Sahasrara Puja, Above the Sahasrar

मुंबई (भारत)

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सहस्रार पूजा बम्बई, ५ मई १९८३

आप सबकी ओर से बम्बई के सहजयोगी व्यवस्थापक जिन्होंने यह इन्तजामात किये हैं, उनके लिये धन्यवाद देती हूँ, और मेरी तरफ से भी मैं अनेक धन्यवाद देती हूँ। उन्होंने बहुत सुन्दर जगह हम लोगों के लिये ढूँढ रखी है। ये भी एक परमात्मा की देन है कि इस वक्त जिस चीज़़ के बारे में बोलने वाली थी, उन्हीं पेड़ों के नीचे बैठकर सहस्रार की बात हो रही है। चौदह वर्ष पूर्व कहना चाहिये या जिसे तेरह वर्ष हो गए और अब चौदहवाँ वर्ष चल पड़ा है, यह महान कार्य संसार में हुआ था, जबकि सहस्रार खोला गया। इसके बारे में मैंने अनेक बार आपसे हर सहस्रार दिन पर बताया हुआ है कि क्या हुआ किस तरह से ये घटना हुई, क्यों की गई और इसका महात्म्य क्या है? था, लेकिन चौदहवाँ जन्मदिन बहत बड़ी चीज़ है। क्योंकि मनुष्य चौदह स्तर पर रहता है, और जिस दिन चौदह स्तर वो लाँघ जाता है, तो वो फिर पूरी तरह से सहजयोगी हो जाता है। इसलिये आज सहजयोग भी सहजयोगी हो गया। अपने अन्दर इस प्रकार परमात्मा ने चौदह स्तर बनाए हैं। अगर आप गिनिये, सीधे तरीके से, तो भी अपने अन्दर आप जानते हैं सात चक्र हैं, एक साथ अपने आप। उसके अलावा और दो चक्र जो हैं, उसके बारे में आप लोग बातचीत ज़्यादा नहीं करते, वो हैं ‘चन्द्र’ का चक्र और ‘सूर्य’ का चक्र। फिर एक हम्सा चक्र है, इस प्रकार तीन चक्र और आ गए। तो, सात और तीन-दस। उसके ऊपर और चार चक्र हैं। सहस्रार से ऊपर और चार चक्र हैं। और उन चक्रों के बारे में भी मैंने आप से बताया था-अर्धबिन्दु, बिन्दु, वलय और प्रदक्षिणा। इन चार चक्रों के बाद कह सकते हैं कि हम लोग सहजयोगी हो गए। और दूसरी तरह से भी आप देखें, तो हमारे अन्दर चौदह स्थितियाँ सहस्रार तक पहुँचने पर भी हैं। अगर उसको विभाजित किया जाए तो सात चक्र अगर इड़ा नाड़ी पर और सात पिंगला नाड़ी पर हैं। मनुष्य जब चढ़ता है, तो वो सीधे नहीं चढ़ता। वो पहले बायें (लेफ्ट) में आता है, फिर दायें (राइट) में जाता है, फिर लेफ्ट में आता है, फिर राइट में जाता है और कुण्डलिनी जो है, वो भी जब चढ़ती है तो इन दोनों में विभाजित होती हुई चढ़ती है। इसकी वजह ये है कि मैं आपको अगर समझाऊँ कि दो रस्सी और दोनों रस्सियाँ इस प्रकार नीचे उतरते वक्त या ऊपर चढ़ते वक्त भी दो अवगुण्ठन लेती हैं। जब दो अवगुण्ठन लेती हैं, तो उसके लेफ्ट और राइट इस प्रकार से पहले लेफ्ट और फिर राइट, दोनों के अवगुण्ठन होने से, फिर राइट वाली राइट को आ जाती है, लेफ्ट वाली लेफ्ट को चली जाती है। आप अगर इसको देखें, तो मैं आपको दिखा सकती हैँ। समझ लीजिये इस तरह से आया। अब इसने चक्कर लिया, और दूसरे चक्कर लेने में फिर आ गई इसी तरफ। इस प्रकार दो अवगुण्ठन उसमें होते जाते हैं। इसलिये आपकी जब कुण्डलिनी चढ़ती है, तो चक्र पर आपको दिखाई देता है, कि लेफ्ट पकड़ा है या राइट क्योंकि कुण्डलिनी तो एक है। फिर आपको एक ही चक्र पर दोनों चीज़ दिखाई देती हैं। इस प्रकार आप देखें कि लेफ्ट पकड़ा है या राइट पकड़ा है। तो इस प्रकार हमारे अन्दर लेफ्ट और राइट अगर