Shri Mahakali Puja

(भारत)

1982-12-19 Mahakali Puja Talk: Desire Within, Lonavala, India, DP-RAW, 62' Download subtitles: CS,EN,ES,FR,JA,LT,PL,PT,RU,ZH-HANS,ZH-HANTView subtitles:
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Shri Mahakali Puja, Lonawala, Maharashtra (India), 19 December 1982.

[English to Hindi Translation]

HINDI TRANSLATION (English Talk) Scanned from Hindi Chaitanya Lahari आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने के पश्चात् पहली योग के इस महान देश में आप सब सहज-योगियों का स्वागत है। आज सर्वप्रथम बाधा जो आपके सम्मुख आती है वो ये है कि आप अपने परिवार के विषय में सोचने लगते हैं, “कि अपने अन्तस में हमें अपनी इस इच्छा को स्थापित करना है कि हम साधक हैं। तथा हमें पूर्ण मेरी माँ को जागृति नहीं प्राप्त हुई. मेरे पिताजी को उत्क्रान्ति एवं परिपक्वता प्राप्त करनी है। आज की जागृति नहीं हुई, मेरी पत्नी को जागृति नहीं हुई. मेरे बच्चों को जागृति नहीं हुई।” आपको ये समझ पूजा पूरे ब्रह्माण्ड के लिए है। इस इच्छा से पूरा ब्रह्माण्ड का ज्योतिर्मय होना चाहिए। आपकी लेना चाहिए कि ये सारे सम्बन्ध सांसारिक हैं । इच्छा इतनी गहन होनी चाहिए कि इससे आत्मा संस्कृत भाषा में इन्हें लौकिक कहा जाता है, ये प्राप्ति की शुद्ध इच्छा, महाकाली शक्ति से निकलने अलौकिक नहीं हैं, ये सांसारिक सम्बन्धों से परे नहीं वाली पावन चैतन्य-लहरियाँ बहनी चाहिए। यही हैं। सांसारिक सम्बन्ध हैं। सारे मोह सांसारिक हैं । इस सांसारिक माया में यदि आप फँसे रहे, क्योंकि आप जानते हैं कि महामाया शक्ति आपको ऐसा सच्ची इच्छा है। बाकी सभी इच्छाएं मृगतृष्णा सम हैं। आप लोग विशेषरूप से परमात्मा द्वारा चुने गए खिलवाड़ करने देती हैं, तो आप इसमें किसी भी हैं, सर्वप्रथम इस इच्छा की अभिव्यक्ति करने के सीमा तक जा सकते हैं। लोग मेरे पास अपने लिए और फिर पावनता की इस गहन इच्छा को सम्बंधियों माता-पिता आदि को लेकर आते हैं और प्राप्त करने के लिए परमात्मा ने आप लोगों को अन्ततः उन्हें पता चलता है कि उन्होंने ऐसा करके विशेष रूप से चुना है। आपने पूरे विश्व को पावन बहुत गलत किया। उन लोगों ने अपने जीवन के करना है, केवल साधकों को ही नहीं उन लोगों बहुत से दिन उन लोगों पर बर्बाद कर दिए जिनमें को भी जो साधक नहीं हैं। इस पूरे ब्रह्माण्ड के श्रीमाताजी का चित्त प्राप्त करने की बिल्कुल भी चहुँ ओर आपने अन्तिम लक्ष्य, आत्मा-प्राप्ति की योग्यता नहीं है। इच्छा, के परिमल (Aura) का सृजन करना हैं इस बात को आप जितना जल्दी महसूस कर लें इच्छा के बिना इस ब्रहमाण्ड का अस्तित्व ही उतना अच्छा है कि इस बात से कोई अन्तर नहीं नहीं होता। आदिशक्ति (The Holy Ghost) ही पड़ता कि आपमें तो यह इच्छा है परन्तु आपके इन परमात्मा की इच्छा हैं। वे सर्वव्याप्त शक्तित हैं. वही