Shri Mahalakshmi Puja: Ganesha Tattwa

Kolhapur (भारत)

1983-01-01 Mahalakshmi Puja Talk, Kohlapur, Maharashtra, India, 38' Download subtitles: EN,HUView subtitles:
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1983-0101 Mahalakshmi Puja, Kohlapur, Maharashtra, India

[Hindi translation from English]

एक बार पुन आज नववर्ष दिवस है। नववर्ष दिवस आते ही रहते हैं क्योंकि हमने कुछ न कुछ नया प्राप्त करना होता है। इतनी अच्छी व्यवस्था की गई है कि सूर्य को तीन सौ पैंसठ दिन विचरण- करना होता है और एक बार फिर नववर्ष आ गया है। वास्तव में पूरा सौर- मण्डल कुंडल की तरह से चलता है। अतः निश्चित रूप से सौर-मण्डल की एक उच्च अवस्था है| हर वर्ष कुंडल की तरह से यह ऊपर की ओर जाता है| तीन सौ पैंसठ दिन गुजरने के कारण ऐसा नहीं होता, इसलिए होता है क्योंकि सूर्य एक कदम और उत्थान की ओर चलो गया हैं। हमने देखा है कि चेतना में मानव निश्चित रूप से पहले से, दो हजार वर्ष पूर्व की अपेक्षा, कहीं उन्नत हुआ है| ब्रह्मांड का सृजन करने वाली प्रणाली हीं पहला नमूना थी जिसका सृजन किया गया और नमूना तो पूर्ण होना चाहिए। तो नमूना पूर्ण था और इसने बाकी चीजों को भी पूर्ण। की ओर ले जाना शुरु किया। अतः उत्थान के सिद्धांत में भी यही आदर्श नमूना है जो उत क्रान्ति को कार्यान्वित कर रहा है| बाकी के ब्रह्मांड कीं पूर्णता भिन्न दिशाओं में घटित होती है।

“परन्तु आज हमने महालक्ष्मी के सिद्धांत को समझा है। महालक्ष्मी, जैसा मैंने आपको बताया आदर्श सिद्धांत है। यह पूर्ण सिद्धांत हैं, पूर्ण । इसका जन्म ही पूर्ण हुआ है। यह पूर्ण रहेगा, हमेशा-हमेशा के लिए। ताकि इसको सुधारने की आवश्यकता न पड़े4 आज मैं महालक्ष्मी के बारे में इसलिए बातचीत कर रहीं हूँ क्योंकि संभवतः आज आप महालक्ष्मी के मंदिर को देख सकेंगे। महालक्ष्मी के मंदिर मैं जब आप जाएंगे वहाँ आपको समझना होगा कि इस देवी का जन्म इस स्थान पर विशेष रूप से पृथ्वी माँ के गर्भ से हुआ है| इसका अर्थ ये हुआ कि इस स्थान में आपको शक्ति प्रदान करने की योग्यता हैं। एक अतिरिक्त शक्ति या उत क्रान्ति का एक गहन एहसास। आप यदि पर्याप्त रूप से संवेदनशील हैं तौँ आप इसे देख सकते हैं, महसूस कर सकते हैं, और इस कार्य को कर सकते है। यदि आप अभी तक पर्याप्त संवेदनशील नहीं हैं, बन्धनों में फँसे हुए हैं और अभी भी अपने बाहर स्थित हैं तो ये कार्यान्वित न हो सकेगा। कहने का अभिप्राय ये है कि सभी कुछ किया जा सकता है परन्तु यदि कोई पत्तर ही बना रहना चाहे तो। आप उसके लिए कुछ नहीं कर सकते है। अतः, इस स्थान कोल्हापुर में महालक्ष्मी तत्व कार्यरत हैं। अपनी स्थिति के कारण प्रायः ये स्थान बहुत गर्म होना चाहिए । परन्तु मंदिर से प्रसारित होने वाली चैतन्य लहरों के कारण गर्मियों में भी यह स्थान ठंडा बना रहता है। हों सकता है कि यहाँ के स्थानीय लोगों को भी इस बात का ज्ञान ने हो। हम नहीं कह सकते कि उन्हें इस बात का ज्ञान हैं या नहीं। क्योंकि नकारात्मक आगे बढ़ रही है, बहुत सी चीनी मिलें यहाँ पर हैं और शराब बाजी भी बहुत हो रही है। परन्तु विशेष लक्ष्य से सृजित किए गए विशेष स्थानों का हमें अधिकतम लाभ उठाना चाहिए। तो एक प्रकार से हमारा यहाँ पर होना सौभाग्य का विषय है | हमें अपने उत्थान के लिए महालक्ष्मी तत्व की देखभाल करनी हैं| जैसा आप जानते हैं, उत्क्रांति का आरम्भ नाभि से होता है जौ गुरु तत्व से घिरी हुई है। 

