Mahashivaratri Puja

(India)


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Shivaratri Puja

आपके अंदर इस अनासक्ति को आना होगा …. इसमें थोड़ा समय लगता है। खासकर भारतीय लोगों में …. जो हर समय अपने बच्चों, माता और पिता के बारे में चिंतित रहते हैं और ये चलता रहता है। वर्षों तक मेरा बेटा … मेरी बेटी … मेरे पिता … पूरे समय ये चलता रहता है। अब परमात्मा की कृपा से कई लोग अपने दायित्वों से छुटकारा प्राप्त कर चुके हैं … सहजयोग के माध्यम से या जिस प्रकार से भी (श्रीमाताजी हंसती हैं)। जो लोग भी अब सहजयोग में आ रहे हैं कि हमें सहजयोग के आशीर्वाद प्राप्त करना है … उनमें भी इस अनासक्ति को लाया जाना है कि हमें आशीर्वाद प्राप्त हो रहे हैं … उन्हें इसका गर्व होना चाहिये। यदि आपको सहजयोग परिवार में आना है तो आप इसमें आंये परंतु किसी को भी सहजयोग में आने के लिये जबर्दस्ती न करें ….. उनके ऊपर सहजयोग को थोपे नहीं। अब वह अवस्था आ चुकी है कि आपको उनसे सहजयोग की बात करनी है। शुरूआत में मैं कहती थी कि उनसे इस बारे में बात मत करो … लेकिन उनके लिये कहती थी जो एकदम बेकार हैं यदि उनको सहज में नहीं आना है तो उनसे बात करें कि आप सहजयोग के लिये बिल्कुल ठीक नहीं हैं …… ऐसे लोगों से बिल्कुल बात न करें। तभी वे आ पायेंगे। कुछ लोगों में आपको कोई दिलचस्पी नहीं रखनी चाहिये … उन्हें कहें कि आप एकदम अक्षम हैं… भौतिकतावादी हैं … आप अच्छे नहीं हैं तो वे कहेंगे कि अब तो मैं सिद्ध करके दिखाऊंगा कि मैं इसके लिये एकदम ठीक हूं (हंसती हैं)
ये सब अनासक्तियां आती हैं और ये अनासक्तियां नाभि के क्षेत्र में होती हैं। नाभि चक्र से आपको अपने भावनात्मक क्षेत्र में ऊपर जाकर हृदय चक्र में जाना होगा। तभी आप अनासक्त हो पायेंगे खासकर से जिसे हम सामूहिकता कहते हैं उससे भी हम अनासक्त हो जाते हैं। इनको मैं भूतों की जमात कहती हूं … सामूहिकता नहीं। सभी बेकार के सहजयोगी मिलकर एक समूह बना लेते हैं और वे हर चीज का विरोध करते हैं। वे हर चीज के लिये सुझाव देंगे …… जबकि सहज में किसी प्रकार के सुझाव नहीं दिये जाने चाहिये … न किसी प्रकार के विकल्प होने चाहिये क्योंकि शिव तो पूर्ण हैं। एक बार जो कह दिया सो कह दिया। आप उस कार्य को करिये और देखिये … यही सबसे अच्छा है। विकल्प तो दूसरे या तीसरे स्थान पर आते हैं या फिर बिल्कुल ही बेकार हैं। शिव तत्व के लिये कोई विकल्प ही नहीं है। आपके अंदर ये समझ होनी चाहिये कि यदि माँ ने कुछ कहा है तो इस कार्य को किया जाना चाहिये। अगर वो ये भी कह दें कि किसी को मार दो तो आपको मारना होगा। इसको इस प्रकार से ही रखें … इस सीमा तक … यहां तक कि यदि वह कहें कि आप अपने प्राण त्याग दें तो आपको अपने प्राण भी देने होंगे। यदि वह कहती हैं कि आप झूठ बोलें तो आपको झूठ भी बोलना पड़ सकता है।
जिस प्रकार से राधा जी ने कहा था कि मेरे पुण्य क्या हैं और मेरे पाप क्या हैं। मैं तो उनके…. श्रीकृष्ण के हृदय में वास करती हूं ….. मैं क्या कर सकती हूं। जो कुछ भी वह कहेंगे में करूंगी….. यही शिव तत्व है। जब ये जागृत होता है तो यह मुझमें ही शिव तत्व को पहचान लेता है और देखता है कि यही शिव तत्व है। ये समझता है क्योंकि शिव तत्व पर आप किसी प्रकार का पाप नहीं करते हैं … आप निष्पाप होते हैं। जब आप आत्मा बन जाते हैं तो आप निष्पाप बन जाते हैं … आपके अंदर किसी प्रकार का पाप नहीं हो सकता। माना मानवीय समझ के अनुसार यदि शिव हमारे शरीर को छोड़कर चले जाते हैं तो व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है … उस समय यह पाप हो सकता है। किसी को क्यों छोड़कर जाना है….. ये पाप है …. क्यों है कि नहीं? सामान्य उद्देश्यों के लिये