Maha Sahasrara Puja: The Start of a New Era

Château de Mesnières, Rouen (France)

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                    महा सहस्रार पूजा

मेसनिएरेस के महल के चैपल में, रूएन (फ्रांस)

 5 मई 1984

सहस्रार के इस दिन इतने सुंदर सहजयोगियों को एक साथ इकट्ठा होते देखना आपकी माता के लिए बहुत ही अद्भुत है।

मुझे लगता है कि सहज योग का पहला युग अब समाप्त हो गया है, और नया शुरू हो गया है। सहज योग के पहले युग में, शुरुआती बिंदु था, पहले, सहस्रार का उद्घाटन, और धीरे-धीरे पूर्णता की ओर बढ़ते हुए, मुझे लगता है कि आज बहुत सारे महान सहज योगी हैं। यह विकास की एक बहुत ही स्वाभाविक प्रक्रिया है जिससे आप गुजरे हैं।

हम कह सकते हैं, पहला था कुंडलिनी का जागरण और फॉन्टानेल हड्डी क्षेत्र को भेदन। जैसा कि आप अपने सिर के ऊपर इन बंधनों को देखते हैं, वैसे ही आपके सिर में भी है, वैसे ही, और आपके सहस्रार में चक्रों को उसी तरह बनाया गया है। तो, सहज योग के पहले युग में, हमने आपके केंद्रों में, मेडुला ऑबोंगटा में और मस्तिष्क में भी देवताओं को जागृत किया।

लेकिन अब समय आ गया है कि हम इसे क्षैतिज स्तर पर फैलाएं, और इसे क्षैतिज स्तर पर गतिशील करें, हमें यह समझना होगा कि इसके बारे में कैसे जाना है। इन्द्रधनुष के सात रंगों की तरह हमें इन केंद्रों के, चक्रों के प्रकाश के, सात रंग मिले हैं। और जब हम इसे पीछे से शुरू करते हैं, मूलाधार से, इसे इस तरफ, आज्ञा तक लाते हैं, तो इसे एक अलग क्रम में रखा जाता है, यदि आप इसे स्पष्ट रूप से देखते हैं। मेरे कहने का मतलब यह है कि सहस्रार में, क्योंकि यह अवतल स्थान है, यह समझना महत्वपूर्ण है कि फॉन्टानेल हड्डी क्षेत्र का केंद्र हमारे हृदय से मेल खाता है। तो हृदय अब दूसरे युग के लिए महत्वपूर्ण बिंदु है। मुझे आशा है आप मेरा मतलब समझ गए।

तो अगर आपको अपना चित्त सहस्रार पर रखना है, तो सबसे पहले आपको अपने हृदय पर चित्त रखना होगा। सहस्रार में, हृदय चक्र और स्वयं हृदय, आत्मा, एक साथ होते हैं। अर्थात जगदम्बा एकाकार हो जाती है,हृदय से-जो कि आत्मा है। तो हम देखते हैं कि यहाँ योग होता है।

इस समय यह समझना बहुत जरूरी है कि हमें एक बड़ा कदम उठाना है।

पूरा सहस्रार इसी तरह चलता है। ये सभी चक्र घड़ी की दिशा में इस तरह से अपनी रोशनी फेंकते हैं, और धुरी हृदय है।

तो सभी धर्मों, सभी पैगम्बरों, सभी अवतारों का सार करुणा है, और हृदय के इस चक्र में स्थित है। इस प्रकार हम समझते हैं कि अब दूसरे युग में हमें करुणा धारण करना है। अब करुणा की अभिव्यक्ति है। यदि सर्वशक्तिमान ईश्वर में करुणा नहीं होती, तो उन्होंने इस महान ब्रह्मांड की रचना नहीं की होती। दरअसल, उनकी शक्ति या आदि शक्ति, उनकी करुणा का मूर्त रूप है और इस करुणा ने ही सम्पूर्ण उत्क्रांति को मानव स्तर तक आगे बढ़ाया है, और यहां तक ​​कि सहजयोगियों के रूप में आपका उद्धार, और करुणा हमेशा पूरी तरह से क्षमा से ढकी हुई है।