हमारे अन्तःस्थित गुरु तत्व यदि अस्थिर है, यह इस प्रकार से स्थापित है जहाँ ये ठीक प्रकार से नाडी तंत्र को प्रभावित नहीं करता, यदि यह हमारे चरित्र और आचरण से प्रसारित नहीं हो रहा, तो हमारा महालक्ष्मी तत्व स्थापित नहीं हो सकता। गुरु तत्व के माध्यम से महालक्ष्मी तत्व को शक्ति मिलती है। आज हमारा सौभाग्य है कि उस दिन श्री दत्तात्रेय के जन्म दिवस पर हमने उनकी पूजा की और आज महालक्ष्मी पूजा हैं। तो हमें एक साथ दो अवसर प्राप्त हुए। पहली दत्त पूजा थी और दूसरी महालक्ष्मी पूजा। गुरु तत्व को ठीक करने क॑ लिए आवश्यक है कि हम अपने धर्म को ठीक करें। जैसा मैंने कई बार बताया है कि धर्म दस हैं और इन दस धर्मों की हमें सावधानी पूर्वक देखभाल करनी है। इसकी अभिव्यक्ति बाहर की ओर होती है परन्तु जो अन्दर होगा वहीं तो बाहर आएगा। जब आप लोग बाते करते हैं, कुछ कहते हैं तो मैं एकदम से जान जातीं हूँ कि नकारात्मक कौन हैं और सकारात्मक कौन है। सकारात्मकत्ता की अभिव्यक्ति करने के। बहुत से तरीके हैं। परन्तु मैं ये कैसे जान जाती हूँ, ये बात मैं आपसे नहीं बता सकती क्योंकि मैं ये जानती ही नहीं कि इसे किस प्रकार बताया जाए। फिर भी मैं ये बात जान जाती हूँ कि फलां आदमी नकारात्मक है और फला सकारात्मक। सकारात्मकता ये बात समझने मेँ निहित है कि हम यहाँ किस लक्ष्य के लिए  हैं। सर्वप्रथम तो हम इस पृथ्वी पर अवतरित क्यों हुए? हम मानव क्यों हैं? अपनी सूझ-बूंझ में हम इन प्रश्नों के विषय मैं क्या कर रहें हैं? हम सहजयोगी क्‍यों हैं? सहजयोगी को क्या करना हैं? सहजयोगी के रूप में उसकी क्‍या जिम्मेदारी है? तब उसे ये समझने का प्रयत्न करना चाहिए कि माँ मेरे प्रति इतनी दयालु क्यों हैं? मुझे चैतन्य-लहरियाँ क्‍यों मिली? यह विशेष कृपा; चैतन्य लहरियों का विशेष॑ ज्ञान प्राप्त करने वाले तोड़े से लोगों में से एक मैं भी क्यों हूँ? और फिर स्वयं से प्रश्न करना है कि मैं इस दिशा में क्या कर रहा हूँ? क्‍या अब भी मैं अपनी उच्छुंखलताओं, बचकानिपों, मूर्खताओं, कटुताओं और आक्रामकताओं में फँसा हुआ हूँ? ये सभी दुर्गुण हम संदैव अन्य लोगों में देखते हैं अपने में हीं। अतः हम सहजयोगी नहीं हैं। जब भी हम अन्य लोगों में

ये दुर्गुण देखने लगें तो हमें ये बात समझ लेनी चाहिए कि एम सहजयोगी नहीं हैं। अपने अन्दर झाँककर हमें अन्य लोगों के प्रति शुद्ध प्रेम प्रवाहित करना चाहिए। परन्तु हमेशा लोग यहीं देखते हैं कि ये सारे दुर्गुण दूसरे व्यक्ति में हैं। मैं चाहे जो! कहती रहूँ ये हमेशा दूसरे लोगों में हीं बुराइयों देखते रहते है। मान लो हमारे अन्दर कोई दुष्प्रवृत्ति व्यक्ति है। आपको उसके प्रति करुणामय होने की कोई जरूरत नही| इसके विपरीत, बेहतर होगा कि उससे दूर हे। जहाँ तक हो सके उससे मुक्ति पा लें, उससे कोई सम्बन्ध न रखें | निश्चित रूप से यह पका अपने प्रति महान करुणा का चिन्ह है, चाहे दूसरों के प्रति न