Shri Mahalakshmi Puja: Ganesha Tattwa

Kolhapur (भारत)

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1983-0101 Mahalakshmi Puja, Kohlapur, Maharashtra, India

[Hindi translation from English]

आज पुनः

नए साल का एक दिन है। प्रत्येक नव वर्ष आता है, क्योंकि हमें कुछ ऐसा करना है जो नवीन हो। यह  व्यवस्था इस प्रकार की गई है कि सूर्य को ३६५ दिन गतिमान होना पड़ता है और  पुनः  एक नव वर्ष आ गया है। वास्तव में सम्पूर्ण सौर-मंडल सर्पिल गति  से घूम रहा है। अतः, निश्चित रूप से एक उच्चतर इस सौर मंडल की उच्चतर स्थिति होती है। प्रत्येक वर्ष यह एक सर्पिल ढंग से उच्चतर बढ़ रहा है  अतः  यह केवल इसलिए नहीं है,  क्योंकि 365 दिन बीत गए हैं, ऐसा इसलिए है क्योंकि यह एक कदम आगे की ओर  बढ़ गया है, वर्तमान स्थिति से उच्चतर ( स्थिति में) आज , हम देख सकते हैं कि जागरूकता में, मानव जाति का निश्चित रूप से बहुत उच्चतर उत्थान हुआ है, तुलना में कहें जैसी अवस्था में वे लगभग 2000 वर्ष पूर्व थे। परंतु, यह प्रथम प्रणाली जिसने इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को आरम्भ किया प्रथम प्रतिरूप था, आप कह सकते हैं इसका सृजन किया गया। और उस प्रतिरूप को श्रेष्ठ  होना चाहिए। और वह एक आदर्श प्रतिरूप  था जिसने शेष सभी को परिपूर्ण करना शुरू कर दिया तो यह एक श्रेष्ठ प्रतिरूप है जो इस उत्थान के तत्व में है। और यही इस उत्थान को कार्यान्वित कर रहा है। अब, शेष ब्रह्मांड की पूर्णता विभिन्न दिशाओं में संपन्न होती है। परंतु आज हमें महालक्ष्मी तत्व पर विचार करना होगा। 

महालक्ष्मी, जैसा  मैंने आपको बताया, एक श्रेष्ठ तत्व है। यह एक संपूर्ण तत्व है। इसे संपूर्ण बनाया गया है। यह संपूर्ण रूप में पैदा हुआ है,सम्पूर्ण ही रहेगा, सदैव अनन्त काल तक सम्पूर्ण रहेगा इसे सुधारने की आवश्यकता ना हो । अब यह महालक्ष्मी की  मैं यहाँ चर्चा कर रही हूं क्योंकि आप आज इस महालक्ष्मी  मंदिर के दर्शन के लिए जा सकते हैं।अब यह महालक्ष्मी मंदिर में जब आप वहां जाते हैं, तो आपको यह ज्ञात होना चाहिए  कि यह देवी इस विशेष स्थान पर भूमि देवी  से प्रकट हुई थी।इसका अर्थ है कि इस स्थान में क्षमता है आपको शक्ति देने की । आप कह सकते हैं, एक अतिरिक्त बल अथवा उत्क्रांति की गहन भावना। यदि आप पर्याप्त संवेदनशील हैं तो आप उसे देख सकते हैं, आप इसकी अनुभूति कर सकते हैं और आप ऐसा कर सकते हैं। परंतु,, यदि आप इतने संवेदनशील नहीं हैंअभी भी संस्करो से इतने अनुबंधित है और अभी भी बाह्म में  हैं, तो ऐसा कार्यान्वित नहीं होगा। मेरा अभिप्राय  है कि सभी प्रकार की चीजें क्रियाशील हो  सकती हैं, परंतु यदि कोई व्यक्ति एक पत्थर बना रहना चाहता है तो आप इसके बारे में कुछ नहीं कर सकते। तो यह महालक्ष्मी तत्व यहाँ कोल्हापुर में कार्यान्वित है।साधारणत यह स्थान बहुत, अपनी ( भौगलिक) स्थिति के कारण बहुत गर्म होना चाहिए। परंतु  गर्मियों में भी यह स्थानबहुत ठंडा रहता है। मंदिर से उत्सर्जित चैतन्य लहरियों के  कारण इस स्थान पर रहने वाले लोग भी शायद इतने जागरूक न हों। हम यह नहीं कह सकते हैं कि वे जागरूक हैं क्योंकि , नकारात्मकता को अग्रसर होना है, यहाँ बहुत संख्या में  चीनी की फैक्ट्रियाँ हैं और यहाँ मदिरापान बाहुल्य में है। परंतु  हमें प्रत्येक स्थान का सर्वोत्तम  लाभ उठाना होगा जिसे विशेष रूप से एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए बनाया गया है। तो, यह एक तीर्थयात्रा एक प्रकार से, कि हम यहां उपसिथत हैं। यह कि हमें अपने उत्थान के महालक्ष्मी तत्व की देखभाल करनी है। जैसा कि आप जानते हैं, यह उत्थान  शुरू होती नाभि से और गुरु तत्व  से चारों ओर से घिरी होती है।अब हमारे अन्तनिर्हित  गुरु तत्व आदि यह विवेकहीन है, ,यदि यह तुलना में, सानिध्य में इस प्रकार सिथ्त है जहां, यदि यह हमारे भीतर पूर्णरूप से समाहित नहीं है, यदि यह हमारे चरित्र और व्यवहार के माध्यम से उत्सर्जक नहीं है तो महालक्ष्मी तत्व को सशक्त नहीं किया जा सकता। महालक्ष्मी तत्व इस गुरुतत्व के माध्यम से ही शक्तिशाली बनता है। अब हम आज भाग्यशाली हैं क्योंकि दत्तात्रेय का जन्मदिन था, बस उस  दिन, जब हमने पूजा की थी, और आज यह महालक्ष्मी पूजा है। अतः दो चीजें हमें एक साथ  मिल गई हैं। पहली दत्त पूजा थी और आज यह पूजा 

