Birthday Puja

New Delhi (भारत)

जनम दिवस पूजा प्रवचन सहज मंदिर, नई दिल्ली, २६.३.१९८५

आज आप लोग हमारा जन्मदिवस मना रहे हैं। यह एक बड़ी सन्तोष की बात है क्योंकि इस कलियुग में कौन माँ का जन्मदिन इस उम्र में मनाता है। इसलिय यह द्योतक है कि आप लोग इस कलियुग में जन्म लेकर के भी अपने मातृधर्म से परिचित ही नहीं लेकिन उसका अवलम्बन भी करते हैं। से इस उम्र में तो जन्म दिन मनाना माने एक-एक साल घटता ही जा रहा है। और बहुत काम करने के बचे हैं। बहुत से अभी कार्य मुझे दिखाई दे रहे हैं जो कि अधूरे से हैं। उन पर मेहनत करनी होगी, ध्यान देना पड़ेगा, तभी वो पूरी तरह से होंगे। हुए दिल्ली में जो काम मैंने कल कहा था कि हमें अपनी सभ्यता की ओर ध्यान देना चाहिए । हमारी सांस्कृतिक स्थिति भी ठीक करनी चाहिए। और तीसरी बात जो बहत महत्वपूर्ण है वो ये कि हमारी जो आत्मिक उन्नति है, उसकी ओर हमें ध्यान ही नहीं देना चाहिए, पर जैसे कोई एक शहीद सर पर कफन बाँध करके किसी कार्य में संलग्न होता है, उसी प्रकार हमें ‘सरफरोशी की तमन्ना’ ले करके सहजयोग करना चाहिए। जब तक हमारे अन्दर ये बात नहीं आती, तब तक सहजयोग सिर्फ हमारे ही लाभ के लिये है। इससे हमें क्या फायदे हुए, इससे हमने क्या-क्या सुख उठाया, यही सब मैं सुनती रहती हूँ। इससे हमारा जो कुछ भी लाभ हुआ है, जो भी हमारा अच्छा हुआ है, वो एक वजह से, एक कारण से हुआ है कि हमने अपनी आत्मा को प्राप्त कर लिया। लेकिन प्रकाश जब आपके अन्दर आ गया, जब आप दीप हो गए, तब दीप को आप कहीं छिपा के नहीं रख सकते। दीप को आपको उघाड़ कर रखना चाहिए। और सहजयोग, कितनी बार मैंने कहा कि, ‘समाजोन्मुख’ है, समाज की ओर उन्मुख है, वही सहजयोग है। जो प्रका फैलाता नहीं है ऐसे प्रकाश का कोई भी उपयोग नहीं। तो हर सहजयोगी को सोचना चाहिए कि मैंने कौन से दायरे में, कौन से अन्दाज से, सहजयोग फैलाया। पहले तो अपने व्यक्तित्व में विशेषता आ जाए, और उस विशेषथा को पाने पर मैंने कितने व्यक्तियों को चमत्कृत किया। आज कोई-सा भी कार्य आप हाथ में ले लीजिए, किसी भी देश में, तो पहला सवाल उठता है कि यहाँ के मानव की स्थिति क्या है? इनमें कौन-कौन से दोष हैं, इनकी कौनसी आदतें हैं, इनके अन्दर कितना अहंकार है ? उसका मापदंड देखा जाता है। और फिर सोचते हैं कि यह कार्य होगा या नहीं। सबसे बड़ा प्रश्न है मानव का। मानव की संख्या कितनी भी बड़ी हो लेकिन अगर उसकी स्थिति ठीक न हो तो कोई सा भी कार्य ठीक से सम्पन्न हो नहीं सकते। यह सबसे बड़ा कार्य सहजयोग ने किया है कि इसने मानव में मनवन्तर कर दिया। मानव में इतना अन्तर ला दिया, इसमें इतनी विशषष प्रगति कर दी। आज सहजयोगी एक ईमानदार, सच्चे, मेहनती, ऐसे लोग तैयार हुए हैं जो इस देश में बहुत ही दुर्लभ हैं, बहुत दुर्लभ लोग हैं, जो कि जो बोलते हैं वैसा