Shri Krishna Puja

Los Angeles (United States)

1983-09-18 Krishna Puja Talk, Los Angeles, USA, DP-RAW, 31' Download subtitles: CS,EN,RO,SKView subtitles:
Download video (standard quality): Download video (full quality): View and download on Vimeo: View on Youku: Listen on Soundcloud: Transcribe/Translate oTranscribe

Feedback
Share

श्री कृष्णा पूजा, लॉस एंजल्स (संयुक्त राज्य अमरीका )

१८ सितम्बर , १९८३ 

पहली बार जब मैं संयुक्त राज्य अमरीका में आई, तो सबसे पहले लॉस एंजिल्स आई थी । क्योंकि, ये देवदूतों का स्थान है। वास्तव में, मैंने सोचा था कि बिलकुल  ये बहुत पवित्र स्थान होगा आने के लिए, सर्वप्रथम, इस महान संयुक्त राज्य अमरीका की भूमि में। 

अब जैसा कि आप जानते हैं कि संयुक्त राज्य अमरीका या सम्पूर्ण अमरीका विशुद्धि चक्र है। जिसमें से  इस विशुद्धि चक्र के, तीन पक्ष हैं। तो विशुद्ध चक्र का मध्य भाग संयुक्त राज्य है। विशुद्धि चक्र का मध्य भाग श्री कृष्ण द्वारा शासित है। और उनकी शक्ति राधा है। “रा – धा”। “रा”का अर्थ है शक्ति, “धा” वह जिसने शक्ति को धारण किया है। “रा – धा”। ” धा – रे – ती – सा”। तो वही हैं जिन्होंने शक्ति को धारण किया है, और इसलिए, उन्हें राधा कहा जाता है। वो श्री कृष्ण की शक्ति हैं।

कृष्ण शब्द आया है कृषि शब्द से – अर्थात – हल चलाना। या आप कह सकते हैं, खेती को “कृषि” कहते है। जो हल चलाता है और बीज को मिट्टी में रोपित करता है, वह कृषि करता है। और इसी लिए उन्हें कृष्ण कहा जाता है।

अब उन्होंने जो बीज बोया है , वो आध्यात्मिकता का बीज है  वो श्री कृष्ण हैं जिन्होंने संस्कृत में कहा था- “नैनं छिदंति शस्त्राणी, नैनं दहति पावकः, न चैनम् क्लेदयन्तियापो न शोशयति मारुतः। अर्थात – ऐसा नहीं हो सकता, अर्थात, आध्यात्मिक जीवन, या आप कह सकते है, अनादिकालीन जीवन, या आत्मा का हनन नहीं हो सकता, किसी भी चीज से, किसी भी  हथियार से, ना ही वायु से उड़ाया जा सकता है, न ही इसे विलीन किया जा सकता है, ना ही इसे नष्ट किया जा सकता है।

तो इसे सिद्ध करने के लिए, क्राइस्ट इस धरती पर आए थे। और उन्होनें अपने पुनरुत्थान से वो सिद्ध किया, जो कि श्री कृष्ण ने कहा। और आप में से अधिकतर सहज योगी क्राइस्ट और श्री कृष्ण के इस रिश्ते को जानते हैं- क्यों उन्हें क्राइस्ट कहा जाता था। क्राइस्ट शब्द भी उसी से आता है – कृषि से। और, उनका पहला नाम आया है शब्द, यशोदा  से। यशोदा को जेसु या येसू भी कहा जाता है। और इसलिए, (कृष) क्राइस्ट को जेसु या येसू भी कहा जाता था। कुछ लोग उन्हें येसु कहते हैं, और कुछ लोग उन्हें जेसु कहते  हैं, क्योंकि यशोदा मां, श्री कृष्ण को गोद लेने वाली माँ हैं।

और आप जानते हैं कि राधा ही महालक्ष्मी  हैं, तो वो ही क्राइस्ट कि माँ थीं, मैरी। इन सभी चीज़ों को हम सहज योग में सिद्ध कर सकते हैं। क्योंकि, जब कुंडलिनी विशुद्धि चक्र तक उठती है और अगर वहां रुक जाती है, तो आप ये सवाल पूछ सकते हैं – “क्या श्री कृष्ण माता मैरी के पुत्र थे – नहीं। क्या  ईसा मसीह, माता मैरी के पुत्र थे? क्या रा के पुत्र और राधा के पुत्र एक ही थे? और तब कुंडलिनी उठती है।

तो आज सहज योग एक ऐसी चीज है जो अब तक की कही गई बातों को सिद्ध करता है। ये सिद्ध करता है। ये कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। क्योंकि लोग इन सब बातों पर विश्वास ही नहीं करते। उन्हें लगता है कि ये सब काल्पनिक कहानी है। कौन थे क्राइस्ट? कौन थे कृष्ण? कौन थीं राधा?  आखिरकार, वहां भगवान तो थे ही नहीं।

