा निर्देश है। किसी को आपकी जरूरत नहीं है, आपको अपने आप की जरूरत होना चाहिए। यदि आप साधक हैं, यदि आप अपनी जड़ों को खोजना चाहते हैं, तो आपके लिए सब कुछ उपलब्ध है। लेकिन जड़ों तक जाने के लिए आपको विनम्र होना होगा, अहंकार के साथ नहीं।

हमें समझना चाहिए कि हम प्रगति क्यों नहीं कर रहे हैं। दरअसल अहंकार उन लोगों को आता है जिनमें आत्मविश्वास की कमी होती है। जिन लोगों का आत्म प्रकट नहीं हो रहा है, उनका आत्मविश्वास टूट जाता है। अपने स्व  को प्रकट होने दें। जब आत्मा प्रकट नहीं हो रही है, तो आपको सभी प्रकार की समस्याएं आती हैं, और तब आप शिकायत करते हैं। दरअसल, समस्या आपके भीतर है।

यह ईश्वर है जिसे शिकायत करनी है। इस बारे में सोचो। जिसने इस ब्रह्मांड को बनाया है, जिसने आप सभी को इतने प्यार और स्नेह से बनाया है, जिसने आपको सूर्य के नीचे सब कुछ दिया है, जिसने आपको आत्मसाक्षात्कार दिया है, आपको प्रकाश दिया है, जो कुछ भी संभव है और तुम उसके खिलाफ शिकायत कर रहे हो? आपको नहीं चाहिए। खुद के बारे में शिकायत करें कि: “मैं ठीक नहीं हूँ, मुझे ठीक होना चाहिए।” अपने बारे में शिकायत करें, खुद का सामना करें।

जैसे बच्चे, जब वे आईने का सामना करते हैं, तो वे कहते हैं: “यह कोई और है? हम कैसे विश्वास करें?” वे कभी भी अपनी खुद की छवि जिसे वे देख रहे होते है उस से अपनी पहचान नहीं बनाते हैं। वे उस छवि से पहचान बनाते हैं जो वे ‘हैं’। वे कृत्रिम चित्र नहीं बनाते हैं या उन छवियों के साथ नहीं रहते हैं जो उन्हें अहंकार-उन्मुख महसूस करा रही हैं। वैसे भी, वे वास्तविकता के साथ रहते हैं। हमें वैसा ही बनाया गया हैं।

आप एक कैमरा देखिए, अगर यह किसी ऐसे,  सामान्य से भिन्न रंग के एक लेम्प के नीचे कोई तस्वीर लेता है, तो तस्वीर अलग तरह की हो सकती है। मान लीजिए मैंने लाल रंग की चीज पहनी है और मान लीजिए कि आप नीली रोशनी डालते हैं, तो यह हरा दिखना शुरू हो सकता है। लेकिन इंसान की आंखें हमेशा वही चीज देखेंगी। यह कुछ असत्य नहीं देखेगी। कैमरा वह सब कर सकता है। कैमरा किसी का सिर हटा सकता है और किसी का सिर वहां लगा सकता है। ये सभी तरकीबें कैमरे से संभव हैं लेकिन इंसानी आंखों से नहीं। आप जो कुछ भी देखते हैं वह वही चीज़ है जो है। बेशक, यदि आप नशे में हों, तो बात अलग हो सकती है। मेरा मतलब है कि मैं सामान्य परिस्थितियों की बात कर रही हूं, आप देखिए।- सामान्य परिस्थितियों में, आप वही देखते हैं जो कि वास्तव में मौजूद है। लेकिन अगर आप अहंकार-उन्मुख हैं, तो आप खुद को, जैसे हकीकत में आप हैं, कभी नहीं देख पाएंगे। आप किसी प्रकार का काल्पनिक देखेंगे, आप देखिए, आप खुद को परमेश्वर के स्वर्ग का राजा समझेंगे, आप देखिए। हम चाहें वो हम देख सकते हैं, यह कल्पना है। यदि आप यहाँ कल्पना को इस तरह रखते हैं, तो आप अपने आप को कुछ भी देख सकते हैं! – जो असत्य है, पूर्णतः असत्य है।

