Easter Puja: Forgiveness

Temple of All Faiths, Hampstead (England)

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                        ईस्टर पूजा

टेम्पल ऑफ़ आल फैथ, लंदन (यूके)

 २२ अप्रैल १९८४।

आज हम ईसा-मसीह के पुनरुत्थान का जश्न मना रहे हैं और इसके साथ हमें मनुष्यों के पुनरुत्थान का भी जश्न मनाना है, सहज योगियों का, जिन्हें आत्मसाक्षात्कारीयों के रूप में पुनर्जीवित किया गया है। इसके साथ हमें यह समझना होगा कि हम एक नई जागरूकता में प्रवेश कर रहे हैं। क्राइस्ट को किसी नई जागरूकता में प्रवेश करने की कोई आवश्यकता नहीं थी, उन्हें इस दुनिया को यह दिखाने के लिए बार-बार नीचे आना पड़ा कि आप शाश्वत जीवन हैं, कि आप एक ऐसा जीवन जियें जो आध्यात्मिक हो, जो कभी नष्ट नहीं होता है।

आपको उस नए क्षेत्र में उत्थान करना होगा जो सर्वशक्तिमान ईश्वर का क्षेत्र है, जिसे आप ‘ईश्वर का राज्य’ कहते हैं। और उसने नीकोदमस से बहुत स्पष्ट रूप से कहा, “तुम्हें फिर से जन्म लेना होगा,” और जब उसने पूछा, “क्या फिर से जन्म लेने के लिए मुझे अपनी माँ के गर्भ में वापस प्रवेश करना होगा?” और उन्होने इसे बहुत स्पष्ट रूप से कहा! यह बहुत स्पष्ट है। जो देखना नहीं चाहते वे अंधे रह सकते हैं! लेकिन उन्होने यह बहुत स्पष्ट रूप से कहा कि, “नहीं,” अर्थात्, “जो कुछ मांस से पैदा हुआ है वह मांस ही है, लेकिन जो कुछ आत्मा से पैदा हुआ है वह आत्मा है।” मेरा मतलब है कि इससे ज्यादा स्पष्ट और कुछ नहीं हो सकता है, कि इसे आत्मा से पैदा होना है।

बेशक, इंसानों में हर चीज को घुमा देने की एक विशेष क्षमता होती है। उनके लिए आत्मा एक किताब हो सकती है, कुछ शब्द हो सकते हैं, एक संगठन हो सकता है, एक चर्च हो सकता है, या कुछ ऐसी चीज हो सकती है जिसे उन्होंने बनाया है। लेकिन जो कुछ भी मानव निर्मित है वह आत्मा नहीं है, यह ईसा-मसीह का स्पष्ट कथन है, जिससे लोग बचना चाहते थे और अपने स्वयं के संगठन, अपने स्वयं के विचार शुरू करना चाहते थे और उनके नाम पर एक बहुत ही मनगढ़ंत बात बनाई। और अब इसके नष्ट होने का समय आ गया है।

यह हजारों वर्षों से अभी तक चलता चला आ रहा है, इतने सारे निर्दोष लोगों को पकड़ लिया है, और अब लोग इसमें शामिल हैं। लेकिन जब आप पुनर्जीवित होते हैं, और आप साक्षात्कारी आत्मा बन जाते हैं, तो आपको यह समझना होगा कि अब आपकी गति भीतर की ओर है, आप अपनी जड़ों की ओर बढ़ रहे हैं, बाहर नहीं। तो बोध से पहले जो भी प्रयास था उसे बदलना होगा, दिशा बदलनी होगी, और वह बिंदु ज्यादातर हम चूक जाते हैं।

आज, बात यह है, कि मैं आपको समझाने की कोशिश कर रही हूं कि, अब तक, मानव मन के लिए मनोरंजन महत्वपूर्ण था; मनोरंजक। मन के लिए, ना की आत्मा को। आत्मा का मनोरंजन मन के मनोरंजन के बिल्कुल विपरीत है।

जैसे किसी ने उस दिन मुझे फोन किया और कहा कि, “माँ, सहज योग में कोई जोश-खरोश नहीं है।” (हँसी) उत्तेजना बहुत अधिक है। हम इसके खिलाफ जा रहे हैं। हम शांति की तरफ जा रहे हैं, उत्तेजना की ओर नहीं और ना ही इस तरह के बिजली के झटके जिनकी हमें हर बार आवश्यकता होती है। तुम देखो, एक शराबी – वह सुबह ठीक है लेकिन शाम के समय वह खिसक जाता है, उसे एक झटके की जरूरत होती है, उसके शरीर में किसी तरह का एक इंजेक्शन। सभी मानव उद्यम ऐसे ही रहे हैं। वे आपके शरीर को उत्तेजित करने वाले हैं। क्योंकि जिससे आप बर्ताव कर रहे हैं, यदि वह निर्जीव है तो आपको उसे उत्तेजित करना होगा। लेकिन कुछ जो जीवित है, जो शाश्वत है, आपको इसका आनंद लेना है न कि इसे उत्तेजित करना है।

तो पूरी तरह से ठीक विपरीत दिशा होना चाहिए, और यही वह जगह है जहां कई सहज योगी समझने में असफल होते हैं। हम यह कैसे करें? बात है। हम अपना चित्त बाहर की ओर जाने के बजाय अंदर की ओर कैसे मोड़ें? यदि आप अपने नए जन्म के समय से शुरूआत करते हैं तो यह बहुत आसान है क्योंकि यह एक नया उद्यम है जिसमें आप प्रवेश करते हैं। वह शांति है, आपकी आत्मा की शांति, आपकी आत्मा का आनंद, जो स्थायी है, आप को इस से किसी उत्तेजना पाने की जरूरत नहीं है, यह स्थायी है, यह शाश्वत है।

तो पहली बात जो हमारे मन में आती है वह यह है कि हम जो कुछ भी आत्मसाक्षात्कार से पहले कर रहे थे वह हमें नहीं करना है। पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बोध आपको सहजता से मिलता है। तो हर समय आपके शरीर में जो प्रयास निर्मित होता रहता है, प्रयास की ऊर्जा कि, “मुझे यह करना चाहिए, मुझे वह करना चाहिए, मुझे यह करना है, मुझे वह करना है!” इससे तनाव पैदा होता है, जो मैं आपको पहले ही बता चुकी हूं। तो हम क्या करें? हम दूसरों के साथ प्रतिस्पर्धा करने की कोशिश नहीं करें। हम कुछ निश्चित समय, तारीखें, घड़ियां तय करने की कोशिश नहीं करें। हम अपना चित्त किसी ऐसे काम में भी नहीं लगायें जो हमें प्रयास में लगाता है, लेकिन हम प्रयास के उस रवैये को ढीला छोड़ दें। इसे संस्कृत में ‘प्रयत्न शैथिल्य’ कहते हैं। पाश्चात्य मन के लिए विषय को समझना बहुत कठिन है इसलिए समझने का प्रयास करें। इसका मतलब सुस्ती नहीं है, इसका मतलब आलस्य नहीं है। किसी को कभी भी निर्जीव, जीवंत की ऊर्जा के बीच भ्रमित नहीं होना चाहिए।

अब हम अपनी ऊर्जा को आत्मा की ऊर्जा में रूपांतरित करने की तरफ प्रयासरत हैं। इसलिए आपको आत्मा को प्रभार ले लेने की अनुमति दे देना चाहिए। आपके मन के प्रयास को कम किया जाना चाहिए और आपके माध्यम से आत्मा की ऊर्जा कार्यान्वित होना चाहिए। अब आप इसे कैसे करते हैं?

पहला है वैराग्य, निर्लिप्तता। निर्लिप्तता की शुरुआत विचार से होती है, आइए विचार को देखें। इसे विचार शैथिल्य कहा जाता है – विचार प्रिक्रिया को आराम देना। अब आपके मन में एक विचार आ रहा है, कुछ विचार जैसे, “आज माँ की पूजा है चलो चलते हैं। हमें जल्दी करनी होगी।” तुम देखो, “यह मिलना चाहिए, तुम्हें फूल नहीं मिले, अब तुम तीसरी दुनिया में जाओ और फूल ले आओ। तुम्हें यह मिलना चाहिए और तुम्हें वह मिलना चाहिए!” दूसरा विचार होता है: “नहीं! अपने आप को अलग करो! साक्षी बनो। इसे आत्मा पर छोड़ दो। देखो!” तुम्हे यह मिलेगा। आप में से कई लोगों ने इस पर गौर किया होगा। लेकिन फिर भी यह मन, जो काफी मूर्खतापूर्ण है, आपको यह समझाने की कोशिश करता है कि आपको इस पुराने कबाड़ उपकरण ‘दिमाग’ का उपयोग करना होगा! और यह दावा करता है कि “बेहतर उपयोग!” और जब आप उसका उपयोग करना शुरू करते हैं, तो अहंकार अंदर आ जाता है, आप उससे जुड़ जाते हैं, और जो आप खो देते हैं वह आपकी प्रगति है और इस प्रकार आनंद कम से कम हो जाता है।

आप खुद को कैसे निर्लिप्त करें? एक ऐसे व्यक्ति के लिए जो पूरी तरह से निर्लिप्त हो, यह समझाना बहुत मुश्किल है कि कैसे निर्लिप्त हुआ जाए, है ना? मै कोशिश करूँगी