सामान्य समझ के अनुसार यदि शिव किसी को छोड़कर चले जाते हैं और उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो ये पाप समझा जायेगा। उदा0 के लिये यदि एक स्त्री की मृत्यु हो जाती है और उसके बच्चे पीछे छूट जाते हैं तो लोग शिवजी को दोष दे सकते हैं कि आप तो उस व्यक्ति को छोड़कर चले गये हैं और ये बच्चे अब बिना माँ के हो गये हैं या बिना पिता के हो गये हैं .. ऐसी ही कोई बात कहेंगे। क्योंकि शिव पाप रहित हैं … निष्पाप हैं … जो कुछ भी वह करते हैं वह पाप रहित है …. पाप का विचार ही खत्म हो जाता है क्योंकि ये आपका अहंकार है जो पाप करता है। अहंकार पाप करता है। लेकिन यदि आपके अंदर अहंभाव ही न हो तो फिर किसी प्रकार का पाप नहीं हो सकता है क्योंकि तब आप कुछ भी नहीं कर रहे हैं। तब आप अकर्म में खड़े होते हैं। माना सूर्य चमक रहा है और बहुत तेज चमक रहा है…. सूर्य का यही काम है। शिव जी का जो कार्य है वह उस कार्य को कर रहे हैं … वह पाप नहीं कर सकते हैं। हमारी मानसिक प्रवृत्तियां हमें ऐसा सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि ये पाप है …. और ये पाप नहीं है। लेकिन यदि हम अहंकारी हैं तो फिर हम पाप कर रहे हैं।
आत्मा निर्दोष है … ये किसी प्रकार का पाप नहीं कर सकती है। जो व्यक्ति आत्मा बन चुका है उसके लिये कुछ भी पाप नहीं है। शिवजी के लिये कुछ भी पाप नहीं है चाहे वह अपना आशीर्वाद किसी संत को दें या किसी राक्षस को। उनके लिये कुछ भी पाप नहीं है क्योंकि वह भोलेनाथ हैं (अबोधों और भोले लोगों के स्वामी)। वह किसी भी तरह के पाप से परे हैं। जो कुछ भी वह करते हैं …. वह पाप पुण्य से परे हैं क्योंकि अहंकार उन्हें छू तक नहीं सकता है। उनमें अहंकार है ही नहीं। क्योंकि हमारे अंदर अहंकार है तो हम पाप कर सकते हैं। एक बार अहंकार खत्म हो जाता है तो हम फिर वहां होते ही नहीं है… कौन पाप करता है? जब हम वहां है ही नहीं तो फिर पाप कौन करता है? शिवजी कभी भी पाप नहीं कर सकते हैं …. अतः हम ही शिव हैं … तो फिर हम भी पाप नहीं कर सकते हैं।
मानसिक रूप से विकल्प देना भी गलत है। मैं कुछ भी कहती हूं तो तुरंत इसके लिये 10 सुझाव आ जाते हैं। मैं आप सबके साथ ये ट्रिक्स अजमाती रहती हूं क्योंकि आप लोगों को कॉन्फ्रेंसों की आदत हो गई है (श्रीमाताजी हंसती है )। मैं कहती हूं हाँ सुब्रमण्यन (दिल्ली के सहजयोगी) … आपको इस विषय में क्या कहना है? आखिरकार भगवान सुब्रमण्यन यहां पर हैं इनको भी पूछा जाना चाहिये। इसके बाद में बेणुगोपाल से पूछती हूं … इसके बाद गेविन, वॉरेन इन सभी से पूछती हूं कि आपको इस विषय पर क्या कहना है? और फिर वे इस पर अपने सुझाव देते हैं।
लेकिन देवताओं की कॉन्फ्रेंसों में किसी प्रकार के सुझाव नहीं होते हैं … न ही किसी प्रकार के विकल्प होते हैं। आपकी माँ के विचारों के लिये भी किसी प्रकार के विकल्प नहीं होते हैं…. बिल्कुल नहीं। वह एकदम पूर्ण हैं संपूर्ण। मुझे कृपया अपने सुझाव न दें … कभी भी नहीं। कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। वे (देवता) आपकी बात सुनेंगे ही नहीं … किसी की भी बात नहीं सुनेंगे। इतनी एकरूपता…पूर्ण आज्ञाकारिता। उनके गुण भी निश्चित होते हैं …… उनको बताया गया है कि आपको ये-ये कार्य करने हैं तो वहीं कार्य करेंगे। आपमें और उनमें यही अंतर है। वे कोशिश करते हैं। कई बार लगता है कि यदि मैं कहूं कि इस तरफ जाओ तो आपको वहां एक स्थान मिलेगा …. और यदि आपको वह जगह नहीं मिलती तो आप कहेंगे माँ आपने तो कहा था कि इस तरफ जाओ या उस तरफ जाओ लेकिन हमें तो वहां कोई चर्च मिला ही नहीं। लेकिन ऐसा नहीं है कि ऐसा मैं कह रही हूं कि वहां चर्च है…. मैं तो देखना चाह रही हूं कि आप क्या सोचते हैं?