हो। आपको यदि आगे बढ़ना है। तो नकारात्मक प्रवृत्ति लोगों के साथ सम्बन्ध न रखें, चाहे वह आपका भाई, बहन या ई निकट सम्बन्धी ही क्‍यों न हो। जो भी व्यक्ति सकारात्मक नहीं है उससे दूर रहने का यत्त॑ करें। इससे बहुत सी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। में आपसे ये बात बताती रही हूँ और आपसे अनुरोध करती रही हूँ परन्तु आपके बंधन ऐसे हैं कि यदि आप गुरु बन गए हैं फिर भी अभी तक आप ये नहीं समझते कि आपको निर्लिप्त होना है। क्योंकि गुरु के लिए भाई, बहन या सम्बन्धी कोई नहीं है। माँ के सम्बन्ध के अतिरिक्त उसका कोई सम्बन्ध नहीं। आप सब लोगों के लिए महत्वपूर्ण और अच्छी तरह से समझ लेने वाला एक सिद्धांत ये है कि “हमारा सम्बन्ध केवल श्रीमाताजी और सहजयोगियों से हैं, किसी अन्य सम्बन्धी से नहीं चाहे वो किसी सहजयोगी के माध्यम से आए हों या किसी अन्य माध्यम से। इस बात का वर्णन मैं हमेशा करती रही हूँ क्योंकि हमारे महालक्ष्मी तत्व ठीक नहीं हैं। यहीं कारण है कि हम मटक जात हैं, इन्हीं चीज़ों में खो जाते हैं| महालक्ष्मी तत्व, कुल मिलाकर, आरोहीं शक्ति (Ascending Force) की तरह से होना है। जैसे मेरे पिताजी एक उदाहरण दिया करते थे कि मान लो आप बहुत सारी गेहूँ एकत्र की है और उसे जमीन पर डाल दिया है तो ये सारी बरबाद हों जाएंगी। इधर-उधर बिखर कर ये सारी नष्ट हो जाएगी। परंतु यदि आप इसे बोरे में डालेंगे तो स्वाभाविक रूप से इसकी ऊँचाई। बढ़ेगी, उसमें मर्यादाएं आएंगी और यह ऊपर को उठती चली जाएगी। इसी प्रकार से महालक्ष्मी तत्व भी बिखर सकता है और श्रीमाताजी को दिया हुआ सभी कुछ तथा इन वर्षों में जो भी कुछ हमने प्राप्त किया है। वह सब इसके बिखर जाने पर नष्ट हों सकता हैं। इसे अपने अन्दर एकत्र करने के लिए स्वयं पर चित्त देना होगा। सर्वप्रथम तो मस्तिष्क में अपने विचारों और सूझ-बूझ को स्पष्ट किया जाना आवश्यक है क्योंकि महालक्ष्मी तत्व अन्ततोगत्‌वा मस्तिष्क में कार्य करता है।

यही मस्तिष्क का प्रकाशमान होना है। ये कार्य महालक्ष्मी तत्व करता है। यह आपको सत्य (सद्‌) प्रदान करता है। अतः मस्तिष्क में आप स्पष्ट रहें | तर्क-संगत होकर हमें इस परिणाम पर पहुँचना हैं कि हमें कौन से कार्य नहीं करने और कौन से कार्य करने हैं। मुझे उत्क्रान्ति प्राप्त करनी है। इसी कारण से मैं यहाँ हूँ। मुझसे क्या करने की आशा की जाती है? तो सर्वप्रथम तार्किकता से आप अपने मस्तिष्क को कायल करें। आत्मसाक्षात्कार के पश्चात्‌ ऐसा करना आवश्यक है क्योंकि तर्कसंगति से यदि आपका मस्तिष्क नहीं समझता तो यह हमेशा तुच्छ, बचकाना, ‘गरिमा विहीन, कठोर या भयंकर कष्टकर बना रहेगा या इनमें से किसी एक प्रकार का। गुरु तत्व में दस मूल-तत्व हैं। इनमें से पाँच का सरोकार वजन से है। गुरु, किसी भी व्यक्ति का वजन, वजन हैं वजन। आपमें कितना वज़न है? इसे हम गुरुत्व॑ कहते हैं। व्यक्ति में गुरुत्व होता है | जब वह बात करता है तो उसमें कितना संतुलन है? भारतीय संगीत में हम इसे वजन कहते हैं। व्यक्ति के वज़न का अर्थ ये है कि जब वह किसी अन्य से या अपने से व्यवहार करता है तो उसमें कितना वजन होता हैं? अंग्रेजी में भी वजन का उपयोग होता है। दूसरों की दृष्टि में उसका कितना वजन है अर्थात्‌ वह दूसरों को कितना प्रभावित कर सकता है। आप यदि बहुत अधिक प्रभावित करते हैं तो वह व्यक्ति कहेगा, ओह! ये तो बहुत ज्यादा हो गया।’ पश्चिम के लोगों मैं ये गुण हैं, वो कहेंगे, ओह! ये बहुत अधिक हो गया। उन लोगों में ये एक विचार है जो कि अहं की देन है। ये बहुत अधिक है। उन्हें जरा सा भी ज्यादा बताएं तो वो ऐसा ही कहेंगे, ओह! ये तो बहुत अधिक है। मेरे लिए ये बहुत अधिक है| ऐसा कहना आम बात है। ये आम प्रतिक्रिया है। तो आपमें कितना वजन है और दूसरा आकर्षण का गुण है। दो चीजे हैं-वंजन और चुम्बकीय शक्ति। पहला गुण वजन है अर्थात आप कितने गरिमामय हैं? आप किस प्रकार बातचीत करते हैं? आपकी भाषा कैसी है? आपका व्यवहार कैसा है? आपको मानवीय होना चाहिए। परन्तु में देखती हूँ कि कभी कभी तो लोग मुझसे भी बड़े अटपटे ढंग से बात करते हैं। मेरी समझ में नहीं आता कि हमेशा वे गलत बातें कैसे करते हैं? एक वाक्य भी यदि उन्होंने बोलना होता है तो वो गलत बोलते हैं। उनके साथ ऐसा ही हैं। यह विशुद्धि की पकड़ हैं जो नाभि भी हैं। ये नाभि से आती है क्योंकि विशुद्धि चक्र नाभि चक्र की ही उत्क्रान्ति हैं। अतः होता क्‍या है कि वह व्यक्ति जैसा भी हो अपनी भाषा से; आचरण से, अपनी मुखाकृति से, अपने नाक

से, आँखों आदि से, विशुद्धि चक्र के माध्यम से दिखाई पड़ता है। व्यक्ति की नाभि में जो भी होगा वह यहीं दिखाई देगा। मान लो किसी व्यक्ति का महालक्ष्मी तत्व भली भाति विकसित है तो उसमें किसी अन्य व्यक्ति से व्यवहार करने की समझ होगी, वजन होगा, सूझ-बूझ होगी कि। उस व्यक्ति के साथ, किस सीमा तक जाना है? उसके साथ किस प्रकार निमाना है? उसके साथ कहाँ तक बात॑ करनी हैं? उसके विषय में कहाँ तक सोचना है? उसे कितना महत्व दिया जाना है? यह वात अत्यन्त महत्वपूर्ण है। दूसरी बात ये है। कि आपमें कितनी चुम्बकीय शक्ति है| अतः आप स्वयं पर ही वापस आ जाते हैं। चुंम्बकीय शक्ति एक चमत्कार है जो व्यक्ति को चमत्क्र्त करती है। चमत्कार के कारण ही व्यक्ति चुम्बकीय होता है। ये चमत्कार आपके अपने व्यक्तित्व से आता है। आपके अपने व्यक्तित्व से । इस चुम्बकीयपन का आधार बाई ओर से झ॒” होता है, आओ गणेश ये आँघार हैं। श्री गण हीं चुम्बकीय शक्ति का आधार हैं| अतः जापका अवोधपन चुम्बकीय शक्ति प्राप्त करने का सर्वोत्तम उपाय है। किसी भौतिक तरीके से चुम्बकीय शक्ति का वर्णन नहीं किया झा सकता। यह भौतिक पदार्थ नहीं है। यह तो निराकार चीज हैं जो आपके गणेश तत्त्व से आती हैं। गणेश तत्व जिसका अच्छा है वही इस शक्ति से सम्पन्न होता है | चुम्बकीय अर्थात्‌ ऐसा व्यक्ति अन्य लोगों को अपने वजन सें, अपने गुणों से आकर्षित करता है, लेकिन वासना, लोभ तथा अन्य मूर्खता पूर्ण चीजों के लिए आकर्षित नहीं करता। प्रेम की सुगन्ध के कारण लोगों को आकर्षित करता है। इसे हमेशा गलत समझा जाता रहा हैं क्योंकि यह निराकार है। अतः व्यक्ति को चाहिए कि इसे अत्यन्त सूक्ष्म तरीके से समझे कि चुम्बकीय शक्ति क्या है। कुछ लोग अन्य लोगों का आकर्षित करने के लिए बनावटी संकेतों का उपयोग करते हैं — जिस प्रकार से वे चलते हैं, वस्त्र धारण करते हैं और