Guru Purnima Seminar Part 2: Assume your position

Lodge Hill Centre, Pulborough (England)

1983-07-23 Guru Purnima Talk: Assume your position, Lodge Hill, UK, DP, 67' Download subtitles: EN,FI,FR,HU,PT,RU,SK,ZH-HANSView subtitles:
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                                      ऋतुम्भरा प्रज्ञा – भाग II

 लॉज हिल (यूके), गुरु पूर्णिमा सेमिनार, 23 जुलाई, 1983।

सहज योगी गाते हैं |

भय काय तया प्रभु ज्याचा रे  (x4)

जब हम भगवान से संबंधित हैं, तो डरने की क्या बात है?

सर्व विसरली प्रभुमय झाली  (x2)

हम दिव्यता में सब कुछ भूल जाते हैं

पूर्ण जयाची वाचा रे (x2)

और हम परमात्मा में पूरी तरह खो जाते हैं

भय काय तया प्रभु ज्याचा रे (x4)

जब हम भगवान से संबंधित हैं, तो डरने की क्या बात है?

जगत विचरे उपकारास्त्व (x2)

जो दुनिया की भलाई के लिए विचरण करते हैं 

परी नच जो जगतचा रे (x2)

लेकिन वह दुनिया से संबंधित नहीं है क्योंकि वह पूरी तरह से अलग है

भय काय तया प्रभु ज्याचा रे (x4)

जब हम भगवान से संबंधित हैं तो डरने की क्या बात है?

इति निर्धन। परस्त्र ज्याचा  (x2)

आप बिना किसी बाहरी धन के हो सकते हैं:

सर्व धनाचा साचा रे  (x2)

धन का असली खजाना अपने अंदर है

भय काय तया प्रभु ज्याचा रे(x4)

जब हम भगवान से संबंधित हैं, तो डरने की क्या बात है?

आधि व्याधि मरणावरती (x2)

सभी रोग और मरण जैसी समस्याएं पूरी तरह से भंग हो जाती हैं

पाय अशा पुरुषाचे  (x2)

ऐसे व्यक्ति के पैर इन सब से ऊपर रहते हैं

भय काय तया प्रभु ज्याचा रे (x4)

जब हम ईश्वर से संबंधित हैं, तो डरने की क्या बात है?

आपका बहुत बहुत धन्यवाद!

कोई मेरा अनुवाद करेगा?

योगिनी: नहीं। हम चाहेंगे कि आप इसका अनुवाद हमारे लिए करें, कृपया!

श्री माताजी: गीत हमारे एक संबंधी ने लिखा था । वह ईसाई धर्म में परिवर्तित थे, लेकिन एक आत्मसाक्षात्कारी थे। और वह कभी भी धर्मांतरण की व्यवस्था से तालमेल नहीं कर सके थे और ना ही जिस तरह से हिंदुओं का आपस में, जाति व्यवस्था के साथ, और वैसा सब कुछ व्यवहार था। और उन्होंने बहुत अच्छा लिखा है, कुछ बहुत अच्छे भजन, मुझे कहना चाहिए। यह उन में से एक भजन है।

गीत कुछ ऐसा है वास्तव में जिसे मैं हमेशा अपने बचपन में बहुत गाती थी। और गीत का विषय कुछ इस प्रकार है: वह जिसे ईश्वर मिला है, या जो ईश्वर के स्वामित्व में है, उसे कोई भय क्यों होना चाहिए? जो चलता जाता है या जो आगे बढ़ता है, – मुझे नहीं पता कि ‘व्यापक यात्रा’ के लिए अंग्रेजी शब्द क्या है – वह जो बहुत घूमता है, ईश्वर के लिए और दूसरों की भलाई के लिए, लेकिन वह इस दुनिया से लिप्त नहीं है, ऐसे व्यक्ति को कोई डर नहीं है। वह इस सब से ऊपर खड़ा है … यह भाषा, मराठी भाषा को आप देखते हैं, वह बहुत ही गहन भाषा है, मुझे कहना चाहिए, और जब आप एक शब्द कहते हैं तो यह कई कोनों को छूती है। यह इस तरह है: “आधि व्याधि मरणावरती ,पाय अशा पुरुषाचे  ।” इसका अर्थ है: इस क्षमता का एक व्यक्ति इन सब बातों से ऊपर खड़ा है, उसका पैर बीमारी, मानसिक समस्याओं और मृत्यु के ऊपर है।

लेकिन जब आप कहते हैं कि इस तरह के व्यक्ति के पैर ऊपर हैं, तो इसका भी अर्थ है, आप देखिए, इसका अर्थ है, कि उसके पैर के प्रभाव से, वह इस पर विजय पा सकता है। देखिये,यह एक द्वि अर्थी भाषा है जैसे ऐसे व्यक्ति का पैर इन तीनों चीजों से भी ऊपर होता है, वह है बीमारी, मानसिक समस्याएं और मृत्यु। पैर उसके ऊपर है। इसका मतलब है कि ऐसा व्यक्ति इनसे ऊपर है। इस प्रकार, यदि आपके पास इस क्षमता वाला कोई व्यक्ति है और उसका पैर बीमार, या मानसिक रूप से परेशान लोगों या मृतकों को छूता है – तो ऐसा व्यक्ति उन्हें ऊंचा उठा सकता है, उन्हें इससे बाहर निकाल सकता है। इसका दोहरा अर्थ है।

तो पूरी विषय-वस्तु इस तरह से काम करती है: कि जो व्यक्ति ईश्वाराधीन है, जो भगवान से एकाकार है, उसे डर नहीं होना चाहिए, निराश नहीं होना चाहिए।

आज मुझे इसकी बहुत आवश्यकता थी क्योंकि एक तरफ, निश्चित रूप से, इतने सहज योगियों, वास्तविक सहज योगियों, ना कि, कृत्रिम शिष्यों या नाटक बाज़, बल्कि बहुत उच्च क्षमता के वास्तविक सहज योगियों को देखने का आनंद है। और कुछ लोग जो परिधि पर खड़े हैं, इतने लंबे समय से परिधि पर हैं, कि कभी-कभी यह देखना मेरे लिए डरावना है कि वे नष्ट हो जाएंगे।

ऐसे समय, आपको इस तरह के एक गीत की आवश्यकता होती है और बचपन में जब भी मुझे वास्तव में हताश महसूस होता था तो मैं इस गीत को गाती थी। यह बहुत ही मार्मिक गीत है। ठीक है? लेकिन शब्द से शब्द अनुवाद मैं नहीं कर सकी।  मुझे लगता है, मैं एक उचित मूड में नहीं हूं।

इसने मुझे बहुत छुआ। यह ऋतुंभरा प्रज्ञा है। आज, मुझे इसकी बहुत आवश्यकता थी।

इसलिए आज सुबह मैं आपको इस नई जागरूकता के बारे में बता रही थी  – प्रज्ञा। ‘ज्ञा’ का अर्थ है ज्ञान और ‘प्र’ का अर्थ है जागृत ज्ञान; जो ध्यान से प्रकट होता है, ध्यान का अवलम्ब, और फिर समाधि। यह उसी का प्रभाव है। यह एक प्रकार से फल का पकना है। जब यह पकता है, तो आपको स्वाद मिलता है, चरित्र की मिठास और फिर आप चारों ओर देखना शुरू करते हैं कि प्रकृति, परमात्मा, आपके साथ कैसे खेल रही है।

इस अवस्था को प्राप्त करना होगा। प्रत्येक सहज योगी के लिए, यह महत्वपूर्ण है कि वे इस अवस्था को अवश्य प्राप्त करें क्योंकि जहाँ तक और जब तक कम से कम आप इस चरण को हासिल नहीं कर लेते, तब भी आप एक खतरनाक क्षेत्र में रहेंगे, जैसा कि मैंने आपको बताया था, यह मुझे बहुत परेशान करता है।

