Diwali Puja

Tivoli (Italy)

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                                                दीवाली पूजा

 टिवोली, रोम, 17 नवंबर 1985

आज हम यहां एकत्रित हुए हैं; दिवाली, दीपावली मनाने के लिए। दरअसल सहज योग शुरू होने के बाद ही, असली दिवाली आकार ले रही है। हमारे पास कई खूबसूरत दीपक थे और हमारे पास जलाने के लिए बहुत सारा तेल था। परंतु दीपों को रोशन करने के लिए कोई चिंगारी नहीं थी। और बत्ती जैसा कि आप इसे कहते हैं, हिंदी भाषा में बात्ती कहा जाता है- आपकी कुंडलिनी की तरह है। इसलिए कुंडलिनी को चिंगारी से मिलना था। सभी सुन्दर दीपक बेकार, उद्देश्यहीन, व्यर्थ थे। और यह आधुनिक समय में महान आशीर्वाद हैं, कि इतनी सारे दीपक प्रकाशित हो गए हैं, और हम मानव हृदयों की दीपावली मना रहे हैं। जब आप प्रकाश बन जाते हैं, आप दीपक के बारे में चिंता नहीं करते हैं, यह कैसा दिखता है, इसे कैसे बनाना है, यह सब हो गया है। आपको केवल लौ की, तेल की चिंता करनी है, क्योंकि वह तेल है जो जलता है और प्रकाश देता है।

संस्कृत भाषा में – जो देवताओं की भाषा है – तेल को ‘स्निग्धा’, ‘स्निग्धा’ कहा जाता है; कुछ ऐसा जो नरम है लेकिन स्निग्धा है। और ‘स्नेहा’ का अर्थ है प्रेम की दोस्ती’, और अन्य भाषाओं के कवियों ने इस शब्द का इस्तेमाल अलग-अलग तरह से ‘नेहा’ कहकर किया है। उन्होंने इस प्रेम का गुणगान किया है।

हर कवि, हर संत ने अपने सुंदर काव्य में इस शब्द का प्रयोग किया है, चाहे वे वियोग में थी या वे मिलन में थी, योग में, एकीकरण में। यह प्रेम ऐसी वस्तु है जो प्रकाश प्रदान करती है। यदि यह तेल शुद्ध नहीं है – दूषित है, तो आपको धुआँ मिलता है। किन्तु शुद्ध है, तो यह बिना किसी धुएँ के चमकदार रोशनी देता है। किन्तु जब यह तेल सुगंधित होता है तो प्रकाश भी सुगंध देता है। तेल विभिन्न चीजों से बनाया जाता है। वह एक जो धरती माता से आता है उसका उपयोग नहीं किया जा सकता क्योंकि वह बहुत भौतिकवादी है, वह कार्बन देता है। जैसे पेट्रोल, मिट्टी का तेल- वह वातावरण को प्रदूषित करता है। फिर जो पशुओं से आते हैं, जो, उनमें से कुछ, भारत में बहुत पूजे जाते हैं, उनके पास एक विशेष प्रकार की स्निग्धा है, या हम उसे घी या तेल कह सकते हैं, जो एक प्रकाश दे रहा है, जो बहुत सुखदायक और शांतिपूर्ण है।

तो जब पदार्थ पशु अवस्था में विकसित होता है, तेल भी विकसित होता है। लेकिन जब इस तेल को संत के चरणों में मला जाता है, वह सुगंध को प्राप्त करता है। उसी प्रकार यदि इस तेल को फूलों के संपर्क में लाया जाए तो यह सुगंध देता है। तो संत के चरण वृक्ष के फूलों के समान होते हैं। और जब फूल जमीन, धरती माता पर गिरता है, वह इतना नाजुक हैं, वह इतना बुद्धिमान है, वह उन्हें चोट नहीं पहुंचाता। वह बड़ी श्रद्धा के साथ गिरता है, एक महान श्रद्धांजलि के रूप में, धरती माता पर।

उसी प्रकार एक संत को भी कोमल होना चाहिए, कोमल जिस प्रकार, इस पृथ्वी पर चांदनी पड़ती है। यह वह प्रकाश है जिसमें कोई जलन नहीं, झुलसन नहीं। व्यक्ति को उस नम्रता को विकसित करना है, उस तेल से, जो आपके दिल में प्यार है, जो हर चीज को चिकनाई देता है, जो घर्षण(रगड़) को खतम करता है, और शांत करता है। आपने देखा होगा किस प्रकार प्रकृति  प्रतिक्रिया करती है। हम कभी भी फूल को खिलते नहीं देखते, हम कभी भी फल को फूल से निकलते नहीं देखते। यह इतना कोमल है और इतना धीमा है कि इसकी गति को मानव आंखों से नहीं देखा जा सकता। क्योंकि प्रकृति चाहती है, आप गति से परेशान ना हो। प्रकृति परवाह करती है, इसलिए आप लोग उतक्रांति के विकास, गति और विस्फोट को महसूस नहीं करते । या हम कह सकते है, प्रकृति के अपने व्यवहार की गति को। उसी तरह एक संत, एक सहज योगी को सहजयोगियों के समाज में बहुत सहजता से चलना पड़ता है। यह सहजयोगियों के साथ है, मैंने कहा; गैर-सहजों के साथ नहीं। प्रकृति किसी भी चीज पर प्रतिक्रिया करती है जो विदेशी है। यह बाहर फेंक देती है जो कुछ भी सहज नहीं है। उसी तरह, संत को कुछ भी स्वीकार नहीं करना चाहिए, वस्तु, व्यक्ति जो सहज व्यवहार के अनुरूप नहीँ है। जब यह जड़त्व के संपर्क में आता है, जड़वादी लोगों के संपर्क में, तब वह अत्यंत विवेक के साथ कार्यान्वित होता है, जड़ की नोक के समान। यह ऐश्वर्य के साथ चलता है, खुद को पृथ्वी माता में समाहित कर लेता है, सभी कठोर चट्टानों के चारों ओर घूमते हुए, और उन्हें एक साथ पकड़ कर, यह पेड़ को सीधा खड़ा कर देता है।