मैं लिप्त नहीं हो सकती यही समस्या है! और मुझे आपको शब्दों में समझाना मुश्किल लगता है, ये मानवीय शब्द हैं, लेकिन फिर भी, मैं अभी कहने की कोशिश करूंगी।

जैसे, शुरुआत में मैंने इंसानों की तरह कुछ करने की कोशिश की, बस यह देखने के लिए कि यह कैसे काम करता है; चूँकि मुझे प्रयोग करना था। उदाहरण के लिए, जब मुझे किसी पूजा या किसी भी चीज़ में शामिल होना होता था, तो मैं उनसे पूछती थी, “शुभ समय क्या है?” तो वे मुझसे कहेंगे, “यह शुभ समय है।” और फिर दूसरा फोन करके कहता कि “यह शुभ समय है।” तो मैंने कहा, “दो शुभ मुहूर्त कैसे हो सकते हैं?” आप देखिए, इंसानों के साथ यह एक बड़ी समस्या है। तो उन्होंने कहा, “भारत में 5 पंचांग हैं।” यानि 5 पुस्तकें शुभ मुहूर्त में परामर्श करने के लिए। यही तो इंसानों ने किया है। मैंने कहा, “फिर सलाह क्यों? 5 शुभ मुहूर्तों का न होना ही बेहतर है, है न?” तब शुभ मुहूर्त समय से परे होना चाहिए। लेकिन यह उस समय में बंधा है जिस तरह से मनुष्य ने इसे बनाया है, इसलिए यह समय में बंधा हुआ है। जैसे भारत में, इतना, इतना, इतना, लेकिन अब, यहां (लंदन में) यह भिन्न है। फिर तुम गणना करते हो, तुम्हारे पास एक घड़ी है। आप देखिए, इन सभी बाधाओं को दूर करने के लिए मनुष्य कुछ उपकरण भी बनाता है। तो आप परामर्श करें। “अब यहाँ शुभ मुहूर्त क्या है?” – उसे समय पर छोड़ दो | फिर यह एक बड़ा सिरदर्द है क्योंकि परामर्श के लिए 5 किताबें हैं, घड़ी गलत हो सकती है, यह गलत हो सकता है, ऐसा हो सकता है। लेकिन अगर आप आत्मा हैं, तो आत्मा कल्याण को ही कार्यान्वित करती है। यह आत्मा है जो कल्याणकारी काम ही करती है। और कल्पना कीजिए कि जब आप ऐसा सोचते हैं, तो कितना तनाव निकल जाता है। सबसे पहले आपको अपनी घड़ी का दास बनना पड़ता है; दूसरा तुम्हें किताबों का गुलाम बनना पड़ता है, फिर बाजार का, कमरे का, किराए की जगह का गुलाम बनना पड़ता है। लेकिन मान लीजिए कि अगर आप आत्मा को इसे कार्यान्वित करने दें, तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। और तुम उस बिंदु पर पहुंच जाओगे जब वह सबसे शुभ होगा। तो आप इसे स्वीकार किस तरह करते हैं? बस स्वीकार करने मात्र से ही।

तो अभी, यदि आप अपनी सत्ता, अपना अधिकार क्षेत्र छोड़ देते हैं, तो आप अपनी आत्मा के क्षेत्र में आ जाते हैं। आप अपना अधिकार क्षेत्र छोड़ देते हैं, जो आपके अहंकार का अधिकार क्षेत्र है, या आपके प्रति-अहंकार का अधिकार क्षेत्र हो सकता है। आप इसे छोड़ दें और चीजों को देखने की कोशिश करें कि यह किस तरह कार्यान्वित होता है।

अब, कौन सा बिंदु है, इसकी जाँच करने का? आप इसकी जांच कैसे करते हैं? यह कार्यान्वित होता है। यही परीक्षण का मुद्दा है! यह काम कर डालता है। इसे काम करने दें। अपना चित्त मत लगाओ। चित्त शब्द का दूसरा भाग, ‘तनाव’ है। और यह कहने की कोशिश मत करो कि, “आज क्यों नहीं, आज ही हो जाना चाहिए था, हमें ऐसा होने की उम्मीद थी। इसी क्षण क्यों नहीं?” वह तुम्हारा अहंकार है। “परमात्मा की इच्छानुसार किया जायेगा”। “Thy will be done”.

तो जो विचार हमारे मन में हर समय घूमने लगता है, जो तनाव पैदा करता है, वह आत्मा का विचार नहीं है। तो, आपको क्या कहना चाहिए कि, “यह विचार नहीं है। यह विचार नहीं।” “हां नेति, नेति वाचाने निगमोर अवचुस।” “यह विचार नहीं, यह विचार नहीं, यह विचार नहीं”, और देखें कि आप कैसे शांति प्राप्त करते हैं। अब आप शांत हैं। “यह विचार नहीं, यह विचार नहीं।” बस किसी भी विचार को स्वीकार करने से इनकार करते चले जाओ। तो तुम निर्विचार में जाओ। उस अवस्था में आप आत्मा को महसूस करते हैं।

क्राइस्ट ने इस पर सबसे बड़ा काम किया है, मुझे कहना चाहिए, लेकिन हम नहीं समझते क्योंकि उनका जीवन एक सूक्ष्म चीज की तरह था जिसे आप देखते हैं, 3 साल। इसलिए हमें इसे थोड़ा खोलना होगा और देखना होगा कि उन्होने क्या किया। उन्होंने हमें क्षमा का सबसे बड़ा हथियार दिया है। जब आप किसी व्यक्ति को क्षमा करते हैं, तो आप क्या करते हैं? शुरूआत में, आप स्थिति को स्वीकार करते हैं, और दूसरी बात यह है कि आपके साथ गलत किया गया है इस विचार को आप क्षमा कर देते हैं। परन्तु चूँकि तुम्हारी आत्मा के साथ कुछ भी गलत किया ही नहीं जा सकता है, तुम सिर्फ क्षमा कर देते हो, क्योंकि तुम आत्मा हो। और जब आप क्षमा करते हैं, तो आपने पाया है कि आपका तनाव दूर हो जाता है। तो, अपने विचारों के लिए भी यदि आप कहते हैं, “ठीक है, इस विचार को क्षमा करें, इस विचार को क्षमा करें,” क्योंकि विचार को दंडित नहीं किया जाना है। “इस विचार को क्षमा करें, इस विचार को क्षमा करें, सब कुछ क्षमा करें।” भूलो मत, क्षमा करो: क्योंकि तब तुम यह भी भूल जाओगे कि तुम आत्मा हो! (हँसी) लेकिन “जो विचार मेरे मन में आ रहे हैं, उन्हें क्षमा कर देना।” बस कहते चले जाओ। यह एक मंत्र है। एक मंत्र होता क्या है? शब्द की वह शक्ति है, जो आत्मा को व्यक्त करती है।

तो, यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण चीज है जो ईसा-मसीह ने हमें दी है: क्षमा का हथियार। सबके पास वह हथियार है, हर कोई उस हथियार का इस्तेमाल कर सकता है। इसके लिए आपको कोई प्रयास नहीं करना है। आपको इसके लिए कुछ भुगतने की आवश्यकता नहीं है, बस आपको यह कहना है, “मैं क्षमा करता हूँ।” आप चकित होंगे कि आपकी नसें शांत हो जाएंगी, यह तनाव, इन आधुनिक चीजों का यह दबाव कम हो जाएगा यदि आप यह कहते रहेंगे कि “मैं क्षमा करता हूं, मैं उन्हें क्षमा करता हूं”। उदाहरण के लिए, आप जाते हैं और किसी प्रकार का देखते हैं … मेरा मतलब है कि यदि आप अचानक आत्मा के अनुसार कुछ बहुत ही गंदी चीज देखते हैं। हो सकता है कि सामान्य मनुष्यों के अनुसार यह बहुत रोमांचक हो, लेकिन हम असामान्य लोग हैं और हमारे लिहाज़ से अगर हम इसे बदसूरत पाते हैं तो सबसे अच्छी बात यह है कि, “मैं क्षमा करता हूं, क्योंकि वे अज्ञानी हैं, वे अंधे हैं। , वे अभी तक वहां नहीं हैं जहां मैं हूं। मैं ‘वह’ हूं जो आनंद के स्रोत पर, शांति के स्रोत पर है और जबकि ‘ये’ नहीं हैं, इसलिए मैं क्षमा करता हूं। ” और आपको आश्चर्य होगा कि यह क्षमाशीलता जो ईसा-मसीह आप को प्रदान करते हैं ‘विचार शैथिल्य’ अर्थात विचार की शांति कार्यान्वित करते हैं|

अब यह विपरीत गति, जिस तरफ कि आपको आगे बढ़ना है, सबसे पहले आज, दूसरों को क्षमा कर देना इस बिंदु पर शुरूआत करना चाहिए।

अब क्या होता है जब आप किसी को माफ कर देते हैं? इसका मतलब है कि आप प्रतिक्रिया नहीं करते हैं। व्यक्ति की चोट, अपमान पर प्रतिक्रिया करने की प्रवृत्ति समाप्त हो जाती है। और जब वह प्रवृत्ति समाप्त हो जाती है, तो आप एक शक्तिशाली व्यक्ति बन जाते हैं क्योंकि अब कोई भी आप पर हावी नहीं हो सकता, क्योंकि कोई आपको मार नहीं सकता, कोई आपको चोट नहीं पहुंचा सकता, कोई आपका कुछ नहीं कर सकता। लेकिन, मैं फिर से कहती हूं ,यह बेशर्मी नहीं है। आप देखिए लोग सोच सकते हैं कि यह बेशर्मी है। इसलिए अगर कोई आपसे कुछ कठोर और कुछ गलत कहता है, तो आप उसे स्वीकार नहीं करते हैं। लेकिन मान लीजिए मैं किसी पर चिल्लाती हूं तो भूत भाग जाते हैं। आपने देखा है कि कई बार, मुझे लोगों पर चिल्लाना पड़ता है, तो भूत भाग जाते हैं क्योंकि वे प्रतिक्रिया करते हैं, और वे बस भाग जाते हैं, लेकिन आत्मा चमक उठती है।  