लेकिन केवल सहज योग में, आज, हम प्रमाणित कर सकते हैं, कि हम जो कह रहे हैं वह सत्य है। क्योंकि, जैसे आत्मसाक्षात्कार के माध्यम से आप स्त्रोत से जुड़ते हैं। आपके  चैतन्य बहने लगते  हैं। कंप्यूटर की तरह आप काम करना शुरू कर देते हैं। और आप जो भी प्रश्न पूछते हैं, उसका उत्तर आपको अधिकाधिक चैतन्य के रूप में आता है, या वह रुक जाता है या आपको गर्मी मिलती है या आपके छाले पड़ सकते हैं। तो सारा संदेश आप तक पहुंचाया जाता है उंगलियों के सिरे के माध्यम से।

जैसा कि मोहम्मद साहब ने बहुत स्पष्ट कहा था, “कियामा के वक़्त, आपके हाथ बोलेंगे”। लेकिन मुसलमान लोग पुनरुत्थान के बारे में बिल्कुल भी बात नहीं करना चाहते। क्योंकि वो लोगों को प्रलयकाल से भयभीत करना चाहते हैं। वो पुनरुत्थान के समय के बारे में बात नहीं करना चाहते, जो कि आने वाला है, जो कि इसके बीच का समय है। क्योंकि वो इस समय को इस्तेमाल करना चाहते हैं, जिसमे लोगों को डराया जाए ये बोलकर कि “अब आपके प्रलय के दिन आ रहे है”! अब आपके प्रलय के दिन आ रहे है! तो सब परमात्मा  के मामले में डरे हुए है। और वो सोचते हैं कि अब तो उन्हें बस कयामत का इंतज़ार करना है , और इस के बीच में कुछ नहीं है।

तो इस तरह से विशुद्धि चक्र विशेष है। अब विशुद्धि चक्र बनाया गया था शनिवार को । तो, यह शनि – एक महत्वपूर्ण ग्रह है विशुद्धि चक्र का। इसलिए, जब भी शनि सबसे ऊपर होगा, अमरीका कार्यों को करने की बेहतर स्थिति में होगा। लेकिन, मुझे नहीं लगता कि वो अपने बारे में ज्यादा जानते हैं। वो नहीं जानते कि वो क्या हैं, वो इस धरती पर क्यों हैं, उनका क्या कार्य है, उनको क्या करना चाहिए, या परमात्मा का अमरीका को बनाने का  क्या उद्देश्य है  ।

हमारे भीतर विशुद्धि चक्र का पहला  कार्य ये था कि, जब हम मनुष्य बने, तो हमने अपने सरों को इस तरह ऊपर उठाया था। जब आप अपने सिर को इस तरह ऊपर उठाते हैं, तो आप एक  मनुष्य बन जाते हैं, इसका आशय है कि, अब आपकी चेतना में एक नयी गति आती है। अब आपकी चेतना में यह गति लगभग छह हज़ार वर्ष पहले शुरू हुई जब श्री कृष्ण इस धरती पर अवतरित हुए थे। ये नयी गति थी, कि ये पिता हैं। पिता का अवतरण मनाया गया था, और इस तरह लोगों के अंदर एक नए प्रकार के यंत्र का विकास हुआ, जिसे अहंकार कहा जाता है।

जब मस्तिष्क को इस तरह उठाया गया, देखिए, तो इसका विस्तार पिरामिड की तरह हुआ – यह पिरामिड है- यह एक पिरामिड बन गया। एक जानवर में, मस्तिष्क सपाट होता है। और, ये धीरे से उभरता है। जब सर उठाया गया था, जब सर को उठाए जाने की ज़िम्मेदारी ली गई थी, तो मस्तिष्क इस तरह से उभरने लगा था कि वह पिरामिड बन गया था। और जब ये एक पिरामिड बन गया, तो इसका चित्त जानवरों के चित्त से भिन्न तरह का बन गया। क्योंकि, जब आपकी चेतना की तरंगें पिरामिड के इर्द-गिर्द पड़ीं , तो समांतर-चतुर्भुज के बल में परिवर्तित हुईं, जिसकी वजह से परिणामी बल – अब इस तरह गिरा, इस तरह गया। परिणामी बल ऐसा था। उसके दो पक्ष थे – एक ऐसा था, दूसरा ऐसा था। इसलिए हम कह सकते हैं की चेतना या चित्त अंदर जाने के बजाए , बाहर जाने लगा!।

 परिणामस्वरुप बल का एक हिस्सा बाहर जा रहा था और इस तरह जब आप एक इंसान बन गए। तो आपका चित्त बाहर की ओर चला गया। केवल मनुष्य ही है, जिसका चित्त बाहर है। ऐसा नहीं है कि जानवर में नहीं होता, लेकिन मनुष्यों का ही चित्त ऐसा है जो प्रतिक्रियाएं पैदा करते है।