दोनों का विभाजन किया जाए, एक चक्र का, तो सात दूनी चौदह। वैसे ही हमारे अन्दर चौदह स्थितियाँ तो पहले ही क्रास ( पार ) करनी पड़ती हैं, जब आप सहस्रार तक पहुँचते हैं। और अगर इसको आप समझ लें कि सात ये, और ऊपर के सात-इस तरह भी तो चौदह का एक मार्ग बना। इसलिये ‘चौदह’ चीज़ जो हैं वो कुण्डलिनी शास्त्र में बहुत महत्वपूर्ण, बहुत महत्वपूर्ण बहुत महत्वपूर्ण चीज़ हैं। और जब तक हम इस चीज़ को पूरी तरह से न समझ लें, कि इन चौदह चीज़ों से जब हम परे उठेंगे, तभी हम सहजयोग के पूरी तरह से अधिकारी हैं। हमको आगे बढ़ते ही रहना चाहिए और उसमें पूरी तरह से रजते रहना पड़ेगा । राजना, शब्द आपके सामने पहले भी मैंने बहत कहे हैं लेकिन आज के दिन विशेषकर के, हम लोगों को समझना चाहिए कि सहस्रार हैं। बिराजना-ये ব

के दिन राजना क्या है? बिराजना क्या है? अब आप यहाँ बैठे हैं, ये पेड़ों को आप देखिये। ये पेड़ श्रीफल का है। नारियल को ‘श्रीफल’ कहा जाता है। श्रीफल, जो नारियल है, इसके बारे में आपने कभी सोचा या नहीं पता नहीं। लेकिन बड़े सोचने की चीज़ है-‘इसे श्रीफल क्यों कहते हैं?’ ये समुद्र के किनारे होता है, और कहीं होता नहीं। सबसे अच्छा जो ये फल होता है, समुद्र के किनारे वजह ये है कि समुद्र जो है, ये ‘धर्म’ है। जहाँ धर्म होगा , वहीं श्रीफल फलता है। जहाँ धर्म नहीं होगा, वहाँ श्रीफल नहीं होगा। लेकिन समुद्र के अन्दर सभी चीजें बसी रहती हैं। हर तरह की सफाई, गन्दगी हर चीज़ इसमें होती है। ये पानी भी ‘नमक’ से भरा होता है। इसमें नमक होता है। ईसा मसीहने कहा था कि ‘तुम संसार के नमक हो।’ माने हर चीज़ में आप घुस सकते हो, ‘हर चीज़’ में आप स्वाद दे सकते हो। ‘नमक हो’ नमक के बगैर इन्सान जी नहीं सकता। जो हम ये प्राणशक्ति अन्दर लेते हैं, अगर हमारे अन्दर नमक न हो तो वो प्राणशक्ति भी कुछ कार्य नहीं कर सकती ये कार्यसाधक है। और ये नमक जो है, ये हमें जीने में का, संसार में रहने का, प्रपंच में रहने की पूर्ण व्यवस्था नमक करता है। अगर मनुष्य नमक न हो, तो वो किसी काम का इन्सान नहीं। लेकिन परमात्मा की तरफ जब ये चीज़ उठती है, तो छूट जाती हैं। और जब इन पेड़ों पर सूर्य की रोशनी पड़ती है, और सूर्य की रोशनी पड़ने पर जब इसके पत्तों का रस और सारे पेड़ का रस, ऊपर की ओर खिंच आता है क्योंकि evaporation होता है, तब इसमें से जो; इस तना में से जो यही पानी ऊपर बहता है- वो ‘सब’ कुछ छोड़कर के, उन चौदह चीज़ों को लॉघ करके, ऊपर जाकर के, श्रीफल बनता है। वो सब नमक को नीचे ही छोड़ देती है- ‘सब’ चीज़ | वही श्रीफल आप हैं। और देवी को श्रीफल जरूर देना होता है। श्रीफल दिये बगैर पूजा सम्पन्न नहीं होती। श्रीफल भी एक अजीब तरह से बना हुआ है। दुनिया में ऐसा कोईसा भी फल नहीं, जैसे श्रीफल है। उसका कोईसा भी हिस्सा बेकार नहीं जाता। इसका एक-एक हिस्सा इस्तेमाल होता है। इसके पत्तों से लेकर हर चीज़ इस्तेमाल होती है और श्रीफल का भी – हर एक चीज़ इस्तेमाल होती है। आप देखें कि श्रीफल भी के सहस्रार जैसा है। जैसे बाल अपने हैं, इस तरह से श्रीफल के भी बाल हैं। ‘यही श्रीफल है।’ इसमें बाल होते हैं ऊपर में, इसकी रक्षा के लिये| मृत्यू से रक्षा हमें बालों से मिलती है। इसलिये बालों का बड़ा मनुष्य महान मान किया गया है। बाल बहुत महान हैं और बड़ी शक्तिशाली चीज़ हैं क्योंकि आपकी रक्षा करते हैं। इनसे आपकी रक्षा होती है। और इसके अन्दर जो, हमारे जो cranial bones हैं, जो हड्डियाँ हैं, वो भी आप देखते हैं कि श्रीफल के अन्दर में बहुत कड़ा-सा इस तरह का एक ऊपर से आवरण होता है। उसके बाद हमारे अन्दर grey matter और white matter ऐसी दो चीजें हमारे अन्दर होती हैं। श्रीफल में भी आप देखें – grey matter और white matter…. और उसके अन्दर पानी होता है, जो हमारे में cerebrospinal fluid होता है। उसके अन्दर भी पानी होता है-वो limbic area होता है। तो ये साक्षात् श्रीफल जो है, ये ही हमारा, अगर इनके लिये ये फल है, तो हमारे लिये ये फल है। जो हमारा मस्तिष्क है, ये हमारी सारी उत्क्रान्ति का फल है । आज तक जितनी हमारी उत्क्रान्ति हुई है-जो अमिबा से आज हम इन्सान बने हैं, वो सब हमने इस मस्तिष्क के फलस्वरूप पाया है। ये जो मस्तिष्क है, ये सबकुछ-जो कुछ हमने पाया है इस मस्तिष्क से। इसी में सब तरह की शक्तियाँ, सब तरह का इसी में सब पाया हुआ धन संचित है। अब इस हृदय के अन्दर जो आत्मा बिराजती है और उसका जो प्रकाश हमारे अन्दर सहजयोग के बाद सात परतों में फैलता है, दोनों तरफ से वो तभी हो सकता है, जब आदमी का सहस्रार खुला हो। अभी तक हम इस दिमाग से वो ही काम करते हैं। आत्मसाक्षात्कार से पहले, सिवाय इसके कि हम अहंकार और प्रतिअहंकार (सुपर इगो) इन दोनों के माध्यम जो कार्य करना है, वो करते हैं। अहंकार और प्रतिअहंकार या आप कहिये मन और ‘अहंकार’ -इन दोनों के सहारे हम सारे कार्य करते हैं। लेकिन साक्षात्कार (रियलाइजेशन) के बाद हम आत्मा के सहारे कार्य करते हैं। आत्मा रियलाइजेशन से पहले हृदय में ही विराजमान है, बिल्कुल अलग – ‘क्षेत्रज्ञ’ बना हुआ, देखते रहने वाला। उसका काम, वो जैसा भी है, देखने -वो करता रहता है। लेकिन उसका प्रकाश हमारे चित्त में नहीं है, वो हमसे अलग है, वो हमारे चित्त में नहीं है।

रियलाइजेशन के बाद वो हमारे चित्त में आ जाता है, पहले। पहले चित्त में आता है। और चित्त आप जानते हैं कि भवसागर (वॉइड) में बसा है। उसके बाद उसका प्रकाश सत्य में आ जाता है, क्योंकि हमारा जो मस्तिष्क है, उसमें प्रकाश आ जाने से हम सत्य को जानते हैं। जानते-माने ये नहीं कि बुद्धि से जानते हैं, पर साक्षात् में जानते हैं कि ये है ‘सत्य’ । उसके बाद उसका प्रकाश हृदय में दिखाई देता है। हृदय प्रगढ़-हृदय बढ़ने लग जाता है, ‘विशाल’ होने लगता है, उसकी आनन्द की शक्ति बढ़ने लगती है। इसलिये ‘सच्चिदानन्द’ – सत्, चित्त और आनन्द-सत् मस्तिष्क में, चित् हमारे धर्म में और आनन्द हमारी आत्मा में प्रकाशित होने लगता है। उसका प्रकाश पहले धीरे-धीरे फैलता है, ये आप सब जानते हैं। उसका प्रकाश धीरे-धीरे बढ़ता है, सूक्ष्म चीज़ होती है, पहले बहुत सूक्ष्म क्योंकि हम जिस स्थूल व्यवस्था में रहते हैं, उस व्यवस्था में उस सूक्ष्म को पकड़ना कठिन हो जाता है। धीरे-धीरे वो पकड़ आ जाती है। उसके बाद आप बढ़़ने लग जाते हैं, होते हैं। सहस्रार