Sarvajanik Karyakram

Rahuri (भारत)

1984-02-22 Public Program, Rahuri, India (Marathi), 35'
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राहुरी फैक्ट्ररी के माननीय अध्यक्ष श्री सर्जेराव पाटिलजी, मित्र संघ संस्था के संचालकगण, जितने भी राहुरीकार और पिछड़े/दलित जाती के लोग यहाँ एकत्रित हुए हैं, मुझे ऐसा कहना उचित नहीं लगता। क्योंकि वे सब मेरे बच्चे हैं। सभी को नमस्कार! दादासाहेब से मेरी एक बार अचानक मुलाक़ात हुई और मुझे तब एहसास हुआ कि यह आदमी वास्तव में लोगों की फिक्र (परवाह) करता है। जिसके हृदय में करुणा न हो उसे समाज के नेता नहीं बनना चाहिए.

जिन्होंने सामाजिक कार्य नहीं किया है उन्हें राजनीति में नहीं आना चाहिए। जिन्होंने सामाजिक कार्य किया है, अगर वे राजनीति में आते हैं, तो उनके मन में जनसामान्य के लिए दया रहेगी। लेकिन ज्यादातर लोग सामाजिक कार्य इसलिए करते हैं ताकि हम राजनीति में आएं और पैसा कमाएं। मुझे सब पता है। मैंने बचपन से अपने देश का हाल देखा है। मैं शायद तुम सब में सबसे उम्रदराज हूँ। मेरे पिता भी बहुत धार्मिक हैं, एक बहुत ही उच्च वर्ग के सामाजिक कार्यकर्ता, देश के कार्यकर्ता, राष्ट्रीय कार्यकर्ता और डॉ अम्बेडकर के साथ बहुत दोस्ताना था,  घनिष्ठ मित्रता थी। उनका हमारे घर आना-जाना था। मैंने उन्हें (डॉ. अम्बेडकर को) बचपन से देखा है। 

मैं उन्हें चाचा कहती थी। उनके साथ संबंध बहुत घनिष्ठ हैं। और वह बहुत तेजस्वी और उदार थे। मेरे पिता गांधीवादी थे और यह(डॉ. अम्बेडकर)  गांधी जी के खिलाफ थे। बहस करते थे। तकरार के बावजूद उनके बीच काफी दोस्ती थी। वह बहुत स्नेही थे! जब मेरे पिता जेल गए, तो वह हमारे घर आकर पूछते थे कि कैसे चल रहा है। ठीक है या नहीं। मेरा बचपन इतने बड़े लोगों के साथ बीता है। मैं भी गांधी आश्रम में पली-बढी हूं और उन्हीं के संघर्ष से मैंने यह निष्कर्ष निकाला है। 

ज्योतिबा फुले या कोई और समाजसेवी, आगरकर, तिलक, ये सब, इनके संघर्ष में जो गुस्सा था वो सही था. जातिवाद हमारे देश का सबसे बड़ा दोष है। जैसे कैंसर। मान लीजिए कि कोड इससे बेहतर होगा! लेकिन हमें जातिवाद की इस बुराई को दूर करना है और इस जातिवाद का कारण खुद्गर्ज लोग हैं। अब हम विचार करें कि जब जाति आई तो आप जन्म से क्या महार हो गए या जन्म से ही ऐसे हो गए। यह कैसे संभव है? 

यदि आप ऐसा सोचते हैं, तो गीता किसने लिखी? गीता व्यास द्वारा रचित है। मेरी सोच यह है कि मैं उनसे पूछती हूं जिन्होंने जाति बनाई। व्यास कौन थे? एक मछुवारी का बेटा। जिसका कोई पिता न हो। अनाथ, वह व्यास! उन्होंने गीता लिखी। आप इसे पढ़कर कैसे जातिवाद बढ़ाते हैं! क्या ‘जाति’ शब्द का उदय बाद में लोगों द्वारा अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए किया गया। हमारे देश में ऐसी कोई जाति नहीं थी। 

यह कर्म के अनुसार चल रहा था। चार जातियाँ मानी जाती थीं। पहली जाति, जो ब्राह्म को खोजते है, वह ब्राह्मण है। वाल्मीकि कौन थे? फिरसे  एक मछुवारा । आज उस रामायण को सिर पर बिठाकर जातिवाद करते है, तो समझ नहीं आता। क्या आप मुझे बता सकते हैं कि इसका मेल कैसे किया जाए? तो यह आप पर हावी होने के लिए कुछ है। लोग जन्म से ही जाति करते हैं, लेकिन पहले जाति कर्म के अनुसार की जाती थी। 

भगवान ने जो जातियाँ रखीं वे आंतरिक थीं, बाहरी नहीं। अब मान लीजिए कि एक पेड़ की प्रजाति है आम, उसे से आम ही मिलना चाहिए। जो मनुष्य ब्रह्म को जानता है, ब्रह्म में लीन है, वह ब्राह्मण है। ऐसे कितने ब्राह्मण हैं, मेरे सामने आओ! उस दिन मैंने यह सवाल पूछा, वे आए और मेरे सामने ऐसा-ऐसा हिलने लगे। पुछा, ‘तुम्हें क्या हो गया? बड़ा ब्राह्मण बनते हो। ऐसा-ऐसा क्यों हिलते हो? आप ब्रह्मा को जानते हैं! बोला की ”माताजी, आप शक्ति हैं, इसलिए हम यह हिल रहे हैं

