Dinner Party

New Delhi (भारत)

Feedback
Share

Nabhi Chakra Date 15th March 1984 : Place Delhi : Public Program Type : Speech Language Hindi

[Original transcript Hindi talk, Scanned from Hindi Nirmala Yog]

होते हैं कि वो जो कहते हैं कि “परमात्मा वगैरह सब ढकोसला है, यह झूठी चीज है। परमात्मा नाम की कोई चीज ही नहीं है ।” परमात्मा को खोजने वाले सभी सत्य साधकों को हमारा प्रणाम! आज दो तरह के गाने आपने सुने हैं, पहले गाने में एक भक्त विरह में परमात्मा को बुलाता है। इसे अपराभक्ति कहते है और जब परमात्मा को पा लेता है, जैसे कबीर ने पाया था, तो उसे पराभक्ति कहते हैं। दोनों में ही भक्ति है। इसे कृष्ण ने अनन्य भक्ति कहा है- जहाँ दूसरा कोई नहीं होता, जहाँ साक्षात् परमेश्वर अपने सामने होते हैं, उस वक्त जो हम लोगों का भक्ति का स्वरूप होता है उसे उन्होंने पराभक्ति कहा-अनन्यभक्ति। सब तरह के विचार करने का अधिकार परमात्मा ने मनुष्य को दे दिया है। यह मनुष्य को दी हुई देन परमात्मा की ही है कि वो स्वतन्त्र है। जो चाहे वो सोच सकता है इस बुद्धि से। लेकिन हम लोगों को तीनों दशा में ये ही सोचना चाहिए कि आज तक हमने जो भी किया, चाहे परमात्मा में विश्वास किया, कुछ उनको भजा या उनके ऊपर लैक्चर दिये, या उन पर किताबें पढ़ीं, जो भी मेहनत करी या हमने उन पर विश्वास नहीं किया, उनको कहा कि वे हैं नहीं, उनसे हमने मुठभेड़ की और कहा कि देखते हैं परमात्मा कहाँ है? इन सभी दशाओं में हमें यह सोचना चाहिए कि “इसने हमारा क्या भला किया? हमें क्या लाभ किन्तु जब हम परमात्मा को याद करते हैं. उनको स्मरण करते हैं, तब उसकी आदत-सी हो जाती है। जब इन्सान को इस चीज की आदत-सी हो जाती है, तो उस आदत से छूटने में उसे बड़ा समय हुआ? हमारे अन्दर कौन सी ऐसी कोई नई प्रकृति आ गयी जिसके कारण हमने जो भी किया सो ठीक है। हमारे बाप दादे भी यही करते आए हैं। और उनके लग जाता है। वह मानने को तैयार ही नहीं होता कि उसकी यह जो साधना है, यह खत्म होने की बेला आई है । और इसी वजह से भक्तों ने भी दृष्टाओं को, सन्तों को, मुनियों को पहचाना नहीं। आप जानते हैं इतिहास में हमेशा सन्तों को इतनी परेशानियाँ उठानी पड़ीं। यह नहीं कि सबने उनको सताया, लेकिन जिन्होंने सताया उनको किसी ने रोका नहीं और उनको बाप दादा भी यही करते आए। और हजारों वर्षों से यही चीज चलती रही।” सहजयोग में हम लोग ईड़ा और पिंगला दो नाड़ी पर ध्यान दे रहे थे। इसमें से जो ईड़ा नाड़ी है, यह भक्ति-प्रबल है। ईडा नाड़ी पर लोग भक्ति में लीन हो जाते हैं, अपनी भावना में बह जाते हैं, और समझाया नहीं कि ये सन्त है, साधु है। अब हमारे समाज में, खासकर के शंहरों में, विविध विचारों के लोग रहते हैं । कुछ तो जो कि परमात्मा में विश्वास करते हैं। इस तरह विश्वास करते हैं, कि जैसे कि किसी मंदिर में गये, नमस्कार कर दिया। कुछ लोग हैं जो कहते हैं”नहीं, परमात्मा श्री परमात्मा में लीन होकर के आनन्द से उनका गान गाते हैं। हमारे महाराष्ट्र में, जो कि मैं सोचती हूँ हिन्दुस्तान में एक बहुत बड़ा प्रदेश है, क्योंकि यहाँ पर पारम्परिक लोग धार्मिक हैं और यहाँ का आराध्य देव कृष्ण विट्ठल हैं, लोग एक-एक महीना हाथ में झांझर लिए हुए गाते हुए जाते हैं “विट्ठल, विट्ठल, विट्ठल”, मुँह में तम्बाकू रखे। अब तम्बाकू जो है; ये की साधना करनी चाहिए और धर्म से रहना चाहिए. उनके मंगल गीत गाने चाहियें, हमेशा उनको भजना चाहिए, जिससे वो हमेशा याद रहें।” कुछ लोग ऐसे

कृष्ण के विरोध में है। क्योंकि विशुद्धि चक्र में श्री कृष्ण का स्थान है और उससे विट्ठल विट्ठल नाम ले रहें हैं, और उनका जो विरोध है उसी को मूंह में रखे चले जा रहे हैं। ऐसे बहुत से लोग मैंने देखे जो मुझसे आकर कहते हैं कि “माँ, हम तो जिन्दगी भर विट्ठल ही की वारी करते रहे। हर बार वहाँ पैदल जाते रहे और एक-एक महीना हमने मेहनत करी बहुत से पढ़े लिखे लोग भी ऐसा कार्य करते हैं- ‘लेकिन हमें तो परमात्मा मिले नहीं।” एक मुसलमान लेकिन जो नहीं हुआ, जिसने साक्षात्कार नहीं पाया उसके लिए उचित था कि वो परमात्मा को याद बिल्कुल विरोध में पड़ती हैं, ” कह रहे हैं । श्री कृष्ण का करे। लेकिन यह सब करने से गर परमात्मा को याद किया और परमात्मा ही नहीं मिले- जैसे आपने कहा कि यह आकुल-व्याकुल लोग ढूंढ रहे हैं परमात्मा को, और उनको अगर परमात्मा नहीं मिले-तो जरूरी है कि मनुष्य कहेगा कि, “हाँ, परमात्मा नाम की कोई चीज ही नहीं है ।” लेकिन क्योंकि हमें उसका अनुभव नहीं हुआ, प्रचीति नहीं हुई इसलिए उस चीज को पूरी तरह से मना करना, मेरे ख्याल से. अशास्त्रीय है। उसको जाने बगैर, उसकी प्रचीति पाए बगैर उसको कह देना कि वो नहीं है-कोई सी भी चीज़ हो-मेरे ख्याल से एक तरह से escapism (पलायनवाद) है। साहब थे, जो कि बहुत परमात्मा को खोजते थे। अन्त में वो हिन्दू हो गए। उनका कहना था कि परमात्मा मुसलमान होने से तो मिलता नहीं, चलो हिन्दू होकर मिल जाए, तो वो हिन्दू हो गये हिन्दू होकर के वो इसी तरह से “विट्ठल विट्ठल” करते जाते थे। तो उन्होंने कहा कि “पहले तो नमाज पढ़-पढ़ के मेरे तो घुटने छित्व गए, फिर वारी कर कर के मेरे तलुए सब परमात्मा है, चाहे आप उसे माने या न माने । मैंने आपको बताया था कि यह फूल इसको कौन बनाता है? इन फूलों से फल कौन बनाता है? हमें अपने माँ-बाप जैसे कौन बनाता है? कौन हमारे अन्दर हमारे हृदय को चलाता है? हमारे अन्दर अनेक ऐसे व्यवहार हैं जो medical science (चिकित्सा विज्ञान ) कभी शभी समझा नहीं सकती कि कैसे होते हैं । इसीलिए ही मनुष्य भक्ति पर उतरता है और परमात्मा को याद मैने यह देखा कि छिल गए, और यह सब होते हुए परमात्मा तो मिला नहीं। जो विट्ठल के सामने लोग खड़े हैं, वो भी परमात्मा के पास नहीं, और जो लोग वहाँ जाते हैं वो भी परमात्मा के पास नहीं।” हम लोग इसी प्रकार हर समय कभी कोई अखण्ड पाठ कर रहे करता है। हैं, कभी कोई परमात्मा को याद कर रहे हैं। पिंगला नाड़ी पर जब हम आते हैं तो वहाँ पर ने यह सोचा कि परमात्मा ने जो यह सृष्टि रची इस प्रकार हम अपनी भक्ति में परमात्मा का याद करते रहते हैं। उससे एक चीज़ जरूर है कि मनुष्य है, इस सृष्टि में जो पाँच, पंचमहाभूत हैं जो elements हैं उसके बारे में जान लिया जाए, उन परमात्मा की तरफ हमारा चित्त है। नामदेव ने कहा है कि एक लड़का गुर पतंग उड़ा रहा है और पतंग पर प्रभुत्व पाया जाए। तो उन्होंने यज्ञ-आदि वगैरह शुरु कर दिया, वेद वगैरह रचे गये पर वेद में भी बिल्कुल शुरु में लिखा है कि वेद से अगर ‘विद्’ नहीं हुआ, अगर उसकी प्रचीति नहीं आई, तो सारा वेद बेकार हो गया। आकाश में जा रही है, उधर सब बच्चे उसके साथ खेल रहे हैं। वो बातें भी कर कहा है, सबसे मज़ाक कर रहा है और यह करते वक्त भी उसका चित्त उसी आकाश के ऊपर तनाया हुआ जो उसका पतंग कि है, उसकी ओर है। इस प्रकार एक साक्षात्कारी इस भारतवर्ष की एक महिमा है, बहुत बड़ी महिमा है। कोई कितना भी बड़ा शास्त्री हो, पंडित हो, मनुष्य का हो जाता है कि उसका पूरा चित्त उसी ओर होता है।