तथाकथित सांसारिक सम्बंधियों में नहीं है। हमारे अंतःस्थित कुण्डलिनी हैं कुण्डलिनी की ईसा-मसीह को जब कहा गया कि उनके भाई-बहन बाहर प्रतीक्षा कर रहें हैं तो उन्होंने कहा, ” कौन केवल एकमात्र इच्छा है- ये है आत्मा बनना। किसी अन्य चीज़ की यदि आप इच्छा करें तो मेरे भाई और कौन मेरी बहनें” ? अतः व्यक्ति को कुण्डलिनी नहीं उठती। जब इसे पता लग जाता ये बात महसूस करनी है कि जो लोग हर समय है कि सामने बैठे साधक के माध्यम से ये इच्छा अपनी पारिवारिक समस्याओं में फँसे रहते हैं और पूर्ण होने वाली है तभी ये जागृत होती हैं । आपमें मेरा ध्यानाकर्षण भी करना चाहते हैं तो आप जान लें कि मैं उनके साथ केवल खिलवाड़ कर रही हैँ। यदि इच्छा न हो तो कोई इसे जगा नहीं सकता। सहजयोगी को कभी अपनी इच्छा अन्य लोगों पर आपके लिए ये चीजें मूल्यहीन हैं। उत्थान के लिए नहीं थोपनी चाहिए पहली आवश्यकता ये है कि आप कोई इच्छा न 22

Hindi Translation (English Talk) करें। अपने सगे-संबंधियों में शुद्ध इच्छा को न सहजयोग में आपको अपनी इच्छा शुद्ध इच्छा बना खोजें। महाकाली शक्ति की स्थापना का यह लेनी चाहिए । आपको बहुत सी चीजों में से निकलना पहला सिद्धांत है। भारत में जहाँ लोग विशेष रूप होगा, परन्तु जो लोग अपने परिवारों के मोह में फँसे से अपने परिवारों में फँसे हुए हैं. यह बहुत बड़ी हैं, उनसे बंधे हुए हैं उन्हें ये देखना होगा कि समस्या है। आप यदि एक व्य क्ति को कहीं वे सहजयोग को अपने किसी सम्बंधी पर थोप आत्म-साक्षात्कार देते हैं तो यह देखकर हैरान हो तो नहीं रहे हैं। कम से कम उन्हें मुझ पर तो जाते हैं कि उसके सभी सगे-सम्बंधी तो भूतों की बिल्कुल न थोपें। अब हमारे अन्दर ये इच्छा, जो कि महाकाली एक बहुत बड़ी टोली है। एक व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार देकर आप मुसीबत में फँस जाते शक्ति है और जो अभिव्यक्त हो रही है, बहुत सी हैं। मुझे सताने के लिए. मेरी शक्ति का हास करने विधियों से हमारे पास आती है। जैसा मैने आपको के लिए धीरे-धीरे ये सभी भूत घुसते चले आते हैं। बताया आत्म-साक्षात्कार के पश्चात् सहजयोगियों और ये किसी काम के नहीं । यह समझने के लिए में यह अपने सम्बंधियों के लिए कुछ करने की कि ऐसा होना शुभ नहीं है, आपके साथ भी यह इच्छा के रूप में आती है। हममें दूसरी इच्छा ये चीज़ घटित होनी चाहिए। आप यदि अपना समय होती है कि अपने बीमार सम्बंधियों को ठीक करने बरबाद करना चाहते हैं तो मैं आपको आपका समय का प्रयत्न करें।