महालक्ष्मी की है। अतः, गुरु तत्व को ठीक रखने के लिए, हमें अपने धर्मों को सही रूप में अपनाना चाहिए। अब ये धर्म, जैसा मैंने आपको कई बार बताया है ये, दस हैं, और हमें इन  दस धर्मों को बहुत सावधानी से देखभाल करनी चाहिए। ये बाह्म में अभीव्यक्त किए जाते हैं, परंतु जो भी हमारे भीतर निहित है वह बाहर आ जाता है। अब मैं देखती हूँ, जब आप लोग बात करते हैं, और आप कुछ चीजें  कहते हैं, मैं जानती हूँ कि यह व्यक्ति नकारात्मक है, वह व्यक्ति निश्चित रूप से सकारात्मक है। सकारात्मकता की अभिव्यक्ति के लिए कई प्रकार के ढंग हैं। परंतु मुझे यह कैसे पता चलता है , मैं आपको वह नहीं बता सकती, परंतु मैं बस  इतना जानती  हूँ कि ऐसा व्यक्ति निश्चित रूप से सकारात्मक है और ऐसा व्यक्ति नकारात्मक है। सकारात्मकता इस समझ रखने में है की हम यहाँ पर, हम इस धरती पर क्यों हैं? हम मनुष्य  क्यों हैं? बोध होना हम इसके विषय  में क्या कर रहे है? हम सहजयोगि क्यों हैं?? एक सहज योगी को क्या करना है?एक सहज योगी होने के नाते उसकी  जिम्मेदारी क्या है? तब वह यह जानने  के लिए अग्रसर होता है कि श्री माताजी की मुझ पर इतनी कृपा क्यों है? मुझे चैतन्य लहरियाँ क्यों मिली है?मैं क्यों उन अल्पसंख्यक लोगों में से एक हूँ जिन्हें यह विशेष आशीर्वाद प्राप्त हुआ है , चैतन्य जागरूकता का यह विशिष्ट ज्ञान।

और फिर अपने आप से पूछें, “मैं इसके विषय में क्या कर रहा हूँ? क्या मैं अभी भी अपनी  तुच्छता अथवा अपने  बचकानेपन , अपनी मूर्खता , अपनी कठोरता , अपनी आक्रामकता में समय हुआ हूँ? हम सदैव  इन चीजों को अन्य लोगों में देखते हैं, स्वयं अपने में नहीं – तो  हम सहज योगी नहीं हैं। हमें उस स्तर पर बोध होना चाहिए,जब हम इन चीजों को दूसरे लोगों में देखना शुरू करते हैं, तो हम सहज योगी नहीं हैं। हमें स्वयं अपने भीतर देखना चाहिए और दूसरों के प्रति शुद्ध करुणा  उत्सर्जित करनी चाहिए।परंतु सदैव लोग सोचते हैं  हैं कि यह सब किसी अन्य व्यक्ति में विधमान है। मैं जो कुछ भी कहने का प्रयास करूँ वे हमेशा दूसरे व्यक्ति में इसे देखते हैं। अब मान लीजिए,कि हमारे मध्य में एक नकारात्मक व्यक्ति है, आपको उस व्यक्ति पास करुणामय होने की कोई आवश्यकता नहीं है।इसके विपरीत अच्छा होगा उससे दूर रहें। उस व्यक्ति से छुटकारा पाएं, जहां तक संभव हो, उनके साथ कोई नाता न रखें। यह  एक निश्चित संकेत है स्वयं अपने लिए महान करुणा, , यदि दूसरों के लिए नहीं है। अच्छा रहेगा जो व्यक्ति नकारात्मक है, उससे कोई नाता न रखना,यदि आपको प्रगति करनी है। वह आपका भाई, बहन, कोई भी हो सकता है। परंतु ऐसे व्यक्ति से दूर रहने का  प्रयास करें  जो सकारात्मक नहीं है।इससे  बहुत सारी समस्या  बनती है। मैं ऐसा बताती रही  हूं, और मैं आपसे निवेदन करती रही हूँ,, परंतु संस्कार( अनुबंधन) ऐसे है,यधपि आप एक गुरु तत्व बन गए हैं,  आप यह नहीं समझते कि आपको निर्लिप्त  होना होगा। एक गुरु के लिए कोई भाई, बहन या कोई अन्य रिश्ता नहीं है सिवाय श्री माताजी के साथ संबंध। अन्य कोई रिश्ता नहीं है। इन  में से इस एक तत्व को समझना होगा। मेरे विचार में यह बहुत महत्वपूर्ण है आप सभी के लिए  कि हमारा संबंध केवल श्री माताजी और सहज योगियों से है और किसी भी ऐसे रिश्ते से नहीं, जो हमें मिला है, है, चाहे वह सहज योग के माध्यम से हो अथवा  किसी और चीज के माध्यम से। अब यह मैं समझा रही हूं क्योंकि हमारा महालक्ष्मी तत्व सही नहीं हैं। इसीलिए, हम एक प्रकार से व्यर्थ नष्ट हो जाते हैं, खो जाते हैं, इन सब चीजों में। और महालक्ष्मी तत्व को एकत्रित रूप में एक आरोही बल के समान होना चाहिए। जैसे मेरे पिता एक उदाहरण दिया करते थे। मान लीजिए कि आपने बहुत सारा गेहूं एकत्रित  किया है और आप इसे जमीन पर फैला देते हैं, यह सब खो जाएगा। यह इस प्रकार  बिखर जाएगा , इस तरफ, उस तरफ, यह सब व्यर्थ हो जाएगा। परंतु यदि  आप इसे एक थैली में रखते हैं, तो यह ऊँचाई में बढ़ जाएगा । स्वाभविक रूप से इसमें वे सब  मर्यादाएँ होंगी। यह ऊपर उठेगा और यह उच्च और उच्चतर होता जाएगा। उसी प्रकार यह  महालक्ष्मी तत्व उस तरह से चारों ओर बिखर  सकता है, और वह सब बस  नष्ट हो सकता है जो माँ ने हमें दिया है ओर इन वर्षों में यह सब हमारे पास था, केवल इसे बिखरने से। अब इसे अंदर इकट्ठा करने के लिए, हमें स्वयं अपने पर चित्त रखना है। सबसे पहले,अपने विचारों को एवं अपनी समझ को अपने मस्तिष्क में  स्पष्ट करने का प्रयास करें।यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि महालक्ष्मी तत्व अंततः मस्तिष्क में क्रियान्वित होता है। है। यह मस्तिष्क का प्रकाशित होना  महालक्ष्मी तत्व  द्वारा किया जाता है।

