6th Day of Navaratri, Complete dedication

Weggis (Switzerland)

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Navaratri puja. Weggis (Switzerland), 19 October 1985

आज नवरात्रि का महान दिन है। हम छठे और सातवें दिन के मध्य में बैठे हैं। षष्ठी और सप्तमी वह दिन है,जब महासरस्वती ने अपना कार्य संपन्न किया और शक्ति ने इसे स्वयं प्रारंभ किया। इसलिए आज बारह बजे देवी स्वयं शक्ति को धारण करेंगीं।

वास्तव में, जैसा आप जानते हैं कि महाकाली और महासरस्वती दोनों श्री सदाशिव की शक्तियां हैं। आदिशक्ति ने सबसे पहले स्वयं को महाकाली के रूप में बनाया ,जो कि इच्छा की शक्ति हैं। लेकिन यह शक्तियां और कुछ भी नहीं है, बल्कि ईश्वर के प्रेम की ही शक्ति हैं। इसलिए इस ईश्वरीय महान प्रेम के क्रम में, आदिशक्ति को सर्वप्रथम इच्छा की शक्ति के रूप में निर्मित होना पड़ा।

इसी प्रकार से सहजयोगी, जो इस प्रेम की शक्ति से आशीर्वादित किए गए हैं,उन्हें अपने हृदय में पूर्ण इच्छा रखनी चाहिए। प्रेम करने की इच्छा। वह इच्छा मनुष्य के दूसरे तरह के मानवीय प्रेम से, हम जानते है उस प्रेम से बिल्कुल अलग है। अन्य मानवीय प्रेम के दूसरे तरह के प्रेम में, जब हमारा सम्बन्ध दूसरों के साथ होता है तो हम उनसे उम्मीदें रखते हैं। यही कारण है कि यह बहुत निराशाजनक होता है।

हमारी अपेक्षाएं हमेशा हमारी समझ और वास्तविकता से बहुत अधिक होती हैं। यही कारण है कि हम निराशा और कुंठा से ग्रस्त हो जाते हैं। और वही प्रेम जो पोषित करने वाला और परिपूर्ण करने वाला होना चाहिए, वह व्यर्थ हो जाता है।

इसलिए जब यह प्रेम मनुष्य में प्रतिबिंबित होता है, तब उसकी इच्छा होती है कि सब उसको प्रेम करें, ना कि दूसरे को । हर किसी को आप से प्रेम करना चाहिए, पर आप दूसरों से कितना प्रेम करते हैं यही मुख्य बिंदु है। स्वभाविक है हम सभी स्वयं के लिए सोचते हैं। अतः कोई भी सचमुच प्रेम नहीं करता। लेकिन जब यह सच्चा प्रेम बन जाता है तो त्याग आपका स्वभाव बन जाता है। ऐसे त्याग को त्याग नहीं माना जाता, अपितु एक विशेष अधिकार कहा जाता है। हम कहते हैं कि प्रेम करना एक विशेष अधिकार है। यह एक सुअवसर है कि हम प्रेम करें। यह हमारा परम सौभाग्य है कि हम सब प्रेम कर सकते हैं। यह एक ईश्वरीय आशीर्वाद है कि हम प्रेम कर सकते हैं और दे सकते हैं।

यह देना तब प्रारंभ होता है, जब आप प्रेम की अनुभूति करते हैं। प्रेम को समझना नहीं होता, बल्कि प्रेम की अनुभूति होती है। प्रेम की शक्ति और अभिव्यक्ति यही तीसरी शक्ति है जो व्यक्त होने लगती है क्योंकि इसके बाद मनुष्य क्रियाशील बन जाता है।

इस प्रकार प्रेम करने योग्य स्थिति को प्राप्त करने का कार्य शुरू हो जाता है। प्रारंभ में हम अनेक प्रकार से क्रियान्वित हो जाते हैं। जैसा कि मैंने कहा- हम अपेक्षा करना प्रारंभ कर देते हैं और सोचते हैं कि दूसरों से प्यार कर रहे हैं। उनके लिए कार्य करते हैं। इस आवेश में, दूसरों को हमें प्रेम करना चाहिए, दूसरों को हमारा सम्मान करना चाहिए, दूसरों को सोचना चाहिए कि हम महान हैं, उन्हें हमें पहचानना चाहिए – हम कोई दूसरी चीजों से प्रेम करना शुरू कर देते हैं जो हमारे लिए इतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं।

इसलिए हम सबसे पहले धन संपदा पर जाते हैं, यदि हमारे पास पैसा है तो लोग हमसे प्यार करेंगे। धन हमारे लिए महत्वपूर्ण बिंदु बन जाता है। हम सोचते हैं कि, यदि हमारे पास पैसा है तो लोग हमें प्यार करेंगे। हम बहुत शक्ति संपन्न हो जाएंगे जैसे पैसे वाले आदमी, जैसे कि अमीर आदमी। तो हम धन संचय करने लगते हैं, और धन दौलत से प्यार करने लगते हैं। लेकिन पैसा सच्चाई नहीं है। हम सत्य से प्रेम नहीं करते हैं।

जब हम पैसे को प्यार करने लगते हैं तो हम पैसे की समस्या के विषय में ही सोचना प्रारंभ कर देते हैं। ऐसे व्यक्ति इस सीमा तक कंजूस हो सकते हैं, यहां तक कि वह ईश्वर के प्रति भी कंजूस हो जाते हैं। वास्तव में उनके पास धन कमी नहीं होता क्योंकि अगर आप पैसा खर्च नहीं कर सकते, आपके पास धन नहीं है, यदि इसका उपयोग नहीं है, तो पैसा रखने का क्या लाभ? इसी कारण उन्हें समस्याएं आती हैं क्योंकि वह पैसे से प्रेम करते हैं, सर्वशक्तिमान परमात्मा से नहीं। वे हमेशा धन के लिए चिंतित रहते हैं ,सत्य के लिए नहीं।

तब इसके साथ वे दूसरी चीज की ओर चले जाते हैं जो कि सत्ता है, वे सत्ता चाहते हैं, वे राष्ट्रपति, मंत्री और नौकरशाह  और इसी प्रकार से, वे सत्ता पाना चाहते हैं। वे सोचते हैं कि बड़ी सत्ता पा लेने के बाद लोग उनका सम्मान करेंगे और उनसे प्रेम करेंगे। लेकिन वे डरे रहते हैं। वे जो पाते हैं वह डर है। हर समय उन्हें डर लगता है। पैसे वाले लोग भी डरते हैं। यही कारण है कि बाइबिल में यह कहा गया है: पाप का प्रतिफल भय है। पाप क्या है? सत्य से प्रेम करना पाप नहीं । पाप है। जब आप सभी से प्रेम नहीं करते तब यह पाप है। इसीलिए जब आप अपने पदों के विषय में चिंतित होने लगते हैं.….जैसे कि राष्ट्रपति को लगता है कि वह नौकरी खो देंगे, उपराष्ट्रपति सोचते हैं कि नौकरी से निकाल दिया जाएगा, प्रधानमंत्री सोचते हैं कि वह निर्वाचित नहीं होंगे, नौकरशाह सोचते हैं कि उनकी नौकरी चली जाएगी, उन्हें पदोन्नति और कुछ नहीं मिलेगा, वहां समस्या हो जाएगी।

ये सारे लोग डर की भयानक भावना से ग्रस्त रहते हैं। उन्हें किसी भी प्रकार की कोई स्वतंत्रता नहीं है और इस श्रेणी के लोग भय के कारण इतना गिरते ही चले जाते हैं कि पैसे वाले लोगों से भी बदतर हो जाते हैं। क्योंकि वे एक बार जब खो देते हैं तो खो ही देते हैं। वे फिर कभी नहीं उबरते। कोई अवसर नहीं। मेरे परिचय में ऐसे लोग हैं जो उच्च पदस्थ रहे हैं और एक बार जब वह उस पद को खो देते हैं तो कोई भी उनकी ओर नहीं देखता, वे सामान्य रूप से पैदल ही चलते हैं,नहीं तो उनके स्वागत के लिए कम से कम सैकड़ो मोटर गाड़ियां खड़ी होती होंगी । एक बार जब भी अपनी नौकरी खो देते हैं कोई भी उनकी तरफ देखता भी नहीं है। वे एक सामान्य व्यक्ति की तरह घूमते हैं।