मिलेगा यह बड़े-बड़े ऋषि- मुनियों ने इसका पता वेद व्यास हो, कुछ हो, लोग उसके सामने हाथ नहीं जोड़ते। पर अगर कोई सन्त, फकीर हो, हाथ में झोली लिये भी हो, और संत हो, माना हुआ संत. तो लोग उसके सामने झुक जाते हैं, फिर वो राजा हो, चाहे वो कुछ हो। यह अपने देश की बड़ी महिमा है। ऐसे आपको कहीं भी नहीं दिखाई देगा। यह इसी देश में होता है क्योंकि इस देश की अपनी एक बड़ी विशेष पुण्य है। यहाँ बड़े-बड़़े पुण्यात्मा, धर्मात्मा, संत-साधु हुए है। हमारी दृष्टि जो बाह्य की ओर लग गई है इससे सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा हुआ है कि अब सबकी दृष्टि अन्तर्मुख है। लगाया और कुछ-कुछ इस पर किताबें भी हैं। लेकिन बड़े सकील तौर की हैं, और दूसरा यह भी है कि ये उपलब्ध भी नही। यह सात चक्र हमारे अन्दर ऐसे बनाये हुये है, बढ़़िया तरीके से, कि जैसे कि एक के बाद एक माने सीढ़ियाँ हमारे उत्क्रान्ति में बनाई गई। जब से हम कार्बन थे, तब से लेकर के धीरे-धीरे जैसे हम उठने लग गए वैसे-वैसे हर उत्क्रान्ति का जो एक एक टप्पा हमने हासिल किया, उसके अनुसार जैसे कि एक एक माईल-स्टोन (Milestone) बनाया गया कैसे करें? और सबसे पहले कि लोग जानें कि इसी देश में, इसी महान देश में ही यह सारा ज्ञान बसा सबसे पहले कार्बन का जो हमारे अन्दर प्रादुर्भाव हुआ; वो है पहला चक्र, जिसे कि मूलाधार-चक्र’ कहते हैं। इस चक्र के बारे में भी बहुत से लोगों को बहुत गलत-फ़हमियाँ हैं। कुण्डलिनी के बारे में तो, जिसे देखिये वो ही लिखने लग जाता है। मैंने ऐसी भी किताबें पढ़ी है कि जिनको पढ़ने के बाद आदमी यह कहेगा. ‘कुण्डलिनी के पास जाने की कोई जरूरत नहीं। एक साहब ने लिखा है कि उसको हुआ है। अब जो भी बातें मैं आप से बता रही हूँ, इस को आप इस तरह से देखिए जैसे एक Scientist (वैज्ञानिक) के सामने कोई Hypothesis ( धारणा) रखी जाये। अगर आप उसको इस दृष्टि से देखें तो आपको समझ में आ जायेगा कि जो मैं बातें कह रही हूँ वो आपको पहले देख लेनी चाहिये, जान लेनी चाहिये, फिर प्रचीति आने के बाद में उसको आपको जाँचना चाहिये कि यह बात सत्य है या नहीं; परमात्मा कुण्डलिनी जागरण हो गया, उसके अन्दर बिजली चमकने लग गई। किसी ने लिखा कि मेरे अन्दर छाले आ गए। किसी ने कहा मैं मेंढक जैसे कूदने लग पड़ा । हिन्दी में ही नहीं, अंग्रेजी में भी ऐसी किताबें है या नहीं। लेकिन पहले धारणा तो करनी पड़ती है। ये धारणा तो करनी पड़ती है कि ऐसी ऐसी बातें हैं. इसे सुनना चाहिये। उसी बात पर आप अगर उखड़े हुये हैं तो फिर आगे बढ़ ही नहीं सकते। पहले आप इसे धारिये, जो मैं बात कह रही हूँ, इसको आप बहुत छपी हैं। वास्तविक कुण्डलिनी आपकी माँ है। हरेक इन्सान की माँ है। अपनी एक-एक व्यक्तिगत माँ है। और यह माँ आपको आपका दूसरा जन्म देती है। यह जो माँ है, यह माँ क्या आपको कोई तकलीफ देगी? समझने का प्रयत्न करें। मैंने आपसे इन तीनों नाड़ियों के बारे में संक्षिप्त में बताया हुआ था। आज मैं आपको अलग-अलग चक्रों के बारे में बताना चाहती हूँ। आपके जब आपका जन्म हुआ था तो आप की माँ ने आपको तकलीफ दी, या सब तकलीफ खुद उठाई? फिर यह जो माँ, जो विशेष एक देवी माँ है, तो क्या आपको तकलीफ देगी? या आपको परेशान करेगी? बुद्धि से भी काम लेना चाहिए। जो लोग इस तरह की बातें करते हैं या तो वो इस काबिल नहीं हैं कि कुण्डलिनी अन्दर सात चक्र मुख्य है। यह नहीं कि सात ही चक्र हैं। सात मुख्य चक्र माने जाते हैं। यह सब ज्ञान हमारे देश के मूल का ज्ञान है। यह आपको किताबों में नहीं

पर कोई भी हाथ चलाएं। हो सकता है वो धर्मपरायण न हों, अधर्मी हों। उनकें चरित्र अच्छे न हों, वो रुपया पैसा बनाते हों, लोगों को ठगते हों। हर तरह की उनमें गड़बड़ हो सकती है। हो सकता है कि उनको इसके बारे में कुछ भी जानकारी न हो। हो सकता है कि उन पर किसी ने कुछ भूत-प्रेत विद्या करके उनको भस्मसात कर लिया हो। कुछ भी हो सकता है। लेकिन कुण्डलिनी जागरण से आज तक हजारों लोगों की कुण्डलिनी का जागरण हो गया है सहजयोग से लेकिन हमने कहीं नहीं देखा कि लोगों में ये परेशानी या तकलीफ होती है का धन है, जिसे हम लोग innocence कहते हैं, वो मूलाधार चक्र पर स्थित है। ये कुण्डलिनी जो है ऊपर स्थित है, और चक्र नीचे में है। कुण्डलिनी स्वयं मूलाधार में बसी है। ‘मूलाधार’ किसे कहते हैं कि ‘मूल का आधार’। अगर मूल कुण्डलिनी है, तो उसका आधार माने उसका गृह, उसका घर जो है वो आपकी ये त्रिकोणाकार अस्थि है, और उसके नीचे गणेश तत्व जो बसा हुआ है वो आपके अन्दर बसी हुई अबोधिता है । |१ आजकल तो चालाकी करना, होशियारी दिखाना, बदतमीजी करना, या ऐसे कहें कि अपने चरित्र के साथ हर समय विडम्बना. यह एक तरह का कुण्डलिनी खुद सूझ बूझ रखती है। पूरी तरह की सूझ-बूझ कुण्डलिनी के अन्दर है । और जैसे कोई एक टेप-रिकार्ड होता है उसी प्रकार इस साढ़े तीन वलह में इसमें आपका पूरा इतिहास लिखा हुआ है। जब से आप कार्बन थे, तब से आज तक का पूरा लोगों को बड़ा शौक हो गया है। लोग सोचते है कि इसमें उन्होंने बहुत कुछ कमा लिया। अपनी पवित्रता के साथ छलना करना, अपने साथी के साथ हमेशा कोई न कोई उपाधि लगा लेना, इस पर हमारा बड़ा इतिहास इसमें है। यह जानती है कि आप ने क्या क्या लतियां कीं आप कौन से गलत रास्ते पर गए, आप ने क्या क्या अपने साथ दुर्व्यवहार किया है, दूसरों के साथ दुर्व्यवहार किया है, क्या आपने ऐसे काम किए हैं। जो परमेश्वर के मार्ग में एक तरह से रुकावटें ही सकते हैं, बधिक हो सकते हैं। वो सब कुछ तो जानती है। उसके पास इसका हिसाब किताब पूरा है। विचार चलता है कि किस तरह से कैसे क्या किया जाए। यह चक्र जो है हमारे अन्दर बहुत महत्वपूर्ण है। हालांकि इस देश में यह चक्र बहुत बलवान है क्योंकि कुछ भी हो, इस देश में पवित्रता का अर्थ लोगों को मालूम है। लोग गलत काम करते हैं, लेकिन वो जानते हैं कि यह गलत है। इन परदेश में मैंने देखा कि वो गलत काम करते हैं, इस तरह से विचित्र बातें लेकिन वो आपकी माँ है। माँ ये नहीं सोचती कि मेरा बेटा कितना दोषी है। वो यह सोचती है किस करते हैं कि समझ में नही आता किे यह इन्सान है या तरह इस बेटे को जो है, मैं उसका जो धन है उसे दे दँं। किस तरह से उसे मैं बचा लू। माँ को ये नहीं विचार आता- समझ लीजिए किसी का बच्चा डूब रहा हो, तो माँ यह नहीं सोचती है कि इसने मेरे साथ से जानवर हैं और वो यह सोचते हैं कि उन्होंने बड़ी कमाई कर ली, वे तो एकदम freedom (स्वतन्त्रता) में आ गए। उन्होंने बहुत कुछ पा लिया कि इस तरह के गन्दे काम वो कर रहे हैं। क्या क्या दुष्टता की, कितना सताया । वो सोचती है जो भी हो सब माफ़। इस वक्त यह बच्चा बच जाए। इसी प्रकार से ये माँ आपकी यही सोचती है कि आप को किसी तरह से बचा लिया जाए। लेकिन इस माँ के लिए आप का जो बाल्यावस्था में पाया हुआ अबोधिता श्री गणेश विशेष करके जो बनाए गए हैं, उनका रूप ऐसा है कि उनके सिर पर हाथी का सिर है। वजह यह कि हाथी एक पशु हैं, और पशु कभी भी अहंकार एकत्रित नहीं करता। इसीलिए उसके अन्दर

