Shri Ganesha Puja

Perth (Australia)

1983-03-01 Ganesha Puja, Talk On Children in Perth ashram, Australia, 29'
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                   श्री गणेश पूजा 

1 मार्च 1983, पर्थ ऑस्ट्रेलिया 

मुझे लगता है कि यह ज्ञान की गुणवत्ता है जो अभी भी कई ऑस्ट्रेलियाई लोगों में प्रकट हो रही है, जो बहुत से लोगो ने खो दिया है क्योंकि उन्होंने भौतिकवाद के घोर पक्ष को ले लिया है। श्री गणेश शुद्ध करने की अद्भुत शक्ति हैं, क्योंकि यह किसी के द्वारा दूषित नहीं किया जा सकते है, आप जो भी कोशिश कर ले , वह दूषित नहीं हो सकते है। केवल एक चीज है, जो की वापस आ सकती है, यह प्रकट नहीं भी हो सकती है, लेकिन जो कुछ भी है, वह अपने पूर्ण रूप में है। यदि आप इसका उपयोग करना जानते हैं, तो आप सभी को शुद्ध कर सकते हैं। तो ऑस्ट्रेलियाई लोगों की ज़िम्मेदारी को समझना जरुरी है यह बहुत स्पष्ट है , क्योंकि वे एक ऐसे देश में रह रहे हैं, जिस पर श्री गणेश का शासन है, इसलिए पहले उन्हें अपनी पवित्रता बनाए रखनी होगी। उनके अस्तित्व की पवित्रता। कई लोग कभी-कभी सोचते हैं कि पवित्रता केवल सतही  पक्ष तक सीमित है, उनके यौन जीवन की शुद्धता पर्याप्त है, ऐसा नहीं है। यही कारण है कि क्राइस्ट ने कहा है “तुम्हारी आंखे व्यभिचारी नही होनी चाहिए ” अर्थात्। आपकी आँखें शुद्ध होनी चाहिए, और जैसा कि आप जानते हैं, आँखें आपके अहंकार और प्रति अहंकार दोनों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसलिए जब उन्होंने कहा कि आपकी आँखें शुद्ध होनी चाहिए, तो उनका मतलब था कि आपके विचार शुद्ध होने चाहिए।

अब, आपकी शक्ति का जनक कौन है, हमें इसकी गहराई तक जाना होगा और देखना होगा कि विचार कैसे उत्पन्न होते हैं। मनुष्य का मस्तिष्क जैसा कि आप जानते हैं, एक पिरामिड की तरह है। यह मध्य बिंदु से एक कोन की तरह उभरा हुआ है, यह केंद्र है, यह ब्रह्मरंध्र है, और जब यह मन मानव में उस स्तर तक उपर उठ जाता है, तो यह अपने पर्यावरण के प्रति  अपनी प्रतिक्रियाओं में एक अद्भुत परिवर्तन में चला जाता है। उदाहरण के लिए, एक जानवर, अगर वह कोई चीज देखता है, तो वह उसके बारे में नहीं सोचता है, कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं होती है। परन्तु केवल मनुष्यों में ही यह प्रतिक्रिया उसके मस्तिष्क के कोन के आकर के  की वजह से होती है, हम कह सकते हैं कि यह चित्त जो अंदर आ रहा है, बलों के समांतर चतुर्भुज में जाता है, चूँकि हमारे मस्तिष्क में दो प्रकार के घनत्व हैं। अपवर्तन भी होता है, और अपवर्तन के कारण बलों का यह समांतर चतुर्भुज इस तरह से कार्य करता है कि आपका चित्त बाहर जाता है, और जो चित्त बाहर जाता है, वह प्रतिक्रिया करता है। और जब यह प्रतिक्रिया करता है, तो विचार तरंगें हम तक आने लगती हैं। 

आपने एक झील देखी होगी। यदि आप एक झील में एक पत्थर डालते हैं, तो लहरें शुरू होती हैं और वे झील के किनारे पर आती  हैं, और फिर किनारा एक और लहर बना देता है जो वापस जाती है। उसी तरह, जब इंसान किसी भी चीज़ को देखता है, तो वह उस पर चित्त  डालता है, तो हमेशा एक प्रतिक्रिया होती है जो आपके सामने आती है।