करते हैं, जो सोचते हैं, वैसा ही जानते हैं, ऐसे दुर्लभ लोग सहजयोग ने तैयार कर दिये हैं । यह विचार से सहजयोग का बड़ा भारी आशीर्वाद इस देश पर है। लेकिन अब भी ऐसे बढ़िया लोग अगर हो जायें अगर एक बढ़िया कारीगर हो और उसे कोई काम ही न हो तो उसकी कारीगरी बेकार जाती है। सो हरेक सहजयोगी को यही सोचना चाहिए कि मैं क्या कारीगरी कर सकता हूँ। पर वो भी अपने शरीर की तकलीफें, अपने आराम की बात पहले सोचता है। नहीं तो यह सोचता है कि किस तरह से इसमें कुछ रुपया लग जायेगा या थोड़ा बहुत कुछ खर्चा हो जाएगा, तो ये कैसे हो? वास्तव में आनन्द को आप खरीद नहीं सकते, उसको सिर्फ भोग सकते हैं। लेकिन जिस चीज़ को हम प्राप्त करते हैं, जिसको हम लेते हैं, अपनाते हैं, अपने अन्दर उसका सुख उठाते हैं, वो चीज़ और है और सहजयोगी चीज़ और है। इसमें जो आनन्द मिलता है, वो सिर्फ बाँटने से ही मिलता है और कोई तरीका इसका नहीं है। उसके लिए हो सकता है कि आपको थोड़ी बहुत तकलीफें उठानी पड़ेंगी, थोड़ी बहुत परेशानियाँ उठानी पड़ेंगी, पर वो तकलीफ बिल्कुल नहीं रह जाती, क्योंकि आत्मा का सुख मिलता है। शरीर के सुख की ओर आप नहीं देखते। |

आप अपने को आजमा कर देखिए कि जब आप अपने आत्मा को प्राप्त होते हैं, और आत्मा का प्रकाश जब आप दूसरों को देते हैं तो शरीर का सुख आपको महसूस ही नहीं होता। आपको तो आत्मा ही का आनन्द इतना ज़्यादा मिलता है कि आप उस आत्मा के आनन्द में पूरी तरह से डूब जाते हैं। ‘आत्मनेव आत्मनः तुष्टः’ आत्मा से ही आत्मा तुष्ट हो जाता है, उसको और कोई सन्तोष की जरूरत नहीं पड़ती। और कोई चीज़ में वो खोजता ही नहीं। इतनी इसमें तृप्ति हो जाती है, जिसको कि कहते हैं कि वो ‘अमृतपान’ कर लेता है। और अमृत पीने के बाद और कोई चीज़ पीने की जरूरत नहीं रह जाती। यह स्थिति जब आपकी आ जाए तब मानना चाहिये कि आप सहजयोगी हो गए हैं, नहीं तो आप अधूरे हैं। अब आप जानते ही हैं कि हमारी तो उम्र काफी हो गई है और लगातार चौदह वर्ष से हमने मेहनत की है। पूरा तब पूरा हो गया कहना चाहिये। लेकिन ज़्यादा १२ साल की मेहनत बहुत ज़्यादा रही। और इसके बाद भी बारह साल और मेहनत करनी पड़ेगी, ऐसा लगता है। लेकिन आप लोग कितनी मेहनत करते रहे हैं वो देखना चाहिए । कोई न कोई बहाने जरूर आपका मन ढूंढेगा, कि यह नहीं हो सकता, इसमें मेरा परिवार है, मेरे बच्चे हैं, मेरा घर है, मेरा ये है, मेरा वो है। लेकिन सब चीज़ से परे जो आनन्द की सृष्टि है उसको अगर पाना है तो आपको जान लेना चाहिए कि उस आत्मा की जो इच्छा है उसे पूरी करें। जब तक आप आत्मा की इच्छा को पूरी नहीं करियेगा आपकी बाकी सब इच्छाएं वैसी बनी रहेंगी, आपके सारे कार्य वैसे ही जमे रहेंगे। कुछ नहीं घटित होने का, क्षेम घटित हो नहीं सकता, योग जब तक पूरी तरह से नहीं होगा। लेकिन जैसे ही आपने