अहम् की भावना नहीं है; वो चिर का बालक होता है। और गणेश जी चिर के बालक हैं। लेकिन उनके अन्दर वो आयुध है और जो विशेष तरह के उनके पास में जो व्यवस्थाएँ हैं, उन सब व्यवस्थाओं से वो मनुष्य के ले गए और पता यह हुआ कि ये जगह पर एक फूकीर ने आकर बताया कि “यह जगह माँ की है, इसे छोड़ दीजिए।” जब हम लोगों ने जाके देखा तो उसके अंदर से, चैतन्य की लहरियाँ-ठंडी ठंडी, लहर-सी अन्दर जो pelvic plexus है उसको सम्भालते हैं। पर ये इतने शक्तिशाली हैं कि अगर आप किसी भी चल रही थीं- साक्षात् सारा सहस्रार। लेकिन यह चीज सिर्फ एक फकीर या कोई सन्त-साधु या कोई सहजयोगी ही बता सकता है। जिसको इसकी अनुभूति नहीं है वो नहीं बता सकता तरह से कुण्डलिनी पर आघात करने का प्रयत्न करें, या जो आदमी धर्म -रहित है, जिसमें चरित्रहीनता है, ऐसा आदमी कोशिश करे कि कुण्डलिनी को चढ़ाए वो इस कृदर नाराज़ हो जाते है (गणेश सबसे नीचे बैठे हैं लेकिन इसके साथ ही ईडा नाड़ी ऊपर कि यह चीज जागृत है या यह झूठ है। या यह सच है या झूठ है। इसके लिए आपको तो ऊँची संवेदना, जिसे कि हम लोग सामूहिक संवेदना कहते हैं, उसमें हुए जुड़ी हुई है) कि ईड़ा नाड़ी पर उनका क्रोध जब चढ़ता है तो आदमी के शरीर में यहाँ से लेकर यहाँ तक़ (बाएँ भाग में नीचे से ऊपर तक) blisters (फफोल) भीहै। आपको होना है। जब तक आप इसमें ‘प्राप्त न ँ जागृत होना पड़ता है। फिर मैं कहूँगी कि आपको जागृत होना पड़ता है। सिर्फ लेक्चरबाजी से नहीं होता आ सकते हैं। ऐसा आदमी गर्मी में तड़प सकता है, उसको तकलीफ हो सकती है। यह गणेश का तत्व जो है, जितना सुखदाई है उतना ही क्षोभकारी है। अत्यन्त क्रोधवान है। होंगे जब तक आपके अन्दर इसकी प्रचीति’ नहीं आएगी, जब तक यह आपको ‘विद’ नहीं होगा, तब तक आपमें और उन साक्षात्कारियों में हमेशा अन्तर रहेगा। इस चक्र की विशेषता यह है कि जब कुण्डलिर्ी का जागरण होता है- जैसे आप मेरे ओर अपने हाथ खोल के बैठें, तो अच्छा रहेगा. भाषण करते ही काम हो सकता है, आप मेरे ओर इस तरह से हाथ करके बैठे हुए हैं, तब आपकी ये जो पाँच उंगलियों में, जो ends & हम भारतवर्ष में गणेश आठ अष्ट विनायक आप जानते हैं, ये जागृत हैं, पृथ्वी के तत्व से निकले हैं। अब हम लोग मानते तो हैं कि वैष्णों देवी, वहाँ जाना चाहिए। इस मंदिर में जाना है, उस मंदिर में Sympathetic nervous system इस प्रकार सात चक्र left side में और सात चक्र right side में। अब यह जो सात चक्र हमारे left और right में हैं, जैसे मैंने बताया था, आपस में मिल जाते हैं, और सुषुम्ना नाड़ी ऐसे उनके बीच में होती है । जाना है। लेकिन यह जागृत तत्व क्या है? क्या हम जानते हैं ये जागृत तत्व क्या है? क्या ऐसी कोई सच्ची बात है कि वास्तविक कोई ऐसे जागृत तत्व का कोई स्थान है? ऐसा स्थान है। क्योंकि पृथ्वी तत्व जो है, यह स्वयं साक्षात् जागृत है। अब आप जब मेरी ओर हाथ करके बैठे हैं, तो धीरे-धीरे, धीरे-धीरे इसमें से चैतन्य बहना शुरु हो जाता है। जब चैतन्य बहना शुरु हो गया तो वो जाकर वहाँ (मूलाधार चक्र) पर श्री गणेश को खबर देता है कि अब कोई अधिकारी सामने खड़ा है। यह अधिकार आपको स्कूलों में, कालेजों में या किसी में या आपको आश्चर्य होगा, मैं एक छोटी-सी जगह मुसलवाड़ी में गई, वहां पर लोगों ने मुझे बताया कि यह जागृत स्थान हैं, और वहां पर कोई भी दीवार नहीं बना सके। एक अंग्रेज ने कहा कि यहाँ पर अजीब- सी जगह, यहाँ पर कोई आप दीवार नहीं बना सकते, कोई बन्ध नहीं बना सकते। तो बंध को ऐसे सीधे लेने के बजाए उसे गोल घुमा दिया, और फिर इस तरह से theosophical society theology

देखें, छोटा सा दोष देख लें, कि जब राम का जन्म होता है, तब उपवास करेंगे. कृष्ण का जन्म होगा तब उपवास करेंगे। और न्कचतुर्दशी जिस दिन नर्क का द्वार खुलता है. उस दिन बैठकर सवेरे खाना खायेंगे । सब उल्टी बातें. बिल्कुल उल्टी बातें। यह पता नहीं किसने सिखाया। जिस दिन आपके घर में बेटा पैदा होगा उस दिन आप क्या उपवास करेंगे? जिस दिन दत्तात्रेय पैदा हुए उस दिन उपवास है देख लीजिए जिस दिन जिसका जन्म हुआ उस दिन उपवास करते हैं। उस दिन उपवास करने की क्या जरूरत है? मेरी पठन आदि से किसी से भी नहीं मिलता यह अधिकार जो. है यह साक्षात्कारी मनुष्य को ही अधिकार है। जब ऐसा व्यक्ति जो जानकार हो, उसके सामने आप इस प्रकार हाथ फैलाते हैं, तो गणेशजी को पहले इसका न्यौता मिलता है कि आप कुण्डलिनी से अब कहें कि आपको निमन्त्रण है और आप चढ़ें। गणेश जी के बगैर यह काम नहीं हो सकता। अबु अगर किसी डाक्टर से कहा जाए कि गणेश जी हैं यह आपके prostate gland को देखते हैं, सम्भालते हैं संवारते हैं तो कहेंगे कि “क्या बात कर रहे हैं माता जी गणेश जी का और medical का क्या सम्बन्ध?” । दूसरा यह कि परमात्मा के नाम समझ में नही आता Medical Science जो है, यह तो ऊपर में है। लेकिन उसके जड़ में अगर श्री गणेश बैठे हैं तो एक मिनट अपनी बुद्धि से यह पूछे कि “अगर इससे हमारे प्रश्न किसी तरह से सुलझ सकते हैं, तो क्यूँ न इस चीज को हम समझें कि श्री गणेश क्या हैं और उनका हमारे अन्दर जागृत होना कितना जरूरी है? एक महाशय थे, वो हमारे पास आये, और कहने लगे कि “माँ मुझे prostate की तकलीफ हो गयी है, डाक्टर कहते हैं कि आपरेशन करवाओ। वो बड़े सहजयोगी थे, दूसरे गणेश भक्त। मैंने कहा आप इतने बड़े गणेश पर क्यों उपवास करते हो? उसने कब कहा था कि आप उपवास करिये? आपको करना है आप करिये। आपको शौकिया उपवास करना है, करिये। इस देश में तो हम इतनी गलतियाँ करते हैं और बिल्कुल नासमझी से, जिसने जैसे कह दिया। स्त्रियाचार, ब्राह्मणाचार की वजह से हमारे धर्म में भी इतने. दोष आ गए हैं। वही हाल मुसलमानों का है, वही हाल इसाईयों का है, यही सिक्खों का है। सब का एक ही है कि अपनी बुद्धि से हम उसको समझते नहीं हैं कि किस वंक्त क्या करना चाहिए अब इनसे मैंने कहा कि खाइये। आपको विश्वास नहीं होगा, उन्होंने वो भक्त है, आपको कैसे prostate हो गया? मेरी समझ में नहीं आता। क्या गणेश आपसे नाराजू हो गए हैं ? कहने लगे “माँ, पता नहीं मैं तो बड़ी गणेश की भक्ति करता हूँ।” मैने कहा आज हमारा प्रसाद चना है, तो चना खाइये ।” तो इधर उधर देखने लग गये। मैंने कहा “आनाकानी खाया। मैंने कहा “अब छोड़िये” आज से आप यह promise (प्रतिज्ञा) करिये कि संकष्टी के दिन मोदक आप बना कर खायेंगे। क्योंकि उनको मोदक प्रिय हैं. इसलिए आप मोदक बना के खायें तो कहा कि “माँ मैं आपको promise (वचन) देता हूँ कि मैं मोदक खाऊंगा। आपको आश्चर्य होगा कि उनका pros- tate -पूना वो पहुँचे और उन्होंने चिट्टी भेजी कि माँ मेरा prostate गायब – उसकी तकलीफ़ ही गायब । इसी प्रकार धर्म में हम अनेक, अनेक, अनेक गलतियाँ करते हैं। और इस लिए जब हम कहते हैं कि “हमने धर्म धारण किया है,” हम यह करते हैं वो करते हैं, फिर हमें माँ क्यों हुआ?” इसका परमात्मा पर कोई दोष मत दीजिये। दोष है जिसने आपको समझाया “अच्छा। तो भई चना खाओ। का क्यूँ कर रहे हैं?” कहने लगे संकरष्टी में मैं उपवास करता हूँ।” मैने कहा “यही तो वजह है। जिस दिन गणेशजी का जन्म हुआ तो उस “आज संकष्टी है, और दिन आप उपवास कर रहे हैं? यह किसने आप को बताया है कि जिस दिन जन्म हो उस दिन आप उपवास करें?” अब धर्म में कितने दोष हैं देख लीजिये । से लोग कहते हैं कि “धर्म हम इतना करते हैं। बहुत हम इतने धार्मिक है माँ, तो भी हम बीमार हैं!” अब