का एक पर्दा खुलने से ही कुण्डलिनी आ जाने से आप ने सदाशिव के पीठ को नमस्कार कर दिया। आप के अन्दर की आत्मा का प्रकाश धुँधला-धुँधला बहने लगा, लेकिन अभी इस मस्तिष्क में वो पूरा खिला नहीं। अंग्रसर अब आश्चर्य की बात है कि आप अगर मस्तिष्क से इसको फैलाना चाहें तो नहीं फैला सकते। अपना मस्तिष्क और अपना हृदय-इसका अब बड़ा सन्तुलन दिखाना होगा। आपको तो पता ही है, कि जब आप अपने बुद्धि से बहुत ज़्यादा काम करते हैं, तो हृदय की गति रुकती है। और जब आप हृदय से बहुत ज़्यादा काम करते हैं, तो आपका मस्तिष्क (ब्रेन) फेल हो जाता है। इनका एक सम्बन्ध बना ही हुआ है, पहले से बना हुआ है। बहुत गहन सम्बन्ध है। और उस गहन सम्बन्ध की वजह से, जिस वक्त आप पार हो जाते हैं, इसका सम्बन्ध और भी गहन होना पड़ता है। हृदय और इस मस्तिष्क (ब्रेन) का सम्बन्ध बहुत ही घना होना चाहिये। जिस वक्त ये पूरा एक (इंटीग्रेट) हो जाता है, तब चित्त आपका जो है, पूर्णतया परमेश्वर-स्वरूप हो जाता है। ऐसा ही कहा जाता है हठ योग में भी कि ‘मन’ और ‘अहंकार’ दोनों का लय हो जाता है। लेकिन ऐसे बात करने से तो किसी की समझ ही में नहीं आयेगा, ‘इसका लय कैसे होगा?’ मन और अहंकार का। तो, वो मन के पीछे लगे रहते हैं, अहंकार के पीछे लगे रहते हैं, अहंकार को मारते रहो, तो मन बढ़ जाता है। उनके समझ ही में नहीं आता, क्या है। ये किस तरह से जाए? मन और अहंकार को किस तरह से जीता जाए ? कि ये पागलपन उसका एक ही द्वार है – ‘आज्ञा चक्र’। आज्ञा चक्र पर काम करने से मन और अहंकार जो है, उसका पूरी तरह से लय हो जाता है । और वो लय होते ही हृदय और ये जो मस्तिष्क (ब्रेन) है, इनमें पूरा ‘सामंजस्य’ पहले आ जाता है- concord| लेकिन एकता नहीं आती। ‘इस एकता को ही, हम को पाना है। तो आपका जो हृदय है, वही सहस्रार है, वही हृदय। जो आप सोचते हैं, वही आपके हृदय में है, और जो कुछ आपके हृदय में है, वही आप सोचते हैं। ऐसी जब गति हो जाए तो कोई तरह की आशंका, कोई भी तरह का अविश्वास, किसी भी तरह का भय, कोईसी भी चीज़ नहीं रहती । जैसे आदमी को भय लगता है, तो उसे क्या करते हैं? उसे मस्तिष्क (ब्रेन) से सिखाते हैं, देखो भाई , भय करने की कोई बात नहीं। देखो, तुम तो बेकार चीज़ से डर रहे थे; ‘ये देखो, प्रकाश लेकर।’ फिर वो अपनी बुद्धि से तो समझ लेता है, पर फिर ड्रता है। लेकिन जब दोनों चीज़ एक हो जाती हैं-आप इस बात को समझने की कोशिश कीजिये-कि जिस मस्तिष्क से आप सोचते हैं, जो आपके मन को समझाता है और सम्भालता है, वही आपका मन अगर हो जाए; यानि, समझ लीजिये कि ऐसा कोई यन्त्र हो कि जिसमें accelerator और ब्रेक दोनों स्वचालित (automatic) हों और दोनों ‘एक’ हों-जब चाहे तो वो ब्रेक बन जाए और जब चाहे तो वो accelerator हो जाए-और वो सब जानता है। ऐसी जब दशा आ जाए, तो आप पूरे गुरु हो गये। ऐसी दशा हमको आनी चाहिये। अभी तक आप लोग काफी उन्नति कर गए हैं, काफी ऊँचे स्तर पर पहुँच गए हैं। जरूर अब आपको कहना चाहिए कि अब आप श्रीफल हो गये हैं। लेकिन मैं हमेशा आगे की बात इसलिये करती हूँ कि इस पेड़ पर अगर चढ़ना हो, तो क्या आपने देखा है, कि किस तरह से लोग चढते हैं? अगर एक आदमी को चढ़ाकर देखिये तो आप समझ जाएंगे कि वो एक डोर बाँध लेता है चारों तरफ से अपने, और उस डोर को ऊपर फँसाते जाता है। वो डोर जब ऊपर फँस जाता है, तो उस पर वो चढ़ता है। इसी तरह से अपनी डोर को ऊँची