रहते हैं, इन सारी चीजों का कोई उपयोग नहीं है। यह शक्ति तो आंतरिक है, ये सुगन्ध अत्यन्त आंतरिक है। इसे विकसित किया जाना चाहिए। लेकिन सहज योग में मैंने देखा है कि लोग इसकी चिन्ता नहीं करते। बिल्कुल चिन्ता ही नहीं करते। जिस प्रकार से वें रहते रहे हैं और कार्य करते रहे हैं वे उसी प्रकार से सो हैं। वे यदि अंग्रेज हैं तो अंग्रेज हैं, फ्रैंच हैं तो फ्रैंच हैं, भारतीय हैं तो भारतीय हैं, कोल्हापुर के हैं तो कोल्हापुर के हैं। सबसे पहले इन विचारों को रोका जाना चाहिए क्योंकि सुगन्ध तो हर जगह फैलती है चाहे आप अंग्रेज हों या कोई और। तो व्यक्ति की सुगन्ध सर्वप्रथम तो अन्दर के गणेश तत्व के कारण विकसित होतीं हैं। अतः गणेश तत्व को सबसे पहले देखा जाना चाहिए। गणेश तत्व वाला व्यक्ति हर समय पश्चाताप नहीं करता रहता, इतना भी व्यर्थ व्यक्ति नहीं होता कि चाहे आप उसकी पिटाई करें फिर भी उसे बर्दाश्त करता रहे, ऐसा नहीं होता। इसके विपरीत चुम्बकीय शक्ति इस प्रकार आकर्षित करत्ती है कि व्यक्ति को बेचैनी नहीं होती। ये बात समझ लेना बहुत आवश्यक है। आप यदि किसी अन्य प्रकार से प्रेम करते हैं, वासनात्मक या कोई अन्य प्रकार तो वह प्रेम व्यक्ति को आकर्षित तो करता है प्ररन्तु उसे नष्ट कर देता है। परन्तु गणेश तत्व का आकर्षण विनाशकारी नहीं होता। ये आकर्षण एक सीमा तक होता है जिसमें व्यक्ति नष्ट नहीं होता। आप लोग क्योंकि बहुत उच्च हैं, गहन है और वज़नदार हैं, किसी चीज़ के आकर्षण से आप नष्ट नहीं हो सकते। हमेशा बड़ा चुम्बक छोटे चुम्बक को अपनी ओर खींचता है ये बात आपको समझनी चाहिए। ये जादू और चमत्कार, व्यक्ति का चमत्कारिक स्वभाव गणेश तत्व (अबोधिता) से आता है और दूसरे पूर्ण समर्पण एवं श्रद्धा से आता है। जौ लोग माँ के प्रति पूर्णतः समर्पित एवं श्रद्धावान हैं, किसी अन्य चीज के प्रति नहीं उनमें गणेश तत्व विकसित होता है। अपने पति-पत्ती, बहन, देश आदि के प्रति समर्पित न होकर अपनी माँ के प्रति पूर्णतः समर्पित्त होने से, पूर्ण समर्पण से आपको यह आकर्षण, यह करिश्मा प्राप्त होता है| सहजयोग में ऐसा व्यक्ति वास्तव में आकर्षक बनता जाता है और उसमें ये गुण होता है| कुछ लोग सोचते हैं कि आप यग्रदि अत्यंत अकर्मण्य हैं और किसी की भी बात का बुरा नहीं मानते, यदि ऐसे व्यक्ति हैं तो आप योग-सिद्ध हैं। परन्तु ऐसा नहीं हैं। लोग आपको इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि वे आप पर सब जमा सकते हैं। इस कारण से लोग आपको पसंद करते हैं | परन्तु यदि आप सोचें कि आक्रामक स्वभाव या लोगों पर चीखने चिल्लाने से आप ये चमत्कारिक स्वभाव प्राप्त कर सकते हैं तो भी आप गलत हैं। इस प्रकार आप वह ऊँचाई नहीं प्राप्त कर सकते तो किस प्रकार इसे प्राप्त किया जा सकता है? और अधिक अबोध बनकर |