आप स्वयं, अपना स्व हैं और आपको स्वयं को, अपने स्व के रूप में, अपनी आत्मा के रूप में देखना चाहिए। और आत्मा सार्वभौमिक सत्ता है, अबोधिता है, तुम्हारे भीतर का कुंवारापन है। इसका सम्मान करो, अपने उस हिस्से का सम्मान करो जो कौमार्य है -जो अभी भी मौजूद है, क्योंकि अगर वह नहीं होता, तो मैं आपको कभी भी बोध नहीं देती। हर हमले के बावजूद वह वहां मौजूद था, उस बिंदु पर आश्वस्त हो। यदि यह अस्तित्व में नहीं होता, तो आपको अपनी बोध प्राप्ति नहीं होती।

उनमें से बहुत से, उन्हें बहुत गर्व है: “ओह! मुझे कुछ भी महसूस नहीं होता, माँ, आप जानती हैं, यह कुछ भी नहीं है।” फिर तो और भी शर्मिंदगी की बात होगी। [श्री माताजी हंसते हैं]

या कम से कम आपको लगता है कि आप कुछ गँवा रहे हैं, है ना? कम से कम, आपको यह महसूस करना चाहिए कि आप में कुछ कमी हैं, अगर कुछ ठीक नहीं है और आपको ठीक होना चाहिए। कम से कम ऐसा सोचें: “मुझे ठीक होना चाहिए, मैं ठीक नहीं हूँ।” इसके विपरीत: “नहीं, नहीं, मुझे नहीं लगा। ओह! क्या? मुझे महसूस नहीं हुआ और यह कि,  मुझे महसूस होना चाहिए?”

तो विवेक| विवेक की जो भूमिका है वह मासूमियत है, पूर्ण विवेक है। यह आप ग्रामीणों या बहुत ही साधारण लोगों में पाते हैं। वे किसी भी तरह से चालाक नहीं हैं। आप उन्हें मूर्ख बनाने की कोशिश करते हैं, और आप चकित होंगे, इसके अंत में आप पाएंगे: “मैं खुद इतना बड़ा चकित मोटा मूर्ख हूं।” कोशिश करें कि कुछ देहाती लोगों के साथ, जो बहुत ही सरल, बातूनी हों, जो मातृभूमि के साथ रहते हों। आप पाएंगे कि वे सभी तथाकथित बुद्धिजीवी, यदि वे उस तरह के एक साधारण आदमी को मूर्ख बनाने की कोशिश करते हैं, तो आधे घंटे के बाद यह शिक्षित और बहुत एम.ए.-पी.एच. डी. शैली को पता चलेगा कि वह ‘अब तक का सबसे बड़ा मूर्ख’ है।

संस्कृत में एक कहावत है, बहुत प्रचलित है: विद्या विनयेन शोभता यानि विद्या, यहां तक ​​कि ज्ञान भी विनय से अलंकृत किया जाता है- शोभते, अर्थात अलंकृत मिलता है या

श्री माताजी, एक तरफ: शोभा क्या है?

सहज योगी: महिमा, सौंदर्य।

श्री माताजी: सुशोभित।

सहज योगी: हाँ।

श्री माताजी : नम्रता से ही शोभा बढ़ती है।

यदि कोई शिक्षित व्यक्ति है तो उसे एक विनम्र व्यक्ति बनना होगा। यदि वह विनम्र व्यक्ति नहीं है, तो वह किसी भी तरह से शिक्षित नहीं है।