जैसे कि आप कुछ देखते है। अब उदाहरण के लिए, मैं डॉक्टर के घर को देखती हूं, तो मेरे मस्तिष्क में एक प्रतिक्रिया शुरू होती है – यह क्या है, इसका क्या मतलब है, ये इसमें कितनी लागत आयी होगी, इन्होंने कहाँ से खरीदा है! आप जो कुछ भी देखते है, वह आपको प्रतिक्रिया देना शुरू कर देता है। जानवरों को ऐसा नहीं होता। जानवर ज़्यादा से ज़्यादा ये कहेंगे – की ये मुझे खाना ही है, कि वो मुझे खाना ही है, मुझे वो चाहिये ही। लेकिन, वो इसके बारे में सोचते नहीं हैं।

केवल मनुष्य ही है जो चिंतन करते हैं। और यह चिंतन आता है क्योंकि, मस्तिष्क का पिरामिड जैसा आकार है। और मस्तिष्क में ही इसकी एक विशेष प्रतिक्रिया होती है, जिससे की हम स्वयं के अहंकार को विकसित करना शुरू कर देते है, स्वयं की मिथ्या,  स्वयं के मानसिक प्रक्षेपण। और जब हम स्वयं के मानसिक प्रक्षेपण को विकसित करते हैं, तो यह अहंकार विकसित होने लगता है – मुझे पता है – इसमें क्या गलत है, ये सभी निरर्थक बातें आती हैं। और जैसे ही इसका कार्यान्वयन होता है, अहंकार का गुब्बारा फूलने लगता है। और हमारे दूसरे गुब्बारे को दबाना शुरू कर देता है, जो की प्रतिअहंकार है, पशुओं के जैसे। और फिर, ये मध्य पर आता है। इस तरह अब हम सामान्य मनुष्य बन गए हैं। लेकिन फिर हम अपने अहंकार को बढ़ाना शुरू करते हैं तो यह प्रतिअहंकार को ढकना  शुरू कर देता है। और एक कठोर जमाव सा शुरू हो जाता है, जिसके द्वारा हम ‘मैं’ बोध को विकसित करते हैं।

तो बस यही सब घटित होता है हमारे शीर्ष उठाने के पश्चात, शीर्ष को उपर उठाने पर, और अब हम जानवरों की तरह नहीं रहे। तो, विशुद्ध चक्र की बहुत बड़ी भूमिका है मानव-विकास में। कि आपके विशुद्ध चक्र को विकसित करके आप  मनुष्य बने हैं, पहली बात। दूसरी बात, क्योंकि यह पिता का चक्र है, जो फिर से अनादि बन जाते है- जैसा कि आप मराठी में इसे बोलते हैं।।।।।।।ब्रह्माण्ड/ विराट विश्व ।

आप स्थूल ब्रह्माण्ड बन जाते हैं। आप सूक्ष्म हैं, और पिता विराट हैं। तो, आप विशुद्धि चक्र के कारण  ऐसे बनते हैं, जो कि श्री कृष्ण द्वारा शासित है, जो स्थूल जगत में विराट कहलाते हैं। मस्तिष्क में इस भाग में यह अभिव्यक्त होता है।  मस्तिष्क के इस हिस्से में, यही यहीं पर आप अपने स्थूल गुणों को प्रकट करना शुरू करते हैं – इस बिंदु पर।

अब, इस विशुद्धि चक्र की एक विशेषता है – वह है, की हम हमेशा कहते हैं – कि मेरे कन्धों पर उत्तरदायित्व है। हमेशा हम कहते हैं कि – उत्तरदायित्व मेरे कंधों पर हैं। कारण है विशुद्धि चक्र आपको उत्तरदायित्व की भावना देता है। और इसलिए, आप जानते है,  अमरीका के लोग पूरे विश्व के लिए उत्तरदायित्व की भावना रखते हैं। स्वाभाविक है! ऐसा बखूबी समझा जाता है, कि  वो पूरे विश्व के लिए उत्तरदायित्व महसूस करते हैं। लेकिन वो उत्तरदायी लोगों के रूप में अपनी भूमिका के बारे में कितने जागरूक हैं, ये एक अलग बात है। लेकिन वो महसूस करते हैं, वो  उत्तरदायी हैं, लेकिन उत्तरदायी लोगों के तौर पर उनकी ये भूमिका अगर वो समझते हैं तो उन्हें आदर्श बनना पड़ेगा। आदर्श।