योग को प्राप्त कर लिया और योग से आप स्थित हो गए, देखिये आपके सारे प्रश्न एकदम से ही हल हो जाते हैं। आप लोगों के हुए हैं न प्रश्न हल कि नहीं? सबके हुए हैं। तब फिर आगे बढ़ के देखिये कि जो हम सोचते हैं हमारे लिये प्रश्न हैं, जो हम सोचते हैं हमारे लिये बड़ी मुश्किले हैं। आप यह सिर्फ सोच कर देखिये कि ‘नहीं, हम सहजयोग के कार्य में संलग्न हैं, और परमात्मा हमको देखने वाले हैं,’ आप देख लीजियेगा कि आपके सारे ही प्रश्न ‘एक-साथ’ साफ हो जाएंगे। एक बार आपसे मैंने बताया था कि कुण्डलिनी जो है, वो कारण और परिणाम से परे रहती है। और जब आप कुण्डलिनी में जागृत हो जाते हैं तो उसका कारण भी मिट जाता है और परिणाम मिट ही जाएगा। जब कॉज ही मिट गया तो उसका इफेक्ट भी मिट ही जाएगा। आपको इसके दर्शन होते हैं। काफी आप जानते हैं कि यह बात होती रहती है, और घटित हो रही है। जो कभी भी हम सोचते नहीं थे, ऐसी चीज़ें हमें मिल गईं, यह हमने प्राप्त कर लिया, इतना हमें सुख मिल गया, सब कुछ हमने पा लिया सहजयोग में, अब भी हम परेशान हैं, छोटी-छोटी चीज़ों के लिये, तो ये बड़ी मुश्किल हो जाएगी। क्योंकि अब तो कम से कम सोच लेना चाहिए कि हमने कितना इसमें सुख, कितना आराम, कितनी सुरक्षा पाई है और यही सहजयोग अब हम दूसरों को देते हैं, तो वो भी इसको पा सकते हैं | लेकिन जब हम दूसरों को देते हैं तो हम इसको बहुत अधिक पाते हैं। हमारे लिये ‘हजारों’ परमात्मा के दूत लगे हुए हैं। न जाने करोड़ों के हाथ हैं, करोड़ों की शक्तियाँ हैं, सार आपके पीछे लगी हुई हैं। एक आदमी खड़ा हो जाता है कि मुझे सहजयोग का कार्य करना है, न जाने कहाँ से चीजज़ें जुटती जाएंगी, न जाने कहाँ से इन्तजामात होते जाएंगे, न जाने कैसे यह सब चीज़ होते जाएगा, हो जाएगा, सब कुछ। देखिए, पहले आप पूरी तैयारी कर लें। क्योंकि आपमें जो देवता बैठे हैं, वो सब जानते हैं कि आप क्या है? आप कितने सच्चे हैं, कितने झूठे हैं? आप अपने कितने ऊपर हैं, कितने नीचे हैं, सब चीज़ वो जानते हैं। और जब तक वो ये जानते हैं कि आप अभी पूरी तरह से संलग्न नहीं है तो आपकी मदद नहीं करते। लेकिन जैसे ही वो समझ जाते हैं कि नहीं यह सिर्फ अपने ही स्वार्थ और अपने ही लाभ के लिए नहीं आए हैं, लेकिन यह सहजयोग करने आए हैं, और सहजयोग जो कि समाजोन्मुख है, उसको बढ़ावा देने आए हैं तो आपको आश्चर्य होगा कि ‘ चारों तरफ’ से वर्षा होती है आशीर्वाद की , चारों तरफ से जैसे सुगंधित वातावरण हो करके, आपको ऐसा लगता है हल्का-हल्का, जैसे ‘कुछ बोझा ही नहीं अब मेरे सर पर, सब काम हुए जा रहे है’, और अपने आप सब सामान जुटते जाता है। उस स्थिति में हमें आना चाहिए। तब आप देखिए हर आदमी बहुत कार्य कर सकता है और बहुत बढ़ा सकता है। मैं जानती हूँ कि अभी दिल्ली में काफी मेहनत हम लोगों को व्यक्तिगत भी करनी है। और फिर उसके बाद सामूहिक।