यह आपको  ‘सत’ देता है, सत्य, आप देखें। तो दिमाग में आपको स्पष्ट करना होगा। तार्किक रूप से करें। तर्क से आपको इस निष्कर्ष पर पहुंचना होगा, “कि मुझे ये काम नहीं करने हैं, मुझे ये काम करने हैं। मुझे उत्थान करना है। यही कारण है कि मैं यहाँ पर हूँ। मैं यहाँ क्यों हूँ? मुझ से  क्या करना अपेक्षित है ? ” अब तर्क  से आप अपने मस्तिष्क को समझा लेते हैं, सबसे पहले।अब यह बहुत महत्वपूर्ण है, आत्म- साक्षात्कार के पश्चात्। क्योंकि यदि  तार्किक रूप से आपका मस्तिष्क  नहीं समझता  है, तो यह सदैव घटिया  बचकाना, अभद्र रहेगा अथवा कठोर, भयंकर रूप से अत्याचारी हो सकता है इनमें से कोई एक हो सकता है। अतः, गुरु तत्त्व में, दस मूल तत्व हैं। उनमें से पांच मूल तत्व  से वजन निपटते हैं। गुरुतत्व। गुरु ‘भार’ है आप  जानते हैं। किसी व्यक्ति का गुरुतत्व। आपको कितना आकर्षण है? गुरुत्वाकर्षण, जैसा  हम इसे कहते हैं। व्यक्ति में  गुरुत्वाकर्षण होता है। जब वह बात करता है उसमें  कितना संतुलन  है।

भारतीय संगीत में देखें हम इसे वजन कहते हैं, जिसका अर्थ है भार ( गुरुतत्व) । व्यक्ति का वजन, इसका अभिप्राय  है कि जब वह स्वयं अपने से या दूसरों के साथ व्यवहार  कर रहा है उसमें कितना ‘गुरुतत्व’ विध्यमान था।  अंग्रेजी भाषा  में भी वे इसका प्रयोग करते हैं – वजन उसमें कितना ‘गुरुतत्व’ है दूसरों के साथ व्यवहार में। अर्थात् वह दूसरों को वास्तव में कितना प्रभावित कर सकता है? यदि आप बहुत अधिक प्रभावित करते हैं, ठीक है, तो वह व्यक्ति कहेगा, ‘ओह, यह आवश्यकता से कहीं अधिक है। “ यह बहुत बड़ा पश्चिमी लोगों का विशेष गुण है, “ओह, यह बहुत अधिक हो गया है!” ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके मन  में  एक विचार है, आप देखें। यह सब अहंकार -उन्मुख है। ‘यह’ बहुत अधिक है। यदि आप उन्हें बहुत अधिक बताते हैं, “ओह! यह बहुत अधिक हो गया है। वे अति अधिक है।   मैं इसे धीरे धीरे करती हूँ यह मेरे लिए बहुत ज्यादा है!” यह बहुत सर्वसाधारण है, यह  बहुत ही सामान्य प्रतिक्रिया है। तो आपमें कितना गुरुतत्व विध्यमान है। और दूसरी है एक चुंबकत्व की गुणवत्ता । दो गुण। चुंबकत्व। पहले की गुणवत्ता वजन है। यह कि  आप कितने प्रतिष्ठित हैं। आप कैसे बात करते हैं? आपकी भाषा कैसी है? आपका व्यवहार कैसा है ? आपको हास्यपूर्ण होना चाहिए, परंतु कभी-कभी,  मेरे साथ भी,मैं देखती हूँ, कि लोग बहुत हस्यापद  ढंग से बात करते हैं। मुझे यह समझ नहीं आता यह कैसे होता है कि वे सदैव अनुचित  बातें कहते हैं?