क्योंकि एक व्यक्ति, जो एक परिवार का एक जिम्मेवार व्यक्ति है, उसे दूसरों के लिए आदर्श बनना पड़ता है। इसकी शुरुआत बहुत अच्छी थी, मैं कह सकती हूं, अब्राहम लिंकन के समय में। इसकी शुरुआत बहुत अच्छी हुई। जब आपने लोकतंत्र की बात शुरू की, तो ये भी – लोकतंत्र भी और कुछ नहीं सामूहिकता है। वो लोगों की सामूहिकता के बारे में बात करने लगे, लोगों का, लोगों के द्वारा। यह सब दर्शाता है कि सामूहिकता की भावना इस विशुद्धि चक्र में ठीक से आने लगी थी। लेकिन जो लोग मध्य में हैं, केवल वो ही सामान्य रह सकते हैं।  जो लोग बहुत ज़्यादा झुकते हैं, या जो बहुत अधिक पीछे झुकते हैं, दोनों ही समस्याओं से ग्रस्त होते हैं।

जो लोग दूसरों के आगे झुकते हैं, वो ऐसे लोग हैं जो अपना प्रति – अहंकार पकड़ते हैं। वो अति-विनम्र हो जाते हैं, जैसे विकासशील देश हैं। और जो लोग पीछे की ओर झुकते हैं, वो ऐसे लोग हैं जो दूसरों पर प्रभुत्व दिखाने की कोशिश करते हैं। जिन्हें अहंकार है। तो इस तरह, परमात्मा के आकस्मिक आशीर्वाद के कारण, उन्होंने बहुत सी चीजों की खोज की। अमरीका में अहंकार बहुत अधिक विकसित होने लगा।

लेकिन अहंकार एक गुब्बारे की तरह है, जैसा कि मैंने आपको बताया था। और, आपको हवा में तैराता रहता है। और जब आप हवा में होते हैं, तो आप निम्न श्रेणी व्यक्ति बन जाते हैं। आप किसी बंधन में नहीं हैं, लेकिन, इसका एक और  लाभ है। अगर आप जानते हैं कि आप हवा में तैर रहे हैं, तो आप एक संपूर्ण व्यापक दृष्टिकोण रख सकते हैं। सम्पूर्णता पर पूर्ण दृष्टि, यदि आपकी आँखें शुद्ध हैं और आपकी सोच स्पष्ट है।

अब एक और चीज़ जो उनके यहाँ आने से होती है, वह समस्या थी कि उन्हें लगा कि – हम एक बहुत नवीन राष्ट्र हैं। इसका एक  लाभ है, साथ ही एक नुकसान भी है।  लाभ ये है कि यदि आप नए हैं, तो यह बहुत अच्छा है। क्योंकि आप को बहुत आसानी से बेहतर में परिवर्तित किया जा सकता हैं। क्योंकि आपके मस्तिष्क में कुछ पूर्व-संस्कार नहीं है।

आप अत्यंत स्वच्छ हैं, बिल्कुल तत्पर हैं, कुछ बनने के लिए।  अन्यथा इस बात की भी संभावना है कि, आप इतने नए हैं कि आप सभी पुरानी वस्तुओं से विस्मित हो जाते हैं, जो कि सत्य है अमरीकियों के बारे में कि उन्होंने इंग्लैंड के सभी पुराने पुलों को खरीद लिया यहाँ आने के लिए। और पुरातन के लिए यहां लालसा अत्यधिक  है।

और वो, जैसे कि कुछ भी नया हो, वो सब  व्यर्थ है!  संभवतया, सहज योग भी उनके लिए निरर्थक है। क्योंकि उनके अनुसार, ये कुछ नया है। क्योंकि ये नवीन राष्ट्र हैं इसलिए उन्होंने सभी कुछ त्यागना शुरू कर दिया जो की नया है। एक व्यर्थ बात है।

अब, हमें यह कह सकते हैं कि सहज योग, जैसे आज है, सबसे प्राचीन चीज़ है। यह ब्रह्मांड के साथ शुरू हुआ और अब चरम बिंदु तक आ गया है, क्योंकि यह एक जीवंत प्रक्रिया है। जैसा कि आप पेड़ पर एक फूल देखते हैं, ये पहला नया फूल है। लेकिन फूल एक बीज से निकला है, जिसकी जड़ें हैं और फिर वह तना बन गया, फिर वह पत्ते बन गया, और फिर वो अब फूल बन गया है।  यद्यपि ये एक नया सा फूल  दिखता है, लेकिन इसकी एक बड़ी विरासत है। उसी तरह, सहज योग भी उतना ही प्राचीन है जितना कि ये ब्रह्मांड है।

लेकिन जिन लोगों में परम्परावाद के लिए इतनी ललक होती है,  वो ये मुश्किल से पता लगा पाते है कि असली परंपरा क्या है। केवल जो लोग जो पारंपरिक होते है वो ही पता लगा पाते हैं कि असली परंपरा क्या है।