तो, सहज योग में, व्यक्ति को यह समझना होगा कि यह सिर्फ मध्य मार्ग है, बस संतुलन की बात है जो महत्वपूर्ण है। यह किसी चीज की अति नहीं है। जैसे जब हम ऐसा कहते हैं कि, “मैंने सभी को क्षमा कर दिया” तो इसका तात्पर्य उस चरम पर जाना नहीं है, जहां आपने कुछ गलत किया और कोई आप को आपकी गलती बताता है, और आपके उपर इसका कोई असर भी नहीं होता हैं, इसका मतलब यह नहीं है। फिर से विवेक आपकी गतिशीलता का इंजन है। तो, अगर उन्होंने ऐसा कहा है, तो आपको कुछ इस तरह देखना होगा कि, “क्या वाकई ? क्या मैं आत्मा के विरुद्ध गया हूँ?” अन्यथा अगर मैं भी तुमसे कुछ कहूँ तो तुम कहोगे, “ठीक है, माँ को माफ कर दो!” आप गौर तो कीजिये कि, बात क्या है? ना की, “ऐसा कहने के लिए उन्हें क्षमा करें।” नहीं न! तुम मुझसे ऐसा नहीं कह सकते! तो फिर, यही वह बिंदु है जिससे आप गौर करने लगते हैं कि, “माँ ने ऐसा क्यों कहा? मैंने क्या गलती की है?” अब विचार उस तर्ज पर करो-तो आप फिर से चलना शुरू करें।

यह बहुत संकरा रास्ता है जिस पर आपको चलना है। एक तरफ है विशाल, बड़ा जिब्राल्टर, जिब्राल्टर की चट्टान, आपके अहंकार की, और दूसरी तरफ प्रति-अहंकार है। दोनों के बीच में एक छोटा विवेक मार्ग जा रहा है, जिस पर आपको दोनों पक्षों पर गौर करते जाना है, चाहे आप खुद को जिब्राल्टर की चट्टान से टकरा रहे हों, या आप प्रति-अहंकार की घाटी में गिर रहे हों। आपको सुनिश्चित करना चाहिए कि आप अपने विवेक का प्रयोग कर रहे हैं। तो एक और बात याद रखनी होगी कि, जो आप आत्मसाक्षात्कार के पहले जो कुछ भी कर रहे थे, वह चरम पर जाना है। उदाहरण के लिए, अब आप किसी भी प्रकार की गतिविधि शुरू करते हैं। माना कि, तुम कहते हो, “हमारे पास शास्त्रीय चीजें होंगी!” ठीक है। तब तुम इतने शास्त्रीय हो जाते हो कि वह मशीनी हो जाता है। अब आप कहेंगे, “छोड़ दो! हम संस्कृति विरोधी शुरू करेंगे”। तो तुम दूसरी तरफ अति पर चले जाओगे कि तुम  एकदम आदिम हो जाओ। जब तक आप इसकी चरम मंजिल तक नहीं पहुंच जाते और अपने जीवन का एक सबक नहीं सीख लेते, तब तक आप वापस नहीं आते! लेकिन सहज योग में, यह एक बहुत ही फिसलन भरी सड़क है जिस पर हम चल रहे हैं, और वहां आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि यह आपका अहंकार नहीं है और यह आपका प्रति-अहंकार नहीं है।

तो इन गतिविधियों में विवेक और संतुलन का बहुत उपयोग करना पड़ता है, जिनका हमें अन्यथा उपयोग करने की आवश्यकता नहीं है। आत्मसाक्षात्कार पाने के पहले वाले दौर में, अपने पूर्ण विनाश की हद तक हम आगे बढ़ते रह सकते हैं। लेकिन सहज योग में जैसे ही आप अपना विवेक छोड़ते हैं आप इस तरफ या उस तरफ गिर जाते हैं। अब वे लोग जो उच्च कोटि के सहजयोगी हैं, पहले विवेक का प्रयोग करते हैं: “कहाँ तक जाना है?” अब उसके लिए माँ को कहने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि आप आत्मा हैं। आप स्वयं, आप आत्मा हैं। सबसे पहले अपनी स्थिति को एक आत्मा के रूप में मान्य करें, और फिर इसके साथ आप चलते हैं, कि आप सावधानी से देखते हैं, कहाँ तक जाना है, कहाँ तक नहीं जाना है।

अब उनमें से एक बात यह है कि क्षमाशील व्यक्ति बनकर निर्विचार होना है। एक बार जब आप क्षमाशील हो जाते हैं तो अधिकांश विचार समाप्त हो जाते हैं। लेकिन आप कुछ लोगों को माफ नहीं कर सकते, जैसे आप भगवान को माफ नहीं कर सकते, आप मां को माफ नहीं कर सकते। कुछ चीजें हैं, जो आप नहीं कर सकते, इसलिए मर्यादाओं को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। अब, इन मर्यादाओं में यदि आप ठीक से चलते हैं, तो आप प्रगति कर सकते हैं। यही वह चीज है जो आपको विचार शैथिल्य लाती है या आप कह सकते हैं – मन शांत हो जाता है। फिर आपको  विषय शैथिल्य पाना चाहिए: यानी आपके अंग, इंद्रियां, हमेशा चीजों पर प्रतिक्रिया करती हैं, चूँकि आप इंसान हैं, आप इन्ही गुणों के साथ ही पैदा हुए हैं। तो जो कुछ भी होता है आप प्रतिक्रिया करते हैं। उदाहरण के लिए, आप एक सुंदर फूल देखते हैं, आप उस पर प्रतिक्रिया करते हैं। इसके साथ किसी तरह का विचार उठता है। अब तुम्हें किसी चीज को निर्विचारिता में देखने का अभ्यास करना चाहिए, तब तुम अपनी आत्मा से फूल की सुंदरता, महिमा, सुगंध अवशोषित करने लगते हो। हर फूल एक कविता है, लेकिन जब आप इसके बारे में सोचना शुरू करते हैं तो यह एक निर्जीव चीज बन जाती है। लेकिन तुम सिर्फ आनंद लेने की कोशिश करो। अब आप वे लोग हैं जो इस धरती पर आनंद लेने के लिए हैं, किसी चीज की चिंता करने के लिए नहीं। बस आनंद लो!

लेकिन अगर आप अभी भी अभ्यस्त हैं कि, “मुझे यह काम विशेष करना चाहिए, मैं कुछ खास सहज योगी हूं, मैं एक बहुत ही विकसित सहज योगी हूं”, तो आप गिर गए हैं! मानो, हम सब एक नाव में जा रहे हैं नाव का आनंद लें और लहरों का भी आनंद लें। लेकिन कोई कहता है, “मैं बहुत खास हूं, मैं नीचे कूदने की कोशिश करूंगा,” तब आप फिर से उसी स्थिति में आ जाते हैं। इसलिए चीजों को देखने का नजरिया रखना चाहिए। चीजों को निर्विचारिता में देखने की इस आदत को विकसित करने का प्रयास करें। अपने मन को उन तौर-तरीकों में ढालने का प्रयास करें जिन में आप प्रतिक्रिया नहीं करते हैं। अब यह रोमांच पाने के धंधे, या यह सब सनसनीखेज जो आज का उन्माद है, उसी स्रोत से आता है: कि आपकी इंद्रियों को एक तरह की सनसनी की आवश्यकता होती है क्योंकि वे प्रतिक्रिया करती हैं। जबकि हमारी इंद्रियां ऐसी होनी चाहिए जो प्रतिक्रिया नहीं करतीं क्योंकि उन्हें  प्रतिक्रिया केवल आत्मा के लिए करनी चाहिए। इसलिए हमें एक नई तरह की इंद्रियों का विकास करना होगा या इंद्रियों के एक नए गुण को विकसित करना होगा जो बाहरी उत्तेजना पर प्रतिक्रिया नहीं करते हैं।

अब यदि आप चाहते हैं कि सहज योग जोश-खरोश पूर्ण हो, तो आप कैसे इसे कर सकते हैं? मेरा मतलब बस, यह इसके ठीक विपरीत है। तो आपको करना ऐसा है कि, यह देखना है कि आपके यौन अंग, उदाहरण के लिए आपकी आंखें, वे कुछ देखती हैं और फिर वे प्रतिक्रिया करते हैं। आपके कान, वे कुछ सुनते हैं और वे प्रतिक्रिया करते हैं। कोई बात करना चाहता है और प्रतिक्रिया देखना चाहता है –  प्रतिक्रिया की, उम्मीदें हैं। लेकिन आत्मा चूँकि स्वयं सक्रिय है, वह अपने आप कार्य करती है – आपने देखा है कि वायब्रेशन बोलते नहीं हैं, वे कार्य करते हैं –  चूँकि इसमें कार्य करने की ‘शक्ति’ है इसलिए आपको प्रतिक्रिया करने की आवश्यकता नहीं है।