तो आप देख सकते हैं, ट्रिनिटी इसी बिंदु पर मिलती है। ईश्वर का पुत्र क्षमा है, क्षमा का मूर्त रूप है। तो, सर्वशक्तिमान ईश्वर जो साक्षी हैं, माता जो करुणा और संतान जो कि क्षमा करने वाली हैं – ये सभी सहस्रार में हृदय चक्र पर मिलते हैं।

अब, हमें सीखना चाहिए कि सहस्रार को कैसे सुधारा जाए। आप सहस्रार के पीठासीन देवत्व को अच्छी तरह से जानते हैं। अब सहस्रार का स्थान आपके सिर में है,  आप इस के बारे में ऐसा सोचते हैं, लेकिन यह पूरे ब्रह्मांड का केंद्र है। इसे विकसित करने के लिए आपको फॉन्टानेल बोन एरिया में अपने हृदय चक्र पर चित्त देना होगा। यदि आप फॉन्टानेल हड्डी क्षेत्र पर चित्त देते हैं, तो आपको वहां देवता की स्थापना करनी चाहिए। लेकिन इस देवता को पहले हृदय में स्थापित करना होगा।

अब आप बहुत भाग्यशाली लोग हैं कि आपके साथ व्यक्तिगत रूप से देवता हैं । जिन लोगों को मेरे इस धरती पर आने से पहले बोध हो गया था, उन्हें देवताओं की कल्पना करनी होती थी, और उस कल्पना में वे कभी भी पूर्ण नहीं थे। लेकिन जैसा कि वे कहते हैं कि, “सहस्रार में, वह महामाया है” इस तरह इसका वर्णन किया गया है। इसलिए, यदि आप भी उस व्यक्ति को देखते हैं, तो हो सकता है कि आप उस व्यक्ति को पूरी तरह से या संपूर्ण तरीके से या निर्दोष तरीके से नहीं जान रहे हों, क्योंकि महामाया शक्ति आपकी कल्पना से बहुत बड़ी है। इसलिए समर्पण करना पड़ता है! आपके मस्तिष्क की सीमित कल्पना के साथ, कोई भी देवता को नहीं देख सकता है।

यह भी कहा जाता है कि वह भक्ति गम्या है – आप भक्ति के माध्यम से जान सकते हैं,श्रद्धा से। तो श्रद्धा तो होनी ही  चाहिए, लेकिन श्रद्धा बहुत शुद्ध श्रद्धा होनी चाहिए, इस अर्थ में कि हृदय में द्वेष नहीं होना चाहिए, हृदय शुद्ध होना चाहिए। हृदय को साफ रखना बहुत मुश्किल है। मनुष्य को हमेशा वास्तविकता की समझ सापेक्ष (तुलनात्मक) होती है, लेकिन वास्तविकता निरपेक्ष (परम,असीमित) होती है। तो, इसे हासिल करने के लिए,  हृदय के अंदर स्थित अन्य सभी प्रकार की अशुद्धियों से छुटकारा पाना होगा।

तो, शुरुआत में हम अपने बोध को प्राप्त करने का प्रयास, बहुत साफ दिल से नहीं करते हैं। उस समय हमारे पास बहुत से लगाव थे, हमारी झूठी चीजों से पहचान थी,और हमने यह भी सोचा था कि बोध पाकर हम बहुत शक्तिशाली लोग बनेंगे। आत्मसाक्षात्कार के बाद भी हम छोटी-छोटी बातों में लिप्त होने लगे, हम अपने सम्बन्धियों, मित्रों, माताओं, बहनों के लिए कृपा माँगने लगे। और स्त्रियाँ अपने पति और अपने भाइयों, बच्चों के बारे में सोचती थीं। उन सभी ने सारे ऐसे लोगों के लिए आशीर्वाद मांगा जिनके साथ वे लिप्त थे। इन सब उलझाव से बहुत जल्द तुम दूर हो गए, मुझे पता है।