यह दूसरी इच्छा है। आप अपने बर्बाद करने की आज्ञा दूँगी। परन्तु यदि आप अन्दर देखें तो आप पाएंगे कि आपमें से बहुत से तीव्रता से उत्क्रान्ति प्राप्त करना चाहते हैं तो लोगों को यह इच्छा हुई। अतः कृष्ठ रोग से लेकर सर्वप्रथम व्यक्ति को याद रखना है कि ये सम्बंध तो के सर्दी, छीकें आदि छोटी-छोटी बीमारियों को पूर्णतः सांसारिक हैं और ये आपकी शुद्ध इच्छा नहीं लेकर भी वो सोचते हैं कि अपने सम्बंधियों को हैं। अतः अपनी शुद्ध इच्छा को सांसारिक इच्छा से सारी चिन्ताओं को मेरे सम्मुख लाना चाहते हैं । अलग करें इसका ये अर्थ बिल्कुल भी नहीं है कि ऐसी छोटी-छोटी चीजों को भी जैसे गर्भ या छीकें आप अपना परिवार त्याग दें. अपनी माँ को त्याग आदि जो कि अत्यन्त स्वाभाविक हैं. फिर भी उन्हें श्रीमाताजी के पास ले जाएं। अपने परिवार की चाहते हैं । मैं कहती हूँ, दें या बहन को त्याग दें। कुछ भी नहीं। साक्षी रूप वे मेरे चित्त में डालना से उन्हें देखें, उसी तरह से जैसे आप किसी अन्य ‘ऐसा करते रहो, अगर सम्भव है तो इस प्रकार व्यक्ति को देखते हैं और स्वयं परखें कि क्या इनका समाधान करने का प्रयत्न करो ! परन्तु वास्तव में उनमें उत्क्रान्ति प्राप्त करने की इच्छा है आपका चित्त यदि ऐसे सम्बंधियों में नहीं उलझा या नहीं। उनमें यदि इच्छा है तो बहुत अच्छी बात होगा तभी लोग मेरे चित्त में होंगे आप उन्हें मेरे है. उन्हें इसलिए अयोग्य नहीं ठहराया जाना चाहिए चित्त में छोड़ दें। मैं इसका समाधान करूंगी परन्तु क्योंकि वे आपके सम्बंधी हैं। ये बात दोनों तरह से यह कुचक्र (Vicious Circle) है यह उस मस्तिष्क है- आपके सम्बंधी होने के नाते उन्हें उत्क्रान्ति के का प्रक्षेपण है जो सोचता है कि ठीक है. “श्रीमाताजी योग्य भी नहीं ठहराया जा सकता और न ही उन्हें यह चीज़ हमारे चित्त में नहीं है आप कृपया इसे इस कारण से अयोग्य ठहराया जा सकता है। देखें।” परन्तु इसका यह तरीका नहीं है। हमारे 23

Hindi Translation (English Talk) अन्दर केवल एक गहन इच्छा होनी चाहिए कि और सुलझना चाहिए। ये सारी चिन्ताएं जो आप क्या मैं स्वयं आत्मा बन गया हूँ? क्या मैने अपना अपने ऊपर ले रहे हैं ये मेरी सिरद्दियां हैं। आपको अन्तिम लक्ष्य प्राप्त कर लिया है? क्या में सांसारिक तो केवल एक कार्य करना है- आपको आत्मा इच्छाओं से ऊपर उठ गया हूँ? स्वयं को स्वच्छ बनना है। मात्र इतना ही ये बड़ा आसान कार्य करें। एक बार जब आप स्वयं को स्वच्छ करने है- बाकी सब मेरा सिरदर्द है। लगते हैं तब यदि कोई कमी रह जाती है तो मैं उसे दूर करती हूं। यह मात्र एक आश्वासन है. वाली समस्या अत्यन्त भिन्न होनी चाहिए। अपनी उत्तरदायित्व (Guaranty) नहीं। समस्या यदि मेरे पावनता का पोषण करने के लिए, अपनी पावनता से चित्त के काबिल है तो मैं अवश्य इस पर ध्यान सुगंधित होने के लिए आपका चित्त दूसरी ओर दूंगी। आपको भी अपने समझना चाहिए जैसे मैं समझती हैं। मेरे विचार से आपको तो मुझसे भी अधिक अपने चित्त के मूल्य इस बात को समझें, पूरा दृष्टि कोण ही परिवर्तित को समझना चाहिए क्योंकि मैं तो अपने अन्दर ही हो जाएगा। दृष्टिकोण ऐसा होना चाहिए :- मैं क्या हर चीज का संचालन कर सकती हैं क्योंकि हर दे सकता हूँ? मैं किस प्रकार दे सकता हूँ? देने चीज़ मेरे चित्त में है । परन्तु आप