Shri Saraswati Puja, The basis of all creativity is love

Dhule (भारत)

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Shri Saraswati Puja, Dhulia (India), Sankranti day, 14 January 1983.

English to Hindi translation

HINDI TRANSLATION (English Talk) Scanned from Hindi Chaitanya Lahari प्रेम से सभी प्रकार की सृजनात्मक गतिविधि जो नहीं सुहाते वे सब लुप्त हो जाते हैं। यद्यपि ऐसा घटित होती है। आप देखिए कि किस प्रकार राऊल बाई मुझे प्रेम करती हैं और यहाँ आप सब लोगों को भी एक सुन्दर चीज़ के सृजन करने का नया विचार को प्रभावित नहीं करते, तो तुरन्त ये पदार्थ लुप्त प्राप्त हुआ है! ज्यों-ज्यों प्रेम बढ़ेगा आपकी होने लगते हैं (नष्ट होने लगते हैं)। होने में समय लगता है, नि:सन्देह इसमें समय लगता है- ज्यों ही आपको लगता है कि ये जनता सृजनात्मकता विकसित होगी। तो प्रेम ही श्री सरस्वती की सृजनात्मकता का आधार है। यदि प्रेम न होता तो अब जिस प्रेम की हम बात करते हैं, हम सृजनात्मकता न होती। इसका अर्थ और भी गहन है, आप देखिए वैज्ञानिक चीजों का सृजन करने वाले लोगों ने भी ये चीजें जनता से प्रेम के कारण बनाई हैं, केवल अपने लिए नहीं। किसी ने भी केवल अपने लिए किसी भी चीज़ की रचना नहीं की। अपने लिए भी यदि वे कोई चीज बनाते तो भी वह सबके उपयोग के लिए हो जाती, अन्यथा इसका कोई अर्थ ही नहीं है। यदि आप ऐटॅम बम तथा विज्ञान द्वारा बनाई गई अन्य सभी चीज़ों की बात करें तो भी ये अत्यन्त सुरक्षात्मक हैं। यदि उन्होंने इन चीज़ों का सृजन न किया होता तो लोगों के मस्तिष्क युद्ध से न हटते। अब कोई भी बड़े परमात्मा के प्रेम की बात करते हैं, निश्चित रूप से इसे हम चैतन्य लहरियों के माध्यम से जानते हैं। लोगों में चैतन्य-लहरियाँ नहीं हैं, फिर भी वे अत्यन्त अचेतनंता में चैतन्य लहरियाँ महसूस कर सकते हैं। विश्व की सभी महान चित्रकृतियों में चैतन्य है। विश्व के सभी महान सृजनात्मक कार्यों में चैतन्य है। जिन कृतियों में चैतन्य है केवल वही बनी रह पाईं, उनके अतिरिक्त बाकी सब नष्ट हो गईं। ऐसे बहुत से स्मारक, भयानक मूर्तियाँ और चीजें बनी जिनकी रचना बहुत पहले की गई थी। परन्तु प्रकृति ने इन सबको नष्ट कर दिया क्योंकि ये काल के प्रभाव को नहीं झेल पाईं- यह काल की विनाश शक्ति है। अत: वह सभी कुछ जो दीर्घयायु है, पोषक है और श्रेष्ठ है, वह इस प्रेम विवेक के परिणाम युद्ध के बारे में नहीं सोच सकता। नि: सन्देह शीत युद्ध हो रहे हैं, परन्तु जब लोग इनसे तंग आ जाएंगे तो शनै: शनै: ये भी समाप्त हो जाएंगे। तो दाईं ओर की, सरस्वती की, सारी गतिविधि मूलत: प्रेम में स्वरूप