Chaitra Navaratri Puja

New Delhi (भारत)

सहजयोगियों के लिये भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का महत्त्व दिल्ली , २५/३/१९८५

आज नवरात्रि के शुभ अवसर पर सबको बधाई ! सहजयोग के प्रति जो उत्कण्ठा और आदर प्रेम आप लोगों में है वो जरूर सराहनीय है, इसमें कोई शंका नहीं। क्योंकि जो हमने उत्तर हिन्दुस्तान की स्थिति देखी है वहाँ पर हमारी परम्परागत जो कुछ धारणाएँ हैं उसी प्रकार शिक्षा प्रणालियाँ हैं, सब कुछ खोई हुई हैं । बहुत कुछ हम लोगों का अतीत मिट चुका है और हम लोग एक उधेड़बुन में लगे हुए हैं कि नवीन वातावरण, तीन सौ साल की गुलामी के बाद स्वतन्त्रता पाने पर तैयार हुआ, वो एक बहुत विस्मयकारी जरूर है, लेकिन विध्वंसकारी भी है । माने कि जैसे कि हम अपने मूलभूत तत्त्वों से उखड़ से गए हैं। उनका सिंचन नहीं हुआ, ये बात जरूर है, लेकिन जो कि हमारा भी रुझान ज्यादा बाह्य की ओर रहा। ये उत्तर हिन्दुस्तान पर एक तरह का शाप सा है। उत्तर प्रदेश में मैं सोचती हूँ कि सीताजीके साथ जो दुर्व्यवहार किया गया उसके फलस्वरूप अब मेरे ख्याल से धोबियों का ही राज शुरू हो गया है। और बड़ी दुःख की बात है कि जब आप उत्तर प्रदेश में सफर करते हैं तो देखते हैं कि लोगों में उथलापन, अधूरापन, अश्रद्धा, अनास्था आदि इतने बुरे गुण आ गये हैं कि लगता नहीं है कि वहाँ कभी सहजयोग पनप सकता है। बड़ा दूसरी बात बिहार, पंजाब, हर जगह ये पाया जाता है कि हम अपने को कहलाते हैं कि हिन्दू या भारतीय हैं, लेकिन हम अपनी संस्कृति से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं ।

हम कुछ भी नहीं जानते कि हमारी जड़ें क्या हैं? किस जड़ के सहारे हम खड़े हैं ? दूसरों की जड़े अपने अन्दर बिठा कर हम पनप नहीं सकते और जो हमारी जड़े हैं वो इतनी महत्त्वपूर्ण हैं कि उसी से सारे संसार की जड़े प्लावित होंगी। उसी से वो उच्च स्तर पर उठेंगी । | लेकिन यहाँ का मानव ऐसा कुछ अजीब वातावरण में है कि न इधर के हैं न उधर के हैं और जब भी मैं अन्दर देखती हूँ, तो बड़ा आश्चर्य होता है कि जो गहनतम विशेषतायें दक्षिण में हैं, वो यहाँ एकदम खो सी गई हैं । इस ओर हमें चिन्ता करनी चाहिए और ध्यान देना चाहिए कि हमने ये सब क्यों खो दिया ? जो हमारा इतना महत्त्वपूर्ण ऊँचा था, उसे हमने क्यों त्याग दिया? उससे तो मैं सिख लोगों को ज्यादा मानती हूँ, क्योंकि कुछ नहीं तो कुछ न कुछ तो वो जानते हैं अपने धर्म के बारे में । ऐसा कोई सिख आपको नहीं मिलेगा जो अपने धर्म के बारे में कुछ भी न जानता हो । लेकिन ऐसे आपको हजारों हजारों हिन्दू मिल जाएंगे जो कुछ भी नहीं जानते और उसमें उनको कोई हर्ज भी नहीं है ।

इसका एक फायदा जरूर होता है कि जब धर्म बहुत ज्यादा संकलित होता है, गसरपळीशव (संगठित) होता है तो उसकी श्रृंखलाऐं जरूर अटकाव रखती हैं, उससे आदमी अति पर जाकर षरपरींळल (धर्मान्ध) हो सकता है यह एक बात है । लेकिन दूसरी बात कि हम बिलकुल अनभिज्ञ हैं अपने धर्म के बारे में। अपने विश्वासों के बारे में और अपनी धारणाओं के बारे में होने से अंग्रेजों को तो कह सकते हैं, परदेसी लोगों को कह सकते हैं कि आपको यह सीखना है, आपको यह जानना है, अपने गहराई में उतरना है, लेकिन हिन्दुस्तानियों को क्या कहा जाए ? वो तो अपने को अंग्रेज ठहराए बैठे हैं । वो सोचते हैं कि हम तो बहुत ऊँची पदवी पर पहुँचे हुए हैं । कितना उथला जीवन हम बिता रहे हैं । इसकी ओर हमारी दृष्टि नहीं । इसलिए हमारी संवेदना, जो आत्मा की है, वो गहन नहीं हो पाती। | आत्मा की संवेदना गहन हैं, उथली नहीं है । जो मनुष्य उथलेपन से जीता है, वो गहनता को कैसे पाएगा ? इस ओर ध्यान देना चाहिए कि इसे हमने क्यों खोया? और खोने पर अब हमारा सम्बन्ध इससे कैसे हो सकता है? हम किस तरह से अपने को गहनता में उतार सकते हैं? एक तो धर्म के प्रति हमारी बड़ी उदासीनता है। मैं कोई बाह्य के धर्म की बात नहीं कर रही हूँ, ये आप जानते हैं, पर अन्दर का धर्म होना जरूरी है । अन्दर का धर्म माने संतुलित जीवन में वो सब चीजों में असर करता है । कोई कहेगा कि ‘माँ कपड़े बहुत पहनने से क्या होता है, वो तो जो है जड़ वस्तु है। सूक्ष्म में ही सब कुछ है।’ अरे भाई, आप सूक्ष्म में जब जाओगे, तब जड़ को आप पाओगे। जब जड़ में भी आप इतने उच्छृंखल हैं, तो आप सूक्ष्म में कैसे उतरेंगे? हमारी भारतीय संस्कृति की विशेषताएं जो हैं, उनको समझे बगैर ही बहुत लोग गलत काम करते हैं। जैसे कि हाथ में चूड़ी पहनना एक छोटी सी चीज़ है। ये क्या चीज़ है आप जानते हैं? विशुद्धि के चक्र में स्त्री में कंकण होना चाहिए । पुरुष भी पहले कंकण पहनते थे। मेरे नाक में (नथ), ये शुक्र का तारा है, ये मुझे पहनना पड़ा। पहले पहना नहीं था बहुत दिनों तक। लेकिन समझ गई मैं इसको पहने बगैर काम होगा नहीं इसलिए पहना । हर चीज़ हमारी संस्कृति में बहुत नापतोल और समझ से बनाई गई है । ये कोई किसी धर्म ने नहीं बनाई । ये द्रष्टाओं ने बनाई हैं, बड़े-बड़े ऋषियों और मुनियों की बनाई गई चीजज़ें हैं, इसको हमें समझ लेना चाहिए । हर चीज़ में, हर रहन-सहन में, बातचीत में, ढंग में हमें पहले भारतीय होना चाहिए। जब तक हम भारतीय नहीं है तब तक सहजयोग आप में बैठनेवाला नहीं। क्योंकि जो परदेसी हैं वो हर समय ये कोशिश करते हैं कि हम भारतीय लिबास में कैसे रहें, भारतीय तरीके से कैसे उठें, बैठे, बोलें । हर चीज़ वो ये देखते रहते हैं, और सीखते रहते हैं ।

