Shri Ganesha Puja: You Should be Prepared to Change

Rome Ashram – Nirmala House, Rome (Italy)

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                       श्री गणेश पूजा

 रोम (इटली), १९ मई १९८५।

मेरे लिए बहुत श्रेष्ठ दिन है कि, गणेश पूजा मनाने के लिए इटली आई हूँ। चारों तरफ जिस प्रकृति को हम देखते हैं, वह गणेश का आशीर्वाद ही है क्योंकि वे ही हैं जो धरती माता से प्रार्थना करते हैं कि वह मनुष्यों पर अपना आशीर्वाद दें। 3:26

यह वही है जो प्रकृति के सभी तत्वों को ढाल कर और उन्हें जीवन बनाने के लिए प्रेरित करता है। जैसा कि आप उन्हें कहते हैं, ये सभी कार्बोहाइड्रेट हैं। अब कार्बोहाइड्रेट में कार्बन और हाइड्रोजन होते है। कार्बन श्री गणेश से आ रहा है और हाइड्रोजन महाकाली से आ रही है। और इस तरह हमारे चारों तरफ इस खूबसूरत तरीके से इस ब्रह्मांड का निर्माण होता है।

अब, इन कार्बोहाइड्रेट को ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है जो हमें सूर्य द्वारा, दायें पक्ष द्वारा दी जाती है। इस प्रकार, आप जानते हैं कि ये पेड़ रात में हाइड्रोजन उत्सर्जित करते हैं और दिन में ये ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं। यह सब श्री गणेश की चाल है जो बीच में विराजमान हैं। अब वही सूर्य बनते है। वह कुंडलिनी के नीचे गहरे आसन से उत्थान करते है। वह महाकाली के बाएं पक्ष से उठकर ऊपर जाते है और सूर्य अर्थात् आज्ञा चक्र में स्थित हो जाते है। तो महाकाली, जो कि आदि शक्ति है, को वे पूर्णतया पार कर जाते हैं| महाकाली की संतान के रूप में, वह पूरी तरह से उनके प्रति समर्पित और श्रद्धामय हैं। और इसी तरह वह महाकाली शक्ति में निपुण हैं, उस के स्वामी हैं। इसका अर्थ है कि वह अवचेतन मन के स्वामी हैं। वह सभी “जड़ चीजों ” के स्वामी है।

श्री माताजी : “जड़”, यानी निर्जीव कह सकते हैं। मृत नहीं। “जड़” वह है, पदार्थ जिसमे जीवन नहीं है – पदार्थ और मृत। आपको “जड़” शब्द को समझना चाहिए। यह बहुत महत्वपूर्ण है, “जड़” का अर्थ है कि वह सब कुछ जो गतिमान नहीं है, जीवन विहीन।

तो, उनके पास एक बहुत थोड़ा सा विवेक है उस के द्वारा वह इस महान शक्ति को पार कर सकते है और उस शक्ति के स्वामी बन सकते है। अब, वह थोड़ा सा विवेक समर्पण है। और समर्पण को सही अर्थों में समझना है। समर्पण का अर्थ है, “कुछ भी नहीं छोड़ना” क्योंकि जब भी आप त्याग करने या पाने की कोशिश करते हैं, तो आप अपने अहंकार का उपयोग कर रहे होते हैं। लेकिन समर्पण का अर्थ है अहंकार को छोड़ना। तो, कुछ त्याग करने या कुछ लेने के सभी विचार समाप्त हो जाते हैं।

अपनी आँखें खुली रखे क्योंकि आप देखिये, मैं अवचेतन के बारे में बात कर रही हूँ और मैं नहीं चाहती कि आप अपनी आँखें बंद रखें, यह अवचेतन में जाने का संकेत है। इसे अपने चेतन मन में दर्ज करना होगा।

अब, जब हम समर्पण करते हैं, तो हमें यह देखना होगा कि ऋतंभरा प्रज्ञा, जो कि महालक्ष्मी की शक्ति है, महालक्ष्मी का सार है, वह कैसे आपकी मदद करती है। जैसी परिस्थितियां हो, हमें स्वीकार करना चाहिए। जैसे, आज सुबह, यह अमावस्या थी, यह वह दिन है, जब आप श्री गणेश की पूजा करते हैं, तो यह बहुत गहरी होती है। इसलिए, मैं अमावस्या के अंत से पूजा शुरू करना चाहती थी। अब, इसीलिए पानी खत्म हुआ; यह शुरू नहीं हो रहा था । मैं अपना स्नान नहीं कर सकी। क्योंकि मैंने कहा है- अगर मैंने कहा होता कि हम दोपहर के भोजन के समय पूजा करेंगे, तो बहुतों को लगा होता: “हे भगवान, अब दोपहर का भोजन नहीं।”

[हँसी]।

लेकिन पूजा शुरू करने का वह सही समय था इसलिए पानी नहीं था और मुझे पानी के लिए इंतजार करना पड़ा। और ऐसी एक साधारण सी बात हुई लेकिन इसने सही समय हासिल कर लिया।

अब, जब आप परिस्थितियों को स्वीकार करना शुरू करते हैं तो आपको पता चलता है कि सभी स्थितियां किसी और चीज से नहीं बल्कि ऋतंभरा प्रज्ञा ने खुद बनाई हैं। लेकिन अहंकार एक ऐसी चीज है जो मनचाहा ही करना चाहता है। तो, लोग परमात्मा की योजनाओं के खिलाफ काम करना शुरू कर देते हैं। और विरोध में जाते हुए वे हर समय संघर्ष में रहते हैं और परेशानी में रहते हैं। और इस प्रकार, उन्हें लड़ने के लिए दोहरी तेज़ गति लेनी पड़ती है। लेकिन ईश्वर के खिलाफ जाकर, हम अपने उत्थान के खिलाफ जा रहे हैं। ये अहंकार हमारे पालन-पोषण, वातावरण और दूसरों पर हमला करने के स्वाभाविक विचार के परिणामस्वरूप विकसित होते हैं।

गुइडो: हम?

