Talk

मुंबई (भारत)

Public Program,Mumbai , India, 17th December 1982

 The recording of the advice given by Her Holiness Mataji Shri Nirmala Devi ji on 17/12/1982   at Parel on the occasion of Her Felicitation by ‘Swajan’. She has explained the meaning of ‘what is Swajan’

“स्वजन” के सब सदस्य तथा इसके संचालक और सर्व सहज योगी आप सबको मेरा प्रणाम! जैसा कि बताया गया स्वजन शब्द यह एक बड़े ध्येय की चीज़ है। स्वजन ये जो नाम हम लोगों ने बदल के इस संस्था को दिया था, इसके पीछे कुछ मेरा ही (–महाम–) जिसको कहते हैं कि महामाया इसके कुछ असर थे | स्वजन ये शब्द समझना चाहिए । स्व मानें क्या ? स्व मानें आत्मा , जिसे जिसनें अपनें आत्मा को पाया है वो जन स्वजन हैं | उस वखत शायद किसी ने न सोचा हो कि ये नाम विशेषकर मैंनें क्यों कहा कि यही नाम बदल रखा और जितने सहजयोगी हैं ये स्वजन हैं, क्योंकि उन्होंनें भी आत्मा को पाया है| ‘स्व’ को पाया है| अपने ‘स्व’ को पाने हीं के लिए स्वजन बनाया गया है और फर्क इतना है कि ऊपरी तरह से देखा जाए तो स्वजन में ये बात कही नहीं गई, लेकिन उस शब्द में हीं निहित है | उसका ॐ उसमें निहित है कि हम स्वजन हैं और जो आत्मा है वह ‘स्व’ है जो हमारे हृदय में परमात्मा का प्रतिबिंब है, वह ‘स्व’ उसका स्वरूप सर्व सामूहिक चेतना से दिखाई देता है| यानी जो आदमी स्व का जन हो जाता है जो स्व को जान लेता है वो जन में आ जाता है। अब जन हम जिसे कहते हैं, हजार जन संसार में घूमते हैं। आप रास्ते पे देखिए तो हजार घूम रहे हैं। कहीं भी जाईए तो आपको इस देश में तो जनसंख्या हीं का प्रश्न खड़ा हुआ है। जहाँ जाईए तो लोग कहते हैं कि आपके यहाँ जनसंख्या बहुत ज्यादा है लेकिन ये स्वजन नहीं हैं | ये सिर्फ जन हैं । जिस स्वजन की बात हम लोगों को सोचनी है वो स्वजन विराट वो हमारे एक ऐसे जन की धारणा है जो इस महान विशाल परमात्मा का अंग प्रत्यंग होते हुए भी अलग- अलग एक जन हैं। लेकिन हमारे शरीर में भी आप देखते हैं कि अनेंक पुर्जे हैं | जिन्हें हम सेल्स कहते हैं । इसी प्रकार इस परमात्मा के अंग प्रत्यंग में भी हम लोग एक सेल की तरह जीवित हैं, लेकिन जागृत नहीं। जब तक हम इसमें जागृत नहीं होते तब तक हम पूरी तरह से ‘स्वजन’ नहीं होते। हाँ यह भी हो सकता है चाहे लोग किसी नाम से इकट्ठे आ सकते हैं पर आपके नाम में एक बड़ी भारी कूटनीति भरी हुई है कि आप सबको स्व-जन होना पड़ेगा। जब तक आप इस स्व-जन पर नहीं उतरेंगें , तब तक कोई चीज का मज़ा नहीं आनेवाला। झगड़े होएँगे, परेशानियाँ होएँगी, आपस में डिस्कशंस (Discussions)  होंगे, सब तरह की चीजें होती रहेंगी लेकिन मज़ा आने वाला नहीं | कहीं गाना  हो गया , म्यूजिक (Music)  हो गया लेकिन गर साफ – साफ पहले हीं से कह दिया जाए कि आप स्वजन को सहजयोग के ही ढंग से चलाइए तो एक आफत हो जाती | कहने का नहीं। अभी शुरू में तो वो सब ठीक हैं| आप पिकनिक पर जाइए , सब आपस में मिलिए और यही ठीक है कि आप सब आपस में मिलते हुए जुलते हुए बात-चीत करते हुए आपस में संगठना बनती जाए, ऐसे लोगों की जो समझदार सूक्ष्म ज्ञानी लोग हैं और जो सब आपस में मेलजोल रखना चाहते हैं लेकिन जब यह मेलजोल घनिष्ठ होता जाएगा तब इंसान की समझ में आ जायेगा कि इसमें कोई चीज थोड़ी खोई खोई सी है। अभी भी वो नितांतता वो प्रेम की आंतरिकता इसके अंदर अभी नहीं महसूस हो रही है। वो समय आ जाएगा और वो आएगा | कारण सारे आनंद का स्रोत आपके हृदय में बसा हुआ ये आत्मा है। जब तक ये आत्मा आपके चित्त में प्रकाशित नहीं होगा तब तक स्वजन का कार्य पूर्णतया आनंदमय नहीं होगा और इस आनंद को पाने के लिए आपको कुछ करना भी नहीं। आप तो पहले हीं कह चुके कि आप स्वजन हैं | अब सिर्फ होना मात्र बच जाता है कि आप स्वजन हो जाईए। यह आत्मा जो हमारे अंदर बसा हुआ है ये परमात्मा की बहुत बड़ी देन है। क्योंकि अमीबा से उठा कर के आज जो हमें इंसान परमात्मा ने बना दिया तो हम वो अडुओं जैसे निखरते चले गए। पहले तो पत्थर हीं थे समझ लीजिए | उसके बाद कार्बन हुआ , उसके बाद जानवर हुए और जानवर से ये बड़ी बढ़िया चीज जिसे इंसान कहते हैं, परमात्मा ने बड़े प्यार दुलार से बना के संजोकर बना दिया। अब इस महान चीज को पाने के बाद क्या है? पूर्ण चीज बनाई गई | उत्तम में आना है | ठीक है | आपस का मेल जोल हमें क्यों अच्छा लगता हैं? क्यों हम स्पेशल बिंग (Special being ) हैं? इसको सोचना चाहिए | नहीं तो अब आप तो सुना ही मेरे पति अब यु.एन. (UN ) में चले गए हैं और वो भी कहते हैं कि ये जितनी भी संस्थाएँ हैं उनमें आत्मा नहीं है। जब तक इनमें आत्मा की चमक नहीं आएगी तब तक ये संस्थाएँ बिल्कुल क्षिंड हो रहीं| इनका सुगंध फैलेगा नहीं और यही बात हमारे सारी संगठनाओं की है| जो भी संगठना हम करते हैं, उसके अंदर हमको जानना चाहिए कि एक बड़ी नियोजित, एक आंतरिक, अंदर से एक इच्छा होती है कि हम सब ‘जन’ में समा जाएँ ,सबमें एकाकार हो जाएँ। हमें लोग महसूस करें और हम उनको महसूस करें। कोई हमें जानें की हमें क्या शिकायत है, हमें क्या तकलीफें हैं , हम कौन- सी खुशियों में रम रहे हैं । जब तक मनुष्य दूसरे में रममाण नहीं होता उसे मज़ा नहीं आता। एक शराबी भी होगा वो चाहेगा कि जब तक वो चार आदमियों के साथ शराब न पीए तब तक उसे मजा नहीं आए। इस सबके पीछे भी आत्मा की पुकार है। वो कहती है कि आप अकेले नहीं हैं| आप उस पूर्ण विराट चेतन के स्वरूप हैं | और जब तक आप सब भी नहीं समायेंगे आपको मजा नहीं आएगा और सहजयोग का कार्य सिर्फ यही है कि आपकी आत्मा को आपके चित में ला देना और जैसे हीं आपके चित में ये आत्मा प्रकाशित होता है उस वक्त आप सामूहिक चेतना में जागृत हो जाते हैं। मानें कोई आपको सर्टिफिकेट (Certificate) नहीं देना पड़ता, आपको ये नहीं कहना पड़ता कि हम सब भाई – भाई हैं, हम तो हमारे बीच में कोई दरमियान कोई भी इस तरह से दरार नहीं। कोई भी हम अलग नहीं हैं| हममें कोई स्वार्थ नहीं है आदि कुछ कहना नहीं पड़ता, ये घटित हीं हो जाता है । कुराने शरीफ में कहा हुआ है कि जब उत्थान का समय आएगा तब आपके हाथ बोलेंगे। आपके हाथ से आवाज आएँगी| उसका