अपनी इच्छाओं को, आपकी ओर होगा, मेरा चित्त कहाँ है ? मुझे अपने प्रति अधिक मुँहबाए खड़ी सभी सांसारिक इच्छाओं से दूर सावधान होना होगा मैं क्या कर रहा हूँ ? मेरी करके स्वच्छ करने का प्रयत्न करें। इसे विशाल जिम्मेदारी क्या है? आपमें पावनता प्राप्त करने की स्तर पर जब आप देखते हैं तो सोचते हैं. श्रीमाताजी देश की समस्याओं का क्या करें ? होनी चाहिए। अर्थात् आपको आत्मा बन जाना ठीक है, अपने देश का मानचित्र मुझे दे दें। चाहिए। परन्तु अपने प्रति आपकी जिम्मेदारी क्या समाप्त, इतना काफी है। तब स्वयं को स्वच्छ है ? आपको इच्छा करनी चाहिए कि अपने प्रति करें- आपमें जो भी इच्छा है उसे छोड़ दें। एक आपकी जिम्मेदारी की अभिव्यक्ति हो और वो पूर्ण आपकी इच्छा को सामूहिकता पर ले जाने चित्त का मूल्य वैसे ही होना चाहिए। अब आप मेरा सामना नहीं कर रहें. मेरे साथ मिल कर पूरे विश्व का सामना कर रहे हैं। में क्या गलती है? मुझे और अधिक सावधान रहना इच्छा का होना आवश्यक है। आपको शुद्ध इच्छा बार जब आप फावन हो जाएंगे तो वह क्षेत्र आपके हो। चित्त की सीमा में आ जाएगा। ये बात बहुत दिलचस्प है। जब आप इस पर काबू पा लेते हैं जिम्मेदारी आती है। जो कि परमात्मा का कार्य है केवल तभी इस पर प्रकाश डाल सकते हैं परन्तु और जो शुरु हो चुका है। उसके प्रति आपकी क्या यदि आप इसके अन्दर हैं तो आपका प्रकाश छुपा जिम्मेदारी हैं। आप लोग ही मेरे हाथ हैं आप लोगों इसके बाद सहजयोग के प्रति आपकी हुआ है। प्रकाश बाहर को प्रसारित नहीं हो रहा। ने ही परमात्मा का कार्य करना है और परमात्मा आपको इस इच्छा से ऊपर उठना होगा। जब विरोधी तत्वों से युद्ध करना है- आसुरी तत्वों से भी आपमें कोई इच्छा जागृत हो आप तब तक इससे ऊपर उठे रहें जब तक आपके सम्मुख खड़ी जो लोग अब भी परिवार के लिए जिम्मेदार हैं वे उस समस्या पर आपका प्रकाश नहीं पड़ने लगता। आधे-अधूरे सहजयोगी हैं- मैं कहती हैं वे बेकार 1 अब आप अपने परिवार के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। 24

Hindi Translation (English Talk) हैं, बिल्कुल किसी काम के नहीं। ऐसे सब लोग करता। उसका चित्त आलोचना पर नहीं होता कि छुट जाएंगे, उनके परिवारों को कष्ट उठाना पड़ेगा फलां व्यक्ति ऐसा है और फलां ऐसा। न ही उसका और मैं जानती हूँ कि ये घटित होगा क्योंकि अब इस प्रकार से शक्तियाँ एकत्र हो रही हैं कि छटनी क्योंकि अन्य तो कोई है ही नहीं । परन्तु समस्या ये आरम्भ हो जाएगी। आत्मा बनना आपकी जिम्मेदारी है, सहजयोग किसी अन्य को कह रही हूँ। कोई ये नहीं सोचता आपकी जिम्मेदारी है, मुझे बेहतर, बेहतर, और कि मैं उसी के विषय में ये बात कह रही हूँ। जो बेहतर समझना आपकी जिम्मेदारी है। अपने अंदर लोग आक्रामक नहीं हैं वो दूसरे ढंग से सोचते हैं। स्थापित तंत्र को समझना आपकी जिम्मेदारी है। मैं यदि किसी आक्रामक व्यक्ति के बारे में कहूँ तो किस प्रकार ये