मेरा अभिप्राय  है, भले ही उन्हें एक वाक्य, कहना पड़े, वे एक अनुचित  बात कहेंगे। ऐसा पूर्ण रूप से उनके साथ होता है।  यह विशुद्धि भी है, जो नाभी भी  है यह नाभि से आता है, क्योंकि आप को यह ज्ञात होना चाहिए कि कि विशुद्धि चक्र  नाभि चक्र का उत्थान है।

तो क्या घटित होता है, कि एक व्यक्ति जो कुछ भी वह है,यह उसकी भाषा के माध्यम से, उसके व्यवहार के माध्यम से, उसके चेहरे के माध्यम से, उसकी नाक के माध्यम से , उसकी आंखों से, सब कुछ, विशुद्ध चक्र के माध्यम से अभिव्यक्त होता है। इसलिए नाभि के उत्थान कि अभिव्यक्ति, प्रदर्शन विशुद्धि चक्र के माध्यम से होता है। अब जो कुछ भी आपकी नाभि में  है यह यहाँ दिखाई  देता  है। अब मान लीजिए एक व्यक्ति जिस में  महालक्ष्मी तत्व उचित ढंग से विकसित हुआ है, ऐसे व्यक्ति के पास किसी अन्य व्यक्ति के साथ व्यवहार करने का एक तरीका होगा जहां उसमें गुरुतत्व  और साथ ही साथ यह  समझ होगी कि उस व्यक्ति के साथ किस सीमा तक जाना है। कहाँ तक उस व्यक्ति के साथ निभाना है।किस सीमा में रहकर उससे बात करनी है, किस सीमा तक इस बारे में विचार करना है। कितना महत्व दिया जाना चाहिए। यह एक बात है जो बहुत महत्वपूर्ण है। और दूसरी  बात  यह है कि -कितनी चुंबकीय शक्ति आपके पास है? इसलिए आप अपनी ओर पीछे मुड़ कर देखें।

चुंबकत्व एक जादू है, एक व्यक्ति की आकर्षण शक्ति  एक व्यक्ति चुंबकीय है क्योंकि उसमें   कुछ जादू ( आकर्षण) है। अब यह जादू आता है आपको अपने , व्यक्तित्व से। आपके अपने व्यक्तित्व से। चुंबकत्व का आधार, बाएं पक्ष की ओर से शुरू होता है। और वह आधार है -श्री गणेश। श्री गणेश उस चुंबकत्व का आधार हैं। तो आप अबोध है। भोलापन सर्वोत्तम तरीका है उस चुंबक़ीय शक्ति को पाने का।  चुम्बकत्व की अभिव्यक्ति आप भौतिक रूप से नहीं कर सकते है। यह कोई भौतिक सामग्री नहीं है, पर  यह अमूर्त चीज़ है, यह आपके गणेश-गुण से आती है, श्री गणेश। ऐसा व्यक्ति चुंबकीय होता है। चुंबकीय का अर्थ है कि ऐसा व्यक्ति किसी  दूसरे व्यक्ति को आकर्षित करता है अपने ( व्यक्तिगत) गुरुतत्व के कारण , क्योंकि व्यक्ति की अपनी गुणवत्ता के कारण ऐसा व्यक्ति आकर्षित करता है। परंतु  वासना, लालच और व्यर्थ बातों के लिये  आकर्षित नहीं करता है परंतु दूसरे  व्यक्ति को आकर्षित करता है, अपने शिष्यों में सुरभित प्रेम की सुगंध के कारण।

अब यह हमेशा ही एक उलझन  है। उलझन में हैं !. क्योंकि यह इतना  अमूर्त विषय  है, इसलिए व्यक्ति को इसे समझना  चाहिए  बहुत सूक्ष्म तरीके से। यह चुंबकत्व क्या है? जिसे व्यक्ति को समझना चाहिए। आप देखें, कुछ हाव-भाव  लोग कृत्रिम रूप से उपयोग करते हैं।जिन्हें समान्यत: वे दूसरे लोगों को  आकर्षित करने के लिए उपयोग करते रहे हैं जिस तरह से वे चलते हैं, जिस तरह से वे पोशाक  पहनते हैं, जिस तरह से वे रहते हैं। ये सभी चीजों का कोई लाभ  नहीं है। यह कुछ इतना आंतरिक है, कि सुगंध इतनी आंतरिक है जिसे विकसित किया जाना चाहिए। परंतु सहज योग में मैंने देखा है, लोग बस इसके बारे में चिंता नहीं करते हैं, बस व्याकुल नहीं होते हैं। वे सोचते हैं कि वे जिस प्रकार से रहते आ रहे हैं, जिस प्रकार वे ऐसा रहे हैं … जैसे कहें, यदि वे अंग्रेज हैं जो वे अंग्रेज हैं, यदि वे फ्राँसीसी है तो वे फ्राँसीसी हैं, यदि वे भारतीय हैं तो वे भारतीय हैं,  यदि वे कोल्हापुर के हैं तो वे कोल्हापुर के ही रहेंगें।  इन विचारों को पहले समाप्त किया जाना चाहिए, क्योंकि सुगंध सर्वत्र फैलती है चाहे आप अंग्रेज है अथवा कोई अन्य। तो एक व्यक्ति की आंतरिक सुगंध सर्वप्रथम आपके  अन्तनिर्हित गणेश तत्व के माध्यम से विकसित  होती है। गणेश तत्व को सर्वप्रथम देखा जाना चाहिए।  अब एक गणेश व्यक्ति कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जो पूर्णत्या आत्मग्लानि से पीड़ित है, या ऐसा कोई व्यक्ति जो इतना गया गुज़रा मामला है कि भले ही आप उसकी पिटायी कर दें और उसका पूरी तरह से ‘कीमा’ जैसा कुछ  बना दें वह उसे सहन कर लेगा। यह ऐसा नहीं है!