मैं आपको अपनी ही ट्रिक्स के बारे में बता रही हूं … ठीक है अतः आप सावधान रहें (हंसती हैं)। यदि मैं आप लोगों को कहूं कि इस तरफ जाइये … अगर आपको वहां चर्च नहीं मिला तो मुझे माफ कर दीजिये मुझे आपसे ऐसा नहीं कहना चाहिये था या आपको उस ओर चले जाना चाहिये था। लेकिन ये सच नहीं है … मुझे आपसे कहना चाहिये कि ये सत्य नहीं है। मैं ये देखने का प्रयास कर रही हूं कि आप इस बारे में क्या कहते हैं? यदि आप चतुर हैं तो आप कहेंगे मैं वहां गया था पर मुझे वहां ऐसी कोई जगह दिखाई नहीं दी लेकिन वहां मैंने कुछ और देखा। माँ आपने मुझे इसीलिये वहां भेजा। अब मुझे मालूम हुआ कि आपने मुझे वहां क्यों भेजा? तब मुझे मालूम हो जाता है कि वह एक सहजयोगी है। लेकिन यदि आप कहते हैं कि अरे मैं तो वहीं गया था कि मुझे वहीं कुछ मिलेगा लेकिन मुझे तो वहां कुछ भी नहीं मिला और आपने मुझे वहां भेज दिया (हंसी) बात खत्म। यदि आप कहते हैं कि आपने ऐसा कहा और फिर ऐसा हुआ या हां मैंने कहा, निसंदेह। लेकिन जो कुछ भी मैंने कहा वो मैं आपके साथ एक ट्रिक खेल रही थी क्योंकि आपकी माँ का एक स्वभाव महामाया का भी है … अतः सावधान रहें। आप किस प्रकार से प्रतिक्रिया करते हैं ….. वह भी मेरे लिये अत्यंत महत्वपूर्ण है कि आप कितनी दूर तक पंहुचे हैं। ये भी आपको जज करने का एक तरीका है। पर किसी ग्रामीण व्यक्ति के लिये ये एकदम अलग है। यदि मैं उसको कहती हूं कि यदि तुम मुझे उस गांव में ले जाना चाहते हो तो बैलगाड़ी को इस तरफ से ले जाओ .. तो वो इसे वहीं से ले जायेगा लेकिन वहां एक खाई है और इस कारण मुझे चोट पंहुचती है। तो वह मुझको कहेगा कि माँ मुझे माफ कर दें आपको चोट पंहुची … मैं आपको इससे बचा सकता था। वह अपने ऊपर इसकी जिम्मेदारी ले लेता है। वह अपने ऊपर सारा दायित्व ले लेता है कि क्योंकि आपने मुझे कहा कि इस ओर से मुझे ले चलो तो मैं आपको वहां से ले गया लेकिन अगर मैं सावधान होता तो मैं इससे बच सकता था। तो ये अंतर है …. दायित्व लेना। ये एक सामान्य मानवीय स्वभाव है कि वे जिम्मेदारी किसी और पर डाल देते हैं। सबसे अच्छा तो माँ पर जिम्मेदारी डालना है (माँ हंसती जाती हैं)। लेकिन इससे आपके पुण्य क्षीण हो जाते हैं।
आपको सोचना है कि दायित्व मेरा है। मैंने कहीं कुछ गलतियां की होंगी या फिर माँ इससे मुझे कुछ सिखाना चाहती होंगी। प्रत्येक समय जब आप कुछ करते हैं …. या मैं आपसे कुछ कहती हूं तो ये आपको कुछ सिखाने के लिये होता है। मुझे अब कुछ नहीं सीखना है। आपको ही सीखना है और यदि आप इसको समझ लें तो आप एक प्रकार की अनासक्ति का भाव और समर्पण विकसित करते हैं । आप हैरान रह जायेंगे कि आप बेकार के बोझों, सिरदर्दों और झंझटों से मुक्ति पा जायेंगे। यदि आप समझ जाते हैं कि ये सारा खेल माँ ने रचा है और मैं तो बस इसे खेल रहा हूं तो ये सब कुछ बहुत सरल हो जाता है।आपको ये अनुभव करना है … समझना है कि इसी में सारा आनंद निहित है न कि विकल्प ढूंढने में। आप कोशिश करें। जिसने भी इसको करने की कोशिश की है उसे इससे आनंद तथा और भी कई चीजें प्राप्त हुई हैं।
यदि आप इस बिंदु को समझ जाते हैं तो आप पूर्णतया अनासक्त हो जायेंगे और आप जान जायेंगे कि हमें अपनी भलाई के लिये माँ को प्रसन्न रखना है और यदि माँ को अप्रसन्न करने के लिये हम कुछ भी करते हैं तो फिर हमें कोई नहीं बचा सकता है।