ये पड़ोसी हिल रहे हैं।’ उसने कहा, जाकर पूछो कौन हैं? उन्होंने जाकर पूछताछ की। पता चला कि वे ठाणे के पागलखाने से ठीक होके आये हुए हैं। कहा, तुम और वे एक ही हैं। आप में और क्या ज्यादा है? तो अगर कोई अपने को कोई शरीफ समझे और कहे कि मैंने ब्रह्म को जाना है और मैं ब्राह्मण हूं, तो ऐसे सर्टिफिकेट से, सेल्फ सर्टिफिकेट से कुछ नहीं होगा। ऐसा सभी धर्मों में हुआ और होता है। और अब मैं आपको बता दूं कि दलीत जाती के  एक सज्जन थे जिन्हें हम जानते हैं। वे अच्छी जाति के थे, मराठा कहते हैं, राजपूत। लेकिन यह दलीत जाती के तौर पर ही मानी जाती थी। मैंने कहा, कैसे आए, आपने दलीत कैसे डाला? अभी आईएएस में हूं तो दलीत जाती होगा। तो अब एक और जाति बना दी गई है 

इसलिए यह संघर्ष जारी है। ये बातें ठीक नहीं होंगी। एक और बात, जाति हमारे देश में थी ही नहीं । जिन्होंने ब्रह्मकार्य स्वीकार किया वे ब्राह्मण हैं। क्षत्रिय जिन्होंने युद्ध में भगवान को खोजने की कोशिश की। तो जिनके पास धन है अर्थात् जो मारवाड़ी हैं वे वैश्य हैं। क्योंकि उन्होंने पैसे में भगवान ढूंढे और जिन्होंने सोचा कि पैसा बनाने के लिए चाहे कुछ भी करना पड़े… और वो लोग, वो लोग जो हमें अपना कुछ बुरा करने के लिए मजबूर करते हैं…  किया। जो खेती करते हैं, वही सबसे बड़ा काम है। कृषि उत्पादन, कृषि कार्य, सर्वोच्च है। लेकिन जो भी एक आईएएस आदमी है, एक कलेक्टर है, हमारे देश में बहुत सम्मानित है। वह एक सरकारी नौकर है।

क्या वह जानता भी है? वह एक नौकर है। हम एक कलेक्टर के रूप में उन्हें सलाम करते हैं। एक कृषक जो भूमि में परिश्रम करता है, वास्तव में वह एक उच्च कार्य में लगा हुआ है। तो यह सब दिमाग की चाल है। लोगों के दिमाग का जादू हैं। इस देश के लोगों को, दिमाग चलाके लोगों के दिमाग में कैसे घुसा जाए,  यह बहुत अच्छेसे आता है।  और यह अभी भी चल रहा है। यह कहीं न कहीं जारी रहेगा। अंबेडकर के लिए मेरे मन में बहुत सम्मान है। मेरे पिता भी संविधान सभा के सदस्य थे। 

उन्होंने(डॉ. अम्बेडकर) संविधान बनाया। वे हमारे घर आकर बैठते थे और बहस भी होती थी। तब मेरे पिता ने कहा, ‘हम आपस में यह कर लें कि जो लोग हमें बहुत ऊँचे पद पर बुलाते हैं,’ क्योंकि मेरे पिता एक साधारण व्यक्ति थे, ‘हम उन्हें साधु बना दें। इसका अर्थ है कि उनमें लक्ष्मी तत्व जाग्रत होगा और वे सबकी सहायता करेंगे। जैसा कि अब सर्जेराव पाटिल के साथ हुआ। अम्बेडकर का कहना था कि आपको इन मामलों में नहीं पड़ना चाहिए। ये लोग बहुत दुष्ट हैं। झूठे हैं। जो इतने बड़े ब्राह्मण बनते हैं वो हमको कुछ नहीं देंगे। वे चाहिए ….. वह यही कह रहे थे। बाद में अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर इसके अध्यक्ष थे। 

संविधान के सबसे विद्वान अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर, जिन्हें हम नहीं जानते, आपको बताती हु, पक्का सन्यासी व्यक्ती था। वह आदमी दो धोतों पर जीवनयापन कर रहा है। मैं आपको बता रही हूं क्योंकि मैंने यह सब देखा है। मैंने ऐसे लोग देखे है। आपकी किस्मत अच्छी नहीं है इसलिये आप अलग किस्म के लोग देखते हैं। लेकिन हमारी किस्मत अच्छी थी। हमने उस समय बहुत निस्वार्थ लोग देखे हैं। अगर आपको इनके बारे में खास तौर पर बताएंगे तो आप सोचेंगे कि माताजी कैसी-कैसी बातें करती हैं? और उसमें जो अय्यर थे वे ब्राह्मणों के पीछे हाथ धो के पडे  थे।