और हो सकता है कि आप लोग सब अपने पडोसी, रिश्तेदार, सबसे इसकी बात कर सकते हैं, सबको बुला सकते हैं और कह सकते हैं। हिन्दुस्तान में यह व्यवस्था बहुत अच्छी है कि हमारे बच्चे हैं, हमारे रिश्तेदार हैं, हमारे पहचान वाले हैं, सबसे हम यह बात कर सकते हैं। हो सकता है उनमें से दो ही चार इसको मानें । लेकिन जब वो आपकी स्थिति को देखेंगे , जानेंगे कि आप में कितना फर्क आ गया है, तो वो जरूर प्रयत्नशील होंगे। कुछ तो होंगे ही। इस प्रकार आप सहजयोग को पूरी तरह से बढ़ावा दे सकते हैं। हर इन्सान, वो चाहे स्त्री हो, पुरुष हो, या बच्चा हो, जब इस प्रकाश को प्राप्त करता है तो उसका ‘अधिकार’ है कि वह योग में स्थित हो। लेकिन उसका कर्तव्य है कि वह योग प्रदान करे। आपके पास शक्ति है, आपके पास सब कुछ है, और तब भी अगर आपने योग प्रदान नहीं किया, तो यह कहाँ तक युक्ति संगत होगा, मैं यह नहीं कह सकती। हमारे दिल्ली के केंद्र पर बहुत से प्रश्न ऐसे खड़े हुए हैं, जिनके बारे में मैं जरूर बातचीत करूंगी और इन लोगों को बताऊंगी कि क्या प्रश्न हैं और किस तरह से उनका आप हल निकाल सकते हैं। वो मुश्किल काम नहीं । लेकिन जो हम मन से सोचते हैं, विचारते हैं, और जिन तर्कों को करके हम किसी एक इरादे पर पहुँच भी जाते हैं, तो भी हम जब तक पूरी तरह से अपने हंसा चक्र को जीत न लें, माने कि हमारे अन्दर जब तक विवेक न आ जाए, जब तक हमारे अन्दर यह सुबुद्धि न आ जाए, जब तक हमारे अन्दर पूरी तरह से कोई चीज़ अच्छी है या बुरी है, कोई चीज़ सहजयोग के लिये लाभदायक है या नहीं है, यह समझने की सूक्ष्म बुद्धि हमारे अन्दर जब तक न आ जाए, समझ न आ जाए, तब तक सहजयोग आपने पाया नहीं। और वो समझ कैसे आती है? कोई पूछता है, कैसे आती है? तुम्हें साइकल चलानी कैसे आती है? जब तुम चलाने लग जाओ। मोटर चलानी आती है? जब तुम चलाने लग जाओ। इसी प्रकार यह सूक्ष्म बुद्धि कब आती है? जब आती है या जाती है। कैसे आती है? सो तटस्थता से। आप साक्षी स्वरूप होकर हरेक चीज़ को देखना शुरू कर दें, ध्यान करें, और अपना समय ज्यादा सहजयोग के विचार में बिताएं, तो आ जाएगी। लेकिन कब आएगी, कैसे आएगी, यह तो जब होगा तभी होगा। और इसलिए वो चीज़ अभी तक अगर हमारे अन्दर नहीं आई है तो हमें उस ओर और अग्रसर होना चाहिए। इसलिए मैंने कहा, कि अब जरा कोशिश जोरों से करनी चाहिये, बहुत जोरों में कोशिश करनी चाहिये। मैंने इनसे कहा था कि पूजा में ऐसे लोगों को बुलाइये जो कि वास्तव में कुछ पा चुके हैं। और जो कोई पा सकता है, उसको देना आपका ‘परम कर्तव्य’ है । हर जन्म दिन के दिन कोई न कोई एक नया निश्चय करते हैं। और मेरी समज में अब आ रहा है कि मुझे भी एक नया निश्चय कर लेना चाहिए। और नया निश्चय जो है कि वो ‘हमने जो विश्व धर्म बनाया है, जो हमने