फँसाते जाना है। और यही जब आप सीख लेंगे, तभी आपका चढ़ना बहुत जल्दी हो सकेगा। पर ज़्यादातर हम ड़रोर को नीचे ही फँसाते रहते हैं । सहजयोग में जाने के बाद भी डोर हम नीचे की तरफ फँसाते हैं, और कहते हैं कि माँ हमारी तो कोई प्रगति नहीं हुई।’ अब होगी कैसे ? जब तुम ड़रोर ही उल्टी तरफ फँसा कर नीचे उतरने की व्यवस्था करते हो। जिस वक्त नीचे उतरना है, तो फिर ड्रोर को फँसाने की भी जरूरत नहीं। आप जरा सी ढील दे दीजिये, ढूर-ढूर-ढूर आप नीचे चले आएंगे। वह तो इन्तजाम से बना हुआ है-नीचे आने का। ऊपर चढ़ने का इन्तज़ाम बनाना पड़ता है। तो बनने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। और जो पाया है, उसे खोने के लिये कोई मेहनत की ज़रूरत नहीं – आप | कुछ सीधे चले आइये ज़मीन पर; उसमें कोई तो प्रश्न खड़ा नहीं होता। इसको अगर आप समझ लें, इस बात को, तो आप जान लेंगे कि ‘नज़र अपनी हमेशा ऊँची रखें।’ अगर कोई भी सीढ़ी पर आप खड़े हैं, लेकिन आप की नज़र ऊँची है, तो वो आदमी ‘उस’ आदमी से ऊँचा है ‘जो’ ऊपर खड़े होकर भी नज़र नीची रखता है। इसलिए कभी-कभी बड़े पुराने सहजयोगी भी ‘धक’ से नीचे चले आते हैं। लोग बताते हैं कि ‘माँ ये तो बड़े पुराने सहजयोगी थे। इतने साल से आपके साथ रहे, ये किया, वो किया-पर नज़र तो उनकी हमेशा नीचे रही ! तो मैं क्या करूँ अगर नज़र नीचे रखी तो वो चले आये नीचे। नज़र हमेशा ऊपर रखनी चाहिए। अब इसे भी, फल को देखना है तो नज़र आपकी ऊपर। इनकी भी नज़र ऊपर है। इन सबकी नज़र ऊपर है, क्योंकि बगैर नज़र ऊपर किये हुए वो जानते हैं कि न हम सूर्य को पा सकते हैं, न ही ये कार्य हो सकता है; ‘न तो हम श्रीफल बन सकते हैं । वृक्ष को बहुत अच्छे से देखना चाहिये और समझना चाहिये। सहजयोग आप वृक्ष से बहुत अच्छे से सीख सकते हैं । बड़ा भारी ये आपके लिये गुर है। जैसे कि जब हम वृक्ष की ओर देखते हैं, तो पहले देखना चाहिये कि ये अपनी जड़ों को कैसे बैठाता है। पहले अपनी जड़ को ये सम्भाल लेता है। जड़ में घुसा जाता है। ये हमारा धर्म है, ये हमारा चित्त है-‘इसमें’ ये घुसा चला जाता है और उसी चित्त से वो खींचता है, उस सर्वव्यापी शक्ति को। ये तो उल्टा पेड़ है, ऐसा कहिये तो ठीक है। उस सर्वव्यापी शक्ति को ये जड़ खींचने लग जाता है, और इसको खींचने के बाद में आखिर उसको खींच कर करना क्या है? फिर उसकी नज़र ऊपर जाती है और इसी प्रकार वो श्रीफल बना हुआ है। आपका सहस्रार भी इसी श्रीफल जैसा है। माँ को अत्यन्त प्रिय है और इसी सहस्रार को समर्पण करना चाहिये। अनेक लोगों ने कल मुझसे कहा कि ‘माँ, हाथ में ठण्डा आता है, पैर में भी ठण्डा आता हैं, पर यहाँ नहीं आता। वहाँ कौन बैठा हुआ है? बस इसको जान लेना चाहिये, यहाँ से ठण्डक आ जाएगी। और वहाँ जो बैठे हैं, वो सारे ही चीज़ों का फल हैं। इस पेड़ की जो नीचे गढ़ी हुई जड़ें हैं, वो भी उसी से जन्मी हैं । इसकी जो तना है, इसकी जो मेहनत है, इसकी