स्वयं ब्राह्मण थे। कहते थे सबके सिर के चोटी को काट दो। उस समय जो होश था, जो क्रोध था, क्रोध सबको लगा, क्या आगरकर को नहीं लगा, तिलक को नहीं लगा, गांधी को नहीं लगा, लेकिन सबने अपने-अपने तरीके से चीजों को पेश किया . ‘माताजी, यह बुद्ध का है।’ यह सही है। बुद्ध ने पहली बार कहा, ‘बुद्धं शरण गच्छामि!’ यानी उन्होंने सिर्फ बात नहीं की। क्या आप बुद्ध बने थे? बुद्ध क्या है? फलक लगाने से कोई बुद्ध नहीं हो जाता। सिर्फ फलक लगाने से हम ईसाई के रूप में स्थापित नही होते हैं, हम बुद्ध के रूप में स्थापित नही होते हैं, हम बुद्ध नहीं बन जाते हैं। बुद्ध बनना चाहिए। यह बुद्ध आपके सामने बैठे हैं।  जो ब्रह्म को जानते है वह बुद्ध है, वह जो प्रबुद्ध है, वह जिसे बोध है वह बुद्ध है। हम वो काम सहजोग मे अभी कर रहे है ! पहले बुद्ध बनो। 

दूसरा उन्होंने कहा ‘धम्मं शरण गच्छामि’। अर्थात धर्म को जगाना चाहिए। शराब मत पिओ कहा,  तो जरूर पीएंगे। मैँ इसे देखती हूँ। बचपन से। तब से देख रही हूँ। जो कहा गया है -वह मत करो- तो  वह जरुर करेगे। यह मानव प्रवृति है। विद्रोह। फिर यदि उसमें धर्म जाग्रत हो जाए तो सब कुछ अपने आप हल हो जाएगा। अतः धर्म को जगाना चाहिए। ‘धम्मं शरण गच्छामि’। लेकिन सबसे अंत में बुद्ध ने, ‘संघम शरण गच्छामि’ के बारे में जो कहा गया है, उसे समझना चाहिए। आप बुद्ध बने बिना, संघ में नहीं उतर सकते। संघ क्या है? इसे ही हम सामूहिक चेतना कहते हैं। क्या यह उंगली, या यह उंगली शरीर के इन सभी अंगों में अलग है? एक संघ में बनाया गया। साथ ही हम सब भी इस विराट का हिस्सा हैं।

इसे जगाने की ही जरूरत है। जागोगे तो संघ से जुड़ोगे, तो क्या? फिर कौन सी जाति और कौन सी पाति! आपके हाथ और उंगली में क्या अलग है? क्या आपकी नाक अलग महसूस करती है? अगर हम इस उंगली की मदद करते हैं, तो हम किसकी सेवा करते हैं? तो इसे भीतर से किया जाना चाहिए। मुझे बचपन से लगता था कि हम पेड़ पर लड़ रहे हैं। ये सब लोग पेड़ पर बैठे हैं और आपस में लड़ रहे हैं, बातें कर रहे हैं और सोच रहे हैं। अब उन्होंने कहा कि कुछ खास नहीं हो सकता। तो कारण यह है कि मूल रूप मे जाओ! सब कुछ सैद्धांतिक होना चाहिए, और उस सिद्धांत में मुख्य तत्व यह है कि आपकी आत्मा ब्रह्मांड में व्याप्त है। उस विश्वरूप को प्राप्त करो। यह हमारा सहजयोग सीधा है। तब वे कहेंगे कि कौन ब्राह्मण है और कौन क्षुद्र! जब सारे योगी हो जाएंगे, जब वे प्रभु के राज्य में उतरेंगे, तो जाति कहां होगी? 

यह सब मानवीय गंदगी है। जहा आदमी तो वहा गंदगी होना ही है। अभी तुम जाकर देखो। जंगल में गन्दगी एक भी देखने को नहीं मिलेगी। जैसे ही वे गांव की ओर आने लगे तो बाहर से बदबू आ रही थी । जंगल में जानवर रहते हैं, सांप रहते हैं, हर तरह के लोग रहते हैं, लेकिन आपको इतनी गंदगी नहीं दिखती। जब वह गाँव  की तरफ आया तो उसे पता चला कि गाँव शुरू हो गया है! यह एक मानवीय आदत है। उसका दिमाग इतना शातीर है कि किसी भी तरह वह जो अच्छा है उसे बुरा बनाना चाहता है। क्या बुद्ध ने कुछ अच्छा किया है? मैं बुद्ध के मार्ग पर चलने वाले लोगों को देखती हूं और सोचता हूं कि बुद्ध का क्या करूं? 

ये जैनियों के महावीर, इनकी क्या हालत बना रखी है! वे समकालीन थे,  वो वही बात कर रहे थे। उनकी हालत  बना रखी। मसीह की दुर्दशा कर रखी। हमारे सभी साधु-संतों ने जो सिखाया है, वही किया है। अब तुम स्वयं जागो। मैंने सभी को बुद्ध बनाने का फैसला किया है। सच्चा बौद्ध धर्म सहज योग है। क्योंकि इसमें आप स्वयं बुद्ध है। आप जानते हैं। आपकी उंगलियां समझती हैं, और आप जानते हैं कि आपके साथ क्या गलत है, दूसरों के साथ क्या गलत है, खुद को कैसे सुधारें। और एक बार जब आप इस बुद्ध धर्म को अपना लेते हैं, जो भीतर है, तो सब कुछ आपका है। सभी के पास कुंडलिनी है। कुंडलिनी का जाति से कोई संबंध नहीं है। है क्या आपकी आत्मा में कोई जाति है? 