पिछली बार मैं यहां अमरीका में आयी और मैं हैरान हुई कि एक सज्जन मेरा इंटरव्यू लेने आये थे। और जब वो बात कर रहे थे, तो  उन्होंने एक ऐसे सज्जन के बारे में पूछा जो भारतीय दृष्टिकोण से सबसे अधिक गैर-पारंपरिक था। उनका नाम रामकृष्ण परमहंस था।  उन्होंने एक महिला से शादी की और उसे बना लिया मां। मेरा मतलब है, ऐसा किसी ने भी नहीं किया है। राम ने नहीं किया है। कृष्ण ने नहीं किया है। यह एक व्यर्थ बात है। लेकिन उनके लिए, वह सबसे पारंपरिक व्यक्ति था। और उसने मुझसे कहा कि, माँ, आपका सहज योग पारंपरिक नहीं है, अगर आप रामकृष्ण को नहीं मानते।

पिछले पचास-साठ वर्षों में, सारे ऐसे नव-पारंपरिक लोग निकले हैं। एक और था इस पांडिचेरी का। एक और अर्थहीन परिस्थिति। वह एक महिला को माँ कहते थे, और उसके साथ उसका रिश्ता संदिग्ध है। आपको नहीं पता कि उनका क्या संबंध है। मेरा मतलब की ऐसा कुछ, भारतीय परंपरा में, एक असंभव परिस्थिति है।

आपको सभी के साथ स्पष्ट संबंध रखना चाहिए। आप अस्पष्टता  नहीं रख सकते। न एक मित्र , न एक पत्नी, न एक मां, या एक बहन। उस तरह की परिस्थिति बिल्कुल गैर पारंपरिक है। ऐसा कभी सोचा भी नहीं जाता।  मेरा तात्पर्य  आप भारतीय समझ सकते हैं कि ये संभव नहीं है। ये एक असंगत परिस्थिति है। लेकिन, कुछ लोगों के लिए, वो पारंपरिक है।

 अब लगभग साठ साल पहले क्या हुआ, मुझे लगता है, मेरे जन्म के समय के आसपास ही, नकारात्मकता ने एक नया रूप लेना प्रारम्भ किया , पाश्चात्य लोगों के भ्रम को समझते हुए। इसमें वो सभी पाश्चात्य हैं, अगर आप देखें तो। और इस पाश्चात्य भ्रम पर वो  हावी हो गए, स्वयं लाभान्वित होने के लिए । उन्होंने इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। और यहीं पर पाश्चात्य लोग उन्हें पहचानने में असफल रहे।

कुछ दिन पहले, यूंग सभागार में, मुझे यूंग अनुनायियों से सहज योग और यूंग की बात करनी थी। अब यूंग के बारे में, मुझे केवल तब पता चला जब उनकी मृत्यु हो गयी, क्योंकि उनके बारे में एक छोटा से लेख था। मैंने कभी मनोविज्ञान का अध्ययन नहीं किया है।  निस्संदेह, मैंने उन लोगों से बात करने के लिए कुछ शब्दावली सीखने की कोशिश की थी। कभी मुझे लगता था कि मुझे उनसे भी बात करनी पड़ सकती है। लेकिन ये यूंग अनुनायी लोग सब, बड़े बुद्धिजीवी और महान लोग, देखिए, मेरे सामने बैठे थे, करीब वो सौ लोग और यूंग समाज का अध्यक्ष। 

 मैंने ठीक इससे पहले एक किताब  पढ़ी थी, उसके आरम्भ  से पहले, और मैंने कुछ रेखाचित्र देखे थे जिसने मुझे सच में उलझन में डाल दिया। पहली धारणा जो उनकी थी, निश्चित रूप से, वो सब यूंग की मानसिक धारणा थी। मैं उन्हें दोषी नहीं ठहराती, क्योंकि उन्हें आत्मसाक्षात्कार मिला था पर उन्हें पता नहीं था कि कैसे इस के अनुकूल स्थिति बनाई गई, इस स्थिति की रूपरेखा क्या थी और उनकी गति अब तक एक साधक वाली थी, कि पता लगायें कि कैसे उन्हें आत्मसाक्षात्कार मिला।

और, सभी गतिविधियां पंक्तिरूप थीं। वो एक बिंदु से सभी ओर विस्तृत नहीं हो रहे थीं। इसलिए, ये उतना एकीकृत नहीं था।

अब, उन्होंने जो चीज दिखाई, वह यह थी कि निचले हिस्से में अचेतन था, जो कभी भी चेतना में नहीं आने वाला। उसके ऊपर प्रबुद्ध-अचेतन, जो सचेत हो सकता है। फिर, अवचेतन था और उसके ऊपर अहंकार था। मेरा मतलब है कि कैसी अव्यवस्थित व्याख्या थी।

मैंने उनसे कहा, देखिए, अब अचेतन शब्द ही भ्रामक है। अचेतन से आपका क्या तात्पर्य  है? जो भी आप अपने  मध्य नाड़ी केंद्र पर महसूस नहीं करते हैं वह अचेतन है – ठीक है? लेकिन इसका क्या तात्पर्य  है? हम अवचेतन को महसूस नहीं कर सकते हैं। फिर, अवचेतन भी अचेतन है। जो कुछ भी हम महसूस नहीं करते हैं – उदाहरण के लिए, कुछ ध्वनियां हैं कुछ विशेष आवृत्ति की जो हम बिल्कुल नहीं सुन सकते। हम उतना ही कुछ सुन पाते हैं जो मनुष्य द्वारा सहन करने योग्य होता है। ये आप सब वैज्ञानिक जानते हैं। हम सब कुछ नहीं सुनते।