है जो हमारे अन्दर अत्यन्त विकसित है। परन्तु यह कुछ अन्य लोगों में भी है जो अभी तक आत्म-साक्षात्कारी नहीं है। अन्तत: पूरे विश्व को समाप्त होनी है। प्रेम से ही इसका आरम्भ होता है और प्रेम में ही समाप्ति। जिस भी चीज़ का अन्त यह महसूस करना होगा कि व्यक्ति को परमात्मा के परमप्रेम तक पहुँचना है अन्यथा इसका ( विश्व का) कोई अर्थ नहीं। प्रेम में नहीं होता वह एकत्र होकर समाप्त हो जाती हैं। बस लुप्त हो जाती है। आप देख सकते हैं कि कोई भी पदार्थ जो प्रेम के लिए उपयोग नहीं हुआ, आपने कलाकृतियों में देखा है कि कलाकारों ने लोगों को आकर्षित करने के लिए कितनी सस्ती जो भी पदार्थ हम बनाते हैं, जिनमें कोणिकता है, जो और अभ्रद चीजों का उपयोग किया है ताकि लोग आम जनता के उपयुक्त नहीं हैं, सामान्य लोगों को ये सोचे कि यह कला है। परन्तु यह सब लुप्त हो वह समाप्त हो जाता है। प्रेम ही आधार है। अन्यथा 7

Hindi Translation (English Talk) जाएगी। जैसा मैंने आपको बताया, यह काल की इतने थोड़े समय में इनका वर्णन नहीं किया जा मार सहन नहीं कर सकती, यह ऐसा नहीं कर सकता और सूर्य ने हमें इतनी शक्तियाँ प्रदान की हैं सकती। क्योंकि समय ही इसे नष्ट कर देगा। ये कि इनके विषय में एक क्या दस प्रवचनों में भी सारी चीजें लुप्त हो जाएंगी। अब भी आप परिणाम देख सकते हैं कि सर्वत्र, पश्चिमी देशों में भी, किसा के विरोध में जाते हैं और किस प्रकार सरस्वती के प्रकार चीजें परिवर्तित हो रही हैं अतः पश्चिम से विरोध में जाते हैं। सरस्वती की पूजा करते हुए इतना निराश होने की और ये कहने की कोई अपने अन्दर यह बात हमने स्पष्ट देखनी है। उदाहरण बता पाना असम्भव है। परन्तु किस प्रकार हम सूर्य आवश्यकता नहीं है कि पाश्चात्य विश्व बंजर भूमि के रूप में पश्चिमी लोग सूर्य को बहुत पसन्द करते हें क्योंकि वहाँ पर सूर्य नहीं होता। परन्तु जैसा आप कार्य करना होगा। पश्चिम ने, मैं कहना चाहंगी, जानते हैं इस दिशा में वे अपनी सीमाएं लाँघ जाते विशेष रूप से सरस्वती की बहुत पूजा की है- हैं और अपने साथ सूर्य की जटिलताएं उत्पन्न कर उससे भी कहीं अधिक जितनी भारत में हुई है लेते हैं। मुख्य चीज़ जो व्यक्ति ने सूर्य के माध्यम क्योंकि वे सीखने के लिए गए और सी चीजें से प्राप्त करनी होती है, वह है प्रकाशविवेक- अन्तर्प्रकाश। और यदि आज्ञा पर स्थित सूर्यचक्र पर भगवान ईसा-मसीह विराजमान हैं तो जीवन की (Waste Land) है । ये सब ठीक हो जाएगा और ये बहुत खोजने का प्रयत्न किया। परन्तु वे केवल इस बात को भूल गए कि वे देवी हैं, परमात्मा देने वाले (Giver) हैं। हर चीजू देवी से आती है। ये बात वो भूल गए और इसी