बस कुंडलिनी और आत्मा का संबंध जोड़ना है। यह एक कार्य है। यदि ऐसा होता है तो लक्ष्मी का तत्त्व भी जाग्रत हो जाता है। अब मैं कहूंगी कि दलीतो का क्या कसूर है? जान लें कि उनके दुख का भी एक तत्व है। मैं कहती हूं, एक मां हु इसलिये यह कहा जाना चाहिए। मेरा मतलब है भूत-प्रेत और ये सारी चीजें, तंत्र-मंत्र, तंत्र-मंत्र, ये सब करके हमने दलीत जाति ने खुद को खत्म कर लिया है, । आपको यह सब छोड़ देना चाहिए। टोट्क, ये, वो बहुत कुछ करते हैं। एक दिन मैं एक दलीत से मिलना हुवा। उन्होंने मुझसे पूछा, माताजी, अगर भगवान हर जगह एक जैसे हैं, तो हम अब तक इतने पिछड़े क्यों हैं?

अरे, पहले प्रभु के राज्य में जाओ। आप इंदिराबाई के साम्राज्य में बैठी हैं। जाओ और उनसे यह प्रश्न पूछो। लेकिन अगर तुम मुझसे पूछो, तो पहले भगवान के राज्य में आओ, और फिर देखो कि गरीबी कैसे रहती है। क्योंकि एक बार जब यह संकट खत्म हो जाता है तो इस तरह का टोना-टोटका और जो धंधा चल रहा है उसमें और ब्राह्मण जुड़ जाते हैं। यानी ये सभी लोग वहां जाते हैं और कहते हैं, ‘हम आपकी पूरी कोशिश करेंगे। हमें चार अंगूठियां दो। हमें दो रुपये दो।’ ये सब छोड़ दोगे तो दरिद्रता भाग जाएगी! क्योंकि ये जहाँ भी है लक्ष्मी ऐसे ही चली जाती है। खैर, अगली कहानी पर वापस! क्योंकि मैंने पूरे देश का भ्रमण किया है। जाति चली भी जाए तो समानता नहीं होगी। यह याद रखना। समानता शब्द अलग है। अब यह क्या है कि जिस देश में जात-पात नहीं, परदेश में क्या लोग सुखी हैं? 

तुम मुझसे पूछते हो कि वहां क्या समस्या है! सिर्फ इंग्लैंड में ही नहीं बल्कि अकेले लंदन शहर में हर हफ्ते माता-पिता अपने दो बच्चो कि की हत्या कर देते हैं. अब बोलो! कोई जाति नहीं है। जब दुसरो को न मार सके तो अब अपने ही बच्चों को मारने लगे। इसका मतलब है कि दिमग में कुछ गड़बड़ है! कुछ टूटा है। कोई इस पर विश्वास नहीं करेगा, लेकिन आंकड़ों में यह है कि लंदन 

 में, माता-पिता अपने दो बच्चो को मार डालते हैं। मैंने अपनी आँखों से देखा। जो इतने छोटे छोटे नवजात शिशु होते थे, उन्हे वे दूसरे कमरे में सुलाते है। और अपने कमरे में कुत्ते और बिल्लियाँ लेके सोते है। तुमने कहाँ देखा है? वे बच्चे वहां मरेंगे तो भी चलेंगे। तुम विश्वास नहीं करोगे, इतने सारे दुष्ट लोग हैं! कभि भी बंदूक से गोलियां चलती है। अमेरिका में इस तरह से काम होता है। इतनी चोरी कि हैरान रह जाएंगे, अब हम यहां रात को घूमते हैं। कोई नहीं रोक रहा है। वहा रात में चलने के लिए ऐसी कोई सुविधा नहीं है। कहीं भी नहीं 

अगर आप दिन में भी हाथ में पर्स लेकर चलते हैं तो ये उसे खींच लेंगे। लंदन मे भी। अमेरिका मे तो पूछो ही मत। साहेब ने मुझसे कहा कि अगर मैं वहा जाऊं तो सारे गहने उतार दूं। मैने कहा, ‘देखो, मुझे वह नहीं चाहिए। क्योंकि यह देवी का काम है और ये सभी आभूषण उन्हीं के हैं। मुझे कुछ पता नहीं है। मैं देखती हूं कि कौन चोरी करता है। लेकिन आप ऐसा नहीं कहते। मेरे द्वारा इसका निर्धारण नहीं किया जा सकता। ये देवी के हैं। मुझे वह अलंकार धारण करना है। जब तक यह काम है।’ तो वहां यह स्थिति है। तुम नहीं जानते वहां के लोगों की क्या समस्या है! रात भर सो नहीं पाता। पागल, 65% लोग पागल हैं। अब बोलो वहा कोई जातीयता नहीं है। तो क्या हुआ मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है।  यदि उसे किसी समूह या समाज को दमन करने की अनुमति नहीं दी जाती है, तो वह घर वालो पर ही अत्याचार करना शुरू कर देता है। कहीं और करेंगे। यह उसकी प्रकृति है। इसका क्या इलाज है? इसका इलाज यह है कि अगर आप कुंडलिनी को जगाएंगे तो कुंडलिनी आपके अहंकार को आज्ञा चक्र पर खींच लेगी। ठीक है, तो तुम इस छात्रावास में इन बच्चों को काम दो। 

