Shri Trigunatmika Puja

Huis Overvoorde, Rijswijk (Holland)


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Shri Trigunatmika Puja

अपना कॉमन सेंस इसमें लगायें और ये तभी संभव हो सकेगा जब आपके अंदर अहं न हो। अहं तो कभी भी कॉमन सेंस नहीं होता क्योंकि मुझे ये पसंद है … वो पसंद है । ये मैं ही अहं है जो अंधा है … विवेकहीन है … मूर्ख है अतः अंततः हम मूर्खतापूर्ण कार्य करते हैं। आपके अंदर कॉमन सेंस होना चाहिये जो अहं के परित्याग के बाद ही संभव है। अब लोग पूछते हैं माँ अहं का परित्याग कैसे करें? ये बहुत सरल है। सहजयोग में आपको अपना बांया दांये के ऊपर 108 बार गिराना चाहिये….. आपको लोगों को माफ करना चाहिये और आप स्वयं को भी देख सकते हैं। सबसे पहले देखें कि आप स्वयं को देखते हैं कि दूसरों को देखते हैं। मेरे साथ एक बार एक महिला यात्रा कर रही थी और वो कहने लगी कि ये आदमी कितना खूबसूरत है … वो महिला कितनी सुंदर है … प्यारी है। मैं उसकी ओर देख रही थी और सोच रही थी कि ये महिली जब तक हम उतरेंगे तब तक पागल ही हो जायेगी। वह सबको देखती ही जा रही थी … सबको जज करती जा रही थी कि कौन खूबसूरत है और कौन नहीं। और वो जिसको भी खूबसूरत बता रही थी मुझे वह व्यक्ति बदसूरत लग रहा था। मैंने उससे कहा कि आप ही ये निर्णय करें ….. मैंने तो ऐसी चीजें कभी भी ट्राइ नहीं की है। इसके बाद वह आदमी बहुत खराब है … बहुत गर्म स्वभाव का है … वो ये है .. वो है … वह ऐसे बात करता है … वैसे बात करता है … ऐसे चलता है वैसे चलता है … उसको ऐसा नहीं करना चाहिये … वैसा नहीं करना चाहिये … पूरे समय दूसरों के विषय में चिंतित रहना। आप उनको कुछ भी कहें वे अपना सिर हिलाते जायेंगे …. ओह आप ऐसा कैसे कर सकते हैं लेकिन आप तो स्वयं ही ऐसा कर रहे हैं। यदि आपको हाँ कहना है तो आप इसे दस बार कहें हाँ हाँ हाँ। यदि आपको ना कहना है तो वे बोलते ही चले जायेंगे। उनमें कोई कॉमन सेंस ही नहीं है। आपको अपनी गरदन इतनी बार क्यों हिलानी है। यदि कोई कुछ कह रहा है तो आपको हर समय प्रतिक्रिया देने की जरूरत ही नहीं है।
तो ये एक दूसरी ही चीज है … आंतरिक प्रतिक्रिया। पहले बाह्य होती है, सबको देखते जाना… सबको जज करना … मुझे तो ये स्टेशन पसंद ही नहीं है …यहां गर बहुत अधिक धूल है … बाथरूम गंदे हैं … वो कमरा गंदा है… ये चीज गंदी है वो चीज गंदी है। मानों कि आप इंग्लैंड की महारानी हों। ये तो इससे भी ज्यादा हो सकता है क्योंकि उन्हें तो अपनी ड्रेस तक चुनने की इजाजत नहीं है … वहां का पार्लियामेंट इस बारे में निर्णय लेती है। वो बेचारी तो अहं भी नहीं कर सकती… बेचारी। वो किसी विसेष इवसर पर हपनी जाने वाली ड्रेस का ही चुनाव कर सकती है … यदि पार्लियामेंट कहती है हाँ तो वह उस ड्रेस को पहनती है और यदि पार्लियामेंट ना कहती है तो कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन हम लोग जो स्वतंत्र लोग हैं हममें ये समझने का कॉमन सेंस होना चाहिये कि क्या करना चाहिये … कहां करना चाहिये … क्या बोलना चाहिये… कैसे बोलना चाहिये लेकिन जहां अहंकार है वहां आपके अंदर कॉमन सेंस हो ही नहीं सकता।