मतलब क्या है? हमारे हाथ बोलेंगें? मतलब यही कि जब चित में आपका आत्मा प्रकाश डालेगा, तब आपकी मज्जा संस्था में आपके नर्वस सिस्टम (Nervous System ) में ये ज्ञात होगा कि दूसरा कोई नहीं है| पराया कोई नहीं है | सब हमारे हीं अंदर हैं । अब जैसे कि बहुत लोग हैं चैरिटी को(–Not Clear–) कराया , उसपे भी मैंने बहुत काम किया है। लोगों को समझानें की कोशिश की | लायन सोसायटी (Lion Society) ये सोसायटी (Society) वो सोसायटी (Society) ठीक है | एक हद तक ठीक है, पर वो परमात्मा के नाम पर नहीं। ऐसे आप बनाइये लायन सोसायटी (Lion Society) जैसे कोई हॉस्पिटल (Hospital ) बना रहे थे, कुछ कर रहे है, ठीक है | लेकिन परमात्मा का ये काम नहीं | जब आप परमात्मा के हो जाते हैं तो दूसरा है ही कौन ? तो आप किसका सोशल वर्क (Social work)  करेंगे? आप किस पे उपकार करेंगे जब दूसरा कोई है हीं नहीं ? समझ लीजिए आपकी उँगली में यहाँ चोट आ गई और जो दूसरी ऊँगली जो सहला रही है उसे, तो क्या आप कहेंगे उससे कि भई तेरा बड़ा उपकार है , तूने मुझे सहला दिया। उसी प्रकार आपको अगर कोई चोट लग गयी और दूसरा सहजयोगी आ के आपसे कहे कि हमें पता है क्या चीज है और आप पर हाथ रखे और आप ठीक हो जाएँ तो ये समझ लेना चाहिए की वो सहजयोगी को भी इसका अहसास हो गया| आपके चोट का अहसास हो गया , और उसका दर्द भी उसे पता चल गया और क्योंकि वह दर्द हीं नहीं बर्दाश्त कर पा रहा है इसलिए आपका ही दर्द उसने उठा लिया। जब दूसरा कोई भी नहीं बच जाता है तभी ‘स्वजन’ होता है लेकिन स्वजन शब्द बहुत ही सुंदर है| शायद आपने उस वख़त समझा नहीं होगा इस बात को कि, स्वजन ही में सब है | दूसरा है ही कौन ? पराया है ही कौन? जैसे अभी कोई कहे कि माँ तुम्हारे बड़े उपकार हैं तो मुझे आती हँसी भई कैसी बातें कर रहे हो, किस पर उपकार कर रही हूँ..? तुम लोग ये बातें कर रहे हो | लेकिन ये होना पड़ता है | अभी आप हो नहीं तब तक ये बात, बात हीं रह जाती है। सब धर्म शास्त्रो में कहा है , हर जगह कहा है कि तुम्हारा पुर्नजन्म होना चाहिए। हम  किसी भी आप शास्त्र को लेकर बैठिए , उसमें लिखा हुआ है कि आपका बैपटिज्म (Baptism ) होना चाहिए , आपको पीर होना चाहिए और सारे ने लिखा है और किसी ने भी जैसे की (-Not Clear—है) हर एक में लिखा हुआ है कि आप को कुछ और होनें का है | अभी आप सिर्फ इंसान मात्र हैं लेकिन अभी आप अंदर हैं, आपका इनलाइटमेंट (Enlightment ) होने का है। आपमें अभी लाइट(Light) आने की है, अब बहुत से लोग सर्टिफिकेट (Certificate) लगा के घूमते हैं कि साहब हमने तो ब्रम्ह को जान लिया। हम तो इनलाईटेंड सोल (Enlightened soul ) हैं | ऐसे थोड़े हीं होता है | कोई झूठा सर्टिफिकेट (Certificate) गर हम अपनें को दे लें कि हम बहुत बड़े आदमी हैं, या कुछ अपनें को कहें कि साहब हम इस देश के प्राइम मिनिस्टर (Prime Minister) हैं तो क्या हम हो जाएँगे? अगर हम हैं तो हमारे अंदर  उसकी शक्तियाँ होनीं चाहिए और जब तक आप के अंदर आत्मा की शक्ति कार्य नहीं करती है, उसका असर नहीं दिखाती है, तब तक झूठी बातों पर टिके रहने से कोई फायदा नहीं होने वाला है | और सच्चाई तो ये है कि आपके अंदर, आपके हृदय में स्वयं साक्षात परमात्मा का बहुत ही सुंदर प्रतिबिंब स्थित है | और आपके अंदर वो भी शक्ति बैठी हुई है जो आपको वहाँ तक पहुँचा दे , जिसे की कुंडलिनी कहते हैं । कुंडलिनी उसे कहते हैं जो कि कुंडल मारे हुए है | साढ़े तीन कुण्डलों में , कुंडल का मतलब होता है जिसका क्वाएल्स (coils)  होता है अंग्रेजी, ये शक्ति स्थित है और ये शक्ति त्रिकोणाकार अस्थि में स्थित है | बिल्कुल साइनटीफीकली (Scientifically) आप देख सकते हैं । अब जैसे अभी इन्होंने बताया कि इनको डाइबिटीज़ की शिकायत है | उनको बताने की मुझे जरूरत नहीं थी, मैं खुद हीं जानती थी उनको यहाँ लेफ्ट (left ) नाभि जिसे हम कहते हैं वहाँ लेके आने लगे , कुंडलिनी बताने लगे कि यहाँ उनको शिकायत है | ये शक्ति जागृत करना भी पता नहीं हमने कहीं पूछा – पाछा तो है नहीं , लेकिन जन्म से हीं जानते हैं । एक हीं काम हमें आता है ,कुंडलिनी का जागृत करना | पर आप कहिए की मोटर चलाइए तो वो नहीं आता हमको | आप कहिए बैंक में आप जाइए और वो करिए मुझे अभी तक पैसा लेने नहीं आता। उसका बैंक का मुझे समझ में नहीं आता , मुझको तो कुछ भी नहीं आता दुनिया की चीज, मैं इतनी बेकार औरत हूँ कि मैं आपसे क्या बताऊँ | लेकिन कुंडलिनी का जागरण मुझे आता है। अब जब मुझे एक चीज आती है तो उसको लोगों को ये अहंकार क्यों होना चाहिए कि ये कौन होती है कुंडलिनी जागृत करने वाली। भई जब एक ही काम हमें आता है और वही चीज हम जानते हैं तो उसमें नाराजगी की कौन सी बात है ? और ये कुंडलिनी का जागरण आप भी कर सकते हैं |जैसे एक जला हुआ दीप दूसरे दीप को जला सकता है और दूसरा जला हुआ दीप अनेक दीपों को जला सकता है , उसी प्रकार आप भी स्वजन हर जगह बना सकते हैं। ‘स्वजन’ मेरे अपने लोग | ये लोग जब तक जागृत नहीं होंगें, कभी भी पूरी तरह से ‘स्वजन’ नहीं होंगें। अब जब कुंडलिनी का जागरण होता है तो यहाँ पर उसका नक्शा तो बना नहीं है लेकिन आपको मैं थोड़ा सा समझाने की कोशिश करूँगी कि वो चीज कोई भ्रामक कल्पना या अपनी बुद्धि की चातुरी या कोई बहाना या झूठ नहीं है | ये बिल्कुल सच्चाई है| आप देख सकते हैं कि जब कुंडलिनी जागृत होती है तो त्रिकोणाकार अस्थि में स्पंदन होता है| जैसे किसी का हृदय स्पन्दित हो रहा हो | आप अपनें आँख से देख सकते हैं | हर एक को नहीं होता है | गर आपका मामला ठीक है , आपका मध्य मार्ग जिसे सुषुम्ना कहते हैं, बिल्कुल ठीक है , उसमें कोई बीमारी नहीं है , कोई तकलीफ नहीं है और आप बिल्कुल मध्य मार्ग में रहने वाले , बहुत सुलझे हुए इंसान हैं तो कुंडलिनी झटाक से उपर चली आती है | तब तो महसूस होगा लेकिन इसमें गर कोई रुकावट हो तो आप अपनी आँखों से देख सकते हैं कि  इसका स्पंदन दिखाई दे रहा है । ये आपकी हरेक की स्वयं की ‘माँ’ है । सबके पास ये माँ है | आपके अपने जैसे आपके भाई-बहन होते हैं , तो आपकी एक ही माँ होती है | काफी भाई-बहनों की भी एक माँ हो सकती है लेकिन कुंडलिनी