इन छोटे बच्चों को पार करो। जैसे पाटिल साहब ने अपने स्कूल में बच्चों को पार किया। तो तुम पार हो जाओ। यह एक सच्चा आशीर्वाद है। अब हमने जो कहा है वह यह है कि पैसे का नाटक नहीं किया जा सकता है। बेशक। लेकिन हम पैसे कि किमत कर सकते हैं। किमत करना सीखें। एक सीधी बात आपको बताते है कि सहजयोग में गांव का आदमी पिछड़ा/दलीत कैसे कहा जा सकता है, वह मेरा बेटा है।

आप कहे दलीत लोग, वह इनकी जाति बनी होती हैं, मैं क्या कर सकती हूं? ऐसा ही एक आदमी हमारे पास आया करता था। वे पाटिल थे। एक बहुत ही शरीफ आदमी और बहुत गरीब। खैर, सहजयोग में दान-धर्म की कोई रीत नहीं है। हमने रीति नहीं रखी है। एक तरह से यह दान ही है। तो वह आदमी हमारे पास आया, मैंने कहा, ‘तुम क्या कर रहे हो, पाटिल? रोज फूलों की माला भी लाते हो। किसी तरह मैंने किसी से कहा, ‘कम से कम उनके हार का तो भुगतान कर दो।

यहाँ इतने सारे हार आते हैं और यह अपना पैसा क्यों खर्च करें। तो उसने कहा, “माताजी, मेरी समस्या हल हो गई है।” “कैसे?” “नहीं, मुझे अब पैसे की कोई समस्या नहीं है।” क्या हुआ?’ हमारी गाव के बहर एक जमीन थी, मैं वहाँ बैठकर ध्यान करता हूँ और वहाँ थोड़ी-बहुत चहलकदम सुबह और शाम को करता हूँ।” उस जमीन मे क्या गुण आ गये पता नहि। एक सिंधी मेरे पास आया और बोला, ‘इस भूमि से थोड़ी सी मिट्टी दे दो,’ अर्थात यह एक पुण्य भूमि बन गई है! इसलिए ‘हमारी ईंटें पत्थर की तरह निकल गईं’ इसलिए उसने उन्हें तराजू से तौला के लिया। यह लक्ष्मी तत्व जाग्रत हुआ। अब आप हैरान होंगे कि उस आदमी का बेटा जे जे स्कूल ऑफ आर्ट में पढता है, जहां मेरी बेटी  भी पढ़ती थी, हजारों लोग वहा है, लेकिन अब वह छात्रवृत्ति पाकर वहीं पढ़ रहा है क्योंकि वह प्रथम श्रेणी में प्रथम आया है। क्योंकि लक्ष्मी तत्व सबसे पहले जाग्रुत हुआ था। मैं मानती हूं, आपने इसे स्कूल में रखा है। शिक्षा दो, लेकिन उन्हें कम से कम एक बार पार होना चाहिए। बुद्ध होना चाहिए। दूसरी बात, आप अपने गाँव से सभी टोटके और इस तरह और भी जो करते उन्हे बंद कर दो। ये परमात्मा के खिलाफ हैं। आपको इन सभी लोगों को खत्म कर देना चाहिए जो धन, जादू टोना, दाह संस्कार, भानामती आदि करने  का काम कर रहे हैं  , तब लक्ष्मी तत्व जागृत होगा। और उसमे से कुछ राक्षस हमारे राजनेताओं के दिमाग में घुस गए हैं। 

ये भूतिया लोग हैं। तो ऐसा होता है। उनके बोलाने से  मुझे यह  सामान्य लोग नहीं लगते । उन्हें सामान्य करने के लिए पहले उन्हें सहजयोग में लाना हैं। सभी योगी बन जायें तो अच्छा है। अब यह कहना कि यदि हमें अपने समाज का, देश का, सारे विश्व का कल्याण करना है तो हमें समग्रता रखनी होगी। समग्र का अर्थ है सभी के अग्रभाग को एक रस्सी से बांध देना। वह रस्सी ब्रह्मांड की कुंडलिनी है। एक बार जब आप उस रस्सी में बंधे थे, तो आप किस तरह की जाति और किस तरह की पाती के हैं। उस प्रभु के शरीर के अंग बन जाने के बाद कैसी जाति और कैसी पाति! यह हमारा काम है। फिर बाहर के वृक्ष पर पत्ते लगाने का कोई अर्थ नहीं है। मूल रूप से इसमें प्रवेश किया जाना चाहिए। 

इसलिए, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब आप यहां एक छात्रावास करेंगे, तो  यह नहीं कहना है कि कोई पिछड़ा/दलीत है। कोई कुछ नहीं कहना । इसे कैसे कलंक लगाये! ये सब जबरन हैं। हमारे देश में वे इस पैमाने के हैं, दूसरे देश मे उस पैमाने के हैं। फिर हमें लगता है कि अगर हमारे पास पैसा आ जाए, संपन्नता आ जाए, तो हमारा बहुत भला हो जाएगा। ऐसा नहीं है! इन लोगों के पास इतना पैसा है, मैंने कल हि कहा था कि स्विट्जरलैंड, नॉर्वे और स्वीडन इन  तीन देशों के पास सबसे ज्यादा पैसा है और वहां सबसे ज्यादा लोग आत्महत्या करते हैं। अब बोलो! उन्हें आत्महत्या के विचार आते थे। 

