Talk on Holi day

New Delhi (भारत)

1984-03-16 Holi Celebrations, Delhi, India, 165'
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Talk on Holi Day Date 17th March 1984 : Place New Delhi : Puja Type English & Hindi Speech Language contents Hindi

[Original transcript Hindi talk, Scanned from Hindi Nirmala Yog]

आप लोग रूपया तक देने भई सुबह चार बजे उठो, अगर कानफन्स है तो। से घबराते है । यह गलत वात जो जरूरी चोज है वह है ध्यान करना। जो बड़ा है। यह सुनकर तो मुझे बड़ा goal (उद्देश्य) है उसे देखना चाहिये। जो चीज आ्चय हुआ कि बम्बई के लोग है, बह है ज्यान करना। Conference (सभा) ह जो औ जरूरी चीज है, वो है ध्यान करना जो बड़ा यह goal सब में ककषमकश लगी रहेगी कि है उसे देखना चाहिए। दफ्तर थोड़ा सा आपने नहीं किया तो भी कुछ नहीं जायेगा, क्योंकि lower मंगिना पडता है। रूपया तो क भी बम्बई में goal (निम्न उदश्य) है । ऐसे हजारों दफ्तर वाले कम नहीं होता। आपको माजूम है कि वम्बई मैंने देख लिये जो कि फाइलों पर फाइल लाद के में लोग हज़ारों रुपया खर्च करते हैं और अपने मर गये लेकिन कोई पूछता भो नहीं कि कहां गये और यहाँ उन्होंने बना रखा है कि इतना रूपया हम कहाँ खत्म हो गए हजारों को में जानती है क्योंकि भगवान के माम पर रखेंगे। यह वड़ी शमें की बात मैंने जिन्दगी भर इन्हीं लोगों के साथ जिन्दगी काटी है कि इन लोगों को आपसे रूपया माँगना पड़ता है । तो दपतर की जो महत्ता है वो मैं अंब जानती हैं और इस तरह की चीजें नहीं होतो चाहिए । हैँ, उसको महत्ता आप मुझसे न बताये कि आज और अगले वक्त मैं ये न सुन पाऊ कि [अप लोगों से दफ्तर में ये था, ऐसा हुआ, दक्तर में मैं फंस गया । दफ्तर क्या चीज है। आपसे ध्यान नहीं होता । इतनो छोटो सी चीज पआपसे नहीं होती। ये भी आपको तन्दुरुस्ती ठीक हो जाती है, तंवियत ठीक सोचना चाहिये कि हम सां से हम सब ठीक करवाना Rটি र हैं। अगर पूजा होगी तो हम कितना रुपया दे। यहाँ रूपया माँगा जाता है । यह तो परमात्मा का काम है। आप यहाँ आकर के इतता लाभ उठाते हैं। चाहते हैं, हमने मां के लिए क्या किया। हो जाती है और आ्राप टाइम (समय) नहीं दे सकते अपने को, आप ध्यान नहीं कर सकते और भापको दुनिया भर के काम है, लेकिन आप के पास ध्यान सब प्पने मे न में सोचें कि हमने मां के लिये क्या किया। सबसे निम्न चीज है कि पसा देना । करने के लिये टाइम नहीं है । मतलब यह है कि डुससे निम्न कुछ है ही नहीं । मां कितना रुपया देती मूझे बाजार जाना था, माँ, मैं क्या करू, मुभे रहती हैं हर साल । हमने कितना रुपया दिया। जरूरी जाना था, सुना कि आज ताजी सबजी आई बो श्रीवास्तव साहब तो कोई सहजयोगी नहीं। थी तो लेने जाना था ले किन ध्यान के लिए उनकी लेकिन उनकी अक्ल बहुत जबरदस्त है कि अगर समय नहीं है । “मुझे अपते वनाऊ ज का मेंचिल्ग इसमें रुपया पसा दिया जाये तो अपना लाभ होता करना था, इसलिये मैं गई।” आदमियों का दूसरा है और उनको हो ही रहा है । उनको सारा लाभ है, “गाज दपतर में कान्फ्न्स थी, मुझे जाना ही हो रहा है रुपयों पैसों का और ग्राप] [लोगों को था इस कान्फेन्स में, तो मैं ध्यान नहीं कर सका ।” लाभ नहीं होता। फिर कहेंगे कि हमारी नौकरी के

यही हमारे घोबी साहव के यहाँ है नहीं चलती. हमें घाटा आ रहा है। होगा ही । बो पर बैठोगी । एक हमारे धोबी साहृब थे यहीं दिल्ली में, बहुत पालो, करो। और अ्राप लोग दो-दो रुपये, चार-चार दिनों तक रहे, घोवी [अभी भी हैं। तो वे एक दिन रुपये के लिये, मुझे तो आश्चर्य है, मोटरों में घूनते सूटवूट पहनकर आये, वो तो धोबियों का ये कि हैं, सबके पास मोटरे हैं, पंट्रोल है, सब चीज, किसी का भी सुट झाड़क र पहन लिया, ये घोबी की श।नवाजी बहुत है। ये जो चीज़ ऊपर [आ] गई है जात है। तो किसी का सूट-बूट झाड़कर अ्राया । दिखावे की, दिखावा, ये अपने North India (उत्तरी तो कहने लगा कि माताजी केसा सूट लग रहा है ? अरे मैने कहा, ये तो साहब का सूट है । कम से कम अचछे होने चाहिये, मोटर होनी चाहिये, घर हमारे घर तो साहब का सूट पहन कर मत माना सून्दर होना चाहिये। लेकिन आपके मन्दिर में था। वो भी काफी लम्बा चौड़ा था, मैंने कहा इस कितना दीप जल रहा है, सादगी पे त रे कर । लिये तृम हमें छोड़ते नहीं हों. क्योंकि साहब का होता होशियार आदमो हैं, उन्होंने कहा चलो भया ये तो क भारत) की खास चीज है। ऊपर का दिखाया। कपड़े सादगो पे आइये, तभी अन्दरके आर्म-दो प की ओर तुम्हें dress (कपड़े) तुम्हें fit (सही) है, इसलिये तुम हमें छोड़ते नहीं हो, मू झे पता है। ये तो हम लोगों की दुर्दशा है । माने ये कि सूट ये मैं नहीं कह ती कि आप फकीरवनकर जिये । जरूर भाडेंगे, चाहे तो किसी की मारा हुआ हो ये वात नहीं है, मतलब ये है कि आदमो को कोई हज्जा नहीं। सूट झाडकर रौब झाड्ना। कितनी traditional (परम्पराचारी होना च हिये। Tradi- देर का रोब होता है? ये रौब कितने देर का ? एक tional तरीके से रहिये लेकिन जो glamorous क्षण भी नहीं। अन्दर का रौब होना चाहिये पना (चटक-मटक) है, ओर जो आदमियों की मनुष्य में, ग्रीर traditional (परम्पराचारी) नहीं हैं शानशोखो] है, वो खत्म होनी चाहिये । हम लोग हम लोग। औरते फीरन sleeveless (विना बाजू कोई अंग्र ज] नहीं कि कीमती सूट पहन करके घू में। का) पहनकर घमती हैं । मैंने देखा है त्रौरतों को क्या जरूरत है सूट पहनने को ? अपना देसी कपड़ा sleeveless फट में पहनेगी । sleeveless पहनना पहनिये । देसी तरीके से रहिये, इस में अपनी शोभा अपने यहाँ कोई देवी देवता, क भी मैंने सुना नहीं है । उसमें अपनापन । बेकार में अपने को show sleeveless पहनती थीं । हमारी लड़की ने एक बाजी (दिखावा) करना और दिखाना यहां इतना दिन कहा, “माँ यहाँ सब लड़कियाँ, जब दिल्ली आए. सब लड़कियां हमारे स्कूल में sleeveless पहनती तो हमने कहा, “जसा आती । एक बार हमारे चपरासी की बीवी मुझके तुम्हारा मन हो पर तुम क्यों नहीं पहनती ? मैंने कहा, “मैं तो नहीं पहन सकती, क्योंकि मैंने सब कुछ। अब मुझे क्या पता था कि ये चपरासी कभी पहना नहीं। मझे शर्म अरती है, ये शरीर क्यों वो तो खुला रहे । ये तो चौज ठीक नहीं। तो कहने लगी जब ठीक तहीं तो आप कहती कों न ही कि ये ठोक मैंने कहा सो के पर बठो ता बेठे न । मैंने कहा, हप्रा नहीं।” मैं ते कहु। पके पास अकल है, आप खुद कया भई, बैठतो कथों नहीं ? इवर-उध र देखने लगी तथ करिये कि अगर हम नहीं पहनेते और अगर तो कहती है, कि माँ बात ये है कि मैं नपराली की आपने पहनना है तो हम ब्यों पआ्रापको जबरदस्ती बीवो है। तो मैंने कहा, अच्छा चलो बंठो, कोई हर्जा करें । पर मैं कभी नहीं पहन गौ । There is no criteria (यह कोई आवश्यक नहीं है) ये तो कोई न जर जायेगी । show (दिखावा) है मैं अपको बता नहीं सकती । अगर किसी के घर जाइये तो मुझे तो समझ नहीं हैं, हम पहने ? मिलने प्राई। तो शनील का मुट प्रौर शनील का क । को बोबी है। मैंते कहा भया सोफ पर बठो मझमे भी अच्छे कपड़े पहन के आई थी। मतलब नहीं, तुन शनाल पहन कर आई हो, तो कहाँ जमोन