यदि आप प्रतिक्रिया की शक्ति को कम कर सकते हैं तो आप बहुत ऊपर उठ जाते हैं। यह एक ऐसी बात है जिसे हमें जानना होगा कि अब जब हम उसके पुनरुत्थान का उत्सव मना रहे हैं: क्योंकि यह तप है, यह ईसा-मसीह की तपस्या है। तपस्या के लिए ईसा-मसीह इस धरती पर आए। गायत्री मंत्र में आप जानते हैं, इसमें उन्होंने सात बातें कही हैं, और ईसा-मसीह के बिंदु पर यह तप है, तपस्या है। तो, आपको आनंद प्राप्त करने के लिए तथाकथित तपस्या करनी होगी। तपस्या है अपनी इंद्रियों को अपने भीतर वापस खींचना। जैसा कि कृष्ण ने कहा है कि आपको अपने सभी इंद्रियों के अंगों को एक कछुए की तरह वापस खींचना होगा।

तो, आपको अपनी इंद्रियों के लिए जिस उत्तेजना की आवश्यकता है, उसकी अब आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आपकी इंद्रियां, अब, स्वयं उत्तेजना का स्रोत हैं। इस अर्थ में कि वे सभी उत्तेजनाओं को बेअसर कर देते हैं। तुम उस बिंदु पर पहुँच जाते हो जहां से वह शुरू होता है। एक नदी बहुत छोटी, छोटी बूंद से शुरू होती है, और फिर वह फैलती है, फैलती है, फैलती है, फैलती है। तुम स्रोत पर जाते हो, बिल्कुल मध्य बिंदु पर, वहां तुम मुश्किल से एक बूंद भी तुम पर गिरते हुए पाओगे। एक और अच्छा उदाहरण होगा: एक पहिये में मध्य बिंदु होता है, और पहिया हर समय चलता है लेकिन मध्य बिंदु को स्थिर रहना होता है अन्यथा यदि वह मध्य बिंदु भी चलता है, तो गाड़ी नहीं चल सकती, गाड़ी चलेगी भी तो फिसलने लगती हैं। तो, मध्य बिंदु को स्थिर करना होगा अन्यथा पहिया नहीं चल सकता। तो आप उस मध्य बिंदु पर जाएँ, और मध्य बिंदु पर गति होती है, जहां एक तरह से पहिये की कोई गति नहीं होती, क्योंकि केवल उत्थान होता है, कोई चक्कर लगाना नहीं होता है। अब यह और नहीं घूमता, केवल मध्य बिंदु पर उत्थान भर होता है।

मुझे आशा है कि आप यह समझने की कोशिश करेंगे कि सभी गतिविधियाँ अज्ञान से आती हैं। सभी बाहरी गतियां इसलिए आती हैं क्योंकि हम अभी मध्य बिंदु पर नहीं हैं। लेकिन वह हासिल करना मुश्किल नहीं है क्योंकि आप उस पर कूद पड़े हैं। लेकिन तुम फिर से पहिये की परिधि पर आ जाते हो। तो वहाँ कैसे बने रहें, और उस दिशा में उत्थान पायें ? मान लीजिए, उदाहरण के लिए, इस तरह के पहिए हैं, पहिए के बाद पहिए, लेकिन मध्य बिंदु स्थिर है। अब हर बार जब आप बाहर कूद कर परिधि पर जाते हैं, तो अब आप वापस मध्य बिंदु पर कैसे जा सकते हैं? निर्लिप्तता से, तप से, तप से है। तपस्या है, त्याग करना (अस्वीकार करना )। इसका अर्थ बाहर की तपस्या नहीं बल्कि भीतर की तपस्या है।

सबसे पहले हमें देना,दूसरों को देना सीखना चाहिए। वह भी कभी-कभी लोगों को मुश्किल लगता है, मैंने देखा है। “यहां तक ​​कि 1 रु. देने के लिए,” उन्होंने कहा, “सहज योग के लिए लोगों को यह मुश्किल लगता है!” मैं हैरान थी! तो दूसरों को देना और भी कठिन होगा। दूसरों को देने की कोशिश करो। त्याग।

तो, एक तरीका है क्षमा करना, तो दूसरा है उदारता। यदि आप सहज योग के लिए काम करते हैं कहें: “मैंने अब तक कुछ नहीं किया है”। आपने जो काम किया है उस पर प्रतिक्रिया न दें। “ओह, यह खुशी की बात है, मैंने किया। यह मेरी खुशी है, मैंने किया। बस आनंद के लिए ”। गिनती मत करो; “मैं चार फूल लाया, वह दो फूल लाई। मुझे डेढ़ फूल की कीमत चुकानी होगी।” ये सब हिसाब परिधि पर हैं, बाहर, जब तुम साक्षात्कारी आत्मा नहीं थे। अब आप बस और कुछ नहीं, बल्कि अपने आशीर्वाद की गिनती करें। इसलिए आप उदार बनें।

मैंने देखा है कि अब लोगों के पास अलग-अलग लगाव हैं, सूक्ष्म हैं। जैसे अपने ही बच्चों से लगाव। मैंने लोगों को उस तरह देखा है। एक बार उनके, सहजयोगियों के बच्चे पैदा हो जाते हैं तो सारा संसार उनकी सन्तान हो जाता है: तुम उन्हें बिगाड़ोगे, तुम स्वयं को बिगाड़ोगे। आप सिर्फ उनके अभिभावक हैं। लेकिन तुम्हारे लिए यह बहुत बड़ी बात हो जाती है कि तुमने एक बच्चा पैदा किया है। कोई भी पैदा कर सकता है, यहां तक ​​कि एक कुत्ता भी एक बच्चा पैदा करता है, इसमें क्या महान है? मेरा मतलब है, कुतिया। यह कहने के लिए एक अजीब शब्द है! तो, एक बच्चा पैदा करना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन यह कि आपके पास एक बच्चा है जो आपके जिम्मे है, जिसे भगवान के लिए काम करना है। आप अभी प्रभारी हैं। लेकिन ऐसी पहचान बनाना कि, “यह बच्चा महान है, वह एक बहुत बड़ी साक्षात्कारी आत्मा है!” और वह सब जो आपके दिमाग को पूरी तरह से ख़राब कर देगा, क्योंकि यह अधिक सूक्ष्म विस्फोट है। यह हाइड्रोजन बम की तरह है। साधारण बम इसके एक हिस्से को नष्ट कर सकते हैं, लेकिन ये सूक्ष्म बम और भी बदतर हैं। और वह बच्चे को खराब कर देगा, जो आपके उत्थान में तथा आपका भी बहुत कुछ कबाड़ा कर देगा।

तो, यदि आपका एक बच्चा है तो आप को यह सुनिश्चित करना है कि,  ठीक है, आप केवल प्रभारी हैं, क्योंकि आप सहजयोगियों के सभी बच्चों के प्रभारी हैं, न कि केवल अपने बच्चे के| उदार बनो, “उदार चरित्रांं वसुधैव कुटुम्बकम” (अर्थ) “जो व्यक्ति एक उदार व्यक्ति है, उसके लिए पूरी दुनिया उसका परिवार है”।

तो, अपने आप को विस्तृत करें। “यह मेरा परिवार है, यह मेरी पत्नी है, मैं अपनी पत्नी के बिना कैसे रह सकता हूं, या मेरे पति, मेरा बच्चा, मेरा …” यह आपकी मदद नहीं करेगा, यह आपको पूरी तरह से बांध देगा। यह बहुत सूक्ष्म चीज है जिसे तुम शुरू करते हो, क्योंकि अब तुम पीछे हट रहे हो। पहले तुमने अपना परिवार छोड़ दिया, अपने बच्चों को छोड़ दिया, सब कुछ छोड़ दिया, इस चरम पर आ गए, अब तुम वापस जा रहे हो! भारतीयों के मामले में, वे समझते हैं कि वे इसमें पहले से ही बहुत अधिक हैं, इसलिए वे जानते हैं कि अपने बच्चों से खुद को निर्लिप्त करना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि वे पहले से ही इसमें हैं। उन्हें अपने बच्चों से बहुत ज्यादा ही लगाव हैं। शुरुआत में, वे हमेशा मुझसे कहेंगे, “मेरा बच्चा ऐसा है, मेरी माँ ऐसी है, मेरे पिता ऐसे हैं, मेरा भाई ऐसा है, मेरे फलां का भला करो …” और वे सभी भूत होंगे, एक से ऊँचा दूसरा ! बिना किसी विवेक के, उन सभी संबंधों को मेरे सिर पर ले आते हैं !और मुझे उनके बारे में बहुत दारुण लगता है। यहां तक ​​कि, एक रिश्ते के रिश्ते का एक दूर का रिश्ता भी वे साथ लाएंगे, “आप देखो वह मेरा रिश्तेदार है”। तो, भारत में इस बात का बड़ा महत्व है कि आप ऐसे और ऐसे व्यक्ति के संबंधी हैं, और भले ही आपका उस व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं हो, लेकिन फिर भी वह एक रिश्तेदार है, इसलिए “वह एक रिश्ता है।”