अब अवतार का काम ऐसा है कि उसे अपने भक्तों, अपने शिष्यों की इच्छाओं को पूरा करना होता है। उदाहरण के लिए, गोपियों ने श्री कृष्ण से इच्छा की थी कि, “हम चाहते हैं कि आप हमारे साथ रहें, व्यक्तिगत रूप से हम में से प्रत्येक के साथ।” इसलिए, उन्होंने स्वयं को कई कृष्णों में विभाजित किया, और वे उनमें से प्रत्येक के साथ थे। लेकिन वह एक बहुत ही दिव्य इच्छा थी, मुझे लगता है, वह गोपियों की एक बहुत ही दिव्य इच्छा थी। लेकिन जब आपने मुझसे अपने भाइयों, बहनों, माताओं, पिताओं के बारे में कृपा की मांग की, तो मैंने जो कुछ भी संभव था वह करने की कोशिश की| 

साथ ही, आपने जो क्षेम मांगा, जो आश्रम आपने मांगा, वह सब कुछ जो आपको आपकी इच्छा पूरी होने के लिए चाहिए था, वह हुआ। तो, कृष्ण के स्तर पर, यह ‘योगक्षेम वहाम्यहम’ था, इसलिए क्षेम की देखभाल कृष्ण के स्तर पर की गई, क्योंकि इसका वादा किया गया था।

लेकिन नए युग में जो आना ही है,  आगे क्या,?

जैसा कि अब आपके पास अच्छे परिवार हैं, अच्छे आश्रम हैं, अच्छी नौकरियां हैं, सभी खुश हैं, आइए हम अगले युग के बारे में सोचें। अगला युग करुणा का है, जैसा कि मैंने तुमसे कहा था। लेकिन अगर आप में कोई भी चक्र अभी भी कमजोर है, तो सात रंगों के कारण सफेद हो जाने वाला प्रकाश मंद हो सकता है, या दोषपूर्ण (अविकसित)हो सकता है। तो, हमारे भीतर मौजूद सभी चक्रों की देखभाल की जानी चाहिए। हर चक्र पर चित्त देना होगा, और इन चक्रों पर करुणा, करुणा की भावना डालना होगी।

अब श्री गणेश के चक्र को लेते हैं। आप श्री गणेश पर चित्त लगाये, चूँकि अब आपका विचार दिव्य है, उन्हें अपने विचार से मुलाधार चक्र में बड़े सम्मान के साथ स्थापित करें। यहाँ अब, आपको यह जानना होगा कि सहज योग के पहले युग में मैं आपसे इन बातों के बारे में बात नहीं कर सकती थी … यह बहुत अधिक सूक्ष्म कार्य है, सूक्ष्म कार्य है।

अब उस चक्र पर अपनी चेतना रखिये, चक्र “प्रदेश” है, देश है, और राजा श्री गणेश हैं, और वह देश है। अब जब आप अपना चित्त उस चक्र पर लगाते हैं, तो शुरुआत करने के लिए उनके प्रति अपनी भावनाओं को, उनके प्रति प्रेम और आराधना की भावना को रखे। और फिर करुणा की अभिव्यक्ति के लिए, आपको और कुछ नहीं बस एक ही प्रार्थना करना है कि,”ओह, अबोधिता के देवता, दुनिया के सभी लोगों को मासूमियत दो”। लेकिन यह मांगने के पहले, आपको निर्दोष होना होगा, अन्यथा यह अनाधिकृत मांग होगी, या आप कह सकते हैं – आपको ऐसा मांगने का कोई अधिकार नहीं है।