कोशिश करते हैं । आज ही हमारी बहू ने एक बात कहीं कि ‘जो सहजयोगी हमने foreign ( परदेस ) में देखे, उनकी जो आस्था और dedication (श्रद्धा, भक्ति ) देखा , वो यहाँ के सहजयोगियों में नहीं है । यहाँ तो सहजयोगी सिर्फ बीमारी ठीक कराने आते हैं।’ तो हिन्दुस्तानियों का भारतीय होना बड़ा कठिन दिखाई दे रहा है, बजाय इसके कि परदेसियों का । एक तो बुद्धि में उनकी बड़ी शुद्धता है और बहुत चमक है। उस बुद्धि से वो समझते हैं कि जो आज तक हम लोगों ने ये अहंकार के सहारे कार्य किये हैं इनको छोड़ देना चाहिए और सीधे सरल तरीके से जो भारतीयता हमेशा आत्मा की ओर निर्देश करती है उसे स्वीकार करना चाहिए। वो इसे समझते हैं बहुत अच्छी तरह से और गहनता से और जिस चीज़ को समझते हैं और मानते हैं उसको करते हैं । क्योंकि उनमें बड़ी समग्रता आ गई है । लेकिन हम लोग माँ के सामने एक बात, बाद में दूसरी बात | ‘उसमें क्या हर्ज है, अगर इस तरह से रहा जाए, उस तरह से रहा जाए।’ आज में आपके सामने एक ही प्रस्ताव रख रही हूँ क्योंकि आप जानते हैं हमने ‘विश्व निर्मल धर्म’ की स्थापना की है ।

लेकिन विश्व धर्म जो है उसकी संस्कृति भारतीय है। संस्कृति बिलकुल, पूरी तरह से भारतीय है। उसमें कोई भी हम लवलेश नहीं करेंगे। जो भारत में आएंगे उनको भारतीयों जैसे रहना पड़ेगा क्योंकि ये संस्कृति हजारों वर्षों से सोच समझ कर बनाई गयी है इसमें जो गलतियाँ हैं उसे ठीक कर के। अनेक वर्ष बिता कर, इसमें से जो कुछ भी दोष हैं उसे निकाल कर, ये संस्कृति बनाई गयी। और इस संस्कृति में एक ही बात निहित है कि ‘अपना चित्त हमेशा निरोध में रखो ।’ अपने चित्त का निरोध । अपने चित्त को रोकिए । आप देख लीजिए दिल्ली शहर में कहीं भी जाइए, सबकी आँखे इधर -उधर घूमती रहती हैं हर समय । किसी की आँख में शुद्धता नहीं पाईयेगा। वासनाभरी हुई है, जिसे lust और greed कहते हैं। चित्त का निरोध तभी हो सकता है कि जब हम इस तरह से अपना भी लिबास रखें, और दूसरों का भी लिबास इस प्रकार रहे जिसमें कि मुनष्य सौष्ठवपूर्ण हो, असुन्दर न हो । लेकिन उसमें वासनामय चीजें न हों । जीवन के हर व्यवहार में हमारा जीवन अत्यंत सौष्ठवपूर्ण होना चाहिए। सौष्ठव का मतलब होता है ‘सु’ से आता है-जिसमें शुभदायी चीज़ हो, सबका मन पवित्रता से भर जाए। ऐसा स्त्री का स्वरूप, पुरुष का स्वरूप होना चाहिए, उनका व्यवहार होना चाहिए ।

| लेकिन हम उनकी जो बुरी बातें हैं, पूरी तरह सीख लेते हैं और उनकी अच्छी बात है तो हम नहीं सीख पाते। और अपने को ये समझ कर कि हम एकदम से बड़े भारी आधुनिक बन गये हैं, इस आधुनिकता के तो शाप हैं उनसे आप वंचित नहीं रहेंगे। अपने बच्चों की ओर नजर करें । अपने बच्चों में भी भारतीयता आनी चाहिए। बच्चों में आदर, आस्था, भक्ति, नम्रता सब होनी चाहिए। अब आप महाराष्ट्र के बच्चे देखिए, सीधे बैठे रहते हैं । मैंने कभी नहीं देखा कि बच्चे इधर -उधर देख रहे हैं, ये कर रहे हैं, हँस रहे हैं, बोल रहे हैं कभी नहीं। आप देखिए शांति से, ध्यान में बैठे रहते हैं । आप अंग्रेज बच्चों को देखिए तो इतना दौड़ते हैं कि उनको सबको बाहर रखा जाता है, उनकी माँओंको भी बाहर रखा जाता है

तो हमें जान लेना चाहिए क्या बात है? सहजयोग इतना गहरा हमारे अन्दर क्यों नहीं उतर रहा। हमें अपनी ओर दृष्टि करके देखना चाहिए कि हम क्या स्वयं गहन हैं? हमारे अन्दर गहनता आयी हुई है? भारतीय संस्कृति को जरूर अपनाना होगा, पूरी तरह से और उसकी पूरी इज्जत करते हुए, जैसे बड़ों का मान करना। हमने सुना कि कोई सहजयोगी हैं, अपनी माता को बहुत सताते हैं और बड़े भारी सहजयोगी हैं । अगर

ये कैसे हो सकता है? सबके अधिकार होते हैं, सबका एक तरीका होता है। अगर माँ कोई ऐसी शैतान हो या भूतग्रस्त हो तब तो समझ में आयी बात । लेकिन किसी भी माँ को सताना हमारी संस्कृति में मना है। माँ बाप का अनादर करना मना हैI भाई -बहनों से दूर भागना भी बिलकुल मना है। | दूसरी बात, अपने यहाँ कोई आदमी, कोई भी मेहमान घर में आए उसके लिए हम लोगों को जान दे देनी चाहिए।

इसके अनेक उदाहरण हैं। जो हमने खोया हुआ है, पूरा का पूरा हमें सहजयोग से वापस लाना है। पन्नाधाय जैसी औरतें, जिसने अपने बच्चे को त्याग दिया। युवराज को बचाने के लिए जिसने अपने बच्चे को त्याग दिया। पद्मिनी जैसी स्त्री इतनी लावण्यपूर्ण थी । उन सब को याद करिये जिन्होंने अपनी जान देश की आन में मिटा दी । उस संस्कृति को छोड़कर के आप किसी भी तरह से सहजयोग में पनप नहीं सकते । | मैंने सारी संसार की संस्कृतियाँ देख लीं । एक तो जो अनादिकाल से संस्कृतियाँ चली आ रही हैं । Egypt (मिस्त्र) में कहिए, China(चीन) में कहिए, या आप चाहे तो Greece (यूनान) में कहिए Italy (इटली ) में कहिए काफी पुरानी सभ्यताऐँ हैं | हजारों वर्ष की सभ्यताऐँ हैं और ऐतिहासिक भी हैं । हमारी तो इतनी पुरानी है कि वो कुछ ऐतिहासिक है, कोई पौराणिक है और कोई तो कोई समझ ही नहीं पाता, इतनी पुरानी सभ्यता हमारी है ।