तो, वो सब अचेतन है – इसका मतलब है कि ये एक मिलीजुली गठरी है। हर तरह की चीजें आपस में मिल गईं है। लेकिन परमात्मा अव्यवस्थित नहीं हैं। देखिए, वो एक सुलझे हुए व्यक्तित्व हैं। वो जानते हैं की वो क्या कर रहे हैं। । वो सबसे बड़े आयोजक है। फिर, वो आपको इस तरह की एक गठरी में कैसे डाल  सकते हैं  – कि अचेतन नीचे है, फिर उसके ऊपर है अचेतन, है जो सचेत हो जाएगा, और जिसके ऊपर सुप्त-चेतन है, जिस पर अहंकार है। तो आप नीचे जायेंगे, इन सब को अपने अंदर रखते हुए, और आप कहाँ जायेंगे ? अब, आप कैसे जायेंगे ?

तो पहली गलती ये थी कि एक के ऊपर एक परतें हैं – ऐसा नहीं है। उन्हें लंबवत रखा गया है। अहंकार दाहिने हाथ की ओर है और प्रतिअहंकार बाएं हाथ की तरफ। भविष्य दाएं हाथ की ओर और अतीत बाएं हाथ की ओर। तो बाएं हाथ की तरफ अव-चेतन और दाहिने हाथ की तरफ परा-चेतना। और मध्य मार्ग को मुक्त रखा है। अर्थात, किसी भी व्यवस्था में, मानिए कि आप हवाई अड्डे में जाते हैं, तो क्या आपके यहां ऐसा होता है कि आपको हवाई जहाज तक जाने के लिए दीवारों से गुजरना पड़ता है?

अगर हम इंसान ऐसी भयानक गलतियाँ नहीं करते हैं, तो परमात्मा ऐसी गलती कैसे कर सकते हैं ? इसलिए उस तरह से सोचना बिल्कुल गलत था। तो, मध्य मार्ग मध्य में है, जबकि दाईं ओर दायां और बाईं ओर बांया है। और आपको बिल्कुल अवश्यकता नहीं है अवचेतन में जाने की। 

क्योंकि उन्होंने उन सभी लोगों को उचित ठहराया है जो उनको सम्मोहित करते हैं, या वो कोशिश करते हैं उन्हें सम्मोहित करने की या उन्हें एक नए प्रकार का – एक प्रकार का अनुभव देते है – ये सब अचेतन था, ये हमें मानना चाहिए। यहां तक कि कुछ लोग अगर अचानक कूदने लगते हैं, तो वो कहते हैं – ओह, ये बढ़िया है।

 अतः जो संवेदनाएँ आपको अव-चेतन और जो परा-चेतन से प्राप्त होती हैं उसे कुछ विशेष मान लिया गया था।  यह आप सब का एक बुद्धिजीवी भ्रम था, मुझे कहना चाहिए। पूर्णतः। लेकिन ये इस तरह से नहीं है। आपका मार्ग बिलकुल सीधा है कुंडलिनी के लिए। बस बात ये है कि जो इसको उठाने वाले हैं, उनको आना होगा, बस इतना ही है। इसके अलावा, सब कुछ बिलकुल सही है। आपको उस भयानक अव-चेतन में जाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

जब मैंने उन्हें बताया, तो वो चकित रह गए। उन्होंने कहा – माँ ये तो अत्यंत सरल है। मैंने कहा – ये बहुत आसान है। आपका अचेतन चार में विभाजित है। एक है सामूहिक अव-चेतन, एक है सामूहिक परा-चेतन है, एक है – आप कह सकते हैं – सामूहिक नर्क और सबसे ऊपर महा-सामूहिक चेतना।

तो हमें कहाँ जाना चाहिए? हमें अपने गंतव्य का पता होना चाहिए। फिर, हमें पहुंचना होगा।

और इसी तरह इन सभी लोगों की समस्या जो मुक्तानंद में  फंसे हुए हैं । हां, उन्होंने मुझसे एक प्रशन्न  पूछा – मुक्तानंद में क्या खराबी  है? वह इतना खतरनाक क्यों है? एक महिला, बेचारी, जैसा कि सहज में होता है , वह आई, उसने कहा – ओह, मैं वहां गई थी, मैंने अपनी पीठ तोड़ दी है और मेरा हमेशा के लिए नाश हो गया है। वह इतना खतरनाक  मनुष्य है। उसने मेरी मिथ्या प्रशंसा की। मैं वहां गई और मुझे नहीं पता कि मेरी पीठ में क्या हुआ है। मैं एक स्थान पर दस मिनट से अधिक नहीं बैठ सकती। मुझे उठना पड़ता है। और मेरे पास एक यंत्र है। मुझे इसे हमेशा ऐसे ही रखना होता है। तो मैंने कहा – “खतरों को देखिए”।