me’ पर ईसाई लोग ये जाकर पता नहीं लगायेंगे कि और कौन हैं । उन्होंने तो बता दिया कि ईसा के सिवाय और कोई नहीं। इस्लाम ने बना लिया कि मोहम्मद के सिवाय और कोई नहीं । इस तरह से उन्होंने सबको एक एक छाँट-छाँट के अलग कर दिया, जैसा कि एक आदमी लटका हुआ कहीं पड़ा हुआ था। सबकी रिश्तेदारी आपस में है। सिर्फ हम ही लोग उनके नाम और बताया । जैसे कि लोग बताते हैं कि जब कुण्डलिनी जागरण होता है तो बड़ी गर्मी होती है और ऐसा होता है, वैसा है। सब झूठ है। एकदम झूठ है। ऐसा कुछ भी नहीं। इस बात पर आप बिल्कुल मत विश्वास रखें। यह लोग सब पैसा बनाने वाले आपको डरा-डरा के ऐसा दिखाते है कि यह बड़े कहीं के पहुँचे हुए लोग हैं। और इस से आपको गलत रास्ते पर डाल देते है, और आप फिर ये पूछने लग जाते हैं कि ” भई हमारी कुण्डलिनी जागरण हुआ उससे तो हमारी हालत ही खराब हो गई। हम तो पागलखाने पहुँच गए।” होना ही है। क्योंकि वो कुण्डलिनी का जागरण नहीं वो EIt sympathetic nervous system overactivity हो जाती है जिससे आप पागल हो सकते हैं। ले लेकर के झगड़ा करते है। इस चक्र के आस-पास आप देखिये कि ये जो यह पेट का हिस्सा है, इसमें दस गुरु के तत्व हैं। इसमें से आप सोच सकते हैं कि शुरु से, ‘आदि नाथ’ से लेकर के उनके गुरु हुए जैसे Socrates हैं, Lao-Tse, यह सब इसी में आते हैं। Moses हैं, Abraham और अपने देश में राजा जनक, नानक, मोहम्मद साहब और Zoroster (जरथस) और अभी आखिरी वक्त जो हुए हैं. वो हैं श्री साईनाथ ‘शिरडी’ के यह सब इनके दस मुख्य अवतरण हुए। वैसे अनेक गुरु हुए हैं, संसार में, लेकिन अब श्री गणेश के बाद स्वाधिष्ठान चक्र है । उससे ऊपर में जो चक्र है वास्तविक यही दूसरा चक्र है जिसे नाभि चक्र कहते हैं। क्योंकि इसी चक्र से दस मुख्य अवतरण है। अब जो लोग गुरु को मानते स्वाधिष्ठान चक्र बाहर निकल कर के, कमल जैसे हैं, कि “गुरु को मान लिया” देखिये गुरु को मान निकलता है, और चारों तरफ घूम-घूम करके- और लेना भी एक बड़ी गलत फुहमी की बात है। गुरु वही यह जो बीच में जो जगह बनी हुई है जिसे कि भवसागर’ कहते हैं, अपने पेट की जो जगह है जिसे ‘भवसागर कहते हैं, अपने पेट की जो जगह है जिसे Viscera कहते हैं, इसके पूरी इसको. जितने भी उसमें organs हैं, इन्द्रियाँ हैं, सबको वो शक्ति देते हैं। इस चक्र में problem आने से diabetes वगैरह बीमारियाँ हो जाती हैं । लेकिन आज उस के जड़ में है जो साहिब से मिलाये। जो साहिब से मिलाए. जो परमात्मा से मिलाए. वही गुरु है। लेकिन हमारे यहाँ हर तरह के गुरु निकल आये हैं। और आप जानते हैं कि हम इतने विक्षिप्त हो गए है, इतने भ्रांतमय हो गए हैं कि कोई भी आदमी जेल से छूट करके और बैठ जाये गेरुआ वस्त्र पहन के; लगे उसके चरण छूने । पहली तो बात यह है कि गेरुए वस्त्र से हमारा क्या सम्बन्ध? हम तो गृहस्थ के लोग हैं। गृहस्थियों का गेरुए वस्त्र से कोई भी सम्बन्ध नहीं होना चाहिए। आप जानते हैं, अगर आपने पढ़ा हो कि वाल्मीकि रामायण में, सीता जी ने पूरा chapter (अध्याय) इन सन्यासियों के बारे में कहा है, कि जो सन्यासी हैं उनको शहर में तो आना ही नहीं चाहिए। किसी गाँव जो चक्र हैं, जिसे कि नाभि चक्र कहते हैं, उसके बारे में मैं आपको बताऊँगी। नाभि चक्र जो है, यह विष्णु का चक्र है, नारायण का चक्र है। अब कोई कहेगा कि ‘माँ, आप तो सब हिन्दू धर्म में कह रहे हैं।” लेकिन और भी लोग सारे सब इसी से विघटित हैं। ईसा मसीह बहुत ने भी कहा है कि जो मेरे विरुद्ध नहीं हैं, वो मेरे साथ में नहीं आना चाहिये। उसकी बहुत सारी मर्यादायें बताई। उस में यह कहा कि गाँव के बाहर उन्हें झोंपड़ी . Those who are not against me are with

अशान्ति जो है वो एकदम जम के पत्थर हो गई। अब आप हिल नहीं सकते ऐसी ही व्यवस्था हो गयी। क्योंकि यह लोग जो धन्धे करते हैं, जिस तरह से यह काम करते हैं. यह आप जानते है हम तो काफी उमर वाले हैं और हम सब जानते थे इसके बारे में। अब तो आप लोग सब younger generation के लोग हैं, शायद आपने जाना ही नहीं होगा कि, श्मशान विद्या, प्रेत विद्या. ताँत्रिक विद्या अपने देश में बहुत है। इस समय कुछ मुझे लगता है कि दिल्ली के लोगों का मन तांत्रिकों से कुछ हटा हुआ है, नहीं तो जहाँ जिस गली में जाइये वहाँ एक ताँत्रिक बैठा हुआ था. इस आपकी राजधानी में। इन तॉँत्रिकों का शौक आपको भ्रँत हो गया है और इसमें आप फँस गए। ऐसे छोटी-छोटी चीजों के पीछे में भागने वाले लोग परमात्मा को. कैसे पायेंगे? में रहना चाहिए और किसी भी गृहस्थ की ड्योढ़ी लाघनी नहीं चाहिए। हाँ, जो लेकिन जिसने सन्यास ले लिया उसको यह सब करना मना है। लेकिन हमारे यहाँ तो देखिये कि हम लोग गृहस्थी के लोग यज्ञ करने में लगे हुए हैं, अपने बाल-बच्चों को सम्भालते हैं। कायदे से रहते हैं, और उन (सन्यासों) लोगों का पालन-पोषण हमारी खोपड़ी गृहस्थ है गृहस्थ है। पर। एक तो हमारे बाल-बच्चे पलते नहीं और ऊपर से इन काशाय वस्त्र वालों को संवार कर बैठे रहिये सुबह से शाम तक। एक सीधी बात यह है कि कोई भी सन्यास लेने से परमात्मा के पास नही जा सकता। यह तो ऊपरी चीज़ है।’सन्यास’ अन्दर का भाव होता है। बाहर का नहीं होता आप जानते है कि राजा जनक को विदेही कहा करते थे और उनकी लड़की को वैदेही क्योंकि विदेही से पैदा हुई थी। वो स्वय राजा थे । राजा जैसे रहते थे, राजा जैसे आभूषण करते थे और उसके सामने बड़े-बड़े साधु, सन्त, दृष्टा, नत मस्तक रहते थे क्योंकि उनकी दशा यही थी, क्योंकि वो स्वयं साक्षात् दत्तात्रेय के अवतरण थे। आदिगुरु के अवतरण थे। लेकिन आजकल हमारे देश में इसकी संवेदना जाती रही। लोग बहुत ही भ्रांत हो गए हैं और ऊपरी तरह से कोई ऊपर से कोई दिखाने वाला. तमाशा वाला आदमी पहुँचा है, तो लोग उसके चरणों में पहले जाते हैं। कोई कोई तमाशा वो करना जानता हो, किसी भी तमाशे के पीछे में भागना हम लोगों में एक अगर माँगना है, तो कोई परम चीज माँगनी चाहिये। और परम में ही सब कुछ मिल जाता है- क्योंकि श्री कृष्ण ने कहा योग होगा तो तुम्हारा पूरी तरह से क्षेम होगा कोई महाशय कहते हैं कि “माँ मेरी तन्दरुस्ती अच्छी करो । ” मेरे पास बहुत से पहलवान आते हैं, कहते हैं “माँ हमें तो कोई शान्ति नहीं।” कोई आदमी कहता है” माँ मेरे पास पैसा नहीं दूसरा रईस आदमी आता है कहता है”मुझसे तो दुखी कोई दुनिया में है ही नहीं ।” इसका मतलब यह है कि सब संसार दुखी है। और इस दुखी संसार में आप अगर किंसी को ये सोचे कि दूसरे के पास कोई चीज है तो उससे वो सुखी है, ये आप को गलतफुहमी है। आप इस पर विश्वास करें कि जिस मनुष्य को आप सुखी समझते हैं वो महादुखी हो सकता है। लेकिन आपको पता नहीं है। इसलिए जिस चीज़ को आप माँग रहे हैं उससे आपको सुख नहीं होने वाला आपने जिस चीज को माँगना है, उसे मांगे है कि ‘योग क्षेम वहाम्यहम्’ पहले जब स्वभाव की एक बात होती है कि कोई तमाशाखोर पहुँच जाए तो उसके पीछे हम भागते हैं। फिर ‘हजारों लोग उसके चरणों में जायेंगे अरे भाई और फिर झूठी झूठी बातें उसके बारे में फैलाना कि उसने इस आदमी को ठीक कर दिया, वो ठीक हो गया, उनको शान्ति मिल गई इस तरह की गलत फुहमियाँ। बहुत से लोग कहते हैं कि हम उस गुरु के पास गये थे, हमको शान्ति मिल गई। मैंने कहा कैसी शान्ति मिली आपको, श्मशान शान्ति मिली होगी। अब आप हिल ही नहीं सकते, आपको अशान्ति तो है ही, लेकिन वो और वो है परम्। और वो परम् तत्व आपके ही अन्दर है. जिसको आपको पाना है। इसके लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं, किसी को कुछ देने की जरूरत नहीं. कुछ उसमें आडम्बर नहीं, बहुत सीधी सरल चीज़ है।