इसलिए हर किसी को उस अवस्था तक पहुँचने का निश्चय करना चाहिए जहाँ आप हर दिन, भगवान का आशीर्वाद प्रकट होते हुए देखें। इसका मतलब है कि आपने परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर लिया है। यह ईश्वर का राज्य है जिसमें आपकी देखभाल की जाती है सरंक्षण और मार्गदर्शन किया जाता है तथा, भौतिक, मानसिक , वित्तीय, रिश्ते तथा, अन्य कई चीजों के साथ ही प्राकृतिक अभिव्यक्ति जिसके द्वारा आप सूर्य, चंद्रमा, तारे, आकाश और सभी पांच तत्व को आपकी सहायता करते हुए देखते हैं,  आपको उचित ढंग से स्वर्गीय आनंद के स्थान पर ले जाया जाता है।

यह अवस्था आप सभी को अवश्य प्राप्त करना होगी, आप सभी को। फिर से यही शब्द को ‘आप सभी को’ प्राप्त करना चाहिए और केवल तभी उत्थान कार्यान्वित होता है।

अब, इस अवस्था को कैसे प्राप्त किया जाए? एक सामान्य प्रश्न है।

अब, पहली बात, जैसा कि आज मैंने आपको बताया, कि आप दुनिया के सभी साधकों की तुलना में बेहद भाग्यशाली लोग हैं, जो हुए, जो होंगे और जो हैं। क्योंकि ऐसी बहुत सी चीजें हैं, जिनका उपयोग साधकों ने उबरने के लिए किया है, आपको इससे उबरना नहीं है। उदाहरण के लिए वे ईश्वर के किसी नाम पर ध्यान लगाते थे और चित्त उस नाम को दोहराते हुए, उस ईश्वर से प्रार्थना करने या उस ईश्वर और उस सब के बारे में सोचने पर जाता था। लेकिन पूरी बात यांत्रिक होगी, और हमेशा वे किसी प्रकार की एक निम्न प्रकार की तथाकथित सिद्धि में उतर जाएंगे । मतलब वे ग्रसित हो जाते थे। वे लोग जो माना कि, राम का नाम लेना शुरू करते हैं, आपने उनमें से बहुतों को देखा है। वे उछलना-कूदना शुरू करते हैं, और वे अजीब तरीके से व्यवहार करना शुरू कर देते हैं। तो, चित्त एकाग्र होने के बजाय, बहुत अस्त-व्यस्त , और एक अजीब चित्त, डगमगाता-सा हो जाता है। और जब वे लड़खड़ा जाते और एक तरह की बायीं बाजू की पकड़ या भावना उनके भीतर आ जाती, और वे इसका भी आनंद लेते रहते, जैसे एक शराबी आनंद लेता है। तब ऐसे लोग रोते -धोते थे, अपने रोने का आनंद लेते थे, उनके रोने से दूसरों को परेशान करते थे और उनके पास उस पर काबू पाने की शक्ति नहीं होती थी। वे इतना ग्रसित हो जाते थे।

फिर एक और तरह के जो महत्वाकांक्षी लोग थे – जैसे कि हमारे पास कई वैज्ञानिक हैं, और इस तरह के लोग, महत्वाकांक्षी लोग – वे आत्म –मुग्ध हो जाते हैं। खुद को महान समझ कर, सबसे बेवकूफी भरा व्यवहार करना और वे बाधित भी हो जाते । और आप हिटलर, और ऐसे सभी प्रकार के लोगों को देख सकते हैं। आज भी इनमें से बहुत से लोग, जो दुनिया पर राज कर रहे हैं – लोकतंत्र में हों या कहें, साम्यवाद, या किसी भी अन्य तरह से – उनमें से ज्यादातर वास्तव में निरंकुश तानाशाह  हैं और यही आज की दुर्व्यवस्था अन्धव्यवस्था है। और एक विषय -वस्तु जैसे राष्ट्रवादी-भावना या वैसा ही कुछ जो वे विकसित करेंगे, और लोगों के दायीं बाजु की तरफ अधिक झुकाव  right-sidedness का अनुचित लाभ उठाने और उन्हें युद्ध और सभी प्रकार की विनाशकारी चीजों में शामिल करने का प्रयास करेंगे।

इस तरह का चित्त उन लोगों के लिए संभव है जो सोचते हैं कि वे बहुत महान हैं, जैसे, हिंदू, ईसाई – ज्यादातर वे लड़ाकू लोग हैं – मुसलमान। आजकल मुसलमान सभी युद्धरत हैं, कल्पना करें, आपस में, इसका सबसे अच्छा हिस्सा है। और ईसाई सभी आपस में युद्धरत हैं। और हिंदू आपस में युद्ध कर रहे हैं। जैसे केवल दो राष्ट्र हैं जहां हिंदू बहुमत है, एक नेपाल है, और एक भारत है, और हर समय वे झगड़ रहे हैं। किसी प्रकार के झगड़े की कुछ खबर सुने बिना एक दिन भी नहीं गुजरता। चूँकि हिंदु तलवारों का उपयोग नहीं करेंगे। लेकिन एक बहुत ही ठंडे खून का झगड़ा चल रहा है। तो यह स्थिति है। फिर से भगवान के नाम पर, मैं कहती हूं, क्योंकि वे बहुत अलग स्तर पर शुरू हुए थे, और उनका ध्यान बाएं या दाएं जाता है और वे उन सिद्धियों को विकसित करते हैं।

तो हमें क्या करना है? सबसे पहले, भगवान की कृपा से, जैसा कि मैंने आपको बताया, आप सभी आत्मसाक्षात्कारी हैं और यह कि आपका उत्थान मध्य में हुआ है, बेशक, जो कि एक बहुत ही कठिन बात है, बिल्कुल कठिन है। लेकिन आपको मध्य में रहना सीखना चाहिए। लेकिन चित्त मध्य में कैसे रखा जाए यह कई लोगों के लिए समस्या है जो अभी भी खुद से ऊपर नहीं उठे हैं।

अब जब आप ध्यान करते हैं, तो निरंतर तरीके से ध्यान करने की कोशिश करें। सबसे पहले इसे बनाए रखें। तब आप पाते हैं कि आप समाधि की स्थिति में पहुँच रहे हैं: एक ऐसी अवस्था में जहाँ आप आनंद और ईश्वर के आशीर्वाद की शांति महसूस करना शुरू करते हैं। और फिर आप कहना शुरू करते हैं, “हे भगवान, क्या आशीर्वाद है! क्या आशीर्वाद है! और कितना आशीर्वाद है! ” एक बार जब आप उस स्थिति में पहुंच गए तो आपको महसूस करना होगा कि “मैं कौन हूं? तुम कौन हो, क्या हो

आप आत्मा हैं।

आत्मा पर अपना निरंतर चित्त स्थापित करने के बाद, आप एक ऐसी स्थिति विकसित करेंगे, जहां आप आनंद के साक्षी बनेंगे। अब जो लोग यहां हैं, वे एक तरह से खुद को बहुत आसानी से आंक सकते हैं। जिन लोगों ने सबसे अच्छे कमरे पाने की कोशिश की, उन्होंने समय से दस दिन पहले बुकिंग करवाई होगी, फिर एक अच्छा कमरा पाने के लिए ऐसा किया होगा। जो लोग सबसे अच्छा भोजन करना चाहते हैं, या सबसे अच्छा समय [जो] एक स्थिति है – मन में। ईमानदारी से खुद का सामना करें। सहज योग एक ईमानदार प्रयास है। खुद के लिए सबसे अच्छी निजता। आप सभी को अपना सामना करना चाहिए। फिर पति, पत्नी, वे खुद के लिए निजता चाहते हैं। यह समय पति, पत्नी के साथ रहने या आपके लिए जोर-शोर से बात करने और मौज-मस्ती करने का समय नहीं है। नहीं, यह एक ध्यान का समय है जिसके लिए आप आए हैं । मेरे हिसाब से यह बहुत कम समय अवधि  है, क्योंकि लोग अपने ध्यान की स्थिति पाने के लिए हजारों और हजारों दिन लगाते हैं। लेकिन इस तेज़ भागते जीवन में आपको इसे स्थापित करने की तीव्र इच्छा होनी चाहिए, इसलिए ध्यान की मनोस्थिति में आएँ।