आज आप अपनी कुंडलिनी उठा रहे हैं क्योंकि आपकी गुरू आपकी माँ हैं। वर्ना आप ये कार्य बिल्कुल नहीं कर सकते थे और इसीलिय. माँ का होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका एक कारण शायद इसीलिये सहजयोगी लीडरों से दूर भागते हैं और कई बार लोगों से भी दूर भागते हैं जो फॉलो ऑन करना चाहते हैं। हो सकता है हमें मालूम न हो कि वे अभी अभी इसमें प्रवेश कर रहे हों या आयें हों……. वे अभी अभी खुल रहे हों । उनके साथ अच्चा व्यवहार करें …… दया दिखायें….. वे चूजों की तरह से अभी अभी अंडे से बाहर निकल कर आये हैं। न्नेहं चूजो बहुत जल्दी मर जाते हैं। आपको उन्हें प्रेम देना है और सावधानी से हैंडल करना है। मैं ये बात आज कई वर्षों तक न कहने के बाद कह रही हूं और आप सबसे अनुरोध कर रही हूं कि विकसित होने का प्रयास करें। शीशे के सामने बैठकर माँ जैसा बनने की कोशिश करें। बेहतर होगा कि आप देखें … इसकी प्रैक्टिस करें, दया भाव रखें और धैर्य रखें। यदि हमको पश्चिम में सहजयोग फैलाना है तो हमैं यही करना होगा… महाराष्ट्र में नहीं। महाराष्ट्र की माँये काफी सख्त और स्पष्टवादी किस्म की होती हैं और वहां के बच्चों को इसकी आदत होती है। मेरी माँ भी बहुत सख्त मिजाज महिला थीं लेकिन मैं सोचती हूं कि मैं उन्हें बहुत पसंद करती हूं क्योंकि उन्होंने ही मुझे बहुत सारी बातें सिखाईं ….. मेरी सभी बहनें बहुत अच्छी कुक हैं … सब अपने जीवन में अच्छे कार्य कर रही हैं … और कभी किसी को परेशान नहीं करती। ये सब हमने अपनी माँ सेही सीखा है। वह बहुत ही सख्त थी और कभी भी कोई मूर्खतापूर्ण बात नहीं सहन करती थीं। वह न तो कभी स्वयं झूठ बोलती थी और यदि कभी हम उन्हें कहते थे कि घर में कोई आने वाला है तो आप कह दे कि आप घर में नहीं हैं तो वह कहती थीं कि तुम लोग मुझे झूठ मत बुलवाओ… मैं उस व्यक्ति को कह दूंगी कि तुमने मुझे झूठ बोलने को कहा है। वो ऐसी ही थीं …. और उन्होंने हमें भी यही शिक्षा दी। हम उनकी बात का कभी भी बुरा नहीं मानते थे क्योंकि वह ये सब हमारी भलाई के लिये ही करती थीं। अब इस लेश में लोग इन बातों को नहीं समझते हैं। उनके अंदर अहंकार है……. वे कभी भी ये नहीं समझेंगे कि ये बात आप उनके भले के लिये कह रहे हैं। वे समझेंगे कि आप उनको दबाना चाह रहे हैं क्योंकि उन्होंने हमेशा लोगों को दबाया है। यदि उनको दबाया गया तो वे इससे भी बुरे हो सकते हैं।
समझने का प्रययास करें कि इस देश में क्या स्थिति है। मैंने तो स्वयं को एडजस्ट कर लिया है आपको भी स्वयं को इसी प्रकार से एडजस्ट करना पड़ेगा। मैं इस विषय पर अब और शिकायतें नहीं सुनना चाहती हूं। फिर से गुरू तत्व को मातृ तत्व के अंदर जाना होगा। अगली बार मुझे शिकायतें बिल्ल नहीं सुननी हैं … सबको कहना है ओह माँ वो व्यक्ति कितना अच्छा है … कितना दयालु है … कितना नम्र है ….. कितने मधुर स्वभाव का व्यक्ति है। इसमें आपका कुछ भी नहीं जाता है। इस सुंदर वातावरण में जहां प्रकृति इतनी सुंदर है और सूर्य ने भी अपनी तीव्रता कम कर दी है … सब कुछ इतना सुंदर है। हमको देखना है कि हम सबको ऐसा व्यवहार करना है कि हमारी माँ को प्रसन्नता हो और हम लड़े नहीं… झगड़ें नहीं … किसी को कुछ भी न कहें।