श्री माताजी: ये हमारी जड़ता\कंडीशनिंग और हमारी परवरिश हैं और एक स्वाभाविक विचार के रूप में हमें खुद को अभिव्यक्त करना होगा।

गुइडो: मुझे क्षमा करें।

श्री माताजी : अच्छा तो तुम आओ।

[गुइडो अनुवाद करता है]

श्री माताजी: स्वाभाविक विचार।

कोई दबाव नहीं, जोर डालने का मतलब है दूसरों पर दबाव बनाना, दूसरों पर हावी होना। अब, यह वर्चस्व वाला हिस्सा भौतिक पदार्थों से हमारे पास इसलिए आता है क्योंकि पदार्थ आत्मा पर हावी है। यह हमें आराम, झूठी धारणाएं, झूठे विचार देकर हम पर हावी हो जाता है। यह हमारी इच्छाओं के माध्यम से हावी है। यह वासना और लालच के माध्यम से हावी है। साथ ही, यह “भूतों” के माध्यम से हमें अपने कब्जे में करके बहुत ही सूक्ष्म तरीके से हम पर हावी हो जाता है, जैसा कि हम उन्हें कहते हैं। और यही हम देखते हैं कि कैसे श्री गणेश ने ईसा-मसीह के रूप में उत्थान किया, हमें यह दिखाने के लिए कि हमें पदार्थ की इस सारी माया से कैसे बाहर निकलना है। जैसे-जैसे वह उत्थान करते हैं, हम उनके पैर पकड़ लेते हैं और हम भी उनके साथ उत्थान पाते हैं। हालाँकि वह एक बच्चे है, वह बहुत शक्तिशाली है और वह हमें उस स्तर तक ले जा सकते है जहाँ आत्मा निवास करती है।

अब सबसे पहली चीज जो हमें जाननी है वह है सेक्स के बारे में। पश्चिम में, सेक्स लोगों के लिए एक जुनून बन गया है जैसे कि यह एक धर्म है। और यदि वे यौन रूप से सक्रिय नहीं हो सकते हैं या यदि वे कोई यौन क्रिया नहीं कर रहे हैं, तो वे सोचते हैं कि वे सब व्यर्थ हैं, वे किसी काम के नहीं हैं। आपके मीडिया के माध्यम से, आपके टेलीविजन के माध्यम से पूरा वातावरण इस तरह बनाया गया है। यदि आप सेक्स के साथ व्यवहार नहीं कर रहे हैं तो आप हीन हैं ऐसा अहसास दिलवाने के लिए आपके दिमाग में हर तरह की चीजें डाली जाती हैं। और जब हम इस तरह के एक मूर्खतापूर्ण विचार से जुड़ जाते हैं कि हमारा जीवन केवल यौन आनंद के लिए है, तो हम ऊपर की ओर उत्थान करने के बजाय नीचे की ओर उतरने लगते हैं।

श्री माताजी: वह क्या है?

गुइडो: छिपकली।

श्री माताजी: मैं उन्हें बहुत पसंद नहीं करती [श्री माताजी हंसते हैं]। ठीक है, कोई बात नहीं। यह भारतीय की तुलना में बहुत अलग प्रकार की छिपकली है। बेहतर दीखती है।

गुइडो: छोटा।

[हँसी]।

आह, यह वहाँ है।

श्री माताजी : आह, वह हरी है। आपको हरे रंग की नहीं मिलती है। ठीक है, तो।

तो नीचे उतरना बहुत आसान है, गिरना सबसे आसान। और जब हमारे दिमाग में हर समय सेक्स का ख्याल आता है, तो हमारा ध्यान इस पर इतना भर जाता है कि हमारी आंखों से, हमारे विचारों से, हमारे मन से, हमारे सिर से, सब कुछ हमारे दिमाग में बस यही गंदगी है। .

इसलिए, युवा लोगों के लिए, जब वे शादी करते हैं, तो सबसे अच्छी बात यह है कि उन्हें यह महसूस करना चाहिए कि सेक्स का महत्व इतना बड़ा नहीं है। और उन्हें यह समझना शुरू कर देना चाहिए कि यह पाप नहीं है लेकिन यही सब कुछ नहीं है।

फिर भी, महिलाओं को पता होना चाहिए कि वे इस धरती पर हैं कि वे आत्मसाक्षात्कारी आत्माओं के जन्म के लिए एक जगह बुनें। और गणेश के नाम पर उन्हें मासूम बच्चे होने चाहिए। लेकिन जब ये आत्मसाक्षात्कारी आत्माएं पश्चिम में पैदा होती हैं, तो वे अपना शुद्ध रूप नहीं रख पाती हैं क्योंकि माता-पिता अजीब आकार में होते हैं। और यद्यपि गणेश ने आत्मसाक्षात्कारी माताओं के गर्भ में सर्वश्रेष्ठ बच्चों को प्राप्त करने के लिए हर संभव प्रयास किया है, वे वास्तव में पूरी तरह से दुष्प्रभावित होते हैं। और हम उन्हें अपने बुरे व्यवहार से, अपने गलत विचारों से आहत करने लगते हैं। इसलिए, जब आप गर्भवती हों, तो आपको गणेश का स्तोत्र [भजन] पढ़ना चाहिए, गणेश की पूजा करनी चाहिए और जहां तक ​​सेक्स का संबंध है, शुद्ध रहने का प्रयास करना चाहिए।

इसके अलावा, हम इस प्रकार की सामान्य सी चीज़ के बारे में भी सोचना शुरू कर देते हैं जो इतनी सहज है! इसमें सोचने की क्या बात है? बस, एक भारतीय यह नहीं समझ पाएगा, वे नहीं समझ पायेंगे, गाँव में, सेक्स के बारे में सोचना क्या है, यह कितना सहज है। यह बाथरूम जाने के बारे में सोचने जैसा है। यह एक आनंदहीन खोज और काल्पनिक विचार है। इसलिए, हमें बहुत सतर्क रहना होगा कि अब हम संत हैं, हम योगी हैं और हम इस तरह की आनंदहीन खोज में अपनी ऊर्जा बर्बाद नहीं करने जा रहे हैं।

श्री माताजी : वहाँ क्या है?