और इन सभी सभ्यताओं ने विकृति को ही माना और उसमें बहक गए । उसमें दिखाया कि परशुराम जो थे उनमें औरतों के प्रति बड़ा आकर्षण था। कैसे हो सकता है ? बाप रे बाप! वो तो जल्लाद थे । वो कैसे औरतों के प्रति आकर्षण रखेंगे ? विष्णु को दूसरे गन्दे स्वरूप में दिखा दिया। इस तरह हरेक देव – देवताओं को उन्होंने उतार के छोड़ा । अब, आप रोम में जाइए । वहाँ की संस्कृति देखिए तो Romans (रोमन लोगों) के लिए तो लोग कहते हैं कि जहाँ ये गये वहाँ ही सत्यानाश । राक्षसी प्रवृत्ति के लोग थे। Egypt (मिस्त्र) में जाईए तो भारी भूत विद्या| China ( चीन) में जाइए तो थोड़ा सा आभास हिन्दुस्तान का मिलता है। पर जो भी उनकी संस्कृति है वो हिन्दुस्तान की संस्कृति पर ही बसी हुई है। जो भी कुछ वो मानते हैं वो हिन्दुस्तान से गयी हुई सभ्यता पर बसी है। उसी प्रकार आप अगर जापान में जाएं वहाँ भी आप पाते हैं कि हिन्दुस्तान की संस्कृति पर बसी हुई चीज़े जैसे कि Zen (जेन) आदि हैं । ये सब हिन्दुस्तान से गयी हुई चीज़ें हैं । संसार को हमें सभ्यता देनी है । हमारी संस्कृति में सारी सभ्यताएँ इतनी सुन्दर हैं, सबको भूलाकर के और अब हम उस सभ्यता को ले रहे हैं जिसमें कोई भी सभ्य चीज़ नहीं है, असभ्य है । इतना ही नहीं कि हम सभ्य हों, हम सुसभ्य हों । सभ्यता ऐसी हो कि हमारे व्यक्तित्व से शुभ झरे। तभी संसार ठीक हो सकता है। तो पहले एक भारतीय होने के नाते आप अपने प्रति गर्व की दृष्टि से देखें । अपने प्रति एक अभिमान रखें कि आप भारतीय हैं, आप के पास से संस्कृति की इतनी सम्पदा है । और कृपया कोशिश करें कि हमारे हर एक जीवन में हम भारतीयता के साथ रहें । अंग्रेजियत को त्याग दें। विलायती चीज़ों का उनके रहन सहन इस्तेमाल करना बहुत गलत है। आप जानते हैं आपकी माँ सब भारतीय चीज़ इस्तेमाल करती है। क्रीम तक वो भारतीय लगायेगी, साबुन भारतीय रहेगा । सब चीज़ भारतीय होनी चाहिए । चाहें इग्लैंड में रहें, चाहे दुनिया में कहीं भी रहें । और मैं देखती हूँ कि बाहर की कोई चीज़ लगाओ तो मेरे को तो सुहाती ही नहीं है। कोई क्रीम बाहर की लगाओ तो वो मेरे को सुहाएगी नहीं । मुझे सुहाता नहीं है । | इसलिए जो यहाँ पर विशेषकर (उत्तरी भारत) में आप देखते हैं कि लोग बहुत ज्यादा परदेसी चीज़ों की ओर, परदेसी सभ्यता की ओर, परदेसी व्यवहार की ओर इतने झुके जा रहे हैं । ये कहाँ पहुँचे हैं? कम से कम अपनी सभ्यता तो सम्हालो । सभ्यता के बात धर्म का सवाल आता है। धर्म हमारे यहाँ संतुलन में है। जरूरत से ज्यादा बात करना, जरूरत से ज्यादा किसी पर अतिशयता करना, किसी पर हावी होना, ये गलत बात है। सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात ये है कि हमारे यहाँ उत्तर हिन्दुस्तान में औरतों पर बड़ा ज्यादा domination (अधिपत्य) है । औरतों को बहुत बुरी तरह से हम लोग यहाँ पर सताते हैं। कोई औरतों की इज्जत ही नहीं है उत्तर हिन्दुस्तान में। औरत को जिस