तंत्र कार्य करता है. और आचरण जो व्यक्ति आक्रामक नहीं हैं वो तुरन्त आक्रामक करता है ये समझना आपकी जिम्मेदारी है। स्वयं व्यक्ति के बारे में सोचेगा अपने बारे में नहीं। तुरन्त चित्त किसी अन्य की आक्रामकता पर होता है। है कि जब मैं बताती हूँ तो लोग समझते हैं कि मैं किस प्रकार गुरु बनना है ये जानना आपकी आप अपना मस्तष्क दूसरे लोगों पर ले जाते हैं जिम्मेदारी है। गरिमामय और सम्मानमय बनना और उनके दोष खोजने लगते हैं। अतः इस पर पड़े आपकी जिम्मेदारी है । सम्मानमय व्यक्तित्व बनना हुए दबाव के कारण ये इच्छा शनैः शनैः निम्न से घटिया व्यक्तित्व का नहीं। आप यदि बुलंदियां निम्नतर हो जाती है । प्राप्त करना चाहें तो आपमें से हरेक का मूल्य पूरे ब्रह्माण्ड जितना है ब्रह्माण्डों के ब्रह्माण्ड आपके सावधानी। सतर्कता कि हमें अपना चित्त केवल चरणों में न्योछावर किए जा सकते हैं बशर्ते कि अपनी शुद्ध इच्छा के पोषण के लिए रखना चाहिए। अतः सावधानी अत्यन्त आवश्यक है। पूर्ण आप बुलंदियों तक उन्नत होना चाहें और अपने इच्छा हृदय से आती है और आपको इस प्रकार से अन्दर स्थित विशालता का पोषण करना चाहें। जो लोग अब भी अपने को निम्न स्तर पर रखना बनाया गया है कि इसके बिना आपका ब्रह्मरन्ध्र ही स्वच्छ न होगा। कुछ लोग सहजयोग की प्रशंसा के चाहते हैं वो कभी उन्नत नहीं हो सकते। उदाहरण के रूप में पश्चिमी सहजयोगियों को माँ के विरुद्ध पाप करने की समस्या है और पूर्व के सहजयोगियों बाँधने को ही बहुत बड़ी बात समझ लेते पुल हैं । परन्तु उनके हृदय यदि खुले नहीं हैं तो वे स्वयं को धोखा दे रहे हैं । अतः अपने हृदय को खुला को पिता के विरुद्ध अपराध करने की समस्या है। रखने का प्रयत्न करें। इससे मुक्त होना आपके लिए बिल्कुल भी कठिन नहीं है। चित्त को शुद्ध रखना है। सहजयोग में महाकाली की पूजा करेंगे तथा यह विशेष यज्ञ आप सारे तरीके जानते हैं। जिनसे चित्त को पावन करेंगे तो निश्चित रूप से हम यह परिमल (Aura) किया जा सकता है चित्त यदि पावन नहीं होगा तो स्थापित कर लेंगे और पूरे विश्व को ज्योतिर्मय बना सभी तुच्छ मूर्खता पूर्ण तथा उत्क्रान्ति की दृष्टि से देंगे परन्तु आपका दृष्टिकोण ये होना चाहिए कि अर्थहीन चीजें हर समय इस इच्छा पर आक्रमण मैंने इसके लिए क्या योगदान दिया ? क्या अब भी करती रहेंगी अच्छा सहजयोगी अपने कपड़ों की, मैं अन्य लोगों के बारे में सोच रहा हूँ ? क्या अब लोगों के आचरण और उनकी बातों की चिन्ता नहीं भी मैं छोटी-छोटी समस्याओं के विषय में सोच रहा करेंगे, मुझे आशा है कि आज जब आप ये पूजा 25