यह क्या है?

गुइडो: यह एक झींगुर , भृंग है।

श्री माताजी: आह। झींगुर से नहीं डर सकती। [हँसी]। ठीक है।

अब, जब हम अपने जीवन को मानवता की मुक्ति के लिए, दूसरों को प्रकाश देने के लिए, पूरी दुनिया को आगामी आपदा से बचाने के लिए इतना महत्वपूर्ण समझते हैं, और हमें इसका एहसास है। हम अपनी ऊर्जा, अपना चित्त इस तरह की सहज चीज में कैसे बर्बाद कर सकते हैं? खासकर बूढ़े लोगों के लिए, मेरा मतलब है, इसके बारे में अब और सोचने की ज़रूरत नहीं है, इसे भूल जाओ, तुम बहुत खुश हो कि तुम ठीक वहीँ हो। अब, बस अपना समय किसी महान चीज़ के लिए समर्पित करें। दरअसल, मुझे किसी बात की कमी का अहसास नहीं होता है। आध्यात्मिक आनंद इतना अधिक है और यह इतना शाश्वत है कि हमें यह सब खोजना नहीं चाहिए। इसके विपरीत जब भी ऐसा विचार आए तो हमें उसका दिशा परिवर्तन करना चाहिए। आप देखेंगे, एक बार जब आप ऐसा करना शुरू कर देंगे, तो आपकी संवेदनशीलता, आनंद के प्रति आपकी धारणा हजार गुना हो जाएगी। और धीरे-धीरे, तुम इससे पार पा जाओगे |चूँकियह एक ऐसा अस्थायी आनंद है – इसलिए लोग इसके पीछे दौड़ते हैं। अगर यह शाश्वत प्रकृति का कुछ होता, तो कोई फिर से उस पर नहीं जाता। लेकिन यह मानव प्रकृति में है, यह स्वाभाविक है इसलिए इस के पवित्र तरीके को मान्यता दी गयी है और जब तक व्यक्ति युवा रहे वे इसे प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन फिर, धीरे-धीरे, आपको अपने शुद्ध अस्तित्व को इतना शुद्ध करना चाहिए कि वे आपके दिमाग में बिल्कुल भी प्रवेश न करें।

इसलिए, जब आप श्री गणेश के पैर पकड़ते हैं जो कि बहुत छोटी मीठी छोटी चीजें हैं, तो आपको पता होना चाहिए कि खुद आप को थोड़ा हल्का होना चाहिए, अन्यथा, यदि आप इन सभी समस्याओं को अपने ऊपर ले रहे हैं, तो वह पसंद नहीं करेंगे और हो सकता है वह आपको फिर से नीचे गिरा दे।[श्री माताजी हंसते हैं]। और श्री गणेश की ओर चित्त रख कर आपका चित्त निर्मल किया जाना चाहिए। केवल इस तरह के लोग ही वास्तव में सेक्स का आनंद ले पाते हैं अन्यथा वे ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि उनके सिर में इतनी विकृतियां हैं कि मुझे नहीं पता कि वे किन गतिविधि में लगे हैं। और इसीलिए फिर वे इससे ऊपर उठ जाते हैं, इसलिए कुछ समय बाद वे इससे तंग आ जाते हैं। और वे अपनी उम्र के अनुरूप ठीक से परिपक्व हो जाते हैं, अन्यथा आप देखेंगे कि अस्सी साल के लोग भी अपनी लाठी पर कांपते हाथ हिला रहे हैं, फिर भी युवा लड़कियों को देख रहे हैं, यह कुछ ऐसा है जो मैं नहीं समझ पाती | [श्री माताजी अनुवाद के बाद हंसते हैं।] और वे कितने मूर्ख दिखते हैं, वे इतने मूर्ख लगते हैं कि हर कोई उन पर हंसता है और युवा उनका मजाक उड़ाते हैं। लेकिन उन्हें ऐसा लगता है कि जैसे वो अचानक ही उस बुढ़ापे में कोई हीरो या कुछ बन गए हों. जैसे उन्होंने एक बार एक पार्टी में शेक डांस करने के लिए आने वाले बहुत, बहुत पुराने अस्सी, अस्सी ऊपर, अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की एक फिल्म दिखाई।

गुइडो: करने के लिए?

श्री माताजी : पार्टी में शेक डांस करना, शेक डांस करना। और लिमोसिन से वे कांपते हुए नीचे उतर रहे थे।

[हँसी] और जब वे आए और दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि, वे तो बहुत प्यार में थे और वह सब, इतना बेवकूफाना लग रहा था कि जो उन्हें देख रहे थे वे हँस रहे थे और हँसी से लोटपोट हो रहे थे। यह बहुत ही हास्यास्पद जोकरपंती है| लेकिन उन्होंने कहा: “हम ईमानदार हैं।” [श्री माताजी हंसते हैं।] तो अगर आप इन चीजों को खुले तौर पर या गुप्त रूप से करते हैं या किसी भी तरह से करते हैं, तो यह बेवकूफी है! और इसी तरह जब आप अपनी उम्र के अनुसार परिपक्व नहीं होते हैं, तो आप अपने बच्चों द्वारा सम्मानित नहीं होते हैं, किसी भी छोटे व्यक्ति द्वारा आपका सम्मान नहीं किया जाता है, यानी आप मूर्ख हैं क्योंकि आप पर्याप्त परिपक्व नहीं हैं।

अब जब फल फूल के रूप में होते हैं, उस समय सारा निषेचन (गर्भाधान)होता है। फिर फल के समय, वे फल के रूप में विकसित होते हैं, न कि फूल के रूप में।

गुइडो: फूल?

श्री माताजी : फूल?

गुइडो: हाँ।

श्री माताजी : फूल फल बन जाते हैं।

गुइडो: बन जाते हैं?