फिर दूसरा सिद्धांत उन्होंने शुरू किया कि अगर हमें परमात्मा के पास जाना है तो कष्ट भोगने ही होंगे। क्यों? मेरा मतलब है कि, परमात्मा के तो बिलकुल भी ऐसे विचार नहीं हैं। आप क्यो कष्ट भोगें ? उन्होंने आपके लिए क्राइस्ट को कष्ट भोगने दिया  – अब समाप्त। अच्छा होगा आप कष्ट ना भोगें। पीड़ित होने की कोई आवश्यकता नहीं है।

तो, ये सभी विचार इन पश्चिमी लोगों के भीतर आ गए थे। और इन मानसिक अनुमानों को उन्होंने स्वीकार कर लिया, बिना कुछ समझे कि दूसरी किताबों में क्या लिखा है। हमें देखना चाहिए। और वो केवल पिछले साठ वर्षों तक ही जा पाए, जिसमें वो सभी भयंकर लोग थे जो भारत गए थे, बहुत ही तुच्छ लोग। उन्होंने थोड़ी बहुत तांत्रिक पुस्तकों को देखा, क्योंकि वो भारतीय संस्कृति के माध्यम से फ्रायेड को सही ठहराना चाहते थे। तो उन्होंने तांत्रिक, कामुक चीजें आदि प्राप्त की। और इन पुस्तकों को ले आए और उनमें से कुछ में लिखा था – मुझे नहीं पता किन किताबों  में- कहा गया कि कुंडलिनी पेट में है। कोई कहता है मस्तिष्क में है। मेरा मतलब है, कि वो ये नहीं जानते कि कुंडलिनी कहाँ है। वो इतनी बड़ी बड़ी किताबें लिख रहे हैं, क्या आप कल्पना कर सकते है? इतनी बड़ी बड़ी किताबें उन्होंने लिखी हैं।।

अब, जब किताबें लिखी जाती हैं, तो हर किताब एक ग्रन्थ नहीं होती। लेकिन उनके लिए, यदि ये किताब में लिखा है, तो ये एक शास्त्र है। और इस तरह पूरा भ्रम फैलना शुरू हो गया। तो ये लोग यहाँ आए, इसका पूरा फायदा उठाया और अब वो लोग महान गुरु बन गए हैं, बहुत पैसे वाले। अमीर लोग। लेकिन परमात्मा का हस्त महान है, एक-एक करके, वो इन लोगों के  मस्तिष्क से बाहर हो रहे हैं। और अब मुझे आशा है कि एक दिन आएगा जब लोग प्रकाश देखेंगे।

तो सहज योग का कार्य सत्य को अपने भीतर स्थापित करना है । ऐसा नहीं है कि हम सदस्यता ले सकते हैं। हम किसी व्यक्ति को इसमें भर्ती नहीं कर सकते। हम उन्हें ये नहीं कह सकते कि उन्हें सहज योगी की पदवी मिली है। यह व्यक्ति का उत्थान है जो दिखना चाहिए।

अब बहुत सारे व्याख्यान हैं जो मैंने ऋतंबरा प्रज्ञा और इन सब विषयों पर दिए हैं। और मैं सोचती हूं, हर एक सहज योगी के लिए ज़रूरी है कि उन व्याख्यानों को सुनें , उन्हें पढ़ें , उन्हें समझें और ध्यान करें ताकि आप का विकास हो। क्योंकि यह कोई प्लास्टिक की वस्तु नहीं है जिसे हम बना सकते हैं। यह एक जीवंत प्रक्रिया है, जीवंत शक्ति, जीवंत परमात्मा की।  अतः इसे विकसित करना होगा। सोचने से आप इसे विकसित नहीं कर सकते। लेकिन विचार ना करके, आप इसे अधिक से अधिक बढ़ने का अवसर दे सकते हैं।

जैसे-जैसे यह आपके भीतर बढ़ने लगती  है, तभी आपको एहसास होता है कि आप क्या हैं। यही एकमात्र तरीका है जिससे आप पराचेतन की स्थिति में पहुंचेंगे और स्वयं को वहां स्थापित करेगें। केवल तब आप जान पाएंगे कि मैं क्या बात रही हूं।

अब आज की पूजा एक और विषय है, तो एक पूजा क्या है? क्या आप लोग कह सकते हैं  कि एक पूजा क्या है? वास्तव में  कल मैं एक पूजा में थी, और मेरे लिए पूजाओं को सहन करना आसान नहीं है, ये मैं स्पष्ट रूप से आपको बताती हूं, क्योंकि चैतन्य इतना अधिक होता है कि मुझे नहीं पता। और फिर, मैं हवाई अड्डे पर गई – दो घंटे तक हम चैतन्य को बहाते रहे। और उसे पूरे न्यूयॉर्क हवाई अड्डे के लिए छोड़ दिया। यह ज़रूरी था। या कार्यान्वित हुआ। 