सिर्फ एक ही इंसान की व्यक्तिगत चीज है और ये समझ लें कि जितनी भी अनंत काल से आपको मालूमात हैं वो सब इस कुंडलिनी में रिकार्डेड (Recorded ) हैं | और जब कुंडलिनी उठती है तो वो देखती है कि कहाँ-कहाँ परेशानी है | पहले तो जहाँ परेशानी है वहाँ वहाँ जा करके वो हाथ मारेगी | उसको दूर करेगी और फिर अग्रसर होकर के और तालु से आ के उसे छेद देगी | इसे ब्रम्हरन्ध्र छेदन कहते हैं | और जब वो छेदन होता है तो आप देख सकते हैं कि आपके सर से ठंडी ठंडी हवा आने लगी । अब हम लोग क्योंकि अपने को सोचते हैं कि अभी हम लोग  डेवलपिंग कन्ट्रीज (Developing  Countries) हैं , नाम हीं अपना बनाया है डेवलपिंग कन्ट्रीज ( Developing Countries)| इससे बढ़ के और गलत बात कोई नहीं है | बात ये है कि गर एक आम के पेड़ को ये ख्याल आ जाए कि वो पेड़ बबुल का पेड़ नहीं है , इसी तरह से हम लोगों का डेवलपमेंट (Development ) गर बबुल के पेड़ बनने के तरफ करना है तो उसे कोई कुछ नहीं कर सकता (—Probable word —“देश” -) का जो डेवलपमेंट( Development)  है वो सिर्फ ऊपरी है| जैसे कि पेड़ ऊपर की तरफ आ जाता है पर उसकी जड़ें नहीं हैं | उनको जड़ों के बारे में कुछ भी मालूम नहीं, वो सिर्फ उपरी हैं और बगैर जड़ के , देख लीजियेगा ये देश टिकने हीं वाला नहीं और जड़ इस देश में है आपके | सारा उसका ज्ञान इस देश में है। इसीलिए आपके देश को योग भूमि कहा गया है। ये कहा गया है कि जो लोग महापुण्य किए हैं वही इस देश में पैदा हुए हैं | ये सही बात है और इसका आपको पड़ताना होगा | कौन करेगा ? तीन चार हजार आदमी होंगे ऐसे मैदान में और करीबन 90 फीसदी लोग खट से पार हो जाएँगे| ये मेरे देश की कमाल है और वहीं परदेश में जाइए तो एक एक पे मेरा हाथ टूटते रहता है। घबराती हूँ किसी नए देश में जाना होता है तो | मैं केवल भगवान पता नहीं कौन से नरक में जा रही हूँ | लेकिन हम लोग भी इसे समझ नहीं पाते हैं क्योंकि हम तो गरीबी देखते हैं। हम लोग ये देखते हैं कि हमारे यहाँ लोग भूखे मर रहे हैं | हम लोग ये देखते हैं कि उन लोगों के पास कोई भूखे नहीं हैं। उनके पास वाहन के साधन हैं और हमारे यहाँ कोई भी नहीं | हर तरह की चोरी-चकारी हम लोग करते रहते हैं | तो हमारा विश्वास टूटता जाता है, कि ये कैसे कि हमारे देश मे हीं सारा इसका ज्ञान का भंडार है। इसकी वजह ये है कि कभी भी हमने उसकी ओर नजर हीं नहीं करी जो हमारे पास है | जो हमारे पास धरोहर है | उतने सालों से हमारे पास पड़ी हुई उस चीज का हमने अंदाज ही नहीं लगाया कि हमारे पास कौन सा धन पड़ा हुआ है। हम तो पागलों की तरह उनके पीछे भाग रहे हैं और वो जाके कहाँ अटके , ये भी देखना चाहिए |या तो एटम बम (Atom bomb ) जैसी चीजें बनाके खोपड़ी पे रख ली है। सारी समाज की व्यवस्था हीं टूटी हुई है। किसी की बीबी किसी के पास , किसी का पति किसी के पास , किसी के बच्चे ओरफेनेज (Orphanage)  में , तो ऐसी बुरी हालत है | हम लोगों को उनको सीखना है। हमको उनसे कुछ सीखने का मुझे तो नजर नहीं आता | लेकिन हमने जो उनके पीछे दौड़ने की ठान ली है तब ऐसे लोगों को समझानें की भी बड़ी मुश्किल की बात है । अब जैसे साइंस (Science)  में जो भी आपको मालूमात हों , आपको आश्चर्य होगा कि अपने देश में सब ये मालूमात थे और वो सब चीज कोई ऐसी कठिन चीज नहीं है उनको जानना | लेकिन अपने यहाँ ऋषि मुनियों ने इसको सोचा कि पहले आत्मा हीं पे मेहनत करें | और फिर लोग आत्मा से चिंतित हों,  आत्मा से जागृत हों तो उनकी शक्तियाँ इतनी प्रबल हो जाएँगी कि फिर इन सब चीजों की जरूरत नहीं रह जाएगी | अपने आप जिसको जैसा चाहें वो साधन जुटा लेंगें  | लेकिन हम तो सोचते हैं कि ये तो सब बेकार की बातें हैं | इससे कोई अर्थ हीं नहीं है | फिर क्यों मंदिर हो आए और प्रार्थना कर आए ? चलो एक आध अपना कोई, ब्राह्मण को दो चार पैसे दे दिए, चलो हो गया, कुछ पूजा पाठ हो गयी, चलो बहुत हो गया भगवान का काम | भगवान सब के अंदर हीं हैं | और भगवान कौन हैं? सर्वशक्तिमान परमात्मा | वो सर्वशक्तिमान हैं| उनकी शक्तियों को हम लोग नहीं जान सकते | हम लोग जानते नहीं कि उनकी कितनी शक्तियाँ हैं| मैं कहूंगी ये बात तो हम देखते नहीं, आप लोग देखे होंगें बाग में हजारों फूलों से फल बन रहे हैं | हजारों को, करोड़ों को असंख्य ये कौन करता है ? आप गर एक आम का पौधा लगाएँ उसमें से आम हीं कौन निकाल रहा है ?आपके अंदर आप स्वयं देख लीजिए, Doctor लोग बता नहीं सकते कि हमारे अंदर की जो चीजें हैं  जिसको कि हम पेरा सिम्पथेटिक नर्वस सिस्टम (Para Sympathetic Nervous system ) कहते हैं , वो कहते हैं ऑटोनोमस (Autonomous)  हैं | उसको हम नहीं समझ पाएँगे , उसको हम नहीं बता पाएँगे | क्योंकि उनकी पहुँच नहीं है | ये ऑटो(Auto) कौन है ?  यही आत्मा है | लेकिन उन्होंने इस पर छापा मार दिया कि आप ऑटो (Auto)  हैं ? बस खत्म | आप इसको मान लीजिए आप ऑटो (Auto)  हैं | पर ये चीज क्या है ? ये आत्मा क्या है ? इसको पाया कैसे जाता है ? इसकी शक्तियाँ हमारे अंदर से कैसे बहाई जाती है? इसके बारे में कोई नहीं जानता । 14 हजार वर्ष पहले इस देश में मार्कण्डेय स्वामी ने इसके बारे में लिख रखा है | लेकिन वो बहुत गुप्त रूप से कार्य उन दिनों में होता था और उसके बारे में बहुत ज्यादा लोगों ने चर्चा नहीं की| सिर्फ अपने यहाँ वेद आदि जो शुरू हुए, उससे हीं आपको आश्चर्य होगा,  क्या साइंस (Science ) की उपलब्धि हुई | क्योंकि उन्होंने पंच महाभूतों को उनके देवताओं को जागृत करने की सिद्धि प्राप्त करी और उसी से फिर साइंस (Science ) की उपलब्धि होना शुरू हो गयी | दूसरा अपने यहाँ भक्ति मार्ग बहुत दिनों से चलता रहा | यहाँ परमात्मा (—Not Clear—-) सदगुरुओं की बातें होने लगीं | ये दो मार्ग अपने यहाँ रहे जिसे हम राईट साइड (Right side ) और लेफ्ट साइड (Left side) कहते हैं | और जो बीच का मार्ग है उत्थान का , यहाँ आप योग को प्राप्त होते हैं | ये मार्ग सुषुम्ना पर इसके बारे में ऐसे तो आप देखिये की इंद्र को भी रियलाइजेशन (Realization)  दिया गया था। हजारों वर्ष हो गए ये कार्य अपने देश में होते रहा। जैसे मैं कहूँगी