कुछ लोगों को लगता है कि वे एक बढ़िया छुट्टी मनाने के लिए आए हैं और यहाँ कोई समुद्र नहीं है, इसलिए, वे तैराकी कैसे करेंगे – इस तरह की मनोदशा।

जो लोग इतने गरीब नहीं हैं, वे अधिक आराम पाने की इच्छा कर रहे होंगे, “मुझे भोजन नहीं मिल सका!” “मुझे यह मिलना चाहिए!” “मेरे बच्चे को सर्वश्रेष्ठ मिलना चाहिए,” या “मेरे पति को”, या “मेरी पत्नी को।” “मेरे।”

एक रात अगर आप लड़के-लड़के एक साथ और महिलायें एक साथ सो जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर छोटे बच्चे हो, तो दूसरी बात है। लेकिन पति, पत्नी को इस समय एक साथ सोने की कोई ज़रूरत नहीं है, जब आप सभी एक ही कमरे में ध्यान कर रहे हों। आप यहां एक बहुत ही खास उद्देश्य के लिए आए हैं। आपने इसके लिए भुगतान किया है! (हंसते हुए) तो ध्यान की स्थिति में रहे।

मैंने पाया की, हर कोई जोर-जोर से बातें कर रहा था। मैंने उन्हें उस ध्यान के मूड में नहीं पाया। हर कोई सोच रहा था कि,  वे यहाँ बहुत आनंद ले रहे हैं! “अच्छा अच्छा!” ये सभी विचार पुराने तरीके हैं।

 मुझे कहना होगा, आवश्यक है की भीतर और बाहर मौन को स्थापित किया जाना चाहिए। बेशक,  भारतीय ऐसे हैं, वे यह सब जानते हैं इसलिए मैं भारतीयों के गुणों के बारे में नहीं कहूंगी, लेकिन ऑस्ट्रेलिया। ऑस्ट्रेलिया, मैं इन सभी आश्रमों में रही। और सिडनी में हम पचास से साठ लोग वहाँ रहते थे। जब तक मैं वहां रही तब तक मैंने कभी भी एक आवाज या पैर की आवाजाही की आवाज़ भी नहीं सुनी। और मैं एक या दो दिन के लिए वहां नहीं थी, मैं लगभग दस, पंद्रह दिनों के लिए वहां थी। कोई हलचल भी नहीं और रोते बच्चे भी नहीं – कुछ नहीं! मैंने कभी आवाज नहीं सुनी।

आपके चित्त को नियंत्रित करने का यह भी एक तरीका था कि, मेरी उपस्थिति में, आप क्या बोलते हैं? आपका क्या कहना है? आपको इसका प्रोटोकॉल वाला हिस्सा पता होना चाहिए। तुम किससे बात कर रहे हो]? आप मजाक नहीं बना सकते आप मजाक नहीं कर सकते। मैं तुम्हारे साथ मजाक कर सकती हूं। आप कभी-कभी मुस्कुरा सकते हैं, ठीक है, या कभी-कभी हंस सकते हैं, लेकिन यह भी एक गुरुत्व के साथ किया जाना है – आप किससे बात कर रहे हैं। मैं आप सभी से यह बात कर रही हूँ, क्योंकि केवल यही सब तालमेल, यही सब व्यवहार आपकी मदद करने वाला है। मेरी कोई मदद नहीं होने वाली है । मुझे नहीं बचाया जा रहा है, मैं अपने बोध को प्राप्त नहीं करने जा रही हूँ। यह आप ही हैं, जिन्हें मुझसे कुछ हासिल करना है, इसलिए अपना चित्त उस पर केंद्रित करने की कोशिश करें।

मैंने ऐसे लोगों को देखा है जो कभी-कभी मेरे साथ रहते हैं। कभी-कभी मैं जानबूझ कर यह जानने के लिए उन्हें बुलाती हूं कि समस्या क्या है। उनमें से कुछ,  जो मेरे साथ रहते हैं,  मैं पाती हूँ कि,  सूक्ष्म और सूक्ष्मतर ,सूक्ष्मतम और गहरे हो जाते हैं। और दूसरी तरफ उनमें से कुछ फायदा उठाना  शुरू कर देते हैं, सुविधा लेते हैं, फिर इस तरह का एक जीवन अपना लेते हैं जो कि इतना दुनियावी, इतना मूर्खतापूर्ण होता है कि, मैं समझ नहीं पाती हूँ

तो आपके दिल में यह जागरूकता होनी चाहिए कि मौका बहुत महत्वपूर्ण है। आप यहां बहुत महत्वपूर्ण मौके पर आए हैं। और जब आप मेरे साथ होते हैं, उस महत्वपूर्ण मौके का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। ऐतिहासिक रूप से यह सबसे महत्वपूर्ण अवसर है, और शब्द के वास्तविक अर्थों में इसका पूर्ण लाभ उठाएं। कुछ लोग सोचते हैं कि अगर उन्हें मुझसे कुछ पैसे मिल सकते हैं तो यह एक बड़ा फायदा है। ठीक है, आप इसे ले सकते हैं! कुछ लोग सोचते हैं कि अगर वे मेरा कुछ समय पा जाएँ, तो वे बहुत लाभ में हैं। ठीक है, आप यह कर सकते हैं! या कुछ लोगों को लगता है कि अगर वे मेरा फायदा उठा सकते हैं, एक तरह की अहंकार तुष्टि महसूस कर सकते हैं या ऐसा ही कुछ और, “मैं एक बड़ा ओहदेदार हूं,” और ऐसी ही कोई चीज, आप जानते हैं – ठीक है। लेकिन जो समझदार होते हैं वे सबसे अच्छा फायदा उठाते हैं और सबसे अच्छा फायदा आंतरिक उत्थान है।

तो पहली जागरूकता यह होनी चाहिए कि आप ऐसे भाग्यशाली लोग हैं कि आप किसी भी अन्य व्यक्ति से आगे खड़े हैं जिसका सभी केंद्रों पर, सभी शक्तियों पर नियंत्रण है, या कहें, जो सर्वशक्तिशाली है। इसका कितना फायदा आपने उठाया है, यही महत्वपूर्ण बात है। 

अब ज्यादातर जहां मैं रहती हूं, वे दो स्थान हैं, हम कह सकते हैं, इंग्लैंड और भारत में, और जो विरोधाभास मुझे लगता है कि [अंग्रेजी] और भारतीय चीज़ों के बीच है: भारत में जितना अधिक मैं रुकती हूं, वे अधिक प्रोटोकॉल पालन करने वाले बन जाते हैं क्योंकि उनके पास पुराना पारंपरिक प्रशिक्षण है। लेकिन इंग्लैंड में मैं पाती हूं, लोग फायदा उठाना, मजाक बनाना, मजाक उड़ाना शुरू कर देते हैं। आप नहीं कर सकते! आप देखते हैं, यह प्रसन्न करना अलग है, लेकिन यह किसी के साथ इतना तुच्छ और उथला होना बिलकुल ही अलग बात है। उदाहरण के लिए, अगर कोई टिन-बोर्ड है और आप इसे नियाग्रा प्रपात के समक्ष ले जाते हैं, तो टिन-बोर्ड का क्या होगा? यह उस की थोड़ी सी भी बौछार को सहन करने में सक्षम नहीं होगा।

इसलिए, ऋतुम्भरा प्रज्ञा के बावजूद, जैसा की आज सूरज, कल यह सोचकर, अवश्य आप  परेशान हो गए होंगे कि, “अब हम यहाँ आ गए हैं, हमें टेंट और पानी में रहना होगा। बारिश हो रही है ”, मुझे पता है आप में से कई लोग परेशान रहे होंगे। लेकिन जो उस अवस्था को प्राप्त कर चुका है, वह परेशान नहीं होगा, “क्या है? अगर मुझे बारिश के साथ जीना है तो कोई बात नहीं! मैं यहां एक विशेष उद्देश्य के लिए हूं। जब तक मैं उस उद्देश्य को प्राप्त कर रहा हूं, अन्य कुछ भी मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता है: कोई भी मुझे असुविधा होती है, ये जो सभी चीजें मेरे साथ होती रहे। मुझे तो वह उद्देश्य हासिल करना है। ”

आप में से कुछ लोग मुझे इतने करीब से नहीं देख सकते। आप में से कुछ अभी भी सक्षम नहीं हैं, कोई बात नहीं है। “जो सबसे महत्वपूर्ण है वह यह है कि मुझे वह अवस्था हासिल करना चाहिए।  उसके लिए ही मैं यहां आया हूं। न मज़े के लिए, न खाने के लिए, न आराम के लिए। किसी चीज के लिए नहीं, बल्कि एक विशेष अवस्था जिसमे मैं गुरु बन जाता हूं,  उसको प्राप्त करने के लिए आया हूँ। उसके लिए मेरी क्या तैयारी है? ”

हमें बेहद सावधान रहना होगा, क्योंकि दिव्य का चित्त सीधे आपको उत्थान नहीं दे रहा है। यह एक संतुलन है। आप हर समय एक संतुलन में हैं, याद रखें। और आपको बेहद सावधान रहना होगा कि आप उस संतुलन के साथ कहाँ तक जाते हैं। तो अब, आप कैसे विकसित होते हैं?