criteria (ग्रावश्यक) नहीं कि मैने कह दिया तो नहीं। कहने लगे में री कोई बौबो नहीं आई, आपने हा कर दिया। मैंने कहा कि प्राप प्रपना दिमाग आने वाली थी. वो कहा चली गई बो कहने लंगे लगाइये कि माँ क्यों नहीं पहनती। SIeeveless नहीं, क पहनेंगी, इतना लम्बा गला पहनेगी, ये सब तरीके उन्होंने कहा कि आ्रावरकी कोई सेक्रट्ी आई हुई हैं । आप छोड़ दीजिये । सहजयोगियों को ये शोभा नहीं देखा तो उनकी बी साहिवा वहाँ जोन पहनकर देता । कायदे के कपड़े पहनिये। जो कार्यदे के कपड़े पहुँची हुई थी। तो उन्होंने कहा, ये तो कोई सेक्रट्री हैं, श्पने traditional (परम्परागत)तरीके से । पाँच होगी। यो अपने को बड़ा खुवमूरत समझ कर घूम में ठीक से पायल होनी चाहिये, आपके पाँव में रही थी असल में औरत में जब dignity (मर्यादा विधिया होतो चाहिये. आपके गले में मंगलसूत्र होना चाहिये । कायदे की औरतें होनी चाहिये। बाबू की बीवी आई हृुई हैं, या वहाँ पर कोई जमा- बाल कटाकर बैठ गई, बाल किसलिए कटाने हैं दारनी के जैसी दिखाई देती है। हिन्दुस्तानी ओरत क्यों वाल कटाती हैं आप लोग ? पराप कोई ग्रज जो इस तरह के कड़े पहनती है बिलकुल जमा- जो वाल कटायें ? किसलिये अ्रापको बाल व टाने दारनी जैसे, कौर ऐोसे जमादारनीं जसे कपड़ पहन की जरूरत है ? कुछ समझ में नहीं प्राता । हमारे कारके घ मना कोई अच्छी वात नहीं । अपनी इज्जत यहाँ बाल कटाना सिर्फ विधवाओं का होता है र अपने हाथ में है। अगर आप अपनी इज्जत नही विधवाओं को भी बाल कटाना जो होता है, बिल्कुल रखेंगे तो दृनिया आपकी इज्जत नहीं करेगी आप मुं इन होता है। ये नहीं कि बाल कटाकर के hair लोग किस तरह के बपड़े पहन ते हैं, किस तरह dress (केश सजजा) वनाकर के घूरमना, सहज- चलते हैं, कि अपने देश के गर्व के साथ, जो अपने योगियों को शोभा नहीं देता । यहीं आदमियों का हाल है । अब ये लोग भी आजकल, मैंने सुना है कि dress (पहनावा) है हाँ कभी-कभी पहनना पड़ता यहाँ के आदरमी लोग भी, फेशन करते है । फेशन सहजयोग में विल्कुल नहीं शोभा देता, आपकी dignity (शन ) में । ऐसे आदमो को आपको माजूम नहीं कि कोई इज्जत सहजयोगी लोग रोब झाडने को जाते हैं औ्ौर यहाँ नहीं देता। परदेश में मैंने देखा है हमारे साथ एक पर जो हैं foreign (विदेशों) से आये हुये लोग हैं, cabinet minister (कन्द्रीय मंत्री) थीं, cabinet minister नहीं secretary (सविव) की बीवी वो तो कोई नहोीं ग्राई। उसके बाद हम बैठे तो र नहीं होगी तो वो मुझे लगेगी जैसे कि कोई अलक घूपना से देश का dress ( पहनावा) है वो सबसे अ्च्छा है formalities (औपचारिकता) पर, कभी आाप सूट पहन लीजिये, पर हर समय सूट पहनने की कोई जरूरत नहीं । तो यहाँ पर मैं देखती हूँ बहुत से कुछ सहजयोगी भी काफी मुझसे कहते हैं कि माी हमें इसलिये अच्छा नहीं लगता है कि वहाँ पर सब suited-booted (सुजे-धजे) लोग रहृते हैं । उनको अच्छा नहीं थीं Chief secretary (मुख्य सचित्र) chief t i Chief cabinet secretary की । उसकी बीबी प्राई एक बार । वो South India (दक्षिण भारत) को थी। उनको लगता है कि ये लोग क्या अजीब लोग लेकिन वो बीबो अ्रपने को बहुत अफलातून समझती हैं, थीं। तो दूबली-पतली थीं और एक दिन हम लोग है, उसे पहन सकते हैं । इतनो गर्मी हो रही है, उस पार्टी में गये खाना खाने । तो वहां पर देखा कि हम वक्त ये लोग अपने ये पहन करके आ रहे हैं। इनको गये तो हमको बड़ी इजजत के साथ उन्होंने हमें बैठाया। विल्कुल ही अपनती कोई प्रतिष्ठा नहीं । जो स्वयं हमारे husband (पति) भो बेडे, ओर ये महाशय अप्रतिष्ठित होते हैं, वो इस तरह से glamour जब वहाँ बैठे तो उन्होंने कहा कि आपकी बोबी कहा है ? कहने लगे आपको तो कोई बो बो आई वो चीज है जिससे आदमी में एक तरह की defi- लगता, क्योंकि आप उतका अनुकरण कर रहे हैं । इनके पास इतने अच्छे-श्रच्छे dress ( बस्व) (दिखावे) में रहते हैं । Glamour (दिखावा) तो

ciency (हीनता) होता है वो glamour लग ता रुचिकर ग्रौर सुल्दर है, और जो ऐसे फालतू चीजों है कि सिर पर डालडा का टीन रख लीजिये उसके के पोछे में श्रादमो जब जाता है तो उसका जो रूप ऊपर में बूफा बनाइये और फिर बो डालडा का है वो विद्रप हो जाता है। जैसे कि एक साहब पार्टी टोन या बालों में खुब ऐसे-रोसे सजा- सजा करके में बहुत बनठन कर गये, तो उन्होंने सोचा कि बंरा वाल-वाल वनायें । क्या जरूरत है ? कोई जरूरत है तो उनके हाथ में उन्होंने अरपने सारे गिलास- नहीं । आप विल्कुल सादगी से रहिये। कहीं आापने वर्गैरा पकड़ा दिये, और वो अ्पने को बड़ा लगा के कोई देवी को देखा है कि वो इस तरह के एक टाईन-बारई लगा के आये। मैंने कहा, इन राजा- वेकार के आडम्बर करती हैं। अगर करे, एक महाराजाओ का गवाल ही खराव हो गया। बड बार हमें जबरदस्ती ठेल-ठाल कर लोग ले गये बन के अये थे राजे और उनको उन्होंने सचने वी तो में तो भूत लगने लग गई। मैंने कहा है भगवान गिलास पकड़वा दिये। मैने कहा कि भई विचारों फ को इसे, वेकार की नीज, सरद्द हो गया। पर को एसे ही पकड़वा दिया उन्होंने । दो-एक दिन मेरे साथ भी ऐसा हो हआ। मैं एक पाटों में गई थी, तो बहीँ एक ambassador (राजदूत) साहब कसे लोग बदर्शत करते हैं और किस लिये ये सारा बदर्द्दाश्त करते हैं ? किसनिये ? इससे किसी को लाभ नही होता है, कोई सुखी नहीं होता, किसो को हिन्दुस्तान के बड़े अग्रेज बनकर आये थे । तो मैंने सोचा कि कोई नीग्रो-बीग्रो होगा, उस को भी बरा बनाकर के भेज दिया होगा। यहाँ पर कोई नीग्रो हैं तो ये बीजों को समझना चाहिये कि श्रीकृष्ण की कि क्या हैं । तो उसको मैंने खुद हो गिलास पकड़वा जो लीला है, उस लीला में सौष्ठव है, उसमें माधुय्यं दिया । तो ये दोडे-दोड़े प्राये कि अरे क्या करती हो, है, उसमें इस तरह की गंदगी नहीं है. कि जिसको अरे क्या करती हो? ये अपने ambassador (राज- देखते साथ ऐसा लगता है कि ये कया चले आ रहे दूत) साहब है । भई मैने कहा, कायदे से अपना बद हैं सामने से, चार तरह के बाल रंगा करके, ऐसा कालर का पहन करके, कायदे से आते तो मैं कहती बड़ा-सा चश्मा पहन करके, जैसे खव खार इससान भी कि हिन्दुस्तान के ambassador (राजदूत आपके ऊपर वला आ रहा है। उनके अन्दर सोष्ठव आये हये हैं। ये इतनी जी टाई वाई लगा करके आये था। उनके dress (वस्त्र) देखिये, पीताम्बर पहनते तो भी खूब मोटी, ऐसे-ऐसे फूलो हुई, बिल्कुूल जैसे थे । हमारे यहाँ कितने लोग पीताम्बर पहने हये हैं, बेरा लोग लगाते हैं। मैेंने कहा तमोज से कपड़े । क्योंकि वो तो पीता- पहनो ऐसे ही इंग्लैण्ड में आप देखिये कि रानी का म्बर पहनने से तो, अरे बाप रे ! हम तो विल्कुल जब वो होता है पारटो तो वहाँ भी ये चलता है। ये देहाती हो गये, कोई नहीं पीताम्बर पहनता और सब अंग्रेजों से हमने सीखा हुआा है फालतू का । तो वो मुकुट लगाते थे, वो भी मोर मुकुट लगाते, मोर वहाँ पर है कि tail coat (एक प्रकार का वस्त्र मुकुट उसको लगा लेते थे, क्योंकि थे तो भगवान ही आप पहनते हैं, जिसको दो क्या है long suit तो उनको मुकूट चढ़ाना है, तो मोर का लगा ले ते (लभ्बा सूट) कहते हैं। अब वो सबके पास तो होता थे। लेकिन अपने यहाँ दृफा बना लेते हैं । वाइये नहीं, कोई रखता न हीं, तो वहाँ एक Ross Bro- श्ीर प्रादमी लोग और क्या-क्या तमाये कर रहे thers (रॉस बन्धु) करके हैं। Ross Brothers हैं । इससे क्या फायदा ? जो गपलि यत पे ग्रादमी तो Ross Brothers जो हैं वो सबको देते हैं कि को रहना चाहिये। पहली चीज ये है कि अपने आप ये hire (भाड़े पर) करो। अब भेया अच्छे- को ये समझ लेना चाहिये कि हमें प्रसलियत पर भले लोग सीधे नहीं चलते, टे़े-टेढ़े चलते हैं । मैंने रहन। है । असलियत इन्सान की जो है वो बहुत कहा क्या वो तो comfortably (अरारामपूर्वक) चल आनंद नहीं आता। उल्टे घबराहट होने लगती है। बताइये ? जो कृष्ण पहनते थे ये