तो अबोधिता को समझने के लिए आपको खुद को समझने की कोशिश करनी चाहिए कि आपका मन कैसे काम कर रहा है।  उदाहरण के लिये, जब आप किसी की तरफ देखते हो, तो क्या आपको लगता है कि आपको उस व्यक्ति को अपने अधिकार (प्रभाव) में रखना चाहिए? क्या आप अनावश्यक रूप से आकर्षित महसूस करते हैं, या आपके मन में कोई निम्न भावना आती है? एक अबोध व्यक्ति के लिए, जब वह एक सुंदर व्यक्ति, या एक महिला, या इस सुंदर दृश्य या सुंदर रचना को देखता है, तो पहली बात यह घटित होनी चाहिए कि वह निर्विचार हो जाए – कोई विचार नहीं है। इसलिए, यदि कोई विचार नहीं है, तो स्वामित्व की अभिव्यक्ति या किसी भी प्रकार की घटिया भावना होने का कोई सवाल ही नहीं है। लेकिन अगर आप श्री गणेश से प्रार्थना करते हैं, चाहे वह थोड़ी बहुत अनाधिकृत रूप से ही हो , कि, “कृपया मुझे अबोधिता प्रदान करें ताकि,  मैं आपसे यह वरदान मांगने के लिए सशक्त हो जाऊं, कि जहां भी मैं जाता हूं, मैं निर्दोषता का स्रोत बन सकूँ, ताकि मुझसे मासूमियत उत्सर्जित हो, जब लोग मुझे देखें, तो उन्हें महसूस हो कि, मैं निर्दोष हूं”|

यह करुणा है,  करुणा की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना करना, करुणा है। ताकि, जैसा कि आप यहां इन सुंदर केंद्रों को देखते हैं, मानो प्रकाश क्षैतिज रूप से घूमने लगता है। यह अनुकंपी तंत्रिका तंत्र  sympathetic nervous system पर गति करना शुरू कर देता है। तो आप स्वयं शक्तिशाली अबोध  बन जाते हैं। तुम मूर्ख या बचकाने नहीं बनते हो, लेकिन तुम बच्चे जैसे हो जाते हो। पूरा व्यवहार अत्यंत गरिमापूर्ण और निर्दोष होता है।

आम तौर पर, यदि आपको कोई ऐसा व्यक्ति मिलता है जो सामान्य रूप से प्रतिष्ठित है, एक अबोध व्यक्ति नहीं है, क्योंकि वह एक दिखावा करता है – यह गंभीर बन कर प्रदर्शन करने का प्रयास मात्र  है कि वह बहुत सम्मानित है ताकि, दूसरों को प्रभावित कर सके। औरएक बच्चा मासूमियत, गरिमा या किसी भी चीज का प्रदर्शन नहीं करता है, क्योंकि बच्चा ‘सोची-समझी’ नीति  से अवगत नहीं है। लेकिन आप में ‘निर्दोष गरिमा’ का वह दुर्लभ संयोग विकसित हो जाता हैं।

अब श्री गणेश का दूसरा गुण क्षैतिज स्तर पर स्वयं को अभिव्यक्त करने लगता है, कि आप विवेकशील हो जाते हैं। लेकिन वह एक शक्ति है, मैं फिर से कह रही हूं,  ‘विवेक शक्ति’, आप में विकसित होती है। अब ‘विवेक की शक्ति’ और ‘विवेक’ बीच के अंतर को समझना चाहिए। तो शक्ति का अर्थ है – यह कार्य करती है। उदाहरण के लिए, संभव है की आप कुछ नहीं भी बोलें, लेकिन यदि आप हैं, लेकिन यदि आप कहीं खड़े हैं तो खुद ‘विवेक’ ही उस स्थिति में कार्य करेगा। जैसे, एक सहज योगी, मान लीजिए कि,  एक अच्छा सहज योगी है, ट्रेन में जा रहा है, और ट्रेन का एक्सीडेंट हो गया है – ज्यादातर तो होगा ही नहीं , लेकिन यदि होगा भी  – कोई भी नहीं मरेगा।

तो आप उस ‘विवेक’ को स्थापित करते हैं जो स्वयं शक्ति है, जो खुद ही कार्य करता है। आपको यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि आप कार्य करते हैं, यह कार्य करता है, लेकिन आप साधन या माध्यम बन जाते हैं, उस ‘विवेक’ का एक सुंदर स्वच्छ वाहन। तब आपको विश्वास रखना चाहिए, अब आप क्षैतिज रूप से फैल रहे हैं। सहज योग के पहले युग में, आपको मुझे व्यक्तिगत रूप से देखने की जरूरत थी। आपको मुझे व्यक्तिगत रूप से देखने की जरूरत थी। जैसा कि हम संस्कृत में कहते हैं, ध्येय: लक्ष्य । आप अपने सामने target चाहते थे।

ग्रेगोइरे (अनुवाद करते हुए): नहीं, मैं ‘target’ नहीं कह सकता श्री माताजी

श्री माताजी : लेकिन देखो, अंग्रेजी में कोई शब्द नहीं है! ‘ध्येय’-‘जो कुछ भी हासिल करना है’। क्योंकि अंग्रेजी भाषा में कोई शब्द नहीं है,क्या करें?