श्री माताजी : हाँ, फूल अवस्था के समय निषेचन (गर्भाधान)होता है लेकिन फल के समय नहीं, देखा? फल को विकसित होना है।

गुइडो: निषेचन।

श्री माताजी : निषेचन वह स्थान है जहाँ

गुइडो: आह, निषेचन।

[गुइडो अनुवाद करता है।]

श्री माताजी: हाँ।

तो यही कारण है कि मंजिल तक पहुँचने के लिए परिपक्वता बहुत महत्वपूर्ण है, यह तभी संभव है जब आप वास्तव में श्री गणेश के पैर पकड़ें। तो आप बुढ़ापे में भी अबोध रहते हैं। इस सारी समझ के साथ, श्री गणेश हमें वह विवेक देते हैं जिससे हम परिपक्व होते हैं।

एक तरफ: तो वह चीज कमरे में थी मुझे लगता है कि मैं लायी थी उपयोग करने के लिए  – तरल है  [श्री माताजी खांस रही है]।

अब जो लोग वासना में लिप्त हैं, उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि वे अपनी समझ में परिपक्व हो जाएँ।

फिर जिन लोगों को अपनी चीजों, अपनी संपत्ति, अपने बच्चों के बहुत अधिक लगाव हैं, उन्हें यह भी समझना चाहिए कि श्री गणेश हमें यह समझने का विवेक देते हैं कि यह आपका नहीं है। तो, कार्बन क्या है, जली हुई लकड़ी, जली हुई लकड़ी के अलावा और कुछ नहीं है, यानी सब कुछ जल गया है। आपको जो विवेक मिलता है वह यह है कि, जो कुछ भी आप अपना समझते हैं वह आपका नहीं है। सब कुछ आपको यहीं छोड़कर जाना है। तुम यह कागज भी अपने साथ नहीं ले जा सकते। [श्री माताजी कागज का एक छोटा सा टुकड़ा दिखाते हैं।] तो हम क्यों उनसे लिप्त हुए हैं? और अपने आनंद को व्यक्त करने के अपने उद्देश्य के लिए इसका उपयोग करें।

अब, मैं आपको एक बहुत ही सुंदर उदाहरण देती हूँ। अब देखें कि ऋतंभरा प्रज्ञा कैसे काम करती है। आप देखिए, यह हार (नेकलेस)जो आप यहां देख रहे हैं, इटली में किसी आत्मसाक्षात्कारी द्वारा बनाया गया था। फिर, यह हार मुझे नहीं पता कि यह भारत कैसे गया। अब, ऑस्ट्रेलियाई मुझे हीरे का एक “मंगल सूत्र” देना चाहते थे, और इस तरह यह मेरे पास है, और उन्होंने दस हजार रुपये एकत्र किए थे। लेकिन, इस आकार का आधा भी हम नहीं खरीद सके क्योंकि रविवार को केवल एक ही दुकान खुली थी: ‘परिस्थिति’ [हँसी]।

तो मैंने चारों ओर देखा और मुझे मूंगा से बना एक बहुत अच्छा सोने का मंगल सूत्र मिला क्योंकि ऑस्ट्रेलिया गणेश की भूमि है। और मुझे चारों ओर जबरदस्त वायब्रेशन महसूस हुआ इसलिए मैं वापस चली गयी क्योंकि उन्होंने कहा: “यह बहुत सस्ता है।” तो, मैंने कहा: “ठीक है।” और वहां, यह [हार] और ये बालियां वहां रखी थीं, इसलिए हमने यह सब खरीदा, साथ ही मंगल सूत्र, साथ ही एक और मूंगे का नग जो मेरे पास है, उतनी ही राशी में| बात यहीं ख़त्म नहीं हुई। फिर, यह गलत जगह रख दिया गया| ऑस्ट्रेलिया में, यह मेरे उस बॉक्स में चला गया, जिसे लंदन आना था, इसलिए मैं इसे लंदन नहीं ला सकी। अब, थेल्मा ऑस्ट्रेलिया से आई और वह उसे अपने साथ ले आई। और यह अब इटली में है जिस कलाकार की आत्मा उसे संतुष्ट करने के लिए यह देख रही थी, न केवल ऐसा, बल्कि यह भी कि यह ऑस्ट्रेलिया से श्री गणेश के दिन प्रस्तुत है। हाँ, बतौर आपके भाई, ऑस्ट्रेलिया से, यह मेड इन इटली भेजा जाता है, श्री गणेश के दिन। क्या आपके पास इस से अधिक संयोग हो सकते हैं?

[हँसी; तालियाँ।]

गणेश के स्थान से आपके भाइयों और बहनों, आप देखते हैं, गणों ने इसे उत्सव के लिए यहां देवों के पास भेजा है, आप देव हैं और वे गण हैं। [हँसी।]

और ये दस हैं, [श्री माताजी हार दिखाते हैं] दस, ग्यारह और बारह [श्री माताजी झुमके दिखाते हैं]। तो, यह हृदय का प्रतिनिधित्व करता है, धर्म के दस और दो झुमके सभी को मिलाकर, यह हृदय है।

पूरा यूरोप और इन दोनों को मिला कर के बारह है, यह दिल है: इंग्लैंड। यहां सभी का प्रतिनिधित्व हो जाता है।