ऐसा नहीं है। इसके विपरीत चुम्बकत्व गुणवत्ता ऐसी  है कि यह आपको आकर्षित करता है,ऐसी सीमा तक जहाँ आप अशांत  नहीं होते हैं। अब यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है जिसे हमें जानना चाहि आप देखें, यदि आपमें  अन्य प्रेम हैं, प्रेम जैसे कामुक प्रेम एवं अन्य सभी प्रेम आप करते  हैं, तो उस  प्रेम से  हो सकता है आप व्यक्ति को आकर्षित करें। वह व्यक्ति आपको नष्ट कर सकता है और यह आपको नष्ट  देता है, सदैव। परंतु  यह आकर्षण नष्ट नहीं करता,नष्ट नहीं करता है। आकर्षण इस सीमा तक होता है। कि आप नष्ट नहीं होते हैं, क्योंकि आप उससे अधिक उच्चतर हैं,   अधिक गहरे और अधिक वज़नदार है। वजन , आपको इस चीज़  से नष्ट नहीं किया जा सकता कि   आप आकर्षित कर रहे हैं। सदैव बड़ा चुंबक छोटे चुंबक को आकर्षित करता है। और यही है जिसे एक व्यक्ति को समझना चाहिए। यह जादू और यह करिश्मा, यह प्रतिभाशाली  स्वभाव एक व्यक्ति में  आता है, सबसे पहले, गणेश ततवा, भोलेपन से और दूसरा पूर्ण समर्पण और भक्ति से। जो व्यक्ति पूर्णत्या श्री माताजी के प्रति समर्पित हैं और उनके भक्त हैं। किसी अन्य के लिए नहीं। गणेश तत्व ही है  अपनी पत्नी के लिए  नहीं, अपने पति के लिए नहीं, अपनी  बहन के प्रति  नहीं, अपने देश के प्रति  नहीं किसी के लिए भी नहीं अपितु श्री माताजी के लिए। सम्पूर्ण समर्पण आपको वह करिश्मा, या वह आकर्षण देता है। सहज योग में ऐसा व्यक्ति वास्तव में आकर्षक हो जाता है और ऐसे व्यक्ति में करिश्मा होता है। अब कुछ(———–) लोग सोचते हैं कि यदि आप एक बहुत निष्क्रिय व्यक्ति हैं , और यदि कोई व्यक्ति आपसे कुछ भी कहता है और आप बुरा नहीं मानते हैं, इस प्रकार के व्यक्ति हैं, आप में करिश्मा है। ऐसा नहीं है। लोग आपको पसंद करते हैं क्योंकि वे आप पर आक्रामक हो सकते हैं। वे अब यदि आप सोचते   है कि आपकी आक्रामकता से और आपके चिल्लाने से और इन लोगों पर आपके चीखने से, आप उस करिश्माई स्वभाव को प्राप्त कर लेंगे , नहीं कर सकते, आप ऐसा नहीं कर सकते। आप उस ऊंचाई को प्राप्त नहीं कर सकते।तो आप इसे कैसे प्राप्त करते हैं? अधिक अबोध बनकर अब किसी व्यक्ति में अबोधिता कैसे  विकसित होती है,इस बारे में सोचने से नहीं  जैसे, आप देखते हैं, किसी व्यक्ति ने मुझसे पूछा, ‘आप अपने आयकर का प्रबंधन कैसे करती हैं?’ मैंने कहा, ‘कोई  भी आय न  होने से।’ फिर उन्होंने मुझसे पूछा, ‘आप  अपनी कार की समस्या का समाधान कैसे करती हैं? “अपने पास कोई भी कार नहीं होने से, मेरी अपनी नहीं।“ 

उन्होंने कहा, “आपके घर की समस्या के बारे में क्या है?” स्वयं अपना घर नहीं होने से।“ निही, निही। मेरे लिए सब कुछ निही है। फिर आप इस समस्या को कैसे सुलझाते है? इसे अपने पास न रखने से, बस अपने पास कुछ नहीं , कुछ न रखने से!” अपने ऊपर  सिर दर्द मत लो।देखिए , जब आप अपने ऊपर सिर दर्द मोल लेते हैं तो तभी अबोधिता होती  है। इस प्रकार के सिरदर्द कि  “यह मेरी शाल है, यह मेरी साड़ी है, यह मेरी चीज़  है, ” यह यह है, यह यह है, यह यह है “। परंतु केवल एक ही चीज है कि” यह मेरी माँ है और मुझे उनकी उद्घोषण करनी है बस इतना ही। यदि यही तरीका इसका अपनाते है, तो भोलापन श्री गणेश की भाँति बढ़ने लगती है। , और कोई सिरदर्द नहीं  होने से  “यह मेरा है, वह मेरा है।”