उत्तर भारतीय लोगों को मालूम है कि राजा जनक के साथ नचिकेता एक उनके शिष्य बन के गए थे और उन्होंने उनसे कहा की हमें आत्मा का ज्ञान दो | उन्होंने कहा बेटा तुमको चाहिए तो मेरा पूरा राज्य ले लो | मुझसे ये मेहनत नहीं होने वाली | फिर उनकी बड़ी परीक्षा लेने पर एक इंसान को उन्होंने उस वख़त पार कराया था , वो नचिकेता था | और आज हजारों लोग पार हो रहे हैं | लोगों को विश्वास हीं नहीं होता की हजारों लोग पार कैसे हो रहे हैं | जब एक पौधा शुरू होता है तो एक ही फूल उसमें आता है | लेकिन जब बहार आती है तब हजारों ऐसे संसार में लोग आते हैं जो पार होते हैं और वो समय आ गया है | यही जिसे की उत्थान का समय रिसरेक्शन टाइम (Resurrection Time)  कहा गया है, लास्ट जजमेंट (Last Judgment) कहा गया है। यही कृत युग अभी आया हुआ है , और इसमें जो पाया है वो पाएगा और नहीं पाएगा तो वो पूरी तरह से खो जाएगा। आपको माँ के नाते और आपके अत्यंत निकट होने के नाते मुझे आपसे बहुत प्रेम पूर्वक विनती करनी है। इस ओर अंदाज करें और नज़र करें और अपने जीवंत अपने मनुष्य स्थिति को समझें  कि इससे आगे कोई न कोई चीज है, जिसे पाए बगैर इस साधन का कोई भी अर्थ नहीं निकलता | जैसे कि ये एक चीज है जब तक इसका साधन जब तक इसका आप में से नही जोड़ेंगें तब तक इसका कोई अर्थ नहीं | इसी प्रकार मनुष्य का भी कोई अर्थ नहीं निकलता जब तक ये आत्मा से एकाकार नहीं होता और आत्मा से एकाकार होते हीं उसके अन्दर से चैतन्य की लहरियाँ बहनी शुरू हो जातीं हैं | ये बिल्कुल सत्य चीज है | इसमें झूठ इतना भी नहीं है | लेकिन साइंस (science) वाले इसलिए नहीं मानेगें क्योंकि वो तो देखना चाहेंगें जो वो आँख से देखेंगें | पर जो अंतर आँख से देखेगा वो समझ सकेगा | लेकिन उसमे परेशानी ये है कि पहले अंतर आँख तभी खुलती है जब आपके आत्मा के दर्शन होते हैं | और जब  तक आत्मा के दर्शन नहीं होते तब तक लोग यही झगड़े में पड़े रहते हैं कि ऐसे कैसे हो सकता है | अब गर आप साइंटिस्ट (Scientist ) हैं तो आपको अपना दिमाग खुला रखना चाहिए | जैसे एक साइंटिस्ट (Scientist ) होता है वह अपना दिमाग बिल्कुल पूरी तरह से खुला रखता है। अगर उसका दिमाग बन्द हो गया और कुंद हो गया तो वो साइंटिस्ट( Scientist)  नहीं | और वो जो चीज का है कि जो चीज भी कहा जाय जो धारणा कही गयी है या हाइपोथिसिस (Hypothesis)  को आपके सामने रखा गया उसको वो पहले अंदाजता है कि वाकई में ये सही है या नहीं ? उसको अनेक एक्सपेरिमेंट (Experiment)  करता है , और जब वो सिद्ध हो जाता है तब उसे मान लेता है | क्योंकि हम लोग हिन्दुस्तानी इन साहब लोगों से भी बढ़ के हो गए हैं | हम लोग तो इसे देखना हीं नहीं चाहते | ये जानना ही नहीं चाहते | अब जब आप जानना हीं नहीं चाहते हैं और देखना हीं नहीं चाहते हैं तो कोई जबरदस्ती कोई चीज तो हो नहीं सकती | क्योंकि परमात्मा ने मनुष्य को स्वतंत्रता दे दी है | चाहे वो परमात्मा के साम्राज्य में प्रवेश करें और चाहे नर्क की ओर चला जाय | ये स्वतंत्रता तो परमात्मा ने हीं चुनी है | एक माँ के नाते हम तो यही कहेंगें कि बेटे तू तो परमात्मा की ओर चले | किसी तरीके कोशिश करो कि इधर हीं रहो , जिससे इसे तुम पा लो क्योंकि यही परम है, सारे धर्म का धन ये है | सारे आशीर्वादों का तथ्य यही तुम्हारा आत्मा है | जैसे अभी तुम अँधेरे में द्वैत में बैठे हो | जब तक तुम अद्वैत में खड़े नहीं हो जाओ , जब सिवाय ब्रह्म शक्ति जिससे कि सारे कार्य कर रहे हैं वो परमात्मा की प्रेम की शक्ति सर्वव्यापी चराचर है, उसको जब तक तुम महसूस नहीं करोगे तब तक तुम नहीं जान सकते कि ये सृष्टि में आने का आपका क्या मतलब है और आपका साधन क्या है | आज तक अंधेरे में बहुत से कार्य हम करते रहे | अंधेरे में बहुत सी बातें होती रहीं । वो थोड़ी बहुत अच्छी भी लगती हैं बुरी भी लगती हैं , और समझ में नहीं आता अब क्या करें ? सब लोग भ्रांति में हैं , कंफ्यूज (Confuse)  हैं | ये ठीक है या नहीं ? ये करना ठीक है या नहीं? इनकम टैक्स (Income Tax) दे देना ठीक है या नहीं? शरीर, सभी आलोकित हो जाते हैं | आपकी बीमारियाँ तो ठीक हो हीं जायेंगी कम से कम और कुछ न हो तो बीमारियाँ तो ठीक हो जाएँगी | आज एक साब आए थे | बहुत बड़े आदमी हैं | इन्होंने कोई गुरु रखे हैं| उनको दुनिया भर की बीमारियाँ हैं | उनको हार्ट ट्रबल(Heart Trouble) है उनको किडनी ट्रबल  (Kidney Trouble) है, उन को कोई दुनिया की बीमारी नहीं, जो नहीं है, और बहुत बड़े अफसर हैं | तो मैंने कहा साब आपने जो गुरु रखे हुए हैं उनका क्या ? किसलिए रखे हैं आप ? उनको कोई उपयोग है नहीं | अरे भई नौकर रखिए | वो भी बड़े काम करता है| कम से कम आपकी हेल्थ (Health) तो अच्छी रखता आपके गुरु सब का और उन्होंने इतना उनको रुपया खिलाया और गुरु महाराज जी बहुत अपने को समझते है कि हाँ हम मतलब कहाँ से अफलातून हैं , और उनसे यहाँ तक की छोटी सी बीमारी भी नहीं ठीक करते हैं | उल्टे उनके घर भर में सारी बीमारियाँ भरी पड़ी हैं । मानें ऐसे गुरु को मानना भी कोई बुद्धि का लक्षण नहीं है | अपनी बुद्धि को ताक पर रखने की जरूरत नहीं है | लेकिन ऐसे जगह हम अपनी बुद्धि को एकदम ताक पर रख देते हैं |बस किसी ने कुछ चमत्कार दिखा दिया , भागे उसके पीछे | चमत्कार सिर्फ एक ही होना है कि हमारी जो शक्ति है , हमारे आत्मा की जो शक्ति है , वो कार्यान्वित होनी चाहिए। हमारी शक्ति दिखनी चाहिए , कोई गर गुरु होंगें तो होंगें , बैठे रहें अपनी जगह | हमें क्या मिला ? स्वार्थ ! स्व का अर्थ जिसने पा लिया वही असल में स्वार्थी होता है | लेकिन वैसे स्वार्थ तो किसी पे है नहीं | ऐसे गुरुओं के पीछे भागने वाले लोग ,गलत रास्ते पे चलने वाले लोग बीच में तरस जाएँगे | और एक तरफ सोच पूरी तरह से परमात्मा को ढक करके की, परमात्मा हैं हीं नहीं , उनकी कोई शक्ति हीं नहीं है, सिर्फ साइंस हीं सब कुछ है | ये समझने वाले लोग भी एक तरह से उस सम्पूर्ण से वंचित हैं। एक तरह से चलने से कभी भी कोई कार्य नहीं होता। आज तक किसी आदमी को देखा है जो एक टांग पे चलता हो ? या कोई मोटर जो है जो एक ही तरफा चलती है ? बैलेंस का होना बहुत जरुरी है और इस बैलेंस के लिए हीं हमारे अंदर जो धर्मं की भावना बनाई गई वो है| लेकिन अब धर्म का मतलब तो पाखंड है और धर्म का मतलब है ,धर्म के नाम पर पैसा कमाना और इसका मतलब है धर्म के नाम पर अपना पेट भरना, बच्चों का पेट भरना और खूब रुपया इकट्ठा करना। अब एक साहब हैं , उन्होंनें 6 हजार करोड़ रुपया कैश (cash ) लोगों से खाया हुआ है। आप के देश के एक बड़े भारी माने हुए साधुजी हैं और उन्होंनें जिंदगी सिखाया है | रास्ते पर भीख माँग रहे हैं उनके घर लूट खा लिए और उनके बच्चे भी हैं वो बीमार और उनको एपिलेप्सी 