तरह से भी हो सके दबाया जाए ? औरत के प्रति कोई भी श्रद्धा नहीं दिखाई देती। फिर औरतें निकलती हैं एकदम यहाँ से जो वो तो एकदम तूफानमार, फिर वो जूते से ही बोलती हैं अगर आप इतनी उस चीज़ को दबा दीजिए तो ऐसी ही औरतें खोपड़ी पर बैठेंगी। मैं तो यू.पी. में देखती हूँ कि वहाँ तो जो औरत वेश्या जैसी है तो मानी जाती है और या जो औरत डंडा लेकर लेकर बैठी है । और सीधी सरल अच्छी औरत हमेशा दबाई जाती है। बुरी तरह से उसको सताया जाता है। ये वो कहते हैं मुसलमानों से आया है। लेकिन मैं मुसलमान देशों में गयी हूँ, रियाद में रही हूँ। हाँ, मानते हैं वहाँ चार बिबियाँ करते हैं, जो भी करते हैं, लेकिन औरत की कितनी इज्जत हैं वहाँ ! बहुत खयाल करते हैं कि एक औरत अबला है, उसकी मदद करनी चाहिए । बहुत इज्जत करते हैं। हम न तो मुसलमान, न हिन्दू पता नहीं कहाँ के आ गए जो कि औरतों को इस तरह से सताते हैं । अपने इस देहली शहर में सुनते हैं बहुत सी bride-burning (वधुओं को बहुत जलाना) हो गयी। मैं आज ये बात इसलिए कह रही हूँ कि मैं परदेस में गई। वहाँ मुझसे लोग यही पूछते हैं कि ये क्या आपकी सभ्यता है कि आप अपने यहाँ की bride (वधु) को जला देते हैं ? अब ‘कायदा पास करो, कायदा कराओ’। क्या हम लोग अन्दर से कायदा नहीं रख सकते ? औरत की हम इज्जत नहीं कर सकते ? औरत पर हम बिगड़ते हैं। औरत पर क्रोध करना पाप है। आपको क्या अधिकार है कि आप औरत पर क्रोध करें? वो आपके बच्चों की माँ है । औरतों को जरूर चाहिए कि वो भी चरित्रवान हों और वो भी पूजनीय रहें । अगर औरत पूजनीय नहीं है, तो भी उस पर क्रोध करने से फायदा क्या? लेकिन अगर पुरुष पूजनीय नहीं है तो भी वो क्रोध कर सकता है और वो महादुष्ट हो और उसे और किसी स्त्री से लगाव होता तो भी वो दुष्टता कर सकता है। ये भारतीय संस्कृति नहीं है । यह भारतीय संस्कृति नहीं हैI इस देश में इतनी बड़ी बड़ी महान औरतें हो गई हैं जो पंडितों के साथ बैठकर वाद – विवाद किया करती थी । वो सबकुछ खो गया। या तो अब कोई राक्षसी प्रकृति की स्त्री आ जाए उसके सामने आप झुक जाऐँगे और या तो कोई बिलकुल ही गिरी हुई औरत हो तो उसके आगे आप दौड़ेंगे। ये क्या पुरुषार्थ है? अब रही औरतों की बात कि वो भी और औरतों की देखा-देखी उस तरह से रहने लग जाती है जिस तरफ औरतों की नजर जाती है। जैसे आदमी लोग औरतों की ओर देखते हैं, उधर ही उनकी नजर जाती है, तो जैसे ये औरतें जिस तरह का कपड़ा पहनती हैं, इस तरह से घूमती-फिरती हैं, इस तरह से बातचीत करती हैं, इनका ढंग जैसा बिलकुल छिछोरा है, उसी ढंग से औरतें भी अपने को बनाना शुरू कर देती है। क्योंकि औरत में व्यक्तित्त्व ही नहीं है । उसको दबा दबा कर मार डाला । वो सोचती है, भाई इसी बहाने खुश हो जाए आदमी । मैं तो इसमें दोषी पुरुषों को समझूंगी हर हालत में क्योंकि जब पुरुष औरत को बढ़ती है इस देश में बढ़ावा दे, उसकी महानता बढ़ाए, तभी औरत बढती है इस देश में इसका ये कभी भी मतलब नहीं कि औरत आदमी के सामने बोले । इसका मतलब नहीं। औरत को सम्मान के साथ अपने पति के साथ रहना चाहिए। उसकी हर इच्छा को पूर्ण करना चाहिए, उसमें कुछ नहीं जाता। औरत धरा (धरती) जैसी है, उसके पास अनन्त शक्ति है। धरा जैसे उसे पति को प्लावित करना चाहिए। लेकिन अगर आप हर समय धरा को चूसते रहें तो एक दिन अन्दर से ज्वालामुखी निकल आता है यह भी समझ लेना चाहिए । बाहर जाकर शर्म आती है यह सोच सोचकर कि जिस तरह के किस्से यहाँ के लोगों की तरफ फैले । पर ये चीजें महाराष्ट्र में क्यों नहीं होती ? महाराष्ट्र में तो dowry system (दहेज प्रथा) बिलकुल नहीं है। South India (दक्षिण भारत) में भी dowry (दहेज) का system (प्रथा) बहुत चल पड़ा है । उसकी वजह वह दिल्ली में जो आकर बैठे है सब मद्रासी । उनको सबको वापस करो या उनको कहो कि मद्रासी बनो । दिल्ली में सीखे हैं “इतने रुपये dowry लेंगे, उतने रुपये dowry लेंगे ।” बड़ा आश्चर्य होता है! हाँ, ठीक है, लड़की के नाम से रुपया-पैसा जरूर कर देना चाहिए। लेकिन दहेज लेनेवाले होते ही दूसरे हैं, लड़की से थोड़े ही कोई सम्बन्ध रहता है? | भारतीय सभ्यता में ये कहीं भी नहीं है। हमेशा स्त्री का मान किया गया है। ‘राधा कृष्ण’ कहा जाता है। कृष्ण, राधा के बगैर कुछ भी नहीं हैं। मान लीजिए जब कंस को मारना था तब भी उन्होंने राधा को याद किया। राधा की ही शक्ति से ही मारा है । वे क्या मार सकते थे अपने मामा को? अगर मार सकते तो जब पैदा हुए तभी मार ड़ालते । हमारे यहाँ ‘सीता-राम’ कहा जाता है। हमारी संस्कृति में सब चीजें इतनी सुन्दर-सुन्दर हैं कि उसको अगर बारीकी से देखा जाए तो मनुष्य समझ सकता है कि इसकी सुन्दरता क्या है। लेकिन ज्यादातर भारतीय संस्कृति के बारे में लिखनेवाले ऐसे लिखते हैं जैसे कि बैंक में कहाँ कहाँ छेद हों उसका अनुभव कि इसमें ये खराबी है, वो खराबी है। कोई ये बात नहीं लिखता है कि कितनी बड़ी भारी बैंक है। लिखता ये है इसमें इधर से छेद | है, उधर से छेद है। वो बनाए इन्होंने ही हैं। हो सकता है उसमें एक दो बातें ठीक करनी भी हों, एकाध इधर उधर की लेकिन एक एक चीज़ पर आप देखिए कि ‘स्वार्थ’ शब्द दिखेगा। ‘स्वार्थ’ का अर्थ पाना है। परम स्वार्थ वही है कि जब आपने परम को पा लिया। और मैं देखती हूँ कि जो परदेश में भी लोग हैं वो जब हमारी औरतों को देखते हैं कि हम उनके जैसे कपड़े पहन के घूमती हैं, उनके जैसी बातचीत करती हैं, उनको जरा भी इज्जत नहीं करते। और जो औरत अपनी भारतीयता पर खड़ी है, उसकी बड़ी इज्जत होती है । मैं जब एक बार जापान गयी थी १९६० में, बहुत साल पहले की बात है, तो हर जगह जाए, तो बड़ा हमारा मानपान हुआ। और जब हम शिकामा नाम के एक बन्दरगाह पर पहुँचे तो ‘हजारों’ लोगों की भीड़ वहाँ पर थी। तो मैंने कहा, ‘ये कौन आए हैं? सब लोग कहाँ से आए हैं?’ तो कहने लगे, ‘आपको देखने । ‘मुझे? क्यों ?’ कहने लगे, ‘क्योंकि उनके पास खबर पहुँची कि बिलकुल पूरी भारतीय स्त्री यहाँ पर आयी हुई है। और उसको देखने से पता हो जाएगा कि बुद्ध की माँ कैसी थी।’ और सब वहाँ खड़े तरस गये देखने के लिए एक भारतीय स्त्री को। वहाँ सारी सिन्धी औरतें आधे कपड़े पहनकर घूमती हैं। वो तरस गये देखने के लिए कि एक भारतीय नारी कैसी होती है? किस तरह से कपड़े पहनती हैं? कैसे उसके बाल हैं? क्या है? हम लोग जहाँ भी जाएं हमें वो लोग कुछ उपहार दे दें। एक जगह बरसात हो रही थी तो हम अन्दर चले गये । वहाँ उन्होंने हमको कुछ दे दिये। तो जो translate (अनुवाद) कर रहे थे, तो उनसे हमने कहा, ‘ये हमको हर जगह उपहार क्यों देते हैं ?’ टैक्सी में बैठिए तो टैक्सीवाला गाड़ी रोककर कुछ उपहार देगा। कहने लगे, ‘क्योंकि आप Royal family (सम्मानित परिवार) के हैं।’ हमने कहा Royal family के ये कैसे कहा ? ये तो बात नहीं हैं ।’ ‘नहीं’, कहने लगे, ‘देखिए आप बाल कैसे बनाती है। हमारे यहाँ Royal family के लोग ही इस तरह के बाल बनाते हैं। और बाकी के जो हैं hair dresser के पास जाते हैं। ये तो रॉयलपन की निशानी है कि अपनी इज्जत में खड़े हो ।’ हम लोग इतने हैरान हो गये। हमारी लड़कियाँ और हम तो इतने हैरान हो गये कि सच्ची ये बात है। | | इसका निरूपण हम तभी कर सकते हैं जब हम इसे बाहर जाकर देखें । और जब तक हम इस देश में हैं हम नहीं समझ पाते कि हरेक कितनी सुन्दर है और अच्छी बनाई गयी है। स्त्री के लिए अलंकार आवश्यक बताया गया है। उसे अलंकार पहनना चाहिए। विवाहित स्त्री के लिए बताया गया है कि उसको अलंकार पहनना चाहिए। खासकर के उस पर सारे घर की दारोमदार होती है, उसके चक्र ठीक रहने चाहिए। उनको सुशोभित रखना चाहिए । उस तरह से कायदे से कपड़े पहनना चाहिए । कायदे से रहना चाहिए । लेकिन अपने को विशेष आकर्षण बनाना वगैरेह, ये सब चीजें भारतीय संस्कृति की नहीं हैं । कोई भी स्त्री भारत में अपने को आकर्षक बनाने के लिए नहीं पहनती है पर हरेक समय समय पर जो occasion(अवसर) होता है, इसलिए सजाती है और इसलिए कपड़े अच्छे से पहनती है कि जो वो अवसर है वो और भी सुन्दर हो जाए । उसके अनुसार वो अपने को जैसे कि महाराष्ट्र में आप देखिए कि अगर अब हमारी पूजा हो रही है तो नाक की नथ पहनेंगे, यहाँ का पहनेंगे, वहाँ का पहनेंगे, best (सबसे अच्छी) साड़ी जो होगी वो पहन कर आऐंगी । यहाँ तक airport (हवाई अड्डे) पर जब हमें लेने आएंगी तो सब पहनकर आएंगी | तो मैंने कहा कि ये सब रळींगीं पर पहनकर क्यों आई । तो कहने लगी कि देवी के मंदिर में जाना है, देवी को देखना है तो क्या ऐसेही देखेंगे? ये दिखाना चाहिए कि हम कितने खुश हैं, कितने सुख में हैं। लेकिन शहरी जो हमारी औरतें हैं, महाराष्ट्र में तो भी अपने खासकर दिल्ली से सम्बन्ध अगर हो गया है तो उनके नखरे ही नहीं मिलते। तो दिल्ली से बहुत लोग प्रभावित हैं । इसलिय मैं सोचती हूँ कि आप लोगों को पूरा समझाया जाए कि भारतीय संस्कृति की एक एक चीज़ को आप समझें, उसके बारे में पढ़े । देवी महात्मे को पढ़ें । स्त्री की कल्पना, ये समझना चाहिए कि हर एक स्त्री एक गृहलक्ष्मी है। घर में उसका मान रखना, उनको इज्जत से रखना बहुत जरूरी है । दूसरी बड़ी मुझे हैरानी होती है कि उत्तर हिन्दुस्तान में लोग अपनी पत्नी को इतना नहीं मानते जितना अपनी लड़कियों को मानते हैं। समझ में नहीं आता बिलकुल मुसलमानी पद्धति है। लड़की को मानना और बीबी को नहीं मानना ये बड़ी अजीब सी बात लगती है। लड़की तो कल ब्याह होकर चली जाएगी और बीबी तो जिन्दगी भर के लिए आपकी अपनी है, ये कुछ समझ में बात आती नहीं है। उसी प्रकार अपने पति को कुछ नही मानना और लड़के को सब कुछ मानना ये भी इधर ज्यादा बीमारी है। लड़का बहुत बड़ी चीज़ है। इधर उत्तर हिन्दुस्तान में लड़का बहुत बड़ी चीज़ है। किसी के लड़का न हो गया कि क्या उसके घर में हाथी आ गया। वो बाद में उठकर माँ को लात ही मारे कोई हर्ज नहीं है। उसका रात दिन अपमान ही करें कोई हर्ज नहीं पर लड़का हो गया। उसके बाद असल मिठाई बाँटी जाएगी। | शुरु से ही स्त्री के प्रति ऐसी निन्दनीय वृत्ति रखने से औरत हमेशा असुरक्षित (insecure) रहती है। जो औरत insecure रहती है वो या तो आपको नचा के छोड़ देगी या आपका सर्वनाश करके छोड़ेगी । स्त्री के अन्दर पूरी इज्जत और मान आप दीजिए । बच्चों को भी । बच्च्चों से भी आप मान से बात करिए। ‘आप बच्चे हैं, आप विशेष हैं, आप सहजयोगी हैं। आप का मान होना चाहिए । आप बड़ों जैसे बैठिए । आप सहजयोगियों जैसे बैठिए ।’ ये अगर आप अपने बच्चों को समझाने लग जाए तो बच्चे कहाँ से कहाँ पहुँच सकते हैं। लेकिन ये बात बहुत कम पायी जाती है । ज्यादातर हम बच्चों को झिड़कते ही रहते हैं, उनके अन्दर कोई इज्जत की भावना नहीं आती। जब उनके अन्दर कोई इजत की भावना नहीं आती है तो बच्चे उसी तरह से बर्ताव करते हैं जैसे आपके नौकर लोग बर्ताव करें । | मैं तो कहती हूँ नौकरों तक को हम लोगों को एक इज्जत से, बकायदा जैसे कुटुम्ब पद्धति हमारे यहाँ है, उसको संम्भाल के वो करना चाहिए । सारे कुटुम्ब को सम्भाल के, सबको प्यार दे कर के । अपनी न बात करें । जिस तरह से औरतों की भी आदत होती है। मैने देखा कि, ‘हमें तो ये चीज़ पसन्द नहीं । ये सफाई नहीं हुई। घर में ये नहीं हुआ। ये ठीक होना चाहिए ।’ आप करिए । ये आपका काम है। और खुश होईये। और तीन बार खराब हो तो चार बार ठीक करिये । क्योंकि ये आपका शौक है। खाना बनाने का शौक होना चाहिए । हर चीज़ का शौक होना चाहिए औरत को। और दूसरों के लिए करने की शक्ति होनी चाहिए । लेकिन इसका मतलब नहीं कि आदमी खोपड़ी पर चढ़ कर बैठ जाए । वो इस चीज़ की इज्जत करें और सोचे… इंग्लैण्ड में हर आदमी बर्तन माँजता है हर आदमी । सिवाय हमारे घर के। और वो तो अगर आप कह दें कि आप बर्तन मांजिए तो गए। कल बर्तन ही टूट जाएंगे। वो जरूर माँजेंगे, जब गुस्सा चढ़े तो । लेकिन अगर वो बर्तन माँजने बैठ जाएं तो गए काम से । सबसे बड़ा अहंकार ये है कि “मैं पुरुष हूँ।” पुरुष, श्रीकृष्ण के सिवाय, मैं तो किसी को नहीं देख पाती। जो करनेवाला है वही है और भोगनेवाले भी वही हैं। पुरुष और प्रकृति जो है सो है, हम अपने को बेकार ही पुरुष समझ करके बड़ा भारी अहंकार अपने अन्दर लिये हुए हैं। हम सब माँ के बटे हैं। इस अहंकार से आप सब लोग छुट्टी पाइए। बहुत ज्यादा है! अभी भी सहयोग में भी बहुत है। और फिर यहाँ तक कि बीबी को मारना, पीटना । बीबी को मारना, पीटना ये अधर्म है । फिर बीबी पीटे तो बिलकुल अधर्म हो जाता है । हाँ, होती हैं ऐसी भी हमने देखी हैं । लेकिन समझदारी की बात ये है हम दोनो रथ के दो पहिये हैं एक left (बायें) में है और एक right (दायें) में है । कोई सा भी पहिया अगर छोटा हो जाए तो पहिया गोल गोल घूमेगा। दोनों एक साथ एक जैसे होने चाहिए, पर दोनों एक जगह नहीं है । एक left में है और एक right में। Right (दायाँ) जो है उसका कार्य ये है कि वो दिशा दे, बाह्य की तरफ देखे, बाह्य की चीज़ें सम्भाले, घर के बाहर सफाई करें । जैसे वहाँ करते हैं लोग । बाहर की सफाई आदमियों को करना आना ही चाहिए, सहयोगियों को। क्योंकि वो बाहर की सफाई नहीं करते हैं, इसलिए अपने बाहर के आँगन गर्दे रहते हैं, अन्दर की सब सफाई रहती है। और जो झाडू मारे, सब करे, घर के अन्दर और आदमी जो है वो बिलकुल नहीं देखता कि बाहर सफाई है या नहीं। औरत तो बाहर जा नहीं सकती और आदमी करनेवाला नहीं है इसलिए अपने जितने गाँव, शहर गरन्दे रहते हैं इसलिए कि आदमी अपने यहाँ कोई सफाई नहीं करते । इंग्लैण्ड में देखिए हर Saturday, Sunday ( शनिवार, रविवार) सब आदमी आपस में competition (स्पर्धा) लगाते हैं कि तेरा अच्छा कि मेरा अच्छा। सब एक special dress (खास पोशाख) पहनकर सब खड़े हो जाते हैं और अपनी सफाई करते हैं । सहजयोगियों को कोइ हर्ज नहीं है । क्योंकि हमें बदलना है। हम दूसरे हैं । हमें कोई हर्ज नहीं है कि हम ये करें। पहले जमाने में हमारी संस्कृति सही थी कि बाहर की सारी सफाई आदमी लोग करते थे, औरते नहीं। और वही चीज़ आज भी हमारे अन्दर आ जाए तो आप देखिए कि शुरूआत हो जाएगी कि हम बाहर की सफाई और अन्दर की सफाई हमारे देश की शुरू हो जाए, तो गन्दगी कहाँ रहेगी? लेकिन उससे बड़े फायदे हो जाते हैं, जब आदमी लोग सफाई करना शुरू कर देते हैं । जैसे लंडन पहुँचे आप तो हमने देखा यहाँ बर्तन धोने के, kitchen ( रसोई घर) साफ करने के इन्तजामात बड़े जबरदस्त हैं । तो हमने कहा कि भाई ये कैसे किया? यहाँ एक से एक चीज़े बनी हुई हैं । इससे इसको रगड़ दो तो पाँच मिनट में निकल जाएगा । वो कढ़ाई है, उसमें ये लगा दो तो दो मिनट में सफाई हो जाती है। हमने कहा हम लोग तो रगड़ते-रगड़ते मर जाएं, ये निकलती नहीं कढ़ाई । ये है क्या? पता हुआ कि आदमियों सफाई करनी पड़ती है! तो उन्होंने सारे scientists (वैज्ञानिकों) को बुलाया कि “बाबा रे! पता लगाओ इसको निकालने का इंतजाम । नहीं तो हमको कढ़ाई माँजनी पड़ेगी । ” कभी कभी बर्तन अगर आदमी माँजे तो कुछ फायदा ही हो जाएगा। और जब आप काम करते हैं उनके साथ तो हाथ बँटाने से ये पता होता है कि ये काम कितना कठिन है और कितनी मुश्किल का काम है। | तो अपने प्रति धारणाएं बना लेने से कोई बड़ा नहीं हो जाता । और मुझे तो ये आश्चर्य होता है कि सब सहजयोगिनी जो हैं भारतीय भी हैं, तो हमसे कहती हैं, “माँ, हमारी शादी बाहर ही करा दो, अच्छा है।”तो मैंने कहा क्यों ? कहने लगी,”अब हमें सहजयोगिनी होकर ड्ंडे नहीं खाने ।” आप सोच लीजिए । बड़ी मुश्किल से ये परदेसी लड़कियों को भुलावा दे देकर मैं यहाँ शादी कराती हैँ। टिक जाएं तो नसीब समझ लो! लेकिन वो चले जाते हैं परदेस, फिर सीख जाते हैं वहाँ | हमने देखा कि पाटणकर का लड़का खूब बर्तन माँज रहा है! तो हमने कहा कि भाई कैसे क्या सीख गए? कहने लगे, “यहाँ सभी सीख जाते हैं ।” खूब पतीले उठा रहा था हमारे साथ । और यहाँ अगर आप कहते तो बिगड़ता और कहता कि, “नहीं, मुझसे नही होनेवाली ये सब बेकार की चीज़ें।” वहाँ खूब मेरे साथ पतीले उठा रहा था। मैंने कहा,”उन लोगों को करने दो । तुम क्यों उठा रहे हो ?” कहने लगे, “मुझे सीखना जो है।” जो आदमी वहाँ ये सब जानता नहीं उसे वहाँ ‘निठल्लू’ कहते हैं ।उन लोगों से ये चीज़ जरूर हमें सीखनी है । नसीब से भई हमारे यहाँ ये प्रश्न नहीं क्योंकि हमें तीन servants (नौकर) allowed (मिले) हैं । तो भगवान की हमारे घरवाले तो कभी नहीं कर सकते । हमने ही उनको खराब कर रखा है । लेकिन तो भी मैं कहती हैँ कि कोशिश करते हैं । उनको जरा लगता है कि भई देखो सब लोग कर रहे हैं और हम नहीं कर रहे है, वो क्या कहेंगे । कोशिश करते हैं। कृपा इसलिए जो जो वहाँ जा रहे हैं, कृपया सब सीख कर जाएं । उसके बगैर आपका वहाँ मान नहीं होनेवाला। तो ये चीज़ें हम लोग इस पर ले आते हैं कि आनन्द का स्रोत आत्मा है। और इस आनन्द को हमने पाया और वो हमारे रग रग में से बहना चाहिए। हमारे जीवन से बहना चाहिए, हमारे हर व्यवहार से बहना चाहिए । उसके लिए क्या करना चाहिए? पहले, सबसे पहले हमें देना आना चाहिए । जो आदमी दे नहीं सकता वो आनन्द का मजा नहीं उठा सकता क्योंकि जब तक चीज़ बहेगी नहीं तो कैसा मजा आएगा? जैसे एक मेंढक एक छोटे से तालाब में, जिसका पानी नहीं बहता है, काई में रहता है । उसी प्रकार अगर हम अपने जीवन को बिताएं, तो बिता सकते हैं । और हमारे भी शरीर पर जैसे कि एक मेंढक के शरीर पर भी काई जैसे जम जाती है, काई जैसा रंग ऐसा ही हमारे जीवन का रंग काई जैसा हो जाएगा । लेकिन जीवन का रस अगर हमें पाना है और उसका मजा उठाना है और आत्मा का आनन्द देखना है तो हमें चाहिए कि हम अपना दिल खोल दें और बहाएं इस आनन्द को। आप जानते हैं कि आपकी माँ की उम्र अब तरेसठ (६३) साल की हो गई है और हिन्दुस्तान के हिसाब से चौंसठ (६४) साल के हो गए। लेकिन कितनी मेहनत करती है आपकी माँ। कितना सफर । करीबन हर तीसरे दिन सफर, दूसरे दिन सफर । उसके अलावा पहाड़ों जैसी कुण्डलिनी उठाना, बड़ी मेहनत… I फिर सारे news paper (अखबार) वाले कि कुछ हैं, कि कुछ हैं। ‘पूरी’ समय मेहनत चलती है। हमारे साथ एक देवीजी आरयीं । हम सें पाँच साल छोटी हैं और मोदी साहब पूरी समय कहें कि ये बुढ़िया देखो, बिचारी कितनी मेहनत कर रही है । मैंने कहा और मेरी बात नहीं कर रहे हो तुम? मैं उनसे पाँच साल बड़ी हूँ। उनके लिए तो ये बुढ़िया बेचारी कितना चल रही है, ये बुढ़िया बेचारी कितना कर रही है। मैंने कहा, ‘मैं कौन हूँ?’ मुझको देखो वो तो सोचते ही नहीं कि मैं बुढ़िया हूँ। | क्योंकि अभी तक देने की शक्ति बहुत ज्यादा है, उसकी क्षमता है। जब तक देने की शक्ति आप के अन्दर है तब तक आप कभी भी बूढ़े नहीं हो सकते । इसलिए देना सीखिए, दिल खोल दीजिए तब आनन्द देखिए कैसा बहेगा ।