तो अब जब आप इसे हर समय चाहते थे, और जब आपके सामने वह व्यक्तिगत रूप से था तो आप खुश, सुरक्षित, आनंदित महसूस करते थे। फिर दूसरे युग में, अब तुम इतनी इच्छा नहीं करोगे कि वहाँ माँ हो, यह तुम मुझ से प्राप्त कर लोगे| यही वह ईश्वरीय इच्छा है जिसके बारे में मैं आपको बता रही हूं, और आपको आज से उस पर काम करना है। मैं आपके साथ हूं, आप जानते हैं, लेकिन इस शरीर में होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि मुझे नहीं पता कि मैं इस शरीर में हूं या नहीं।

लेकिन एक बार जब यह इच्छा काम करने लगेगी, तो आप जबरदस्त चमत्कार होते हुए देखेंगे। जब बच्चा माँ से पैदा होता है, तो उसे स्वतः ही दूध मिल जाता है। तो प्रकृति पूरी बात से इतनी जुड़ी हुई है। आपकी ईश्वरीय इच्छा में भी यह जुड़ा हुआ है। और यह बहुत स्पष्ट है जब आप एक दिव्य व्यक्ति हैं।

तो, तुम मुझे कहीं भी पा सकते हो। आप सड़क पर चल रहे हैं, अचानक आप माताजी को अपने साथ चलते हुए पा सकते हैं। तो यह दूसरा युग है जिसे हमने शुरू किया है, और यदि आप मुझे अपने बिस्तर पर बैठे और मेरा हाथ अपने सिर पर रखते हुए देखें तो आपको चौंकना नहीं चाहिए। या आप मुझे क्राइस्ट के रूप में अपने कमरे में, या श्री राम के रूप में चलते हुए देख सकते हैं। ऐसा होना ही है, इसलिए आपको तैयार रहना चाहिए! [हँसी]

आप पर पहले ही इतने चमत्कार हो चुके हैं, लेकिन स्थूल स्तर पर। आपने मेरे सिर पर प्रकाश को आते देखा है, और तस्वीरों ने आपको कुछ चमत्कार दिखाए हैं। लेकिन बहुत कुछ ऐसा होगा, कि आपको कुछ ऐसा देखने को मिलेगा जिसकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। यह होना ही है, बस आपको यह यकीन दिलवाने के लिए कि आप “प्रज्ञा लोक” के नए क्षेत्र में अपने विकास की एक निश्चित ऊंचाई पर पहुंच गए हैं, क्योंकि यह एक नया राज्य है जिसमें अब आप क्षैतिज आधार पर प्रवेश करेंगे।

इस क्षेत्र में, आप स्थूल चीजें मांगना छोड़ देंगे, और कुछ भी सूक्ष्मतर, सूक्ष्म कुछ भी मांगना छोड़ देंगे। मांगना गायब हो जाएगा, और यही वह समय है जब तुम बहुत शक्तिशाली हो जाओगे। और जो कुछ भी मैं कहती हूं वह होता है, जैसा कि आप जानते हैं, केवल एक चीज है कि, मैं तुम्हें विकसित होने का आदेश नहीं दे सकती।

आप में कुंडलिनी का काम काफी किया जा चुका है। अब करुणा का नया कार्य, इसे दूसरों तक पहुँचाने का कार्य तुम्हें ही करना है। जैसे-जैसे प्रकाश तेज और तेज होता जाता है, इसके द्वारा कवर किया जाने वाला क्षेत्र बड़ा और बड़ा होता जाता है। तो, आप करुणा के दाता बन जाते हैं।