रहे हैं, उनको सब tight ( तंन) कपड़े, कोई लटके पहनेंगे नहीं तो विल्कुल जैसे वो beach ( समुद्र हये हैं, किसी के सहा तक पर जा रहा है, कोई ढीले- किना रे) पर पहन कर घूमते हैं, वसे हाले विल्कुल जोकर बने हुये हैं, Clown जैसे । मैंने दोनों चीज हम रे देश के लिये शोंभा नहीं दे iि । कहा जो अच्छे-भले लोग थे ये केसे लग रहे हैं। मुझे हमारा देंन भी बहुत बड़ा प्रतिष्ठावान है, क्योंकि तो हसी पे हंसी ग्राती रही। पूरे समय मुझे हसी बड़े पूर्वजन्म के सुकृत से प्राप इस देश में पदा हुये तो रही। इन्होंने पूछा तुम्हें हंसी क्यों प्राती है ? हैं इनको पूर्वजन्म का कुछ मालूम हो नहीं। फिर मैंने कहा ये देखो elown (जोकर), ये तो इनना उनके सुकृत को कौन बात करे। तुम्हारे तो पूर्वजन्म दमी है, इसकी क्या हो गया, ये clown पहनकर घमेंगे इतने सुकुत हुये इसी देश में आप पदा हये और इस देश में पंदा होने के बाद इसकी यान से रहे । औरतों को भी चाहिये कि इसकी शान से रहे देखिये कपड़ा पहना कीजिये के अच्छा जसे बना चला है । भवात को कृपा से जब से हम पहुँचे तो ये allow (इजाजत) आप अपना national dress (राष्ट्रीय पोषाक) पहन कर आइये। तो मैंने कहा, नहीं तो मैं तो आपके साथ चलती नहीं । Clown (जोकर) बनकर के मैं चलने नहीं वालो। ये सब भगवान की कृपा हो गई, समझे ना । फिर उस से अजीव-प्रजोब लोग हो गया कि आप हिन्दुस्तानो ढंग से । आपकी इज़्जत होगी, लोग अपको पसंद करेंगे, अरपको मानेगे। महाराष्ट्र में इस मासले में लोग काफी ये हैं। श्रासाती से अपना dress नहीं छुटता, आसानी से नहीं छुटता पर देहातों में तो बिल्कुल ३।। dressed आते हैं, varieties (भिन्न-भिनल्न रूप ) हो नहीं, चाहे कुछ हो जाये देहातो में विल्कुल नहीं आती हैं-कोई अरजीब तरह का पहन कर आते हैं, जिसको आरप प्रजीब से कहें मिलता है कि इनका national dress ( राष्ट्रीय के प्राप जेबर पहनिये, उसमें कोई हर्ज नही, क्योंकि पोषाक) क्या है । Variety (विभिन्नता) से आरता है, सब अपने tradtion (परम्परा) की तरह सारे जितने भी जेवर हैं ये सारे एक-एक चक्रों पे से कपड़ पहनते हैं। उनके देश में जो tradition उसकी शोभा के लिये हैं। लेकिन आपको कोई जरू- बनता है। अपने देश में भी जो कुछ tradition बने हैं, रत नहीं कि आप अप्रेजों जैसे फाक पहनकर घूमिये वो भी इस हिसाब से tradition बने हैं कि जिससे और या उनके जैसे कपड़े पहनिये । हां कभी आपको हमारेदेश में जो जरूरी चीज है, जिस तरह का dress formalities (लोकाचार) पर पहनना पड़े । पर (वस्त्र) पहना वो धोरे-धीरे बो tradition बाँधते अधिकतर अ्रपने ही देश का dress सह जधोगियों जाता है । जिस तरह का हमारे लिये शोभा देता को पहनना चाहिये, हरेक घ्रादमी को । जिस देश में है, उपयोगी है, उसको छोड़कर एकदम अंजों जैसे रहो, कपड़े पहनने की क्या जरूरत है ? ओर अंग्रेज जैसे dress पहनो । छूटता। उनका dress (पहनावा), मैं तो ये कहती । वो पर दिखने को तो हैं कि traditional dress प्राप पहनिये, सब तरह सौंदर्य ये अपने देश का tradition ( प रम्परा) है, श्रर ये अगर इंग्लैण्ड में रहो तो इंग्लेण्ड जैसा

[Hindi translation from English]

1984-03-16 होली समारोह, दिल्ली, भारत

मैं आप सभी को होली की शुभकामनाएं देती हूं ।यह एक अद्भुत त्यौहार है जो बहुत समय पहले श्री कृष्ण द्वारा आरम्भ किया गया था । श्रीराम के आगमन के बाद,जो अत्यंत गंभीर सज्जन पुरूष थे और जो एक दयालु राजा के अत्यंत त्यागपूर्ण जीवन में विश्वास करते थे, जब ये सभी चीज़ें इतनी प्रचलित थीं सब जगह कि राजा को दयालु व्यक्ति होना चाहिए,उसको परोपकारी होना चाहिए उसको त्यागवान होना चाहिए, उसको गंभीर होना चाहिए और इसी प्रकार राजा की तरह- समाज का पूर्ण वातावरण बहुत गंभीर था । जब हम कुछ भी चरम सीमा  तक करते हैं तो, हम ग़लत पक्ष में चले जाते हैं,यह आप जानते हैं । इसलिए पूरा समाज अति गंभीर समाज बन गया। उस गंभीरता में बहुत से कर्मकाण्ड शुरू हो गए । उस समय की रस्में बहुत बेतुकी व हास्यास्पद थीं।जैसे आपको ये भोजन नहीं खाना चाहिए,आपको इस पानी को नहीं छूना,कोई आपको छूना नहीं चाहिए, स्नान अवशय करो व उन्हीं भीगे वस्त्रों में ही खाना पकाइए।ऐसी सभी बेतुकी बातें उन्होंने शुरू कर दीं, जिसे आप धर्म कहते हैं,उन्हें लगा यह धर्म है।बुरी तरह  आडंबर शुरू हो गए।इतना कि उन दिनों के ब्राह्मण आत्मसाक्षात्कारी नहीं होते थे। वे सबको बहुत से विचार देने लगे कि यदि आप ब्राह्मण को गाय दान करेंगे तो आपको मोक्ष मिलेगा,या आपको ब्राह्मण को ये दान करना ही चाहिए,आपको ब्राह्मण को यह करना चाहिए।और सब कुछ एक भिखारी का घर जैसा बन गया था ।

इस सबसे श्रीकृष्ण बहुत परेशान हुए और जैसा कि आप जानते हैं, सभी अवतरण ‘समयाचार’ का अनुसरण करते हैं। समयाचार का अर्थ है उस समय, उस क्षण जो भी स्थिति है । और उस समय के समयाचार में उन्होंने पाया कि उन्हें इन सभी विधि-निषेधों का उल्लंघन करना पड़ेगा जिसे आप कहते हैं कि यह अच्छा है यह बुरा है ।

वास्तव में उत्तर में ऐसा हुआ जब श्रीकृष्ण यहां थे। और श्रीकृष्ण राजा बनने तक कभी दक्षिण की ओर नीचे नहीं गए। तो फिर [हम कर सकते हैं?] उत्तर भारतीयों और दक्षिण भारतीयों के बीच अंतर यह है कि दक्षिण भारतीय होली अधिक नहीं मनाते । वे अन्य त्यौहार मनाते हैं लेकिन होली को इतना नहीं मनाते।और यहां आप देखिये कि हर एक का बुरा परिणाम होता है, मनुष्य को पता होता है, कोई कुछ भी करता है, उसका बुरा परिणाम मिलता है ।

इसलिए जब श्रीकृष्ण ने कहा कि यह लीला है,यह परमात्मा की लीला है। सभी को लगा कि वह ‘लीला’ हैं। वह लीलामय हो गये।तो इस प्रकार के परित्याग की क्रमश:एक और पृष्ठभूमि बनने लगी, इस प्रकार की सोच उत्तर में शुरू हो गई। यही कारण है कि आप उत्तर के लोगों को दक्षिण के लोगों की तुलना में मूर्ख पाते हैं । दक्षिण में हो सकता है – आप उन्हें कभी-कभी जड़, कर्मकांडी, कर्मकाण्डों से बहुत अधिक बंधे हुए कह सकते हैं। जबकि उत्तर में आप लोगों को पूर्ण रूप से सब कुछ त्याग किया हुआ पाते हैं, बीच में कुछ भी नहीं। तो यह परित्याग उत्तर में बहुत हुआ, हालांकि कुछ लोग इन बहुत से आडंबरों पर अटक गए थे। इसलिए हमारे यहां दो प्रकार के लोग थे। जो सर्वथा मूर्ख थे- वे केवल होली खेलते, और कुछ नहीं। उनके लिए कोई अन्य समारोह होली से अधिक नहीं था। क्योंकि होली में गंभीरता नहीं थी और होली में उन्होंने सोचा कि वे पेय भी ले सकते हैं, वे भांग ले सकते हैं, वग़ैरह।वास्तव में होली का महत्व यह नहीं है कि आप उन सब नशीले पदार्थों का सेवन कर सकते हैं। ऐसा नहीं है क्योंकि श्रीकृष्ण ने कभी मदिरा नहीं पी। शिवजी ही केवल हैं, जो कभी अवतार नहीं लेते पर पीते हैं,इसकां यह अर्थ है कि वह अपने भीतर सभी नशीली वस्तुओं और इन सभी मादक वस्तुओं का सेवन करते हैं। इसलिए इसका कोई मतलब नहीं है । मैं समझ नहीं पाती हूं कि लोगों ने होली के दौरान भांग क्यों लेना शुरू कर दिया क्योंकि उन्होंने सोचा होगा कि अगर आपको छोड़ना है तो आपको अपने सभी संकोचों से भी छुटकारा पाना होगा, बेहतर होगा कि भांग जैसी किसी तरह की मादक वस्तु लें और पागल हो जाएं और आपे से बाहर हो जाएं । लेकिन श्रीकृष्ण ने ऐसा कभी नहीं किया। वह कभी आपे से बाहर नहीं हुए ।

इसलिए उत्तर में और दक्षिण में भी पूरी व्यवस्था का दुरुपयोग किया गया है कि लोग अति कर्मकांडी हो गए हैं,सर्वथा जड़, वाम पक्षीय।और उत्तर के लोग इस बारे में बिना किसी भी संकोच के दाहिना पक्षीय हैं । और यही कारण है कि आप देखते हैं कि उत्तर भारतीय पश्चिमी देशों में बहुत अच्छी तरह से कार्य करते है क्योंकि वे स्वंय को बेहतर ढंग से सबके अनुकूल बना सकते हैं ।

अब यह ओछापन श्रीकृष्ण का खेल नहीं है। वह कभी भी ओछे नहीं हो सकते। वह खेलते हैं । वह माया रचते हैं लेकिन ओछी कभी नहीं । अंदर, वह इतने गहरे हैं। आप जानते हैं वह योगेश्वर हैं। वह योगेश्वर हैं, तो योगेश्वर ओछे व्यक्ति कैसे हो सकते हैं? वह ओछेपन के लिए ऐसा नहीं करते बल्कि वह इसे इस तरह से खेलते हैं कि लोग, जिन्हें समस्याएँ आती हैं, वह इस तरह से माया रचने का प्रयास करते हैं कि माया हानिकारक, या स्पष्ट रूप से महसूस नहीं की जाती है, या किसी भी तरह से ख़तरनाक, या उन लोगों के लिए चौंकाने वाली नहीं  होती, जिन्हें उनकी सहायता की आवश्यकता होती है। तो वह इसे इतने सुंदर ढंग से करते हैं कि वह केवल अपनी उंगली घुमाते हैं, और वह ऐसी स्थिति पैदा कर सकते हैं जिसमें व्यक्ति जान जाता है कि वह ही सब कुछ कर रहे हैं।