तो, हमें जो समझना हैं, वह यह है कि हमारे संबंधों और हमारी पहचान को पूरी तरह से छोड़ देना चाहिए। हम अब सार्वभौमिक प्राणी हैं। तो, आपका बच्चा आनंद का स्रोत है – हर बच्चा आपके लिए आनंद का स्रोत होना चाहिए, ‘हर बच्चा’ होना चाहिए। इस रूप में कुंवारे बेहतर हैं या जिनकी अभी तक शादी नहीं हुई है, वे हर किसी के बच्चे का आनंद अच्छी तरह से ले सकते हैं। लेकिन, जब आप माता और पिता नहीं हैं, यदि आप अन्य बच्चों का आनंद ले रहे हैं, तो उसमे क्या बड़ी बात  है? जब आप माता-पिता बन जाते हैं और तब भी , आप अन्य बच्चों का उतना ही आनंद लेते हैं जितना आप अपने बच्चे का आनंद लेते हैं तो आपकी उदारता शुरू हो गई है।

तो दूसरों से प्रेम करने की उदारता, करुणा से उदारता। करुणा का अर्थ यह नहीं है कि आप किसी पर दया करें बल्कि करुणा का अर्थ है व्यक्तित्व को साझा करना, प्रेम व्यक्तित्व को साझा करना। और यहीं पर हम बात चूक जाते हैं, सामान्यत: उस करुणा का अर्थ है कि किसी की मदद करनी है। लेकिन, सहज योग करुणा वह नहीं है, सहज योग करुणा है – यह सांझा करना है।

अब चौथी बात आपको याद रखनी है। मैंने तुमसे और क्या कहा है? पहला है? क्षमा है। प्रथम! मेरे अनुसार सबसे पहले क्षमा है। दूसरा है, आप इसे करुणा या निर्लिप्तता कह सकते हैं जो करुणा की ओर ले जाता है। तो आप इसे पहला क्षमा, तब निर्लिप्तता और तीसरा करुणा कह सकते हैं। ये आपके रथ के पहिये हैं जो आपको गतिमान करते हैं। ये वे पहिए हैं जिन्हें आपको याद रखना चाहिए।

अब, यदि आप इसके साथ आगे बढ़ते हैं,  मान लीजिए कि,  निर्लिप्तता आप में कार्यान्वित है, यहां तक ​​कि आप करुणामय हो जाते हैं, वह भी आता है। अभी भी आंकलन बिंदु क्या है? आप कैसे सुनिश्चित करें कि, आप ठीक हैं? आप कैसे मापते हैं? आप कैसे पता लगाते हैं कि आप ठीक हैं? मेरा मतलब है कि आप क्या कहते हैं, जहाज की भार वहन क्षमता, जैसा कि वे कहते हैं, जांच लो। आपको कैसे मालूम? आपके पास शांति होनी चाहिए, आपको एक शांतिपूर्ण व्यक्ति होना चाहिए। बाहर उत्तेजना हो सकती है, लेकिन आपको बिल्कुल शांत व्यक्ति होना चाहिए। यदि आप एक शांतिपूर्ण व्यक्ति नहीं हैं, तो पक्का जानिये कि, आप अभी तक वहां नहीं हैं जहां आपको होना चाहिए था।

अब आप कह सकते हैं कि, “ईसा-मसीह को भी बहुत क्रोध आया, उन्होने अपने हाथ में एक कोड़ा लिया और लोगों को पीटा, इसलिए हम भी ऐसा ही कर सकते हैं!” आप ईसा-मसीह नहीं हैं! आप अवतार नहीं हैं, आपको पता होना चाहिए, आप एक साक्षात्कारी आत्मा हैं। इसलिए आपको अपने हाथ में चाबुक लेकर दूसरों को मारने की जरूरत नहीं है। आप नहीं कर सकते। मोहम्मद साहब के शिष्यों ने यही गलती की है, कि उन्होंने कभी नहीं सोचा कि वह अवतार थे, आप देखिए। सारे अवतारों ने वध किये। कृष्ण ने मारा, राम ने मारा, देवी ने मारा। लेकिन तुम देवी नहीं हो, तुम श्री कृष्ण नहीं हो। तो, आपको किसी को मारने की ज़रूरत नहीं है। आपको गुस्सा दिखाने की जरूरत नहीं है।

तो अगर आपमें अभी भी गुस्सा है तो जान लें कि आपकी प्रगति बहुत धीमी है। आपको एक शांतिपूर्ण व्यक्ति बनना होगा। कल्पना कीजिए कि सहज योगियों के पास जिहाद है। उस बारे में आप क्या कहेंगे? हाथ में तलवार और हाथ में भाला लिए जा रहे हैं और दूसरों को मार रहे हैं। यह बात मैं बहुत स्पष्ट कर देना चाहती हूं क्योंकि जब मैं वहां होती हूं, तो निश्चित रूप से, मैं आप सभी को बताने जा रही हूं, लेकिन जब मैं वहां नहीं हूं तो मैं नहीं चाहती कि आप अपने हाथों में तलवारें और चीजें लें और लड़ें। विलियम ब्लेक ने जो लिखा है वह अवतार के लिए है। अवतार कहते हैं “मुझे मेरा दे दो …” ऐसा नहीं है कि अब आप कहें कि “मुझे राम के आयुध दो” आप उपयोग नहीं कर सकते! आप अवतार नहीं हैं। क्योंकि उनका विवेक प्रभावी है – आपका नहीं। इसलिए तुम्हें कोई हथियार, हथियार या क्रोध भी नहीं लेना है। जब तक मैं आपको क्रोधित होने के लिए न कहूं, तब तक किसी भी बिंदु पर सहजयोगी को यह शोभनीय नहीं है। तो यह मानदंड है, कि आपको शांतिपूर्ण व्यक्ति बनना है, आक्रामक व्यक्ति नहीं।

अब अलग-अलग लोगों में अलग-अलग तरह की आक्रामकता होती है। उदाहरण के लिए, पुरुष शुरू करेंगे … पुरुष चर्चा नहीं करते हैं, आप देखते हैं, वे सिर्फ आपको थप्पड़ मारते हैं – समाप्त। वे तर्क नहीं करते हैं कि वे बहस करना पसंद नहीं करते हैं, एक स्थिति तक वे जाएंगे और वे आपको मार देंगे और समाप्त कर देंगे। लेकिन महिलाएं तर्क में बहुत अच्छी होती हैं, और बहुत आक्रामक, बहुत आक्रामक रूप से तर्क करने वाली होती हैं। तो, आप बहस नहीं करें: दूसरा बिंदु है। यदि आप बहस बाज़ हैं तो जान लें कि आप अभी वहां नहीं हैं जहां आपको होना है। एक शांत व्यक्ति एक बिंदु तक जाता है और फिर तर्क से उस का निवारण करता है| यदि आप बहस बाज़ हैं तो आपकी प्रगति ठीक नहीं है। तो एक व्यक्ति को पूरी तरह से शांतिपूर्ण होना चाहिए और यही शांति सबसे प्रभावी चीज है। हम ब्रह्मांड की शांति की चाहत कर रहे हैं: आप इसे इन बमों में से किसी एक के माध्यम से प्राप्त नहीं कर सकते हैं, आप इसे केवल आत्मा के माध्यम से प्राप्त कर सकते हैं जो सभी शांति का स्रोत है। इसलिए, मैं आप सभी से अनुरोध करूंगी कि आप गुस्सा, क्रोध छोड़ दें। शांति इस धरती पर सबसे बड़ी ताकतवर चीज है।

इसके बारे में एक कहानी है, एक चीनी कहानी, दिलचस्प। आप देखते हैं, दो बहुत महान लड़ाकू मुर्गे थे, जिन्हें सबसे महान माना जाता है। और फिर चीन में मुर्गों की लड़ाई को लेकर यह उत्साह है। मेरा मतलब है कि आपके पास इस दुनिया में सब कुछ हो सकता है, सभी बेतुकी चीजें, जैसे रग्बी, फुटबॉल, यह, मेरा मतलब है कि इसका कोई अंत नहीं है! तो मुझे लगता है कि इन दो मुर्गों को एक अंतरराष्ट्रीय प्रकार की लड़ाई के लिए जाना था। तो उन्होंने कहा कि यहाँ एक महान संत रहते हैं, वह सभी को बहुत शक्तिशाली बनाते हैं। तो, मुर्गों का मालिक उसके पास गया और उसने कहा, “क्या तुम मेरे इन दोनों मुर्गों को बहुत शक्तिशाली बना दोगे, ताकि वे लड़ सकें और जीत सकें?” उन्होंने कहा, “ठीक है, यह बहुत आसान है। ठीक है, तुम उन्हें मेरे साथ छोड़ दो।” तो एक महीने बाद जब वह मुर्गे वापस लेने आये, तो वे किसी भी बात पर प्रतिक्रिया नहीं कर रहे थे, वे ऐसे ही खड़े होकर देख रहे थे। उसे अपने जीवन का डर लगा! उन्होंने कहा, “वे कैसे लड़ने जा रहे हैं?” उन्होंने कहा, “आप उन्हें ले जाइये, आप देखेंगे।” तो, वह उन्हें अखाड़े में ले गया और उन्हें वहाँ रख दिया, और सभी मुर्गे, आप देखिए, एक दूसरे पर आक्रमण किया, लड़े। ये मुर्गे, वो बस देख रहे थे, ये दोनों देख रहे थे! (हँसी) और बाकी सब इन दोनों से इतने भयभीत हो गए, सब भाग गए और ये जीत गए!