लोग अब बहुत जबरदस्ती करेंगे। अगर किसी से कह दें कि भई पैर न छुएं तो उनको तो लगता है कि माँ ने तो जैसे कि उनको शाप ही दे दिया मैं यह कहती हैँ. बेटे, तुम क्यों छू रहे हो? तुमको मैंने क्या दिया? किसलिए मेरे पैर छू रहे हो? जब तक तुमको कोई भी मैंने आत्मा का परिचय दिया नहीं, तब तक आप मेरे पैर क्यों छू रहे हैं? मैं भी कोई ढोंगी हो सकती हूँ, मैं भी कोई खुद गलत हो सकती हूँ। क्या वजह है कि आप मेरे पैर छूयें? आदत है। और इस आदत की जैसे कि एक बीज को आप अँकुर ला सकते हैं, यदि धरती माँ के उदर में डाल दें , उसी प्रकार यह कार्य हो सकता है। लेकिन मनुष्य के लिए सीधा- साधा होना भी कठिन हो जाता है। क्योंकि वो सीधे तरह से खाना खाना अब जानता ही नहीं। उल्टा हाथ फिरा के ही वो खाना खाता है कोई काम सीधे तरीके से करना उसकी बुद्धि के परे हो गया है, उसकी बुद्धि इतनी जटिल हो गई। सोच-सोच करके उसका दिमाग 1 ৭ी खराब हो गया है। इस गुरु के कारण कैन्सर जैसी बीमारी होती है। गलत गुरु के सामने अपनी पेशानी झुकाना। इसलिए किसी ने कहा है कि अपनी पेशानी सब के सामने मत झुकाओ। यहाँ तक कि मंदिरों में जब आप जाते हैं, कोई भी आदमी आपको टीका लगा दे। हर एक आदमी से आप अपने माथे पर टीका वजह से हमारा एकादश जो है, हमारे माथे पर जो एक बड़ा भारी चक्र होता है। जिसमें 1। रुद्र बैठे हैं। रुद्र जो आप जानते है कि संहार-शक्ति है। अगर आप किसी और को इस तरह से गुरु मान ले, तो दायें तरफ में आपके रुद्र पकड़ जाते हैं। और जैसे ही पकड़ जाते हैं, ऐसे ही कैन्सर की बीमारी तो पहली चीज है। कोई आदमी भी समझो एक politician (राजनीतिज्ञ) है, समझो किसी के आगे बहुत झुकता है। वो भी हो सकता है। एक अगर economics (अर्थ-शास्त्र) वाला आदमी है, या Business (व्यवसाय) वाला आदमी है वो अगर किसी के आगे लगवा लेते हैं, बहुत गलत दोष है। किसी का क्या अधिकार है कि वे आपके माथे को छूए? आप जानते हैं कि आपने तो कहा कि 9-10 साल मिलन को लागे’ मैं तो यही कहती हूँ कि हजारों वर्षों से आपको बना बना कर के आज परमात्मा ने मनुष्य बनाया है। और उसका आप किसी के सामने भी सर झुका देते हैं? किसी के सामने भी सर झुकाने को हमेशा लोगों ने मना किया है । सिर्फ साक्षात्कारी जो आदमी है वो ही जानता है कि किसके सामने सर झुकाना चाहिए। हम तो कहते हैं कि हमारे भी पैर छूने की आपको कोई जरूरत नहीं। और न छूओ तो अच्छा है। जब तक आप पार न हों, जब तक आप के हाथ में चैतन्य नहीं आया, हम आप के लिए वैसे ही, जैसे दूसरे हैं जैसे कि आप मंदिरों में जाते हैं वैसे हम यहाँ बैठे हुए हमसे आपको छूने से क्या फायदा? चरणों में आने का तभी फायदा हो सकता है अगर आपके अन्दर वो connection (योग) शुरू हो गया। अगर हम माइक्रोफोन के सामने बात कर रहे हैं और यह जरूरत से ज्यादा नतमस्तक होता है, अपने Business (व्यवसाय) के लिए.. वो भी कोई भी आदमी जरूरत से ज्यादा अगर किसी के सामने सिर झुकाए, तो उसको कैन्सर की बीमारी हो सकती है। उसके इधर की जो 5 रुद्र में से पांचों रुद्र पकड़ सकते हैं। इसलिए सब के सामने नतमस्तक होना मनुष्य के लिए बिल्कुल वर्जित है। लेकिन किसी से अकड़ना भी वैसी बात है। कि “मैं ही गुरु हूँ” मैं ही भगवान हूँ, मैं ही सब कुछ हूँ, मैं ही सब कुछ करता हूँ, मुझे कौन बताने वाला है।” ऐसे भी लोग हैं जो कहते हैं कि तुम ही गुरु हो, और तुम इसे खोजो, दूसरों को खोजने है मख दो। तुम ही हो सब कुछ। यह भी बात गलत । क्योंकि आप मुक्त सा० त्कारी नहीं है। जब तक एक दीप जला नहीं, तब तक वो अपने आप से जल नहीं connection (योग) ही नहीं है तो बात करने से फायदा क्या? इसलिए किसी को भी पैर पे जाना और पैर पे लेना दोनों ही दोष है, मैं समझती हूँ। क्योंकि सकता। एक जला हुआ दीप ही उसे जला सकता है।

(आलीशान कर) दें तो मैं आऊ। अब सब लड़कों ने पर उस में लेना-देना कोई नहीं बनता है। उसमें किसी तरह का स्वार्थ नहीं होता है। किसी भी तरह का उपकार नहीं होता। यह तो और जो दीप जला हुआ उसे छू गया, आप जल गए। उसमें किसी भी तरह की ऐसी बात नहीं आती कि जिसमें आपको पूरी तरह से यह कहना है कि आपका एक साल भर सिर्फ आलू खाया, पैसा बचाया और आपका दीप जला नहीं .उनको Rolls Royce दी एक लामा साहब पहुँचे वहाँ-यह लोग आकर मुझे बताते हैं तो मुझे बड़ी हैरानी हुई। लामा साहब, जो कि बहुत साधु सन्यासी बनते हैं, वहाँ पहुँचे तो कहा कि “हमें तो Marble के Floor (संगमरमर का फर्श) के सिवा और कुछ नहीं चाहिये।’ से कोई व्यक्तित्व ही न रह जाए, कि आप एकदम से वहाँ Marble बड़ा महंगा मिलता है, स्वीडन में। तो स्वीडन के बिचारे लोगों ने भूखे रहकर उनके लिए Marble का Floor (फर्श) बनाया, तो वो पधारे वहाँ। और पधारने के बाद, यह चीज कि आप उनके सामने, जाइये तो एक हजार एक बार आप उनके सामने झुको। मैं आपको इसलिए यह सब बातें बता रही हूँ कि सब चक्कर में आप लोग होते ही हैं। सवेरे दस आदमी मिलने आए। उसमें से नौ उस चक्कर में कि माँ हमें समझ नहीं आता हमने तो गलती नहीं करी। मैंने कहा कि तुम खोजने क्या गये थे, यह बताओ। जिसने परम की बात की और जिसने परम दिया, उसी के चरण में जाना चाहिए और उसी के शरण में पागल जैसे उनके पीछे लगे रहें। अभी ऐसे बहुत लोग मैंने देखे। स्पेन में 50,000 लोग ऐसे हैं कि जो एक गुरु मुहाराज कोई हैं उनके पीछे में इतने नत-मस्तक है कि पागल हैं। स्पेन की महारानी हमें मिली थीं । वो कह रही थीं कि ” अपने देश से ऐसे ऐसे आप गुरु घण्टाल यहाँ भेजते हैं कि उनका क्या करें? कुछ समझ नहीं आता। हमारे यहाँ पचास हज़ार युवा लोग एकदम पागल हो गये। इस तरह के न जाने कितने तरह-तरह के लोग आपने बाहर भेज दिये हैं । आपको Export (निर्यात) के लिए और तो कुछ मिला नहीं इस देश में तो बढ़िया से उठा उठा कर ऐसे लोगों को बाहर भेज दिया है कि सबने नाक कटाकर रख दी है। और उनके लिए अगर कुछ कहें तो लोग कहते हैं कि माँ आप तो बहुत intolerant (असहिष्णु) हैं। तो क्या ऐसे लोगों को हम हार पहनायें? उनकी आरती उतारें और उनको सिंहासन पर बिठायें? पहले जमाने मे तो दैत्यों को मारा जाता था। मार के उनकी पूर्णतया हत्या कर दी गई। लेकिन अब कम से कम उन को कहा तो जाए कि “ये दैत्य हैं और राक्षस हैं।” उसमें आप लोगों को क्यों इतनी परेशानी हो जाती है? क्या आप भी उन्हीं के साथ मिले हुए हैं? दूसरे लोगों को लूटना, खसोटना, उनसे पैसा लेना, उनको दूसरे मार्ग में डालना, यह कहाँ का धर्म है? और वो भी भारतीय होकर के आपको क्या अधिकार है? यह एक तरह का अजीब-सा छिपा हुआ aggresion (अत्याचार) है। और यह इस तरह से छाया हुआ है कि आप आश्चर्यचकित होंगे कि एक साहब, लंदन आते है और उन्होंने कहा मेरे लिए अगर आप Rolls Royce भी जाना चाहिये. बाकी सब बेकार है। ये बातें जो हैं- बातों से तो इन्सान का दिमाग खराब हो जाता है। आपने सुना होगा बहुत से लोग वेद पर बात करते हैं। वेद. वेदाचार्य, यह वो। एक महाशय बम्बई में है, बड़े भारी वेदाचार्य है। पंडितों के पंडित वो उमर में हमसे छोटे है। लेकिन वो जब बात करते हैं तो ऐसा लगता है कि सठिया गए हैं। जो बकते चले जाते हैं, ऐसे बकते चले जाते हैं कि कोई उनके पास पाँच मिनट खड़ा होना नहीं चाहता। अब उनको समझ नहीं आता कि लोग उनसे भागते क्यों हैं? इस कदर क्रोधी और म तापमय इंन्सान है, कि जो भी उनके पास बैठता है कहता है, “बाप रे बाप यह तो एकदम तूफान आ गया।” और गुस्सा उनको इतना आता है कि अगर उनकी बात किसी को समझ नहीं आई तो कहते हैं कि तुम तो ऐसे दुष्ट हो, तुम तो ऐसे खराब हो; और लेकर मारना शुरु कर देते हैं। अब बताइये इतने