आप जानते हैं कि मैंने स्वयं इतनी सारी माया रची है, और आप सभी ने उस माया का अनुभव किया है जो मैं आप पर करती हूं। अब यह केवल आपके अहंकार को मारने के लिए है, आपकी अति चतुरता को मारने के लिए, या क़ानून और व्यवस्था पर अधिक महत्व देने के लिए, क़ायदा-क़ानून को । और कुछ लोग समय को लेकर बहुत कठोर होते हैं।  तो उन्हें समय से बाहर करने के लिए, आप देखिए, आप उनकी घड़ियों के साथ बहुत सारी चालें खेल सकते हैं। आप उनके समय और इस सब के साथ चालें खेल सकते हैं । तो आपको परे ले जाने के लिए, समय से,गुणों से और धर्मों से परे ले जाने के लिए, श्रीकृष्ण ने लीला से एक नई जागरूकता पैदा की जिसमें पूरी दुनिया एक लीला है। लेकिन यह केवल उन लोगों के लिए लीला है जो साक्षात्कारी हैं और साक्षात्कार में जम गए हैं । उन लोगों के लिए नहीं जो अभी भी इस अज्ञानता में सम्मिलित हैं। वे वह नहीं हैं जो यह कर सकते हैं ।

इसलिए होली खेल बन गया। होली केवल गोप और गोपियों के बीच खेला जाता था। वह साक्षात्कारी आत्माएँ थीं। इसलिए उन्होंने होली खेली यह ठीक था।लेकिन आजकल हर कोई सोचता है कि वह होली खेल सकता है।वे चाहे जितने भी पाप कर लें, सारा जीवन वे होली खेल सकते हैं। ऐसा नहीं है, इसकी अनुमति नहीं है। हर किसी को अनुमति नहीं है , हर कोई होली नहीं खेल सकता।केवल साक्षात्कारी आत्माएँ ही होली खेल सकती हैं।

 इस तरह से आपने ध्यान दिया होगा कि जब आप साक्षात्कारी हो जाते हैं तो कोई जाति-पाँति नहीं रहती। आप सब एक जाति के हो जाते हैं। आप योगी हैं।आप सब योगी बन जाते हैं। कोई जाति नहीं, कोई जाति नहीं रहती। कोई समुदाय नहीं होता। कोई रंग-भेद नहीं।वर्ग का कोई ध्यान नहीं, इस वर्ग या उस वर्ग का. सब समाप्त हो जाता है। आप सभी एक पंक्ति में यह सोचकर एक साथ बैठते हैं कि आप योगी हैं। आप देखेंगे कि कोई व्यक्ति बहुत समृद्ध विरासत से आ रहा है, कोई जो हज़ारों रुपये या पाउंड कमा रहा है, और दूसरा बहुत साधारण आदमी है-हो सकता है कि केवल एक जमादार हो तो भी कोई बात नहीं, वह सहज योगी है -वह सहज योगी हैं। सहज योगियों में कोई जाति व्यवस्था नहीं होती। कोई उच्च और निचला पद या ऐसा कुछ नहीं होता।लेकिन होली खेलने के लिए सहज योगी बनना होगा, एक-दूसरे से प्रेम से मिलना होगा और प्यार को इस तरह से बढ़ाना होगा कि लोगों को लगे कि आप प्रेम लेने व प्रेम करने वाले हैं। जैसे लोग गले मिलते हैं। पुरुष पुरुषों को गले लगाओ, महिलाएँ महिलाओं को गले लगाओ, और वे भी.. । इस तरह आप अपने चैतन्य को आपस में बांटते हैं -इसके माध्यम से। इस प्रकार से आप बाह्य रूप में अपना प्रेम अपने निजि शरीर के प्रति अभिव्यक्त करते हैं क्योंकि आप सभी एक ही शरीर के अंग-प्रत्यंग हैं। और यदि आप एक ही शरीर के अंग-प्रत्यंग हैं, तो इस हाथ को इस हाथ की देखभाल करनी चाहिए, इस हाथ को इस हाथ की देखभाल करनी चाहिए।आप क्या करते हैं बस आप अपने प्यार को इस विराट के शरीर में घुमाते हैं, और इससे संपूर्ण शरीर में एकाकारिता का अनुभव होता है।यह स्थिति ऐसी है ।

तो रंग, रंग आपके सभी चक्रों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ये सभी चक्र हैं जैसा कि आप जानते हैं। हर चक्र का अपना अलग रंग होता है। तो क्या होता है? ये रंग बस हवा में, वातावरण में वितरित हो जाते हैं। होली के समय आप (आप जानते हैं) आप उन रंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो पूरी तरह से वायुमंडल में व्याप्त हैं । तो यह एक दूसरा तथ्य है जब आप रंग खेलते हैं । जब आप किसी अन्य व्यक्ति को रंगते हैं, तो आप बस यह व्यक्त कर रहे होते हैं कि, आपके वह चक्र आशीर्वादित हो जाएँ। लाल रंग मूलाधार का होता है। वह सभी रंग जो कि आप यहां उपयोग करते हैं,वह अलग-अलग चक्रों के हैं। तो आप केवल अपने प्यार की पूरी अभिव्यक्ति कर रहे होते हैं कि आप पूरी तरह से लाल रंग से भर जाएँ,अर्थात् अबोधिता,मतलब मासूमियत से। क्योंकि मां के गर्भ में पल रहे बच्चे के रूप में केवल मां का लाल रंग, खून का रंग देखता है।

तो जैसे कि आप देखते हैं कि चेहरे पर अलग-अलग रंग फैले हुए हैं। और अबीर, गुरु तत्व का हरा रंग है। इसी तरह इन सभी रंगों का महत्व है कि वे आपके चक्रों के रंग हैं जो आप अपने दोस्तों, अपने अन्य भाइयों और बहनों, जो सहज योगी हैं, पर लगाते हैं। तो यह, वह प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है कि आप वास्तव में अपने चक्रों का सार, फैला रहे होते हैं, अपने चक्रों का आधार, अपने चक्रों के रंग,  उन चक्रों की सुगन्ध अन्य सहजयोगियों तक । आप केवल सर्वव्यापी, सब और रिसता व्याप्त हो जाता है। मैं हिंदी भाषा में नहीं जानती जैसे मराठी ‘उधड़’, उधड़ जैसे बेहतर शब्द हैं। ‘उधड़’ का मतलब है बस …..(Hindi starts….

Hindi ends)… लाल रंग,अबोधिता का प्रतीक है। तो कबीर कहते हैं कि,तुम मुझे ऐसे रंग दो। ओ मुझे रंगने वाले”। रंगरेज़ वही है जो चीज़ों को रंगता है। तो वह कहते हैं, ओ रंगरेज़, मुझे ऐसे रंग दो कि सब कुछ पूरा लाल हो जाए- अबोध, मुझे पूरी अबोधिता से भर दो। और अबोधिता वह है जिसे उसने भरने के लिए कहा है।और श्रीकृष्ण के साथ भी यही है कि उन्होंने इन सभी विभिन्न रंगों के साथ खेला ताकि यह दिखाया जा सके कि लाल के अलावा और अलग-अलग अन्य चक्र भी हमारे भीतर हैं। सभी यह चक्र एक सुंदर हर्षित व्यक्तित्व बनाने में एक भूमिका निभाते हैं। ।

तो जो लोग सनकी स्वभाव के होते हैं, एक पक्षीय, एक पथ पर चलने वाले,और असामान्य रूप से गंभीर, यदि आप कुछ का एक सम्मेलन देखें, कहते हैं, पश्चिमी लोग, वे बहुत गंभीरता से बैठे हैं जैसे, विचारक । और जब मूर्खता की बात आती है तो वे इतने बेवक़ूफ़ होते हैं कि मैंने अस्सी साल के लोगों को शेक डांस करते हुए देखा है । वे पहले से ही हिल रहे होते हैं,[हंसी] । इसके अलावा वे हाथ में एक छड़ी के साथ शेक नृत्य कर रहे हैं,आप देखिये, हिलते हुए । और बहुत अच्छे घरों के लोग, बहुत अच्छे घरों के। वे इस तरह के मूर्खतापूर्ण ढंग से व्यवहार करते हैं कि आप समझ नहीं सकते। या तो वे मूर्ख या अनावश्यक रूप से गंभीर लोग बन जाते हैं,दिखावा करते हैं जैसे कि वे बहुत महान विचारक हों। इसलिए दिखावा करने के लिए ये चीज़ें बिल्कुल आवश्यक नहीं हैं। बल्कि यह अपने भीतर ही कुछ है जिससे आप आनंद अनुभव करते हैं, एक बच्चे की तरह । आप बच्चे की तरह हो जाते हैं। आपकी मुस्कान, हंसी, हर चीज़ बच्चे की तरह हो जाती है, अबोध और ऐसा ही आप सभी को होना चाहिए ।

अब दिल्ली में होली मनायी जाएगी। मैं बहुत प्रसन्न हूं क्योंकि उत्तर में केवल होली मनाई जानी चाहिए मुझे लगता है क्योंकि यहां श्रीकृष्ण हैं जहां उनकी लीला हुई थी, और वह होली का समय था । लेकिन अब मैं आपको श्रीकृष्ण के बारे में एक और बात बताने जा रही हूं जो महत्वपूर्ण है।सब को पता होनी चाहिए, जो मुझे आपको बताने का अवसर कभी नहीं मिला,जो हमारे ग़लत विचार हैं अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को लेकर होली के बारे में या श्रीकृष्ण के बारे में। सबसे पहले श्रीकृष्ण के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात आपको अवशय जाननी चाहिए कि वह योगेश्वर हैं। वह निर्लिप्त हैं। वह पवित्र हैं। तो जो लोग होली खेलते हैं-कई बार मुझे लगता है कि वे [लोगों के साथ?] विचित्र ढंग से खेलते हैं। इस तरह से होली बिल्कुल नहीं होती।यह होली के विरोध में है। वास्तव में यह शैतानी है। क्योंकि श्रीकृष्ण को जो भी पसंद नहीं यदि वह किया जाए तो वह शैतानी है। वे इस तरह से होली खेलते हैं कि वे अपने विकृत स्वभाव को व्यक्त करने का प्रयत्न करते हैं । दूसरा,होली खेलने वाले लोगों को पता होना चाहिए कि उन्हें अपने शरीर पर कुछ तेल ज़रूर लगाना चाहिए क्योंकि श्रीकृष्ण को तेल पसंद है। उन्हें कुछ मक्खन जरूर खाना चाहिए। फिर वे, या यदि वे चाहें तो अपनी नाक में कुछ घी डाल सकते हैं जो बहुत महत्वपूर्ण है, और कान में कुछ डालना, कुछ तेल, जो बहुत अच्छा है। क्योंकि यह सब सूखने वाली चीज़ें हैं।