अब क्राइस्ट के अनुसार हमारी आँखे व्यभिचारी नही होनी चाहिए , कोई व्यभिचार नहीं होना चाहिए। शुद्ध अर्थ में व्यभिचार शब्द इतना बुरा नहीं है। व्यभिचार का अर्थ है कि जो मौजूद है, उसमें कोई मिलावट नहीं होना चाहिए, जैसा कि सरल है। जब हम कहते हैं कि दूध में मिलावट है, तो हमारा मतलब है कि यह पूरी तरह से दूध नहीं है, लेकिन इसमें कुछ और है। इसलिए जब आप चीजों को देखते हैं, मान लो कि यह एक दीवार है, तो एक दीवार बस एक दीवार भर है,बस इतना ही, इसमें सोचने का क्या है? लेकिन एक व्यक्ति जो आत्मसाक्षात्कारी  नहीं है, वह तुरंत एक दीवार के बारे में भी सोचना शुरू कर देगा। अब एक व्यक्ति की आदतों  के आधार पर, यदि कोई व्यक्ति बहुत विकृत आत्मा है, तो मुझे नहीं पता कि वह दीवार के बारे में क्या सोचेगा क्योंकि मैं भी सोच की हर सीमा तक नहीं जा सकती -मुझे खेद है कि मेरी कुछ निश्चित सीमाएँ हैं । लेकिन एक व्यक्ति जो एक सामान्य व्यक्ति है, वह भी दीवार के बारे में सोचना शुरू कर सकता है, जैसे इसपर कितना खर्च होगा और क्या होगा और यह और वह और, अगर वह धन उन्मुख है तो धन के दृष्टिकोण के अनुसार सभी प्रकार के विचार, । अगर वह अहं उन्मुख होता है, तो उसके विचार उसी तरह प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे। यही  मिलावट है, कि जब आप चीजों को देखते हैं तो सोचने के लिए कुछ नहीं होता है-सोचने के लिए है क्या ? जो भी है, वह है, लेकिन हम सोचते हैं कि सोचने से हम समस्याओं को हल कर सकते  हैं। साथ ही इस तरह का मिथक इंसानों के बीच मौजूद है, कि जब आप किसी चीज को देखते हैं या आप किसी चीज के बारे में सोचते हैं तो आप समस्या का समाधान करते हैं। यह सच नहीं है। यह एक मिथक है, क्योंकि सोच  केवल मन की एक  प्रक्रिया है। यह किनारे की ओर पहुँचती एक लहर की तरह है जो सोचती  है कि यह इसे पूरी तरह से घेर सकती  है या इसे पूरी तरह से अपने में समा सकती है। तो विचार सिर्फ एक ऐसा खाली बर्तन है जो कुछ भी नहीं ले जाता है। यह कुछ भी नहीं कर सकता है, यह किसी भी तरह फलदायी नहीं है।

कभी-कभी यह कथन बहुत बड़ा लग सकता है और आप सोच सकते हैं कि माँ ऐसा कैसे हो सकता  है, हमने सोचकर बहुत कुछ किया है तथा ऐसा और वैसा । लेकिन आपने ऐसा नहीं किया है, आपने जो कुछ भी किया है वह त्वरित बुद्धि  के माध्यम से किया है क्योंकि अचेतन ने आपकी मदद की है, आपको मार्ग दिखाया  है! और प्रेरणा दी है , आपने सब कुछ प्रेरणा के माध्यम से किया है न कि अपनी सोच से। अब हम यहां इस बात से सहमत नहीं होना चाहते हैं, क्योंकि इसके लिए अपना अहंकार छोड़ना होगा चूँकि हमें लगता है कि हमने इसे अपनी सोच के माध्यम से हासिल किया है। लेकिन जब आप बहुत ज्यादा, बहुत ज्यादा, बहुत ज्यादा, उस तरह से सोचते हैं, तब क्या होता है? अचेतन आपको आवश्यक जानकारी देता है, क्योंकि इसमें करुणा है, उसके पास आपके लिए प्रेम  है और अचानक आपको  वहां कुछ मिलता है। आपको बस उस कोने में धकेल दिया जाता है, जहाँ आप उसे पाते हैं। और इसके लिए आपको पता होना चाहिए कि आइंस्टीन वह व्यक्ति है जो कहता है कि सापेक्षता का सिद्धांत उस पर अज्ञात रूप से हावी हो गया, क्योंकि जो कुछ भी ज्ञात है वह पहले से ही वहा है। और जो कुछ भी अज्ञात है वह आप विचार रूपी  बुद्धि द्वारा नहीं खोज सकते , लेकिन प्रबुद्ध मस्तिष्क द्वारा।