Hindi Translation (English Talk) हूँ या अपनी आत्मा के विषय में ? तो बायाँ पक्ष श्री गणेश से शुरु होता है और विरोधी गतिविधियाँ हैं। ये एहसास होने पर आप उन्हीं पर समाप्त होता है। श्रीगणेश जी में मूलतः इनका डटकर मुकाबला करेंगे, कहेंगे कि यह तो एक ही गुण है कि वे पूर्णतः अपनी माँ के प्रति समर्पित हैं। किसी अन्य परमात्मा को वो नहीं हमारी माँ सारी उत्कृष्ट चीजों का, श्रेष्ठ चीज़ों का, पहचानते। यहाँ तक कि वो अपने पिता को भी नहीं पोषण करने बाले तत्वों का, उत्क्रांति और मुक्ति की पहचानते। वो तो केवल अपनी मों को जानते हैं ओर ले जाने वाले तत्चों का स्रोत है तो ये लोग और उन्हीं के प्रति समर्पित हैं। परन्तु ये शुद्ध इच्छा (फ्रॉयड आदि) तो हमें हमारी जड़ों से काट गतिशील होनी चाहिए। इस गतिशीलता के बारे में हैं। मैं सोचती हैँ कि आप लोगों के साथ ऐसे मैं आगे होने वाली बहुत सी पूजाओं में बताऊँगी । व्यवहार किया गया है मानो आप पशु हों ! वो परन्तु आज हमें चाहिए कि स्वयं को आत्मा बनने चाहते हैं कि हम सब मानवता के निकृष्टतम स्तर की शुद्ध इच्छा में स्थापित कर लें। अब पाश्चात्य मस्तिष्क प्रश्न करेगा, कैसे ? ये मेरी समझ में नहीं आती ! अतः आप पर हुए उन बात हमेशा उठती है कि किस प्रकार ये कार्य सारे आक्रमणों को समझ लेना आपके लिए अत्यन्त करें ? क्या में आपको बता देँ कि यह बहुत सहज आवश्यक है। सावधान रहें कि इस प्रकार के लोगों है। आदिशंकराचार्य ने विवेक चूड़ामणि तथा अन्य के झाँसे में न आ जाएं। बहुत सी पुस्तकें और ग्रन्थ लिख डाले और सारे बुद्धिवादी लोग उनकी जान के दुश्मन बन गए। कहने लगे, आदिशंकराचार्य ने इन सब लोगों को भुलाकर सौन्दर्य लहरी लिखी जो केवल माँ का वर्णन है कोई टेलिफोन नहीं कर सकते। यहाँ की डाक और माँ के प्रति उनके समर्पण है। सौन्दर्यलहरी में प्रणाली भयानक है। रेलवे भी बदतर है (मुझे ये बात लिखा गया हर श्लोक एक मंत्र है यह मस्तिष्क के नहीं कहनी चाहिए क्योंकि हम रेलवे के बंगले में सब मूर्खता है पूर्णतः गलत है और परमात्मा दा हमारे मूल का, हमारी जड़ों का विनाश है। जब से रहे पर आ जाएं जैसे हम भयानक रोगी हों। ये बात अंत में मैं ये कहूँगी कि इस देश में आप लोग जड़ों को देखने के लिए आए हैं कोपलों को देखने के लिए नहीं। पाश्चात्य शैली का अपना दृष्टिकोण परियर्तित करें। यहाँ पर टेलिफोन खराब हैं आप इसमें ऐसा लिखो, वैसा लिखो। रुके हुए हैं ) परन्तु यहाँ के लोग शानदार हैं। वो माध्यम से मस्तिष्क का समर्पण नहीं है यह तो उनके हृदय का समर्पण है। यह आपके हृदय का जानते हैं कि धर्म क्या है । किसी भी तरह से पूर्ण समर्पण है। पश्चिमी सहजयोगी भली भांति समझ लीजिए वो आक्रमण से बचे हैं क्योंकि जानते हैं कि किस प्रकार उन पर बार-बार कुण्डलिनी होने के कारण यहाँ श्रीगणेश बैठे हुए नकारात्मकता के आक्रमण हुए, विशेष रूप से जब फ़ायड जैसे भयानक लोग उनके आधार को, हिम्मत कर सकता है ? यहाँ तो रक्षा करने के लिए उनकी जड़ों को नष्ट करने के लिए आए और किस आठ गणेश बैठे हुए हैं मैं नहीं जानती कि महाराष्ट्र प्रकार से पश्चिम ने आँखे बंद करके उसे स्वीकार के लोग भी इस बात को जानते हैं या नहीं। बहुत किया और स्वयं को नर्क के मार्ग पर डाल दिया। से मारुति भी यहाँ विराजमान हैं। अतः इस देश पर ये सारी चीजें बाहर निकालनी आवश्यक हैं ये हुए हैं। कैसे कोई इस महाराष्ट्र पर आक्रमण करने की कौन आक्रमण कर सकता है ? यहा पर कोई अन्य 26