तो यदि आप यह सब डालते हैं तो, आपके विशुद्धि चक्र में (सुधार होगा?) । विशेष रूप से विशुद्धि चक्र को बहुत सारे घी से ढका जाना चाहिए या जिसे आप मक्खन कहते हैं, वह मक्खन है। आप इसे यहां लगाओ, और यह यहां पर रगड़ो [अस्पष्ट] ।जिन लोगों को विशुद्धि चक्र की पकड़ है… अगर वे प्रतिदिन ऐसा करें- इस घी की दो बूंदें और कान में भी एक बूंद तेल और यहां थोड़ा घी या मक्खन, मक्खन रोज़ यहां लगाइये, पीठ पर भी लगाइये यह बहुत अच्छी विशुद्धि के लिये सहायता करेगा। क्योंकि श्रीकृष्ण को यह पसंद था। और उन्हें विश्वास था कि महिलाएँ,गोकुल की गवालिनें अपना सभी मक्खन मथुरा में बेचने जाती थीं, जहां ये भयानक राक्षस रहते थे, और वे इस मक्खन से पुष्ट हो रहे थे। और मक्खन का यह पोषण उन्हें बहुत मज़बूत बना रहा था। इसलिए वह इन देवियों के मक्खन को चुराने की कोशिश करते अपने लिए और गोकुल के अन्य सभी बच्चों के उपभोग के लिए चुराने का प्रयास करते थे।,क्योंकि मक्खन राक्षसों के पास नहीं जाना चाहिए था। और यही उनकी योजना थी।

लेकिन उनके जीवन का सार यह है कि सब को यह समझना चाहिए कि श्रीकृष्ण ने जो उपदेश दिया वह यह है कि उच्च लक्ष्य के लिए आपको निचले लक्ष्यों का त्याग करना होगा । यह मुख्य बात है – उनके जीवन का तत्व, उनके जीवन का सिद्धांत। एक उच्च लक्ष्य के लिए आप निचले लक्ष्य का बलिदान कर सकते हैं। जैसे निचले लक्ष्य हैं, अब कुछ लोग हैं, अब यह [अस्पष्ट] [ले?]-उनके मक्खन चुराने के बारे में।उन्होंने केवल मक्खन चुराया, और कुछ नहीं । क्योंकि गोकुल के लोगों के विशुद्धि चक्र के लिए मक्खन बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे उन्होंने अपने स्वाभिमान का विकास किया होता,अपने साहस का और उन्होंने मथुरा में इन भयानक राक्षसों के विरूद्ध अपनी गर्दन उठाई होती। तो यह महत्वपूर्ण था और [महत्वपूर्ण?] उन दिनों में लोगों के लिए इस मक्खन का। तो सिद्धांत यह है कि आपको चोरी नहीं करनी चाहिए। तो फिर आप मक्खन कैसे चुरा सकते हैं? लेकिन उच्च लक्ष्य लोगों के विशुद्धि चक्रों को संरक्षित करना है, इसलिए इस कारण आप चोरी कर सकते हैं। लेकिन हमारे देश में, हर बात को इस तरह से समझा जा सकता है कि आप उसे विकृत कर देते हैं। जैसे अब लोग सोचते हैं कि अगर कृष्ण चोरी करते थे तो हम चोरी क्यों नहीं कर सकते? हम अपना पेट भरने के लिए सरकारी धन चोरी कर सकते हैं ! हम लोगों से उनके सारे पैसे चुरा सकते हैं और अपने ही बच्चों को पोषित कर सकते हैं । यह उच्च लक्ष्य से निचले लक्ष्य तक है। बस दूसरी तरह से। इतना विकृत। जो उच्च लक्ष्य से निचले लक्ष्य तक हो गया । अब, उदाहरण के लिए, यदि आपको कुछ करना है, कहते हैं, मां के लिए, यह किसी भी चीज़ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। लेकिन जब करने की बात आती है, तो पहले अपने लिए और अंत में मेरे लिए करते हैं । यह ग़लत है । और यही मुझे आज आपको बताना है कुछ महत्वपूर्ण के बारे में,जिसका मुझे उल्लेख नहीं करना चाहिए ।

{19.29 से 34.58 की अवधि के लिए बात हिंदी में जारी रही]

अगर आप इंग्लैंड जाते हैं तो अंग्रेज़ों जैसी ड्रेस पहन सकते हैं। क्योंकि अब वह पोशाक जो पारंपरिक रूप से उनकी है, वही है क्योंकि वह उस देश के अनुकूल है।और जब आप भारत आते हैं तो भारतीय परिधान पहनें। यदि मान लें कि यदि आपको यहां तीन-पीस-सूट पहनना पड़े टाई के साथ, तो मुझे नहीं पता कि आप में से कितने वापिस जाने के लिए बचेंगे। हमें केवल आपके सूट वापिस भेजने पड़ेंगे। क्या आप भारत में थ्री-पीस-सूट के बारे में सोच सकते हैं? यह इतना आरामदायक है,आप देखिए, उस तरह के कपड़े पहनना जैसा कि देश हो।और यदि यह कार्यान्वित हो कि आप अपनी पोशाक यहां रख सकते हों, तो आप कर सकते हैं । लेकिन आप नहीं कर सकते । यह आप अच्छी तरह जानते हैं। यह बहुत उपयुक्त, आरामदायक पोशाक है जो आपकी यहां है, और यहां आरामदायक पोशाक का होना बेहतर है जहां परंपरा इसे उस स्तर तक ले आई है कि आप ऐसी और ऐसी पोशाक पहनते हैं। इसलिए मैं भारतीयों को यह बताने की कोशिश कर रही हूं कि उन्हें क्या चाहिए । अब आप सभी कह सकते हैं कि आपको भारतीय पसंद नहीं हैं, जैसे भारतीय महिलाएँ फ़्राॅक्स पहने हुए, हैं ना? क्या आप चाहेंगे भारतीय महिलाएँ फ़्राॅक्स पहनें? [रुकते हुए और लोग इनकार करते हैं] बस। तो मैं उन्हें यह बताने की चेष्टा कर रही हूं कि यह उन पर जँचता नहीं है । आपका चेहरा अलग है, आपकी शैली अलग है, आपको अपने परिधान पहनने चाहिए।इसके स्थान पर हम आपका अनुसरण करने का प्रयास करते हैं,आपकी पोशाक,आपका व्यवहार, आपके रहन-सहन का।

कुछ अंग्रेज़ सांसद मेरे घर रात के भोजन के लिए आए। उन्होंने कहा कि आपका एकमात्र घर है जो हमें लगा कि भारतीय है – अन्यथा इंग्लैंड से ग़ायब हुए  सभी पुराने राजपरिवार के लोग भारत आ गए  होंगे ।

मैंने कहा, क्यों?

“देखिए,उन्होंने सभी शैलियाँ, रुमाल,यह, नौकर सब कुछ उस तरह से अपना लिया है.”

कोई थाली कुछ भी नहीं, आपको तशतरी देखने को नहीं मिलेगी,खाने के अलग तरीक़े जो यहां तक कि अब इंग्लैंड में भी आपको नहीं मिलेगा। आप देखिए,बहुत कम लोग खाने के भिन्न प्रकार प्रयोग करते हैं, और वे इन चम्मचों, कांटों,इसको,उसको,सभी वस्तुओं को अति सावधानी पूर्वक इकठ्ठा कर रहे हैं।बस अंग्रेज़ों की तरह। कल्पना करिए- आप उस अंदाज़ में भारतीय खाना कैसे खा सकते हैं? क्या आप खा सकते हैं?कल्पना करिए भारतीय भोजन विभिन्न स्तर पर। सबसे पहले आपको रसम मिलेगा।  फिर इडली।फिर यह है,फिर वह।और मद्रासी कहेंगे बाबा यहां से चले जाओ। इससे अच्छा है कि केले के पत्ते पर खाओ , बजाए ऐसे भिन्न प्रकार से खाने के। आप इस तरह से भारतीय भोजन कैसे खा सकते हैं? और चपाती के साथ आप देखिए, वे उत्तर भारतीय शैली में खाना शुरू करते हैं । फिर पहले चपाती और उसी के साथ केवल सब्जियां। फिर कुछ और के साथ, कुछ और, आप कहेंगे, “अब, हम तंग आ चुके हैं, हम खा चुके। चपाती के साथ आप जो कुछ भी चाहें आप खाते हैं। आपके पास एक विकल्प है। अब आप यहां खाने का कार्यक्रम आरम्भ करते हैं। यही परेशानी है कि हम अपने देश की परंपरा का मूल्य नहीं समझते। हमें अपनी परंपराओं के मूल्य को समझना चाहिए और हमें हर देश की परंपराओं के मूल्य को समझना चाहिए । जो भी अच्छी परंपराएँ हैं, उन्हें चुन लिया जाना चाहिए,सभी सहज योगियों द्वारा उपयोग किया जाना चाहिए ।