अब जब उन्होंने कहा, “तुम्हारी आंखे भी  व्यभिचारी नहीं होना  चाहिए,” – बेशक व्यभिचार अर्थात्, हमारी आँखों में वासना नहीं होनी चाहिए। लेकिन मैं फिर भी यह कहना चाहूंगी  कि हमारा चित्त इतना शुद्ध होना चाहिए कि हमें किसी विशेष चीज से अपेक्षा नहीं होना चाहिए, लेकिन इसका आनंद लेना, बस आनंद वाला भाग । अगर मुझे कोई खूबसूरत चीज दिखती है, तो मैं सिर्फ इसका आनंद ले रहा हूं, न कि यह मेरे पास होना चाहिए, न ही मुझे इसके बारे में सोचना चाहिए, न ही मुझे इसकी आवश्यकता है कि मुझे इसे दोहराना चाहिए। जैसा है वैसा भोगो। हो सकता है कि अगर आप इसका आनंद लेंगे तो आप इसे फिर से बना लेंगे।  व्यक्ति की शुद्धिकरण की क्षमता होनी चाहिए।

 तो, कभी-कभी लोग सोचते हैं कि सहज योग एक बहुत ही विक्टोरियन (नियंत्रण) प्रकार का सिस्टम है जिसमें आप इस तरह से जीवन नहीं जी सकते हैं और हमने जो आजादी हासिल की है और जो स्वच्छन्दता हमने हासिल की है , सहज योग में उसका आनंद नहीं ले सकते  है। लेकिन यह गुण या यह धार्मिकता जिसकी हमने अब तक निंदा की है, वास्तव में जीवन का निर्वाह है, हमारा गुण है, हमारा सोना है, हमारा धन है, हमारी संपत्ति है, हमारी सुरक्षा है जिसे हमने खो दिया है, और हमें बस फिर से शुद्धता हासिल करना है| यह वहाँ है ही  क्योंकि अगर यह मौलिक रूप से शाश्वत है तो यह खो नहीं सकता है, इसे स्थायी रूप से नष्ट नहीं किया जा सकता है। यह ऐसा है जैसे आपने एक पीतल धातु या ऐसा कुछ देखा है, जो वायुमंडल से ढका हुआ है, काला, लाल, पीला, हर तरह का रंग है और बर्बाद हो गया है। लेकिन फिर से आप इसे पॉलिश करते हैं, यह वापस ठीक हो जाता है। लेकिन अगर यह सोना है, तो यह अविनाशी  है, लेकिन अगर सोने को भी गंदे गटर या किसी चीज में जंग लगने दिया जाए, तो आप उसे देख नहीं पाते  , यह कई तरह की चीजों से ढक जाता है। लगता है कि यह अभी समाप्त हो गया है, यह वहाँ नहीं है।परन्तु यह हर समय मौजूद है,  इसी तरह हमारी मासूमियत हमारे भीतर मौजूद है। यह खोयी नहीं है, यह वहाँ है, केवल यह ढंक गयी हे | जैसे आकाश को बादलों से ढक दिया जा सकता है, वैसे ही यह अब वायुमंडल के कारण आच्छादित है, जिस तरह से हम इसे बिगाड़ने  की कोशिश करते हैं और सभी तरह की चीजें करते हैं। इसीलिए मैं कहती  हूं कि आप खुद को दोषी महसूस नहीं करें, क्योंकि अगर आप दोषी महसूस करते हैं, तो फिर आपका हाथ एक कमजोर हाथ हो जाता है , एक कमजोर दिमाग होता  है, एक  लड़खड़ाता दिमाग है, और फिर आप खुद को शुद्ध नहीं करना चाहते हैं। लेकिन यह हमारे भीतर हर समय मौजूद है, यह अविनाशी हमारे भीतर मौजूद है। आपको बस इसे प्राप्त करना है। अब श्री गणेश वही हैं जो हमारे लिए यह काम करते हैं। वह वह है जो इसे साफ करते है। यही नहीं कि वह