उन्होंने कहा 4 दिन का उपवास। बस हम करके वेदाचार्य और फलाने ढिकाने होते हुए उनके यह सारा बाहर ही रह गया है। कुछ उनके हृदय में कुछ नहीं दिखायेंगे। यह सब चीजों से परमात्मा नहीं मिलता है। सहज-सरल। सहज समाधि लागे। सहज। सहज गया। न उनमें दया, न अनुकम्पा, न कुछ, बस बड़बड़ाते रहते हैं सुबह-शाम। ऐसे मैंने फ्रॉस में बहुत से देखे। वो तो बस में चढ़ते हुए बड़बड़ाते हैं। पूछा क्या, तो क्या कहने लगे कि ये बड़े भारी पादरी थे मैंने कहा वाह भाई, यह पादरियों का अन्त। एक बड़े भारी पादरी थे इसलिए हम उन को कुछ कहते नहीं बस बड़बड़ाते चलते हैं सुबह से शाम तक। ऐसे बहुत मिलते हैं फ्राँस में। मेरे ख्याल से वहाँ इस तरह के होना चाहिए। जो चीज़ सहज नहीं है जिसमें असहज है, वो परमात्मा की चीजू हो ही नहीं सकती एक सीध बात आप सोचिये कि आप इन्सान बने आपने कौन सी मेहनत करी? आप क्या सिर के बल खड़े हुये, कि आपने क्या अपनी दुमें काटी थी? किस तरह से आप बन गए? आप इन्सान अपने आप सहज सरल बन गये इसी प्रकार ऊंची स्थिति में जाने के लिए भी ‘सहज’ ही भाव होना चाहिए और जब तक प्रकार बहुत हो चुके है। लोगो ने बहुत अध्ययन, अध्ययन किए। तो इस तरह के गुरु हो कि जो सिर्फ बातचीत ही बातचीत करें। आपको कहेंगे पचास पारायण करो। सहज भाव नहीं आता है तब तक आप जो भी ऐसी ऊट-पटाग चीजें करते हैं उससे आपको नुकसान होगा. तकलीफें होंगी, चक्र पकड़ेंगे, आपको परेशानी होगी- चाहे वो शारीरिक हो, मानसिक हो. या बौद्धिक हो, मगर आप परेशानी में फँस जायेंगे इसलिये मैंने पहले ही कहा सहज भाव में बैठे और कहा कबीर को गाओ। क्योंकि कबीर सहज भाव में गाते थे उनका मिलन हो चुका था, इसलिए वो मिलन में गाते थे। दत्तात्रेय का आप पारायण करो। गुरु का आप पारायण करो। पचास पारायण करने के बाद में मिला क्या? एक महाशय हमारे पास आए, हमसे कहने लगे माँ हमने तो चौदह वर्षों की तपस्या की। मैंने कहा अच्छा, और?” “उन्होंने सिर्फ पारायण करने को कहा और शिवजी का मन्दिर धोता रहा।””और अब क्या हुआ।” कहने लगे “एक मिनट में कुण्डलिनी जागरण हुआ।” तो मैंने कहा, “भाई यह सोचना चाहिये, पारायण करने से परमात्मा मिलता है तो अपने देश में तो कितने लोग हैं जो पढ़ भी नहीं सकते। इसका मतलब कि उनको परमात्मा नहीं मिलेगा? सिर्फ पढ़े लिखे लोगों को मिलेगा? जो वेदाचार्य हैं, उनको मिलेगा? अब यह जो नाभि चक्र है इसमें एक दफ़ा तो यह हुआ कि जहाँ आपने किसी को भी गुरु मान लिया ऐरा-गैरा नत्थू-खैरा जिसे कहते हैं कि किसी को भी गुरु मान ले। गलत आदमी को गुरु मान लिया। गलत चीजों में सिर झुका लिया। दूसरे ऐसे होते हैं कि जो किसी को मानते ही नहीं । भगवान को भी नहीं मानते ।”मैं ही सब का गुरु हूँ।” तो बायें ओर के पाँच रुद्र हैं वो पकड़ जाते हैं। इस प्रकार के दो प्रकृति के आदमी होते हैं। अब जो किसी को नहीं मानते जो बड़े भारी वेदाभ्यास करने वाले हैं, इनके बारे में मैने आपको वर्णन कर ही दिया कि किस तरह के होते हैं। और उनके जो प्रभूति होती है इस कदर धनीभूत तरीके से. क्रोधी होती है कि इस आदमी के पास भगवान हो ही भी विश्वास नहीं करता। भगवान इनके पास से गुजर जो वेद पढ़ सकते हैं, संस्कृत जानने वाले कितने लोग हैं? मैं कहती हैँ. कुरान-शरीफ पढ़ने वाले कितने लोग हैं? या बाइबल पढ़ने वाले कितने लोग हैं। मतलब जो पढ़ते नहीं वो काम से गए। ऐसे कैसे हो सकता है? जो परमात्मा है, सबका ही निर्माण करने वाला है, सबको ही प्रेम करने वाला है. वो कभी ऐसे काम करेंगे?” इसलिए जो गुरु-तत्व में खराबी आ जाती है उससे आप सब बचकर रहिए। और यह गुरु तत्व हर तरह से आपके अन्दर एक हद, एक तरह की सीमा बाँध देता है। “कि हम यह करके दिखायेंगे । ” सकता है, ऐसा कोई

पी रहे हैं? इतनी घृणा हो गई। हमने तो कुछ नहीं किया हम तो वहीं लन्दन में बैठे हुये थे। सकते हैं, ऐसा भी कोई नहीं विश्वास कर सकता। परमात्मा जो है, वो प्रेम का, आनन्द का, लेकिन आप ही स्वयं धर्म हो जाने की वजह सौख्य का और अनुकम्पा का सागर है, क्षमा का सागर है। जिस आदमी में इस कदर क्रोध, इस कदर से क्योंकि यह आपके अन्दर दस गुरु जागृत हो जाते हैं साक्षात् धर्म हैं। इसकी वजह से अपने आप ही गन्दी आदतें छूट गई। फिर उसके बाद, गन्दी आदतें छूटने के बाद में आप की दृष्टि वहाँ जाने लगी कि जिससे आपको लक्ष्मी का है । जै से एक महाशय-आपको विश्वास इस बात का भी होना जरा कठिन है लेकिन आपसे बतायें- एक हमारे पहचान के थे उन्होंने हमें बताया कि “माँ जब से मैं सहजयोग सब के साथ ये तृष्णा है, बो आदमी कभी भी परमात्मा का आदमी हो नहीं सकता। अब, भवसागर के बीच में जो विष्णु का तत्व है इसके बारे में मैं जरूर आपको बताना चाहूँगी। क्योंकि अपने देश में हर एक जगह जाइये तो लोग मुझसे ऐसे कहते हैं कि माँ हमारी गरीबी का क्या होगा? जैसे कि इन लोगों ने कुछ गरीबी का ठीक ही किया होगा जो मुझसे कहते हैं कि गरीबी का क्या होगा। वही बात हुई “कृष्ण ने कहा कि ‘योग क्षेम हुआ? कहने लगे कि “जिस जमीन पर मैं ऐसे टहलता वाहम्यहम्’- पहले योग को प्राप्त हो, उसके बाद आपका मैं क्षेम करूंगा जिस जिस गाँव में सहजयोग हुआ. जहाँ-जहाँ हम गये, जिन्होंने योग पाया, उनके सब प्रश्न solve (हल) हो गये किस प्रकार? सबसे पहले तो सारी गन्दी आदत छूट जाती हैं; धर्म जागृत हो करने लग गया हूँ बड़ा चमत्कार हुआ।” मैने कहा क्या था, उसकी मिट्टी इतनी बढ़िया हो गयी कि एक आदमी आकर मुझसे कहने लगा कि भई किसी फकीर ने आकर हमसे बताया कि यहाँ की मिट्टी थोड़ी-सी लेकर के अगर तुम ईंटे बनाओ तो पत्थर जैसी हो जायेंगी। तो वो हमारे यहाँ आया ओर हमसे तो बिल्कुल तोल कर मिट्टी ले जाता है।” लेकिन पहले जागृति होनी चाहिये, लक्ष्मी तत्व की। लक्ष्मी तत्व की जागृति किये बगैर, अगर आप चाहें आपके अन्दर लक्ष्मी आएगी तो नहीं। पैसा आ जायेगा। पैसा आ जाएगा, पर लक्ष्मी जी नहीं आयेंगी। और लक्ष्मी जी कैसी होती जाता है। मनुष्य के अन्दर की जितनी भी आदते हैं, जिससे मनुष्य जकड़ा हुआ है वो सारी ही एक साथ जाती हैं। आप जानते हैं कि बता रहे थे कि टूट 200 आदमी हमारे साथ परदेश से घूम रहे थे, इन लोगों में से न जाने कितने Drug (मादक द्रव्य) लेते थे, कितने alcoholics (शराबी) थे, कितने कैसे कैसे थे हम तो कुछ देखते नहीं। जो आया उसे पहले पार करो। पार होने के बाद धर्म जागृत हो गया एक महाशय थे वो बहुत शराब पीते थे। फिर सहजयोग में आते ही दूसरे दिन से उनकी शराब छूट गई । एकदम शराब छूट एक बार जर्मनी गये थे, उन्होंने कहा कि देखें कैसा क्या है। उनको एक शराब बहुत पसन्द थी। पीने के साथ कहने लगे ऐसी उल्टियां हुईं, और उसमें से ऐसी गन्दी बदबू आने लग गई कि हैं? एक हाथ से उनके दान है। एक हाथ से उनका आश्रय है, और हाथ में दो कमल के सुन्दर पुष्प है, जो कि उनके प्रेम के प्रतीक हैं, और इतना ही नहीं , एक – भँवरा जिसके अन्दर इतने काँटे हैं, उसे तक वो अपने अन्दर समा लेती है। ऐसे लक्ष्मी पति आप हो सकते हैं जो समाधान में, इतने सन्तुलन में खड़ी हैं। वो कमल पर ही खड़ी रहती है इतनी सादगी से, इतनी dignity (मर्यादा) से वो रहती हैं । मैं तो बहुत आजकल देखती हूँ कि जो पैसे वाले हैं उनके अन्दर कोई dignity ही नहीं । उनके अन्दर दिखाई नहीं देता है कि इनके अंदर गई। तो हमने कहा कि यह क्या Molasses पी रहे हैं कि क्या ‘कार्क’ पी रहे हैं, और समझ ही नहीं आ रहा कि क्या