कारण से सभी समस्याएं खड़ी हो गई। आपकी शिक्षा में यदि कोई आत्मा न हो, पावनता, जिसे आप ‘नीति’ कहते हैं, और भी अधिक आवश्यक है, यही जीवन की नैतिकता है। अब पश्चिम में तो नैतिकता भी बहस का बहुत शिक्षा में यदि देवी का कोई स्रोत न हो तो शिक्षा पूर्णत: व्यर्थ है। उन्हें यदि इस बात का एहसास हो बड़ा मुद्दा बन गई है। लोगों में पूर्ण नैतिकता का विवेक ही नहीं है। नि:सन्देह चैतन्य-लहरियों पर गया होता कि आत्मा कार्य कर रही है तो वे इतनी दूर न जाते। भारतीयों को भी मैं इसी चीज़ की चेतावनी दे रही थी कि यद्यपि आप लोग भी अब औद्योगिक क्रान्ति को अपना लक्ष्य बना रहे हैं आप इस बात को जान सकते हैं परन्तु वे सब इसके विरुद्ध चले गए। जो लोग भगवान ईसामसीह के पुजारी हैं, जो सूर्य के पुजारी हैं, सरस्वती के पुजारी हैं, वे सभी विरोध में चले गए। सूर्य की शवितयों के विरोध में, उसकी अवज्ञा करते हुए। परन्तु आपने औद्योगिक क्रान्ति की जटिलताओं से बचना क्योंकि आपमें यदि नैतिकता व पावनता का विवेक है। आत्मा को जानने का प्रयत् अवश्य करें। आत्मज्ञान प्राप्त किए बगैर आपको भी वही समस्याएं नहीं है तो आप सूर्य नहीं बन सकते। सभी कुछ होंगी जो इन लोगों को हैं। क्योंकि वे भी मानव हैं स्पष्ट देखने के लिए सूर्य स्वयं प्रकाश प्रदान करते हैं। सूर्य में बहुत से गुण हैं। वे सभी गीली, गन्दी और मैली चीजों को रुखाते हैं। परजीवी जन्तु उत्पन्न करने वाले स्थानों को वे सुखाते हैं। परन्तु पश्चिम में बहुत से परजीवी जन्म लेते हैं। केवल परजीवी ही नहीं से भयानक पंथ और भयानक सरस्वती जी के इतने आशीर्वाद हैं कि चीजें भी पश्चिम में आ गई हैं, उन देशों में जिन्हें और आप भी। आप भी उसी मार्ग पर चलेंगे। अचानक आप दौड़ पड़ेंगे और समस्याएं होंगी, बिल्कुल वैसी ही समस्याएं जैसी पश्चिमी लोगों को हैं। बहुत 8.

Hindi Translation (English Talk) प्रकाश से परिपूर्ण होना चाहिए था परन्तु वे उसी हमारे अन्दर हैं तो वे हमें सुबुद्धि देती हैं, विवेक अन्धकार में बने हुए हैं आत्मा के विषय में देती हैं इसी कारण से सरस्वती पूजन के लिए, सूर्य अन्धकार, अपने ज्ञान के विषय में अन्धकार और पूजन के लिए हमारे अन्दर स्पष्ट दृष्टि होनी चाहिए कि हमें क्या बनना है, हम क्या कर रहे हैं, कैसी गन्दगी में हम रह रहे हैं, हमारा मस्तिष्क कहाँ जा रहा है। आखिरकार हम यहाँ पर मोक्ष प्रप्ति के लिए हैं, अपने अहं को बढ़ावा देने तथा अपने अन्तःस्थित गन्दगी के साथ जीवनयापन करने के प्रेम के विषय में अन्धकार। जहाँ प्रेम का प्रकाश होना चाहिए था वहाँ इन तीनों चीजों का साम्राज्य प्रकाश का अर्थ वह नहीं है जो आप अपनी स्थूल