विश्व धर्म की स्थापना की है, जिसको हम मानते हैं, उसकी मर्यादाओं में जो नहीं रहता है, उसे सहजयोगी कहलाने का अधिकार नहीं, ऐसा मैंने सोचा है कि एक नया निश्चय हम लोग करें। जो इसकी मर्यादाओं में रहता है वही इस धर्म का पालन करने वाला हो सकता है। जो विश्व धर्म को मानता है, वो अगर इसमें नहीं रहे तो उसको हम सहजयोगी मानने को तैयार नहीं। जैसे कि समझ लीजिए कि कोई सहजयोगी है, और वो दहेज लेता है, तो वह सहजयोगी नहीं हो सकता। कोई है वह जाति-पाति विचार रखता है, वो सहजयोगी नहीं हो सकता। कोई उंच-नीच विचार रखता है, वह सहजयोगी नहीं हो सकता। तो आज मैंने यही निश्चय किया है कि आज से जो भी कोई इन्सान अपने को सहजयोगी कहलायेगा उसमें विश्व धर्म की पूरी कल्पना होनी चाहिए। इतना ही नहीं कि कल्पना में हो, लेकिन उसके आचरण और व्यवहार में अगर यह बात नहीं हो, समझ लीजिये कि किसी सहजयोगी ने ऐसी हरकत की, तो उसको सहजयोग में रहने का अधिकार नहीं है, उसको कहना चाहिये कि इसके लिये आप प्रायश्चित करें और प्रायश्चित स्वरूप पहले आप अपने को ठीक करें, और तभी आप सहजयोग में आ सकते हैं। ऐसा करने से संकीर्णता आ जाए, लोग कहें कि कम लोग हो गए, कोई हर्ज नहीं। भगवान के दरबार में भी बहुत कम जगह बची हुई है। आपको पता नहीं है। वहाँ कितने लोगों को आप

घुसेड़ियेगा? नर्क में भी जगह नहीं रह गई। तो कहीं बीच में ही लटका कर लोगों को रखना पड़ेगा। इसलिए जो आधे-अधूरे लोग हैं, जो कहीं के न रहें, ऐसे लोगों को सहजयोग में नहीं आना चाहिए। बेकार में परेशान करने से कोई फायदा नहीं। जो लोग सहजयोग में आएं वो लोग सहजयोग की मर्यादाओं में रहें, उसको अपने आचरण में लाएं, उसको अपने व्यवहार में लाएं। अपने अड़ोसी-पड़ोसी सबको उसके बारे में पूरी तरह से बताएं, और यह कहें कि, ‘हम विश्व धर्म में विश्वास करते हैं और हम किसी भी धर्म में विश्वास नहीं करते । ‘ और जो लोग ऐसा नहीं कहते हैं, उनको हम सहजयोगी नहीं मानेंगे। जो लोग डरते हैं समाज से यह कहने में कि हम विश्व धर्म के योगी हैं, जो यह कहने में डरते हैं, कि हम सहजयोगी हैं, ऐसे लोगों के लिए सहजयोग नहीं है | सहजयोग की मर्यादाएं बिल्कुल आपको पूरी तरह से माननी पड़ेंगी। जैसे कि बहुत से लोग हैं, वो कहते हैं कि माँ हम थोड़ी-बहुत शराब- वराब पी लेते हैं, थोड़ी बहुत सिगरेट भी पी लेते हैं, तम्बाकू भी खा लेते हैं, आप सहजयोगी नहीं हैं। जो सहजयोग की मर्यादाएं हैं उस मर्यादा में जो मनुष्य नहीं रहेगा , वो विश्व धर्म को नहीं मान सकता। और ये विश्व धर्म हमारा जो है, इसको पूरी तरह से स्वच्छ रखना है, क्योंकि यह सिर्फ ‘विश्व धर्म’ नहीं है, यह ‘विश्व निर्मल धर्म’ है, इसमें कोई भी अशुद्ध बात हम आने नहीं दे सकते, इसलिए जो अशुद्ध है वो इसमें नहीं आ सकता। इसमें वही लोग रहेंगे जिन्होंने