क्या कहना है! ये युवक-युवतियां वहां से आये । उसके हाथों से मुझे ऐसा लगा, जैसे किसी लाश की हालत हो। क्या करते हैं युवा,  मुँह इतना सूखा है। मृत की तरह, मैंने कहा, तुम्हें क्या हो गया?  कहते है, ‘हम बैठकर सोचते हैं, की आत्महत्या कैसे कर सकते हैं?’ खाने, पीने या देने कि कोई तकलीफ नहीं है। पर उसका इरादा आत्महत्या करने का है। तो ऐसा क्या हुआ? आप ऐसा क्या करते हैं  क्या आपके पास खाने या पीने के लिए कुछ नहीं है, क्या आपके पास कार नही है,  शिक्षा नही है। सब कुछ है। फिर, कहते है “हमें कोई खुशी नहीं मिलती”।

क्योंकि हमने किसी चीज में आनंद नहीं पाया है, इसलिए अब हम सुख की ओर मुड़ते हैं। बुद्ध एक उदाहरण हैं! सब कुछ होते हुए भी वह ईश्वर की खोज में क्यों गया? इस प्रकार वे ईश्वर की खोज में आत्महत्या कर रहे हैं। फिर तुम इतनी दूर क्यों जाते हो, आत्महत्या करते हो और फिर ईश्वर को प्राप्त करते हो?  इतना लंबा रस्ता क्यों? पहले वो लोग नशा करते थे, फिर हिप्पी बनकर घूमते थे, चिल्लाते थे, सब कुछ कर लिया उन्होने। सब खत्म हो गया उनका वह। अब आ गये  है।

सहजयोग में आने के लिये और मैंने कहा, इतनी लंबी सैर की क्या जरूरत है? वे यहीं हृदय में बैठे हैं। आपकी आत्मा आपके हृदय में निवास करती है। आइए इसे लें और उसकी शक्ति के सामने देखें! क्या कोई गरीबी है? कुछ नहीं,  यह ऐसे ही नष्ट हो जाएगा। कृष्ण ने कहा है, योगक्षेम वहाम्यहम्! कहा हैं न, योगक्षेम वहाम्यहम्! योग करने के बाद आपका क्षेम याने कल्याण करेंगे, लेकिन पहले योग तो करें। तब जो जुड़ा ही न हो, उसका क्या फायदा? मैं सबसे पहले योग करने को कहती हूं। तो चलिए आगे देखते हैं। लेकिन योग करने के बाद जब कली मे अंकुर फूटा तो वह एक तरफ बैठ गया। एक महीने थोड़ी मेहनत तो करो, मतलब देखो, अपना हॉस्टल देखो। यह सब राहुरी का नया रूप होगा। यह हमारी मेहनत है। 

हमारे माता-पिता का स्थान है। और वे बहुत धनवान होते हुए भी, घर में सब कुछ होते हुए भी, सब कुछ त्याग कर भी उन्हें कुछ संतोष नहीं मिला और हमारे देश का कुछ भला भी नहीं हुआ। इतनी मेहनत की, जेल गए। अपने बच्चे, सब कुछ कुर्बान कर दिया। सब कुछ हो गया है लेकिन फिर भी हमारे देश के लिए कुछ भी अच्छा नहीं हुआ है। लेकिन हमारे पिता बहुत तपस्वी थे। उन्होने मुझसे कहा कि, ‘ जिस काम के लिए तू आई है वह बहुत बड़ा है। यह महायोग है। तो पता करे के कैसे  सभी को समायोजित किया जाएगा। कैसे, ठीक काम? वह मिल जाए तो मेरी जिंदगी जीने के कुछ मायने होगे। आप इसका पता लगाइए।’ मैं उनके समय तक ऐसा नहीं कर सकी, लेकिन मेरी माँ के जाने से पहले उन्होंने पूछा, ‘क्या यह हो गया? मैंने कहा “हाँ। हां हो गया पता चल गया”।’ उन्होने  खुशी से प्राण त्याग दिये। फिर जो हमने पहले देखा था, बड़े लोग, बहुत बड़े लोग हो गए। आप उनसे बड़े हो सकते हैं। बस अपनी आत्मा को जगाओ। यह बहुत ही आसान काम है। इसमें पैसा नहीं लगता। भवन की आवश्यकता नहीं है। आप जहां भी होंगे, यह होगा। इसे पहले लें। बात सीधी है। इसे एक बार प्राप्त करें, देखें कि आपका काम कितना सुचारू और व्यवस्थित होता है। यह हम में एक दोष है कि हमने अभी तक परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं किया है। तो उनका आशीर्वाद कैसे दें। एक पेड़ जिसे सींचा नहीं गया है वह सूख जाएगा। इसलिए कनेक्शन किया जाए। संबंध जोड़ना चाहिए। यह हमारे सहजयोग का सीधा मार्ग है।