इसको समझने के लिये आपको किस चीज की जरूरत है …. न तो आयु, न पद, न योग्यता कुछ भी नहीं … बस आपको एक विवेकशील दिमाग की जरूरत है … एक गहन व्यक्तित्व की जरूरत है। मैने देखा है कि अत्यंत युवा लोग अत्यंत संवेदनशील हैं जबकि उनके माता पिता एकदम मूर्ख हैं। अतः इस कार्य के लिये आपको एक गहन और विवेकशील व्यक्तित्व की आवश्यकता है और आपको इसको विकसित करने का प्रयास करना चाहिये। ये शिवतत्व के साथ ही आ सकता है … जो अत्यंत ठोस चीज है …. शिवाचल … जो गति नहीं करता है। ये बिल्कुल रिलेटिव नहीं है …. बिल्कुल भी नहीं … ये किसी चीज से भी जुड़ा हुआ नहीं है …. एकदम पूर्ण …संपूर्ण है। इसी से आपको गहनता प्राप्त होती है जिससे आप गहनतम होते जाते है ….
शिव आपके गुरू हैं। गुरू वह हैं जो आपको गहनता में जाने के लिये गुरूत्व प्रदान करते हैं। ये अत्यंत महत्वपूर्ण है। और मैं आशा करती हूं कि आज की पूजा से हम आपको शिव तत्व में स्थापित करने का प्रयास करेंगे। आइये हमारे चित्त ….. हमारे चित्त के एक एक कण को शिव तत्व के आशीर्वाद से भर दें और चमकने दें। मैं आप सबको आशीर्वाद देती हूं। अतः पहले हम देवी की पूजा करेंगे और फिर शिव की पूजा करेंगे।
परमात्मा आपको आशीर्वादित करें।

शिव तत्व …..
शिव तत्व निष्कलंक है ….पूरी तरह से निष्कलंक है। यह अत्यंत शक्तिशाली और पूर्णतया निष्कलंक है। इसको प्राप्त करने का मंत्र है केवल उन्हें प्रसन्न करना। यदि आप शिवजी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो चाहे आप कोई राक्षस ही क्यों न हों वह आपको सभी प्रकार के वरदान देते हैं। लेकिन राक्षसों को वह लंबी उम्र का ही वरदान दे सकते हैं जबकि संतों को वह सच्चिदानंद अवस्था का वरदान देते हैं। अतः यदि वह राक्षसों को वरदान देते भी हैं तो आपको इसके विषय में प्रश्न नहीं पूछने चाहिये। वह आपको लंबी उम्र का वरदान दे सकते हैं … वह व्यक्ति हजारों वर्ष तक जी सकता है परंतु इससे भी यदि उसे कुछ भी प्राप्त न हुआ तो इससे क्या फायदा है … उसे आत्मसाक्षात्कार तो नहीं प्राप्त हो सकता है। अतः एक संत को वह चिरआयुष्य प्रदान करते हैं जो आत्मा से आता है।
जबकि विष्णु तत्व किसी संत को उत्थान प्रदान करता है और विवेक का प्रकाश देता है ताकि वह प्रत्येक चीज को सामूहिक चेतना में देख और समझ सके। राक्षसों को वह मृत्यु प्रदान करते हैं और उन्हें मार डालते हैं। अतः जो लोग गहन नहीं हैं उनको लगता है कि शिव राक्षसों को लंबी आयु का वरदान क्यों देते हैं। इन देवताओं के ये विशेष गुण हैं। अब यदि राक्षसों को लंबी आयु चाहिये तो वे शिवजी के पास जायेंगे … वे उनकी प्रशंसा करेंगे … उनका गुणगान करेंगे…. उनसे आशीष प्राप्त करेंगे … उनकी तपस्या करेंगे … शिवजी के भोलेपन की बातें करेंगे …. और उनसे वरदान प्राप्त करेंगे। कभी-कभी इन राक्षसों का हमारी चेतना में होने से अच्छा है कि वे धरती पर ही रहें। वे अत्यंत भयावह हो सकते हैं। मनुष्यों को परेशान करने के लिये वे कुछ और भूतों को एकत्र कर लेते हैं। अतः उनको श्री विष्णु की आँखों में ही रहने दें। वह उनको अवचेतन में भेजने की अपेक्षा यहीं उनकी अच्छी व्यवस्था कर सकते हैं। लेकिन शिव जी की शैली श्री विष्णु से पूर्णतया अलग है। आपको सभी प्रकार की शैलियों की जानकारी होनी चाहिये क्योंकि आपको तो