सुक्ष में दिल खोल देना चाहिए, कहना चाहिए । लेकिन ये ही हमारी सभ्यता का तत्त्व है, कि दो । जितने, जितने अपने यहाँ सूक्ष्म लोग हो गए हैं बड़े बड़े, जिनके आख्यान आपने सुने, चाहे हरिश्चन्द्र हैं, जिनकी आपने बात सुनी होती । ये जो कुछ भी आपने पढ़ा है उसमें ऐसे लोगों की महानता बताई है जो दिल खोलकर के देते थे । और वही आपको भी देना है । इस संस्कृति की महत्ता जितनी भी गाई जाए वो कम है। लेकिन सिर्फ महत्ता से नहीं है, वो हमारे अन्दर बिंधनी चाहिए। हमारे अन्दर उसका पूरा प्रवेश होना चाहिए । उसके अंग अंग में हमें मजा आना चाहिए। और हमें उससे खुश होना चाहिए । अभी भी जहाँ ये संस्कृति है वहाँ बड़ा मजा आता है । एक बार हम गए थे राहरी के पास । वहाँ के बहुत से इंजीनियर थे बेचारे । कोई खास तनख्वाह नहीं । छोटे छोटे घर, जिनमें कि एक छोटी सी वो आईं। कहने लगी, “माँ, कल आप लोग हमारे यहाँ breakfast (नाश्ते) पर आइए ।” हमने कहा, “क्या कर रहे हो? तीस आदमी हैं हम लोग। कहाँ आप करोगे?” “माँ आप आओ न एकबार । मान जाओ। हमें बड़ी खुशी होगी।” मुझे बड़ा force (आग्रह) किया। मैंने कहा, “क्या कर रही हो? तीस आदमियों का ब्रेकफास्ट (नाश्ता) कैसे बनाओगी तुम?” सुबह छ: बजे पहुँचे, तो मंडप बना हुआ है ऐसा। सब लोगों ने मिलकर रात को तीन बजे से खाना बनाया। और ‘इतनी’ खुश! और इतना बढ़िया उन्होंने ब्रेकफास्ट (नाश्ता ) खिलाया कि मुझे भूलता ही नहीं है। और पता नहीं कहाँ से बेंचेस लाकर लगाए, कहाँ से इन्तजामात किये? और इतनी खुश जैसे बड़ा भारी कोई बड़ा समारंभ हो गया हो। ये हमारा देश है। ये हमारी सभ्यता है। इसको मत छोड़िए । इसको फिर से पनपाना है, इसको बढ़ावा देना है। हमारा संगीत, हमारी कलाएं, हमारा जो कुछ भी है, बड़ा गहन है। उसको समझिए क्या चीज़ है। इसकी गहनता में घुसें । मैं चाहूँगी आपसे जितना भी बन पड़े हमारे संगीत के बारे में, कला के बारे में जानने का प्रयत्न करें | जो अपनी कला को नहीं जानते, अपने संगीत को नहीं जानते, अपनी भारत माता को नहीं जानते, वो इस माता को कैसे प्यार कर सकते हैं ? इसलिए तो हम झगड़ेबाजी करते हैं । आज सिर्फ आपसे बातचीत करनी थी, सो कर ली । अब मैं चाहती हूँ कि अगले समय मैं आऊँ तो आप लोग ये समझें कि हमारे क्या क्या त्यौहार होते हैं, इन त्यौहारों में क्या क्या होता है। हमारे यहाँ छोटी छोटी दवाइयाँ हैं जो कि बहुत सालों से चली आ रही हैं । छोटी छोटी बातें हैं जैसे केला खाया, उसके बाद चना खाओ या कोई चीज़ खाओ, उसके बाद पानी पिओ । धूप में से आए आप पानी मत पियो । आजकल लोग सब हिन्दुस्तान में बीमार हो जाते हैं। वजह क्या है? ये छोटे छोटे नियम जीवन के जो बनाए हुए हैं, समझदारी के वो हम नहीं मानते हैं। “इसमें क्या हो गया?” हो गया क्या? आप अस्पताल में जाएंगे और क्या होगा? अब जैसे अंगूर दिया इन्होंने समझ लीजिए । अब पहले हमने अंगूर खा लिया। उसके बाद हम लिम्का (जल पेय ) नहीं पी सकते । अब तो पी लिया हमने, कहा चलो अब क्या करें? हमारी बात और है। लेकिन आप लोगों को नहीं करना। फल खाने के बाद पानी पी लिया, आइसक्रीम खाने के बाद कॉफी पी ली, या कॉफी के बाद आइसक्रीम खा लिया, तब तो गए । | ये छोटी छोटी बातें हमारे जीवन की जो छोटी छोटी चीजें, हरेक, जिसे कहते हैं कि हरेक अणु-परमाणु में जो हमारा जीवन बड़ा ही सुधड़, सुव्यवस्थित और ऐसा बनाया गया है जिससे कि मनुष्य हमेशा स्वस्थ रहें, उसकी तन्दुरुस्ती स्वस्थ रह, उसका रहें और जिससे अन्त में वो परमात्मा को प्राप्त करें । ऐसा सुन्दर सारा बनाया गया है। लेकिन मन स्वस्थ रहे, उसका चित्त स्वस्थ उसको समझ लेना चाहिए । और जिस आदमी में चरित्र ही नहीं है वो आदमी किस काम का? लेकिन चरित्र को बढ़ावा देनेवाली, उसको सजानेवाली, उसको पूरी तरह से प्लावित करनेवाली जो शक्ति है, वो है आपकी सभ्यता । सभ्यता से ही आप जानते हैं कि “ये असत्य है, ये हमें शोभा नहीं देता ।” आज की हमारी भेंट में हम चाहेंगे कि आप अपनी भारतीय संस्कृति जो है उसको सर आँखों पर लगाकर मान्य करें, उसे स्वीकार करें और उसमें ही आप देखियेगा कि आपका चरित्र ऊँचा उठता जाएगा। शिवाजी का चरित्र माना जाता है कि बहुत ऊँचा था । शिवाजी की न जाने कितनी ही बातें आपको बतानी चाहिए, लेकिन उनके चरित्र में माँ का बहुत बड़ा स्थान है। लेकिन एक बार सुनते हैं कि कल्याण के सूभेदार की बहू को उनके सरदार पकड़ कर लाए। वो लावण्यवती थी। और उसका बहुत खजाना (धन) था। सब कुछ उठाकर ले आए। उसका सारा माल, उसके सारे जेवरात और ये और वो, काफी लोगों को पकड़कर लाए । और जब शिवाजी दरबार में बैठे, उनके सामने पेश किया। तो वो बहुत घूंघट तो नहीं पर नकाब पहने हुई थी। तो उन्होंने कहा कि आप अपना नकाब हटाइये। जब उन्होंने नकाब हटाया तो बड़े काव्यमय थे।