जैसा कि मैंने आपको बताया कि कृष्ण का मुख्य सार उच्च लक्ष्य का त्याग करना था- नहीं, बस इसके विपरीत।भारतीय शैली निचले लक्ष्य के लिए उच्च लक्ष्य का बलिदान करती है, आप देखिए। लेकिन श्रीकृष्ण की शैली उच्च लक्ष्य के लिए निचले लक्ष्य का त्याग करने की थी। वह किसी भी चीज़ में विशवास नहीं करते थे,आप देखिए। वह समय पर विश्वास नहीं करते थे, वह विश्वास नहीं करते थे। तो कुछ लोग, आप देखिए, हर समय इस बात के ग़ुलाम हैं। जैसा कि मैंने आपसे बताया,कि वह समय में विशवास नहीं करते थे ।जिस तरह से उन्होंने सब कुछ किया वह बिल्कुल बच्चों जैसे माधुर्य से,सुंदरता से, और जिस तरह से वह लोगों को बदल देते थे। आप देखिए, जैसे सुदामा,जब वह मिलने के लिए उनके पास आए। कल्पना कीजिए।सुदामा, उनका एक पुराना मित्र, जीर्ण अवस्था में, फटे कपड़ों के साथ वह मुख्य द्वार पर आते हैं। वह अपने सारे गहने, सब कुछ लेकर वहां भागते हैं। बस उन्हें गले लगाते हैं। अन्यथा, आप यहां देखते हैं, यदि आप किसी से मिलते हैं !मैं कुछ मंत्रियों को जानती हूं जो ठीक वैसे ही थे, वे मेरे सामने निक्कर पहनते थे, छोटे, छोटे लड़के आप देखिए। लेकिन आप वहां जाइए।” ठीक है । उन्हें वहां बैठा दो। फिर आप वहां एक ठंडे कमरे में दो घंटे के लिए बैठ जाइए, फिर वह बस आते हैं, और आपको देखते हैं, और कहते हैं, “मैंने पहचाना नहीं। आप कौन हैं? ” आपका अपना भाई भी ऐसा कर सकता है। यही देश है। अब यह बात नहीं है,आप देखिए। श्री कृष्ण, उनके लिए प्रेम ही मुख्य था। प्रेम को व्यक्त कैसे करें, कैसे वह अपने सारे गहनों, सब कुछ के साथ बाहर भागे, चप्पल पहने बिना वह बस बाहर भागे द्वार खोला- “हे भगवान, मेरे महान मित्र आ गए हैं। आह! और गले से लगा लिया” उन्होंने यह नहीं देखा कि सुदामा ने  स्नान किया है या नहीं। वह लंबे सफ़र से आए हैं।यहाँ  पर अगर कोई और लोग हों तो कहेंगे, “हे भगवान! मेरी साड़ी ख़राब हो जाएगी। मेरे कपड़े गंदे हो जाएंगे। यह साफ़ होना चाहिए। यह होना चाहिए । इन सभी बुरी आदतों को मत सीखिए।प्रेम में कोई भी कुछ नहीं होता।प्रेम में कोई भी इन बातों के बारे में नहीं सोचता । क्या हैं ‘कपड़े’, बदले जा सकते हैं। लेकिन एक हृदय जो आहत है, हम बदल नहीं सकते । हम छोटी-छोटी बातों के लिए लोगों को चोट पहुंचाते हैं।

जैसे मैं एक और भयानक औरत को जानती थी जो अमेरिका में रहती थी। वह एक आया की तरह लग रही थी मुझे हर समय। लेकिन वह सोचती थी कि उसके जैसा कोई नहीं। वह इस तरह से अपने बालों को बांधती थी, आप देखिए। उसका अपना अंदाज़ था। मैं नहीं जानती कि यह क्या था । मुझे अमेरिका में कहीं नहीं मिल सका । और वह समय के बारे में बहुत पाबंद थी।तो एक दिन उसने हमें चाय के लिए निमंत्रित किया, और हम सबको जाना था। अब मैं और श्रीमती नागेन सिंह- जो कि आप देखिए, बहुत अच्छी और गरिमामय महिला हैं, और वह एक महारानी हैं, और यह सब-और हमें बल्कि देर हो चुकी थी क्योंकि हमारे पति नहीं पहुँच पाए थे। वे अपने काम में व्यस्त थे। तो वहां वह बहुत क्रोधित हो गईं। उन्होंने कहा,आप इतनी देर से क्यों आईं? आख़िरकार, आप देखिए, यदि आपके पति नहीं आए थे तो आप आ सकती थीं।

मैंने फिर कहा, हम अपने पति की प्रतीक्षा कर रहे थे जो जल्दी आ जाते हैं।मैं तो  बहुत नाराज़ हो गई।श्रीमती नागेन सिंह मुझे केवल चुटकी ले रही थीं । “देखो”, उन्होंने कहा कि  आप देखिए, श्रीमती नागेन सिंह इसे सहन नहीं कर सकीं।उन्होंने कहा, हम यहां चाय नहीं पिएँगें क्योंकि मुझे लगता है कि हम अपने घर में बेहतर चाय पी सकते हैं,बिना ऐसी सब बातों के बिना।और हम उठकर चले गए, देखें । लेकिन वह बहुत हास्यास्पद थी,उन्होंने हम पर चिल्लाना आरम्भ कर दिया था।”आप देर से क्यों आए?” तो वास्तव में उसने हमें क्यों आमंत्रित किया था?उसने हमें चाय के लिए आमंत्रित किया, हमसे अच्छी तरह से बात करने के लिए, हमारे प्रति दयालु होने के लिए।इसके बजाए वह हमसे क्रोधित हो गई थीं और चिल्ला रही थीं क्योंकि हम देर से गए।ज़रा सोचिए।हम अपने ही घर में चाय पी सकते थे। हम उसके क्रोध से भरे शब्दों को सुनने के लिए नहीं गए थे। है न? हम केवल उनसे मिलने गए थे ।

तो यह सबको समझना चाहिए कि कृष्ण का जीवन प्रेम से भरा हुआ था। वह प्रेम में कुछ भी बुरा नहीं मानते थे।जिस भी तरह का था, वह सब प्यार है, और आप अपनी मां को भी देखते हैं।आप अच्छी तरह से जानते हैं कि मैं अपनी स्वच्छता पर विशेष रूप से ध्यान देती हूं,स्वयं से  बहुत साफ़ हूँ।मेरे घर में – यह एक विशाल घर है,आप जानते हैं, और आपको कभी-कभी मेरे घर की तस्वीरों को देखना चाहिए,तो आपको पता चल जाएगा कि मैं वहां कैसे रहती थी-अत्यंत स्वच्छ। मैं बहुत साफ़-सुथरी हूं । लेकिन मैं कभी किसी और को नहीं कहती । मैं स्वयं जाकर अपनी वस्तुओं को साफ़ करूंगी। आज बाथरूम में सब अस्त-व्यस्त पड़ा था, और यह सब कुछ । मैंने इसे स्वयं धोया। मैंने साफ़ किया । मैंने किसी से नहीं कहा। मैं किसी को आहत नहीं करना चाहती। मैं किसी को चोट क्यों पहुंचाऊं?यदि मुझे करना है तो मैं करूंगी। और यदि उन्होंने इसे गंदा किया, तो भी मैं उन्हें कभी नहीं कहूंगी कि आपको गंदा नहीं करना चाहिए, आपको ऐसा नहीं करना चाहिए । आप देखिए कि आपको किसी को चोट नहीं पहुंचानी चाहिए। आप घर की सफ़ाई क्यों करते हैं? किसके लिए? दूसरों को प्रसन्न करने के लिए आप घर की सफ़ाई करते हैं। लेकिन सफ़ाई के लिए सफ़ाई का कोई मतलब नहीं है । आप समय क्यों बचा रहे हैं? दूसरों को प्रसन्न रखने के लिए। आप समय की ख़ातिर ऐसा नहीं करते। आप दूसरों को प्रसन्न करने के लिए कर रहे हैं। लेकिन उसके द्वारा आप दूसरों को अप्रसन्न कर रहे हैं, कोई लाभ नहीं। ऐसा करने का कोई लाभ नहीं। मैं किसी भी बात को लेकर कभी शिकायत नहीं करती- आपने ध्यान दिया होगा। इस तथ्य के बावज़ूद मैं अपने निजी तरीक़े से रहती हूँ। मैं स्वयं बहुत ही साफ़ और सुथरे तरीक़े से रहती हूं। मैं स्वयं अत्यंत स्वच्छ हूं । आप देखिए जब मैं खाना बनाती हूं तो मैं बहुत अच्छी तरह से पकाती हूं । लेकिन मैं देखती हूं कि लोग बहुत सुस्त तरीक़े से पकाते हैं ।यदि मैं कोई भी कार्य करती हूं तो,अत्यंत सावधानीपूर्वक ढंग से करती हूं,अत्यन्त सुन्दरता से । मैं देखती हूं कि यह उचित प्रकार से हो।लेकिन लोग,जब मैं उन्हें कोई काम देती हूं तो वे बस इसके बारे में बिल्कुल लापरवाही आरम्भ कर देते हैं। वे परवाह नहीं करते स्पष्ट नहीं। आप बता नहीं सकते ।

तो मैं आपको बताने का प्रयत्न कर रही हूं कि बेहतर है कि आप स्वयं को देखें, कि आप स्वयं करें जो आप करना  चाहते हैं। लेकिन दूसरों का दिल मत दुखाइए। दूसरों को आहत न करें। ऐसी बातें न कहें जो कठोर हों। भूल जाओ। जहां तक हो सके इसे भूल जाइए। बस भूलने की चेष्टा करें। और इससे आपको काफ़ी सहायता मिलेगी। क्योंकि इस तरह तनाव बहुत बढ़ जाता है । और श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में इसी पर प्रहार किया। वह केवल लोगों के तनाव को मिटा देना चाहते थे, जो समय के कारण,विधि-निषेधों के कारण, धर्म के हास्यास्पद विचारों के कारण था।यह सब वह समाप्त चाहते थे।उन्होंने कहा, “यह उस जगह नहीं होता है  जहां मैं रहता हूं।”

तो यही सबको उनके जीवन से सीखना चाहिए कि आप को स्वयं को अत्यंत साफ़ और सुथरा रखने का प्रयास करना चाहिए। आपको स्वयं को बहुत उदार बनाने की कोशिश करनी चाहिए। आपको स्वयं ही सभी कार्य करने का प्रयत्न करना चाहिए । आपको यह नहीं कहना चाहिए, “मैं यह सब पोस्टर लगा रहा था, और इस साथी नहीं किया.” तो क्या हुआ? आपको ऐसा करने के लिए किसने कहा? बेहतर होगा कि आप न करें। यदि आपको लगता है कि आप कुछ काम कर रहे हैं, तो आप बेहतर है नहीं करें। लेकिन यदि आपको लगता है कि आप अपनी प्रसन्नता के लिए कर रहे हैं, ठीक है ।यदि मैं खाना बना रही हूं तो मैं केवल खाना बनाती हूं । मैं खाना बनाती हूं, मैं आनंद लेती हूं। मुझे इस बात की चिंता नहीं है कि मेरे नौकर ने कितना काम किया है या किसी और ने किया है। मैं सब कुछ करती हूं।यदि आवश्यक हो, तो मैं धोती हूं, और साफ़ करती हूं, और झाड़ू लगाती हूं, और  सब कुछ करती हूं, यदि करना है तो। मुझे आनंद मिलता है। क्योंकि आप अपने काम का आनंद नहीं लेते, आप दूसरों से करवाना चाहते हैं । “उसने क्या किया? उन्होंने ऐसा नहीं किया। मैंने ऐसा नहीं किया। तो यदि मैं करूंगा, वह सब नहीं करेंगे । इसलिए मुझे भी ऐसा नहीं करना चाहिए । यह तरीक़ा नहीं है । यानी आप परमेश्वर के कार्य का आनंद नहीं लेते हैं। कोई भी काम। आप फ़र्श, कुछ भी धो सकते हैं। श्रीकृष्ण आप जानते हैं वहां गए और उन्होंने वहां मौजूद मेहमानों का झूठा भोजन सब कुछ साफ़ किया।उन्होंने सब साफ़ कर दिया।सब स्वच्छ किया था और ज़रा सोचिए भारत में केवल सफ़ाईकर्मी या ऐसा कोई व्यक्ति  युधिष्ठिर, धर्म राज के स्थान पर ऐसा करता है । उनके स्थान पर वह चले गए और किया । तो ज़रा सोचिए। मसीह ने अपने शिष्यों के पैर धोए। तो उनके लिए कोई काम बड़ा या छोटा नहीं। वे केवल आनंद लेते हैं । और सब कुछ उनके लिए महत्वपूर्ण है ।