मालूम ही है कि मनुष्यों में कई प्रकार के परिवर्तन और संयोग (permutations and combinations) हो सकते हैं। यदि आप एक शैली को जानते हैं पर मनुष्यों की अन्य शैलियों को आप क्या करेंगे? अतः श्री विष्णु की शैली इस प्रकार से है कि यदि आप अपनी हरकतों से बाज नहीं आये तो वह आपके साथ कोई ट्रिक खेल सकते हैं और आपको ठीक कर सकते हैं। माना कोई सहजयोगी कोई मूर्खतापूर्ण हरकत करता है …. या शराब का सेवन करता है तो वह कहते हैं कि ठीक है तुम और शराब पियो। वह शराब पीता है और बीमार हो जाता है या उसकी कार कहीं गडढे में गिर जाती है या कहीं पर उसका अपमान हो जाता है या उसके साथ कुछ और हो जाता है। उसको इतनी बुरी सजा मिलती है कि वह कहता है …. हे भगवान मैंने क्या किया है? यही विष्णु तत्व है।
लेकिन शिव जी दूसरी तरह के हैं। देखिये यदि आप शराब पीते हैं तो वह आपके हृदय से अदृश्य हो जाते हैं। आपको दिल का दौरा पड़ जाता है और आपकी मृत्यु हो जाती है। वह सीधे तौर पर सकारात्मक रूप से मारते हैं वह निश्चित रूप से मारते हैं। यदि शिव अदृश्य हो गये तो फिर आप किस प्रकार से जीवित रह सकते हैं … ये एक प्रकार है और दूसरा यह है कि शिव तत्व के साथ जन्मा हुआ व्यक्ति … जैसे श्री शिरडी के सांईंनाथ या उनके जैसे कोई अन्य। कई बार तो देवी भी ऐसा कर सकती हैं। वह शिव जी की तरह से विश्व की पूरी मदिरा पी सकती हैं … समस्त विष पी सकती हैं।
जब श्री साईंनाथ ने देखा कि लोग तंबाकू खा रहे हैं तो उन्होंने संसार का सारा तंबाकू पी लिया। उन्होंने महाराष्ट्र का सारा तंबाकू पी लिया ताकि लोग इसे न पीयें। शिवजी की शैली ऐसी ही है कि वह अपने अंदर सारा विष सोख लेते हैं। ये शिवजी की शैली है कि वह संसार का सारा विष अपने अंदर सोख लेते हैं। इस विष को सोखने के लिये वह कठिन से कठिन कार्य कर सकते हैं। एक प्रकार की डीलिंग हमारे मस्तिष्क से आती है क्योंकि विराट हमारे मस्तिष्क में है … वह हमारे मस्तिष्क के माध्यम से कार्य करता है। वह आपके साथ ट्रिक्स खेलते हैं। हमको लगता है कि उन्होंने किसी को मार डाला है। हम सोचते हैं माँ आपने बहुत अच्छा किया कि आपने उस व्यक्ति को सजा दे दी। लेकिन शिव तत्व आपको ऐसी समस्यायें दे सकता है जिनको आप देख नहीं सकते हैं लकिन जो बहुत कम समय में कार्यान्वित हो जाती है। जैसे हृदय रोग या जिस व्यक्ति का शिव तत्व काफी कमजोर हो उसे संसार के सभी प्रकार के असाध्य रोग हो जाते हैं। यहां कोई मरता नहीं है परंतु वह व्यक्ति हर क्षण मरता रहता है। शिवजी इसी प्रकार से हमको ठीक करते हैं।
जब हमारे अंदर शिव तत्व जागृत हो जाता है तो हमारी प्राथमिकतायें भी पूरी तरह से बदल जाती हैं। मैंने देखा है कि जो लोग पश्चिम से यहां आये हैं उनकी प्राथमिकतायें काफी बदल चुकी हैं लेकिन अभी भी उतना बदलाव उनमें नहीं आया है जितना आना चाहिये था। निसंदेह वे अपने उन साथियों से तो बहुत अच्छे हैं जो साक्षात्कारी नहीं हैं लेकिन उनमें अभी भी पैसे के लिये काफी आसक्ति है। उनको अनासक्त होना पड़ेगा। लोगों में अभी भी बहुत सी चीजें ठीक नहीं हैं और इसको ठीक करने की सावधानी भी उनमें नहीं है।
हमें देखना चाहिये कि पैसे से हमारा लगाव बहुत निम्न स्तर पर प्रारंभ होता है। आपको अधिक दोस्त बनाने की आवश्यकता नहीं है क्यों आपको पैसा अपने दोस्तों को देना चाहिये?