जो उत्क्रान्ति है, यह ‘सब’ कुछ अन्त में जाकर के वो फल बना। उस फल में सब कुछ निहित है। फिर से आप उस फल को जमीन में ड्राल दीजिये, फिर से वही सारी चीज़ निकल आयेगी । ‘वो सबका हुए अर्थ यही है; वो सबका अन्त वही है। सारे संसार में जो कुछ भी आज तक परमात्मा का कार्य हुआ है, जो भी उन्होंने कार्य किया है, उसका सारा समग्र-स्वरूप, फलस्वरूप आज का हमारा यह महायोग है। और उसकी स्वामिनी कौन हैं? आप जानते हैं। तो ऐसे शुभ अवसर में आकर के आपने ये प्राप्त किया है, सो धन्य समझना चाहिए और इस श्रीफल स्वरूप होकर के और समर्पित होना चाहिये। पेड़ से तभी फल हटाया जाता है जब वो परिपक्व होता है, नहीं तो बेकार है। पकने से पहले वो माँ को नहीं दिया जाता। इसलिये परिपक्वता आनी चाहिये। बचपना छोड़ देना चाहिए। जब तक बचपना रहेगा, आप पेड़ से चिपके रहेंगे। लेकिन समर्पण के लिये पेड़ पर चिपका हुआ फल किस काम का? उस पेड़ से हटाकर के जो अगर वो समर्पित हो तभी माना जाता है कि पूजा सम्पन्न हुई। इसलिये सहजयोग को समझने के लिये एक बड़ा भारी आपके सामने प्रतीक रूप से स्वयं साक्षात् श्रीफल ही खड़ा हुआ है। यह बड़ी मेहरबानी हो गई कि आज यहाँ पर हम लोग सब एकत्रित हुए और इस महान समारोह में इन सब पेड़ों ने भी हमारा साथ दिया है। यह भी सारी बातों से नादित, यह भी स्पन्दित और यह भी सुन रहे हैं; उसी ताल पर यह भी नाच रहे हैं। यह भी समझ रहे हैं कि बात क्या है। इसी प्रकार आप लोग भी श्रीफल हैं, उसको पूरी तरह से परिपक्व, उसको परिपक्व करने का एक ही तरीका है कि

अपने हृदय से सामंजस्य बनायें । हृदय से एकाकार होने की चीज़ है। हृदय में और मस्तिष्क में कोई भी अन्तर नहीं है । हृदय से इच्छा करते हैं और मस्तिष्क से उसकी पूर्ति करते हैं । दोनों चीज़ें जब एकाकार हो जाऐंगी तभी आपको पूरा लाभ होगा। अब सर्वसाधारण लोगों के लिये सहजयोग एक बड़ी रहस्यमयी बात है। उनकी समझ में नहीं आने वाली-क्योंकि उनका जीवन ही रोज़मर्राका उसी स्तर का है। उस पर वो चलते हैं। लेकिन आपका स्तर अलग है। आप अपने स्तर से रहिये। दूसरों की ओर अधिकतर जब आप देखते हैं तो दया-दृष्टि से, क्योंकि यह बेचारे क्या हैं, इनका क्या होने वाला है। यह कहाँ जायेंगे इनकी समझ में नहीं आता, इनकी गति ही क्या है? यह कौनसे मार्ग में पहुँचने वाले हैं? इसको समझ करके और आप लोग यह समझें कि इनको अगर समझाने से समझ आ जाये सहजयोग, तो बहुत अच्छा है-समझाया जाए। लेकिन अगर यह लोग परवाह न करें तो इनके आगे सर फोड़ने से कोई फायदा नहीं। अपने श्रीफल को फोड़ने से कोई फायदा नहीं। इसको बचाकर रखें। इसका कार्य बहुत ऊँचा है। इसको बड़ी ऊँची चीज़ के लिये आपने पाया हुआ है और उसी ऊँचे स्तर पर इसे रखें और उसी सम्पन्न अद्भुत स्थिति को प्राप्त होने पर ही आप अपने को धन्य समझ सकते हैं। इसलिये हमको व्यर्थ चीज़ों के लिये अपनी खोपड़ी फाड़ने की कोई जरूरत नहीं। किसी से बहस करने की ज़रूरत नहीं। पर अपनी स्थिति को बनाये रखना चाहिए। नीचे उतरना नहीं चाहिए। जब तक यह नहीं होगा तब तक सहजयोग का पूरा-पूरा आप में जो कुछ समर्पण पाना था वो नहीं पाया। जो कुछ अपनाना था वो नहीं पाया। जो