दृष्टि से देखते हैं। प्रकाश का अर्थ है- अन्तर्प्रकाश- प्रेम का प्रकाश। यह इतना सुखकर है, इतना मधुर है, इतना सुन्दर है, इतना आकर्षक है और इतना लिए नहीं। विपुल है कि जब तक आप इस प्रकाश को अपने तो ये प्रकाश हमारे अन्दर आया है और हमें अपनी मानसिक गन्दगी जो हमारे चहुँ ओर अन्दर महसूस नहीं कर लेते- बह प्रकाश जो पावन प्रेम है, पावनता है, पावन सम्बन्ध है, पावन सूझ-बूझ है, आपको चैन नहीं आ सकता है। इस प्रकार का पनप रही है, से ऊपर उठने का प्रयत्न करना चाहिए। इसके अतिरिक्त गहनता में जाकर आपको समझना होगा कि हमारे अन्दर अहं नाम की भी एक संस्था है। यह अहम् मिथ्या है, बिल्कुल मिथ्या । आप कुछ नहीं करते। वास्तव में जब आप हैं, प्रकाश यदि आप अपने अन्दर विकसित कर लें तो सभी कुछ स्वच्छ हो जाएगा। ‘मुझे धो दो और मैं बर्फ से भी श्वेत हो जाऊंगा। “Wash me and I Shell be whiter then Snow ‘I पूर्णतिः स्वच्छ: हो जाने पर आपके साथ भी ऐसा ही होता है। अपनी दृष्टि इधर -उधर घुमाते जब आपका चित्त इधर-उधर जाता है, तब यह केवल आपका अहम् प्रकृति का पावनतम रूप हमारे अन्दर निहित होता है जो आप पर काबू पाने के लिए प्रयत्नशील है- प्रकृति का पावनतम रूप। प्रकृति के पावनतम है। परन्तु वास्तव में अहम् पूर्णत: असत्य है क्योंकि रूप से ही हमारे चक्र बनाए गए हैं। मानसिक ‘अहम्’ तो केवल एक है और वो है विचारों द्वारा हमीं लोग इसे बिगाड़ रहे हैं। उसी ‘सर्वशक्तिमान परमात्मा’-‘महत् अहंकार’। इसके सरस्वती शक्ति के विरुद्ध आप साक्षात सरस्वती के विरुद्ध जा रहे हैं। प्रकृति की सारी अशुद्धियों को सरस्वती शुद्ध करती हैं, परन्तु अपनी मानसिक गतिविधियों से हम इसे बिगाड़ रहे हैं। हमारी सारी हैं- आप ये कर रहे हैं, आप वो कर रहे हैं- जो मानसिक गतिविधि पावन विवेक के विरुद्ध जाती है और यही बात व्यक्ति ने समझनी है कि अपने विचारों द्वारा हमने इस शुद्ध विवेक को नहीं बिगाड़ना। सभी दिशाओं में यह अपना प्रक्षेपण कर सकता है। हमारे विचार हमें इतना अहंकारी, इतना अहंवादी, आगे की ओर जब यह अपना प्रक्षेपण करता है इतना अस्वच्छ बना देते हैं कि हम वास्तव में तो अन्य लोगों को नियन्त्रित करता है। दूसरे विषपान करते हैं और कहते हैं, ‘इसमें क्या बुराई लोगों पर रोब जमाने का, उनका वध करने का है?’ सरस्वती के बिल्कुल विरुद्ध। सरस्वती यदि अतिरिक्त किसी अन्य अहम् का अस्तित्व नहीं है। सब मिथ्या है। बहुत बड़ा मिथक है क्योंकि यदि आप सोचने लगे कि आप ही सभी कुछ कर रहे आप नहीं कर रहे, तो यह धूर्त अहम् प्रवेश कर जाता है और आप इसे कार्यान्वित करने लगते हैं। प्रयत्न करता है। हिटलर बन जाता है। जब 9.