यहां तक की इन चीजों को घटित होते देखकर कि यह सत्य इतने स्पष्ट रूप में उनके सामने आ रहा है,वे उस सत्य को नहीं मानते,वे उस सत्य की अनुभूति नहीं करते,वे उसकी अनुभूति स्वयं में नहीं करते।

कुछ पल के लिए वह समझते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। तब जब एक मनुष्य की मृत्यु हो जाती है, देखते हैं कि धनी व्यक्ति, पैसे वाले को लोग भूल जाते हैं कोई व्यक्ति भी उनके विषय में चिंतित नहीं होता की कौन धनवान था। इसके विपरीत, प्रधानमंत्री या सभी उच्च पदस्थ लोगों की जब मृत्यु होती है, उनके व्यक्तिगत जीवन के विषय में और जो भी कुकृत्य,भयानक कृत्य और उन्होंने अपना जीवन जैसे व्यतीत किया है उनके बारे में तुरंत पुस्तके आनी शुरू हो जाती है। उनके जीवन में कोई सुगंध नहीं होती है,कोई आदर्शवादिता नहीं होती। कुछ भी नहीं, क्योंकि जो उत्तरदायित्व जनता के प्रति और उनके प्रति है उसे वे नहीं समझते और अपने व्यक्तिगत जीवन को गड़बड़ बना लेते हैं। यही कारण है कि इस प्रकार की प्रतिक्रिया उनके बाद आती हैं।

किसी दिन मैं एक सुप्रसिद्ध अभिनेता का साक्षात्कार पढ़ रही थी । वह एक जन्मजात आत्म साक्षात्कारी है,मैं जानती हूं,लेकिन वह पूर्णतया पथभ्रष्ट हो गया। वह कहता है,”मेरे विचार से शराब पीने में क्या हानि है,जुआ खेलने में क्या नुकसान है,धूम्रपान में क्या हानि है? क्योंकि,अंत में, मरना ही है। तब इसकी चिंता कौन करता है? मान लीजिए कि मुझे कैंसर हो जाता है, तो भी क्या? किसी भी दशा में अगर मैं मरने वाला ही हूं, तो इस जीवन के आनंद को क्यों ना उठाएं। लेकिन मृत्यु के बारे में क्या? आप इसे जारी रखें।

जो आप सब करते रहे हैं उसका परिणाम सामने आएगा और लोग आपकी तस्वीर को घर में रखना पसंद नहीं करेंगे। बच्चे आप पर थूकेंगें। इसके बारे में क्या? आपका जीवन यह नहीं है जो आज है, तीन साल, चार साल, दस या तथाकथित सफलता के पन्द्रह साल के लिए के लिए है। जब आप की मृत्यु हो जाती हैं तो यह सारी सनक गायब हो जाएगी और लोग आप के विषय में सच्चाई को जान जाएंगे। यही कारण है कि लोकप्रियता की शक्ति समाप्त हो जाती है। या सस्ती लोकप्रियता, आपका अपने प्रति निम्न स्तर का व्यवहार एक ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करता है जो ना तो पूजनीय होगा और न समाज में स्वीकार्य होगा। कोई भी महापुरुष के रूप में आप का उदाहरण नहीं देगा। कुछ समय के लिए तो यह चलता रहेगा लेकिन समग्र रूप से ऐसे व्यक्ति ने मानवता के लिए कुछ भी नहीं दिया।

इसी तरह से सरस्वती की शक्ति कार्य करती है। लोग सत्ता को प्राप्त करने हेतु क्रियाशील हो जाते हैं। लेकिन सत्य की खोज के लिए कार्य करना चाहिए। सरस्वती को सत्य की खोज में आप का सहायक होना चाहिए। जब आप उन अजीबोगरीब स्थानों और रास्तों में कार्य करते हैं आपको एहसास होता है कि यह मार्ग नहीं है, हमने इसे खो दिया है। मार्ग तो कहीं और है, हमने इसे खो दिया है। हम सत्य मार्ग की खोज करें क्योंकि यह मार्ग हमें आनंद नहीं देते। यह कोई भी दूसरों से इतिहास से, अन्य दूसरी चीज़ों से, अपने माता-पिता से, अपने समाज से, स्वयं से तथा अपने बच्चों से भी सीख सकता है।

यदि आप सीखना चाहते हैं, यह सरस्वती के पुजारियों का गुण है कि वे ज्ञान प्राप्त करते हैं, वह वास्तविकता को प्राप्त करते हैं, वेद-वेदों के प्रारंभ में यह कहा गया है कि यदि इन चारों वेदों को पढ़कर आप विद् नहीं होते हैं। स्नायु पर आधारित ज्ञान ही विद् है अर्थात् साक्षात्कार। इन वेदों के अध्ययन की कोई आवश्यकता नहीं है।

अतः सरस्वती की सर्वप्रथम बात यह है कि अध्ययन के द्वारा, सरस्वती की अभिव्यक्ति की प्रक्रिया के माध्यम से आपको यह समझने के लिए एक बिंदु तक पहुंचना होगा, यह एक चूहा दौड़ है, और हमें इस से बाहर निकलना होगा, हमें बाहर कदम रखना होगा। जब ऐसा होता है, तब महालक्ष्मी तत्व आपके अंदर कार्यरत हो जाता है, वह तीसरा तत्व है जो कार्य करना प्रारंभ कर देता है।

महालक्ष्मी तत्व मानव में विकासात्मक प्रक्रम के माध्यम से अपने प्रेम को पूर्ण रूप से व्यक्त करना प्रारंभ कर देता है। वह साथ ही साथ विकसित होने लगता है। वाह साक्षी की तरह दोनों पक्षों की ओर देखता है कि क्या घटित हो रहा है, और अपनी महालक्ष्मी शक्ति का उपयोग करता है। महालक्ष्मी की शक्ति के प्रथम भाग में, वह पारिवारिक बंधनों, सत्ता, धन और वासना के अन्य मानवीय बंधनों से बाहर निकलना प्रारंभ कर देता है और वह एक उच्च स्तर पर गतिमान होने लगता है। वह हमें सत्य की स्थापना करके लोकप्रियता का एक नवीन विचार प्रदान करता है, क्योंकि महालक्ष्मी शक्ति के माध्यम से आप अपने केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर सत्य की खोज करते हैं और अंततः यह प्रबुद्ध मस्तिष्क का प्रकाश है।

जब महालक्ष्मी शक्ति अभिव्यक्त होने लगती है मनुष्य दूसरे के लिए सोचना प्रारंभ कर देता है। केवल भौतिक स्तर पर नहीं, वे भौतिकवादी कष्ट उठा रहे हैं। “इस समय इथोपिया में जो लोग हैं। उन्हें कौन बचाएगा? हमें उन्हें कुछ भोजन इत्यादि अवश्य देना चाहिए।” नहीं!–उन्हें समस्या की जड़ तक जाना है। क्यों? या-वे नहीं सोचते हैं कि पैसा और संपत्ति का समान वितरण होना चाहिए। नहीं, यह सतही सोच है क्योंकि जहां कहीं भी यह बंटवारा किया गया है वहां लोग खुश नहीं है। वे महसूस करते हैं कि उन्हें कोई आजादी नहीं है।