कुछ वृद्धि थी वो नहीं पाई। जो आपकी पूरी तरह से उन्नति होने की थी, वो नहीं हुई और आप गलतफहमी में फँस गये। इसलिये किसी भी मिथ्या चीज़ पर आप यह न सोचें कि हम कोई बड़े भारी सहजयोगी हो गये या कुछ हो गये। जब आप बहुत बड़े हो जाते हैं तो आप झुक जाते हैं, आप झुक जाते हैं। देखिये, इन तीन पेड़ों की ओर, हवा उल्टी तरफ बह रही है। वास्तव में तो पेड़ों को इस तरफ झुक जाना चाहिये जबकि हवा इस तरफ बह रही है। लेकिन पेड़ किस तरफ झुके जा रहे हैं? आप लोगों ने कभी मार्क (mark) किया है कि सारे पेड़ों की दिशा उधर है। क्यों? वहाँ से तो हवा आकर के उसको धकेले जा रही है फिर तो भी पेड़ उसी तरफ क्यों झुक रहे हैं? और अगर ये हवा न चले तो न जाने और कितने ये लोग झुक जायें। क्योंकि ये जानते हैं कि सबको देने वाला ‘वो’ है । उसके प्रति नतमस्तक होकर के वो झुक रहे हैं और ‘वो’ देने वाला जो है, वो है ‘धर्म’ । हमारे अन्दर जो धर्म है जब वो पूरी तरह से जागृत होगा, पूरी तरह से कार्यान्वित होगा, तभी हमारे अन्दर के श्रीफल इतने मीठे, सुन्दर और पौष्टिक होंगे। फिर तो आपके जीवन से ही संसार आपको जानेगा और किसी चीज़ से नहीं जानेगा, आप लोग कैसे हैं। अब चौदह बार आप इसका जन्मदिन, इस सहस्रार को मना रहे हैं। और न जाने कितने साल और इसको मनाएंगे । लेकिन जो भी आपने इस सहस्रार तक जन्मदिन मनाया उसी के साथ-साथ आपका भी सहस्त्रार खुल रहा है और बढ़ रहा है। कोई भी तरह का समझौता करना, कोई भी तरह की बातों में अपने को ढ़ील दे देना, सहजयोगियों को शोभा नहीं देता। जो आदमी सहजयोगी हैं वो वीरस्वपूर्ण अपना मार्ग आगे बढ़ाना चाहिये। कितनी भी रुकावटें आयें, घर वाले हैं, family वाले हैं, ये हैं, वो हैं, तमाशे हैं, इनका कोई मतलब नहीं। ये सब आपके हो चुके हज़ार बार। इस जन्म में आपको पाने का है और आपके पाने से और लोग पा गये तो उनका धन्य है, उनका भाग्य है। नहीं पा गये तो क्या आप क्या उनको अपने हाथ से पकड़कर ऊपर ले जाओगे? यह तो ऐसे हो गया कि आप समुद्र में जायें और अपने पैर में बड़े-बड़े पत्थर जोड़ लें और कहें कि ‘समुद्र, देखो, मुझे तो तैराकर ले जाओ|’ समुद्र कहेगा कि ‘भई! ये पत्थर तो छोड़ो पहले पैर के, नहीं तो कैसे ले जाऊँगा मैं?’ पैर में बड़े-बड़े आपने लोढ़ बाँध दिये तो उनको कटवा ही देना अच्छा है और नहीं कटवा सकते तो कम-से-कम ये करो कि उनसे परे रहो । इस तरह की चीज़े जो-जो आपने पैर में बाँध रखी हैं, उसे एकदम तोड़-ताड़ कर ऊपर उठ जाओ। कहना , ‘जाइये, आपको जो करना है करिये लेकिन हम से कोई मतलब नहीं क्योंकि और ऐसे ही कितनी बाधायें हैं और यह फालतू की बाधायें लगा लेने से कोई फायदा नहीं। जिस तरह से ये पेड़ देखिये, इतना भारी फल उसको उठा लेते हैं-ऊपर। कितना भारी होता है यह फल, इसके अन्दर पानी होता है। इस फल को उसने ऊपर उठाया है। इसी प्रकार आपको भी इस सर को उठाना है। और इस सर को उठाते वक्त