अपने पिछले व्याख्यान में, जो आपने पहले ही सुना है, मैंने आपसे तपस्या करने का अनुरोध किया है। पूरे समर्पण के साथ आपको इस महल की तीर्थ यात्रा से गुजरना होगा। यह तप की एक झलक है जो आपको करनी है, क्योंकि मुझे बताया गया है कि आप में से कुछ को छोटी-छोटी कठिनाइयों में पड़ना पड़ा था, और आप लोगों को तीर्थयात्रा के रास्ते में थोड़ा कष्ट हुआ। लेकिन साहसी होने और उन जगहों पर जाने में मजा आता है जहां शैतान जाने की हिम्मत नहीं करते।

ग्रेगोइरे (अनुवाद करते हुए): “मैस, यह मजेदार है”

श्री माताजी : मज़ा – कोई शब्द नहीं! उन्हें कभी मज़ा नहीं आया! चलो हम कहते हैं, यह दयनीय है! [हँसी]

और अगर आप जानते हैं कि तथाकथित असुविधाओं में से भी कैसे मज़ा पायें, तो आपको समझ जाना चाहिए कि आप सही रास्ते पर हैं। और जैसे-जैसे आप अपने आप समझदार होने लगते हैं, आपको पता होना चाहिए कि आप अच्छी तरह से आगे बढ़ रहे हैं। जैसे ही आप अधिक शांत हो जाते हैं और जैसे ही आप किसी को अपने उपर हमला करते देखते हैं, आपका गुस्सा हवा में गायब हो जाता है, तो जान लें कि आप अच्छी तरह से प्रगति कर रहे हैं।

जैसे ही आप किसी परीक्षा या विपदा को व्यक्तित्व पर पड़ते हुए देखते हैं और आपको इसकी चिंता नहीं होती है, तो जान लें कि आप प्रगति कर रहे हैं। जब कोई भी कृत्रिमता आपको प्रभावित नहीं कर सकती है, तो जान लें कि आप प्रगति कर रहे हैं। दूसरों में भौतिक कल्याण की कोई भी मात्रा आपको दुखी नहीं करती है,  अप्रसन्नता अब और अधिक नहीं है, तो जान लें कि आप अच्छी तरह से प्रगति कर रहे हैं। सहजयोगी बनने के लिए कोई कितना भी श्रम करे या परेशान हो पर्याप्त नहीं है। आप चाहे जितना भी प्रयास करें सकते हैं, व्यक्ति सहज योगी नहीं बन सकता, जबकि आपको वह बिना किसी प्रयास के मिल गया है, इसलिए आप कुछ खास हैं। तो यह, एक बार जब आप समझ जाते हैं, कि आप विशेष हैं, तो आप इसके बारे में विनम्र हो जाएंगे। फिर, जब आपके साथ ऐसा होता है कि जब आप देखते हैं कि आपने कुछ हासिल कर लिया है, तो आप विनम्र हो जाते हैं, कि आपके पास कुछ शक्तियां हैं, कि आप अबोधिता उत्सर्जित कर रहे हैं, कि आप बुद्धिमान हैं, और इसके परिणामस्वरूप, आप अधिक करुणामय हो जाते हैं ] विनम्र व्यक्तित्व, एक मधुर व्यक्तित्व, तो आपको विश्वास करना चाहिए कि आप अपनी माँ के हृदय में हैं।

यही है, नए सहजयोगी की निशानी, अब नए युग में, जिसे नई ताकत के साथ आगे बढ़ना है। जहां तुम इतनी तेजी से बढ़ोगे कि बिना ध्यान के तुम ध्यान में हो जाओगे। मेरी उपस्थिति में न होकर, तुम मेरी उपस्थिति में होगे। बिना मांगे आप पर पिता की कृपा होगी। आप यहाँ यही पाने आये हैं और, फिर से, मैं आज इस नए युग में, सहस्रार के इस महान दिन पर आपका स्वागत करती हूं।

परमात्मा आप सबको आशीर्वादित करें!

 गेविन, आज आप क्या करने जा रहे हैं? सहस्रार पूजा| यह पूर्ण मौन है।

ब्रह्म रंध्र को इतना बड़ा बना दो कि वहां कोई अहंकार शेष न रह सके!

चलो अब पूजा शुरू करते हैं। यहां पूजा कौन करेगा?