दोस्त किस लिये होते हैं? शिव तत्व के अलावा क्यों आपको अपने दोस्तों की जरूरत है? इसके विषय में सोचिये कि परमात्मा के बिना आपका जीवन क्या है? अतः आपको अनासक्त होना पड़ेगा। आपको अपनी प्राथमिकताओं को बदलना होगा। केवल परमात्मा ही आपका मित्र, पिता और माता है और वही पूजे जाने योग्य है इसके अलावा कुछ नहीं। आपका तनमन धन सब परमात्मा के लिये है। निःसंदेह मैं आपसे कुछ नहीं चाहती और आप भी ये जानते हैं। यही आप सबकी भी प्रवृत्ति होनी चाहिये। अतः सबसे पहले आपके अंदर यह प्रवृत्ति आनी चाहिये। जिनके अंदर भी यह प्रवृत्ति आई है उन्हें भौतिक रूप से यह बहुत बड़ा फायदा हुआ है कि आपको इसके विषय में तुरंत ही पता चल जाता है और जो ये नहीं कर पाते हैं उन्हें कष्ट भोगना पड़ता है। अतः इसके प्रमाण भी है

शिव तत्व हीरे की तरह से चमकदार है….

प्रत्येक प्रकार की आसक्ति पर शिव तत्व से आक्रमण किया जा सकता है क्योंकि शिव तत्व हीरे की तरह से चमकदार है। इसका प्रत्येक फलक कुंडलिनी जागरण और सावधानी से बहुत सरलता से साफ किया जा सकता है लेकिन इसके बाद भी आप देखेंगे कि अभी आपके अंदर अन्य कई प्रकार की आसक्तियां बाकी हैं जैसे मित्रता, सहानुभूतियां आदि। आप तुरंत ऐसे व्यक्ति के प्रति सहानुभूति दिखाने लगते हैं जो जरूरतमंद है या ऐसा ही कुछ और। पर आपके अंदर सहानुभूति है ही नहीं आपने तो कई लोगों को परेशान किया है। दूसरा तरीका ये हो सकता है कि आप किसी से अत्यंत घृणा करते हैं या किसी से अत्यंत प्रेम करते हैं तो इसमें भी अनासक्ति होनी चाहिये कि आप न तो किसी से प्रेम करें और न किसी से घृणा करें। आप इसका निर्णय परमात्मा पर छोड़ दें कि हे परमात्मा…. मैं इस पर कोई निर्णय नहीं लूंगा। मैं केवल उनकी कुंडलिनी पर उन्हें परखूंगा और उनकी कुंडलिनी को जागृत करूंगा। यदि ऐसा हो पाया तो ठीक है और नहीं हो पाया तो भी ठीक है। आपने स्वयं को दूसरों को परखने या जज करने के दायित्व से अनासक्त कर लिया है। आपको उन्हें केवल कुंडलिनी पर जज करना चाहिये। अगर ये ठीक है तो अच्छा है। आप बस एक बैरोमीटर की तरह से हैं या फिर एक ऐसी मशीन की तरह से हैं जो उपचार करती है आप इसमें लिप्त नहीं हैं। व्यक्तिगत जीवन और व्यक्तिगत संबंधों जैसे माता पिता, भाई बहन जैसे सभी व्यर्थ रिश्तों को त्याग देना चाहिये। माना आपकी माँ ठीक नहीं है तो आपको उसके पीछे पड़कर पहले उसे ठीक करना चाहिये। ऐसा करना अत्यंत महत्वपूर्ण है… आपकी माँ को ठीक होना होगा। अगर वह ठीक नहीं है तो आप उसको कहें कि मैं आपके हाथ का बना खाना नहीं खाऊंगा। बस बात खत्म। माँ … आप पहले अपने वाइब्रेशन्स ठीक करें या पहले आत्मसाक्षात्कार ले लें वर्ना मेरा और आपका कोई लेना देना ही नहीं है। मैं आपको मिलने आऊंगा और चला जाऊंगा। उनको अपनी अनासक्ति दिखाइये और दृढ़ बनें। आपको अपनी माँ का इलाज करना होगा। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि माता सहजयोग का एक भाग है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन मैंने देखा है कि कई लोगों को मालूम ही नहीं है कि किस प्रकार से प्रतिकार करना चाहिये। आपको प्रतिरोध करना चाहिये। एक के बाद एक प्रतिरोध करते जाइये क्योंकि अपनी माँ के लिये आप यही सबसे बड़ी चीज कर रहे हैं। आप उनको दे ही क्या सकते हैं? अगर आप अपनी माँ को उनके अनंत जीवन …. परमात्मा के जीवन के लिये ठीक नहीं कर सकते हैं तो सारे संसार की चीजें एकदम तुच्छ हैं।