जिन लोगों के पास पैसा है, वह प्रसन्न नहीं हैं क्योंकि उनका जीवन आसुरी है। जहां वे स्वतंत्र हैं वहां उनका व्यवहार राक्षसों के समान है। न कोई समग्रता की भावना है और न सामूहिकता की भावना है। जब वे उस तरह के बन जाते हैं, तब यहां तक कि वे यह भी महसूस नहीं करते हैं कि वह राक्षसी प्रवृत्ति के हो गए हैं। प्रत्येक वस्तु एक बड़ी शहादत की तरह बन जाती है। वह जमीनों के लिए लड़ते हैं, वे राष्ट्र के लिए लड़ते हैं, वे अधिकारों के लिए लड़ते हैं और वह हर प्रकार के खतरनाक कार्य करते हैं, मनुष्य और मानवता को नष्ट करना प्रारंभ करते हैं।‌

आज की समस्त उथल-पुथल का प्रभाव अधिकांशतः पश्चिमी देशों में और सारे अरबी देशों में भी है। मैं कहूंगी—यह दाईं ओर की  पकड़ है।

और यह उथल-पुथल पूर्व में बाईं ओर का प्रभाव है।

यह बहुत आश्चर्य चकित करने वाला है, और विरोधाभासी भी है। यह मेरे लिए बहुत अजीब सी दुविधा की बात है, मैं कई बार इसे समझ नहीं पाती हूं।

क्योंकि जहां पर वे अपनी शुद्धता के विषय में सतर्क हैं,जब अपनी पवित्रता और हर चीज के विषय में इतना चिंतित होते हैं, कि उन्हें बाईं ओर की समस्या होनी चाहिए। यह पूजा करते हैं,उनमें श्रद्धा है,वे कैथोलिक की तरह है। हम कह सकते हैं स्वीटजरलैंड में रहने वाले लोगों के अतिरिक्त वह कैथोलिक की तरह है शायद धनी लोग नहीं है। मेरा विचार है यहां प्रत्येक व्यक्ति धनी है क्योंकि वे लोग अत्यधिक धन की ओर उन्मुख हैं।

या, जहां पर लोग दाई और वाले हैं वे अपनी पवित्रता की उपेक्षा करते हैं, दाएं ओर के विषय में ध्यान नहीं देते हैं। यह बहुत आश्चर्यजनक बात है कि उन्हें दाई ओर की समस्याएं होती हैं। इसका कारण यह है कि वह अपनी पवित्रता को ध्यान में रखते हैं तो वे इसकी अत्यधिक गहराई में चले जाते हैं।

मान लीजिए, कोई व्यक्ति पूजा कर रहा है और वह केवल सुबह से शाम तक, बिना किसी गतिविधि के पूजा ही पूजा करता रहता है। पूजा करना बहुत सरल है, है की नहीं। बस इधर आ जाइये, कोई आपके लिए पूजा करता है, चैतन्य लहरियां प्राप्त कर, अच्छे से आशीर्वादित होकर, घर जाए, कोई गतिविधि और कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। इसलिए कोई संतुलन नहीं होता जब भी पूजा करते हैं तो वह सोचते हैं कि अरे-उन्होंने बहुत अच्छे से पूजा की है। नहीं! अगर आप दांयीं ओर से प्रभावित व्यक्ति हैं तो पूजा आपके लिए सहायक है, और यदि आप बाईं ओर से प्रभावित व्यक्ति हैं तो पूजा सहायक नहीं होगी।

वास्तवमें, पूजा निश्चित ही आपकी सहायता करती है, निसंदेह मेरी पूजा दोनों ओर के लोगों के लिए सहायक रहेगी, क्योंकि मैं न तो बाईं ओर, न दायीं ओर न ही और कहीं हूं।

अब पूजा की बात, इसे जब वे करते हैं: मान लो कोई व्यक्ति देवी की पूजा कर रहा है, भारत में वे देवी की पूजा करने के लिए बहुत साहस दिखाते हैं, आपको मालूम नहीं है। सप्तशती, जो उनके पास है उससे वे कार्य करते हैं, फिर वे भूत ग्रसित हो जाते हैं और उका कारण भी नहीं समझ पाते।

सर्वप्रथम वे एक मूर्ति बनवाते हैं किसी भयानक इंसान से और फिर भी देवी की पूजा करते हैं। वे ईश्वरीय भय में रहते हैं, कह सकते हैं कि सब ठीक हो रहा है। हमारे यहां ऐसे मंदिर भी हैं जहां स्वयंभू,भूमि माता द्वारा निर्मित, जिनकी पूजा होती है, सब कुछ मान लो ठीक हो रहा है, लेकिन फिर भी वे भूत ग्रसित हो जाते हैं। क्यों? वह इसलिए की अधिकतर मंदिर प्रेत आत्मा और भूतों से ग्रसित हैं वह इसलिए क्योंकि वहां पर हर प्रकार की तांत्रिक गतिविधियां प्रयोग होती हैं। जब लोग वहां पर पूजा करते हैं तो उन पर आक्रमण हो जाता है और वे अधिक बांई ओर चले जाते हैं।

अब मुस्लिम और दूसरे लोग जो ईश्वर में विश्वास करते हैं, जो निराकार है, जो आकार हीन है वे दायी ओर चले जाते हैं। यह ईश्वर निराकार है, ठीक बात है, हर जगह मौजूद, आप में, मुझ में, हर जगह उनका अस्तित्व है। सभी ईश्वर हैं चाहे आप शैतान क्यों ना हो, सभी भगवान हैं। किसी में कोई भी त्रुटि नहीं है। सब ईश्वर है इसी मूल्य पर यह आधारित है। इससे वे अति चेतन में प्रवेश करते हैं, वे राक्षसी स्वभाव के बन जाते हैं। अब वे झगड़ालू हो जाते हैं क्योंकि वे शैतान बन गए हैं। शैतान को लड़ना पड़ता है नहीं तो उसका अस्तित्व कैसे बना रहेगा? वे लड़ते हैं, वे आक्रामक होते हैं, दूसरे देशों को जाते हैं, उन्हें उत्तेजित करते हैं, उन्हें पकड़ते हैं, वे हर समय दूसरे को आक्रामक करने की सोचते हैं।

सूक्ष्म रूप से वे आक्रामक हैं, आजकल पश्चिम में मीडिया आक्रामक है। आक्रामकता के बहुत सारे तरीके हैं और उनके लिए कुछ आक्रामकता बहुत धार्मिक है। कुछ चीजों के लिए! वह सीधे उत्तेजक, अपमान करने वाले और क्रूर प्रश्न पूछेंगे। वे क्रूर इंसान बन जाते हैं। इस तरह से उथल-पुथल प्रारंभ हो जाती है जब हम महासरस्वती की शक्ति का गलत ढंग से या महाकाली की शक्ति का गलत ढंग से प्रयोग करने लगते हैं।

यही कारण है, सहज योग में पूजा के पूर्व आपको बहुत सारी गतिविधियों को करना होता है: आपको हॉल को सजाना होता है, आपको फूलों को लाना होता है, आपको प्रत्येक चीज को सुंदरता पूर्वक व्यवस्थित करना होता है। गुलाबों को देखिए, वह कितने सुंदर हैं। तब आप, उन सारी गतिविधियों के द्वारा, जिन्हें आप करते हैं,स्वयं को संतुलित करना प्रारंभ कर देते हैं और तब आप पूजा के लिए बैठते हैं। यह उसी तरह है जिस तरह दिन के समय आप कार्य करते हैं और रात में आप सोते हैं। आराम करने के लिए, स्थान पाने के लिए आपको सक्रिय होना पड़ता है। उसी प्रकार से ध्यान में जाने के लिए हिमालय पर्वत पर जैसी चढ़ाई चढ़नी होती है, क्योंकि जब आप थके होते हैं तो आप बाद में आराम कर सकते हैं। अन्यथा, यदि आपको कोई मिलता है, कहते हैं केवल स्विट्जरलैंड से जो ध्यान के लिए अत्यधिक तीव्र व्यक्ति होते हैं, आप जानते हैं, उनको शांत करने के लिए अधिक प्रयास करना होता है क्योंकि वह हर समय उन्मत्त हो जाएंगे, वे हर समय उछल कूद मचाएंगे।