(किसी ने माँ के चेहरे से सूरज को हटाने के लिए पर्दा बंद करने का प्रयास किया)

यह ठीक है, सूर्य के बारे में, चिंता मत करो, मुझे यह पसंद है। मैंने आज सुबह ही उसे बुलाया था।

तो आप इस चित्त को कैसे प्रबंधित करते हैं? अब देखते हैं कि चित्त की कौन-कौन सी अवस्थाएँ है।

या तो आपका चित्त एक धूर्त चित्त होगा। आप जो कुछ भी देखते हैं, आप एक शातिर कोण से देखते हैं। कई लोग ऐसा एक अहं-उन्मुख समाज में विकसित करते हैं। और इसके अलावा, अगर आप शातिर भूतों से ग्रसित हैं, तो भगवान ही आपको बचाएं और दूसरों को बचाएं हैं। जैसे शातिर चित्त इस प्रकार का होगा कि आप जो कुछ भी देखते हैं, आप सोचने लगते हैं, “इससे मैं क्या फायदा उठा सकता हूँ? मैं कितना पैसा बचा सकता हूं? ”, आप देखें। ऐसा बहुत, बहुत शीघ्र होता है। “यह इस तरह से सस्ता होगा।” “अगर मैं इस रास्ते से जाता हूं तो मैं कुछ समय बचा सकता हूं।” पाउंड बचाओ, समय बचाओ, सब कुछ बचाओ और अपने स्व को समाप्त कर लो।

तो बस बचत के लिए आप करे जा रहे हो। जब आप पैसे बचाने की कोशिश करते हैं तो चित्त शातिर हो जाता है। यहां बचाओ, वहां बचाओ, अपनी गणना के साथ। लेकिन अगर आप अनायास पैसे बचाने की कोशिश करते हैं … तो वास्तव में कुछ भी करने की कोशिश नहीं करनी होती है, बस ऐसा होता है कि आप बचाते हैं। लेकिन शातिर चित्त हर समय चीजों के बारे में स्मार्ट होने की कोशिश करता है।यह बहस करता है तर्क देता है, यह स्पष्टीकरण देता है।

इन दिनों यह इतनी सस्ती, सस्ती, सस्ती, सस्ती, सस्ती, सस्ती बात है कि आप वास्तव में पागल हो जाते हैं। जैसे मेरे पास अमेरिका जाने का टिकट था। मैंने कहा, “मुझे एक महंगा टिकट, प्रथम श्रेणी मत दो, क्योंकि मैं एक सस्ते टिकट से जाऊंगी”। इसलिए उन्होंने मुझे इस तरह का टिकट दिया कि मैं कभी भी कम से कम एक साल के लिए लंदन वापस नहीं आ पाती ! और मैं उस अमेरिकी अंग्रेजी में कहीं खो गयी [बन गया] होती! तो यह इतना [उन्होंने काम किया था – यह उस में, उस में। उस तरह का भयानक चित्त बेकार है! रहने दो! भूल जाओ ! उस बचत के कारण, मैंने किसी को भी अमीर होते नहीं देखा।

जैसे अगर मैं जा कर और कुछ पेंट खरीदना चाहुँ । तो हम कुछ पेंट खरीदते हैं। तब वे सोचते हैं, “ठीक है, अगर हम इसे लाते हैं, तो हम इसे कैसे वापस कर सकते हैं? हमें क्या करना होगा?” यह, वह, बकवास! हर समय मन उस स्तर पर होता है।

मैं आपको एक उदाहरण देती हूं, एक अन्य दिन हमें ग्लास को पेंट करने के लिए कुछ पेंट मिला। इसका सूक्ष्म पक्ष देखें। आप देखते हैं, स्थूल में भी एक सूक्ष्म संकेत होता है। और पेंट लाया गया था। और फिर, इसकी कोई विशेष कीमत भी नहीं थी, 80p या कुछ (£ 0.80)। मेरा मतलब है कि मैं इतना पैसा खर्च करना बर्दाश्त कर सकती हूं, इसलिए मैंने खरीदा है। यदि आप सहन नहीं कर सके ना खरीदें !

तो उन्होंने कहा, “अब हमें लौटाने जाना चाहिए” मैंने कहा, “लेकिन क्यों? अब इसे बाहर निकाल लिया गया है, अब जा कर लौटाना ! आप वहां जाने के लिए इतना पेट्रोल क्यों खर्च करते हैं? यदि आप इसकी गणना भी करें तो यह बैवकूफी हैं, और आप कितना समय बर्बाद कर रहे हैं।” “नहीं, लेकिन माँ, आप देखिये, अंततः हम 2 पी बचाते हैं!” मैंने कहा, “ठीक है, अब मैं बहुत सारे पैसे बचाऊंगी और मैं आपको दिखाऊंगी कि कैसे।” मैंने उस पेंट को ले लिया और कई चीजों को चित्रित किया जो कांच की तरह दिखती थी या जो पत्थर की तरह होती थी और सभी चीज़े बहुत सुंदर लगने लगी थी।

तो जो मन विनाशकारी है, वह केवल जोड़-घटाव \गणना करता है। यदि आपके पास ऐसा कोई मन है, तो आप स्वयं को जानिये कि,  आपको इस तरह की गणना से छुटकारा पाना है। सस्ते, सस्ते, सस्ते, सस्ते, सस्ते, सस्ती चीजों बातों से आपको बस छुटकारा पाना चाहिए ।मध्य में रहें।  निश्चित रूप से आपको, अति-भोगवादी नहीं होना चाहिए, लेकिन आपको हर समय इस तरह के जोड़-घटाव की गणना के लिए भी, नहीं होना चाहिए, क्योंकि आप अपना महत्वपूर्ण जागृत चित्त बर्बाद कर रहे हैं, जो इस दुनिया में बहुत कम लोगों के पास है। आपको पता होना चाहिए कि आप आत्मसाक्षात्कारी हैं, आप साधारण सांसारिक प्रकार के लोग नहीं हैं। आप विशेष लोग हैं और आप बेकार के पैसे, ‘p’ और इस और उस पर अपना चित्त व्यर्थ  करने में नहीं हैं। आगे बढ़ने दो! क्या होता है, देखते हैं! आप जानते हैं की मैं कभी गणना नहीं करती, लेकिन मैं बहुत कम खर्च में रहती हूं, और आप भी ऐसा कर सकते हैं।

यह चित्त, शातिर चित्त, भी एक बहुत उधम मचाते चित्त है। यहाँ यह पैसा बचाना शुरू करता है और फिर शाम होते ही इसे शराब पीने को चाहिए। तो पी, पी, पी, पी, की सारी बचत पीने के गटर में चली जाती है।  ऐसे व्यक्तित्व का कुल योग क्या है? बस पाप है।