बजाय इसके कि कहें कि आप हमारी बहन हैं उन्होंने कहा कि ‘अगर हमारी माँ आपकी जितनी खूबसूरत होती तो हम भी आपके जितने खूबसूरत होते।’ उसके आँख से आँसू निकल आए । उसके बाद उनकी जितनी भी चीज़ें थी , जो जेवरात थे , हर चीज़, उनके हर आदमी को बाइज्जत कल्याण तक पहुँचाया। और बहुत नाराज हुए । ये हमारे देश का चरित्र है । राणा प्रताप एक बार जरा झुक गए क्योंकि बहुत परेशानी में थे। उनकी लड़़की के लिए घास की रोटी बनाई वो तक एक बिड़ाल (बिल्ली) उठाकर ले गई । उसको देख करके…. कहाँ राणा प्रताप जैसा आज कोई आदमी है आपकी श्रिळींळली ( राजनीति) में? सब चोर बैठे हैं। तो जब वो उठाकर ले गई बिल्ली तो राणा प्रताप के मन में आया और वो चिट्ठी लिखने बैठे शाहजहाँ को कि मैं आपकी शरणागत हूँ। जैसे उनकी बीबी ने पढ़ा उन्होने भाला उठाया और अपनी लड़की को मारने के लिए दौड़ी । तो कहने लगे, “ये क्या कर रही हो?'” कहने लगी, “इसको ही मार ड़ालती हूँ, जिसकी वजह से तुम ये सोच रहे हो ।” ये हमारी देश की औरतों का चरित्र है । और आजकल ये नमूने दिखाई दे रहे हैं । ये कहाँ से पैदा हुए यहाँ पता नहीं? लेकिन सहजयोगियों की औरतें इस तरह की होनी चाहिए और मर्द भी इसी तरह के होने चाहिए । | संस्कृत में कहा जाता है कि परस्त्री जो है वो माँ समान है। कोई भी परस्त्री माँ समान है। और परकन्या बेटी समान है । तो हम जब शादी होकर यू.पी. में गए तो लोग कहने लगे ये तो असम्भव है। मैंने कहा, “हमने तो बहुत ऐसे लोग देखे हैं। अधिकतर तो हम ऐसे ही लोग देखते हैं। यहाँ यू.पी. में क्या विशेषता है कि यहाँ असम्भव बात हैं ? आपकी नजर इतनी खराब कैसे हैं? हमने तो जिन्दगी भर ऐसे ही लोग देखे हैं। ये कहाँ से ये लोग आ गये?” तो हुआ कि नवाब साहब कोई थे , उनकी १६५ बिवियाँ थी और पता नहीं क्या क्या… तो और क्या होगा । उनके सामने ideal (आदर्श) ही ऐसे गन्दे हैं वहाँ तो और क्या होगा ? कोई अच्छे ideal (आदर्श) तो दिखाई नहीं देते । | जैसे लंडन में एक राजा साहब थे। उन्होंने सात बीबियों को मार डाला। तो वहाँ और क्या होगा? आजकल वहाँ औरतें मार रही हैं आदमियों को । तो अपनी संस्कृति जो है, बहुत महत्त्वपूर्ण है । और उस महत्त्वपूर्ण संस्कृति को समझना, उसकी गहनता को समझना , सहजयोगी का परम कर्तव्य है । जब आप लोग उसे समझेंगे, उस पर कुछ लिखेंगे तभी तो न हमारे परदेश के सहजयोगी भी उसको आत्मसात करेंगे। वो लोग छोटी छोटी बातें देखते रहते हैं और सारा वो जोड़ते रहते हैं अपने अन्दर में, मैं देखती हूँ। लेकिन हम लोग ये नहीं सिखते क्योंकि न इधर के, न उधर के रहने की वजह से कोई चीज़ हम नहीं सीख पाते। आशा है अगली बार मैं आऊँ तो आप लोग आनन्द से आत्मा का प्रकाश सब ओर फैलाते हुए नजर आएँ। मेरी यही इच्छा है कि जो मेरे अन्दर है सब मेरे बच्चे पा लें। सब कुछ। और उसी प्रकार दे जैसे में दे रही हूँ। उसी मन से, उसी भावना से, उसी प्रेम के साथ सबको ये बाँटते रहें । यही मैं चाहती हूँ। | कुछ शुद्ध चीनी पानी में घोलकर दीजिए, जिससे कि वो दाँत में न लगे । पानी में घोलकर दी हुई चीनी बच्चों के लिए बहुत जरूरी है । डॉक्टरों का इस मामलें में मत सुनिए। वो तो general (सामान्य) चीज़ चलाते हैं कि अब चीनी मत खाओ । सब लोग चीनी नहीं खा रहें । फिर नमक नहीं खाओ । सब लोग नमक नहीं खा रहें । भाई जिसको, जिस चीज़ की जरूरत है वो खाओ । बच्चों को चीनी की जरूरत बहुत है। उनको आप चीनी दीजिए । लेकिन ऐसी चीनी न दीजिए जो दाँत से वो खाएऐं या इस तरह की । पर चीनी जो कि पेट में चली जाए । दूसरे ये कि गर्मियों में ‘कोकम’ नाम का एक फल आता है महाराष्ट्र में मिलेगा । उसको भिगो लिया रात को उसके दूसरे दिन चाहे तो थोड़ा उबाल लिया। उसका रस निकाल कर उसमें चीनी ड्राल दीजिए । चीनी ड्रालकर के उसको रख लीजिए । दिन भर बच्चे को वो पीने को दीजिए । | अगर जॉन्डिस जैसी बीमारी हो जाए तो मूली के पत्ते को, छोटी छोटी जो पत्तियाँ होती हैं उनको उबाल लीजिए । कोमल पत्तियाँ जिनको कहना चाहिए कि अभी जो निकली हैं। उनको उबालकर के उसमें खड़ी शक्कर मिला करके या चीनी जो वाइब्रेटिड हो मिलाकर बच्चे को दीजिए । और कोई पानी न दें। एक दिन के अन्दर बच्चे का जॉन्डिस ठीक हो सकता है। और गर्मियों में अगर मूली का रस दे सकें तो बहुत ही अच्छा है। मूली खूब खाने को दीजिए बच्चों को । बच्चों के लिए मूली