यह ‘मेरा’ धंधा समस्या का कारण बनता है, मेरे विचार में। व्यक्तिगत रूप से, मैं सोचती हूँ यही  कारण होना चाहिए । यह ‘मेरा’ व्यवसाय जो है। ‘ “यह मेरा है” क्योंकि जो कुछ भी ‘मेरा ‘ है। किसी व्यक्ति ने  मुझे बताया ,यह बहुत अच्छा तर्क है जो उसने दिया , जो कुछ भी मेरा है वह मैं नहीं हूँ अर्थात् वह सहज नहीं है। मेरा शरीर, मेरा सिर, मेरा सब कुछ – ‘मेरा’। परंतु “ मैं” उसने मुझे यह विचार दिया है – ‘मैं’। ‘मैं’ क्या हूँ ? क्या है? तब ‘मैं’ अलग हो रहा है , जो कुछ भी मेरा नहीं है वह ‘मैं’ है। इसलिए जो कुछ भी शेष बचता है वह आपकी आत्मा है। किसी व्यक्ति ने मुझे यह तर्क दिया।  मैंने कहा, “यह बहुत अच्छा तर्क है इसे क्रियान्वित करने के लिए।“ तब  जो कुछ भी शेष रह जाता है वह “मैं” हूँ और उस ‘मैं’ को ही हमें देखना है! तो आप इस सभी ‘मेरा’ अपना  ‘मेरा ‘ अपना  ‘मेरा’ अपना को कम करते जाते हैं। इन सभी ‘खानों’, ‘खानों’, ‘खानों’ को कम करने है।तभी भोलेपन की शुद्ध  आत्मा का उत्थान होगा। अतएव आत्मा के बारे में भी विचार, लोग सोचते हैं कि यदि आप आध्यात्मिक हो जाते हैं – मेरा अभिप्राय  है, मैं नहीं जानती हूँ  कि लोग आध्यात्मिक लोगों के बारे  में क्या सोचते हैं । परंतु आध्यात्मिक लोगों के बारे में विचार यह है कि आपको कुछ भयंकर एक बैल की भाँति अथवा मैं नहीं जानती। एक लोमड़ी की तरह तेज होना होगा अथवा एक बौद्धिक होना होगा फ़्रॉयड जैसा अथवा कोई अन्य चीज़। लोगों के मन में  सभी तरह के विचार हैं। नहीं, ऐसा  नहीं है! आध्यात्मिक व्यक्ति बस अबोध होता है , बस अबोध।

कोई बुद्धि नहीं होती  है, कुछ भी नहीं। केवल भोला। सम्पूर्ण रूप से भोलापन होता है। देखें,  जो भी वह बात करता है या कहता है,भोलेपन  से आती है। इसमें कोई ऐसी बुद्धि मात्र  नहीं है, जो यहां लोगों में पढ़ने के माध्यम से और समझने  के माध्यम से और  विश्लेषण करके उन्हें मिलती है। ऐसा कुछ भी नहीं। इसमें एक मात्र शुद्ध और सरल अबोधिता है। और ये  बहुत अच्छे ढंग  से कार्यान्वित होता है। यह इतनी निर्मल  है। यह केवल कहती है है जो यह जानती  है और जो यह जानती है सब सर्वोपरि  है। अतः यह ‘ अनुबंधन – मुक्ति’ हमारे भीतर प्रस्थापित ( लानी) करनी होगी।परंतु इसकी आपको अपने लोगों के बीच में भी चर्चा नहीं करनी चाहिए। एक बार जब आप चर्चा करना शुरू करते हैं, तो आप भी, आप देखते हैं, यह एक प्रकार से धार्मिक विवाद बन जाता है।इसके विषय में कोई धर्मशास्त्र नहीं है।यह बहुत सरल है। अबोध होना सरलतम बात है। परंतु अबोधिता लुप्त हो जाती है।

क्यों? क्योंकि हमारा ध्यान अलग मार्ग पर है, हम अन्य चीजों के प्रति सजग  हैं। हम अन्य चीजों की ओर देख रहे हैं। यह बहुत सरल है, आप जानते हैं। आज मैं सोच रही थी  कि मुझे तीन नौ गज की साड़ियाँ ख़रीदनी हैं। एक साधारण प्रश्न है कि क्योंकि वहाँ वे तीन महिलाएँ थीं जो नौ गज की साड़ी पहनती थीं और मुझे उन्हें तीन नौ गज की साड़ियाँ देती थी।बस इतना ही। मैंने  बस इस विषय में विचार ही किया। ठीक है। मैं यहाँ आयी , मैंने  यहाँ बहुत अच्छी साड़ियाँ यहाँ रखी हुई देखी। तो मैंने उससे पूछा ,” यह कहाँ मिलती है”?

उसने कहा , “ये यहीं पर मिलती है।“  मैंने कहा “ ठीक है।“  तो आप  जाइए और इन तीन साड़ियों को खरीद लें।“  कोई विश्लेषण नहीं,ऐसा कुछ भी नहीं मेरे मन  में बस यही आया कि मुझे तीन साड़ियाँ खरीदनी हैं, बस समाप्त । इसका उत्तर यहाँ है। तो यहां तक कि यह पर्यावरण भी इतना अबोध है,सम्पूर्ण  परिस्थिति इतनी अबोध है कि ‘ ‘अबोधिता’ से ही अबोधिता को समाधान मिल गया। यह भोलापन प्रत्येक स्थिति में कार्यान्वित होता है, आप देखते हैं,क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति में थोड़ा बहुत भोलापन होता है, सभी में, क्या ऐसा नहीं है, तो आप कर सकते हैं … यह एक पांचवें स्तंभ की तरह  है, आप देखें । यह अबोधिता आपके भीतर  पांचवां स्तंभ है। इसलिए यदि कोई  व्यक्ति अबोध  है, तो आप देखेंगें  वह आपके पांचवें स्तंभ पर कार्य करेगा और आपको सही कर देगा। जब आप दूसरों को बंधन देते हैं, तो कैसे घटित होता है, आप वास्तव में उसे अपनी अबोधिता से बांधते हैं और वह बेचारा व्यक्ति यह नहीं जानता   है। उसके भीतर उसकी अबोधिता विध्यमान है, आप  उस अबोधिता  को पकड़ लेते है, बस यही आपने किया है, इसी प्रकार आप प्रबंध करते है। परिस्थित्यों को कार्यान्वित करना बहुत सहज है।केवल एक तत्व, तत्व जिसके ऊपर सम्पूर्ण विषय टिका हुआ है , क्या है,? यह तत्व अबोधिता के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है? तो इन सभी चीजों के द्वारा इसे विकसित करने का प्रयास करें …या  नेति, नेति यह कहते  हुए, “यह नहीं, यह नहीं, यह नहीं 