इसलिए इस मानसिकता को नियंत्रित करना होगा। विशेष रूप से अहं-उन्मुख लोग बहुत जोड़-घटाव अत्यंत गणना वाले होते है – सबसे आश्चर्य की बात यह है। लेकिन भारतीय, जो लोग बहुत गणना नहीं करते हैं, वे इतने अमीर नहीं हैं। वे बहुत उदार हैं। उनके पास  सहज योग के लिए हमेशा पैसा होता है। मुझे उनके साथ पैसों की समस्या कभी नहीं हुई, कभी नहीं, क्योंकि वे इतनी गणना नहीं करते हैं। उनका तरीका है, दूसरों के लिए खर्च करना |अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए। दूसरों के लिए खर्च करना। अगर उन्हें हमारे घर आना है, “ठीक है, अपना दिल खोलो।

यह अब खर्च करने का समय है! ” शराब पीने और आत्म-भोग के लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए कुछ करने की संतुष्टि का। यह उनका अभ्यास और परंपरा है। तो इस संबंध में, आपको उस परंपरा को अपनाना होगा, “ओह, वे आए हैं। चलो, अब खर्च करते हैं। हम क्या कर सकते हैं?” यह मुख्य बात है जिसे किसी को समझना चाहिए, वे जो ज्यादातर आत्म लिप्त हैं वे बेहद कंजूस लोग हैं।

तो जो चित्त शातिर है वह सबसे खराब चित्त है क्योंकि चालाकी खुद को भी धोखा देती है। यह आपके साथ भी शातिर है। और आपको लगता है, “ओह, मैं काफी स्मार्ट रहा हूं। मैंने 2 पी बचा लिया है! ” लेकिन आपने अपनी आत्मा खो दी है! अब आप सहज योगी नहीं हैं।

मैं आपको एक उदाहरण दूंगी मैंने किसी से कहा कि, “वैन को वहीं रख दो। रेलगाडी से जाएं। यह वैन एक भयानक वैन लगती है! ” और दोनों उँगलियों को इस तरह हिला-हिला कर, मुझे देने के लिए बहुत स्पष्टीकरण था। और मैं मुझ पर आ रहे हमलों से इतनी तंग आ गयी कि मैंने कहा ‘जैसा ठीक लगे करें’। और चीज़ असफल हुई ! और बात बिगड़ गई या जो भी है। अब यह वैन बिगड़ी पड़ी है इसलिए उन्हें वही करना पड़ा जो मैं उन्हें बता रही थी। बिना बहस के, अगर उन्होंने मेरी बात सुनी होती तो ठीक होता।

इसलिए आपका चित्त भौतिक चीजों और सांसारिक चीजों और सभी चीजों को बचाने पर नहीं होना चाहिए बल्कि खुद के चित्त की रक्षा की जानी चाहिए। एक प्रश्न पूछें, “मेरा चित्त कहाँ है?” मैंने कार्यक्रमों में देखा है कि कुछ लोग लगन से मेरी बात सुन रहे हैं लेकिन कुछ लोग नहीं कर सकते। कुछ थोड़ी देर के लिए केंद्रित होते हैं, और अन्य कुछ लोग थोड़े ही समय के बाद उदासीन हो जाते हैं। कुछ इधर देख रहे हैं, कुछ उधर देख रहे हैं। तो कितना आपने चित्त को बचाया है वही सहज योगी को एकमात्र परवाह होना चाहिए। दूसरों के बारे में भूल जाओ, वे सभी कचरा साफ़ करने वाले हैं! उन अन्य लोगों के बारे में भूल जाओ जो इच्छुक ही नहीं हैं, जो आपकी गुणवत्ता के नहीं हैं, लेकिन आप एक गुणवत्ता हैं।

अब आपको क्या बचाना है? उदाहरण के लिए यदि कोई राजा है। वह 2p को बचाने की परवाह नहीं करता है। भई, मैं नहीं जानती, इन दिनों, मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकती हूँ! वे आज के राजा भी उस तरह का काम कर रहे हों तो, आप जानते हैं, लेकिन वह किस बात की फ़िक्र करते हैं ? उनकी शान और गरिमा को बचाने की।

लेकिन सहज योगी के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपको अपने चित्त की रक्षा करना चाहिए। इसे चित्त निरोध कहा जाता है। निरोध। यह आपके चित्त की रक्षा है। “ये कहां जा रहा है? यह मेरे लिए इतनी अति मूल्यवान चीज है। यह कहाँ भाग रहा है? ”

फिर आप अपना चित्त कैसे बचाते हैं? एकाग्रता के माध्यम से होता है। एकाग्र! एकाग्रता की कोशिश करें। अपना चित्त को डगमगाने न दें। धीरे-धीरे आप एकाग्रता विकसित करेंगे। आप मेरी तस्वीर देख सकते हैं – यह सबसे अच्छा है। एकाग्र हों | इसे अपने दिल में लाओ। इसे अपने दिल में एकीकृत होने दें। आप भाग्यशाली लोग हैं, आपको एक तस्वीर बनाने की आवश्यकता नहीं है, और फिर इसे छोड़ देना क्योंकि यह सिर्फ एक अवलंबन है, इसका मतलब है कि यह सिर्फ एक निर्भरता है, और फिर आप इसे हटा देते हैं। मेरी तस्वीर यह आपके लिए पूरी तरह से निर्भरता है और मेरे लिए, पूर्ण आनंद का एक भार है।

इसलिए जब आप सहज योग में एकाग्र हो रहे हैं, पूरी तरह से सहज योग में, तो आप एक तरह से अपने चित्त की रक्षा कर रहे हैं, उसे नियंत्रित कर रहे हैं। यह एक प्रकार के लोग हैं।

 फिर एक अन्य प्रकार का चित्त  जिसे हम कहते हैं, वे लोग हैं जो बहुत नकारात्मक रवैया अपनाते हैं। पहले प्रकार के पॉजिटिव हैं, तथाकथित हैं, तथाकथित पॉजिटिव हैं, जो पैसा बचा रहे हैं, जो सब कुछ बेकार है उसे बचा रहे हैं।

अब दूसरा प्रकार सभी आपदा, दुख, दुर्घटना के आर्कबिशप हैं। इस प्रकार का चित्त। अगर आप रोज सुबह अखबार पढ़ते हैं तो आपका चित्त उसी तरह का हो जाएगा। सभी अखबारों के लोगों का ध्यान उस तरह का है, जो यह पता लगाता है कि आपदा कहां है। मेरा मतलब है, एक मनहूस तरीके से, वे वहाँ एक आपदा होने पर ख़ुशी महसूस करते हैं। मैंने लोगों को देखा, “ओह माँ, मैं सेमिनार में आया था, लेकिन देखिये,  समस्या यह है कि, पानी नहीं था!” चित्त भीतर और बाहर आपदाओं को खोजने में है। “क्या हुआ?”, “वहाँ एक आपदा है”! “क्या हुआ”? “मैंने एक पिन खो दिया है।” इस तरह के बेवकूफी भरे विचार रखना बेतुका है। वे रोएंगे -धोएँगे और सभी को दुखी करेंगे, “ओह, मैं बहुत दुखी हूं।” “क्या?”, “मेरे पति मुझसे बात नहीं करते।” या “मेरा बच्चा मेरे साथ नहीं है।” जहां तक ​​उनके रिश्तों का सवाल है, ऐसे लोग बेहद खुद से ही लिप्त होते हैं। वे हर किसी को ऐसा बनाते हैं, “ओह, उस व्यक्ति ने मुझसे अच्छी तरह से बात नहीं की और वह ऐसा और वैसा था।” वे मामूली छु लेने भर से आहत महसूस करते हैं और इस तरह करके उन्हें लगता है की वे चीज़ों की नहीं तो कम से कम अपनी भावनाओं की रक्षा कर रहे हैं |

ऐसे लोग किसी से बात करने के लिए बहुत भयभीत लोग होते हैं, और कोई भी अच्छी बात भी कहता है तो भी उन्हें डर लगता है – ऐसे वे हाव-भाव बनाते हैं। कारण यह है कि वे नहीं जानते कि उन्हें जो बचाना है, वह उनकी भावनाएं नहीं हैं। अपनी भावनाओं को बचाने की कोई आवश्यकता नहीं है, आप सुरक्षित हैं! अगर कोई आपसे कुछ कहे भी तो क्या फर्क पड़ता है? आप उससे ऊपर हैं। आपको कोई छू नहीं सकता है! आप अपनी भावनाओं को बचाने के लिए हर समय अपना चित्त बर्बाद कर रहे हैं।