आप जानते हैं श्रीकृष्ण का जीवन ऐसी घटनाओं से इतना भरा हुआ है कि आप कल्पना नहीं कर सकते कि उन्होंने कितना गहनतम होकर बताया कि आपकी स्थिति,आपका, जिसे आप धन कहते हैं,आप जिस प्रकार से जीते हैं उसका कोई अर्थ नहीं है। इसका कोई मतलब नहीं है। यह सब बेतुका है । और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें किसी को चोट नहीं पहुंचानी चाहिए । हमें किसी को परेशान नहीं करना चाहिए। हमें किसी की भावनाओं को आहत करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। इसके विपरीत हमें अत्यंत मीठा होना चाहिए । मधुर ढंग से आपको चीज़ें करनी चाहिए । और इस प्रकार उन्होंने आकलन किया। जब उन्होंने किसी को कुछ काम बताया।वह उस व्यक्ति का आकलन कर सके कि वह किस प्रकार का व्यक्ति है।तत्काल ही वह यह आकलन कर पाए कि वह व्यक्ति कितना गहरा है ।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

आप देखिये, समर्पण के साथ, एक छोटा सा काम.. ।जैसे श्रीराम के जीवन में…हमने देखा कि शबरी ने हर छोटे से बेर को लिया, और उसकी जाँच की वह खट्टा नहीं होना चाहिए।आप देखिए,ऐसे ही ,वह व्यक्ति की जाँच करते थे कि कोई कितना ईमानदार और समर्पित है । छोटा सा भी काम आप करते हैं ऐसी सुंदरता से और वह बहुत भली प्रकार से दिखता है। यदि आपकी भक्ति ठीक है, यदि आप एकदम सकरात्मक व्यक्तित्व के हैं,तो ज्ञात हो जाता है। लेकिन अन्यथा यह बेकार हो जायेगा। आप सभी प्रकार की ग़लतियाँ करेंगे क्योंकि हृदय से नहीं करते।तो हृदय से होना चाहिए। यह श्रीकृष्ण की विशेषता है कि वह हृदय से करते थे। और उनके हृदय में शिव का निवास था। इस बार हमने विट्ठल के स्थान पर शिव पूजा की थी क्योंकि अब शिव, हमेशा विट्ठल शिव के पास गए। लेकिन इस बार शिव को विट्ठल के पास जाना पड़ा। ताकि लोगों को अपनी भक्ति में, अपने व्यवहार में, अपने हर काम में याद रखना है कि उन्हें आत्मा बनना है। श्रीकृष्ण की भक्ति में उन्हें पता होना चाहिए कि कृष्ण ने सब कुछ इसलिए किया ताकि आप आत्मा बन जाएं।आपको बंधना नहीं चाहिए,अपने गुणों से,काल से,किसी भी वस्तु से। लेकिन आपको स्वतंत्र होना चाहिए। उन्होंने केवल आपको इन सबसे मुक्त करने का प्रयास किया।बस वह नहीं चाहते थे कि आप लोग ओछे हो जाएँ। आप उल्लासमयी हो सकते हैं। लेकिन आप तुच्छ लोग नहीं हो सकते।और ओछेपन को व ऐसी ही सब चीज़ों को उन्होंने सर्वथा त्याग दिया था।वह चाहते थे कि आप उन सभी बंधनों से छुटकारा पा जाएँ,जो आपको नीचे गिरा देते हैं।

मुझे लगता है कि इस होली में हमारा अच्छा समय रहा है और हमारा हमेशा इतना अच्छा समय होना चाहिए।हमेशा श्रीकृष्ण के आशीर्वाद से आप सभी को होली का आनंद लेना चाहिए।लेकिन उच्चतम होली अपने अंदर की होती है,जब आप हर प्रकार के रंगों से स्वंय को भर लेते हैं।आपका स्वभाव ऐसा होना चाहिए कि हर किसी को उसका आनंद आए।वह रंग जो आपके अंदर है-सौंदर्य का रंग-कृत्रिम नहीं केवल दिखाने को,बस बिना किसी प्रेम के कुछ दे रहें हैं।मैं आपको बताती हूं,कल मैं बाज़ार गई थी,केवल आप लोगों के लिये उपहार ख़रीदने।और मैं बस चली गई,वास्तव में मेरा हृदय प्रेम से परिपूर्ण था,और मुझे विदेशियों के लिये ठीक पैंतालीस वस्तुएँ मिल गईं,जो मुझे ख़रीदने थे।बिल्कुल।और इतनी प्यारी वस्तुएँ कि जब आप देखेंगे तो आप भी इसे पसंद करेंगे,बस प्यारी वस्तुएँ।मुझे मिल गईं और मैंने केवल इतना कहा, “देखो, यह मेरा प्रेम है।मात्र ये विचार कि मुझे इन लोगों को कुछ देना है। यह कैसे कार्यान्वित हो गया। तो अब हम वह समारोह करेंगे सभी विदेशी लोगों को उपहार देने का क्योंकि होली के दिन आप को कुछ उपहार देने चाहिए।ठीक है? तो हमारे पास आप को देने के लिये कुछ है ।

पहले हम रुस्तम को कुछ देना चाहेंगे जिन्होंने अत्यधिक योगदान दिया है,प्रचुर मात्रा में अपने निजी धन से बहुत योगदान दिया है । मुझे लगता है कि रुस्तम ने जितना योगदान दिया है, उतना किसी ने नहीं दिया है। इसलिए उनका अभिनंदन करते हैं।

(ताली)

और एक और व्यक्ति जिन्होंने काफ़ी व्यक्तिगत पैसे का योगदान दिया है,वह वॉरेन हैं । इसलिए उनका भी अभिनंदन।

(ताली)

तो अभी हमें इन दोनों के बारे में सोचना होगा । लेकिन यहां कई हैं जो आ रहे हैं कहना होगा गेविन ने आश्रम के लिए कुछ अतिरिक्त धन देने का फैसला किया है, और वह भी थे… ।

विकी? वह कहाँ हैं? विक्की भी इंग्लैण्ड के आश्रम के लिए कुछ अतिरिक्त धन देने वाली हैं। देखें यह कैसे कार्यान्वित होता है। लेकिन इसे पूर्ण हृदय से करें क्योंकि यह अभी तक कार्यान्वित नहीं हुआ है । मुझे लगता है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है कि कुछ भी घटित नहीं हो पा रहा है । तो बेहतर होगा इसके बारे में सोचना कि इसमें क्या ग़लत हुआ, और मुझे विश्वास है कि यह कार्यान्वित होगा।

यहां एक और सज्जन हैं। मैं नहीं जानती कि वह यहां हैं,बूढ़े सज्जन जिन्होंने दान दिया है, जिन्होंने सहज योग के लिए धन दान करने के लिए वसीयत बनायी है । ऐसे कई लोग हैं, जिन्होंने इस तरह पैसा दान किया है। लेकिन आज मुझे लगता है कि हमें श्री वेणुगोपालन का अभिनंदन करना चाहिए,उनके अतिरिक्त कार्य के लिए ।

(ताली)

और सुब्रमण्यम और ऐलन के लिए [ताली]जिन्होंने इस आश्रम को बनाने के लिए अपने स्तर पर पूर्ण प्रयास किया है । अब इस आश्रम के बारे में मुझे लगता है कि मुझे कुछ नियमों और क़ानूनों को लिखना होगा । श्रीकृष्ण के समान नहीं हो सकता। क्योंकि मुझे लगता है कि लोगों के पास अभी तक यह समझने का उत्तरदायित्व भी नहीं है कि आश्रम एक मंदिर है, एक पूजा-स्थल है। और जिस तरह से वे मंदिर में कई बार व्यवहार करते हैं,यह आश्चर्य की बात है ।

एक और व्यक्ति जिसे विशेष अभिनंदन दिया जाना है वह हैं योगी महाजन। क्योंकि (ताली) उन्होंने भी सबमें बहुत सहायता की है ।इस प्रकार उन्होंने इसे तैयार किया है। और इसके अलावा मंदिर के बारे में उनका विचार बिल्कुल सही है कि लोगों को इसके प्रति कैसा व्यवहार करना चाहिए । यह अपने भीतर से आना चाहिए। यह आपकी माँ का घर है और आपको कैसा व्यवहार करना चाहिए। आपको ज़ोर-ज़ोर से बात नहीं करनी चाहिए। आप एक मंदिर में प्रवेश कर रहे हैं, एक चर्च में। और आपको इसका सम्मान करना चाहिए। जब आप अंदर आते हैं तो इसका सम्मान अवश्य करें। यहां तक कि इसके बाहर भी आपको माथे से स्पर्श करना चाहिए। यह एक मंदिर है, और एक साकार माँ का मंदिर है जो यहां हैं। इसलिए इस मंदिर का सम्मान करने का प्रयास अवश्य करें। मैं लोगों को चीज़ें यहां-वहां फेंकते हुए देखती हूं । कोई लाभ नहीं उन पर क्रोध करने का। क्योंकि मुझे लगता है कि उन्हें अभी तक यह एहसास नहीं हुआ है कि वे संत हैं, और उन्हें संतों की गरिमा के अनुरूप व्यवहार करना होगा । इसलिए, मैं कहूंगी कि योगी महाजन ने वास्तव में सहज योग को यहां तैयार करने में वास्तव में बहुत सक्रिय भूमिका निभाई है । और हमारे श्री वर्मा साहब,जो मैं यह अवश्य कहूंगी कि वह हम सभी की बहुत सहायता कर रहे हैं ।

(ताली)