(Epilepsy)  भी है और छटपटा रहे हैं । ऐसे ऐसे राक्षस अपने देश से बाहर जाकर के रुपया खा रहे हैं, और हमारे हिन्दुस्तानी भी हैं उनके शिष्य बने हुए हैं | एक साहब से मैंने पूछा कि साब आप उनके शिष्य क्यों बने | कहने लगे वो हमारे आर्गेनाईजेशन (Organization) को पैसा देते हैं | मैंनें कहा एक दिन डूबेगा, आपका आर्गेनाईजेशन (Organization) समझ लीजिए। ऐसे पाप भरे रुपयों से आर्गेनाईजेशन (Organization) डूब जाएगा। आज मैंने जाना कि यहाँ रेलवे से बहुत से कर्मचारी आए हुए हैं| अब वो देखना चाहिए कि रेल्वे वालों को सहजयोग से क्या लाभ होगा | बिल्कुल प्रैक्टिकल (Practical) बात आपसे करें। अब अनुभव की बातें आपसे बताएँ कि जो एक्सीडेंट्स (Accidents)  होते हैं , कभी किसी ने जाना नहीं की एक्सीडेंट्स (Accidents) क्यों होते हैं ? किसी ने नहीं समझने की कोशिश करते कि एक्सीडेंट्स (Accident) क्यों होते हैं |और किस तरह से अचानक एक्सीडेंट्स (Accidents) हो जाते हैं | जबकि हम हर तरह से बचाव करते चलते हैं और उसमें चीजें पालते हैं और उसके इतने नियम हैं और इस तरह से हम लोग सीधे रास्ते चलते हैं तो भी एक्सीडेंट (Accident) हो जाते हैं | उसकी क्या वजह है ? कहने लगे कुछ न कुछ कल में खराबी हो गई | ठीक है | पर वो क्यों खराबी हुई | तो और आगे चलकर इतना कहेंगें की बूरी मति उसके अंदर आ गई | पर एक अच्छे भले आदमी के अंदर बूर मति क्यों हो गई ? वो क्यों गलत रास्ते पे चला गया ? उसके बारे कोई सोचता हीं नहीं | गर वो आत्मा में स्थितचित्त हो तो वो कभी भी गलत रास्ते पर नहीं चलेगा | उसको एकदम अंदाज हो जाएगा कि  इस तरह से करने से एक्सीडेंट (Accident)  होगा | जो आदमी पार हो जाता है , उसको एकदम अंदाज आ जाता है कि एक्सीडेंट (Accident ) होने वाला है , और आपको आश्चर्य होगा की एक बार एक सहजयोगी ट्रेन (Train) से जा रहे थे और उसमें एक्सीडेंट (Accident) हो गया और एक भी इंसान को चोट नहीं आई और ट्रेन (Train) को भी कोई शिकायत नहीं हुई | तो लोगों को समझ में नहीं आया कि ये कैसे हुआ  तो उन्होंने पूछा भई यहाँ कोई साधु संत हैं क्या ? कारण अपने देश में तो लोग मानते हैं | कोई साधु संत जरूर होगा लेकिन ये हुआ कैसे चमत्कार ? तो वो बेचारे अपने चुपचाप बैठे रहे | उन्होंने कुछ कहा नहीं| पर एक बार एक सहजयोगिनी राहुरी से बम्बई आ रही थी और उसकी बस ८० फीट नीचे गिरी, वे बारिश में | सिर घुमाके नीचे पड़ी थी और दोनों , सब लोगों नें ये सोचा कि वो तो खत्म हो गई लेकिन ऐसे वो मुडी की दोनों साइड (Side)  बराबर जमीन पर टिक गए और ( —Not Clear—   )  जमीन पर चुपचाप | तो सब लोग हैरान हो गए, पर ड्राईवर(Driver )मारे डर से भाग गए, (भाग गए ), ड्राईवर (Driver) मारे डर से भाग गए और ड्राईवर (Driver) ने ये सोचा कि फिर भी ये हुआ कैसे ? लेकिन आएगी तो मुझ पे हीं आफत | तो वो चाबी वहीं छोड़ करके भाग निकला | एक साहब ने कहा की साब मुझे तो बस चलानी आती है लेकिन अब इतने जोर से यहाँ गिरी है बस , तो चलेंगी कैसे ? अच्छा कोशिश करूँ। उन्होंने जाकर के चाबी चलाई, चाबी चलाई तो चाबी चल गई ,बस चल पड़ी और वो चले आए | तो उन्होंनें कहा की वहाँ कौन है बैठी है ? वो सोच रहे कोई साधु संत हो | हमारे सहजयोगियों के पास एक अँगूठी होती है | कैसे देहातों में बहुत काम सहजयोग का हो रहा है (-कहा !!ये!! —) ये बात है , सारे परमात्मा के शक्तिशाली देवदूत आपके शरण में आ जाते हैं | ये बात सही है , मेरी बात का सच मानिए । कृष्ण ने कहा है कि “योग क्षेमं वहाम्यहम्” जब योग घटित होगा तब मैं क्षेम करूँगा । इस बात को हम भूल जाते हैं। यहाँ लिखा है इंश्योरेंस कम्पनीज (Insurance companies)  ने, योग क्षेमं वहाम्यहम् ,यानी ये इंश्योरेंस कम्पनी  (Insurance company ) क्या श्रीकृष्ण हैं ? ये सिर्फ क्षेम को देखेंगे ,पर योग ? उनको तो सिर्फ क्षेमं वहाम्यहम् कहना चाहिए | पर वो साफ लिखते हैं “योगक्षेमं वहाम्यहम्”| पहले योग होना चाहिए | उसके बाद फिर क्षेम होता है |यह श्री कृष्ण ने कहा है । उन्होंनें ये क्यों नहीं कहा कि “क्षेम योग वहाम्यहम्,”| हमलोग परमात्मा से कहते हैं , हे प्रभु तुम हमारी रक्षा करो | कोई कहता है प्रभु हमें बच्चे दो| कोई कहता है हमें बहुत बच्चे हैं| हर तरह की हमारे पास (–और-Not Clear-) की क्या बात ? , कैपिटलिस्ट (Capitalist)   तो वो हुआ जिसके पास सर्व शक्तियाँ हैं। हम कहें हम सबसे बड़े कैपिटलिस्ट (Capitalist)  हैं |(हम क्यों कहें Capitalist ?) क्योंकि हमारे पास सारी शक्तियाँ हैं , और हमसे बढ़कर कोई कम्युनिस्ट (Communist) भी नहीं | क्योंकि इसको बाँटे बगैर मजा नहीं आता । साब अच्छा भला घर है , शादी शुदा हैं , सब आराम है , लोगों को समझ में नहीं आता है पागल जैसे क्यों घूम रहे हैं जंगलो में ? और देहातों में रहती हैं , जहाँ न बाथरूम (Bathroom)  है , न कुछ नहीं है | लोगों को समझ में नहीं आता , बात का भई मजा हीं नहीं आता ना | करें क्या ? तो सबसे बड़े कम्युनिस्ट (Communist)  भी हम हीं हैं , सबसे बड़े कैपिटलिस्ट (Capitalist) भी हम हीं हैं | और वो लोग जो कैपिटलिस्ट (Capitalist) कहते हैं, कम्युनिस्ट (Communist) कहते हैं, ये तो सब सुप्रीम (Supreme ) लोग हैं | और इसी लिए सब चीज जो है, खत्म हो गई | जहाँ कैपिटलिज्म (Capitalism) आया जहाँ फ्रीडम (Freedom ) आ गई , तो इंसान को यही पता नहीं कि फ्रीडम (Freedom ) कैसे इस्तेमाल करें ? यहाँ रशिया (Russia) में दबा के रखा हुआ है , बेचारे दबोचे हुए उसमें भी (—Not Clear—–) आप किसी को दबोच करके बताईए, तो पशु , पशु जैसे चीजें नहीं ? पाश्विकता है | वो सिर्फ खाने पीने के लिए आपको फ्रीडम (Freedom ) है , सोचने समझने के लिए नहीं | तो पशु कहाँ हो गए | वो पार्श्व में बैठे हैं  और जिनके पास स्थित है वो चले नरक के प्रति | वो नरक की ओर बड़ी तेजी से चले जा रहे हैं  | तो इंसान न तो स्वतंत्रता को झेल पाता है , ना तो पैसे को झेल पाता है, ना सत्ता को झेल पाता है | किसी भी चीज को झेल हीं नहीं पाता है । सत्ता मिल गई ,चोरी चकारी शुरू हुई , हर तरह से (Not Clear-)करना शुरू हो गईI किसी का ख्याल नहीं, किसी के लिए मोहब्बत नहीं , देश का प्रेम नहीं , किसी का विचार नहीं, क्या वजह क्या है ?  