बाकी ये बच्चे भी बहुत उदार हैं। ये बाहरी लोग बहुत उदार होते हैं। पहले ही हम वहां (अस्पष्ट) गए थे। बच्चों, स्कूल आदि के लिए कुछ व्यवस्था थी। तो वे मुझसे कहते हैं, माँ, हम प्रत्येक बच्चे को अपना उत्तराधिकारी बनायेंगे। वे कहते हैं कि वे ऐसा करेंगे, लेकिन यह मेरी कोई बड़ी नीति नहीं है। होगा मेरा मतलब है कि वेतन पाओ, सीखो।  मैंने बहुत से विद्वान गधों को देखा है। सीखने से कोई ज्ञान नहीं आता! यहां तक ​​कि महामुर्ख भी होते है। और इन राजनेताओं ने कुछ शिक्षा प्राप्त नहीं कि है! उनमे कोई हृदय नहीं है। देखने का हृदय ही नहीं होता, कि अरे ये तेरे पड़ौसी का आदमी मर रहा है और तू क्या कर रहा है और पैसा खा रहा है! उस हृदय को जगाना होगा और उसके लिए हमारा सहजयोग कार्यक्रम चल रहा है। हम सब के लिए जो कर सकते हैं वो कर रहे हैं और करेंगे। आपको जो भी परेशानी हो, बस कहने भर की बात है। कई ठीक हो चुके हैं। कहने से ही हो सकता है। लेकिन आइए हम प्रभु के राज्य में आएं, अन्यथा हम ऐसा नहीं कर पाएंगे। जब हमारा हाथ प्रभु के राज्य में काम करेगा यह आशीर्वाद लो। आओ और प्रभु के राज्य में बैठो और अपना ले लो। ‘तेरा तेरेपास हि  है’, वह ले लो। फिर कौन खुश हुआ और कौन नाराज। अरे दीपक जब जलता है तो दीपक ही रोशनी देता है। यह दीपक जलाने का समय है। तब तक हम आपसे कहते हैं कि इसमें तेल डालें, दीया ठीक करें, इसकी बाती ठीक करें। और रोशनी दो। अभी कुछ नहीं करना । मैं तुम्हारा दीपक ठीक करती हूं और वह जला भी देती हु । इसे आपको जलये रखना चाहिए, बस! आप दाता होंगे। इसे कर ही डालो। एक बार जो सत्य है उसका तत्व को प्राप्त करें। यह बहुत महत्वपूर्ण है। क्या आपने देखा कि बाकी सभी को मिला? उन्होने क्या दिपक जलाये यह भी ज्ञात होगा। इसलिए यदि आप वास्तव में  दिपक कि ज्योति जलाना चाहते हैं, तो आपको वह प्राप्त करना चाहिए जो वास्तविक है। नकली के लिए मत जाओ। 

मैं आपसे ऐसी प्रेम से अनुरोध करती हूं! मैं माँ हूँ अगर मैंने तुमसे कुछ कहा है तो माँ के बोलने का बुरा नहीं मानना ​​चाहिए। वह आपके हित में काम कर रही है। मुझे आपके हित से परे कुछ नहीं चाहिए। मैं तुम्हें वह सब कुछ देने आयी हूं जो मुझमें है। इसे ले जाएँ। तो मैं मुक्त हो जाऊंगी। सबने मुझे यहां बुलाया, हम सबकी तरफ से भूमिपूजन किया, आप जो मांगो, हम देने को तैयार हैं। आपको मुझे विशेष रूप से तब बताना चाहिए जब मैं इसे नहीं समझती। यानी हमारा क्या है, उनका क्या सिस्टम है क्योंकि ये एक वैश्विक संस्था है, सब कुछ इन्हीं से होता है. मैं पैसे के बारेमे कुछ नहीं जानती। तुम्हारी क्या आवश्यकताएँ होंगी उसे उनके पास  लिख लो। 

फिर वहां से हम वह करेंगे जो हमें करने की जरूरत है। लेकिन मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मेरे लिए क्या मायने रखता है, कि आप में से कितने जाग्रुत होते हैं और कितने सहजयोगी बनते हैं? तो अब मैं आ गयी। तो आशीर्वाद स्वरूप सब ऐसे ही हाथ कर के बैठेंगे। आराम से और सोचना बंद करो। अब आप अगर एक राजनेता हैं। आप जो भी हो। पर अभी तो तुम माँ के बच्चे बनकर बैठे हो। और जो तुम्हारे पास है उसे अपने साथ ले जाओ। अपनी आत्मा लो। इस तरह हाथ जोड़कर बैठ जाएं। इसे जाति की जरूरत नहीं है, इसे किसी चीज की जरूरत नहीं है। आत्मा तुम्हारे भीतर निवास करती है। आपको यह मिल गया। क्या सुमंतराव है! क्या आपका नाम सुमंत है? क्या आप जानते हैं सुमंत कौन थे? क्या आप जानते हैं कि वे श्रीराम के सचिव थे। आपने बहुत बड़ा नाम लिया है क्या? माँ ने कुछ सोचा होगा और नाम रखा होगा। तब कुछ करना चाहिए। ऐसे हाथ करके बैठो, अरे उस राम ने भिलिनी का झुटे बेर खा लिये। मैं कहती हूँ, भीलिनी की झुटे बेर खाये है, पर यह गधे तो उसके हाथ का खाना भी न खाएगे! जी हां बात सच है ! मैं कहती हूं,  क्योंकि मैं हूं! भिल्लिनी की बेर खा भी लें तो उनके दिमाग में रोशनी नहीं होगी, रोशनी कैसे होगी! आत्मा कि होनी चाहिये है। इसके बिना कोई इलाज नहीं है। कुछ भी करके दिखाया है। कृष्ण ने विदुर के घर जाकर भोजन किया। लेकिन फिर भी लोगों के दिमाग में रोशनी नहीं आयी। उन्होंने गीता की इतनी बड़ी पुस्तक किसके हाथ से लिखी? उन्हें कोई और नहीं मिला। उनोन्हे व्यास पाया। मछुआरा ।