इसके बाद आपकी पत्नी आती है जो काफी खतरनाक स्थिति है। यदि आपकी पत्नी नकारात्मक है तो वह आपके मस्तिष्क में लगातार ऐसी चीजें डालती जायेगी कि किसी दिन वो किसी अजीब सी जगह पर कार्यान्वित हो जायेंगी कि आपको लगेगा कि कैसे आपके हाथ से चीजें फिसल गईं या आपने किस प्रकार से ऐसी बातें कह दीं। आपने ऐसा किस प्रकार से किया …. ऐसा क्यों किया। पत्नी को भी कह दीजिये कि उसे ठीक से व्यवहार करना है …. और ठीक होना है …. इसके लिये कोई बहाना नहीं चलेगा और न ही किसी प्रकार का समझौता किया जायेगा। उसको कहें कि तुमको दूसरे कमरे में जाना होगा और मैं दूसरे कमरे में रहूंगा। तुमको ठीक होना पड़ेगा…. मैं इसमें तुम्हारी किसी प्रकार की सहायता नहीं करूंगा। क्योंकि ये तो और भी खतरनाक स्थिति है क्योंकि यदि किसी स्त्री को पकड़ है तो आप मूलाधार की समस्याओं के कारण गंभीर किस्म के रोगों से ग्रसित हो जाते हैं। अतः आपको अपनी पत्नी से सख्ती से पेश आना होगा । आपको उसे कहना होगा कि मैं तुम्हारे हाथ का बना खाना नहीं खाऊंगा। मेरा तुमसे लेना देना नहीं है … मैं तुमसे बात नहीं करूंगा। मैं आऊंगा और दूसरे कमरे में सो जाऊंगा और फिर चला जाऊंगा। तुम मेरे कपड़ों को भी हाथ मत लगाओ। अगर तुम मेरी बात नहीं मानोगी तो मेरा तुम्हारा कोई लेना देना नहीं है। मैं जिस भी धर्म को मानूं… तुम्हें उसी को मानना पड़ेगा। पत्नी भी अपने पति से इसी प्रकार से कह सकती है। धीरे धीरे उसे बताना होगा कि इस प्रकार से उनके प्रेम में वृद्धि नहीं होने वाली। पुराने समय में इसी प्रकार से महिलायें अपने पतियों को सुधारा करती थीं। आजकल के जमाने में तो यदि आप पत्नियों को कुछ दें तो तभी पत्नियां प्रसन्न होती हैं। यदि कोई रखैल भी होगी तो जब तक वह पत्नी को हीरे जवाहरात देती रहेगी वह उससे प्रसन्न रहेंगी। भारत में अभी भी इसको मान्यता नहीं प्राप्त है। परंतु मैंने देखा है कि पश्चिम में कोई भी इस बात का बुरा नहीं मानता है। यदि आपके पति की दस रखैलें भी होंगी तो उन्हें तब तक इससे कोई फरक नहीं पड़ता है जब तक उनका पति उनको पैसे देता रहता है। यह काफी हास्यास्पद है। अतः पत्नी, माता, पति के संबंधियो तथा नजदीकी रिश्तेदारों सभी को सुधारना आवश्यक है।
बच्चों को भी देखभाल अत्यंत आवश्यक है। आपको बच्चों को गलत कार्य नहीं करने देने चाहिये। यदि वे गलत कार्य कर रहे हैं … सहजयोग में नहीं आ रहे हैं तो आपको उन्हे कहना चाहिये कि तुम्हें मैं बिल्कुल भी पैसे नहीं देने वाला चाहे तुम कुछ भी करो। यदि तुम सहजयोग में नहीं आओगे तो मैं तुम्हारा मुंह भी नहीं देखूंगा। आप अपने बच्चों को परमात्मा के अलावा और क्या दे सकते हैं।
आप ऐसा कर सकते हैं। लेकिन हमें मालूम होना चाहिये कि ऐसा करने की जरूरत नहीं है। कई लोग कह सकते हैं कि माँ आपके पति तो सहजयोगी नहीं हैं। ठीक है। मुझ माबूम है कि कब उन्हें बाया जाना चाहिये। मैं यह भी जानती हूं कि कब मेरे बच्चों को सहज में लाना चाहिये। क्योंकि अगर वे सहज में होते तो लोग कह सकते थे कि इन लोगों ने तो इसे पारिवरिक व्यवसाय ही बना लिया है (हंसी)।