तो, जो शांत है वही शक्तिशाली है। जो किसी अन्य चीज पर प्रतिक्रिया नहीं करता, वह सबसे शक्तिशाली है। इसलिए, व्यक्ति को यह समझना होगा कि शांति यह जानने का मानदंड है कि आप बिल्कुल उस बिंदु पर हैं जहां आपको होना है। लेकिन शांति किसी भी तरह से कायरता नहीं है। क्योंकि, आप देखिए, मुझे पता है कि अविवेक क्या है, मानव अविवेक। तब वे कायरता का विचार करते हैं। नहीं, तुम ऐसे (सीधे) खड़े हो, ऐसे नहीं। एक शांतिपूर्ण व्यक्ति और एक कायर व्यक्ति के बीच का अंतर यह है कि एक कायर व्यक्ति नकारात्मक शक्तियों के लिए कार्य करता है, और एक शांतिपूर्ण व्यक्ति सकारात्मक शक्तियों, रचनात्मक शक्तियों का निर्माण करता है। इसे उत्पन्न करता है। इसलिए आपको कायर नहीं बनना है बल्कि आपको शांत रहना है। और एक शांत व्यक्ति चुंबक की तरह होता है, आप देखते हैं, यह कितना सुखदायक है।

तो, आप देख सकते हैं कि हम आत्मा के सुखदायक गुणों की ओर बढ़ रहे हैं। हमें दूसरों को शांत करना है और उत्तेजित नहीं करना, बल्कि शांत करना है। और वह शांति प्रदायक गुण, जिसे आप कहते हैं, वह है, हम इसे घी जैसा कहते हैं: जब शरीर जल जाता है और बिल्कुल जल रहा होता है, तो आप उस पर किसी प्रकार का घी डालते हैं ताकि यह शांत और स्निग्ध हो जाए, एक स्नेहक . ऐसा व्यक्तित्व स्नेहक होता है। यह घर्षण में नहीं जाता है, बल्कि घर्षण कम कर देता है। यह एक स्नेहक स्वभाव है। तो आपको खुद को परखना चाहिए, “क्या मैं एक स्नेहक व्यक्तित्व हूँ?” उदाहरण के लिए, आप देखते हैं कि दो व्यक्ति लड़ रहे हैं, ठीक है? और एक व्यक्ति शांति-निर्माता के रूप में जाता है; और कोई अन्य उसे और अधिक उत्तेजित करने जाता है, तुम देखो, वह उनके साथ शामिल हो जाता है। अब जो शांतिदूत है वह धन्य है, वह वही है जो ईश्वर की ओर बढ़ रहा है क्योंकि वह शांतिदूत है। “धन्य हैं वे जो शांतिदूत हैं।” ये सब बातें यदि आप देखें, तो आज मैं जो कह रही हूं वह वही है,वह सब है – जो मसीह ने कहा था,  – लेकिन एक अलग भाषा में, । क्राइस्ट को समझने के लिए आपको उन्हें और अधिक खोलना होगा, क्योंकि उन्होंने इसे बहुत ही सरल शब्दों में कहा है, जिसके बहुत गहरे अर्थ हैं और केवल एक सहज योगी ही उन्हें समझ सकता है।

इसलिए आपको शांति बनानी होगी। मैंने देखा है कि लोगों को शांति का नोबेल पुरस्कार दिया जाता है, जिनके भीतर बिल्कुल भी शांति नहीं है। वे गर्म स्वभाव वाले, भयानक लोग हैं और उन्हें शांति के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया है! ठीक है! और क्रोधी व्यक्तित्व, बिल्कुल गर्म स्वभाव वाला; और आप इसे शांति कहते हैं! आप ऐसे व्यक्ति के साथ शांति कैसे प्राप्त कर सकते हैं जो इतना गर्म स्वभाव का है? तो, यह संभव है। इस मानव प्रयास में कुछ भी संभव है आप देखिए। कभी-कभी इतना बेतुका, आप देखते हैं। जैसे मैंने लोगों को “डॉक्टरेट ऑफ लर्निंग” की डिग्री प्राप्त करते हुए देखा है, जो ऐसे स्कूल में भी नहीं गए हैं जो किताब पढ़ना नहीं जानते हैं! कुछ भी संभव है क्योंकि यह हर चीज सिर्फ एक पैंतरेबाज़ी है, यह इतना कृत्रिम है। तो तुम्हारे प्यार की स्निग्धता, प्रेम। इसलिए आप जो आनंद पाते हैं वह उस प्रेम का नहीं है जो आपको दिया गया है बल्कि वह उस प्रेम का है जो आप दूसरों को देते हैं।

प्यार का अंदाज भी अजीब होता है। आपने अभी तक जो देखा है, यह उसके ठीक विपरीत है। वे लिखेंगे “आई लव यू” ठीक है? और दूसरा वाक्य होगा “मैं तुम्हें तलाक देना चाहता हूं।” और आधुनिक फैशन ऐसा ही है। “मैं आप से प्रेम करता हूँ; मैं तुम्हें तलाक देना चाहता हूं क्योंकि मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं!” (हँसी) “क्योंकि मैं तुम्हें बचाना चाहता हूँ!” बहुत आधुनिक है, बहुत परिष्कृत है।

तो, ऐसा प्रेम जो दूसरों को दुख देता है, वह प्रेम जो दूसरों को पीड़ा देता है, वह प्रेम जो अपेक्षा करता है, वह प्रेम नहीं है। प्रेम जो बस बहता है, केवल क्षमा करता है, वह केवल करुणा है। यह सबसे सुखद, आनंददायक बात है। दीप्तिमान, धूप की तरह, ईसा-मसीह की तरह, जिन्होंने उन्हें भी माफ कर दिया जिन्होंने उन्हें सूली पर चढ़ा दिया! कल्पना कीजिए! कल्पना कीजिए!! क्योंकि वह जानता था कि परमेश्वर क्षमा नहीं करेगा। भगवान भी जिन्हें माफ नहीं करेंगे – उन्होंने उन्हें माफ करने की कोशिश की। लेकिन हम, जो खुद को ईसाई कहते हैं, जिन्हें ईसाई माना जाता है, वे ईसा-मसीह के बिल्कुल विपरीत हैं, ठीक, हर तरह से विपरीत, यदि आप देखें, तो बिल्कुल विपरीत।

तो, आप एक ऐसी स्थिति में आ जाते हैं जहाँ आप समझते हैं कि आप प्रेम हो गए हैं। और जब यह शुद्ध प्रेम संबंध है तो कोई वासना और लालच या कुछ भी नहीं है केवल प्रेम और प्रेम की पवित्रता है। आप कोई चीज़ इसलिए नहीं करना चाहते  क्योंकि आप उस व्यक्ति से कोई वासना निकालना चाहते हैं। बस देखें, इसके विपरीत। यहां लड़की बेहद ‘आकर्षक’ है। क्या, इतना आकर्षक है? मेरी नज़रों में तो वो बिल्कुल मच्छर जैसी लगती हैं। भयानक! कभी-कभी चुड़ैलों की तरह आप जानते हैं। उनके नाखून और वह सब जो मुझे चुड़ैलों की तरह दिखता है: इतना कृत्रिम। मशीनों की तरह, कभी-कभी। इन महिलाओं में इतना आकर्षक क्या है? या इन आदमियों में? आप समझ सकते हैं। वे मुझे खोपड़ी की तरह दिखते हैं, कभी-कभी और कुछ जैसे, फ्रेंकस्टीन, मुझे नहीं पता कि वे क्या दिखते हैं, भयानक। जिस तरह से वे चलते हैं, जिस तरह से वे प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। मेरा मतलब है, उनमें से डर के अलावा और कुछ नहीं आता है।

तो, जो आप अपने प्यार से दूसरों को देते हैं,  सुरक्षा की भावना, सुरक्षा का एक सागर जिसे आप कह सकते हैं। हर कोई आपके साथ सुरक्षित, सुरक्षित महसूस करता है। और वह सुरक्षा आपको महसूस होगी। भरोसा करो, दूसरों पर भरोसा करो। आपको भरोसा करना चाहिए। यह बहुत महत्वपूर्ण है। हर चीज के लिए भरोसा। मैंने देखा है कि कुछ लोग पैसे को लेकर बहुत गंभीर होते हैं, कुछ संपत्ति को लेकर बहुत गंभीर होते हैं, कुछ ऐसे होते हैं। मुझे पता है कि वे कभी-कभी कमजोर लोग होते हैं। पैसे के बारे में कमजोर हो सकते है, संपत्ति के बारे में कमजोर हो सकते है, यहां तक ​​​​कि उन चीजों के लिए अपमानजनक भी हो सकता है जो ऐसा नहीं होना चाहिए: लेकिन अपना आपा न खोएं बस उन्हें क्षमा करें और उन्हें सुरक्षित महसूस करवाएं, बिल्कुल सुरक्षित। विश्वास। जैसा कि आप जानते हैं, आप देखते हैं कि मैं कभी भी ट्रस्टियों से मुझे कोई रिपोर्ट देने के लिए नहीं कहती। मैं उनसे मुझे कोई हिसाब या कुछ भी देने के लिए नहीं कहती। मैं खुद खातों को बिल्कुल नहीं समझती, आप देखिए। तो मैं कभी नहीं देखती कि आपके पास कितने खाते हैं, आपके पास क्या पैसा है या कहें, मान लीजिए कि गेविन कह रहा है कि “मैं अब पैसे भेज रहा हूं माँ,” मुझे जो कुछ भी मिलता है वह ठीक है – समाप्त हो गया। मुझे नहीं पता कि वह आपको रसीदें देता है या नहीं, कुछ नहीं। अगर वह ऐसा कहता है [यह] ठीक है। मैं इसे उस पर छोड़ती हूं। उसे उन्नत होना है, चाहे कुछ भी हो। यह उसकी जिम्मेदारी है, अगर वह पर्याप्त रूप से विकसित  नहीं हुआ तो वह विकसित होगा। इसलिए दूसरों पर भरोसा करें क्योंकि सहज योग में आपको पता होना चाहिए कि हम सब बढ़ रहे हैं, हम सब रूपांतरित हो रहे हैं।