ये याद रखना चाहिए कि सर को नतमस्तक होना चाहिये, समुद्र की ओर। समुद्र जो है, ये धर्म का लक्षण है। इसको धर्म की ओर नतमस्तक होना चाहिए। बहुत से सहजयोगी यह समझते ही नहीं हैं कि जब तक हम ‘धर्म’ में पूरी तरह नहीं उतरते, हम सहजयोगी हो ही नहीं सकते। हर तरह की गलतियाँ करते रहते हैं। जैसे बहुत से लोग हैं, तम्बाकू खाते हैं, सिगरेट पीते हैं, शराब पीते हैं, ये सब करते रहते हैं और फिर कहते हैं ‘हमारी सहजयोग में प्रगति नहीं हुई। ‘ तो होगी कैसे ? आप अपने ही पीछे हाथ धो करके लगे हैं। सहजयोग के छोटे-छोटे नियम हैं, बहुत साधे हैं-इसके लिये आपको शक्ति मिली है वो पूरी तरह से आप अपने आचरण में व्यवहार में लायें। और सबसे बड़ी चीज़ जो इनके (पेड़ों के) झुकाव में हैं वो नतमस्तक होना, और उस कुछ प्रेम को अपने अन्दर से दर्शित करना। जो कुछ आपने परमात्मा से पाया, उस प्रेम को परमात्मा को समर्पित करते हुए याद रखना चाहिए कि सबके प्रति प्रेम हो। अन्त में यही कहना चाहिये कि जिस मस्तिष्क में, जिस सहस्रार में प्रेम नहीं हो, वहाँ हमारा वास नहीं है। सिर्फ दिमाग में प्रेम ही की बात आनी चाहिए कि प्रेम के लक्षण में क्या करना है। गहराई से सोचें, तो मैं फिर वही कह रही हूँ कि दिल को कैसे हम प्रेम में ला सकते हैं। यही सोचना चाहिये कि क्या ये मैं प्रेम में कर रहा हूँ? ये क्या प्रेम में बात हो रही है? सारी चीज़ मैं प्रेम में कर रही हूँ। ये सब कुछ बोलना मेरा, करना-धरना क्या प्रेम में हो रहा है? किसी को मार-पीट भी सके हैं आप प्रेम में। इसमें हर्ज नहीं। अगर झूठ बात हो तो मार सकते हैं-कोई हर्ज नहीं। लेकिन यह क्या प्रेम में हो रहा है ? देवीजी ने इतने राक्षसों को मारा, वो भी प्रेम में ही मारा। उन से भी प्रेम किया, उससे वो ज़्यादा नहीं, और भी राक्षस के महाराक्षस न बन जायें और अपने भक्तों को प्रेम की वजह से, उनको बचाने के लिये, उनको मारा। उस अनन्त शक्ति में भी प्रेम का ही भाव है जिससे उनका हित हो वही प्रेम है। तो क्या आप इस तरह का प्रेम कर रहे हैं कि जिससे उनका हित हो? यह सोचना है। और अगर कर रहे हैं तो आपने वो चीज़ पा ली जो मैं कह रही थी कि सामंजस्य आना चाहिए। तो वो सामंजस्य आपके अन्दर आ गया। एक ही शक्ति है जिसे हम कह सकते हैं ‘प्रेम’ और प्रेम ही से सब आकारित होने से सब चीज़़ सुन्दर, सुडौल और व्यवस्थित हो सकती है। जो सिर्फ शुष्क विचार है उसमें कोई अर्थ नहीं। और शुष्क विचार तो आप जानते ही हैं, वो सिर्फ अहंकार से आता है और जो मन से आने वाली चीज़ज़ है वो दूसरी-ऊपर से ज़रूरी उसको खूबसूरती ला देती है लेकिन अन्दर से खोखली है। इसलिय एक चीज़ गन्दी होती है लेकिन शुष्क होती है, दूसरी चीज़ सुन्दर होती है लेकिन नीरस होती है, पूर्णतया खोखली होती है। एक नीरस है, तो दूसरी खोखली। दोनों चीज़ों का सामंजस्य इस तरह से बैठ ही नहीं सकता क्योंकि एक दूसरे के विरोध में है । लेकिन आत्मसाक्षात्कार के बाद में, सहजयोग में आने के बाद में सारे विरोध छूटकर के जो चीज़ विरोधात्मक लगती है, वो ऐसा लगता है कि वो एक ही चीज़ के दो अंग है। और यह आपके अन्दर हो जाना चाहिये । जिस दिन ये चीज़ घटित होगी, तब हमें मानना पड़ेगा कि हमने अपने सहस्रार का १४ वाँ जन्मदिन पूरी तरह से मनाया। परमात्मा आप सबको सुखी रखे और इस शुभ अवसर पर हमारी ओर से और सारे देवताओं की ओर से परमात्मा की ओर से आप सबको अनन्त आशीर्वाद !