अब, आपको ऋतंभरा प्रज्ञा की सुंदर कार्यप्रणाली जो बहुत सूक्ष्म है के माध्यम से समझने में सक्षम होना चाहिए। और फिर आप छोटी-छोटी चीजों का आनंद लेना शुरू कर देंगे जो वे आपको बहुत प्रसन्न करने के लिए आयोजित करती हैं और आपको वह देने के लिए जो किसी कलाकार ने बहुत पहले किया होगा, जिसे पूरा करना उसकी इच्छा थी। अब, हमें कहना चाहिए कि, यह भी श्री गणेश का कार्य है। वह ऋतंभरा प्रज्ञा में ओंकार के रूप में निवास करते है। वह पदार्थ में वायब्रेशन के रूप में, प्रत्येक परमाणु में विद्युत चुम्बकीय बलों पर रहते हैं। वह हमें प्रसन्नता देने वाली हमारी भावनाओं की हर लहर में बसते है । और वह कुंडलिनी की एक सुंदर सजावट के रूप में बसते है क्योंकि उनके पास मेरी साड़ी की तरह लाल और सोने का रंग है। तो कुंडलिनी के रंग के रूप में वे निवास करते हैं। लेकिन सहस्रार में, वह आनंद बन जाते है। मूलाधार में सुगंध के रूप में, और मन की हर स्मृति ने आपको सुगंध प्रदान करना चाहिए क्योंकि वे स्मृति के स्वामी हैं।

तो, इस तरह वह हर चीज़ को इतनी खूबसूरती से प्रबंधित करते है। वह एक ऐसे अबोध व्यक्ति है जो हमें प्रसन्नता देने के लिए अपनी सुंदरता के साथ हमारे इर्द-गिर्द खेलते है।  हमें अपने बच्चों से भी बहुत प्रसन्नता प्राप्त होना चाहिए, अगर हमने उन्हें ठीक से पाला है तो। लेकिन अगर हम हर समय वासना और लोभ में व्यस्त रहते हैं तो आपके बच्चे अच्छे बच्चे नहीं हो सकते। वे अपेक्षित गणेश तत्व का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाते हैं।

तो आज एक महान दिन है कि हम इटली में श्री गणेश की स्थापना कर रहे हैं। हमने स्विट्जरलैंड में और अब इटली में ऐसा किया है। यह आपको अबोधिता की शक्ति, पवित्रता की शक्ति, विवेक की शक्ति प्रदान करे | यह आपको आनंद की चंचलता की कला और हर चीज को सुगंधित चीज में बदलने का विशेष गुण प्रदान करे।

परमात्मा आपको आशिर्वादित करें!

[पूजा शुरू]

श्री माताजी : आज की सुबह की पूजा छोटी होगी लेकिन उसके बाद हम दोपहर का भोजन करेंगे, कोई भी मुझे छोड़ कर ना जायेगा।

[श्री माताजी हंसते हैं।]

ठीक है, तो चलो कुछ पानी धोने के लिए लेते हैं,

पहले बच्चों को आकर मेरे पैर धोने चाहिए। सभी बच्चे, बम्बिनी।

लड़कों और लड़कियों के लिए, “बम्बिनी”?

गुइडो: हाँ, वही।

श्री माताजी: श्री गणेश की तरह। [श्री माताजी हंसते हैं।]

श्री गणेश की तरह दिखने के लिए आपको उनके साथ कुछ तालमेल रखना चाहिए। अन्ना, साथ आओ, आओ, तुम सब आओ, तुम्हें पता है कि यह कैसे करना है। वह डर गया है, तुम देखो, दूसरे लड़कों को करने दो। हाँ, यह थोड़ा  ठंडा है। आपको गर्म करने की जरूरत है, गर्म करने के लिए आपको गर्म करने की जरूरत है। वह बहुत अच्छा है!

उसके साथ क्या दिक्कत है? वह इतना क्यों रोता है? क्या उसके पास खाने के लिए कुछ था?

सहज योगिनी : हाँ माँ।

श्री माताजी : मच्छिन्द्रनाथ, क्या बात है? इतना रोना नहीं चाहिए। अब रगड़ें।

देखो ये लड़के नहीं हैं – आओ और तुम ठीक हो जाओगे। साथ आओ, आओ।

अब, इसे नीचे, नीचे रगड़ें। नीचे नीचे, नीचे। नीचे। नीचे, बस। अब तुम देखो? अच्छा, देखा? बढ़िया, बेहतरीन।

तो अब और दो लड़के आ जाना चाहिए। अब आओ, आओ मच्छिंद्रनाथ आओ, तुम यहां आओ।

चलो, हुम, ठीक है। तेज, नीचे, नीचे, नीचे। नीचे। आपको ग्रेगोइरे की तरह होना चाहिए, रोने के लिए नहीं। क्या वह ग्रेगोइरे रोता है? ग्रेगोइरे रोता नहीं है। अब, रगड़ें, रगड़ें। अभी और भी, साथ आओ। इसे रगड़ो। आह, अच्छा, अच्छा, अच्छा। अच्छा, अच्छा, कुछ और। कुछ और। इसे कुछ और रगड़ें। हो गया, सब ठीक है। वे सब ठीक हैं।

अब, साथ आओ, तुम इसे अभी रगड़ो। आओ, जोर से रगड़ें। मुश्किल! जोर से , बहुत जोर से, अब साथ आओ।

जोर से रगड़ना जोर से, जोर से। देखते हैं। मुश्किल। ….

देखें कि वह कैसा कर रहा है, वह अच्छा कर रहा है। हाँ, वह अच्छा कर रहा है। आह, आह, अच्छा किया। अब वायब्रेशन देखें, साथ आएं। मच्छिंद्रनाथ, अब अपने वायब्रेशन देखें? देखें, अपने वायब्रेशन देखें, यहां हाथ लगाएं। अब देखिए, अपने चैतन्य देखिए। अपने दोनों हाथ मेरी ओर रखो।

ऐसे देखें।

सहज योगी: क्या आप अंग्रेजी बोलते हैं?

श्री माताजी : वह अच्छी अंग्रेजी बोलता है।

ठीक है, ठंडा आ रहा है? ठीक है।

53:21

[३:१५:४८ लंचटाइम।]

[उपहारों की प्रस्तुति: वे एक मोमबत्ती के आकार में एक बड़ा और सफेद झूमर लाते हैं। तालियाँ]

गुइडो: यह पूरे यूरोप, पूरी दुनिया की सामूहिकता द्वारा दिए गए दो उपहारों में से एक है।

श्री माताजी: इटली से?