पवित्रता का अवतार है, वरन वह यह  काम करते  है। केवल एक व्यक्ति, या केवल देवता जो पवित्रता का अवतार है, वह कर सकते  है। जैसे आप एक साबुन देख सकते हैं। साबुन वह है जो एक गुणवत्ता में है, एक शुद्ध चीज है और यह शुद्ध भी करता है। माना कि यह शुद्ध नहीं है, यह दूषित हो सकता है। उसी तरह हमारी अबोधिता बिलकुल शुद्ध है इसलिए यह हमारी अबोधिता खुद ब खुद ठीक हो जाती है। बस इसे  देख लो। वह जो हमारे अंदर छुपा है जिसे हमने हमेशा दबा रखा है, जिसे हमने कम आँका है, जिसका हमने सम्मान नहीं किया है, हमारी मदद के लिए आता है, और हमारे भीतर चमकता है। यह एक बहुत बड़ी आशीष है कि हमारे भीतर इतनी सारी शाश्वत चीजें विद्यमान हैं, अन्यथा मानव बहुत पहले ही समाप्त हो चुका होता। उनके चरित्र की वास्तविक शक्ति के साथ, उनकी शुद्धता के साथ खेलने के तरीके के कारण मनुष्यों का कोई पता भी  नहीं चलता। इसलिए जब यह हमेशा हर धर्म में बहुत समझाया जाता है कि आपको एक उचित जीवन, एक पवित्र जीवन व्यतीत करना है, तो इसका कारण यह है कि यह आपके  अंदर का सोना चमकाया जाना चाहिए और ऐसे चेहरे की चमक आप देख सकते हैं। आप एक ऐसे व्यक्ति को देख सकते हैं, जो बहुत तेज जीवन जीता है, जैसा कि आप इसे कहते हैं, वह दुखद जीवन का सामना करता है, और उसके चेहरे पर सभी प्रकार की दुख की रेखाएं हैं। लेकिन एक व्यक्ति जो खुद को उस ज्ञान और उस पवित्रता के साथ चमकाना शुरू कर देता है, श्री गणेश की चमक के साथ बिल्कुल मुस्कराता है, श्री गणेश की मासूमियत, उसका आनंद, जिस तरह से वह आनंद प्राप्त करता है, जिस तरह से वह खुशी का आनंद लेता है। वह दुनिया के सभी आनंद का स्रोत है। अब अंग्रेजी भाषा में आनंद को कोई नाम नहीं दिया जाता है, केवल एक शब्द  आनंद है और मुझे कभी-कभी विभिन्न प्रकार के आनंद का वर्णन करना मुश्किल लगता है जो हमारे विकास के विभिन्न स्तरों पर हो सकते हैं। लेकिन जब आप अपने सहस्रार को प्राप्त करते हैं तो आनंद को निरानंद कहा जाता है। अब नीरा मेरा नाम है, आप जानते हैं। आनंद का अर्थ है आनंद। नीरा का अर्थ है कि आनंद के अलावा और कुछ नहीं है। पूर्ण आनंद है, कोई प्रतिक्रिया नहीं, सिर्फ आनंद में डूबा कुछ भी नहीं। वह गुण श्री गणेश के गुण से भी विकसित होता है। यह श्री गणेश है जो हमारे भीतर निरानंद के उस गुण को विकसित करता है। वह धीरे-धीरे विकास में जाता है जैसा कि आप देखते हैं कि आज्ञा चक्र पर स्थित  मसीह बन जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि वह विकास में जाता है, लेकिन हम एक बीज को उस पेड़ में विकसित होते हुए देख सकते हैं और आखिरकार हम पाते हैं कि हम बच्चों की तरह आनंद में उस पेड़ के ऊपर बैठे हैं। वह आनंद जो हमारे परमपिता ने सहस्रार पर हमें दिया है।.