मुझे नहीं पता कि मैंने आपको एक संत के बारे में एक कहानी सुनाई है जो ध्यान कर रहे थे और अंधे थे। और एक राजा ने वहां आकर उनसे पूछा, “क्या आपने अपने आस-पास कुछ लोगों को देखा है?” उन्होंने हाँ कहा। हाँ राजा, मेरे राजा। बैठ जाओ। मैं ने आपके नौकर को आते देखा, और आपके मंत्री भीतर आये, और प्रधान मंत्री भीतर आये, और अब आप आये है।” उसने पूछा: “आप अंधे हो, आपको कैसे पता चला? अपने ध्यान के द्वारा?” वह बोले, नहीं। व्यावहारिक बुद्धि”। उन्होंने कहा: “सामान्य बुद्धि क्या है?” उन्होने कहा, सबसे पहले, नौकर अंदर आया।

उसने कहा, “क्या, तुम यहाँ बैठे हुए फर्जी आदमी, अपना समय बर्बाद कर रहे हो?” उसने मुझे दो-तीन गालियां दीं, अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और कहा: “क्या तुमने यहां किसी व्यक्ति को देखा है?” तो मैंने कहा: “नहीं।”

फिर मंत्री अंदर आए। उन्होंने मुझे गाली नहीं दी, लेकिन उन्होंने मुझसे सिर्फ पूछा। फिर प्रधानमंत्री आए। उसने मुझे कहा: “सर” ।-इंग्लैंड से होना चाहिए! और शायद यह भी कहा होगा धन्यवाद शायद [श्री माताजी हंसते हैं]।

और फिर आया राजा। और उसने कहा कि: “आप अत्यंत विनम्र थे। आपने  पहले मेरे पैर छुए, आप धरती माता पर बैठ गए, मेरी प्रतीक्षा करने लगे, की में पूछूँगा तुमसे कुछ कि: “तुम क्या चाहते हो?” और बहुत नम्र तरीके से आपने कहा: ‘यदि आपने अपने आस-पास के लोगों के बारे में कुछ सुना हो’। चूँकि मैं अंधा हूं, इसलिए आपने ऐसा कुछ नहीं कहा जिससे मुझे दुख पहुंचे, इतने विनम्र तरीके से कि, अगर मैं आपको बता सकूं। लेकिन मुझसे यह पूछने से पहले आपने गुरु के कम से कम एक सौ आठ नाम लिए। इसलिए मैं जानता हूं कि आप विद्वान हैं, आप सबसे विनम्र हैं, और इसलिए आपको राजा बनना चाहिए।” अन्यथा उन दिनों हमारे पास कम से कम ऐसे राजा या प्रधान मंत्री नहीं थे जो बॉक्स-ऑफिस अभिनेता रहे हों। [हँसी]

जनता भी इतनी मासूम थी कि वे ऐसी बकवास को स्वीकार नहीं करेंगे, आप देखिए। तो यह था अंतर। इस कहानी से हमें यह निष्कर्ष निकालना होगा कि जितना अधिक हम विद्या में, सहज योग की तकनीक में सीखते हैं,  हमें विनम्र होना पड़ता है। यही हमारा अलंकरण है, यही हमारा प्रमाण पत्र है, यही प्रत्येक मनुष्य के प्रवेश का मार्ग है, इसी प्रकार हम अन्य साधकों के बहुत निकट होने वाले हैं। विनम्र होना, विनम्र होने के तौर तरीके खोजना। यह निर्मला विद्या की कुंजी है: “विनम्र कैसे बनें?” नम्रता से आप कभी नहीं कहेंगे: “यह मेरा बाथरूम है, या यह मेरा फल है, या यह मेरा भोजन है, या यह मेरी मेज है, और यह मेरा गिलास है”।

मासूमियत आपको वहां मौजूद हर चीज का आनंद लेने की ताकत देती है।

मेरे लिए,  मेरा मतलब है, कभी मुझे भूतों के साथ खाना पड़ता है, और कभी मुझे भूत खाना पड़ता है।  न केवल उनके साथ खाना, बल्कि उन्हें भी खा जाना – यह सबसे खराब हिस्सा है।