सहज योगी: कैपोडिमोन्टे से।

गुइडो: यह नेपल्स के पास एक छोटी सी जगह है। एकमात्र जगह जहां वे इस तरह के सिरेमिक बना सकते हैं।

श्री माताजी : यह भी एक और ऋतंभरा प्रज्ञा है।

इस कार्ड पर क्या लिखा है?

गुइडो पढ़ता है: “यह पात्र पूरी तरह से कैपोडिमोन्टे की प्राचीन परंपरा का पालन करते हुए हाथ से बनाया गया है। टी.एस.ए.।”

श्री माताजी: क्या मैं देख सकती हूँ? इसका क्या मतलब है?

[अश्रव्य]

ठीक है। सुंदर, सावधान रहें।

[तालियाँ]

कल शनिवार था, मुझे बस इसमें [अश्रव्य] मजबूर किया गया था। [श्री माताजी हंसते हैं]

आह।

अबमुझे लगता है,पाँच मिनट।

सहज योगी: हाँ, पाँच मिनट, वे पहले से ही थे-

श्री माताजी : अंतिम पांच मिनट हमें मिल गए, आखिरी पांच मिनट।

गुइडो: श्री माताजी की जोड़ी उनके शयनकक्ष में होगी।

श्री माताजी: और मुझे याद होगा [अश्रव्य] मैं वहां गयी हूं क्योंकि यह बहुत महंगा है, यह, कि, हमें दूसरा नहीं मिला और आखिरकार हमने इटालियंस के साथ [अश्रव्य] खरीदने का फैसला किया, इस अर्थ में कि निश्चित रूप से , यह अंतरराष्ट्रीय से है, लेकिन यह इटालियंस और अन्य इटालियंस [हँसी] द्वारा [अश्रव्य] है।

यह इटली की एक प्राचीन परंपरा से आ रहा है। यह खरीदने के लिए इतनी खूबसूरत चीज है।

और यह आपके देश की एक पारंपरिक चीज है जो कलाकार के हाथ से बनाई गई है, वह इस तरह की चीजें हैं, अन्यथा, श्री गणेश के लिए मशीन द्वारा बनाया गया कुछ हासिल करने का क्या फायदा है? गणेश को मशीनें पसंद नहीं हैं।

यह एक खूबसूरत चीज है मेरा मतलब है, मैं आपको बताती हूं, यह ऐसा विकल्प है, ऐसा विकल्प है।

सब कुछ अपनी अभिव्यक्ति में इतने सुंदर तरीके से पूरी तरह से कार्यान्वित है। उसी तरह, हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम अपने जीवन को इतने सरल सरल तरीके से व्यक्त करें कि सब कुछ हमारे प्यार का इजहार करने में कार्यान्वित हो।

सोचकर, हम बस जटिलताएँ पैदा करते हैं, जैसे कल मैंने पैदा की थी – [श्री माताजी हंसते हैं] – थोड़ी सी। चूँकि हमने भी पहले से ही कुछ तय कर लिया था और मैं गणेश के लिए कोई उपहार नहीं ले सकी। ऐसा निर्णय किसी को नहीं करना चाहिए। क्योंकि केवल तीन पूजाएँ थीं और अगर मैं दो में लेती हूँ, अगर मैं तीसरी में नहीं लेती हूँ, तो मैं इटालियंस को चोट पहुँचाऊँगी।

तो तुम्हारी माँ भी सब कुछ बदल देती है, और तुम्हें भी परिवर्तन के लिए तैयार रहना चाहिए। जैसे मैं उसे कल केवल एक गुरु पूजा का उदाहरण बता रही थी, बस हमने एक ही गुरु पूजा बम्बई,भारत में की थी| देखिए आप कितने भाग्यशाली हैं, वहां केवल एक ही गुरु पूजा हुई है! और उस गुरु पूजा के लिए, उन्होंने मेरे लिए एक शॉल, एक शॉल खरीदी। तो मैंने कहा, “अब, अगर तुमने शॉल खरीदा है, तो तुम मुझे साड़ी मत दो। मैं कोई साड़ी नहीं लूंगी क्योंकि वह मेरे लिए बहुत ज्यादा होगी।” और मुझे पूरा यकीन था कि मैं नहीं लूंगी और मैंने कहा, “नहीं, नहीं, नहीं,” अर्जेंटीना का “नहीं” यह दस गुना है, “नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं- नहीं। ” लेकिन, आप देखिए, ये देवता मुझसे ज्यादा आप लोगों की तरफ पूरी तरह से एक हैं। [हँसी]

क्योंकि सभी सहजयोगियों को इस बात का बहुत अफ़सोस हो रहा था कि उन्होंने साड़ी खरीद ली है। यह भारत में केवल एक गुरु पूजा थी और मुझे इसकी अनुमति देनी चाहिए थी। मैंने कहा, “आपको गुरु पूजा में खुद को पूरी तरह से निर्लिप्त कर लेना चाहिए। इस पर चिंता न करें।” लेकिन वे नहीं माने, उन्हें सब बुरा लग रहा था।

फिर, पूजा से पहले, मैं भारत में एक नल के नीचे अपने पैर धोने गयी। आप जानते हैं कि कभी-कभी नल कैसे होते हैं – उस ऊंचाई पर। और जैसे ही मैंने नल खोला तो सारा पानी मेरे ऊपर आ गया, मैं पूरी तरह भीग चुकी थी।

तो मैं पूरी तरह भीग कर बाहर आ गयी। मैंने कहा, “ठीक है, मुझे साड़ी दे दो।” [हँसी; तालियाँ]

इसलिए, चूँकि मैं नहीं चाहती कि पूजा के लिए आप पर कर लगाया जाए, क्योंकि कुछ पैसे देने होंगे क्योंकि वह एक हिस्सा है, लेकिन थोड़ी भागीदारी होनी ही चाहिए। तो थोड़ा सा हिस्सा देना होगा जो महत्वपूर्ण है क्योंकि आपको देना सीखना चाहिए इस अर्थ में कि जब आप थोड़ा देते हैं तो आपको बहुत कुछ मिलता है, आप देखते हैं। यह एक और रिश्वतखोरी भ्रष्टाचार है।

इसलिए, मैं ग्रेगोइरे से कह रही थी कि “आपको लोगों पर बहुत अधिक कर नहीं लगाना चाहिए, इसे एक छोटा सा योगदान बना दें।” और उसमें स्थित देवताओं ने गलत गणना की और उसने पंद्रह पाउंड मांगे!