इसकी वजह यही है कि अपने अंदर आत्मा की जागृति नहीं है | जब आत्मा जागृत हो जाता है तो मनुष्य इन सब चीजों से ऊपर उठके देखता है और उसे लगता है कि मुझे सत्य प्रकाश दिख गया । माँगनेवाला कौन ? किसी को देना हीं है , देना हीं है , देना हीं है | लेने का मेरे कुछ अधिकार ही नहीं और मज़ा हीं नहीं आता लेने में | दे भी क्या सकता है इंसान | जो देता है , उसको हजार गुना परमात्मा देते हैं | लेकिन उसको देनें का क्या ? उसी से बात विचार खूब तोड़ करके उसको जरा आपने दे भी दिए तो वो तो बचपना है आपका | ठीक है ,परमात्मा उसे स्वीकार भी करते हैं | कृष्ण ने कहा है “पुष्पं फलं तोयं” जो भी दोगे ले लेंगें | लेकिन देने के लिए क्या कहते हैं अनन्य | अनन्य शब्द पे खेल है | क्योंकि बड़े भारी राज्य कारण थे । श्री कृष्ण राज्य कारण के ही साक्षात् अवतार थे। डिवाईन पॉलिटिक्स (Divine Politics ) के वो अवतरण थे | उनका अनन्य भक्ति करो | अनन्य | अनन्य मानें क्या ? मानें रियलाइजड सोल (Realized soul )| जब दूसरा कोई नहीं होता | “स्व-जन” हैं | माने की खरी खरी बातें समझने की है तो साफ कह दें, अनन्य करें | कर्मयोगी का मानें उन्होंनें समझा दिया बाबा, कि कर्म करो लेकिन परमात्मा पे छोड़ो | हो हीं नहीं सकता | एब्सर्ड (Absurd) , यही पॉलिटिक्स (politics) है कि एब्सर्ड कंडीशन (Absurd  condition)  डाल दी | कर्म करो परमात्मा पे छोड़ो | कभी हो हीं नहीं सकता | बहुत से लोग कहते हैं , माताजी मैं जितना भी कर्म करता हूँ ब्लैक मार्केट (Black Market) करता हूँ जो भी करता हूँ परमात्मा पर छोड़ता हूँ | जो भी चोरी चकारी करता हूँ तो परमात्मा पर छोड़ता हूँ | सब परमात्मा हीं करवा रहे हैं। अच्छा भई , तुम्हारे परमात्मा जैसे तुम्हारे गोद में बैठे हुए हैं | जो कहो सो करते रहते हैं | तो उन्होंने हीं कहा कि “कर्मण्येवाधिकारस्ते” कर्म को करते रहो फल तुम्हारा नहीं |लेकिन इसमें  भी बड़ी डिप्लोमेसी (Diplomacy )  है क्योंकि एब्सर्ड (Absurd ) बात है | आदमी कभी भी जो कर्म करेगा उससे छुटकारा नहीं पा सकता | वो ये नहीं कह सकता कि मैं कर्म को नहीं कर रहा हूँ | परमात्मा कर रहे हैं । इसी तरह चाहे कुछ भी कह दें , पढ़ लिख कर के कुछ भी कर के क्योंकि अभी भी वो इसी भ्रम में , इसी मिथ्य में बैठा हुआ कि मैं कर रहा हूँ | क्योंकि उसका अहंकार (तो अभी गया नहीं ) वो तो अभी घटा नहीं | तो वो ये जानते हैं कि मैं हीं कर्म कर रहा हूँ | पर हम कर्म ही क्या करते हैं ? सारे मरे कर्म करते हैं | गर एक गर कुर्सी है ये बना ली तो ओ हो हो हो आप सोचते हो क्या बना ली | अरे ये तो मर गया इसने कुर्सी बना ली | कोई जीवित कार्य किया अपने ? एक फूल में से तो फल नहीं निकाल सकते , आप कर्म ही क्या कर रहे हैं ? कितना अहंकार मनुष्य में है की मैंनें ये कर्म किया , मैंने ये कर्म किया , मैंने वो कर्म किया | सब परमात्मा पर छोड़ दिया |ये दूसरा भ्रम है। जब आप पार हो जाते हैं तब आप कहते हैं , जा रहा है , उनका आ रहा है | जैसे आप कोई तीसरे पुरुष हो गए | आपकी भाषा अकर्म में बदल जाती है | आप कर्म नहीं करते, फिर घटित होता है। एक दिन किसी ने हमसे कहा माँ हमारे लड़के को जरुर प्यार करिए | इसीलिए मैं निर्विचार के पीछे आईं हूँ इसको जरुर पार करिए | मैंने कहा देखो भाई वो तो तुमनें से ना तुम प्यार तुम खुद पार हो ? हो जाओ तो हो जाओ, नहीं हो तो नहीं हो | वो आए वो कहाँ से पार होने वाले |  उनके भी हाथ टूटे मेरे भी हाथ टूटे | कहने लगे माँ पार करो | मैंने कहा तुम दे दो सर्टिफिकेट | तुम यदि पार हो तो दे दो | उसमें ऐसे कैसे भूतों को सर्टिफिकेट दे दिया जाए ? मैनें कहा यही तो बात है | जब पार हो ही नहीं तो आप कैसे कह रहें हैं कि ये पार हो गए। पार होना पड़ता है | जैसे कि अंकुर फूटना पड़ता है  कोई बीज को कहे कि जीवित हो गया और इसमें अंकुर फूट गया तो आप मान लीजिएगा ? लेकिन अंकुर फूटना भी एक जीवित क्रिया है, और वो अपने आप स्वयं घटित होती है इसीलिए वो सहज है | सहज माने आपके साथ जो पैदा हुई , ऐसी जो क्रिया है और उससे जो आप योग को प्राप्त करते हैं वो सहजयोग है। वो सब चीज आपके साथ निहित है | आपके अंदर है | सब चीज पूरी तरह से अच्छे से बनाई गई है। आप इसके अधिकारी हैं | आप खुद से प्राप्त करना है| इसमें कुछ करने का नहीं | बहुत ही सहज सरल बात है | इसके लिए आपको कुछ भी करने का नहीं | क्योंकि आप करते क्या हैं ? एक बीज को अगर जगाना है तो माँ के अंदर छोड़ दीजिए | माँ अपने आप जगा देती है | फिर बीज जगने की बाद फिर मेहनत करनी पड़ती है | उसे जमाना पड़ता है और वहीं बहुत से सहजयोगी फेल (Fail)  हो जाते हैं । आपको बनना पड़ता है क्योंकि जब आपके पास एनर्जी (Energy ) आ गईं , तब तो सब ठीक है पर एनर्जी (Energy) आने के बाद उसका एडजस्टमेंट (Adjustment) और उसको ठीक से चलाना , इस मशीन को समझना, ये काम आपका होता है। गर कोई आपको मोटर दे दे तो आप क्या मोटर वाले हो जाएँगे ? जब तक आप मोटर हीं नहीं चलाना जानते, तो उसका कोई फायदा नहीं | इसी प्रकार सहजयोग में पहली स्थिति में तो आप इसको पाते हैं , जिसे की आप कह सकते हैं कि हाथ से चैतन्य की लहरियाँ अंदर की ओर बहती हैं और उसके बाद आप उसमें बढ़ते हैं | लेकिन इसके लिए चहिये कोई, मराठी में है ‘येऱ्या गबाळ्याचे काम नव्हे हे’  रामदास स्वामी ने कहा अब ये अवधूत बस का नहीं है | इसके