इसलिए, हमें विकसित होना चाहिए, हमें विकसित होना चाहिए और आपके विकास के लिए सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण चीज है। अगर पेड़ की सुरक्षा नहीं होगी तो वह कभी नहीं बढ़ेगा। इसलिए, सभी को सहजयोगियों की संगति में सुरक्षित महसूस करना चाहिए। यदि किसी से कोई असुरक्षा है तो इसकी सूचना सामूहिकता को देनी चाहिए और आप यह सुनिश्चित करना चाहिए कि असुरक्षा पैदा करने वाले, संकट पैदा करने वाले ऐसे सभी मामलों को कुछ समय के लिए हटा दिया जाना चाहिए। क्योंकि स्वस्थ विकास होना चाहिए। लेकिन विकास होना चाहिए और उसके लिए आपको भरोसा करना चाहिए। कोई गलती कर सकता है – ठीक है कोई फर्क नहीं पड़ता। कोई बेईमान हो सकता है – कोई बात नहीं। लेकिन उन्हें सुरक्षा दें।

लेकिन हम क्या करते हैं कि, भूतों को सुरक्षा देते हैं,  मैंने देखा है, यह बहुत आम है। लोगों को केवल भूतिया लोगों में ही दिलचस्पी होगी। वे एक छोटे से बेईमान व्यक्ति की तुलना में एक भूतिया व्यक्ति पर भरोसा करेंगे। देखिए, बेईमानी क्या है? मान लीजिए कोई इनकम टैक्स नहीं देता, कोई बात नहीं, यह सरकार है, या वह सरकार है। हमारे लिए क्या मायने रखता है? जब तक वह व्यक्ति ईश्वर के प्रति ईमानदार है, यह काफी है। हमारी ईमानदारी एक अलग स्तर की है। तो हम उस व्यक्ति से नाराज हो जाते हैं, हम उस व्यक्ति से परेशान हो जाते हैं। गुस्सा करने की कोई बात नहीं है।

वास्तव में, जैसा कि आप जानते हैं, मेरा सिस्टम यह है कि मैं उन लोगों को भी जानती हूं जिन्होंने पैसे का गलत प्रबंधन किया है, जो उचित नहीं रहे हैं, किसी तरह, मैं इसे जानती हूं, बिना खातों को जाने लेकिन मैंने कहा, “बस माफ कर दो, माफ कर दो।” मैं सब कुछ जानती हूं लेकिन मैं सिर्फ इतना कहती हूं, “क्षमा करें, कोई फर्क नहीं पड़ता।” फिर, आप तर्कसंगतता के साथ कह सकते हैं कि, “माँ, ऐसा व्यक्ति ऐसा ही आगे भी करता रहेगा”। नहीं वह नहीं करेगा! आप कोशिश करें और भरोसा करें। क्यों? क्योंकि वे बढ़ रहे हैं, वे प्रकाश में आ रहे हैं और जितना अधिक प्रकाश वे देखते हैं उतना ही वे बेहतर बनते हैं। यह भरोसा वहां होना चाहिए। ईश्वर पर भरोसा कि, वह उसे सही रास्ता देगा। तो आपके विकास के बारे में यह समझ आपके भीतर ही है, जिसे आप देख सकते हैं।

और सबसे ऊंची है सामूहिकता। भूतों की बिरादरी नहीं, बल्कि सामूहिकता। फिर से विवेक का उपयोग करना होगा – आप कितने सामूहिक हैं। यदि कोई व्यक्ति सोचता है कि वह बहुत महान व्यक्ति है और वह सभी को सुधार कर सकता है और वह सभी को दंडित कर सकता है और जैसा चाहे वैसा कर सकता है, तो वह सामूहिक नहीं है। लेकिन कभी-कभी आपको यह भी समझना होगा कि भूतिया लोगों के साथ भी मुझे उन्हें जीतने के लिए, उन्हें ऊपर लाने के लिए नीचे झुकना पड़ता है। उनके जैसा मत बनो, उनके स्तर पर नीचे जाने के बजाय उन्हें ऊपर उठाने की कोशिश करो। और यदि आप इसे प्रबंधित कर सकते हैं, तो आपने अपनी सामूहिकता के माध्यम से वह हासिल कर लिया है जो आप करना चाहते थे। और व्यक्ति को सामूहिक होना चाहिए। अगर वह सामूहिक नहीं है तो यह जान लेना चाहिए कि उस व्यक्ति के साथ जरूर कुछ न कुछ गड़बड़ है। फिर चीजों से निर्लिप्तता पाने के बाद आपको जो करना है, उसका तपस्या। इसके लिए हमें कुछ तपस्या करनी होगी। उदाहरण के लिए यदि आप किसी चीज से बहुत अधिक आसक्त हैं: मान लीजिए कि आप खाने के बहुत शौकीन हैं। बहुत से लोग हैं, मुझे पता है। जीभ सबसे खराब है। यदि आप जीभ को नियंत्रित कर सकते हैं तो आपने अपनी इंद्रियों के कम से कम 50% को नियंत्रित कर लिया है। यदि आप जीभ के स्वाद से लिप्त हैं  तो आपको कहना चाहिए “इन दिनों मैं एक बड़ी तपस्या से गुजर रहा हूं, मैं बिना नमक के सिर्फ उबला हुआ खाना खा रहा हूं, इसमें और कुछ भी शामिल नहीं, सिर्फ उबला हुआ खाना। तपस्या में जाना। मुझे करना होगा! नौ महीने के लिए। ”

मेरे लिए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह मेरे लिए कोई तपस्या नहीं है क्योंकि मेरे पास कोई जीभ नहीं है, कोई स्वाद कलिकाऐं नहीं है, इसलिए मैं प्रबंधन कर सकती हूं। तो जो कुछ भी आप बहुत ज्यादा पसंद करते हैं, “आह! मुझे कुछ खाने का शौक है।” आप देखिए, विशेष रूप से यहाँ मैंने देखा है कि जैसे ही आप अच्छा खाना या कुछ भी देखते हैं – “मम्म… ..”

(योगी माँ के लिए ठंडी चाय लाते हैं)

अब, यह बर्फ की तरह ठंडी है। क्या मुझे यह लेना चाहिए? अगर आप चाहें तो मैं ले सकती हूं, लेकिन यह ठंडी है, मुझे लगता है कि आप मुझे गर्म देना चाहेंगे। ठीक है। मुझे इसे लेने में कोई आपत्ति नहीं है। ठीक है।

तो, अब आपको जो करना है वह एक प्रकार का स्व-निर्देशित अनुशासन है। स्व-निर्देशित। दूसरों पर नहीं। स्व-निर्देशित। “क्या मैं सुबह ध्यान करता हूँ? मैं नही। तो मेरे साथ क्या गलत है? माना जाता है की मैं सहज योगी हूँ।” किसी को आपको बताना नहीं पड़े। आपको खुद अपने साथ ऐसा करना चाहिए। आप खाने के शौकीन हैं, “ठीक है कोई बात नहीं, मैं दो दिन का उपवास रखूंगा”। सहज योग में उपवास की अनुमति नहीं है, ठीक है, लेकिन निर्लिप्तता पाने के लिये उपवास करना ठीक है, ईश्वर के लिए नहीं, बल्कि आप अपने लिए करते हैं। “मुझे एक विशेष प्रकार का केक पसंद है। ठीक है मैं इसे नहीं खाऊंगा। मैं एक साल तक नहीं खाऊंगा ”। लेकिन नहीं, जब लोगों को त्याग करना पड़ता है, तो वे करेले अथवा रूबर्ब जैसा कुछ छोड़ देते हैं! (एक कड़वी सब्जी) (हँसी) तो इसके बारे में चालाक नहीं होना चाहिए, आप देखते हैं, अपने आप से चालाकी नहीं होना चाहिए। तो आपको यह देखना है कि, “यह मन कहाँ जाता है? आकर्षण क्या है?”