यह अबोधिता व्यक्ति में किस प्रकार विकसित होती है? इसके बारे में सोचने से यह विकसित नहीं होती | जैसे किसी ने मुझसे पूछा कि आप अपना आयकर कैसे प्रबन्धन करती हैं? मैंने उत्तर दिया “मैं कोई कमाई ही नहीं करती” | तब उन्होंने मुझसें पूछा कि आप अपनी कार को कँसे संभालती हैं? मैंने कहा मेरी अपनी कोई कार ही नहीं है। फिर उन्होंने पूछा, अपनी घर की समस्याओं के बारे में बताए कहा, मेरा कोई घर ही नहीं है। नहीं, नहीं। मेरे लिए कुछ भी नहीं। इन सारी समस्याओं को समाधान ये है कि इनकी सिरदर्दी ही न पालें | अगर आप यह सिरदर्दी पालेंगे तो अबोधिता घटेगी। सिरदर्द इस प्रकार से आते हैं कि ये मेरी शाल है, ये मेरी साड़ी है, ये मेरी चीज है आदि-आदि।| होना ये चाहिए कि, ये मेरी माँ है और मुझे इनकी उद्घोषणा करनी हैं, बस। अगर यह तरीका अपनाया जाएं तो वो गणेश की तरह से अबोधिता बढ़ने लगती है, किसी भी प्रकार ले सिरदर्द पालने से नहीं। व मेरा है; वो मेरा है यह ‘मेरा- बाजी’ सभी समस्याओं का कारण है। व्यक्तिगत रूप से मैं सोचती हूँ कि यही कारण हो सकता है| ‘मेरा तेरा पन’ सहज नहीं है। मेरा शरीर, मेरा सिर; मेरा सभी कुछ। मैं और मेरा ‘जब छूट जाते हैं तो बाकी बचती हैं आत्मा। केवल मैं बच जाता है और इसी में को हमने देखना है| तो आपको इन्हीं ‘मेरे, मेरे, मेरें को कम करते चले जाना है और  अबोधिता की शुद्ध आत्मा उन्‍नत होगी। आध्यात्मिकता के बारे में भी लोगों के विचार मेरी समझ में नहीं आते | न जाने आध्यात्मिक लोगों के विषय में ये क्‍यों सोचा जाता है कि उन्हें लोमड़ी की तरह से चालाक या फ्रायड की तरह से बुद्धिवादी होना चाहिए | लोगों में सभी प्रकार की धारणाएं हैं| नहीं, सच्चाई ये नहीं है। आध्यात्मिक व्यक्तित्व केवल अबोघ होता हैं, केवल अबोध। उसमें चालाकी आदि नहीं होती। अबोधिता ही सभी कुछ है। व्यक्ति जो भी कुछ बोलता है या कहता है वह अबोधिता से ही आता हैं। इसमें पुस्तकों से प्राप्त की गई बौद्धिकता नहीं होती, ऐसा कुछ नहीं होता| इसमें तो केवल शुद्ध और सहज अबोधिता होती है जो बहुत अच्छी तरह से कार्य करती है। ये इतनी स्वच्छ है। ये केवल वहीं कहती है जो यँह जानती है। और यह उच्चतम है| अतः हमारे अन्दर बंदन-मुक्ति आनी चाहिए। परन्तु इसके बारे में आपस में भी बात-चीत नहीं करनी चाहिए। एक बार जब आप तर्क- तर्क करने लगते हैं तो यह धर्म विज्ञान पर बहस बन जाती है। इसमें कोई धर्म विज्ञान नहीं है। ये अत्यन्त सहज है। अबोध होना सहजतम है | परन्तु अबोधिता समाप्त हो जाती हैं। क्यों? क्योंकि हमारा चित्त अलग ढंग से चलता है। हम दूसरी चीजों को देखते हैं। आज मैं सोच रहीं थीं मुझे तीन नौ गजी साड़ियाँ खरीदनी हैं क्योंकि तीन महिलाएं ऐसी श्री जो नौ गजी साड़ियां पहनती हैं और उन्हें मैंने ये साड़ियाँ देनी थीं। मैंने इनके विषय में केवल सोचा ही था। मैं यहाँ आई तो देखा कि बहुत सुन्दर साड़ियाँ यहाँ रखी हुई थीं। मैंने उससे पूछा कि ‘आप ये साड़ियाँ कहाँ से मांगती हैं” उसने उत्तर दिया आपको ये यहीं मिल सकती हैं।’ मैंने कहा, ठीक हैं| तो तुम जाकर ये तीन साड़ियाँ खरीद लो किसी प्रकार का कोई विश्लेषण करने की जरूरत नहीं | मेरे दिमाग में आया ही था कि मैंने तीन साडियाँ खरीदनी हैं और काम हो गया, उत्तर सामने है। तो वातावरण इतना स्वच्छ है। सारी स्थिति इतनी अबोध है कि अबोध लोगों को अबौधिता ही समाधान प्रदान करती है। हर चीज में अबोधिता कार्य करती है क्‍योंकि हर इन्सान में थोडी बहुत अबोधिता तो होतीं है। अबोधिता खम्भे कीं तरह से होती । आपके अन्दर ये पाँचवा खम्भा है। तो कोई व्यक्ति