लिए चाहिए कोई पक्के से लोग , बहुत सीरियस (Serious) लोग चाहिए और इसीलिए मैं कहूँगी की अपने देश से भी जो सर्वोच्च देश हैं, उत्तम देश हैं वहाँ ऐसे साधु संत पैदा हुए हैं जो परमात्मा की खोज में कमर कस के लगे हैं । उन्होंने सिर्फ Science  ही नहीं खोजा वो परमात्मा को भी खोज के छोड़े | जब वो सहजयोग में आते हैं , तो ऐसे लग जाते हैं कि आप हैरान हो जाइएगा कि जितना ये जानते हैं, हमारे बड़े बड़े पंडित नहीं जानते | ये चीज हमारे अंदर नहीं | हम लोग खिल्लरता से कुछ उजडे उजडे से उखड़ी उखड़ी चीजों में हमारा मन लगा रहता है | और ऊपरी तरह से हम ,हर हम अपना बर्बाद कर देते हैं। जब तक कोई बड़ी आफत न आ जाए तब तक हम ये नहीं सोचते कि हमें गहन में उतरना है और हम बहुत बडी चीज हैं | सोचिए एक तो हम मनुष्य लोग, दूसरे हम भारतीय हैं, और इस बड़ी चीज को हम खो दे रहे हैं | सारे संसार की जिम्मेदारी आज भारतीयों पे है | और सारा संसार आपके चरण छू लेगा, जिस दिन आप इस महान शक्ति को अपने अंदर प्रस्थापित करेंगें | तो मेंरी स्वजन वालों को और सबसे विनती है, ठीक है, आप कार्य कर रहे हैं , आपका बहुत कार्य बढे हैं | लेकिन इसमें ये भी कोशिश करें कि ‘स्वजन’ की जो आत्मा है उसे जागृत करें । उसको करते हुए आप देखें , आपके हाथ खुल जाएँगे | आप हजारों लोगों का भला कर सकेंगे | हजारों लोगों को आप चंगा कर सकेंगे | हजारों लोगों की मानसिक दुर्दशा जा सकेगी | कितनी ही लोगो की गरीबी और हर तरह की लाचारी खत्म हो जाएगी | एक नया ही समाज तैयार हो जाएगा | यही स्वजन उठ करके वहाँ पहुँच जाएगा | मुझे पूर्ण विश्वास है कि एक दिन ऐसा आएगा कि स्वजन की ये दशा मैं देखूँगी , अपने आप हीं | अब मेरा पूरा आशीर्वाद आपके साथ है | आज बहुत मैं खुश हूँ कि आज आप लोगो ने बुलाया और आप सबसे फिर मुलाकात हुई और जैसे कि कोई माँ को अपने खोया हुआ बच्चा या बडे दिन बाद बच्चा मिल जाए तो (—-Not Clear—) आनंद बढ़ सकता है | इसी प्रकार मेरे आनंद का कोई भी मै अंदाज नहीं लगा पा रही। मेरे समझ में हीं नहीं आ रहा था कि मैं किस तरह से इसको व्यक्त करूँ। आशा है आप मेरी कोई बात का बुरा नहीं मानेंगें और जो भी मैंने कहा उसको पूरी तरह से विचार करेंगें | आपको  अगर कोई प्रश्न हो तो आप लोग पूछ सकते हैं और उसके बाद गर आप चाहे तो मैं रीयलाएजेशन Realization का भी प्रोग्राम (Program ) कर सकती हूँ।    “थोड़ा पानी चाहिए मुझे “!

कोई प्रश्न है तो पूछिये ना , पूछना चाहिए (–आँ-) अच्छा ठीक है(–अच्छा कुछ कम पे –)अच्छा ठीक है,(—-Not Clear—–) अच्छा आपने इससे पहले ये पूछा की ध्यान में आना और ध्यान को प्राप्त करना और आनंद को प्राप्त करना इसमें कितना समय लगता है ? इसमे कोई समय नहीं लगता , क्योंकि ये जीवंत क्रिया है किसी किसी को तत्क्षण में हो जाता है और कोई ध्यान करना नहीं होता है  | आप ध्यान में होते हैं और जब कुंडलिनी आपके आज्ञा चक्र को लाँघ जाती है , तो आप निर्विचार हो जाते हैं |उसी वखत पर गर वो स्थित हो जाए तो निर्विचारिता बढ़ती जाती है। जैसे कि एक विचार उठता है तो गिर जाता है फिर दूसरा विचार उठता है फिर गिर जाता है | इन विचारों से बीच में एक छोटी सी जगह होती है जिसे विलंब कहते हैं | तो आप या तो पास्ट (Past) में रहते हैं या फ्युचर (Future) में रहते हैं | ऐसे भूत में रहते हैं या भविष्य में रहते हैं, लेकिन वर्तमान में प्रेजेंट (Present) में आप नहीं रहते | तो कुंडलिनी जब राइज (Rise) करती है , तो वो इन विचारों को लंबा कर के और ये विलंब को बढ़ा देती है | उसके कारण जब कुंडलिनी आज्ञा से ऊपर चढ़ जाती है, आज्ञा चक्र से, आज्ञा चक्र से जागृति होने से आपके अंदर वो दो संस्थाएँ हैं, जिसको की मन और अहंकार कहते हैं, दोनों ही एकदम छिप जाते हैं | जैसे कि कोई बैलून को प्रेस कर दे । गुब्बारे और दोनों गुब्बारे एकदम छिप जाने से तालु की जगह खुल जाती है | उससे आपकी जो पाप और वो जो कल्पनाएँ जितने संस्कार हैं , जो भी आपके हीं गर्त में होगा वो सब छिप जाती है| आज्ञा चक्र बहुत हीं इम्पोर्टेन्ट(Important) है, बहुत – बहुत उपयोग है | जब ये जागृत होता है तो उसकी जो शक्ति है जो ये हैं कि ये आपकी जो भी पाप कर्म आदि वगैरह जो चीजों को आप सोचते हो वो सब खींच लेती हैं और दूसरी तरह से आपका अहंकार को भी खींच लेती हैं | और जैसे हीं ये छिप जाता है तो कुंडलिनी उसी ब्रम्हरंध्र को छेदी देती है , जिस वक्त आज्ञा चक्र से कुंडलिनी ऊपर जाती है , जिसे की अंग्रेजी में Limbic Area  कहते हैं जिसे की सहस्त्रार कहा जाता है संस्कृत शब्द में , जिससे कि हजारों से नाड़ियाँ जिसे की सहस्रार कहा जाता है, उसी बीच कुंडलिनी प्रवेश करती है , तब आप निर्विचार समाधि में जाते हैं | ये तत्क्षण हो जाता है | उसी समय | तत्क्षण हो जाता है और किसी किसी को नहीं भी होता है | क्योंकि जो आदमी बहुत ज्यादा सोचता है, उसका आज्ञा चक्र जरूर गड़बड़ रहेंगा | उसका आज्ञा चक्र घुमाते हुए हो सकता है | इस प्रकार ये चीज आप सबके लिए ये नहीं कह सकते है कि 2 मिनट में होगा कि 4 मिनट में होगा | वैसे ही किसी पेड़ में एक साल बाद फल लग जाते हैं | किसी पेड़ में दस साल बाद लग जाते है। इसी प्रकार ,पर सबको हो हीं जाता है। 