बहुत फायदे की चीज़ है। और उनको ऐसी ऐसी चीज़ें दीजिए जिससे कि उन पर बहुत ज्यादा fat (चर्बी) न पहुँचे । हमारे यहाँ बहुत ज्यादा तली हुई चीज़ बच्चों को दे देते हैं, कुछ सोचते ही नहीं। तली हुई चीज़ बिलकुल नहीं देनी चाहिए। और दूसरा यहाँ पर एक ‘लिव ५२’ भी अच्छी दवा मिलती है। वो अगर शुरू कर दें तो एक साल के अन्दर वो भी चल सकती है। लेकिन एक चीज़ बनती है जिसको मराठी में कहते हैं ‘एरोण्या’, छोटी छोटी काली काली । नागपूर में बहुत होती है इसलिए नागपूर में किसी को liver(जिगर) की trouble(बीमारी) नहीं होती । और जब जाड़ा पड़े तो सौंठ थोड़ी सी पीस कर उसमें चीनी मिला कर सबेरे बच्चों को जाड़ा पड़ने पर दें । दूसरी चीज़ कि गन्ने का रस जितना बच्चा पी सके उतनी चीज़ अच्छी है उसके लिए। उसमें अदरक, नींबू ड्रालकर। ये सब फायदा करती हैं। और बच्चों को ज्यादातर ‘ये कर रे, वो कर रे” ऐसा नहीं कहना चाहिए ‘सबेरे उठो, जल्दी चलो, ये करो” ऐसा नहीं कहना चाहिए। इससे इनकी, जिसे तिल्ली कहते हैं, spleen खराब हो जाती है और इसी से ब्लड कॅन्सर हो जाता है। Hectic life जो lead करता है उसे ब्लड कॅन्सर होता है। बच्चों को hectic नहीं बनाना चाहिए। बच्चों को बहुत शांतिपूर्वक रखना चाहिए । पूड़ी खाना, पराठे खाना ये सब गन्दी चीज़ें हैं । पराठे तो बिलकुल बन्द कर दीजिए आप लोग । दूसरा सहजयोग में compulsory (अनिवार्य) है, compulsory I हर आदमी को अन्दर बनियान पहनना है। हर आदमी को अन्दर बनियान पहनना है। और औरतों को अन्दर से शरमीज पहननी है अगर साड़ी पहनती हैं तो नहीं। पर अगर ड्रेस पहन रही हैं तो और उपर से चुनरी लेनी है। जरूरी है । नहीं तो सारे सीने में आपको दर्द होगा। और फिर आप आएंगे कि माँ मेरे सीने में दर्द है। सब लोगों को बनियान पहनना है क्योंकि आप जानते हैं एक छोटी सी चीज़ है कि आपको जब पसीना आता है तो वो पसीना सूख जाता है और बदन में ठंडक लग जाती है। इसलिए ऐसी चीज़ होनी चाहिए जो पसीने को खींच लें। बहुत लोगों को ऐसे दर्द होता है। बेकार मुझे परेशान करते हैं। इसलिए सबको compulsory (अनिवार्य) है और औरतों को भी । हम भी कॉलेज में पढ़ते थे । हम भी सलवार कुरता पहनते थे । जब थे हम हमेशा शमीज पहनते थे । सवाल ही नहीं उठता था । पहले तो समझा जाता था कि बदतमीजी है बगैर शीमज के, चुन्री के कोई लड़की घूमे तो । और दूसरी बात ये भी होती थी कि जब तक उस तरह से पहना न जाए, समझ लीजिए एकाध कपड़े के साथ नहीं हो शमीज तब तक पहना नहीं जाता था। शमीज पहनने का रिवाज पहले था। अब पता नहीं सब लोगे ऐसे फँशनेबल हो गए कि कुछ समझ में नहीं आता। वो किसलिए बनाया गया ता? फायदे के लिए कि आपके पसीने को absorb (सोख) कर लेगा । | अगर आप साड़ी पहनें तो ठीक है। साड़ी आपको ढ़केगी, पर साड़ी भी आपको लपेटकर रखना चाहिए। जब आप बाहर जाते हैं साड़ी हमेशा इस तरह से पहनना चाहिए जिससे बदन में आपके… । इसके सबके फायदे हैं न । शारीरिक हैं । और दूसरे लज्जा स्वरूप है। बहुत फायदा होता है अगर आप अपने सीने को ढ़क लें तो जो हवा आपकी है, खास कर यहाँ की हवा के लिए तो बहुत ही जरूरी है। इतना पसीना आता है सारे आपके सीने में वो जकड़ जाता है फिर आपको बीमारियाँ हो जाती हैं।