सहज योगी: उसे लगा कि वह स्विस बैंक मांग रहा है।

एक और सहज योगी: हाँ।

[श्री माताजी हंसते हैं]

और आपको आश्चर्य होगा, ये पंद्रह पाउंड मेरे पास हर तरह की करंसी में आये हैं। मुझे नहीं पता कि इसके साथ क्या करना है, लेकिन यह वहां है। इस पैसे में से मैं हमेशा आपकी पूजा के लिए चांदी का कुछ न कुछ खरीदती हूं क्योंकि आप कह सकते हैं कि यह मेरा है। लेकिन आप देखिए, इसमें कुछ भी गलत नहीं है अगर मैं वह सब कुछ ले जाऊं जो आपके पास है, मुझे पता है। लेकिन, मैं हर चीज में एक मर्यादा रखना चाहती हूं, क्योंकि आपके पास भी मर्यादा होना चाहिए, मैं “अ-मर्यादा” हूं, जिसका अर्थ है “मेरी कोई सीमा नहीं है”, लेकिन आपको मर्यादा के साथ चलना होगा। मुझे मर्यादा की कोई आवश्यकता नहीं है, और मेरे पास नहीं है। मैं क्या कर सकती हूं? लेकिन मैंने ये मर्यादा जानबूझ कर लगाई है क्योंकि आपको मर्यादा होनी चाहिए।

क्योंकि जब आप अवतार लेते हैं, तो आप “अ-मर्यादा” में आते हैं, आप शरीर  में आते हैं। और इसी तरह मनुष्य को मर्यादा, सीमाएं सिखानी पड़ती हैं, क्योंकि वे हमेशा कह सकते हैं: “क्या गलत है? अगर वे मुझे दे रहे हैं, तो मैं उन्हें क्यों नहीं लूंगी?” कोई भी उन्हें कुछ भी दे रहा है, वे कहेंगे: “क्यों नहीं? मैं शोषण कर सकती हूं।” मनुष्य ऐसा ही है। तो, एक अवतार हमेशा अपने मर्यादित जीवन से , उनके लिए एक मर्यादा बनाता है।

अब, जैसा कि आप जानते हैं, मुझे उदारता बहुत पसंद है। मुझे तथाकथित उदार होना पसंद है क्योंकि यह सब आपका अपना है। अगर मैं तुम्हें कुछ देती हूं, तो खुशी मेरी है। अब केवल देने से ही आप समझ सकते हैं कि आप कितने हर्षित हैं। अन्यथा कोई रास्ता नहीं है। इसलिए जब मैं इंग्लैंड के अलावा किसी और देश में जाती हूं क्योंकि लंदन में मेरे पास खरीदारी के लिए समय नहीं है, मैं दुकानों पर जाती हूं। मैं अपने चैतन्य और सब कुछ वहीं छोड़ देती हूं। इसके अलावा, मैं कुछ ऐसा खरीदने की कोशिश करती हूं जिसे मैं आसानी से दे सकती हूं, अच्छे तरीके से, और निश्चित रूप से अपने परिवार जिसे कि मुझे चलाना होता है और, अन्य दोस्तों के लिए भी, कुछ ।

[श्री माताजी हंसते हैं]

लेकिन फिर चीजें बहुत ज्यादा जमा हो जाती हैं और बांटने में पूरी रात भी लगा दें तो भी खत्म नहीं होता। [श्री माताजी हंसते हैं]

भारत में इस बार पूरी रात हम उपहार बांट रहे थे। कोई थका नहीं था, न देने वाले न लेने वाले। और जब हमने दिया, आप देखते हैं, सभी पश्चिमी सहज योगियों ने कहा: “हा,” जैसे कि वे इसे प्राप्त कर रहे हैं, आप देखते हैं, और फिर वे भारतीय सहज योगियों को सब कुछ देंगे। मैं आपको बताती हूं कि, मैंने इसे देखा है। मैं कभी-कभी चीजें, पैसे और उन सभी चीजों को अधिक खर्च कर देती हूं, एक प्रकार से खुद को व्यक्त करने की कोशिश में यहाँ तक की टूर के दौरान भी, लेकिन मेरे पास कभी पैसे की कमी नहीं है, आप देखिए, कोई बैठा है, कुबेर, जो हर समय मेरा पर्स भर रहा है। मुझे कभी कमी नहीं होती। [श्री माताजी हंसते हैं]

वह आदि शक्ति के साथ-साथ आप लोगों के लिए भी बहुत दिलचस्प व्यक्तित्व है। आप बस देखिए और देखिए पूरी बात। चिंता मत करो। परेशान मत होइए। आप देखेंगे कि सब कुछ एक नाटक की तरह इतनी खूबसूरती से प्रबंधित किया गया है।

श्री माताजी [एक योगी के लिए]: क्या आप अभी ठीक हैं? मुझे बताया गया था कि आप बल्कि चिंतित थे। मुझे आपसे इसके बारे में बात करनी है। नहीं, आप चिंतित नहीं हैं। अच्छा।

मुझे नहीं पता कि अभी आप क्या चीजें कर सकते हैं क्योंकि मुझे दोपहर का भोजन करना है, यह, आप देखिए, फिर हम हवन करेंगे। उन्हें दोपहर का भोजन करने दो।

मेरा लंच खत्म हो गया है। मैं नहीं खाऊंगी।

मैं बहुत आनंद से भरी हूं। बेहतर होगा कि आप दोपहर का भोजन करें और फिर हमारे पास- या आप पहले हवन समाप्त करना चाहेंगे?