अब पूजा वाले भाग को समझना चाहिए। सहज योग में यह बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन हर किसी को, दो कारणों से शुरूआत करने के लिए पूजा के संपर्क में नहीं आना चाहिए। कभी-कभी पूजा करने आने वाले लोग वास्तव में इसके योग्य नहीं होते हैं और फिर वे प्रतिक्रिया करते हैं, वे पूजा पर प्रतिक्रिया करते हैं। वे सोचते हैं कि यह पूजा क्यों ,और यह अधीनता है ,और अन्य सभी प्रकार की बातें, चूँकि वे इसके योग्य नहीं हैं,  पर उन्हें अपनी अयोग्यता का औचित्य साबित करने के लिए कोई न कोई बहाना लगाना होता है । इसलिए हमें पहले यह पता लगाना होगा कि व्यक्ति पूजा के योग्य है या नहीं। यदि व्यक्ति योग्य नहीं है, तो व्यक्ति को पूजा के योग्य होने तक अकेला छोड़ देना बेहतर है क्योंकि संदेह और वे सभी चीजें अन्य लोगों के लिए चैतन्य के प्रवाह को बाधित कर सकती हैं और ऐसा व्यक्ति दूसरों के लिए समस्या पैदा कर सकता है। यदि किस व्यक्ति का दिल खुला नहीं है और पूजा क्या है, इसकी समझ भी नहीं है तो, पूजा में शामिल होना उसकी असभ्यता है । किसी भी देवता की पूजा करना इतना आसान काम नहीं है, खासकर श्री गणेश की। वे लोग जो श्री गणेश की पूजा करते हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि निश्चित रूप से यह एक स्वयंभू हों , जो कि धरती माता द्वारा बनाया गया हो। गणेश के अलावा किसी और की पूजा नहीं की जानी चाहिए। और अगर वे एक आत्मसाक्षात्कारी आत्मा नहीं हैं तो वे कभी भी श्री गणेश की पूजा नहीं कर सकते हैं। वे उसके बारे में सोच भी नहीं सकते, वे उसका नाम भी नहीं ले सकते, श्री गणेश तक पहुंचना इतना कठिन है। लेकिन आत्मसाक्षात्कार  होने के बाद आपको सबसे पहले श्री गणेश की पूजा करनी होगी क्योंकि वह आधार है जिस पर आपको आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति हुई थी। वह पहला है जिसने अपने को सूली पर चढ़ाया और फिर पुनरुत्थान पाया और यह वही है जिन्होंने आपके लिए प्राप्ति का मार्ग खोला है, इसलिए अत्यंत त्याग के साथ किसी अन्य देवता के पहले उनकी पूजा करनी होगी। उन्होंने आपके ख़ातिर इंसान बनने का, एक इंसान की तरह मरने और ,पीड़ित होने का अत्यंत विकासवादी उत्थान किया ताकि आपको अपने आत्मसाक्षात्कार प्राप्ति के लिए मुश्किल न हो। आज जब हम कहते हैं कि यह बहुत आसान है और,आप जिस तरह इसे प्राप्त करते हैं,  तब हम यह भूल जाते हैं कि लोगों ने आपके लिए इसे प्राप्त करने के लिए, पथ बनाने के लिए बहुत सारे काम किए हैं।  जैसे मैं पर्थ में आती हूं।  सोचें , जब मैं स्कूलों में पढ़ रही थी तो मैं पर्थ शब्द पढ़ती थी और, मैं सोच भी नहीं सकती थी कि भारतीय आसानी से पर्थ पहुँच सकते हैं कि बस उड़ जाओ और तुम वहीं हो। लेकिन आज यह संभव है कि हमने भारत से पर्थ तक इस तरह का उत्थान इतनी आसानी से हासिल कर लिया  है क्योंकि लोगों ने इसके लिए काम किया है। लोगों ने बलिदान दिया है। कितने लोग हवाई जहाज़ बनाते हुए मर गए होंगे, कितने लोगों को झटके और इस तरह की चीजें हुई होंगी? हमें अपने लाभ के लिए उनके बलिदान का उपयोग करने के बहुत विशेषाधिकार प्राप्त हैं। हम इस सभी को अपने लिए आवंटित मानते हैं।