पूरी तरह से ‘विश्व निर्मल धर्म’ को माना, और उसकी तरह अपना आचरण किया। यही निश्चय आज हमने अपने जन्म दिन के दिन किया हआ है और आशा है आप लोग इसे प्रेम से स्वीकार करेंगे । अब यह विश्व धर्म की क्या-क्या विशेषताएं हैं, और यह कैसा होना चाहिए, इसकी गहनता क्या है, इसके बारे में मैं किसी दिन और बताऊंगी, लेकिन अभी इतना जरूर जान लेना है कि मोटे तौर से जो बातें आप जानते हैं, वो कम से कम आप लोग नहीं कर सकते, जो बहुत ही साधारण तरीके से भी आप जो देख सकते हैं कि, ‘यह चीज़ सहज नहीं’ वो चीज़ आप नहीं कर सकते। और अगर आप उससे छुटकारा नहीं पा सकते तो हमें आप छुट्टी दीजिए। हम आप से जूझ नहीं सकते। बहुत से लोगों को हमने देखा है, बीमारी के लिए ठीक होने आएंगे , उसके बाद दूसरी फिर बीमारी ले आएंगे , फिर तीसरी बीमारी ले आएंगे। वजह ये है कि एक बार ठीक होने के बाद आपको सहज होना चाहिए। अगर आप सहज नहीं हुए तो फिर से आप असहज हो गए, तो फिर से आप बीमार हो जाते हैं। फिर आपको कोई बीमारी लग जाती है। फिर जिन्दगी भर हम आपको धोबी जैसे धोते ही रहें क्या ? | तो आपको भी अपने को निर्मल रखना चाहिए, और इस धर्म को इस तरह से मानना चाहिए कि ‘यह हमारा अलंकार है, यह हमारी शोभा है, यही हमारी विशेषता है। इसलिए आज हम संसार में इतने ऊंचे स्थान पर बैठे हैं।’ अंग-अंग में इसका विचार होना चाहिए। प्रत्यंग से चैतन्य लहरियाँ कहते हैं। यह समझ लेना चाहिए, कि परमात्मा इतने लालायित हैं आपको इससे सुशोभित करने के लिए । लेकिन आप कितने इसके प्रति जागरूक हैं और आप इसके लिए सिद्ध हैं यह आपको खुद समझ लेना चाहिए। हमसे जितना हो सकता है आपसे बता देते हैं, और यही मापदंड चलेगा कि जब तक आप सहजयोग के धर्म का पालन नहीं करेंगे, तब तक आप सहजयोग में अन्दर आ नहीं सकते, आपको पूजा का अधिकार नहीं, किसी चीज़ का अधिकार नहीं रह जाता। और जो लोग इस मर्यादा में रहेंगे उनको ही यह अधिकार रहेगा। हो सकता है, उसमें से चार-पाँच लोग ही रह जाए, कोई हर्ज नहीं, आसानी रहेगी। तो इसके प्रति अत्यन्त जागरूक रह करके आप लोग अपना व्यवहार, जीवन इस तरह से बनाएं कि आप सार्थ हों, आपका जो स्वयं है, उसका अर्थ निकले, सार्थ (अर्थ पूर्ण) हो जाएं। और उसी के साथ आप समर्थ हो जाएं। यही हमारा आपको आशीर्वाद है, कि सब लोग अपनी शक्ति में समर्थ हो करके इस प्रेम की शक्ति से सारे संसार को प्लावित करें । आज क्योंकि हमारा जन्म दिन है, बहुत लम्बी-चौड़ी पूजा नहीं होगी, एक साधारण पूजा होने वाली है। पहले तो गणेश जी के नाम से पैर धो करके उसका चरणामृत बनाया जाएगा। और उसके बाद में चरण धो करके उसका जिसे ये लोग ‘तीर्थ’ कहते हैं, वो बनाया जाएगा। और उसके बाद में हाथ से हम चरणामृत बना देंगे और उस वक्त में १०८ नाम देवी के लिए जाएंगे। बस और कुछ ज़्यादा पूजा नहीं है आज ।