इसलिए पूजा के पूर्व संतुलन स्थापित करने के लिए गतिविधि करनी होती हैं। इसलिए महिलाओं को साड़ी और ब्लाउज ढूंढना और यह और वह और वे फूलों से सजाने की चिंता करती हैं, चीजों को व्यवस्थित करने की चिंता होती है। यह और वह। बहुत सारे क्रियाकलाप! हमें यात्रा करनी है। अंग्रेजों के लिए इंग्लैंड से यात्रा करना आवश्यक था, इसके लिए अपने पैसे और कमरों का प्रबंध करना है और हर एक चीज जो यहां आनी है, भविष्य के पक्ष को सोचने के लिए, उन्हें क्या भुगतान करना है, उन्हें कैसे अपना ऋण वापस करना है! यह सभी भविष्य की योजनाएं उन्हें स्विट्जरलैंड जाने से पूर्व ही बनानी होंगी, क्योंकि स्विट्जरलैंड सबसे सक्रिय जगह है। यहां पूजा करना बेहतर है, इससे वे इतना अधिक सक्रिय नही हैं। क्योंकि देवी सारी चीजों की व्यवस्था करती हैं।

इसलिए उत्थान विकसित होना प्रारंभ हो जाता है। उसमें, नवरात्र देवी का, युगों से, आप के उत्थान के लिए नाटक है। यही कारण है कि नवरात्रि अत्यधिक महत्वपूर्ण पूजा है। मुझे कहना होगा, सहज योग में नवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण पूजा है। यद्यपि हम कह सकते हैं, आधुनिक सहज योग में सहस्त्रार दिवस है, इसी कारण आप अपना साक्षात्कार प्राप्त करना शुरू कर देते हैं। तो लेकिन यदि आप विकास की संपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं की ओर देखें तो आप पाएंगे कि एक मात्र नवरात्रि है जो आपको सहस्त्रार तक लाई है। उत्थान के विभिन्न चरणों में देवी की सहायता के बिना आप आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने की स्थिति में नहीं होते हैं। इसलिए आपके द्वारा अतीत में उठाए गए सभी कदमों की आज पूजा की गई और उसका उपयोग देवी को धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए किया गया, जो आपको यहां तक लाईं। इसलिए यह एक तरह का धन्यवाद देना है। उनके कार्य के बिना कुछ भी नहीं हो सकता।

इसलिए जब हम देवी के विषय में और उनके अवतरणों के विषय में पढ़ते हैं: कैसे वह भक्तों की रक्षा के लिए धरती पर आई, जो मनुष्य अपने उत्थान के लिए भवसागर पार करने का प्रयास कर रहे थे, उन्होंने कितना कठोर परिश्रम किया, कैसे वह शैतानों से लड़ी, कैसे उन्होंने अकेले राक्षसों का संहार किया, उन्होंने स्वयं लोगों को भवसागर पार कराने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लिया।

गुरु ने आपको धर्म धारण की शक्ति दी लेकिन वह वही है जिन्होंने आप को पार कराया। यहां तक जो लोग धार्मिक थे राक्षसी दबाव के कारण ऐसा नहीं कर सके। वह अकेली ही हैं जिन्होंने अपनी विनाश की शक्तियों के साथ अकेले युद्ध किया। उन्होंने आपके प्रेम के कारण संघर्ष किया। वह आपको इस स्तर तक ले आई। और तब उन्होंने सामान्य रूप में अवतार लिया। उन्होंने यहां तक सभी गुरुओं के समय में उन्होंने रूप धारण किया, जैसा आप जानते हैं, जानकी जनक की पुत्री थी, फातिमा मोहम्मद साहब की पुत्री थी और नानकी नानक जी की बहन थी। इन सभी रूपों में, इन शक्तियों ने गुरुत्व को बनाए रखा और पोषण किया। और उसके बाद या कभी-कभी एक साथ,वह मानवता के उत्थान हेतु सामान्य रूप में अवतरित हुई।

इसलिए आज धन्यवाद ज्ञापन का दिन है। जैसे गुरु पूजा अपने गुरु को धन्यवाद देने का दिन है, वह जिसने आपका मार्गदर्शन किया, वह जिसने आपको सत्य के विषय में बताया, और वह जिसने आपको सत्य सिखाया और आपको साक्षात्कार प्रदान किया। और देवी पूजा एक धन्यवाद ज्ञापन है जहां, एकमात्र बहुत प्यार करने वाली मां की तरह, अपने आंचल में उसने आपकी सुरक्षा की, आपके लिए लड़ाई की, आपके चारों तरफ जो शत्रु है उनसे, और हर प्रकार की विद्यमान समस्याओं से लड़ी और अंततोगत्वा आपको सहस्त्रार तक के स्तर पर ले गई और तब आपको आत्म-साक्षात्कार प्रदान किया। यह मां को वास्तविक धन्यवाद देना है।

इसलिए हम कह सकते हैं नवरात्रि मातृ दिवस के समान है जहां आप उन्हें धन्यवाद देते हैं: इसलिए कि जिन्होंने अपने बच्चों के लिए निरंतर और अथक कार्य करतीं रहीं ।

मातृत्व गुरुत्व से अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि गुरु वह है जो आपको प्रशिक्षित करता है, आपको निपुण बनाता है। लेकिन मां आपको क्षमा करती है, वह आपकी सहायता करती हैं, और वह आप को सिखाती है कि प्यार कैसे किया जाए। उसमें अत्यधिक धैर्य और अत्यधिक प्रेम है और वह इसे अकेले ही करती हैं। वह आपसे किसी चीज की अपेक्षा नहीं रखती-पूर्णतया निस्वार्थ। मुझे कहना चाहिए कि ‘निस्वार्थ’ एक बहुत छोटा शब्द है, यह एक ऐसी असीम करुणा है, जो प्रत्येक गलत को नष्ट कर देती है, भंग कर देती है, पचा लेती है, अवशोषित कर लेती है।

इसलिए नवरात्रि का दिन सभी सहयोगियों के लिए बहुत महान दिन है, क्योंकि तब श्री राम की शक्ति सीता के रूप में मौन क्षमता और पीड़ा के साथ आई। उन्होंने कितना सहन किया! उन्होंने कितना सहन किया! फिर उन्होंने राधा का रूप धारण किया। फिर वह सरस्वती की पांच शक्तियों के रूप में, श्री कृष्ण की पांच पत्नियों के रूप में आईं। फिर वह मैरी के रूप में आई: मैं सोचती हूं की पुत्र को सूली पर चढ़ते हुए देखना अत्यधिक पीड़ादायक था। इस पीड़ा को उन्होंने मौन भाव से, धैर्य पूर्वक सहन किया। वह पूरा नाटक, जो देखा गया, वह पराकाष्ठा थी। आप सबको अपने आज्ञा चक्र को पार कराना था उन्होंने यह सब सहन किया क्योंकि आप सबको अपने आज्ञा चक्र को पार करना था। उन्हें अपने पुत्र का बलिदान करना पड़ा। यह करना एक पिता के लिए बहुत सरल है लेकिन एक मां के लिए बहुत कठिन। अब आप लोगों में से बहुत सारी माताएं हैं, आप जानती होंगी कि बच्चे को रखना क्या होता है और उसके विषय में कैसा अनुभव करती हैं।