आपको एक बात के लिए उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहिए कि  सबसे बड़ी बात उन्होंने की है-आपकी साड़ी खरीदने में और इस तरह की चीज़ों में आपको लाभ करवाया है । [हंसते और ताली बजाते] उन्होंने आपके लिये इतने पैसे बचाए हैं।

सहज योगी: सावधानीपूर्वक खाता…

श्री माताजी: सावधानीपूर्वक लेखा-जोखा और सब कुछ। अब आपको राय साहब यहां मिल गए हैं जो आपकी निर्मला योग की पत्रिका के लिये काम कर रहे हैं । और (ताली) अब डाक पक्ष बढ़ गया है, और मुझे लगता है कि  उस पर थोड़ा डाक बढ़ाने की आवशयकता है । तो मुझे लगता है कि एक पाउण्ड और चाहते हैं, यही है? आम तौर पर? तीन पाउण्ड अधिक जोड़े जा सकते हैं मूल्य बढ़ने के कारण और यह केवल तीन पाउण्ड थे। मुझे हास्यास्पद लगता था, छह पाउण्ड बेहतर है । मुझे लगता है कि बेहतर है यह सात पाउण्ड हो।

(ताली)

[54.56 से 56.10 की अवधि के लिए बात हिंदी में जारी]

श्री माताजी: अब पाउण्ड कम हो गया है। [हिंदी में फिर से बात करें]

अब मैंने देखा है कि लघु-समाचार पत्रिकाएँ अच्छी हैं और वे अच्छा कर रहे हैं । लेकिन आप देखिए। आपको क्या करना है कि आपके पास एक बहुत अच्छा लेख लिखा होना चाहिए, और संपादित किया जाना चाहिए, और यह सब। और वह सिरदर्द मुझे मत देना, बस। जैसे बंबई के लोगों ने अपना संपादन किया और उन्होंने इसे प्रकाशित किया । केवल पत्रिका में यह ग़लती की गई कि ईसा मसीह के नाम के स्थान पर किसी और का नाम लिखा था । नहीं. [हिंदी में बात कर रहे हैं] भक्ति संघम में ।

[हिंदी में बात करते हैं]

उन्होंने इसे बदल दिया ।आप देखिए, तो।  मैं नहीं जानती कि यह किसके बारे में था।  उन्होंने शीर्षक बदल दिया । बस इतना ही। लेकिन यह सभी छोटी, छोटी ग़लतियाँ। लेकिन अन्यथा आप देखिए यह सब उन्होंने स्वयं ही किया है, और इससे एक पत्रिका बना ली। इसे करने के लिए आप कुछ पत्रिकाएँ भी ख़रीद सकते हैं।

अब यह मग़ज़ है। यह बीज है, आप देखिए, सभी बीजों के जैसे- जैसे खरबूज़े और कद्दू, उनके बीज सबसे पहले भिगोए और सुखाए जाते हैं। अब इसका महत्व देखिए। यह इतना गहरा है । हम समझ नहीं पाते। हम केवल इसे पारंपरिक रूप से बनाते हैं । क्यों? श्रीकृष्ण क्या हैं- विराट का मस्तिष्क हैं। और मस्तिष्क के लिए आपको क्या चाहिए-वसा। और बीज की चर्बी सबसे अच्छी है जिसे मग़ज़ कहा जाता है। इसे मग़ज़ भी कहा जाता है।मग़ज़ का मतलब “मस्तिष्क”भी होता है, और मग़ज़ का मतलब”बीज”भी है, बीज के अंदर, बीज का सफेद । क्या आप कल्पना कर सकते हैं? इसीलिए इसे बनाया गया था। अब आप कल्पना कर सकते हैं कि श्रीकृष्ण ने कितनी गहराई से सोचा। लेकिन वे केवल होली पर्व को बेअसर करने के लिए इसमें भांग डाल देते हैं।

(श्री माताजी हिंदी में बोल रही हैं)

बुध्दिमान व्यक्तियों की तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती है, कैसे पीठ पीछे बुराई करने ..कैसे नाक पीछे कराएंगे । [दर्शक हंसते हुए]

[अच्छा ?]

या फिर मैं डॉ0 माथुर और अपने डॉ0 साहब को भी धन्यवाद देना चाहूंगी।वे, दोनों एक तरफ देख रहे हैं । वे विश्वविद्यालय की देखभाल कर रहे हैं, और डॉ0 निगम देखभाल कर रहे हैं, यह है, [श्री माताजी स्पष्ट रूप से अपना ध्यान किसी चीज़ पर डालती हैं] यह देवी के लिए है। होली के दिन। विशेषतः आधा चंद्रमा है। अब मैं सुझाव दूंगी, हमें उन दोनों का अभिवादन करना चाहिए। डॉ0 माथुर (अस्पष्ट) देखभाल के लिए.. ।

(ताली)

… और डॉ0 निगम (अस्पष्ट) देखभाल कर रहे हैं …

मैं श्री गुप्ता के बारे में भी कहना चाहूंगी जो नदी के पार से आते हैं, जिन्होंने अद्भुत कार्य किया है [हमारे लिए?] ।

(ताली)

और सभी महिलाओं, मुझे कहना चाहिए  क्योंकि वास्तव में भारत में महिलाएँ संभावित रूप से बहुत सहायता करती हैं।  वे सब बहुत अच्छी तरह से इसे क्रियान्वित कर रहीं हैं, और वे बहुत क्षमतावान हैं । वे सामने नहीं आतीं। तो सभी महिलाएँ,जिन्होंने सहज योग में यहां सहायता की है [अस्पष्ट] …

(ताली)

और सभी युवा लड़के,जिन्होंने प्रचार किया ।

[हिंदी में बात कर रहे हैं]

(ताली)

निसंदेह, मैंने किसी को नहीं छोड़ा है। सहज योग में सहायता करने वाले सभी लोग मेरे हृदय में हैं। मैं आप सबको बहुत-बहुत धन्यवाद देती हूं ।

{हिंदी में 1.00.53 से 1.01.33 तक की अवधि के लिए बात जारी रही]

परमात्मा आपको आशीर्वादित करें।

(ताली)

डॉ0 वॉरेन।

(ताली)

इन्हें देखो, इतना मीठा। और आ रहा है,इन्हें देखिए।कैसे हैं?ओह,कितना प्यारा है!

(हिंदी में बात करें)

मुझे ठीक पैंतालिस मिल गए। [हंसते हुए और कुछ योगी कुछ कह रहे हैं]

वह काफ़ी हैरान थी,आपको पता है, वह पागल हो गयी। हमें नहीं पता था क्योंकि कुछ बड़े थे कुछ छोटे थे । और इतने पर। और उसने कहा, “क्या आपको विश्वास है कि आप इतने सारे चाहती हैं?” मैंने कहा, मैं उन सभी को लेना चाहती हूं लेकिन गिनती करिए। उसने कहा “वे पैंतालिस हैं.” बस इसके बारे में सोचिए।ठीक उतने!

बच्चे आनंद ले रहे हैं।

(हिंदी में बात कर रहे)

आपको ये नहीं मिलते हैं – सामान्य रूप से।

रेविन? रेविन।

(ताली)

अब सभी पुरुषों को पहले आना चाहिए। एक-एक करके। [हिंदी] विदेशों से आए सभी पुरुष।

यह बहुत अधिक है ।

सहज योगी: “माँ,आपके कुछ बच्चों ने मुझसे कहा कि आपके लिए उपहार में विशेष रूप से श्रीकृष्ण लें।

श्री माताजी: आप सभी बहुत सयाने लोग हैं।

(ताली और हंसी)

सहज योगी: “यह एक [प्रार्थना है?] कि हम सभी को निर्लिप्त होना चाहिए, ताकि हम केवल अपनी समस्याओं को साक्षी रूप में देख सकें और आपकी लीला का आनंद लें ।

श्री माताजी: हाँ। [वाहवाही]

श्री माताजी: [अस्पष्ट] मेरे लिए इतनी महंगी चीज़ ख़रीदना?

(सहज योगी कुछ कहते हैं)

श्री माताजी: ओह, यह बहुत अधिक है।आपको पता है कि मैं ये सब नहीं पहनती. और यह आपके व्यय करने के लिए बहुत अधिक है ।

(सहज योगी कुछ कहते हैं)

श्री माताजी: मैं नहीं जानती कि आप इसे कैसे खोलते हैं, बहुत सूक्ष्म है। आपको इसे खोलना होगा, या आप इसे इस तरह पहन सकते हैं? मुझे फ़िट नहीं हो सकता है?

(हिंदी में बात करें)

आप सभी को एक-एक करके आना चाहिए। सभी लोग।

(हिंदी में बात करें)

श्री माताजी: मैंने उन सभी को छुआ है।

(हिंदी में बात करें)

श्री माताजी: … एक [बड़े पैमाने पर?] पर। श्री माताजी:परमात्मा आपको आशीर्वादित करें।

(बज रही तालियों के मध्य)

श्री माताजी: माधुर्य, बस श्रीकृष्ण का माधुर्य देखिए। यह आपकी गोद में है। मेरी नहीं। यह आपकी गोद में है। आप समझ सकते हैं।परमात्मा आपको आशीर्वादित करें।परमात्मा आप सभी को आशीर्वाद दें। उनमें से कुछ चित्रित नहीं हैं, लेकिन आप उन्हें चित्रित कर सकते हैं।

(हिंदी में बात करें)

[तालियों के मध्य]

श्री माताजी: अब महिलाओं को इसके बाद आना चाहिए।

(सहज योगी कुछ कहते हैं)

श्री माताजी: आपने गिना है [यह? सब कुछ?]।साथ लाओ।

(हिंदी में बात करें)

श्री माताजी: क्या ये रंगीन वाला है?रंगीन लें। [उसके लिए बेहतर है? आप?] ।

(हिंदी में बात करें)

श्री माताजी मुझे आशा है कि यहां पैंतालीस लोग हैं।

(सहज योगी कुछ कहते हैं)

श्री माताजी: कितने हैं? मैंने देव की गिनती नहीं की थी। देव आ गए हैं।

(सहज योगी कुछ कहते हैं)

श्री माताजी: तीन और। हमारे पास तीन गणेश हैं।

सहज योगी: […] मैं [अस्पष्ट] के लिए एक और एक ले रहा हूं ।

श्री माताजी: ओह?

सहज योगी: मैं [अस्पष्ट] के लिए एक और एक ले रहा हूं । वह बीमार है ।

श्री माताजी: ठीक है। मैं आपको उसके लिए कुछ और दूंगी। ठीक है? क्योंकि हमें यह देखना होगा कि क्या [वह आ रहा है??] ठीक है? तीन लोग कौन हैं? अपने हाथ उठाएं।

सहज योगी: रॉबिन…केविन।