माना कोई ट्रेन में जा रहा है और वो टिकट कलेक्टर से लड़ाई करे कि ये मेरी सीट है … तो सहजयोगियों को ये नहीं करना है ….सहज। अच्छा आपको ये सीट चाहिये तो मैं वहां बैठ जाता हूं। ठीक है मैं जो कुछ भी कानूनी है या ठीक है मैं वहीं करूंगा। जो कुछ भी उचित है वही मैं करूंगा। तुरंत ही वो व्यक्ति पिघल जायेगा। लेकिन अगर आप कहते हैं कि नहीं नहीं ये तो मेरी सीट है ….. मैंने इसे बुक किया है तो फिर आपकी माँ आपके साथ ट्रिक खेलती हैं और आपको पता चलता है कि सीट तो आपकी थी ही नहीं। आप अत्यंत नाराज हो जाते हैं … तो देखिये सहजयोगी किस का किस प्रकार से अपमान हो जाता है।
देखिये ये कितनी सुंदरता से कार्यान्वित हो जाता है यदि हम मधुरता और धरती माँ की सुंदरता को समझ सकें तो। धरती किस तरह से हर चीज का सृजन करती है और कितनी मधुर है। मैं आपको कहती हूं कि यदि आप नारियल के वृक्ष के नीचे सो रहे हों तो क्या आप इसकी कल्पना कर सकते हैं। नारियल कितना बड़ा होता है और यदि ये किसी के सिर पर गिर जाय तो उस व्यक्ति का तो काम तमाम समझिये। ये आपकी हड्डियां भी तोड़ सकता है लेकिन ये कभी भी किसी आदमी या जानवर के सिर पर नहीं गिर सकता है। क्या आप इसका विश्वास कर सकते हैं। ये सच बात है। ये ऋतंभरा प्रज्ञा है (अस्पष्ट)। ये धरती माँ का गुण है कि नारियल कभी भी किसी आदमी या जानवर के सिर पर नहीं गिरता है। वो ऐसा कैसे करती हैं। आपने देखा है कि फूल किस प्रकार से बनते हैं। आप कभी भी फूलों को बढ़ता हुआ नहीं देखेंगे। माँ कैसे ये सब करती हैं। वो ये सब धीरे धीरे करती हैं … वह पत्तियों को कितना सुंदरता से व्यवस्थित करती हैं कि सबको धूप मिल सके। वो आपके लिये सुंदर छांव का सृजन करती हैं….. रंगों का संयोजन सब कुछ इतनी सुंदरता से करती हैं और पोषण करती हैं … जब पत्तियां झड़ जाती हैं तो वे धरती माँ को नाइट्रोजन देती हैं जिससे वह फिर पेड़ को पोषित करती है। लेकिन पत्तियों को झड़ना पड़ता है यदि सूरज की किरणों को धरती पर आना होता है। ये सब धरती माँ बड़ी सुंदरता से करती है लेकिन हमें इसका पता भी नहीं चलता है कि ये वो हमारे लिये कर रही है। यदि आप नोटिस करें कि धरती कितना सुंदरता से सृजन करती है और यदि इसके दस करोड़वां भाग भी हम कर सकें तो हम काफी कुछ कर सकते है …. स्वर्ग का राज्य में राज कर सकते हैं।
आपकी कुंडलिनी जागृत हो चुकी है तो आपको अपने अंदर वही मधुरता लानी होगी कि लोग अगर आपको देखें तो कहें कि आप कितनी महान माँ होंगी। लेकिन पश्चिम में मांये कापी खराब होती हैं … महिलायें काफी दबंग होती हैं कि लोगों को माँ की छवि का कोई अंदाजा भी नहीं है। वहां पर महिलायें बहुत ही दबंग और प्रभुत्व जमाने वाली होती हैं। महिलाओं को प्रभुत्व जमाना चाहिये …ये बहुत सरल है लेकिन उन्हें धरती माँ जैसा भी होना चाहिये जो कितने कष्ट सहती है … सभी कठिनाइयां …क्या हम ये सब कर सकते हैं। खासकर से इस देश की महिलाओं से मैं कहना चाहती हूं कि वे भी अपने अंदर इन सुंदर गुणों को विकसित करें न कि दबंगता को। महिलाओं पर दबंगता शोभा नहीं देती है। ये तो एक बैल की तरह का व्यवहार है। महिलाओं को अपने पतियों को दबाने का विचार छोड़ देना चाहिये। वह कुछ कहता है और हम बच्चों को ना कह देते हैं। हम सभी को ना कह देते हैं …हम सब पर प्रभुत्व जमाना चाहते हैं। ये हमारा चरित्र नहीं होना चाहिये।
परमात्मा आपको आशीर्वादित करे।