जब तक वे इससे बाहर हैं ये बहुत अच्छा है। खासकर भारत में। अतः सबसे अच्छी बात है कि वे मेरा विरोध करें और मैं उन सबको बाहर रखूं। जरा कल्पना कीजिये कि मेरे अपने भाई मेरी बहुत इज्जत करते हैं। मेरे भाई ने कहा कि भगवान का धन्वाल कि तुम मेरे कमरे में रह रही हो अबमेरे कमरे के वाइब्रेशन्स काफी बढ़ जायेंगे। मैंने कहा कि तुम वाइब्रेशन्स को क्या समझते हो उसने कहा सब कुछ। लेकिन वह सहजयोगी नहीं है। मैंने उन सभी को साक्षात्कार भी लिया है लेकिन वो लोग सहजयोगी नहीं हैं और न ही इसका हिस्सा। नहीं तो वे पैसों के इन चार्ज बन जाते। पैसे के साथ हर प्रकार की समस्यायें आने लगती हैं … और इन सभी संबंधियों के साथ भी … मालूम नहीं। कुछ लोग कहेंगे कि श्रीमाताजी ने ऐसा कहा था ….. श्रीमाताजी की बेटी ने ऐसा कहा था आदि । मुझे इस तरह का कोई भी दबाव अपने सिर पर नहीं चाहिये।
यही सबसे अच्छा तरीका है। काश हमारे राजनेता लोग इस बात को समझ पाते कि उनको अपने सगे संबेधियों को साथ नहीं रखना चाहिये। इस प्रकार से प्रशासन को अच्छी तरह से चला सकते हैं। यदि आपके सगे सूबंधी आस पास रहेंगे तो आप कभी भी सही ढंग से कार्य नहीं कर सकते हैं और यदि आप ठीक से कार्य भी कर रहे हों तो आपके सबंधी उसे बिगाड़ देंगे।
अतः जो भी सहजयोगी है उन्हें मालूम होना चाहिये कि आपको अपने रिश्तेदारों की इस प्रकार से तहायता नहीं करनी है कि वे सहजयोग से फायदा उठाने का प्रयास करें। माना आप सहजयोगी हैं तो आप अपनी माँ को मेरे सामने बिठा सकते हैं। लेकिन पहले उनके वाइब्रेशन्स को ठीक करें… उन्हें ठीक करें और फिर उनको मेरे पास लेकर आंये। मेरे पिता को ठीक करो… मेरी माता को ठीक करो …. ये सब माँ का दायित्व नहीं है … ये दायित्व आपका है। जब वे ठीक हो जांय तब आप उन्हें मेरे पास उसी प्रकार से लेकर आंये जिस प्रकार से आप मेरे लिये फूल लेकर आते हैं। अपने रिश्तेदारों को अपने परिवार के तोहफे के रूप में मेरे पास लेकर आंये। यही सबसे अच्छा तरीका होगा अपेक्षाकृत इसके कि मैं उन्हें ठीक करूं। यदि कोई सहजयोगी है तो उसकी तीन पीढ़ियों को … यहां से वहां तक ठीक करना है जैसे कि मेहरोत्रा (किसी सहजयोगी का नाम) ने मुझसे करवाया।
व्यक्ति को पारिवारिक रिश्ते नातों से अनासक्त हो जाना चाहिये और इन भावनात्मक असंतुलनों से भी। भावनात्मक समस्यायें केवल इसी से सुलझाई जा सकती हैं कि इन लोगों को सहजयोग करना चाहिये। जैसा मैंने कहा कि मेरे अपने पति और मेरी बेटियां और रिश्तेदार … मैं उन सबको बाहर रखती हूं। आपको भी ऐसे किसी को सहजयोग के आस पास भी लाने का प्रयास नहीं करना चाहिये। आपको जानने के लिये अपनी विवेकबुद्धि से काम लेना चाहिये। यद्यपि मेरे सभी संबंधी अत्यंत धार्मिक लोग हैं … बहुत अच्छे है …. अत्यंत आत्मसम्मान वाले हैं … उनमें सभी गुण हैं। एकदम रेडीमेड लेकिन फिर भी वे सहजयोग में नहीं हैं। अतः आप में से कोई भी नहीं कह सकेगा कि उसने ऐसा कहा था … इसने वैसा कहा था । बल्कि ऐसा कहना चाहिये कि माँ ने ऐसा कहा था।