, यह नहीं, यह नहीं,” आपने  सभी विचारों के लिए। ” यह नहीं यह नहीं, यह नहीं, यह नहीं”। आप स्थिति में पहुँचते है।– “ मेरा नहीं, मेरा नहीं, मेरा नहीं, मेरा नहीं।“ और  यह ऐसा ही है। और आप देखते है। कि सम्पूर्ण  भौतिक संसार अब ‘ अबोधिता’  पर हमला कर रहा है, क्योंकि वे भयभीत हैं। आप उस पर आक्रमण  नहीं कर सकते। अबोधिता नष्ट नहीं की जा सकती।”इसे  नष्ट नहीं किया जा सकता है। अबोधिता कुछ ऐसी चीज़ है, जो सर्वव्याप्त है और इसे नष्ट नहीं किया जा सकता है। इसलिए जो कुछ भी लोग प्रयास करें यह  नष्ट नहीं हो सकती।  परंतु इसपर आवरण हो  सकता है, यह पीछे की ओर जा सकती है,, परंतु इसे नष्ट नहीं  किया जा सकता है। स्वयं अपने मार्ग पर क्रियाशील होगी। अतः इस अबोधिता को विकसित करने का प्रयास करें जो महालक्ष्मी तत्व का मूल आधार हैहमें कहना चाहिए अथवा यह महालक्ष्मी तत्व का सार है।अतः बाह्मय चीजें, महत्व, वजन, गरिमा, व्यवहार सब कुछ यह बाह्म्य  बात है और आंतरिक  बात -यह ‘तत्त्व’ , तत्व, जिस पर यह आधारित है, अबोधिता है।

अब यदि,इसके साथ,  यदि अपने अंतनिर्हित महालक्ष्मी तत्व को समझे, इसे कैसे कार्यन्वित होना है। यह बौद्धिक नहीं है! दुबारा  मैं कहूंगी  कि मैं नहीं चाहती कि आप अपनी बुद्धि को इसमें प्रक्षेपित करें, और यह पता लगाने के लिए , परंतु केवल वहीं स्थित रहें जहाँ पर आप है और आप पाएँगें कि सभी उत्तर आप को बस मिल रहे हैं- स्वतः ही।

बस अपने मन का इसमें प्रक्षेपण नहीं करें, बस आपको प्रत्येक प्र्श्न के सभी उत्तर मिल जाएँगें, बस ऐसे ही। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति में अंतनिर्हित अबोधित ही सरल उत्तर है जहां सभी जटिलताएं छूट  जाती हैं। यही भोलापन है।और यही है जो ईश्वर का प्रेम है, ‘परमात्मा का प्रेम’ है।अतः इसे प्रेम के साथ भ्रमित न करें , अपने सभी  प्रेम संबंधी निरर्थक विचारों केसाथ जो आपके अंदर लोगों के प्रति  पहचान, गलत पहचान के रूप में विधमान है। यह हमारे भीतर स्थित शुद्ध प्रेम है, पवित्रता , अबोधिता जो प्रेम है और जो स्वयं जीवन  है, हमें कहना चाहिए। यह उसका एक हिस्सा है, ‘प्राण शक्ति’।  परंतु  प्राण शक्ति महालक्ष्मी नहीं है। अतः  महालक्ष्मी है और सभी चीजों का सार है, क्योंकि यदि सृजन करना है साथ में यदि परमात्मा की इच्छा भी है, और यदि कोई,  महालक्ष्मी तत्व वाहब विध्यमान नहीं है, तो फिर इच्छा होने का क्या औचित्या है? मान लीजिए, यदि आप  सृजन करते है, और आपके पास महालक्ष्मी तत्व नहीं है, तो कैसे  आप इसे कार्यान्वित  करेंगे? आप इसे कार्यान्वित नहीं कर सकते, आपके पास अवश्य ही महालक्ष्मी तत्व  होना चाहिए। क्योंकि उनका कोई अर्थ नहीं है। तो बाह्य रूप से यह महालक्ष्मी तत्व है,परंतु भीतर, भीतर में, हम कह सकते हैं, वहाँ तीन प्रकार के सत्व हैं।पहला सत्व  महालक्ष्मी तत्व है , ब्राह्म से देखने पर, आप विकास  देखते हैं,ठीक है। फिर  इसके भीतर सृजन  है, अर्थात् सभी तत्वों का सृजन  हो रहा है और वे सब।परंतु उसके भीतर इच्छा है और इस इच्छा के अंतनिर्हित आधे भाग में,आप कह सकते हैं,श्री गणेश हैं। इसलिए यह गणेश तत्व  अंततः सभी कुछ नियंत्रित कर लेता है और सभी में व्याप्त हो जाता है।