के लिये भी अब यह हो गया है कि पति से बढ़कर के पैसा उनकी, बच्चों से बढ़कर के पैसा हो गया । हर चीज में पैसा जहाँ पैसा मुख्य हो जाता है और प्रेम नगण्य हो जाता है, वहाँ लक्ष्मी का स्वरूप खत्म हो कोई प्रतिष्ठा हो। बिल्कुल अप्रतिष्ठित तरीके से इस तरह से करते हैं कि समझ में नहीं आता कि इतनी चापलूसी करने की इनको क्या जरूरत है जब इनके पास लक्ष्मी का प्रसाद है? पर लक्ष्मी का प्रसाद नही, सिर्फ पैसा है। गधे के ऊपर आप अंगर नोट लगा जाता है। वहाँ सब लक्ष्मी का स्वरूप खत्म हो जाता दीजिए तो क्या वो लक्ष्मीपति हो जाएगा? तो ऐसे पैसे है। और उस जगह सिर्फ पैसे का एकदम ‘रूखा’ वाले से वो लक्ष्मीपति जो अपने ‘शान’ में अपने जीवन आ जाता है जो आज आपको परदेश में दिखाई “गौरव’ में खड़े रहते हैं। जो किसी के सामने हाथ नहीं देता है यहाँ से भी हिन्दुस्तानी परदेश में जाते हैं फैलाते। जब है, तब बाँटते ही रहते हैं। ऐसे हमने उनको पता नहीं क्या हो जाता है, सारी परम्परा टूट अपनी आँखों से लोग देखे हुये हैं। ऐसे हमने जाने हैं करके वो बेतहाशा पैसे के तरफ दौड़ते हैं। मैं तो उन लोग जो होते हैं। स्वयं हमारे पिता इस तरह के थे। उनकी इतनी दानी प्रवृत्ति थी कि वो सवेरे हर इतवार को चीजें बाँटा करते थे। किसी दिन कम्बल बॉट दिया, किसी दिन कुछ। और उनकी आँख हमेशा नीचे रहती थी, और देते रहते थे। देते रहते थे। लोग है। ऐसे पैसे वालों को बहुत बुरे दिन भी देखने पड़ते लोगों को देखकर के हैरान होती हूँ कि यह क्या मेरे देश के लोग हैं? इस तरह से जब हम अपने को गलत रास्ते पर डाल देते है, तब उस पर बहुत जोर का मार आती दो-दो ले. जायें, तीन-तीन ले जायें तो कोई क्या हैं। उनके बच्चे, जो वाहियात निकल जाते हैं, इधर-उधर दौड़ जाते हैं और गलत काम करते हैं । ऐसे पैसे वालों के लिए कोई भी आशीर्वाद नहीं होता। आप जाकर देखिये, रातरात भर सोते नहीं। उनको परेशानियाँ हैं। तो जो पैसा लक्ष्मी स्वरूप है, उस पैसे को आप प्राप्त करो। उस सम्पत्ति को, उस धन को उनसे कहें कि “क्या कर रहे हैं आप? और दो-दो तीन-तीन कम्बल आदमी लिये जा रहे हैं, आँख क्यों नीची की हैं?” कहते “भई मैं दे नहीं रहा हूँ, दे कोई और रहा है। इसलिये मुझे शर्म लगती है। सब लांग कहते हैं आप दे रहे हैं।” ऐसे तो बड़े स्वतन्त्र वीर थे, लेकिन वो इस मामले में उन्हें शर्म लगती थी कि लोग मुझसे कह रहे हैं, मुझे बड़ी लज्जा आती है. लोग मुझे कह रहे हैं कि दे रहे हो तुम और देते वक्त में कहने लगे “देने वाला जो वो जाने, मुझे क्या करने का है। मैं तो बीच में खड़ा हुआ हूँ।” ऐसे लोग थे पहले इस भारत में अब तो पता नहीं कुछ दिखाई नहीं दे रहा आप प्राप्त करते हैं. जो लक्ष्मी की देन है जब आपके अन्दर कुण्डलिनी जागृत होती है। और इसलिए इस देश का जो दारिद्र है, उसी दिन होगा जब यहाँ पर लोग योग को प्राप्त हों। उससे पहले कभी नहीं हो दूर सकता; आप कोशिश कर लीजिये। मैं गई थी. राहुरी में, मैंने देखा कि खूब इस तरह का तरीका। पैसे वाले का मतलब तो यही हो गया कि बहुत घमण्डी, बहुत क्रूर और किसी की झोपड़ियाँ बनी हुई थीं कहने लगे यह झोंपड़ियाँ परवाह नहीं। अपने माँ-बाप की परवाह नहीं, अपने . बनाई। मैंने कहा “अच्छा।” कोई नर बनाया गया भाई बहनों की परवाह नहीं, अपने को बहुत सब कुछ है। मैंने कहा, यह नगर कैसा? पता नहीं । वहाँ से जा समझना। यह पैसे वाले के लक्षण हैं। दुनिया में किसी रहे थे तो सामने रास्ते पर लोग खूब शराब पी-पी की भी परवाह नहीं करना। यह जो हमारे यहां अब पैसे करके आकर धड़ाधड़ गिर रहे थे एक तो हमारे का भूत सवार हो गया है, इस भूत से हमारी जो समाज-व्यवस्था है पूरी तरह से टूट जायेगी औरतों मोटर के सामने गिर गया। और एक नहीं, दो नहीं काफी सारे लोग वहाँ से निकले जा रहे थे। मैंने कहा,

यह कौन सा नगर बनाया? यह कहें? यह झोंपड़ियों और इस तरह की चीजें जब तक आपके समाज से का नगर बनाया, इसमें सिर्फ शराब ही चलती है? जायेंगी नहीं आपके समाज की गरीबी कभी हट नहीं कहने लगे, हाँ “यह तो ऐसे ही नगर हैं।” उनको सकती क्योंकि लक्ष्मी जी ऐसे स्थान में बसती नहीं । झोंपड़ी दी तो उसमें शराब शुरु कर दी, और 100 रुपये दे दिये तो उस ने शराब शुरु कर दी। यह कोई गरीबी हटाने का लक्षण नहीं दिखा। इस तरह से गरीबी नहीं हटेगी। यह तो शराब ऐसे पीछे पड़ गयी कि इस में से 50 फीसदी गरीब मर ही जायेंगे, तो गरीबी मिट ही जायेगी। इलाज तो ऐसा हैी हो रहा स्त्री भी पुूजनीय होनी चाहिये। स्त्री भी ऐसी हो कि कि लोग जीने ही नहीं वाले। रास्ते पर ऐसे धड़-धड़ गिर रहे थे, उनमें कोई ताकत नहीं थी क्षीण-हीन ऐसे हुए लोग। इनकी गरीबी आप क्या हटा सकते हैं? इनको तो पैसा वो सब देने से इन्होंने शराब पी-पी करके और धन्धे कर कर के और अपना तीसरी चीजू जिससे लक्ष्मी जी हमारे देश में नहीं है उसका मुख्य कारण यह है कि “यत्र नाया पूज्यते तत्र रमंते देवता” माने यह कि जो इन्सान स्त्री की पूजा करता है, स्त्री को मानता है, उसकी इज्जत करता है, वहाँ देवता का रमण होता है। लेकिन है न की जाए, तो ऐसी स्त्री से फायदा जिसकी पूजा क्या? तो स्त्री ऐसी होनी चाहिये जो पूजी जाए। जो पजनीय हो जो पवित्र हो। जो उच्च विचार लेकर के संसार में आये। प्रेम से अपने घर और रिश्तेदार और सबको सम्भाल के रखे। ऐसी जो स्त्री हो, जो पूजी जाये, ऐसी स्त्री के पति जो हों उसकी इज्जत करें, घर वाले उनकी इज्जत करें| स्त्री की, बच्चों की, लड़कियों की. माँ की, जहाँ इज्जत होती है वहाँ देवता रमण करते हैं। नहीं तो भूतों का नाच शुरु हो जाता है। अब आप सुन रहे हैं कि अपने देश में स्त्री की क्या स्थिति है मैं तो तब भी कहूँगी कि हिन्दुस्तान की नारी एक विशेष स्वरूप की औरत है जिसने बहुत कुछ सहन किया। पुरुषों की ज्यादती जितनी हिन्दुस्तानी नारी सहन करती है और कोई नहीं सहन सर्व-सत्यानाश कर लेना है। अब गरीबी हटाने पर एक और प्रश्न है कि जब हम इस तरह की तांत्रिक विद्या और ऐसी मैली विद्या करते हैं तो लक्ष्मी जी दूसरे पैर से चली जाती हैं। जिस घर में तांत्रिक विद्या शुरु हो जायेगी, लक्ष्मी जी दूसरे पैर से चली जायेंगी। आज मैं विशेषकर धर्म पर बात कर रही हूँ क्योंकि यह जानना बहुत जरूरी है कि हम धर्म में कितनी गलतियाँ करते हैं। जो लोग अपने घर में दिवाली मनाते हैं, हर जगह दीप जलाते हैं रात को क्योंकि बाहर रात्रि थी। उस वक्त यह न हो कि लक्ष्मी कहीं लौट के चली जाये। उनको अन्धेरा पसन्द नहीं। और जितनी मैंली विद्या, जितनी भूतविद्या, प्रेत विद्या, श्मशान विद्या और यह दुष्ट गुरुओं का जो चक्कर है चला, जो अगुरु लोग जो हैं, इन्होंने जो चक्कर चलाए हुये हैं, इन्हीं सब चक्करों के वजह से अपने देश गें बिल्कुल कालिख पुत गई है, एकदम करता। और अपना समाज ही पूरा ऐसा बन गया है कि आज़ बिल्कुल हम लोग इस मामले में निर्लज्जता से बात करते हैं। कोई कहता है कि “साहब इतने लाखों रुपये dowry (दहेज) में दीजिए और नहीं तो आपको हमारे दरवाजे में प्रवेश नहीं । बिल्कुल उन लोगों को इस मामले में शर्म भी नहीं जती, इरा तरह की बात करने की और इस तरह की चीजें इतनी हमारे समाज में आज प्रचलित हो रही हैं। जितनी जितनी ये बढ़ती जायेंगी उतनी उतनी आपके देश में गरीबी आयेगी। किसी लड़के को बेचकर के और लड़की काला अन्धकार हो गया है। और वो काला अन्धकार होने के वजह से अपना देश उठ नहीं पाता। जब तक इन लोगों को आप सगुद्र नें नहीं डाल दीजिएगा, जब इनको आप अपने हृदय में से निकाल नहीं दीजियेगा के नाम पर अगर आपने रुपया इक्कट्ठा किया, आप