मेरा मतलब है, अब भी, मुझे लगता है कि कुछ लोग रोमियो और जूलियट जैसे हैं, आप देखिए, अभी भी रोमियो जूलियट-पन के उस वातावरण क्षेत्र में रह रहे हैं। इससे बाहर निकल जाओ! यह बकवास है। उस तरह की चीज से बाहर निकलो। इसका कतई मतलब यह नहीं है कि आप एक अन्य अति पर जाएँ और शुष्क व्यक्तित्व बन जाएँ, हो सकता है कि आप लाठी की तरह हो जाएं। ये मुद्दा नहीं है। लेकिन आपको ऐसी चीजों में शामिल नहीं होना चाहिए। ये सब कृत्रिम चीजें हैं। तो, अपने भीतर एक तपः स्थापित करना है। आत्म-अनुशासन। अब ज्यादा बोलने वाले बात करना बंद कर दें, बिल्कुल “मौन” ही “इलाज” है। ऐसे लोगों का इलाज है मौन! बस बात मत करो! जो बात नहीं करते हैं, ज्यादातर अंग्रेज पुरुष बात नहीं करते हैं, महिलाएं बहुत ज्यादा बात करती हैं। यह एक तथ्य है। मैंने देखा है – आप कोई भी इंटरव्यू देखें, महिलाएं पहले बात करेंगी। यह पुलिस कांस्टेबल महिला मर गई और उसकी माँ बात कर रही थी! भारत में, माँ बात करने की स्थिति में भी नहीं होगी, आप देखिए। पिता चुप बैठे थे। आप देखिए, आप कल्पना नहीं कर सकते। भारत में मान लीजिए किसी बच्चे की ऐसे ही मौत हो जाती है, आप देखिए, मां बिल्कुल रो रही होगी, गड़बड़ में, वह बात नहीं कर रही होगी। यहाँ महिला बात कर रही थी, हम सबसे ज्यादा हैरान थे! आप देखिए, यहाँ महिलाएं बहुत ज्यादा बात करती हैं, पुरुष बस बिलकुल ही बात नहीं करते हैं, मुझे लगता है कि मान लिया गया है की उन्हें बात नहीं करनी चाहिए, वे बस चुप ही रहें। ज्यादा से ज्यादा वे थप्पड़ मार सकते हैं। मुझे नहीं पता कि वे क्या करते हैं। (हँसी)

तो, हमें क्या करना है कि हम खुद को सिखाएं कि, अगर हमारी जीभ बहुत ज्यादा बोलती है, तो बेहतर है कि हम चुप रहें। अगर हम बात नहीं करते हैं, तो बेहतर हो की हम कुछ बातें करें, हमें खुद को बोलना सिखाना चाहिए। अब जाओ और समुंदर से बात करो, जाओ और किसी पेड़ से बात करो, जाओ और किसी से ऐसे बात करो। या सबसे अच्छा है मुझसे बात करना, मेरी तस्वीर से। तो इस तरह आप अपनी जीभ पर एक तरह का नियंत्रण हासिल करते हैं। मीठी-मीठी बातें करना। कुछ लोगों को इसके लिए तपस्या करनी पड़ती है। उनके लिए मीठी-मीठी बातें करना फिर से कोई कड़वा फल लेने जैसा है। वे बस मधुरता से बात नहीं कर सकते, बस नहीं कर सकते। व्यंग्य। आप देखिए, उस कटाक्ष में उन्हें एक विशेष आनंद मिलता है। कुछ मधुर बोलने की कोशिश करें। आप व्यंग्यात्मक हुए बिना भी विनोदी हो सकते हैं। हास्य सबसे अच्छा तरीका है। व्यंग्यात्मक होने की क्या आवश्यकता है? बिल्कुल भी जरूरत नहीं है। यह कायरता की निशानी है, मुझे लगता है, कटाक्ष, एक संकेत है कि आप दूसरों को चोट पहुँचाना चाहते हैं, लेकिन आप स्पष्टवादी नहीं हैं। इसलिए व्यंग्यात्मक बातों से बचने की कोशिश करें। यदि आप व्यंग्यात्मक हैं, तो बेहतर होगा कि अपनी जीभ को ठीक से व्यवहार करने के लिए कहें। तो, अपने प्रति थोड़ा अनुशासित रवैया,दंड या जिसे आप तप कहते हैं कार्यान्वित करना होगा|

अब देखिये, लोगों के पास चीजों को देखने के कई तरीके हैं। कुछ पुरुष हर समय महिलाओं को देखना चाहते हैं, कुछ महिलाएं हर समय पुरुषों को देखना चाहती हैं या कपड़े या कुछ भी, आप देखिए| अब फर्क यह है कि जब आप कुछ देखते हैं तो वह प्रतिक्रिया करता है। मेरे किसी भी चीज़ को देखने में अंतर यह है कि वह प्रतिक्रिया करता है। जब मैं आपको देखती हूं, तो आपकी कुंडलिनी प्रतिक्रिया करती है, जब मैं इसे देखती हूं, तो वायब्रेशन होता है। “कटाक्ष, कटाक्ष”: हर नज़र … हर नज़र, हर नज़र चीज़ को प्रतिक्रिया देती है। और निरीक्षण का अर्थ है, “मुझे पता है कि यह क्या है। मुझे पता है ये क्या है। किसी व्यक्ति को देखकर मुझे पता चलता है कि वह क्या है। किसी चीज़ को देखकर, मुझे पता है कि वह क्या है”, निरीक्षण। और वहां की सारी बात स्मृति में है, तुम देखो।

जैसे, हम जा रहे थे और उन्होंने कहा कि हमारे पास सिर्फ काले पत्थर हैं। मैंने कहा, “नहीं, तुम्हारे पास भी लाल है।” उसने कहा, “आपको पता है की कहाँ हैं ?” इसलिए मैंने उन्हें बताया कि लाल पत्थर कहाँ से लाएँ। वे बोले, “माँ, आपको कैसे पता?” मैंने कहा, “हम लगभग आठ दिन पहले उस रास्ते से गुजरे थे और मुझे पता है कि लाल पत्थर हैं।” तो मैं जो कुछ भी देखती हूं वह कंपित होता है और मैं यह भी नोट करती हूं कि वहां क्या है, और उचित समय पर उपयोग करने के लिए वहां सब कुछ तैयार होता है। लेकिन मैं क्या करूँ? मैं क्या करूं? मैं कुछ नहीं करती। मैं कुछ नहीं करती। मुझे नहीं लगता, मैं योजना नहीं बनाती। जो कुछ भी आप लोग करते हैं वैसा, मैं नहीं करती।

तो जब आपके पास उस तरह का स्वभाव होगा तो आप चकित रह जाएंगे! गतिशीलता की मात्रा इसे कार्यान्वित करेगी। आपको एक डायनेमो बनाने की जरूरत नहीं है, यह आपके अंदर है। इसे काम करने दें। आज मैंने गेविन से कहा था कि मैं इतनी पूजा नहीं करूंगी लेकिन बात करूंगी क्योंकि पूजा ठीक है, यह अपने लिए और इस बात की बात करती है। लेकिन मैं आपसे बात करना चाहती थी क्योंकि अब समय आ गया है कि हम और आगे बढ़ें।

इस सब के परिणामस्वरूप, यह सब, कि जब आप इसे करते हैं, तो आप सत्य बन जाते हैं, आप सत्य बन जाते हैं। तो, प्रत्येक चक्र में यदि आप चित्त एकाग्र करते हैं, और चक्र का उपयोग उस चक्र के विशेष गुण से खुद को निर्लिप्त करने के लिए करते हैं। जैसे, अब उदाहरण के लिए नाभी चक्र पाचन करता है। अब आप चिंता न करें कि पाचन के लिए आपको क्या खाना चाहिए। बस अपने आप को वहां से अलग कर लें, वायब्रेशन की मदद से, यदि आप बस देखते हैं और जो कुछ भी है उसे खाते हैं: आप पचा लेंगे। और तब तुम सत्य बन जाते हो। सत्य जो प्रेम है, वही ईश्वर है।

परमात्मा आप सबको आशीर्वादित करें!

[बातचीत के अलावा:

श्री माताजी: हाँ। गेविन, क्या – आपके पास कंपनी की ओर से सभी व्यवस्थाएँ हैं … मुझे जो भी पसंद है।

गेविन: जो कुछ भी आप चाहते हैं।]

बेशक मैंने आपको अभी अंडे के बारे में बताया है, अब आप पहले से ही मुर्गियां बन गए हैं। बस, आपको विकसित होना है।

हर दिन इतने सारे अंडे तोड़ना, है ना?

ईस्टर हमारे जन्मदिन जैसा कुछ है जिसे हम मनाते हैं; जब हम पिंजरे से, खोल से स्वतंत्र पक्षी बन गए। तो ईस्टर हमारा जन्मदिन है जिसे हम मना रहे हैं, हमारे आत्मसाक्षात्कार का, और हर दिन हमें अपने जन्मदिन के साथ विकसित होना  चाहिए।

जबकि मानव रूप में आप अपनी उम्र कम करते हैं, जैसे-जैसे आपका जन्मदिन आता है, लेकिन इसके साथ आप अपनी उम्र बढ़ाते हैं, और आपको गर्व होता है कि आप बढ़ रहे हैं।

मानवीय स्तर पर आप दुखी महसूस करते हैं कि आप की उम्र बढ़ रही हैं। यहां आपको गर्व महसूस होता है कि आप उन्नत हो रहे हैं। आप जो कर रहे हैं, उसके ठीक विपरीत अगर आप उसे करने की कोशिश करेंगे, तो यह अच्छा होगा।

मेरा मतलब है, इसका मतलब फिर से अविवेकी नहीं है, आप जानते हैं? मैं उस बिंदु पर काफी चिंतित हूं। [श्री माताजी हंसती हैं, हंसी]

विवेक पहली चीज है जो आपके सामने होनी चाहिए।

अब यदि आपका कोई प्रश्न है तो आप मुझसे पूछ सकते हैं, लगभग पाँच, दस मिनट तक जब तक मैं चाय नहीं ले लेती और तब हम थोड़ी पूजा करेंगे।

[वीडियो रुकावट]…पूजा से पहले सवाल हैं, और फिर – या पूजा के बाद बेहतर है [हंसी], आप जो भी कहें।

योगी:  बाद में , माँ।

श्री माताजी: एह? उपरांत।

योगी: हाँ।

श्री माताजी : ठीक है।

[योगियों से बातचीत, फिर शुरू हुई पूजा]