और यही  है, मैं कहूंगी  कि, इसके बारे में  विचार ना करें बस अपने भोलेपन  को बढ़ने दें,सहज अबोधिता।और आपकी गरिमा बहुत महत्वपूर्ण है ,आपके पास अपनी गरिमा का होना।  जैसे कुछ लोग सोचते हैं कि यदि वे फटे कपड़े पहनते हैं और सड़कों पर  चलते फिरते हैं, और वे सभी बड़े संन्यासी हैं। यह अनुचित  है। क्यों? आप गरिमापूर्ण नहीं व्यवहार कर रहे हैं और परमात्मा  ने आपको इतना अधिक  दिया है, तो आपको यह दिखवा करने  का प्रयास क्यों करना चाहिए की आपके पास कुछ नहीं है? बस यह दिखवा करने के लिए कि आपको कुछ भी नहीं मिला जिसे भगवान ने दिया हो । यह केवल एक प्रकार से परमात्मा को धन्यवाद  देने की  क्रिया है कि, हे परमात्मा , आप ने मुझे बहुत  कुछ दिया है।” आपको सर्वोत्तम पहनना होगा। जैसे पूजा में, यदि आप देखते हैं, तो यहाँ की महिलाएँ वे अपने सारे नाक के छल्ले( नथुनी) पहनती हैं और अपने सभी गहने और सब कुछ, यदि मंदिर में उन्हें जाना है।सब कुछ  वे पहनती  हैं! और इसी प्रकार से , पुरुष भी अपनी साफ-सुथरी पोशाकें पहनते हैं, , बहुत साफ-सुथरी चीजें, जो  कुछ भी उनके पास है, वे साधारण, साफ सुथरे हैं, जो कुछ भी उनके पास है। परंतु  कोई भड़कीला पन  नहीं। यह केवल एक आचार है जिसके द्वारा आप अभिव्यक्त करते हैं। परमात्मा ने  आपको यह  किया  है। ‘हे ईश्वर ! मैं आपको धन्यवाद करता हूँ’। आज का यह इतना महान  दिन है, नववर्ष में, नए साल के दिन यहाँ उपस्थित होना- कोल्हापुर में महालक्ष्मी के स्थान पर। और इसे कोल्हापुर इसलिए  भी कहा जाता है क्योंकि क़ोल्हासुर का यहाँ संहार हुआ था। कोल्हासुरा एक  लोमड़ी की भाँति भयानक व्यक्ति था  और वह दुबारा पैदा हुआ था। अब वह फिर से मर चुका है। ईश्वर का धन्यवाद! वह यहाँ था और अब वह … कोल्हासुर मर गया। आप इसके विषय  में नहीं सोचते हैं, फिर से आपका मन बाहर की ओर चला जाता है। इसके बारे में मत सोचो, मैं आपको इसके विषय में बताऊँगी । मैंने जानबूझकर नाम नहीं लिया। उसने दुबारा जन्म लिया और उसे बाहर फेंक दिया गया।  तो यह वही स्थान  है जहाँ कोल्हासुर को मारा गया था, जहाँ यह स्थापित हुआ था, इसलिए महालक्ष्मी का अवतरण हुआ  औरइसलिए इस स्थान का विशेष महत्व है,  कि हम यहाँ तीर्थ यात्रा के लिए आए हैं और आइए हम विनम्रता से इस विषय में विचार करें। वास्तव में ये सभी घटनाएँ पशिचम देशों में घटित नहीं हो सकती थी क्योंकि यदि वे धरती माँ से भी  बाहर आतें तो उन्हें पहचानता कौन?  उनके बारे में कौन जान पाता ? 

किसने उनका आदर सत्कार किया होता?किसने उनकी पूजा की होती?   इसीलिएऐसा नहीं हुआ पश्चिम में बहुत अधिक । परंतु  यह वहां है, थोड़ा बहुत वहाँ है, इसमें कोई संदेह नहीं।  परंतु  यहाँ अब हमारे पास  हैं, ये सब, मंदिर और अबोधिता पर आक्रमण तांत्रिकों की ओर से हुआ है। एवं इसलिए तांत्रिकों ने इन सभी मंदिरों में प्रवेश किया और उन्होंने स्वयं को स्थापित करने का प्रयत्न किया।परंतु धीरे-धीरे उन्हें निष्क्रिय  और  समाप्त  किया जा रहा है। ये तांत्रिक सभी देवियों के प्रत्येक मंदिर में घुस गए है। और वे धीरे-धीरे सभी बाहर हो जाएँगें , सीधा बाहर निकलेंगें। तो यही वह आक्रमण  है जिनके माध्यम से आया और इस प्रकार ये ब्राह्मण  आकर इन स्थानों में बस गए । तथाकथित ब्राह्मण। एवं यहाँ पर प्र्यत्न किया इन सभी तांत्रिक विधियों  और चीजों के विषय में उपदेश देने का मंदिर में, और उन्होंने वास्तव मैं यहाँ पर वातावरण दूषित कर दिया। परमात्मा आप सभी को आशीर्वाद दे। मैं चाहती  हूं कि आप लोग मन की एकाग्रता  विकसित करें ताकि आप अन्य सभी गलत पहचान से से ऊपर उठें और शुद्ध आत्मा के साथ तादात्म्य स्थापित करें, इस अपने महालक्ष्मी तत्व के माध्यम से।

परमात्मा आपको आशिर्वादित करे।