ऐसा करने के पश्चात, वह उस दशा पर आती हैं जहां वह आपको आपका आत्मसाक्षात्कार प्रदान करती हैं। यह कार्य अत्यधिक धैर्य का है, जैसा आप जानते हैं। यह अत्यधिक धैर्य और समझदारी है। जैसे-जैसे समय परिवर्तित हुआ, निसंदेह मानव साक्षात्कार की ओर उन्मुख हुआ, लेकिन इसके साथ ही बहुत ही अजीबोगरीब, मूर्खता पूर्ण, कुटिल बेवकूफी भरे मार्ग की तरफ चल पड़ा। यह समझना असंभव है कि कैसे वे अपने मूर्खतापूर्ण विचारों के साथ हो सकते हैं और वह कैसे इतने कष्टदाई हो सकते हैं! वे इस हद तक कुटिल, अजीबोगरीब, कष्टदाई हो सकते हैं कि कभी-कभी क्षमा करना तक कठिन हो जाता है।

इसके बावजूद, आप में से बहुत सारे लोग आज यहां, यूरोप में, गुरु की धरती पर, मुझे मिले जिन्होंने साक्षात्कार प्राप्त किया है। इसलिए, निसंदेह इस विषय में मां के गर्व और मां की प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं है। यह देखना इतनी बड़ी बात है, कि उनके बच्चे यहां उनसे समस्त शक्तियों को ग्रहण करने के लिए बैठे हैं। अब, दोबारा जब हम इस स्थिति में है, हमें पहला सिद्धांत जानना है जिसके साथ संपूर्ण चीजें प्रारंभ होती हैं- यह प्रेम की शक्ति है। यह प्रेम की ही शक्ति है, जो आपको इस स्थिति तक लाई है और यह प्रेम की शक्ति है जिसे आप अभिव्यक्त करेंगे, प्रकट करेंगे और आप विकसित होंगे।

अब, सहज योग में आने के बाद भी लालसाएं बढ़ती जाती हैं। कभी-कभी जो शक्तियां हमें प्राप्त है, उनके लिए हम सहज योग करने का प्रयास करते हैं, हम सहजयोग को फैलाने का प्रयास करते हैं। संभव है कि आप अकेले हो इसलिए आप और सहज योगी चाहते हों। हो सकता है कि इससे आप इसलिए करते हो कि आप सोचते हैं ,कि कैसे आप अपनी शक्तियों को फैलाएं। यहां तक कि नेतृत्व में भी समस्या है, मैं पाती हूं, वहां अहंकार की समस्याएं हैं। किसी व्यक्ति को एक अगुआ नियुक्त किया गया तो दूसरा बुरा मान जाता है, यह, वह सब चलता रहता है। मैं देखती हूं कि नाटक चल रहा है। छोटे बच्चों की तरह वे लड़ते हैं। यह नेतृत्व क्या है? क्या केवल बनावटी! यह किसी समाचार पत्र में तक नहीं छपता है जैसे उनके पास दिखावटी सरकारी हैं, हमारे पास दिखावटी नेतृत्व है। इसलिए जब लोग उसके लिए लड़ते हैं- यह सूक्ष्म हो जाता है। शक्ति संघर्ष सूक्ष्म होता चला जाता है।

तब पुन: धन की समस्या आती है। कुछ लोग सोचते हैं कि सहज योग पैसा बनाने का बहुत बड़ा जरिया है। या कुछ लोग सोचते हैं कि हम बहुत धन प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि मां लोगों को धन संपदा से आशीर्वादित करती हैं, इसलिए हम सहजयोग में रहें‌, लेकिन एक भी पैसा खर्च करना नहीं है। आप देखिए, काम चलाना है। नहीं! ऐसा नहीं है,यह ऐसा नहीं है। इसके विपरीत है। फिर से यह दूसरी दुविधा है कि भारत में, जो आपके देश की तुलना में गरीब देश है, प्रत्येक व्यक्ति दान देता है। प्रत्येक केंद्र में जहां कहीं भी ट्रस्टी हैं, उन्हें कम से कम ₹5000 ट्रस्टी बनने के लिए दान देने पड़ते हैं। निश्चित ही, मुझे इसमें कुछ लेना नहीं है। लेकिन मुझे नहीं मालूम कि मैंने कितने सहज योगियों के ट्रस्टी बनाने के लिए कैसे और कितना धन स्वयं लगाया है। लेकिन आप को दान करना ही होगा। और जब आप पुन: कंजूसी करते हैं, तो इसका अर्थ है कि फिर से वही सब चीजें चलने लगती हैं। आपके पास बैंक राशि है लेकिन स्रोत समाप्त हो गए हैं और आपके पास कुछ भी बचा नहीं है। बैंक शेष ईश्वर के साथ होना चाहिए। तब वह मूलधन से अधिक ब्याज देता है। क्या कोई बैंक ऐसी है जो ऐसा करती है? कम से कम वह स्विस बैंक तो नहीं है! आपको उसमें पैसा रखने के लिए भुगतान करना पड़ता है। यह ऐसा कैसे है? आपको इसका लाभ उठाना चाहिए। सदैव स्रोत की ओर जाने का प्रयास करना चाहिए। यह इस अर्थ में सूक्ष्म से सूक्ष्म हो जाता है कि लोग सोचते हैं कि अब उनके बच्चे साक्षात्कारी आत्मा बन गए हैं। ठीक है, तो क्या? वे भगवान नहीं हैं, क्या वे हैं? वे अपने बच्चों में इतना आसक्त हो जाते हैं, मेरा मतलब है, यह दूसरी मूर्खता महिलाओं में होती है। लेकिन उनके लिए उनका बच्चा इतना महत्वपूर्ण होता है, कि वे बच्चे के प्रति बहुत आसक्त हो जाते हैं। मेरा अभिप्राय है, पहले वे बच्चों, की उपेक्षा करते हैं, कि बाद मे अपने बच्चों के प्रति इतने आसक्त हो जाते हैं कि हर समय अत्यन्त लिप्त लोगों की तरह दिखाई पड़ते हैं।

और इस तरह के बच्चे पूर्णतया तब तक विकसित नहीं हो सकते जब तक आप उन्हें पूरी आजादी नहीं देते । उन्हें विकसित होने के लिए पूरी स्वतंत्रता दीजिए। लेकिन मार्गदर्शन, वास्तविकता में, क्योंकि वे शानदार लोग हैं अर्थात् सहज योगी, वे जन्मजात साक्षात्कारी सहज योगी हैं, एक अच्छे सहज योगी के रुप में उन्हें कैसे व्यवहार करना चाहिए। सामंजस्य रखिए, उनसे बात करिए, अब आप उन्हें यह बताइए कि उन्हें कैसा होना चाहिए। उनके अंदर उस आत्मसम्मान को विकसित कीजिए कि उन्हें इस तरह होना चाहिए। उन्हें आपसे आसक्त नहीं होना है। यह वह तरीका नहीं है। बच्चे, यहां तक की शारीरिक रूप से भी, पूर्णतया कभी विकसित नहीं होंगे, अगर आप उन्हें अपने से चिपकाए रखेंगे।

पश्चिम में अब नई विचारधारा प्रचलित होती देख रही हूं कि बच्चे को मां से चिपके रहना चाहिए। यह एक अतिशयता से दूसरी अतिशयता पर जाने जैसा है। वे बहुत बाईं और चले जाएंगे। वे चाहे उम्र में बड़े हो जाएंगे, लेकिन मस्तिष्क से बड़े नहीं होंगे। वे अपने आचरण में भी बड़े नहीं होंगे, अगर वे अपनी मां से चिपके रहेंगे। अगर वे थोड़ी देर, थोड़ा बहुत रोते भी हैं, कोई बात नहीं, लेकिन बच्चे को मां से दूर ही सुलाना चाहिए। पूरे समय अपने बच्चे को गोद में उठाकर न रखें। इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन, इसे बच्चा नहीं चाह रहा है, यह मां ही खुद करना चाहती है, और कुछ पिता भी, मैंने देखा है, अपने बच्चों से चिपके रहते हैं और फिर कहते हैं कि “मदर, मेरा बच्चा बिगड़ गया है। यह ऐसा है, वह वैसा है।” ऐसे बच्चे बहुत जल्दी भूत ग्रस्त हो जाते हैं, अगर तुम बच्चों को अपने ऊपर आश्रित बनाओगे। बहुत जल्दी वे भूत ग्रस्त हो जाएंगे।