किसी से डरने की कोई बात नहीं है। क्योंकि कोई कुछ कठोर शब्द कहने जा रहा है, इसीलिए आप कुछ करना नहीं चाहते हैं! ऐसे तथाकथित समझौतावादी लोगों ने सहज योग नहीं समझा है। सहज योग में कोई समझौता नहीं है, यह हीरे की तरह है। हीरा सदैव हीरा रहेगा, आप चाहे जो करो ,यह हमेशा-हमेशा के लिए है|  यह ऐसा ही है |

तो व्यक्ति को यह समझना होगा कि चित्त को एक शराबी के जैसी तुष्टि में नहीं जाने दिया जाना चाहिए, कि, वे सबसे दुखी लोग हैं, इसलिए शराबी हैं – बस कल्पना करें। वे हमेशा रोते बिलखते रहेंगे, और लोग सोचते होंगे कि वे बहुत दुखी हैं। तो उस समय आपको अपने चित्त को इस तरह की आपके भय की बेकार अभिव्यक्ति की आत्म तुष्टि से बचाना है।

अब देखें, आज उन्होंने गाना गाया। गीत ने मुझे भर दिया, कुछ ऐसे भावों को पूरी तरह से सामने लाया, जो इस समय अनायास नहीं निकलेंगे। लेकिन सबसे बड़ा काम जो इसने किया कि मुझे यह याद दिलाया कि, “आप परमात्मा हैं। आप निराश होने के लिए नहीं हैं। आपको उन सभी की देखभाल करनी है, और आप शक्तिशाली हैं! आप अपने आप पर संदेह करने या निराश महसूस करने की हिम्मत कैसे करती हैं!  एक दर्पण की तरह यह बात इतनी अधिक प्रतिबिंबित करने वाली है, – मैं अपना आइना देखती हूं। उसी तरह, आपको अपनी भावनात्मक समझ भी होनी चाहिए। और भावनाएं आपका दर्पण होनी चाहिए, आपको खुद को अपनी भावनाओं में देखना चाहिए: आप कैसे व्यवहार करते हैं, आप कैसे व्यवहार करते हैं, आप कैसे बात करते हैं।

तो, ऐसे लोगों को हमेशा दर्पण रखना चाहिए और ऊंचा उठा हुआ महसूस करना चाहिए। आप सहज योगी हैं! और दर्पण में , प्रतिबिंब में, आपको मुझे देखना चाहिए और खुद को नहीं।

कभी-कभी जब मैं सहज योगियों के साथ बहुत निराश हो जाती हूं, तो मैं दर्पण के सामने खड़ी हो जाती हूं और कहती हूं, “अब, चलो! तुम ही वह हो जिसके पास सारी शक्तियां हैं, जिसके सभी चक्र जागृत हैं। किसी भी अवतार के पास यह नहीं था। आप ही हैं जिसने इस दुनिया को बनाया है और आप ही हैं जिसे इसे बचाना है। तो अब उठो! ” हिम्मत नहीं हारना, चिंता नहीं करना।

भावनात्मक बातों में  केवल मुझे कभी-कभी लगता है कि – अब मुझे उनमें से कुछ को छोड़ देना होगा, पूरी तरह से, [और] वे मेरे बच्चे हैं। एक माँ के रूप में, एक गुरु के रूप में नहीं! एक गुरु के लिए कोई समस्या नहीं है! और फिर सरगर्मी अपने भीतर आती है कि, “नहीं, भले ही मुझे उन्हें छोड़ देना पड़े, कोई बात नहीं। बिलकुल,मुझे उनका उत्थान करना होगा, और उस शक्ति से यह काम करता है।

तो प्रतिबिंब मेरा होना चाहिए, उसका जो आपके सामने आदर्श हो। उसका जो आपको ऊर्जा देता है – इस गीत की तरह – और ना की एक दुखी व्यक्ति का प्रतिबिंब :ईसा- मसीह जो आपके सामने खड़ा है सिस्टिन चैपल की तरह और ना की कोई    दुखी कंकाल  है जो आपसे भी बदतर है!

इसलिए अपनी माँ की उन छवियों को बनाएं जिन्हें आपको अपनी भावनाओं में देख कर उत्थान करना चाहिए! यह दूसरे प्रकार का चित्त है जिसे आपको नियंत्रित करना है।

तीसरा एक बहुत ही भयावह, मूर्ख व्यक्ति है। मूर्ख व्यक्ति दूसरे प्रकार से आता है, जहां व्यक्ति भावनात्मक रूप से भोगवादी होता है। यह तीसरे का ‘a’ है और तीसरे का ‘ बी ’ प्रकार पहले प्रकार से आता है, जो बेवकूफ है। इसलिए हमारे पास दो तरह के लोग हैं, एक है मुर्ख दूसरा बेवकूफ। लेकिन भारतीय भाषा में केवल एक ही शब्द है, विशेष रूप से मराठी में –  मुर्ख ’है। उनके लिए, दोनों श्रेणियां समान हैं, जैसे कि गोला  एक ही बिंदु पर मिलता है। मेरा मतलब है, अंग्रेजी भाषा कुछ मायनों में अच्छी है, कम से कम यह मूर्खों के बीच अंतर करता है: जैसे वे बेवकूफ हो सकते हैं या वे मूर्ख हो सकते हैं, आप देखते हैं। मानस के बारे में यहाँ इतना भ्रमित होने के कारण ऐसा है कि मनोवैज्ञानिक सामने लाए हैं: कुछ सिज़ोफ्रेनिक हैं, कुछ मूर्ख हैं, कुछ बैवकुफ हैं, कुछ गधे हैं! (हँसी)

तो यह, तीसरा प्रकार सबसे बुरा है – मेरे लिए सबसे अधिक निराशाजनक है! वे मुझ पर जोंक की तरह चिपके रहेंगे, वे हर समय बेवकूफ़ बातें कहते रहेंगे। बस एक बेवकूफ सहन नहीं हो सकता, क्या ऐसा नहीं है? वे किसी व्यक्ति को बोर कर सकते हैं। मेरा मतलब है कि सभी इस तरह के लोगों को एक साथ मिलाकर ‘ मुर्ख ‘कहा जाता है। इसलिए मैं इसका विश्लेषण नहीं करना चाहती। यह बहुत अधिक है

तो, उस तरह का चित्त यदि आपके पास है, तो आप बेहतर है कि,चुप रहें! बात मत करो! बस दूसरों की बात सुनें कि वे क्या बोलते हैं, क्या कहते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जो सिर्फ अप्रासंगिक बातें करते-करते, बात करते ही जाएंगे। बेकार में उनकी ऊर्जा बर्बाद कर रहे हैं। और ऐसे लोग हमेशा चालाक के दोस्त होते हैं। चालाक और इस तरह के लोग हाथ में हाथ डाले चलते हैं, क्योंकि चालाक किसी को बेवकूफ बनाना चाहता है, और मूर्ख चाहता है कि वह बेवकूफ बने। देखिये, जैसे राजा के पास एक भांड होगा, इस तरह ये संयोजन कार्यान्वित होते हैं। तो ऐसे लोगों के लिए सबसे अच्छी बात है चुप रहें। उनका सारा चित्त, उनकी सारी ऊर्जाएं सिर्फ सफाई के लिए सुरक्षित रखें।

यदि आप स्वयं के चित्त को बचाने का प्रयास करते हैं तो यह सारी मुर्खता बहुत जल्द ही समाप्त हो जाएगी। बात मत करो! ऐसी बातें न कहें जो मूर्खतापूर्ण हैं, जो बैवकुफाना हैं, बस चुप रहें और दूसरों को देखें। कभी-कभी ऐसे लोग भगवान की शक्ति के बहुत बड़े वाहक बन सकते हैं लेकिन केवल तभी जब वे बैवकुफी और मूर्खता नहीं करते हैं।