10 साल वगैरह कभी नहीं लगते ये भी समझ लें , लेकिन सबको ये घटना घटित हो हीं जाती है | वो चाहे आप किसी भी दरजे के हों , किसी भी जाति के हों , किसी भी रंग के हों ,किसी भी स्थान के हों , ये खट्ट से होता है | और किसी को जरा समय लग जाता है | कोई हर्ज नहीं | हमें तो आपके प्रति पूर्णतया पूरी तरह का पेशेंस (Patience)  है और हम उसको बड़े तटस्थता से काम करते हैं | तो आपको भी इसी प्रकार होना चाहिए। आपको भी अपने प्रति इसी प्रकार एक बड़े सहानुभूति से देखना चाहिए | तो कार्य बढेंगा तो आप ध्यान में हो जाएँगे | अब दूसरी बात आपने पूछी कि मेरे बारे में कि मुझे ये कब हुआ और ये सब मैंने किया या सब चीज जो भी हो , तो अपने बारे में बताने में यही है तो अभी तक जिसने – जिसने बताया उसको या तो फाँसी पर चढ़ा दिया गया और या तो उसके गर्दन काट दी और या तो उसको जहर दे दिया | अभी तक तो ऐसे ही हाल रहा | बहरहाल तो बताने से अपने बारे में ये सोचती हूँ कि कभी न कभी तो बताना हीं पड़ेगा और आपको भी पता चल हीं जाएगा हमारे बारे में |( किसी सहजयोगी का आवाज) नहीं-नहीं-नहीं कष्ट नहीं है |कष्ट की कोई बात हीं नहीं है | आपसे बता रही हूँ, बताती हूँ| तो अपने बारे में , यही बताना है कि पहले आप अपने बारे में जान लीजिए फिर मेरे बारे में भी आप जान लीजियेगा। लेकिन ये कार्य मैंने 1970 से शुरू किया | 1970 से कुण्डलिनी का सामूहिक जागरण का कार्य मैंने शुरू किया। अब आपको आश्चर्य होगा कि भृगु संहिता के पहले एक नाड़ी ग्रंथ निकाली | उससे पहले हजारों वर्ष पहले भृगु संहिता लिखी गई | उससे पहले संस्कृत में एक नाड़ी ग्रंथ लिखा गया | उसका रिविजन (Revision) 300 साल पहले एक भुजेन्द्र करके हैं उन्होंने किया और उन्होंने लिखा कि 1970 से ये कार्य शुरू होगा | फिर सहज में कुंडलिनी जागृत होएगी और लोग पार हो जाएँगे और अस्पताल नाम की कोई भी संस्था बचने नहीं पाएगी । अब वही कार्य हो रहा है | अच्छा अपने देश में तो बड़े द्रष्टा हो गए पर आश्चर्य की बात है कि लंदन में भी 100 साल पहले एक विलियम ब्लेक नाम के बड़े भारी द्रष्टा हुए | उन्होंने सहजयोग के बारे में पूरा वर्णन किया कि सहजयोग कहाँ से शुरू होगा उसनें एक्सेक्ट excact  पते बताए की इस जगह से शुरू होगा और फाउंडेशन Foundation कहा पड़ेगा और मेरे घर कहाँ होंगें उसका बराबर पता उन्होंने बताया | यानी 100 साल पहले उस द्रष्टा ने सब देख लिया था कि ये कार्य होगा | तो तीसरी बात आपने कही की बचपन से आप अपने बारे में कोई बात बताएँ | तो ये बताना है कि बचपन से मैं जानती थी कि ये कार्य मुझे करने का है और मेरे पिता जो थे, वो भी स्वयं बहुत पहुँचे हुए पुरुष थे  और इन्होंने फिर मुझे ये बताया कि मनुष्य की दशा , जो है , कैसे इतनी बड़ी गेप्पिंग Gapping ? पहले मनुष्य को तुम समझो | क्योंकि जब तक तुम मनुष्य को नहीं समझोगी, तब तक मनुष्य तुमको नहीं समझेगा | क्योंकि कोई इंसान गर 10 वीं मंजिल पर पैदा हुआ और वह 10 वीं मंजिल की चीज देखता है और गर कोई जमीन हीं पे है, तो वो , वो चीज नहीं देख पाएगा जो 10 वें मंजिल पे हैं | तो जरूरी है कि उसको कम से कम दूसरे, तीसरे मंजिल तक पहुँचा दो | तो इसी प्रकार सहजयोग भी है और इसलिए 1970 से मैंने ये कार्य को शुरू किया और आज ये कार्य बहुत ज्यादा बढ़ गया है और देहातों में भी ये कार्य अत्यंत जोरों से हो रहा है। आज आप जानते है कि जीवन में बहुत से कार्य इसलिए मैंने किए हैं क्योंकि बहुत आवश्यक है। एक तो ये की विवाह | सहजयोग में विवाह , रिश्ते को बहुत मानी है, हम लोग विवाह को बहुत ऊँची चीज मानते हैं | विवाह एक यज्ञ है, लेकिन उत्तमोत्तम सबसे बढ़िया विवाह हो। हमारे यहाँ अनेक विवाह होते हैं। पिछले साल दिल्ली में करीबन 12 विवाह हुए | उसमें कुछ हिन्दुस्तानियों के बाहर विवाह हुए , कुछ बाहर के लड़कियों ने यहाँ शादियाँ करी और कुछ उनके आपस में शादियाँ हुई , कुछ हिन्दुस्तानियों की शादियाँ हुई । लंदन में एक बार 16 विवाह हुए और एक बार 22-21 विवाह हुए और विवाह को हम इसलिए मानते हैं क्योंकि विवाह तो घरौंदा है जिसमें बच्चा पनपता है , बड़ा होता है, मनुष्य की सारी-श्रुष्टि-बनती है | आज परदेश में यही सबसे बड़ा प्रश्न है कि उनके साथ विवाह नहीं हुए उनके बच्चे किसी के माँ-बाप ही नहीं होते | सब अनाथ हैं | तो अच्छे विवाह बनाना एक महत्वपूर्ण कार्य है। इसलिए मैंने विवाह किया और एक कार्य ये मैंने जीवन में किया कि विवाह करें और विवाह करने के बाद बच्चों को संगोपन करना उनकी पूरी देख भाल करना और जब तक उनको ठीक से नहीं दिखा दिया तब तक मैंने सामाजिक कार्य नहीं शुरू किया , क्योंकि उससे पहले करना भी उचित न होता क्योंकि हम गर अपनी यंग ऐज (Young Age ) में चाहते कि हम माँ बनें , तो कोई हमको मानता ही नहीं कि हम माँ हैं | हम तो माँ बचपन से हीं थे लेकिन हमको कौन मानता ? इसलिए इस उम्र पे आने पर जब हमनें इसका पता लगाया कि मनुष्य की कुंडलिनियों में क्या क्या दोष होते हैं, इसके अंदर किस तरह से परम्युटेशन एंड कॉम्बिनेशन (Permutations   and  Combinations ) होते हैं, किस तरह से कुंडलिनी का राग छेड़ा जा सकता है। हर एक के अंदर सूक्ष्म से हमने बहुत ही इसका पता लगा कर के 1970 में ये कार्य शुरू किया | और इसके बाद हम कहेंगे जरूर की हमारे पति भी बहुत हीं ज्यादा उदार पुरूषार्थ के हैं । उन्होंने बहुत हमारी मदद की शुरू से | पैसे से कोई चीज , हम तो पैसा नहीं लेते हैं आप जानते हैं | हरेक चीजों में हमारी मदद की | हमारा अमेरिकन Tour जो था,  हमारे भाइयों ने हमारी बड़ी मदद की | वो सारे अमेरिकन Tour में उन लोगों ने रुपया पैसा दिया, जिससे हम परदेश में जा सके और वहाँ कार्य शुरू किया और बढ़ते बढ़ते आज वो कार्य काफी बढ़ गया | इस प्रकार एक छोटे से हमने आपको बताया कि हम उसी कार्य को करने के लिए संसार में आए हैं और यही कार्य हमें करने का है और आप असल में हमारी शक्ति हैं | आप के बगैर हम ये कार्य नहीं कर सकते | जितना भी हमारे अंदर हो उससे कोई फायदा नहीं , जब तक आप लोग इसे नहीं पाइएगा , हमारे लिए बेकार है | क्योंकि माँ का तो आप जानते हैं कि जब तक उसके बच्चे नहीं पनपते, उनसे कोई भी चीजें जब तक उसके बच्चे उसकी शक्ति को नहीं प्राप्त करते तब तक उसे कोई चीज नहीं | तो भाई आपको प्रश्न ( एक सहजयोगी का प्रश्न-)

श्रीमाताजी:- All right, Now his question is that when we are in the process of achieving some goal and then suddenly  we find , we are diverted from that goal and we go to another diversion what is the reason for that ?  Reasons can be many.  The reason, one of the reasons is, may be your goal is not correct may be that God doesn’t want you to go to that goal, if your goal is right and then still you are pursuing the goal, may be that the God will, you are not supported by from spirit or we can say the angel and there are bad things now.for example suppose in your family somebody ————-