को दे देंगे जो भी घर में है, जो हो अपने हृदय से देख लीजिए उसमें कभी भी आपको यश नहीं आयेगा । आप करके देख लीजिये कोई आदमी लाखों रुपया इस तरह से ले ले उसको कोई न कोई घाटा आएगा, कोई न कोई बड़ी बर्बादी होगी और वो ऐसी दशा में पहुँच जाएगा कि जहाँ से निकल नहीं पायेगा। या तो कोई ऐसी बीमारी में फँस जाएगा या ऐसे कोई बेकारी में फँस जायेगा कोई न कोई ऐसी चीज उसे मिल निकालकर। हमारे साथ लोग सफ्र कर रहे थे देहातों में हैरान थे. कि लोग झोपड़ियों में रहते हैं मगर उन का दिल है कि राजा जैसे। और यह लोग महलों में रहते हैं और ये हैं बिल्कुल भिखारी। मैं तो रोज के अनुभव लन्दन में देखती हूैँ कि जितने भी विदेशी लोग है बड़ी-बड़ी position (पद) में हैं, बड़ी-बड़ी इस में हैं। आप उनको कितने भी presents (उपहार) दे दीजिये, कुछ भी कर दीजिये, उनसे एक पैसा नहीं निकलेगा। हमारे साहब की सेक्रेट्री हैं, वो साहब से कहती है कि “आपके grand children (नाती) आ रहे है, तो आप परेशान नहीं? उन्होंने कहा क्यों? जाएगी कि जिससे वो पछताएगा। क्योंकि किसी भी सती स्त्री किसी भी स्त्री जाति का अपमान् करना शक्ति का अपमान है। अगर वो स्त्री इसी तरह की है कि जो बेकार है और पूजनीय नहीं है, उसके बारे में मैं नहीं कह रही। पर अपने भारतवर्ष में आज मैं जरूर आपका सारा घर गन्दा हो जाएगा।” उन्होंने कहा यह किसके लिए घर है, यह क्या मेरे लिए घर है? यह तो उनके लिए घर है जो मेरे बच्चे आये हैं । उनका यह था कि कहती हैं “जो हमारी grand mother थीं जब तक दो पैसे हमसे नहीं लेती थीं हमको टेलीफोन नहीं करने देती थी।”और उसी लन्दन शहर में आप कहूंगी कि यहाँ की स्त्री बहुत बहुत पूजनीय है। अब भी औरतें हमारे यहाँ glamour (चमक- दमक) वगैरह में विश्वास नहीं करतीं। अब हैं कुछ पागल उनको छोड़िये। लेकिन अधिकतर औरतें सादगी से, अपने चरित्र को सम्भालते हुए रहती हैं । जिस देश में पद्मिनी जैसी लोगों ने जौहर किये-कोई विश्वास नहीं करता। अगर परदेश में जाकर मैं कहूँ कि हमारे देश में तो chastity (पवित्रता) के पीछे औरतों ने जौहर कर दिया तो कहते हैं यह हो ही नहीं सकता है। मैंने कहा आश्चर्य करेंगे, कि दो बच्चे हर हफ्ते में मारे जाते हैं। तो ऐसे देश की affluence (धन-सम्पत्ति) से भगवान बचाये रखें। तुम क्या समझोगे, उस ऊँची चीज को तुमने जाना नहीं। उन आदर्शों को तुमने जाना नहीं । आप लोग उस ओर जाने की कोशिश न करें। जो कुछ है उसमें समाधान से परमात्मा को दृष्टि देकर के अपने लक्ष्मी तत्व को आप जागृत करें। इस आज उन आदर्शों को सब को छोड़ के और हम इन पागलों के पीछे अगर भागना शुरु कर दें तो मैं आपसे बता रही हूँ कि गरीबी जो नहीं आनी थी वो आ जायेगी । और इन लोगों में क्या कम गरीबी है? आप इनको समझते हैं रईस हैं? मैं तो समझती हूँ इनसे गरीब कोई नहीं। इनके अगर घर जाइयेगा और देश का लक्ष्मी तत्व बिल्कुल जागृत हो सकता है, पर सौष्ठव और उनका गौरव समझते हुए। अगर हम उसको न समझें और व्यर्थ की चेष्टाओं से, चाहें कि लक्ष्मी इक्कट्ठा कर लें, तो कभी भी हमारे अन्दर लक्ष्मी तत्व जागृत नहीं हो सकता। यह ही अपने देश का कर्मोपाय है, कि अपने धर्म में जागृत हों यह हमारे देश के लिए एक ही तरीका है। एक कप चाय दिया तो उनका दिल बैठ जायेगा। अगर एक कप चाय उनके घर से खर्च हो गया तो उनका दिल बैठ जायेगा। और हम लोग दिलदार हैं । गरीब भी है तो भी हमारे घर में कोई आता है. तो उसे चाय पानी कुछ न कुछ, कुछ नहीं है तो गुड़ ही, खाने इतना ही नहीं, लेकिन जब ऐसा होगा- और होगा ही, क्यों नहीं होगा?- उस वक्त सारी दुनिया के देश आपके चरणों में लौटेंगे और जानेंगे कि असली

लोगों की मदद हो सकती है, वो करना चाहिए और अच्छे मार्ग में, सन्मार्ग में रहना चाहिए। अच्छे काम करने चाहिए। सबसे बड़ी चीज है परमात्मा का आशीष। श्रीवन्ती जो है, असली रियासत जो है वो इस देश में हैं। अब भी लोग देखते हैं तो आँखे खुल जाती हैं कि कहते हैं कि “इतने गरीब लोग साफ लोटा मॉजकर के उसमें लेकर के आ गये। हमें देने के लिये।” यह लोग विश्वास नहीं कर सकते कि इतने बड़े हृदय के लोग इनके देहातों में कैसे रहते हैं। जब तक उसका आशीष नहीं मिलेगा, सब चीज व्यर्थ है। उसमें कोई शोभा ही नहीं हैं। ऐसे घर में जाओ तो आपकी टाँगे टूटने लग जाती हैं। आपको लगता है दूध “कब भागे इस घर से। उनका खाना खाओ तो आपको उल्टी हो जायेगी। कोई न कोई तकलीफ हो जायेगी। ऐसे लोग जो बिल्कुल ही पैसे से जुटे हुए हैं मशीन बन जाते हैं। उनके अन्दर कोई हृदय नहीं है। वे लोग सोचते हैं हमारे घर में कुछ भी नहीं है, हम भूखे रह जायेंगे, ऐसे लोगों के घर का खाना न लीजिये । सो उस चीज् को खोना नहीं है। और ये समय ऐसा आया है कि हम खो रहे हैं। हमारे बच्चे बिगड़ रहे हैं, और उस ओर हम जा रहे हैं। इस वक्त बहुत जरूरी है कि सहजयोग की स्थापना कस्के और अपने बच्चों को रोक लीजिये उनके अन्दर लक्ष्मी तत्व जागृत करके उनके अन्दर यह गौरव भर दीजिये। मनुष्य को यह जान लेना चाहिए कि हमारे अन्दर परमात्मा ने स्वयं साक्षात् लक्ष्मी का स्थान रखा है। वो हमारे अन्दर बसी हुई हैं। सिर्फ उनको जागृतमात्र करना है। और उस जागृति के लिए आपको आज मैंने आपसे विशेष करके लक्ष्मी तत्व पर बात की है, क्योंकि ये बहुत जरूरी चीज है। आप लोग जाने कि हमारा देश गरीब क्यों हैं? और इसकी गरीबी, आप गरीबों को रुपये देने से नहीं होगा आप्र देकर देखिये। आप किसी भी गरीब आदमी को सौ बुद्धि के कोई घोड़े दौड़ाने की जरूरत नहीं, कोई रुपया दीजिये। न वो शराब के अड्डे पे गया तो कहाँ जाएगा। कोई भलाई नहीं। इसलिए आप जान लीजिये कि पैसे को झेलने के लिए भी लक्ष्मी तत्व जरूरी है। ऐसे ही रईस लोगों को भी सोचना चाहिए कि पैसा जो है वो परमात्मा ने हमारे लिए दान के लिए दिया है। हम बीच में एक माध्यम बने खड़े हुए हैं, और उसको दान के लिए दिया हुआ है। इसका जो कुछ कर्म हो सकता है वो करना है और इससे जो भी विशेष सोचने की जरूरत नहीं। सिर्फ कुण्डलिनी का जागरण होते ही यह कार्य हो सकता है। तो इसे क्यों न करें? और इसे करना नितान्त आवश्यक है। और यह होने का समय आ गया है। एक विशेष चीज है कि यह विशेष समय आ गया है और इस विशेष समय पर आप इस वक्त उपस्थित है। इसका आप पूरी तरह से उपयोग करें और अपने लक्ष्मी तत्व को पहले जागृत कर लें। शुभ