ये लोगों के प्रकार है: तीन प्रकार मैं कहूंगी।

लेकिन चौथा प्रकार वे लोग हैं जो एकाग्रता का जीवन जीते हैं। मेरा मतलब है कि  उदाहरण के लिए एक व्यक्ति जो कार्यालय में बहुत मेहनत कर रहा है, एक उल्लेखनीय रूप से बहुत ही सफल व्यक्ति है, और वह ऐसा है और वह वैसा, और वह, और यह भी है, बहुत एकाग्र है। एकाग्र मन से, कहीं भी, बहुत अच्छा काम करने वाला व्यक्ति एकाग्र होता है। एक गृहिणी जो अपने पति और बच्चों की देखभाल करती है बहुत एकाग्र होती है, और एक पति अपने परिवार और उसकी चीजों की बहुत एकाग्रता से देखरेख करता है। वे अच्छी तरह से पेंट करना जानते हैं, वे जानते हैं कि चीजों को कैसे करना है, और उनके हाथ निपुण होते हैं, और वे सब कुछ जानते हैं। लेकिन ऐसे लोग कठोर\अटका हुआ चित्त रख सकते हैं; बहुत ठोस, प्लास्टिक की तरह, या आप इसे रबड़ की तरह कह सकते हैं। इस पर और सुधार कर के कहने के लिए, ज्यादा-से ज्यादा,  हम कह सकते हैं, कुछ ऐसी चीजें जो मैंने देखी हैं, जिन्हें आप वाटर-प्रूफिंग के लिए उपयोग करते हैं, आप देखते हैं, आप बस इसे उपयोग करते हैं और कुछ समय बाद यह इसमें ठस जाता हैं। इसी तरह वे बिलकुल इससे बाहर नहीं निकल सकते वे बस नहीं कर सकते वे कुछ भी आनंद नहीं ले सकते जहाँ तक और जब तक आप उन्हें एक फ़ाइल नहीं दिखाएंगे, तब तक आप उनसे बात नहीं कर सकते। आप देखें, अगर आपको ऐसे व्यक्ति से बात करनी है तो बेहतर है कि आप के सामने पहले एक फ़ाइल ले लें, और शुरू करने से पहले आप फ़ाइल को अपने सामने रखें। यदि यह केवल फ़ाइल पर है, तो ही वे देखेंगे, लेकिन यदि आप बात करते हैं, तो वे कहते हैं, “एक फ़ाइल बनाओ!” बहुत ही ठस, और वे जीवन का आनंद नहीं ले सकते। कोई लचीलापन नहीं है, वे रचनात्मक नहीं हो सकते। वे केवल अपनी ही शैली में रचनात्मक हो सकते हैं, लेकिन वे आनंद के रचयिता नहीं हो सकते ।

वहाँ इस तरह की एकाग्रता है, एकाग्र प्रयास लोग करते हैं। जैसे लोग कट्टरपंथी होते हैं। वे अपने प्रयास में बहुत एकाग्र हैं, अत्यंत। इसी तरह ये सब धर्म फैले हैं जैसे ईसाई धर्म, इस्लाम, हिंदू धर्म और ये सभी, चूँकि उनके पास कट्टरता का एकाग्र  प्रयास था – केंद्रित प्रयास। यदि आप बाइबल में पॉल के पत्रों को पढ़ते हैं, तो आप इसकी एकाग्रता देखेंगे: “तुम वहां जाओ और तुम वहां जाओ और एक चर्च की स्थापना करो और ऐसा करो,” और “तुमने क्या किया है?” बहुत संगठित। बहुत व्यवस्थित! मशीन पर चलते बेल्ट की तरह। और उन पर हर समय उस गति के बाद के वे प्रभाव हैं। चार्ली चैपलिन ने अपनी फिल्म ‘मॉडर्न टाइम्स’ में [यह] दिखाया है। मुझे बहुत मज़ा आता था, कि वह एक बेल्ट बाँधता था, देखिये, लगभग एक घंटे तक खड़े रहते थे, और फिर कुछ समय बाद जब वह काम से निकल जाता था, तो भी वह वैसे ही चलता चला जाता था! (हँसी) उस तरह का चित्त, जो केंद्रित है, का अर्थ है किसी चीज़ पर अटक जाना। यह वह नहीं है। यह कुशाग्र नहीं है। क्योंकि यदि  एकाग्रता से आपका चित्त सूक्ष्म,सूक्ष्मतर नहीं बनता है, तो यह कुशाग्र नहीं है, लेकिन यह अटक रहा है, और अटका हुआ चित्त सहज योग के किसी काम का नहीं  है। ऐसे तथाकथित ‘सफल’ लोगों को, मुझे नहीं लगता, शायद कभी भी बचाया नहीं जाएगा।  वे अपने सभी बैज, वगैरह सब कुछ के साथ जाएंगे, और भगवान कहेंगे, “सज्जनों वापस जाओ! आपको अभी तक सीमा शुल्क विभाग से अनुमति नहीं दी गई है। ”

एक संगठन और भी है, जो बहुत तेजी से, बहुत चुस्त तरीके से काम करता है, और एक बहुत ही खास दक्षता से। तो ऐसे लोग सिर्फ अटक जाने वाले लोग ही होंगे।

अब चौथे प्रकार के लोग हैं जो दत्त चित्त हैं। वे गहन, गहरे हैं। वे घुस जाते हैं, क्योंकि वे जीवंत मन हैं। उनके मन निर्जीव या ठस नहीं हैं। उनके पास जीवंत दिमाग है। वे व्याप्त हो जाते हैं। कभी-कभी मैं निरिक्षण करती हूं, मैं कुछ लोगों से पूछती हूं कि आप किसी विशेष व्यक्ति के बारे में क्या सोचते हैं? वे जिस तरह बात करते हैं उससे तुरंत मुझे पता चलता है। अगर वे सिर्फ सांसारिक तरीके की बाते बताते हैं, “वह एक अच्छा व्यक्ति है!” “वह एक बुरा व्यक्ति है,” यह बात, वह बात – तो मुझे पता चलता है कि वह कैसा है: बहुत सतही, उथला। लेकिन एक व्यक्ति जो उसके जागरण की संभावनाओं और क्षमताओं को, और जिन समस्याओं का एक व्यक्ति को सामना करना पड़ रहा है, देखता है तो मुझे पता चलता है कि वह ऐसा व्यक्ति  है जिसके पास उस विषय में कुशाग्रता है। और सहज योग के विषय में अधिकतम, अधिकतम, कुशाग्रता की आवश्यकता होती है।

क्योंकि अगर आप सहज योग को समझ गए हैं – मुझे नहीं पता कि आप समझ गए हैं या आप इसके बारे में जानते हैं या नहीं – लेकिन कुछ और नहीं अपितु अनुभव के माध्यम से ही सीखा जाता है! आपको अनुभव करना होगा और फिर उस पर विश्वास करना होगा। यह ऐसा नहीं है कि जो मैंने आपको बताया वह आपके दिमाग में एक संस्कार हो, ऐसा कुछ भी नहीं! आप स्वयं इसे अनुभव करते हैं और सीखते हैं।

लेकिन जिनके पास वह कुशाग्र बुद्धिमत्ता है, जिनके पास मर्मज्ञ प्रेम, भावनाएं हैं और वे जिनकी समझ की गतिशीलता भेद्नशील हैं, वे वही हैं जो अनुभव करते हैं, सीखते हैं, अनुभव करते हैं, सीखते हैं, अनुभव करते हैं, सीखते हैं।

वे अपने मन को स्वयं पर हावी नहीं होने देते, “नहीं, नहीं, नहीं। मेरा इस मन के पास अतीत से पाए हुए अनुभव है और वह उसी पर आधारित है। नहीं, मुझे हर दिन एक नया अनुभव लेना है। और उस अनुभव को मेरे भीतर शांत किया जाना चाहिए, मेरे भीतर स्थिर किया होना चाहिए, मेरे भीतर संस्कारित होना चाहिए। ”