रामायण वाल्मीकि द्वारा लिखी गई थी। प्रभु विफल नहीं हुये है। वह तुम्हें बार-बार शिक्षा दे रहे है। लेकिन मनुष्य की जाति है की नहीं समझेगी। चाहे कितने ही झटके लगें। तो अब इसे खत्म करो। तुम अब बुद्ध बन गए हो, बस! फिर मुझे कुछ कहने की जरूरत नहीं है। क्या तुम्हें पता था? अब अपने हाथों को ऐसे ही रखें। 

ऐसे हाथ करके  बैठे। अब अपने टालु को देखो, क्या तुम्हें ठंड लग रही है? इस हाथ को देखो। सिर ठंडा होना चाहिए। अपनी टोपी उतारो। मां के समने  टोपी लगाकर कोई नहीं बैठता। टोपियां हटा दें। माँ के सामने टोपी क्यों? हम माँ के पास कैसे आते हैं? देखो, क्या ऊपर आ रहा है, सिर पर पाला है। ठंड सिर से आनी चाहिए। तुम जानोगे कि जिस भूमि पर तुम बैठे हो वह कितनी पवित्र है! क्या अब आ रहे हैं? क्या चल रहा है अब दाहिना हाथ करें। यह बहुत गर्म है। हर कोई गरम हो जाता है। तब रोग उत्पन्न होते हैं। माथा बहुत गरम है। अपना दाहिना हाथ मेरे तरफ रखो और अब सभी को क्षमा करो। पहले सभी राजनेताओं को माफ कर दो। 

वे अज्ञानता में काम करते हैं। और जातिवाद फैलाने वालों को भी माफ कर दो। वे मूर्ख हैं। कुछ गधे हैं, कुछ मूर्ख हैं। क्या करें हमें समझदारी से सबको माफ कर देना चाहिए। अब देखिए, क्या यह सिर पर आ रहा है? क्या देखो, यह ठंडा होना चाहिए। क्षमा करे। मैं अपनी आंखें बंद कर लेता था और माफ कर देता था। लोग क्षमा नहीं कर सकते और कहते हैं, ‘माँ, क्षमा कैसे करें?’ लेकिन हा, यदि आप क्षमा नहीं करते हैं, तो आप स्वयं को चोट पहुँचा रहे हैं। दूसरे को क्षमा नहीं करते। माफ़ करें कहो ‘मैं क्षमा करता हूं’। मेरा मतलब है दिल से, पूरे दिल से। क्या आब आ रहे हैं? आपको अपने सिर से बाहर निकलना होगा। थोड़ा और करीब से देखें। यह सूक्ष्म है। सूक्ष्म है। हम जड मे बैठे हैं। सूक्ष्म है। आए? देखो, यह सूक्ष्म है। अपनी खुद की। देखो यह तुम्हारा है। क्या यह ठंडा है? अब हर तरफ ठंड का अहसास होगा। अब अपने हाथों को इस तरह ऊपर उठाएं। और पूछो क्या यही ब्रह्म शक्ति है 

क्या यही परमात्मा की शक्ति है? ऐसा मुझसे पूछना है। पूछो, क्या यही ईश्वरीय शक्ति है? हृदय से पूछो। मैं इसका उत्तर देती हूं। यह है, इस शक्ति को देखें। यह आपके हाथ में आती है। हम उस सजीव कार्य को नहीं देखते जो प्रभु चहुओर में करते हैं। ठंडा,  हाथ मे लगा। अब आप सुकून महसूस करेंगे। अब इसके बाद देखिए, धीरे-धीरे समझ आएगी। अब ‘बुद्धशरण गच्छामि’ कहना है । अन्यथा इस मंत्र का कोई अर्थ नहीं है। जागरूक नहीं।  अब जितने नाम लिए जा रहे हैं वह साक्षात्कारी थे, सब साक्षात्कारी थे। लेकिन उस समय इस काम को करने की कोई सुविधा नहीं थी।

क्या यह हाथ में आता है? ठण्डा आ रहा है। कुछ आया! अच्छा लगता है, शांत! अब मैं सभी को अलविदा कहती हूं। ईश्वर की कृपा से आपके सभी काम सुनियोजित होंगे। मुझे बच्चों के पते भेजें। छवि भेजो ये लोग यहां के बच्चों को गोद लेना चाहते हैं। उनकी व्यवस्था करेंगे। उन्हें प्यार देगे। ऐसे ही ये लोग करेंगे। आपको बच्चों के पते और फोटो भेजने चाहिए। उन्हें भी पार करें। उनका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। वे ठीक हो जाएंगे। मैं आपके निमंत्रण के लिए बहुत आभारी हूं। और सब सहजयोगीयो  की ओर से मैं आपको धन्यवाद करती हूं।