[हँसी]

तो, आपको भी बुरा नहीं मानना ​​चाहिए अगर भूत वाले लोग हैं। यदि वे अहंकारी हैं, तो उन्हें बंधन देने का प्रयास करें, इन सभी तरीकों से उन्हें नियंत्रित करने का प्रयास करें। लेकिन अगर आपको लगता है कि उनके साथ बहस करके आप उन्हें मैनेज कर पाएंगे, तो यह असंभव है। तो निर्मल विद्या का प्रयास करें, और वह है विनम्रता, जो चैतन्य का  myelin sheath माइलिन शिथ (विद्धुतरोधी कवच) है। जैसे हर तंत्रिका में एक  myelin sheath (विद्धुतरोधी कवच) होता है, वैसे ही नम्रता है, myelin sheath (विद्धुतरोधी कवच)है। यदि आप विनम्र हैं तो आप युद्ध जीतेंगे, यदि आप नहीं हैं, तो हम हार जाएंगे। तब सब कुछ तुम्हारे लिए मजाक बन जाएगा, बिल्कुल मजाक। यदि आप विनम्र हैं तो आप इस नाटक के मूर्खों, भूतों और सभी अभिमानियों को जोकर के रूप में देख पाएंगे।

अपने आप के साथ और मेरे साथ विनम्र होने का प्रयास करें। मेरे साथ बहुत महत्वपूर्ण है। आपको समझना चाहिए कि यह उन शर्तों में से एक है जिसे ईसा-मसीह ने ‘आप’ पर रखा है, इसलिए ‘सावधान’ रहें। मेरे साथ व्यवहार करते हुए, मैं नहीं चाहती कि आप मेरे साथ किसी भी तरह से कठोर हों, क्योंकि फिर मैं वहां इस में आपकी मदद नहीं कर सकती। जब तक तुम मेरे साथ विनम्र हो, सब कुछ मेरे अधीन है। लेकिन जैसे ही आप मेरे प्रति असभ्य होते हैं, कोई अन्य -और उनमें से ऐसे कई , हजारों लोग कार्यभार संभाल लेते हैं, और फिर उसके लिए मुझे दोष न दें। क्योंकि तुम यहाँ मेरे आश्रय में हो, मेरी सुरक्षा में।

मान लीजिए आप अपनी छत में छेद करने की कोशिश करते हैं, और फिर कहते हैं कि बारिश आ रही है, तो आप इसके बारे में क्या कर सकते हैं? मेरा मतलब है कि आपने पहले ही अपनी छत में छेद कर लिया है। जो छत तुम्हारी रक्षा करने वाली थी, तुमने छेद कर दी, अब बारिश आनी है। फिर अगर तुम चाहते हो कि छत अभी भी तुम्हें बारिश से बचाए, तो मैं कहूंगी कि तुम्हारे पास समझ की कमी है। यह वही है।

तो यह है- एक और चेतावनी। यह बहुत लज्जाजनक है, लेकिन आज फिर से शर्मिंदगी का दिन है। क्योंकि कुँवारी हमेशा शर्मिंदगी की स्थिति में रहती है, वह एक शर्मीला व्यक्तित्व है। उसे संकोची होना होगा। जो बातें कहना नहीं चाहती उसे कहने में शर्म आती है, बेशक बड़ी प्यारी बात है, वहां भी शर्माती है, कटु बातें कहना भयानक बात है।

तो आइए हम अपने भीतर अपने कौमार्य की पूजा करें। आइए हम अपने कौमार्य की प्रतिभा के उस हीरे को अपनी विनम्रता की स्थापना में स्थापित  करने के लिए उस बिंदु तक प्रगति करें। तुम दूसरों पर क्रोधित हो सकते हो, सहजयोगियों से नहीं, मुझसे नहीं। दूसरों के साथ भी, तभी जब यह बिल्कुल आवश्यक हो। लेकिन अगर आप आपस में लड़ते हैं, और लोगों को सहज योग के बारे में बताते हैं, तो कोई भी आप पर विश्वास नहीं करेगा।