अगर आप उन्हें अति स्वतंत्र बनाएंगे, ”तुम अब आत्मनिर्भर हो” तो दूसरा पक्ष देखा गया, कि जब हम ऑक्स्टेड मे थे, एक सात साल की बच्ची हमें अखबार देने आती थी, और वह एक लॉर्ड की बेटी थी ! सुबह लगभग पांच बजे, उस ठंड में, अपनी साइकिल पर चढ़कर, सब जगह अखबार पहुंचाती थी। और जब मैंने उसकी मां से कहा, “तुम यह क्या कर रही हो? या बहुत खतरनाक है। यह बच्ची खतरे में है, यह एक लड़की है, तुम इसके साथ ऐसा कैसे कर सकती हो ?” उसने कहा, “नहीं, नहीं, इसे स्वावलंबी होना चाहिए।“

इसलिए एक और है उसका आत्मनिर्भर होना और दूसरी ओर है इन्हें चिपकाना, यह भी उसी प्रकार का एक सूक्ष्म अपनत्व/अधिकार की भावना है। “यह मेरा बच्चा है, मुझे ही इसकी देखभाल करनी है।“ यह बच्चा एक आत्मसाक्षात्कारी है, यह, वह । केवल आपका बच्चा ही आत्म साक्षात्कारी नहीं है, सहज योग में सभी के बच्चे आत्मसाक्षात्कारी हैं।

आप दूसरों के बच्चों के लिए कितना करते हैं? या केवल अपने ही बच्चों की देखभाल करते हैं। प्रथा तो यह होनी चाहिए कि अगर आप एक चीज अपने बच्चों के लिए खरीदते हैं तो दो और चीजें किसी दूसरे बच्चे के लिए खरीदें। दूसरे बच्चों के लिए आप बेहतर चीजें खरीदें और अपने बच्चे के लिए कम चीजें। आप अपने बच्चों को उसकी चीजें दूसरों के साथ साझा करवाएं। जब आप कोई वस्तु खरीदते हैं तो ऐसी चीजें खरीदें जो बच्चे मिल बांट सके। उसे मिल-जुल कर बांटना सिखाएं । क्योंकि, यद्यपि वे आत्म साक्षात्कारी आत्माएं हैं लेकिन ऐसे माता और पिता के साथ रहकर वह फिर से वही पुरानी शैली के दयनीय लोग बन जाएंगे: झगड़ालू, लड़ते, एक दूसरे को मारते एक दूसरे को परेशान करते। इसलिए इससे सावधान रहें। क्योंकि वे आत्मसाक्षात्कारी हैं। आपको आश्चर्य होगा, वे आपके लिए अत्यधिक सुविधाजनक होंगे। आप उन्हें दूसरे सहजयोगियों के पास नियंत्रण संभालने के लिए भेज दें उन पर भरोसा करें, इन्हें उनकी देखभाल करने दें। सब एक जैसे हैं । होने की अनुभूति बच्चों के माध्यम से आती है। बच्चे ही वे है जो एक दूसरे को बांधते हैं।

लेकिन,” मेरे बच्चे को मत छुओ। यह मेरा बच्चा है”। जैसे ही कोई व्यक्ति अंदर आता है आप दरवाजा बंद कर लेते हैं। इसी प्रकार से आप पीछे की ओर जा रहे हैं जैसे आपकी माताएं रही हैं। सहज योग में कोई युद्ध नहीं चल रहा है। हम ईश्वर के साम्राज्य में हैं। यह साक्षात्कार होना ही है। इन व्यर्थ की चीजों, जीवन के इन सुखों को मांगने की कोई आवश्यकता नहीं है।

अपनी जिम्मेदारियों को समझें कि आप प्रारंभ में, मध्य में और अंत में सहयोगी हैं, और एक सहयोगी के रुप में आप का क्या कर्तव्य है? दूसरों की अच्छाई और भलाई के लिए पूर्णतया समर्पित होना है। यही एक मात्र चीज है जो आप के उत्थान में आपको पोषित करने वाली है। यदि आप अपने बच्चों की देखभाल इस प्रकार करते हैं, पागल की तरह, यह आपकी सहायता नहीं करने वाला है। आपको समस्याएं हो जाएंगी। अगर आप अपने बच्चों की उपेक्षा करते हैं तो आपको समस्याएं होंगी। इसलिए मध्य में रहिए। और इन सभी के केवल साक्षी बनें। प्रत्येक सहजयोगी, जो सहजयोग में आता है, प्रारंभ में उनकी एक सामान्य दुर्बलता होती है, वे इस तरफ की पांच पीढ़ियों की और उस तरफ की पांच पीढ़ियों की सूची भेजेंगे-मेरे पिता, भाइयों, बहनों, यह चीज, वह चीज, सगे चचेरे भाई सब बीमार है। तो कृपया मां, अपना चित्त डालें। और जब मैं अपना चित्त डालती हूं चित्त वापस आ जाता है वह मैं नहीं समझ पाती हूं। शुरुआत मे यह सब ठीक है-से प्रारंभ होता है। ठीक है, प्रारंभ में मैं कहती हूं,”ठीक है अभी ही इन्होंने प्रवेश किया है।“ लेकिन आप नहीं जानते हैं कि यह जाल है जो आपको नीचे गिरा देते हैं। वे आपको ईश्वर के साम्राज्य में ऊपर उठने की अनुमति नहीं देते हैं। ईश्वर के साम्राज्य में, प्रत्येक वस्तु जो आपकी है, यहां तक की आपके बाल, सर्वशक्तिमान परमात्मा द्वारा देखभाल किए जाते हैं। हर चीज! क्या यह आप समझ सकते हैं? क्या यह आप अनुभव कर सकते हैं? यह आदिशक्ति की अरबों और अरबों और अरबों शक्तियों के द्वारा क्रियान्वित होते हैं। आप स्वयं क्या कर सकते हैं? केवल चिंता करने और परेशान होने के सिवा।

यदि आप विश्वास कर सकें और उस शक्ति को अपना सकें कि आप परमात्मा के साम्राज्य में हैं, जो कि सक्रिय परोपकार है, उसका स्वभाव सक्रिय हित है या हम कहें -हित। अगर आप अस्वस्थ हैं वह भी आप का हित है। अगर आप स्वस्थ हैं, वह भी आप का हित है। अगर आपके पास धन है तो यह भी आप का हित है और अगर आपके पास धन नहीं है, यह भी आप का हित है। प्रत्येक परिस्थिति आपके लिए अच्छी है, ईश्वर के साम्राज्य में, आप अपने मापदंड से उसे न मापे । आप किस को हितकारी मानते हैं, इस दुनिया में, मेरे अतिरिक्त? सच में, इस शब्द के सही अर्थ में।

अगर आप किसी बहुत अमीर आदमी का उदाहरण लेते हैं, क्या वह परोपकारी है? नहीं’ क्या वह खुश है? नहीं! क्या वह आदरणीय है? नहीं। इस वर्णन के लिए के आसपास होने के लिए उसे एक आत्मसाक्षात्कारी व्यक्ति होना चाहिए। और यदि आपको परमात्मा के साम्राज्य में स्थान प्राप्त करना है तो आपको यह ज्ञात होना आवश्यक है कि सब कुछ ईश्वर की शक्ति द्वारा ही संचालित है। आप की क्रिया, आपकी निष्क्रियता, आपकी निद्रा और सभी कुछ संचालित होता है, उनकी प्रेम शक्ति के द्वारा। प्रेम कभी भी हानि नहीं पहुंचा सकता और ना ही या नष्ट कर सकता है। अगर आप इसके थोड़ा भी साथ चलें तो यह आपके ऊपर पुष्प वर्षा करता है।