बेहतर है, कर लो ? एक घंटा लगेगा।

क्या वे भूखे हैं?

सहजयोगियों का उत्तर: हवन।

श्री माताजी : तो यह एक अच्छा विचार है।

[श्री माताजी हिंदी में बोलते हैं] आपने कब व्यवस्था की है?

गुइडो: इसका अभी तक प्रबंध नहीं है, श्री माताजी।

श्री माताजी : तो, उन्हें तब तक भोजन करने दो।

गुइडो: ठीक है।

जेरेमी, ठीक है, ठीक है। ठीक है।

जेरेमी: मुझे करने दो-

गुइडो: हम पहले भोजन करेंगे

श्री माताजी: मेरा मतलब है कि इसे हमारे साथ समायोजित करना होगा, आप देखिए। कुछ भी “बंधन” नहीं करना चाहिए | मर्यादा अलग है लेकिन “बंधन” अलग है। मर्यादा अलग है।

सहज योगी: हाँ, मर्यादा अलग है।

श्री माताजी: “बंधन” अलग है।

गुइडो: बाध्यकारी?

श्री माताजी: “बंधन”। देखो अब मैं मर्यादा में हूँ, मेरा शरीर मर्यादा में है, लेकिन अगर बाँध दूँ तो यह “बंधन” है

गुइडो: आह। “बंधारे”।

श्री माताजी : इसे एक “बंधन” बनाओ और उन्हें बताओ।

श्री माताजी: बंधरे, आप कहते हैं, बंधरे? बन्दर? आह।

मराठी में एक गीत है जो राम के बारे में बहुत अच्छा है जब वे पार करने के लिए पुल का निर्माण कर रहे थे – “बंधारे बंधारे” – हाँ, मराठी में “बंधारे”।

सहज योगी: इसका क्या मतलब है?

श्री माताजी: इसका अर्थ है “निर्माण करो, निर्माण करो”। और भारत में “बंधारा”, भारतीय भाषा का अर्थ है “बंद” एक है … आप इसे क्या कहते हैं?

सहज योगी: “बैंड”?

श्री माताजी : पानी के लिए “बंद” – नहीं, नहीं, नहर को रोकने के लिए, “बंधारे”, “बंधारे”।

गुइडो: डिग्यू।

श्री माताजी : बस इतना ही, बंधारे। इटालियंस के यहाँ कुछ महाराष्ट्रियन रहे होंगे, मुझे यकीन है।

[श्री माताजी हंसते हैं] अन्यथा, आप कैसे समझा सकते हैं!

इसलिए।

सहज योगी : श्री माताजी, क्या हम अन्य उपहार दे सकते हैं?

श्री माताजी : अभी। दोपहर के भोजन के दौरान?

सहज योगी: हाँ।

श्री माताजी: साथ -साथ , ठीक है, साथ -साथ । ठीक है।

सहज योगी : पहला यह है।

हम आपकी पूजा के लिए नहीं खोल पाए, श्री माताजी। यह एलेसेंड्रा से [एक सनशेड] है।

श्री माताजी : ओह!

[तालियाँ]।

सहज योगी: हम इसे हवन के लिए रखेंगे।

श्री माताजी : मेरी पूजा के लिए।

गुइडो: हाँ श्री माताजी।

श्री माताजी: कहाँ, भारत?

सहज योगी: चीन से।

श्री माताजी : तो आप को क्या लगता है मैं इसे भारत में कहाँ ले जाऊँ?

गुइडो: कहाँ? जहाँ भी आपको श्री माताजी पसंद हों।

[हँसी]

सहज योगी: लंदन में, शायद आपको इसकी ज़रूरत नहीं है, क्योंकि सूरज नहीं है।

श्री माताजी : आपको छतरी में ही फुटबॉल खेलना पड़ता है। [श्री माताजी हंसते हैं]

हां, शुरुआत में लंदन में करना एक अच्छा विचार है। लेकिन, लंदन में आप इतना प्रबंधन नहीं कर सकते। भारत में यह बाहर हो सकता है। अगर यह भारत में है और बाहर है तो यह धूप से बचाने के लिए उचित है। आपका बहुत बहुत धन्यवाद। आपके पास सिर्फ कागज का बनी और क्या चीजें हैं

सहज योगी: हाँ, मुझे लगता है कि कुछ सलंग्न चीज़े है।

सहज योगी: कुछ उपहार व्यक्तिगत उपहार हैं और नाम बाद में लिखे जाएंगे जब हम इसे पैक करेंगे।

श्री माताजी: अब, यह कितना महंगा है! मर्यादा तो होनी ही चाहिए। [श्री माताजी हंसते हैं]

सहज योगी [पीछे से]: फूलदान यूगोस्लाविया के सहज योगी से यूगोस्लाविया से है।

गुइडो: ओह, हाँ, यह मारियाना से है।

श्री माताजी: यूगोस्लाविया। और ये है –

सहज योगी: वेनिस से , माता जी।

श्री माताजी: कहाँ से? वेनिस। ओह, सुन्दर !

मेरी साड़ी में कुछ गिर रहा है। [श्री माताजी उठ खड़ी होती हैं।]

अब, यह क्या है?

गुइडो: यह एक डॉन क्विचोटे है।

श्री माताजी: हम?

गुइडो: डॉन क्विचोटे।

श्री माताजी: इसका क्या मतलब है?

गुइडो: वह जो उनसे लड़ता था-

सहज योगी: ड्रैगन।

गुइडो: नहीं, “मोलिनो”

सहज योगी: ए, पवनचक्की।

श्री माताजी: हवा।

सहज योगी: यह स्पेन के एक सहज योगी से है, श्री माताजी ।

गुइडो: रूपर्टो। आपको रूपर्टो याद हैं क्या, श्री माताजी?

श्री माताजी : हाँ लेकिन यह किस भाषा में है?

सहज योगी: स्पेनिश।

श्री माताजी: स्पेनिश? ठीक है, बहुत-बहुत धन्यवाद।