यदि अबोध है तो वो आपके पाँचवें खम्भे (शक्ति) पर कार्य करेगा और आपको ठीक कर देगा | जब आप दूसरे लोगों को बंधन देते है तो क्या होता हैं? आप उसे अपनी अबोधिता द्वारा बाँध देते हैं और बेचारे को पता भी नहीं चलता। जो अबोधिंतां उसके अन्दर होती है उसे आप पकड लेते हैं। आप केवल इतना करते हैं और प्रबन्ध कर लेंते हैं। कार्यान्‍वेन करना बहुत आसान है। केवल सिद्धांत, तत्व, पूरी चीज़ तत्व पर निर्भर होती हैं और तत्व अबौधिता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। अतः नेति नेति’ कहते हुए इस तत्व को विकसित करने का प्रयत्न करें। अपने सारे दोषों को ‘नेति नेति’ कहते रहें। नेति नेति’ कहकर आप ये मैरा नहीं है, मेरा नहीं है। मेरा नहीं है, मेरा नहीं है” पर पहुँच जाते हैं। तो चीजें इस प्रकार से हैं। अंबोधिता पर पूरा मौतिक विश्व भी आक्रमण नहीं कर सकता, क्योंकि इंससे कह घबरातां है। अंबोधिता पर आक्रमण कोई नहीं कर सकता। इसे नष्ट नहीं किया जां सकेता। इसे नष्ट नहीं किया सकता। अबोधिता सर्वव्यापी है और इसे नष्ट नहीं, किया जा सकता चाहे जो मर्जी लोग करते रहें। परन्तु इसे आच्छादित किया जा सकता है। पीछे घकेला जा सकता है। परन्तु नष्ट नहीं किया जा सकता क्‍योंकि यह तो अपने हीं तरीके से कार्य करेंगी। अतः इस अबोधिता को जो कि महालक्ष्मी तत्व का आधार हैं विक॑सित करने का प्रयत्न करें| हम कह सकते हैं कि यह महालक्ष्मी तत्व का सार तत्व हैं। बाह्य चीजें जैसे वजन, गरिमा, आचरण आदि सभी बाहरी हैं। जिस तत्व, जिस सिद्धांत प्रर॒यह आधारित हैं वह तो अबोधिता है। अगर ये ऐसा हीं हैं, यदि हम अपने अंतःस्थित महालक्ष्मी तत्व क्रो समझते हैं तो यह किस प्रकार कार्यान्चित होनां चाहिए? यह बुद्धि का विषय नहीं है। मैं पुनः कहूँगी कि इसे पाने के लिए आप इसमें अपनी बुद्धि का प्रक्षेपण न करें | आप जहाँ पर हैं वहीं बने रहें और स्वतः ही आपको उत्तर मिल ज़ाएगा। बस अपना मस्तिष्क इसमें प्रक्षेपित न करें | आपको सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जायेंगे क्योंकि किसी भी व्यक्ति के अन्दर अबोधिता ऐसा सहज उत्तर है जहाँ सारी जटिलताएं अत्यन्त सुगमता से चली जाती हैं। 

परमात्मा का प्रेम भी यही है। यही परमात्मा का प्रेम है। अतः इस दिव्य प्रेम का अर्थ अपने मूर्खतापूएं प्रेम से तथा लोगों के विषय में अपनी घारणाओं, सामंजस्य, असामंजस्य से न लगाएं। यह हमारे अन्दर का पावन प्रेम है, पांचनता है। अवोधिता प्रेम है जोकि जीवन है, सा हम कह सकते हैं कि ग्रह जीवन को बहुमूल्य हिस्सा है| परन्तु प्राणशक्ति महालक्ष्मी नहीं है। महालक्ष्मी तो सारतत्व है, हर चीज़ का सार तत्व, क्योंकि यवि सृष्टि का सृजन घटित होना है, यदि परमात्मा की इच्छा है परन्तु महालक्ष्मी तत्व नहीं है तो इच्छा का क्या लाभ है? यदि सृजन कर भी दिया गया तो बिना महालक्ष्मी तत्व के किस प्रकार आप इसे कार्यान्वित करेंगे? आप इसे कार्यान्वित ही नहीं कर सकते। महालक्ष्मी तत्व का होना बहुत आवश्यक है। इसके बिना सृजन अर्थहीन है। तो, बाह्य रूप से तो महालक्ष्मी तत्व है परन्तु अन्दर इसकी तीन शक्तियाँ हैं| देखने  के लिए महालक्ष्मी तत्व हैं परन्तु अन्दर