क्योंकि चैतन्य अत्यथिक शक्ति के साथ बहना शुरू हो जाता है और अगर आप लोग इसे समाहित नहीं करेंगे, तो मेरे शरीर से इसे बाहर निकलने में समय लगता है। मुझे इससे भारीपन लगता है। लेकिन, फिर ये  बह जाता है और मुझे बेहतर महसूस होता है। और मंत्र कहने से बस यही होता है कि, आप अपने अंदर के देवी-देवताओं को जागृत करते हैं, और चैतन्य प्राप्त करना शुरू करते हैं।

और जब आपके देवी-देवता जागृत होते हैं, तो वो मेरे भीतर के देवी-देवताओं की शक्ति के माध्यम से जागृत होते हैं – उन्हें ऐसा करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है, और इस वजह से वो बहुत अधिक चैतन्य पैदा करते हैं, जो आपके देवी-देवताओं के जागृत होने पर आपको समाहित लेना चाहिए। तो इस तरह ये काम करता है। आप इसे शब्दों में वर्णित नहीं कर सकते। आप इसे शब्दों में नहीं बता सकते। ये एक घटना है जो घटित होनी है।

बहुत से लोग जो पहले सहज योग में आते हैं, वो  थोड़ा सा इस तरह जा सकते हैं, आरम्भ  में। धीरे-धीरे वो स्थिर हो जाते हैं, सही राह पर आ जाते हैं, उसमें उन्नत होते हैं, फिर सब ठीक हो जाता है। कुछ लोग सिर्फ एक ही दिन में तेजी से उन्नत होते हैं, और वो वहां स्थिर हो जाते हैं। कोई  अंतर नहीं पड़ता। क्योंकि ये एक विकासशील वस्तु है और इसे विकसित होना है। कुछ लोगों के सन्दर्भ में, भूमि इतनी उपजाऊ है, या शायद कुछ और, कि ये बस तेजी से कार्यान्वित होती है। इसलिए, कोई भी, किसी और को दोष न दें। और विशेष रूप से, किसी को दोषी महसूस नहीं करना चाहिए क्योंकि वो बाएं हाथ की तरफ की  विशुद्धि है।

विशेष रूप से अमरीका के लिए, मैं इस पत्थर को पहन रही हूं जिसे काला नीलम कहा जाता है। क्योंकि, यह श्री कृष्ण का पत्थर है। यह विशुद्धि चक्र का पत्थर है। हर चक्र का एक पत्थर होता है। और यह विशुद्धि चक्र का पत्थर है, इसलिए मैं इसे पहन रही हूं, सिर्फ अमरीका आने के लिए। और, मुझे आशा है कि आज की पूजा इस देश की क्षमता को उभारेगी, परमात्मा को, स्वयं श्री कृष्ण को, जो कि यहां के प्रभारी हैं, उनकी जागृति द्वारा, उन्हें प्रसन्न करके। उन्हें सक्रिय बनाकर। और, उनके पास बहुत से महान गुण हैं। और उनका एक महानतम गुण है, कि उनके पास है – संहारक शक्ति। जिसके द्वारा वो राक्षसों को मार सकते  हैं। और, उन सभी राक्षसों को जो यहां आकर बस गए हैं, जो वास्तव में भ्रम में हैं। क्योंकि, यह श्री कृष्ण का स्थान है, और वो बहुत खतरनाक स्थिति में हैं। क्योंकि एक बार जब यहां उनकी जागृत हो जाती है, तो वो सब पूरी तरह से नष्ट हो जाते है, उनके सुदर्शन चक्र के माध्यम से जो इनके हाथ में है। और वो बस एक-एक करके उनको मार देते  हैं।

लेकिन पहले उन्हें प्रसन्न करना होगा, और उन्हें जागृत करना होगा, उन्हें ‘प्रसन्न’ होना होगा। यही शब्द है। प्रसन्न का अर्थ है, खुश होना। और फिर, यह कार्यान्वित होता है। 

तो आज सबसे पहले हम श्री गणेश की पूजा करेंगे, छोटी सी, क्योंकि गणेश पूजा का उद्देश्य मात्र अबोधिता की स्थापना करना है। इस स्थान की अबोधिता। एक बार अबोधिता स्थापित हो जाए तो, वह सबसे महत्वपूर्ण होती है। वही सभी का मूल तत्व है। गणेश ही मूल तत्व हैं। और, फिर हम श्री कृष्ण पूजा करेंगे और फिर शक्ति की देवी की पूजा। तो इस तरह हम तीन पूजाएं करेंगे – एक के बाद एक, लेकिन हर बार, थोड़े समय के लिए। ठीक है?