लेकिन अपने स्वभाव को समझिए, यदि आप बाईं ओर के प्रभावित व्यक्ति हैं। अधिकतर मैंने पाया है कि बाई तरफ वाले लोग सदैव मेरी पूजा करने के लिए इच्छुक रहते हैं और दाएं तरफ वाले लोग संचालन/प्रबंध छोटा नहीं है करने की इच्छा रखते हैं। आप इसके विपरीत करें। अपने स्वभाव को पहचानिए, स्वयं को संतुलन में रखिए और तब ईश्वर के साम्राज्य में प्रवेश करें। मानो आप एक द्वार में प्रवेश कर रहे हैं, उदाहरण के लिए आप अपनी पीठ पर बहुत भारी सामान उठाए हैं, इसका अभिप्राय है कि आप बाईं ओर वाले व्यक्ति हैं, तब आप अपनी पीठ से बोझ हटा कर सर पर रख ले और अंदर आएं क्योंकि आप थक गए हैं। आप प्रतिदिन ऐसा करते हैं। यदि आपका यह हाथ थक जाता है तो उसे बाएं हाथ पर रख लेते हैं। मैं देखती हूं कि हवाई जहाज में जब लोग एक हाथ में लेकर चल रहे होते हैं, तो थकने पर वे स्वत: उसे बाएं हाथ में ले लेते हैं-स्वत:। वे सहजयोगी नहीं हैं। इसी प्रकार जीवन में भी आपने यदि एक तरफा कार्य अत्यधिक कर लिए हैं, तो अब दूसरी तरफ के कार्य करें और अपने को संतुलित करें।

नवरात्रि का दिन आपको संतुलन देता है। जिनका दाया हाथ थक जाता है, उनको बाएं हाथ में शक्ति मिलती है। जिनका बाया हाथ थक जाता है -उन्हें दाएं हाथ पर शक्ति मिलती है, उस भार को बांटने की। इसलिए जिनको धन की समस्या है, वह पैसे की समस्या का समाधान करें और जिनकी नींद की समस्या है, वह अपनी नींद की समस्या का समाधान करें। लेकिन कोई कह सकता है, यदि किसी को यह दोनों समस्याएं हैं, तब उसे क्या करना है। मैं कुछ लोगों को जानती हूं, मैं वहां रहती थी, उस देश में जहां उन्हें दोनों समस्याएं हैं, वह उतना ही सोते हैं उनके पास धन भी नहीं है और वे चिंतित नहीं है ! इसलिए ऐसे लोगों के लिए हमें क्या करना चाहिए? बेशक, मैं आपको नहीं बताऊंगी, लेकिन किसी को इस विषय में कुछ करना होगा। किसी को कुछ करना है।‌ अगर आप उनसे कहते हो तो वह हिलेंगे नहीं, उत्तर होगा, “मैं जानता हूं। मैं जानता हूं मैं बहुत सोता हूं, मैं जानता हूं मैं इस प्रकार का हूं। मैं जानता हूं। मैं जानता हूं।” यह सब। तब आप क्या कहते हैं? यह आपको पूरी तरह रोक देता है। आप आगे नहीं जा सकते । यदि वे जानते हैं तो इसके आगे क्या कहना? वहां पर यह एक संपूर्ण पर्वत आपको पूरी तरह से समाप्त कर देने के लिए खड़ा है।

तो इसे करना ही होगा। प्रत्येक व्यक्ति को कुछ तो करना ही होगा। कोई व्यक्ति कार्य को सुनियोजित कर रहा है, कोई व्यक्ति कोई सा काम कर रहा है, और दूसरा व्यक्ति मदद भी नहीं कर रहा है। तो वह कार्य संपन्न नहीं होगा, यह एक सामूहिक कार्य है, आप उसे अकेले नहीं कर सकते। मैंने ऐसा होते हुए देखा है। यह एक सामूहिक कार्य है।

हम आज की स्थिति में देखें कि आज नवरात्रि है और यह केवल मां का कार्य नहीं है जो आज तक उन्होंने किया, यह कार्य तो आप सभी का है। मैं इससे अकेले नहीं कर सकती, अगर मैं कर सकती होती तो आपके यहां होने की कोई आवश्यकता नहीं थी, एक हवाई जहाज बनाती, उसमें तुम्हें बैठाती, और जैसे भी संभव होता, बैठा कर, उसे ताला लगा कर तुमको वहां भेज देती। यह संभव नहीं है। आप सबको अपने अपने जहाज उठाने होंगे। उन्हें निर्माण करके, उन्हें सम्मान से उठाना है, छोटे बच्चों की तरह नहीं। अब आपको परिपक्व होना है, और उस परिपक्वता को पाने के लिए सामूहिक होने की आवश्यकता है। आरंभ में विद्यालय में सिखाया जाता है कि दो और दो चार होते हैं। लेकिन जब आप कॉलेज जाते हैं ,तो आपको इसे स्वयं ही करना होता है, समस्या का स्वयं ही समाधान करना होता है। और आज वही हो रहा है। सहज योग अच्छा है, आपको इस आधुनिक काल में आत्म साक्षात्कार की प्राप्ति होती है, परंतु परिपक्वता पाना आवश्यक है, अन्यथा यह व्यर्थ है। बीज की स्थिति तक तो ठीक है, लेकिन एक बार जब वह अंकुरित हो गया तो उसका वृक्ष बनना अनिवार्य हो जाता है, नहीं तो यह बेकार है। इसलिए आप सबको मिलकर करना है, एक दूसरे की मदद करते हए, एक दूसरे को समझाते हुए। सबको मिलकर हल निकालना होगा। अगर एक भी व्यक्ति व्यथित होता है, तो मैं भी व्यथित होती हूं। सारी वस्तुएं सामूहिक हो गई हैं। देवी भी सामूहिक हो गई हैं। यह एक उद्यम है। यह एक उद्यम है, मैं इसे भली-भांति जानती हूं। कोई और विकल्प नहीं है। यह आपके शरीर के प्रत्येक अंग, शरीर की प्रत्येक कोशिका के सूली पर चढ़ने के समान है। लेकिन यह भी ठीक है।

तो आज आप अपने को दोषी अनुभव करने की अपेक्षा अपने अंदर अत्यधिक साहस व अत्यधिक उत्साह की अनुभूति करें, कि हमें ऐसा करना है। मां ने हमें शक्तियां प्रदान किए हैं। हम इसे कर सकते हैं, कोई भी हमें हतोत्साहित नहीं कर सकता। और हम एक दूसरे की सहायता करने जा रहे हैं।

एक व्यक्ति एक कार्य कर रहा है, कोई भी उधर नहीं देखता, वे जरा सा भी नहीं हिलते,”मैं जानता हूं, मैं बैठा हूं, मैं जानता हूं। मैं कुछ नहीं कर रहा हूं, मैं जानता हूं। “सहज योग में यह तो और भी सूक्ष्म हो गया है,” मैं करना चाहता हूं, लेकिन मेरे अंदर भूत बैठा है जो मुझे इसे करने नहीं देता।“ तो तुम अपने भूत के साथ यहां से बाहर निकल जाओ! यही ठीक होगा। ये सारे तर्क मूर्खता हैं, इसका सहज योग में कोई मूल्य नहीं है। इसका तात्पर्य है कि आपने सहज योग का अर्थ ही नहीं जाना, अपने आप का भी अर्थ नहीं जाना, और आपको अपने जीवन के प्रति कोई सम्मान नहीं है। यही बात है। अगर आप इस प्रकार की विचारधारा से लिप्त है तो यह अच्छा नहीं है।

तो आज आपको अपने को वचन देना होगा, और मुझे भी, कि आप अपने हृदय को भीतर तक उस उत्साह और शक्ति से भर लेंगे। समय आ गया है जो आपको सच्चा योगी बना देगा। समग्र समर्पण। कल्पना कीजिए यह फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन के लोग, वे लोग निडरता पूर्वक क्या कर रहे हैं। मेरा तात्पर्य है, हर प्रकार के लोग जो आपके चारों तरफ दिखते हैं, यहां तक कि कलयुग में, कई मूर्खतापूर्ण चीजों के प्रति कितने समर्पित हैं।

तो हम लोग इतनी सार्थक जिसके लिए क्यों नहीं समर्पित हो सकते? वह किसी से नहीं डरते हैं, वे दु:साहसी हैं। हम उस तरह क्यों नहीं बन सकते? हमारे में क्या कमी है?