Hindi Translation (English Talk) नकारात्मक आक्रमण नहीं है सिवाय इसके कि लोग स्वयं कुछ धन-लोलुप हैं। केवल ये अभिशाप उन पर है. इससे वे यदि मुक्ति पा लें तो वे महान लोग हैं। दिन है। पांचांग के अनुसार हो सकता है कि ऐसा न हो परन्तु मेरे अनुसार ऐसा ही है। आइए अपने सूक्ष्म स्तर पर अपने अन्दर पावन होने की इच्छा, सभी बाधाओं और अपने अन्दर की सभी अस्वच्छ अंतः आप लोग इस देश में पश्चिम की सुख सुविधा प्राप्त करने के लिए नहीं आए। आत्मा का चीजों से मुक्ति पाने की इच्छा को स्थापित कर लें। सुख पाने के लिए आए हैं अतः भारत के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलें मैं किसी भी प्रकार से ये सहजयोगी बनने की इच्छा को, माँ के प्रति समर्पित नहीं कह रही कि एयर इण्डिया के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलें। ये बिल्कुल गलत घारणा है कि सहजयोगी होने के नाते आपको केवल एयरइण्डिया में जाने वाली विकृति, क्योंकि आप क्या समर्पण से ही यात्रा करनी है बिल्कुल भी नहीं । सहजयोग करते हैं ? मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए। सिवाए को एयरइण्डिया से कुछ नहीं लेना-देना। हमारे रेलवे, तथा अन्य सभी चीजों का सहजयोग से कोई सरोकार नहीं । तो क्या ? के लिए आप अपने हृदय खोल लें। इस अहम् बने और परमात्मा के लिए अपनी ही एयरलाइन का उपयोग करें आप जब यहाँ पहुँचेंगे तो पाएंगे जाएगा। मैं स्वयं को आपके हृदय में बिठाने का कि यहाँ के लोग अत्यन्त अबोध हैं। वे फायड को प्रयत्न कर रही हॅूँ और निश्चित रूप से मैं बहाँ नहीं समझ सकते। इस विषय पर तो हम उनसे स्थापित हो जाऊंगी। बात भी नहीं कर सकते। ये बात उनसे परे है। इस मामलें में वे ऊँचे प्रकार के लोग हैं क्योंकि महान सहजयोगी बनने की इच्छा को, जिम्मेदार होने की इच्छा को। ऐसा करना कठिन नहीं है। ये अहम् है अन्त इसके कि आप मेरा प्रेम स्वीकार कर लें। समर्पण का अर्थ केवल इतना है कि मेरा प्रेम स्वीकार करने अंतः देश भक्त को त्याग दें। केवल इतना ही, और यह कार्यान्वित हो परमात्मा आपको धन्य करें। (निर्मला योग से उद्धृत एवं अनुवादित) उन पर आक्रमण नहीं हुआ। परन्तु आप लोग भी एक प्रकार से बहुत ऊँचे है क्योंकि आप पर आक्रमण हुआ फिर भी आप इसमें से निकल आए मुख मोड़ने मात्र से आप दूसरी ओर आ गए है। ये भी महान बात है। अतः आपको इस बात का भी भरोसा हो जाएगा कि और भी बहुत से लोग हैं जो आप की तरह से विश्वास करते हैं विशाल जनसंख्या वाले इस देश में आपको आश्रय देने वाले बहुत से लोग हैं। अतः स्वयं को खोया हुआ न समझें। आज हम महाकाली तत्व की पूजा से आरम्भ करेंगे। आप कह सकते हैं आज गणेश गौरी का 27