Hindi Translation (English Talk) प्राप्त होती है। परन्तु कितनी बार मैं ऐसा कहती हैँ? आप यदि कुछ कहते हैं तो अधिक से अधिक मैं हास्यास्पद, मूर्खतापूर्ण और व्यर्थ की चीज़ों को यही कहती हैं कि, “हाँ।” परन्तु मैं वो नहीं कहती। देखने लगता है। जब यह बाई ओर को जाता है मैं यदि जोर से ऐसा कहूँ, तो मैं नहीं जानती, क्या तो यह इस प्रकार से देखने लगता है, मानो हो जाए। सभी कुछ शायद नष्ट हो जाए! अत: हमें है कि केवल महत् अहंकार ही गतिशील ईसामसीह, बहुत बड़ी देवी या आदिगुरुओं की है, वही कर्म करता है, वही सृजन करता है। तरह से कुछ और “मैं अति महान व्यक्तित्व कभी-कभी मैं आप पर चिल्लाती हूँ, तुरन्त सारे भूत भाग खड़े होते हैं। मात्र मेरे एक बार चिल्लाने पर। कल आपने देखा, बातें करने वाले सभी भूत भाग खड़े हुए। कल ही मैंने आपको ये बताया था। अतः आपको समझना है कि अब आप ये दाई ओर को जाता है तो यह अतिचेतन ( Supra Conscious) बन जाता है। तब यह आप कोई बहुत बड़े आदमी हो, बहुत बड़े समझना हूँ!” यह बायाँ पक्ष है। और जब यह पीछे की ओर जाता है तो अत्यन्त भयानक है। उस स्थिति में लोग ऐसे गुरु बन बैठते हैं जो दूसरों को बरबाद कर रहे हैं। उनका अहं जब पीछे की ओर जाता है तब वे गुरु बन बैठते हैं। उनके अपने अन्दर अनगिनत दोष होते हैं और अन्य लोगों को हैं। स्वयं पर चिल्लाने के लिए आप दाई विशुद्धि भी वे इसी घोर नर्क में खींचने का प्रयत्न करते हैं। का उपयोग करें, “‘क्या अब तुम डींगे मारनी बन्द आत्म-साक्षात्कारी हैं, आप भी ऐसा ही कर सकते सभी ओर, अहंकार की गतिविधि ही नर्क है। करोगे, क्या तुम बेवकूफी भरी बातें करनी बन्द लोग जब अपनी दाई विशुद्धि का उपयोग करोंगे, क्या तुम करने लगते हैं, अपनी डींग मारने लगते हैं, तो ये दिखावा करना बन्द करोगे?” तब यह रुके जाएगा। सबसे बुरी बात है। किसी भी प्रकार का अहं ये स्थूलता उन लोगों द्वारा घटित होती है जो वास्तव में गतिशील हैं। वे इसके विषय में कुछ करना चाहते हैं, ऐसा नहीं हैं कि वो गतिशील नहीं हैं। वो करना चाहते हैं, परन्तु उन्हें केवल एक ही। को इतना मोटा कर देता है कि उसका भेदन मार्ग का ज्ञान है कि लम्बी बातें करनी हैं। वो नहीं आपको हो, यदि आप इसकी शेखी बघारने लगते हैं, इसके बारे में बात करने लगते हैं, तब यह आपको चहूँ ओर से घेर लेता है, अहं की दीवारह असम्भव हो जाता है, क्योंकि ऐसा व्यक्ति अपने समझते कि कुछ आन्तरिक मार्ग भी हैं जिनके द्वारा आप कहीं अधिक नियन्त्रण कर सकते हैं क्योंकि वे इन्हें अपनाना ही नहीं चाहते, बातों में ही उलझे आप से पूरी तरह सन्तुष्ट होता है, और मानता है कि वह ऐसा ही है। एक बार जब उसका विश्वास इस प्रकार की मूर्खता में हो जाता है तो अहं की उस दीवार को तोड़ना बिल्कुल असम्भव हो जाता रहते हैं। एक बार जब उन्हें इसकी आदत हो जाती है। है तो वे इसके विषय में बात करते हैं और सारी अत: जब भी आप इन चीजों के बारे में शक्ति बाहर चली जाती है। यदि वे इसके बारे में बात न करें, इसे अपने अन्दर बनाए रखें तो ठीक डींग मारें, या लम्बी बातें करने लगें तो सावधान हो जाएं। आप जानते हैं कि मैं क्या हूँ, परन्तु मैं कितनी है। आप अपने अनुभवों के बारे में मुझे बता वार कहती हूैँ कि “मैं वो हूँ।” मैं चाहे एक बार ऐसा कहूं तो आपको बहुत तेज चैतन्य लहरियाँ को ये अनुभव बताने लगेंगे, इसके बारे में बहुत सकते हैं, ठीक है, परन्तु यदि आप अन्य लोगों 10