उसी तरह से जब आध्यात्मिक उत्थान में हम आसन कहते हैं, यह इतना आसान नहीं है जितना आप सोचते हैं, क्योंकि इस पर युगों  से बहुत गहरे तरीके से काम किया है, और यहां तक कि आपकी मां ने भी इसे हासिल करने के लिए बहुत मेहनत की है। तो किसी ने काम किया है। इसलिए अगर यह आसान है तो आपको संदेह करने की बजाय अपने ग्रहों को धन्यवाद देना चाहिए | आप इसमें कुछ योगदान करना चाहते हैं, ठीक है आप कर सकते हैं, लेकिन पहले जो उपलब्ध है उसका लाभ उठाएं और फिर आप इसके लिए कुछ और  योगदान कर सकते हैं। यदि आप एक साधारण हवाई जहाज भी नहीं जानते हैं, तो आप एक जटिल वाले का निर्माण कैसे करेंगे? तो पहले यह जान लें कि जो कुछ भी प्राप्त है वह आत्म-साक्षात्कार है और श्री गणेश की स्वच्छता की शक्ति है। अपने भीतर श्री गणेश की स्थापना करें। सबसे पहले आपको उन्हें स्थापित करना होगा और फिर आप दूसरों के लिए, अपने लिए और सहज योग के तरीकों को जो की आपने सीखें है  बेहतर और, बेहतर बनाने के लिए इसका उपयोग कर सकते हैं।

इस प्रकार श्री गणेश सभी सहज योगियों के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं, यह सभी पहलुओं में समझा जाना चाहिए , लेकिन यह सिद्धांत बहुत बड़ा है। यह सिद्धांत बहुत फैला हुआ है, यह बहुत ही सूक्ष्म है, इसलिए इसके सभी पहलुओं को समझना कोई आसान बात नहीं है। केवल एक चीज जो आप कर सकते हैं वह है महासागर के साथ एकाकार हो जाना। अगर तुम सागर के साथ एकाकार हो जाते हो तो तुम सागर हो जाते हो। बस इसके साथ एक बनो और इस तरह यह काम करता है |

लेकिन अगर आप इसे समझने के लिए अपने दिमाग का इस्तेमाल करते हैं, तो आपका दिमाग इस की एक झलक भी नहीं पा सकता है । तो सबसे अच्छी बात यह है कि आप पूरी प्रक्रिया के बारे में विनम्र रहें, बस उसके साथ एकाकार होने की कोशिश करें, और जो लोग  ऐसा कर सकते हैं उन्हें एहसास होगा कि वे स्वयं आनंद बन गए हैं और उनके पास आनंद  देने वाले गुण हैं, उनके पास हैं वे गुण जिनसे वे दूसरों को सिर्फ आनंद और शांति देते हैं। बस उनका वहां होना ही इस एहसास को पैदा करने के लिए पर्याप्त है। मुझे हमेशा ऑस्ट्रेलिया से बहुत उम्मीदें हैं और मुझे यकीन है कि एक दिन यह यहां बड़े पैमाने पर होगा। और जब यह यहां होता है तो हम अन्य स्थानों पर भी अधिक परिणाम प्राप्त करेंगे। मुझे कड़ी मेहनत करनी होगी, और आप सभी को इस देश के महत्व, ऑस्ट्रेलियाई के रूप में आपके महत्व ……… को समझने के लिए बहुत कड़ी मेहनत करनी होगी।

इसलिए पर्थ के लिए, यह एक महान संदेश और, यह केंद्र एक दरवाज़ा है। यह श्री गणेश का द्वार है और आपको अधिक से अधिक लोग जो सच्चे साधक हैं उनका पता लगाना है, और उनके साथ झगड़ा न करें जो लोग सहज योग पर संदेह कर रहे हैं, , बस झगड़ा न करें। धीरे-धीरे उन सभी को आना होगा और अगर वे नहीं आते है तो निराश नहीं हों, तो यह ठीक है, यह उनकी किस्मत है। तो आप उस बिंदु पर बहस नहीं करेंगे। उनके साथ बहस करने में अपनी ऊर्जा बर्बाद न करें। हमारे पास उन्हें समझाने के अन्य तरीके हैं, , जो आप उपयोग करते हैं: उन्हें उन सभी निर्मला विद्याओं का बंधन देना ।इसलिए आप निराश नहीं हों और आप उनसे नाराज़ नहीं हों, क्योंकि वे अज्ञानी हैं और आपको अपने अतीत को भी ध्यान में  रखना चाहिए, कि आपने शुरुआत में सहज योग के प्रति कैसा व्यवहार किया था तब फिर आप उनके प्रति दयालु होंगे। दयालु हों। जो खोजी हैं ,क्रमशः सबको आना ही है । दरवाजे बंद करने से पहले हम देखेंगे कि वे सभी हैं|