और इसीलिए आज वह दिन है जब कुंवारी गौरी शिव की पूजा करने बैठी थीं। उसने एक शिव लिंग बनाया और बैठी थी और उस पर अपना “सिंदूर” लगा रही थी: “कि तुम इसकी देखभाल करो, जो तुम्हारे साथ मेरे मिलन का प्रतीक है। मैं इसे आप पर छोड़ती हूं, देखभाल करने के लिए। ”- शिव को। “आप इसका ख्याल रखें। इसके लिए मैं आपके सामने समर्पण करती हूं।”

इस तरह गौरी, आपकी कुंडलिनी, आत्मा के प्रति समर्पित होती है: “अब, आप इस संबंध की देखभाल करें। मैं बाकी सब कुछ भूल जाती हूँ। मैं इसे आपके हाथ में छोड़ती हूं। मुझे ऊपर उठाओ। आप मुझे उपर उठाएं। मैं वह सब भूल जाती हूं जो मैं पहले थी। मैंने सब कुछ छोड़ दिया है। कोई और इच्छा नहीं। लेकिन बस मुझे ऊंचा और ऊंचा उठाएं। मुझे अपना बना लो। बाकी कुछ महत्वपूर्ण नहीं है। इन इच्छाओं की अन्य सभी अभिव्यक्तियाँ समाप्त हो गई हैं। अब, मैं पूरी तरह से आपके प्रति समर्पित हूं, ओ मेरी आत्मा। मुझे ऊंचा और ऊंचा उठाएं। उच्च और उच्चतर, उन सभी चीजों से दूर जो आत्मा नहीं थीं। मुझे पूर्ण आत्मा, पूर्ण आत्मा बना दो।”

पहले जो कुछ था उसे भूल जाओ। वह ऊंचाई, वह चढ़ाई एक तेज, त्वरित यात्रा, एक ‘बहुत’ तेज चढ़ाई बन जाती है। बस आप इसे कर सकते हैं यदि आप इस क्षण और हर क्षण उस सब को त्यागने का प्रयास करते हैं जो आत्मा नहीं था। जो कुछ भी आत्मा के खिलाफ जाता है उसे छोड़ देना चाहिए। और वही शुद्ध इच्छा है, वही कुण्डलिनी है, वही कुँवारी है। आत्मा के साथ बिल्कुल एकाकार होना है। बाकी सभी का कोई अर्थ नहीं है, कोई मूल्य नहीं है।

यह उत्थान – आपका कोई भी पद हो, आप जिस किसी से भी विवाहित हों, जहाँ भी आप काम कर रहे हों, आपकी स्थिति जो भी हो, आपका देश कुछ भी हो, आप ‘आत्मा’ हैं। और यदि तुम ऊँचे उठ कर ऊपर हो, तो परमेश्वर के सुंदर राज्य में निवास करोगे, जहां सब कुरूपता दूर हो जाती है। जैसे जब कमल खुलता है, तो सारा कीचड़ बाहर गिर जाता है, पूरी तरह से। इसी प्रकार मेरे बच्चों को सदाशिव के लिए सुन्दर सुरभित भेंट बनने दो।

परमात्मा आप को आशिर्वादित करे।

ठीक है, तो। [हिंदी]

कार्तिकेय वहीं बैठे हैं।

सहज योगी: यही श्री विष्णु के नाम हैं।

श्री माताजी: मुझे लगता है कि आप सभी को इसकी प्रतियां लेनी चाहिए और पता होना चाहिए कि हम यहां क्या कर रहे हैं। आप देखिए, यदि आप इसे नहीं समझते हैं, तो यह उचित नहीं है। बेशक, संस्कृत भाषा करीब है, यह बेहतर मंत्र देती है, लेकिन अगर आप इसे अंग्रेजी में कहते हैं, तो मुझे पता है, क्योंकि अब मैं अंग्रेजी भी समझती हूं। लेकिन अगर आप समझ सकें कि वह क्या कह रहे हैं, तो ज्यादा अच्छा होगा।