Hindi Translation (English Talk) अधिक बातें करने लगेंगे तो जो शक्ति आपको सब’। परन्तु वह गर्व नहीं है। मैंने देखा है कि वह प्राप्त हुई है वह धीरे-धीरे लुप्त होने लगेगी और गर्व विद्यमान नहीं है। अब भी यह अत्यन्त व्यक्तिगत आप पूर्णतया निम्नस्तर पर आ जाएंगे। अत: व्यक्ति को ये बातें बहुत अधिक नहीं करनी चाहिए तो होता क्या है कि आप ‘एक व्यक्तित्व,’ एक है। आप यदि ये सोचने लगें कि ‘हम’ ‘सहजयोगी’, कि मेरे पास ये शक्ति है, मेरें पास वो शक्ति है या मैं ऐसा सोचता हूँ, वा मैं ऐसा करता हूँ, ऐसा करना संस्था बन जाते हैं । परन्तु व्यक्ति तो अन्य लोगों को हीन भावना से देखता है, वह देखता है कि फलां व्यक्ति नीचा है, फलाँ ऊँचा है, फलों ऐसा है। वो ये नहीं सोचेगा कि ‘हम सहजयोगी’ कितने सुन्दर हैं! अत: बिल्कुल गलत है। मैं आपको चेतवनी देती हूँ कि दिखावा करने का प्रयत्न न करें, (Do not try to show off )। हाँ, आप मेरी शक्तियों के बारे में बात कर सकते हैं, यह विल्कुल ठीक है, परन्तु अपनी शक्ति के बारे में बात करने का प्रयत्न न करें। ‘हम’ शब्द से सोचें, इस प्रकार हमारा अहं कम, कम, और कम हो जाएगा। और कल यही मूर्ख अगर कहना ही पड़े, नि:सन्देह जब आप किसी और हास्यास्पद लगने वाला अहं एकादश का शिकार नकारात्मक व्यक्ति से बात करें या बताएं तब आपको ‘हम’ कहना चाहिए “मैं” नहीं। ‘हमें’, ‘हममें से कुछ को, यह शक्ति अपने अन्दर महसूस हो जाएगा परन्तु हम सबको हर समय ‘हम’ कहना हुई है।’हमने लोगों को देखा है। चाहे आप ही बोल रहे हों, परन्तु आपको ‘मैंने’ कहने की आवश्यकता नहीं हैं। आपको कहना है, ‘हम,’ तब आप महत् क्योंकि सूर्य ने भी अब अपनी दिशा बदल दी है। अहंकार बन जाते हैं। जब आप कहते हैं, ‘हम’ ‘हममें से कुछ,’ ‘ की ओर, इस दिशा में, आने का स्वागत करें। हो जाएगा। आज, व्यक्तिगत अहं एकादश में विलीन याद रखना होगा। आज का दिन हमारे लिए इसी कारण से महान है कि हमने परिवर्तित होना है, सूर्य इस ओर आ रहा है, तो आइए सूर्य का उत्तर हम करते हैं । जैसे ग्रेगोर की आस्ट्रेलिया के लोगों के लिए ये कहना है कि यद्यपि सूर्य चला गया है, फिर भी आइए सूर्य को स्थापित पुस्तक में मैंने किया है कि वह बहुत अधिक ‘मैं’ शब्द न लिखे, इसके स्थान पर हम’ अर्थात पूरी सामूहिकता, पूरा सामूहिक अवयव, सहजयोगियों का करें, हमारे अपने अन्दर सूर्य के साम्राज्य को। जीवन्त अवयव क्योंकि हमारे अन्दर सूर्य कभी लुप्त नहीं होता। आप कहते हैं, हाँ ‘हममें से कुछ को प्राप्त हैं,’ तो ( Living Organism)। अत: यदि अत: हमें इस प्रकार से ऐसा आदर्श अपनाना होगा जिसके माध्यम से हम ‘एक व्यक्तित्व’ के विषय में रखते हैं और अन्य सभी को अपने से ऊपर। कहें, सोचें, ‘हम सब मिलकर, हम सब मिलकर।’ कोई ‘हाँ’ हममें से कुछ को प्राप्त है। मैं जानता हूँ कि भी व्यक्ति जो कुछ अलग या भिन्न बनने का इसका अर्थ ये है कि आप अपने को निम्नस्तर पर कुछ लोगों के पास ये शक्तियाँ हैं।” करने की यही प्रयत्न करेगा वह बाहर चला जाएगा। मैं उसे विधि है। क्योंकि यदि आपने अपने अहं पर काबू निकाल दूंगी। चाहे जो हो, वह निकल जाएगा। पाना है तो आप इसे हर व्यक्ति में प्रसारित होने की अत: जो भी विशेष बनते हैं वो अपना आकलन आज्ञा दें। इस प्रकार से आप इसे पूर्णतया ठीक कर करें। पूर्ण (Whole) का पोषण करने के लिए, पूर्ण पाएंगे। इसे फैलने दें, हम सभी सहजयोगी, ‘हम (Whole) की सहायता करने के लिए, पूर्ण का 11

Hindi Translation (English Talk) उद्धार करने के लिए, हर आदमी जो चाहे करे, मैंने एक अत्यन्त सुन्दर कविता लिखी थी- “धूल परन्तु कभी भी किसी को नीचे धकेलने के लिए नहीं। क्योंकि सहजयोग ऐसा नहीं है। सहजयोग “कि मुझे धूल कण होना चाहिए, ताकि मैं लोगों में केवल सामूहिकता में ही कार्य करता है और जिसने कण बनना’, मुझे स्पष्ट याद है, बहुत समय पूर्व, व्याप्त हो सकू” जो बहुत बड़ी चीज़ है- इस प्रकार का धूल कण बनना। आप भी जिस चीज को छते हैं वह जीवन्त बन जाती है, जिस चीज़ को महसूस विषय में आप जो चाहे सोचते रहें, मुझे कुछ नहीं करते हैं वो सुरभित हो उठती है, इस प्रकार बन यह पारगामी आत्मा विकसित कर ली वही सच्चा सहजयोगी है, जिसने नहीं की, वो नहीं है। अपने कहना, परन्तु यह पारगामी व्यक्तित्व एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचता है चाहे आप कुछ बोलें या ने बोलें। जैसे आपकी माँ हैं। मैं आपसे मिलूं या न मिलूं कोई फर्क नहीं पड़ता, परन्तु मैं आप सबमें व्याप्त हूँ, छोटी-छोटी चीज़ों के द्वारा भी मैं आपके साथ हूँ। अत: इस प्रकार से एक दूसरे ही हैं। वे बहुत सहज महिला हैं, बहुत ही सादी में व्याप्त होने का प्रयत्न करें और अपने अन्दर के और बहुत ही सादे ढंग से वो रहती हैं उनमें व्याप्त सौन्दर्य को देखें। अपना भरपूर आनन्द उठाएं क्योंकि होने का विवेक है। अब बहुत से सहजयोगी हैं, यही सबसे बड़ी चीज़ है और यही सबसे बड़ी चीजू प्राप्त करनी है। ये अहं आपको छिलके सहजयोग को ठीक प्रकार से अपना लेंगे, धुलिया (Nutshell) की तरह से बना देता है जो व्याप्त होने के भी अब बहुत से सहजयोगी हैं और मुझे पूरा के सौन्दर्य के साथ तालमेल नहीं रख सकता। देखें विश्वास है कि और अधिक लोग आएंगे। आशा है जाना बहुत बड़ी बात है। मेरी यही इच्छा है, और यह पूर्ण हो जाएगी। उस छोटी आयु में भी मुझे धूल का कण बनने का विचार था, और आज आपसे बात करते हुए मुझे याद आया कि में वही बनना चाहती थी, ये वही स्थान है। राऊल बाईं भी वैसी कल जो लोग आए, और मुझे विश्वास है कि वे कि स्वर किस प्रकार एक दूसरे में घुलमिल जाते हैं! आप सबसे मिलें होंगे, सबसे दोस्ती बनाएं, जानने का प्रयत्न करें कि वो कौन हैं, हो सकता है उन्हें अंग्रेजी न आती हो, आप कोई अनुवादक ले सकते हैं। उनसे बातचीत करें और उनके प्रति अच्छे बने, आज के दिन ये महान धारणा