सहज योग के अनुभव अच्छे संस्कार हैं, “ऐसा कैसे हो सकता है? मैंने इसे देखा है, मैंने इसका सामना किया है, मैंने इसे पाया है। यह कैसे हो सकता है?” लेकिन उसके लिए भी, सबसे अच्छे अनुभवों को पाने के लिए, पहली शर्त ऋतुम्भरा प्रज्ञा की होती है, जहाँ आपको उस स्तर का होना चाहिए कि आप वास्तव में उन अनुभवों को प्राप्त कर सकें, अन्यथा हर समय आप सिर्फ सांसारिक प्रकार के एक व्यक्ति होंगे। और मेरे साथ रह कर के भी, तुम्हारे पास वे अनुभव नहीं होंगे, तुम्हे उस शांति का अनुभव नहीं होगा, उस आनंद का-कुछ भी नहीं ।

तो यह पैंठ आपके ध्यान और ध्यान की निरंतरता से शुरू होती है और समाधि बीज अंकुरित होता है, जो आपके भीतर नए आयाम को प्रकट करता है।

 इस तरह का चित्त, किसी व्यक्ति को अपने ही चित्त की निगरानी करके विकसित करना होता है: चित्त निरोध। जिस तरह आप अपने पैसे की निगरानी करते हैं, जिस तरह आप ड्राइव करते समय सडक की चौकसी करते हैं, जिस तरह आप अपने बच्चे को बड़ा होता हुआ देखते हैं, जैसे आप अपनी पत्नी की सुंदरता देखते हैं, या अपने पति की परवाह करती हैं, तो इन सभी को एक साथ मिलाएंगे उतनी आप खुद की,  अपने चित्त की निगरानी करें कि, आपका चित, “यह कहाँ जा रहा है? यह कहां पिछड़ रहा है? मेरे चित्त को क्या हो रहा है? “

ऐसे लोगों को कोई समस्या नहीं होती है। आपको आश्चर्य होगा कि ऐसे लोग, जब वे कुछ भी करना चाहते हैं तो यह गतिशील हो जाता है। वे इसे कार्यान्वित कर सकते हैं। किसी को कोई परेशानी नहीं होती है। और अगर कोई समस्या है भी,  जिस का हर समय आप सामना कर रहे हैं, तो जान लें कि आपके साथ कुछ गड़बड़ है, यंत्र में ही कुछ गलत है। यदि आपके पास टिन कटर नहीं है और आप टिन काटने के लिए चाकू का उपयोग करना शुरू करते हैं [और] यह काम नहीं करता है, तो क्या आप ऐसा कहेंगे, “टिन के साथ कुछ गलत है!” या आपके ही साथ कुछ गड़बड़ है? नहीं न! यह तो उपकरण  instrument की ही खराबी या कमी है और उस उपकरण को सही करना है।

जब साधन ठीक है, तो आखिरकार, आपके पास निहित सभी शक्तियों के साथ, आपको उपलब्ध सभी आशीर्वाद के साथ, और इसके पीछे स्थित शक्ति का स्रोत, सब कुछ कार्यान्वित होना ही चाहिए। यह काम करना चाहिए। आपके पास चीज़ों  के हो जाने के कई अनुभव हैं। आपने अपनी आंखों के सामने कई चमत्कारों के अनुभव किए हैं लेकिन फिर भी चित्त उन अनुभवों के साथ स्थापित नहीं हुआ है। फिर भी गतानुभव, अर्थात पुराने अनुभव, जारी हैं। पुरानी पहचान जारी है। आप अभी भी उस के साथ जारी हैं और उस की गंदगी अभी भी आपके अस्तित्व पर है। सब कुछ बदलें। एक नए ताज़े व्यक्ति बनें।

आप एक फूल के रूप में और फिर एक पेड़ के रूप में खिल रहे हैं अपना पद और अपनी स्थिति ग्रहण कीजिये। सहज योगी के रूप में अपना स्थान ग्रहण कीजिये। इसलिए इस चित्त पर ध्यान देना होगा। आप खुद का आकलन करें  – आपका चित्त कहाँ है – और समझने की बात क्या है, समझ का पैमाना क्या है। यह बहुत सरल है: मुझे प्रसन्न करना होगा क्योंकि मैं चित्त हूं। अगर मैं प्रसन्न हूं मतलब तुमने ठीक से काम किया है। लेकिन मैं सांसारिक चीजों से खुश नहीं हो सकती, ना ही इसको ले कर किसी बहस से, अपितु केवल आपके उत्थान से। तो आप इस आधार पर अपना आकलन करें।

चाहे आप मुझे एक फूल दें, या कुछ भी मैं केवल तभी प्रसन्न होती हूं, जब उस काम का सार उतना ऊँचा होता है, उसकी विशेष अभिव्यक्ति होती है। आप कहते हैं, ” माँ, मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ ।” ठीक है। आप कहते हैं, लेकिन मुझे यह देखना होता है कि आप जो प्रेम कह रहे हैं, या कर रहे हैं, उसमे वह भाव है। इससे मुझे खुशी मिलती है।

यह हमारे बीच एक ऐसी परस्पर बात है, जिसकी आप कल्पना नहीं कर सकते। मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती और तुम मेरे बिना नहीं रह सकते। यह बहुत परस्पर  है। लेकिन एक तरफ से यह बिलकुल सौ फीसदी हितकारी है: चाहे मैं आपसे नाराज होऊं, चाहे मैं आपको डांटूं, चाहे मैं आपको लाड़ करूं, चाहे मैं कहूं, “ऐसा मत करो।” अगर मैं आपको बताऊं, तो “मेरे बहुत करीब मत आना। दूर रहो!” जो कुछ भी मैं ऐसा करती हूं, वह आपके लिए हितकर है। और मेरे लिए परोपकार केवल यही एक है, कि तुम्हें मुक्ति मिलनी चाहिए, कि तुम मुझसे कुछ हासिल कर लो, कि मेरे द्वारा तुम समृद्ध हो जाओ। जैसे कि धरती माता इन सुंदर हरे पेड़ों में अपनी अभिव्यक्ति को देख कर अति प्रसन्न महसूस करती है। यह वैसा ही है। वह कुछ भी नहीं है। हम उस पर खड़े होते हैं, हम उस पर चलते हैं। हम उसे कहाँ देखते हैं? लेकिन वह उनमें अपने आप को देखती है। यह उसी तरह की स्थिति है। वह वह है जो सभी मौसमों को बदल देती है।  ऋतुंभरा ‘का अर्थ है, वह, चित्त, जो ऋतुओं को बदल देता है। ‘ऋतु’ का अर्थ ऋतुओं से है। इसलिए सभी मौसम हमें खुश करने के लिए उसके द्वारा बनाए गए हैं। लेकिन हम उसे खुश करने के लिए क्या करते हैं? हम उसे खाली कर डालते हैं, उसे प्रताड़ित करते हैं, उससे सब कुछ निकालते हैं, उसे प्रदूषित करते हैं, सभी प्रकार की बेहूदी बातें करते हैं और फिर वह गुस्सा हो जाती है।

वही बात की जो वह प्रेम है। उसी प्यार में वह गुस्सा हो जाती है, और फिर आप देखते हैं ज्वालामुखी, और भूकंप और मनुष्य के साथ होने वाली अन्य सभी प्रकार की घटनाएं। लेकिन निश्चित रूप से आपकी माँ को गुस्सा आने में समय लगता है, लेकिन समय लगता है इसका तात्पर्य यह नहीं है कि आपको समय गुजार देना चाहिए। खुद की देखभाल करो ! यह बहुत ज़रूरी है। अचानक आप स्वयं को उन्नत पाएंगे। कुछ लोग बस खुद को उन्नत कर लेंगे और दूसरों को पूरी तरह से छोड़ दिया जाएगा। तो सावधान रहो! मैं तुम्हें चेतावनी दे रही हूं!

तो आज का दिन,   पंद्रहवें दिन का पिछला दिन है। और चौदहवें दिन, किसी व्यक्ति को वध कर्ता बनना पड़ता है:  जो अज्ञानता है,  वह सब जो मूर्खतापूर्ण, बेवकूफी है,  वह सब जो चालाकी है और वह सब भावुकता है, उसका हंता। कल आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए,  उस भाग का हनन करें और एक सहज योगी बनें ।

परमात्मा आपको आशिर्वादित करे !