सहज योगी: हमने इसे छाप दिया है।

श्री माताजी : ओह! अच्छा! ईश्वर आप पर कृपा करे।

आह, यह अच्छा है। अब इसके अनुसार करने का प्रयास करें।

[हिंदी]

“विष्णु नामा”  यह किस लिए है? विष्णु नाम, हम क्यों कहते हैं? आप जानते हैं कि? हम विष्णु नाम कहते हैं क्योंकि वे ही आपको उत्थान की चाहत देने वाले हैं। वह है जो तुम्हें विकास देते है। वह वही है जो तुम्हें तुम्हारा धर्म देते है। वह ही है जो हर वस्तु को पालन करते हैं, सबको गुण-धर्म देते है। सभी दस आज्ञाएँ उन्ही से आती हैं। सबसे पहले हमें परमेश्वर के उस पहलू की आराधना करनी चाहिए क्योंकि वह हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। मनुष्य के लिए यही सबसे बड़ी बात है, अपने गुण-धर्म,पोषण की देखभाल करना, अपने आप को, धर्म को संतुलन देना।

तो इसका पहला भाग यह देखना बहुत जरूरी है कि आप उसके इक्कीस नाम लें क्योंकि ये इक्कीस नाम आपको उनके बारे में विवरण दे रहे हैं। और हर नाम उनकी शक्तियों में से एक है। और बहुत प्रतीकात्मक, आप देखिए,  केवल वही प्रतीक है जो चैतन्य की लहर पैदा करता है। तो प्रतीक हैं, यह बहुत प्रतीकात्मक है। किसी को इस पर सवाल नहीं उठाना चाहिए क्योंकि अब इसका पता लगा लिया गया है और इसे सुलझा लिया गया है और हर कोई जानता है कि यह कैसे काम करता है।

ठीक है, चलो अब हम यह करें।

[सहज योगी मंत्र कहते हैं]

श्री माताजी: एम् , रिम, क्लीम।

एम् कुँवारी है, एम् महाकाली है।

[पूजा जारी है।]

[ऑडियो ट्रैक पर नहीं]

प्रश्न: क्या सत्य इंद्रिय-बोध से परे है?

श्री माताजी : बिल्कुल है। क्योंकि अगर हम अपनी इंद्रियों के माध्यम से जो कुछ भी ग्रहण करते हैं-जो कुछ भी हम अपनी इंद्रियों के माध्यम से अनुभव करते हैं वही -सत्य है तब तो, हमें अब और खोज़ करने की ज़रूरत नहीं है! अपनी इंद्रियों के माध्यम से हम जो कुछ भी देखते हैं, वह बहुत प्रत्यक्ष, स्थूल है, सूक्ष्म नहीं है। स्थूल के पीछे क्या है, हम समझ नहीं सकते। उदाहरण के लिए, हम यह नहीं कह सकते कि परमाणु कैसे बनाया जाता है। हम यह नहीं कह सकते कि अमीबा कैसे इंसान बनता है। हम एक बंदर को इंसान नहीं बना सकते- क्या हम कर सकते हैं?- इंद्रियों की अपनी क्षमता के माध्यम से। इंद्रियों की अपनी क्षमता के माध्यम से, हम उस सूक्ष्म को कार्यान्वित नहीं कर सकते जो स्थूल के पीछे है। तो हम इंद्रियों के माध्यम से नहीं जान सकते हैं। लेकिन एक बार जब आप को इसका ज्ञान हो जाता है तो आप इसे अपनी इंद्रियों के माध्यम से भी महसूस कर सकते हैं। यह दूसरा बिंदु है।