बहुत उपयुक्त होगी। आज हम धुलिया में पूजा कर रहे हैं, ये बहुत महान बात है। धुलिया का अर्थ है-धूल। ‘धूल’। उनसे दोस्ती करें। व्याप्त होने (Permeation) के बचपन में, मुझे याद है, मैंने एक कविता लिखी थी। ये बड़ी अच्छी कविता थी, मैं नहीं जानती कि ये अब कहाँ है। परन्तु मैंने इसमें लिखा था कि “धूल लिए मैं चाहती थी कि आप उनसे मिलें। आपको पता होना चाहिए कि ये लोग कौन हैं, और नासिक में कौन लोग हैं, क्योंकि वहाँ के सहजयोगियों से हम कभी नहीं मिलते। जब हम वापिस जाते हैं तो के उस कण की तरह से छोटी बनना चाहती हूँ जो हवा के साथ उड़ता है, सर्वत्र जाता है, जाकर सम्राट हमारे पास केवल एक या दो पते होते हैं! ये अच्छी सोच नहीं है, देखने का प्रयत्न करें कि वहाँ कितने के सिर पर बैठ सकता है या किसी के चरणों में गिर सकता है, या कहीं भी जाकर बैठ सकता है। परन्तु मैं ऐसा धूल का कण बनना चाहती है जो लोग हैं, उनसे उनके विषय में प्रश्न पूछे आदि आदि। सुरभित है, पोषक है और प्रकाशप्रदायी है। ” इसी से ये व्याप्तिकरण केवल तभी सम्भव है जब प्रकार मुझे याद है, जब में सात साल की थी तब आपका अहं चहुँ ओर व्याप्त होने लगेगा और दाई 12

Hindi Translation (English Talk) ओर की समस्याओं पर काबू पाने का भी यही उपाय है और सरस्वती की पूजा भी इसी प्रकार से करनी है। सरस्वती के हाथ में वीणा है और वीणा होता है- सर्वत्र प्रवेश करना होता है। अत: हर जल गंगा नदी बन जाता है! ये सब सूक्ष्म चीजें हैं। अतः पदार्थ सूक्ष्म बन जाते हैं क्योंकि इन्हें होना चीजू, चाहे जो हो- और वायु सर्वोत्तम है- वह वायु आदिवाद्ययन्त्र है जिसका संगीत वे बजाती हैं। वह संगीत हृदय में प्रवेश कर जाता है। आपको पता भी भी चैतन्य-लहरियों में परिवर्तित हो जाती है! नहीं चलता कि किस प्रकार आपके अन्दर ये संगीत अत: आप देख सकते हैं कि किस प्रकार प्रवेश करता है और किस प्रकार कार्य करता है! इसी प्रकार से सहजयोगी को भी व्याप्त हो और जाना चाहिए- आपको बताया, बहुत पदार्थ से बनी चीजें- इन पाँच तत्वों से बनी हुई चीजें- सूक्ष्म बन जाती हैं। नि:सन्देह बायाँ दायाँ- दोनों पक्ष इसे कार्यान्वित करते हैं। क्योंकि संगीत की तरह से। जैसे मैंने हैं जिनका वर्णन एक से गुण प्रेम’ ने इस पर कार्य करना होता है और प्रेम जब पदार्थ पर कार्य करता है तो पदार्थ भी प्रेम बन जाता प्रवचन में नहीं किया जा सकता है, परन्तु सरस्वती जी का एक गुण ये है कि वे सूक्ष्म चीजों में प्रवेश कर जाती हैं। जैसे पृथ्वी माँ सुगन्ध में परिवर्तित हो जाती हैं, इसी प्रकार से संगीत लय में परिवर्तित हो संयोजन बनाने के लिए। है। और इसी दृष्टि से व्यक्ति को अपने जीवन को भी देखना चाहिए- इसे प्रेम और पदार्थ का सुन्दर जाता है और जिस भी चीज़ का सृजन वे करती हैं वह और अधिक महान हो जाती है। जिस भी पदार्थ को वे उत्पन्न करती हैं वह सौन्दर्यसम्पन्न हो जाता है। सौन्दर्यविहीन पदार्थ तो स्थूल है और इसी प्रकार सभी कुछ है। अब आप कहेंगे कि जल क्या है? परमात्मा आपको धन्य करें। निर्मला योग-1983 (रूपान्तरित) 13