अतः हम सभी में यह उत्साह होना चाहिए” मैं स्वयं एक संस्था हूं। और मैं यह करने जा रही हूं, मैं आश्रम के जीवन का लाभ उठाने नहीं जा रही हूं, अच्छी तरह से आश्रम में बस गई हूं। बहुत अच्छा, सस्ता।” नहीं! हम सब भी बाहर जा रहे हैं वहां कहीं और स्थान बना लेंगे । तब तक के लिए आश्रम ठीक है परंतु दूसरों को अधिक स्थान दें जो आ रहे हैं। आप इससे बाहर निकलिए। कहीं और रहिए और इसका हल निकालिए। उसके बाद आश्रम में “यह मेरा घर है, मैंने इसके लिए पैसे खर्च किए हैं, यह मेरा फर्नीचर है, यह, यह वस्तु है, यह, वह वस्तु है।” वास्तव में, यह आपको ज्ञात होना चाहिए कि कैसे एक धागे पर में रहना है, जूते के फीते (छोटे परिमाण), जैसा कि वे कहते हैं, एक जूते के फीते पर। 

निसंदेह, अब मुझे एहसास हो रहा है कि कई आश्रमों में बहुत सारे फर्नीचर हैं जो उन्हें लाने थे, अच्छा है कि आप अभी जूते के फीते में रहे।

अतः तपस्या प्रारंभ होती है। स्वयं तपस्या करिए। परंतु तब मैं सुनूंगी, ”मां मैं तपस्या में हूं, मैं केवल एक बार भोजन करता हूं।“ क्यों? कौन आपको तपस्या करने के लिए कहता है? आनंद कीजिए! अपनी तपस्या का आनंद उठाइए! तब तो यह सहज योग है अन्यथा निरर्थक है। आनंद उठाइए। यदि आप अपनी तपस्या का आनंद ले सकते हैं तो आप उत्साह के साथ सहज है। इन पीएलओस की तरफ देखिए, इन लोगों की तरफ देखिए, क्या वे कहते हैं,”हम एक तपस्या में जा रहे हैं, कुछ नहीं!” आपके आसपास के लोगों का उदाहरण है । परंतु हम यह नहीं कह सकते हैं कि उन पर भूतों का अधिपत्य है। अथवा भले ही वे खुद है, आपका क्या? परिवर्तन के लिए बेहतर है कि सहज भूतों का आप पर अधिपत्य हो यही केवल एक मार्ग है, जिससे आप प्रेरित हो सकते हैं।

तो अपने मस्तिष्क से कहिए,” कोई स्पष्टीकरण नहीं, इससे काम नहीं चलेगा। मैं अपना सामर्थ्य दिखाने जा रहा हूं/जा रही हूं।” परंतु हर समय अगर आप का चित्त केवल दिखाने के लिए, या मेरा ध्यान आकर्षित करने के लिए या मेरे संपर्क में रहने के लिए, मुझे लिखने के लिए या कुछ और करने के लिए है, यह बिल्कुल आपकी सहायता करने वाला नहीं। मैं सिर्फ एक दर्पण हूं और आप मेरे भीतर, अपने आप को, सच्चे रूप में देखें। और यह दर्पण भी माया से भरा है। अतः एक शैतान इस आईने में देख सकता है व स्वयं संत प्रतीत हो सकता है। यदि उसमें अहंकार है तो वहां खुद को संत के समान प्रतीत हो सकता है। या अगर वह एक बाईं ओर झुका व्यक्ति है, वह सोच सकता है कि वह भैरव का अवतार है- वह हो सकता है। लेकिन यदि वह सच्चा है वह स्पष्ट रूप से देख सकता है कि वह सर्वोच्च है, वह एक सहजयोगी है। और जब तक आप स्वयं को इस तरह से नहीं देखते, ज्ञात होना चाहिए कि यह एक माया है।

यह महसूस करने के लिए कि आपने अपने साक्षात्कार को प्राप्त करके बहुत कुछ हासिल कर लिया है और आप इन सभी छुद्र विचारों से बहुत ऊपर उठ गए हैं। हर विचार तुच्छ है, चाहे वह अर्थशास्त्र हो, राजनीति, दर्शन, कोई भी वाद , सहज योगी के लिए सभी तुच्छ है, क्योंकि उनमें से कोई भी ईश्वर के साम्राज्य के विषय में इतना भी नहीं जानता।

वे जिस बारे में बात कर रहे हैं,वह अर्थशास्त्र है। वे उनकी राजनीति के बारे में कुछ भी नहीं जानते। वे कुछ भी नहीं जानते कि एक दिव्य शक्ति है जो पूरे ब्रह्मांड पर शासन करती हैं और जो इतनी कुशल है। जो कभी असफल नहीं होती। इतनी सामायिक, इतनी समझदार, इतनी रोचक, नाटकीय। देखिए, कैसे इतने कम समय में हमने इन सभी को आरक्षित (प्रबंध) किया हमने इस जगह को कैसे पाया, मुझे यहां यह पूजा करनी थी। यह सब आप जानते हैं, मैं यहां कैसे आई।

चमत्कार को कार्यान्वित होते हुए देखिए। दैवीय शक्तियां कैसे कार्य करती हैं। आप परमात्मा के उचित माध्यम हों। इनके पास एक और बल है, जैसा मैंने आपको बताया – केंद्राभिमुख और अधिकेंद्रीय- और आपको बाहर फेंका जा सकता है। उस बिंदु पर सतर्क रहें। स्वयं का सामना सत्यता में करें। अपने अहंकार के द्वारा उदासीन मत हो या अपने प्रति अहंकार के द्वारा दुखी मत हो।

बस अपने आप को प्रेम के एक शक्तिशाली माध्यम के रूप में देखें,परंतु प्रेम में आप अविवेकपूर्ण ना बनें। स्थिर रूप से, खूबसूरती से, धीरे-धीरे आप इसमें शामिल होंगे। और इतनी शक्ति उत्पन्न हो सकती है, आप आश्चर्यचकित होंगे कि जल, जो हमें तुच्छ सा प्रतीत होता है, इसमें इतनी अधिक शक्ति है। आप हाइड्रोस्टेटिक्स (द्रवस्थैतिक)के बारे में जानते होंगे।

धरती माता जो इतनी सरल दिखती हैं, उनके ऊपर हम अपने पैरों से चलते हैं। वह हमें अपनी ओर आकर्षित करती हैं। वह स्वयं इतनी तीव्रता से चक्रण कर रही हैं, वह हमें स्वयं से चिपका कर रखती हैं। वह हजारों- हजारों अद्भुत कार्य कर रही हैं, यह महान धरती मां इतनी सरल दिखती हैं। वह बहुत शक्तिशाली हैं। इसी प्रकार से आप इस गणेश तत्व से बने हैं जो इतना अद्भुत है।

इस नवरात्रि आपको वह शक्ति प्रदान की जानी चाहिए, नौ चक्रों की ये नौ शक्तियां। सात चक्र तो आपको पहले से ही ज्ञात हैं। जिसके ऊपर आप स्वयं गुरु बन जाते हैं, और तब आप स्वयं ही शक्ति बन जाते हैं।

परमात्मा आपको आशीर्वादित करें।