सृजन हैं और सभी तत्वों का सृजन होता हैं, इसके अन्दर इच्छा है और इस इच्छा के अन्दर श्री गणेश हैं। तो ये गणेश तत्व निश्चित रूप से सभी चीज़ों पर हावी हो जातों है और समी चीजों से प्रसारित होता है | इसीलिए मैं कहती हूँ। कि इसके विषय में सोचे नहीं। अपनी अबोधिता को बढ़ने दें, सहज– अबोधिता को और अपनी गरिमा को। गरिमा का होना भी बहुत आवश्यक है। कुछ लोग सोचते हैं कि लम्बे चोंगे पहनकर यदि वे गलियों में घूमेंगे तौ लोग उन्हें सन्‍यासी समझेंगे, ये बात गलत है। क्‍यों? क्योंकि परमात्मा ने आपकों इतना कुछ दिया है फिर भी आप गंरिमामय नहीं है। क्यों आप ये दर्शाने का प्रयत्न करें कि आपके पास कुछ नहीं है। आप ये दिखावा करते हैं कि परमात्मा ने आपको कुछ नहीं दिया। परमात्मा के प्रति अपनी कृतज्ञता दर्शाने के लिए आपको चाहिए कि अच्छे से अच्छे वस्त्र पहनें। पूजाओं के अवसर पर यदि यहाँ कि महिलाओं को देखें तो वे आभूषण, नथ आदि पहनकर मंदिर में आती हैं और पुरुष भी अच्छे और साफ सुथरे वस्त्र पहनकर आते हैं। कोई दिखावाबाज़ी नहीं होती, यह तो मात्र इस बात की अभिव्यक्ति होती है कि परमात्मा ने आपको कितना कुछ दिया है। हे परमात्मा! मैं आपका आभारी हूँ। आज नववर्ष का महान दिन है और आज के दिन महालक्ष्मी के स्थान पर कोल्हापुर में होना ! ये स्थान कोल्हापुर कहलाता है क्योंकि यहाँ कोल्हासुर का बंध हुआ था। कोल्हासुर  लोमडी की तरह से चालाक, भयानक राक्षस था| उसने पुनः जन्म ले लिया था। परमात्मा का शुक्र हैं कि अब उसकी मृत्यु हों गई। है। आप इसके विषय में सोचें नहीं, नहीं तो आपका मस्तिष्क भी श्रमित हो जाएंगे। आप सोचिए नहीं | मैं इसके विषय में आपको बताऊंगी। जानबूझकर मैंने उसका नाम नहीं बताया, उसका पुनर्जन्म हुआ था और उसे निकाले फेंका शयों। तो सह वह स्थान है जहाँ कोल्हासुर का वध हुआ। यहाँ पर महालक्ष्मी अवत्तरित हुई और इसी कारण से इस स्थान का विशेष महत्व है कि हम यहाँ पर तीर्थयात्री के लिए आएं हैं। आइए व्रिनम्रता पूर्वक इसके विषय में सौचें। पश्चिम में यह सब॑ घटित नहीं हों सकता था। क्योंकि स्वयंमु दैवता पृथ्वी के गर्भ से निकलकर वहाँ प्रकट भी हो जाते तो भी उन्हें कौन पहचानता, कौन उनका सम्मान करता और कौन उनकी पूजा करता? इसी कारण से ये स्वयंमु पश्चिमी देशों में प्रकट नहीं हुए। थोड़ा सा वहाँ पर भी है इसमें कोई  सन्देह नहीं, परन्तु यहाँ पे तो इन सभी देवी-देवताओं के मंदिर हैं | यहाँ पर तान्त्रिकों ने अबोधिता पर आक्रमण किया है। मन्दिरों को किराए पर लेकर उन्होंने खुद वहाँ स्थापित होने का प्रयत्न भी किया, परन्तु शनैः शनैः उन्हें वहाँ से निकाला जा रंहां है। सभी देवी-देवताओं के मंदिर में ये तांत्रिक पहुँच गए थे परन्तु अब ये निकाल दिए जाएंगे। तो इस प्रकार से आक्रमण हुआ और तथाकथित ब्राह्मण यहाँ पर आकर जम गए, मच्चिरों में कर्मकाण्ड सिखाने लगे और वहाँ क॑ वातावरण को श्रष्ट कर दिया। परमात्मा की क्रपा सदैव आप सब पर बनी रहे। मैं चाहती हूँ कि आप सबके अन्दर चित्त की एकाग्रता विकसित हों ताकि आप सभी भ्रमों से ऊपर उठकर अपने महालक्ष्मी तत्व के माध्यम से शुद्ध आत्मा’ के साथ एकरूप हो सकें। 

परमात्मा आपको धन्य ।करें।