जीवन की निशानी यह है कि वह जड़त्व के विरुद्ध जाता है, वह जो जड़ है। जैसे वृक्ष गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध जाता है; जैसे महान मनुष्यों ने अपने शरीर को गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध सीधे मुद्रा में उठा लिया हैं। उसी तरह, यदि आप देखें लौ गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध जाती है।

किसी ने नहीं सुना होगा अग्नि को ऊपरी मंजिल से भूतल की तरफ जाते हुए। वह भूतल से शुरू होती है और ऊपर की ओर जाती है। लेकिन अग्नि भी उस पदार्थ से आती है जो जल रहा है। तो पदार्थ को जलाना ही होगा, अगर आपको उठना है। यदि आपका चित्त हर समय तुच्छ चीजों की ओर, जड़वादी चीजों पर, भौतिक सुखों की ओर हैं, आप उठ नहीं सकते। आप कितना भी ध्यान कर सकते हैं, मेरे फोटोग्राफ्स का उपयोग कर सकते हैं, मेरी पूजा में आ सकते हैं, लेकिन अगर आपका चित्त जड़ा हुआ है, वह ऐसा है जैसे आप एक मगरमच्छ पर खड़े होकर नाव पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।

अब, इसका मतलब यह नहीं जब लौ जलती है, तो वह पदार्थ छोड़ देती है, लेकिन वह निर्लिप्त हो जाती है और उसे जला देती है। तो यह शरीर, यह मन, यह अहंकार, यह प्रति-अहंकार को पूर्णता जलना है, इस लौ को हर समय जलाये रखने के लिए।

आपको कुछ भी त्यागना नहीं है,  लेकिन उसी चीज़ का उपयोग करना है, उच्च जीवन के लिए, और यही है जो हर सहज योगी का लक्ष्य होना चाहिए।

वास्तव में साक्षात्कार प्राप्त करने के बाद, आप बस अनायास ही देना शुरू कर देते हैं क्योंकि आप प्रकाश हैं। लेकिन सम्मान करें, अपने प्रकाश का और दूसरों के प्रकाश का। अंधेरा बहुत है, और हमें इस अंधेरे को दूर करने के लिए बहुत सारी रोशनी चाहिए। इन रोशनीयों को बनाए रखना है, देखभाल करनी है, प्यार करना है।

जैसा कि आप अच्छी तरह से जानते हैं, मैं इसे अकेले नहीं कर सकती। उदाहरण के लिए बिजली का स्रोत, यदि आप इसको जलाने के लिए काम लेते हैं, एक बड़ा विस्फोट हो सकता है। इसे विभिन्न बल्बों में जाना पड़ता है, एक अच्छी, फैली हुई रोशनी देने के लिए। और आप माध्यम हैं, आप ही हैं जो मुझे अभिव्यक्त करने वाले हैं। मैं तो केवल संभावित ऊर्जा हूँ, क्योंकि ऊर्जा कहीं से आ रही है जो संग्रहीत है और अगर मैं आपसे पूछूँ, आपको पता भी नहीं होगा यह कहां संग्रहीत है।

यह आपके व्यवहार से, आपके शुद्ध प्रकाश से, आपकी सुगंध से, लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर को जानेंगे। कुछ ऐसे हैं, जो चेहरे को काला कर सकती हैं; वे रोशनी हैं, इसमें कोई शक नहीं। परंतु चेहरे को काला कर सकती हैं,  यदि अशुद्धियां हैं। परमात्मा के चेहरे को काला करती हैं, आपके निर्माता के चेहरे को काला करती हैं,  और यही है, व्यक्ति को सावधान रहना होगा, कि हम परमात्मा का नाम काला नहीं कर रहे, अपने दुर्व्यवहार से।

अब मेरी बात बहुत ध्यान से सुनो, यदि दीपक से प्रकाश न हो, वह न अंधेरा करता है और न ही प्रकाशित करता है। परंतु यदि वहाँ प्रकाश है, वह काला भी कर सकता है और प्रकाशित भी कर सकता है। केवल सहजयोगी ही हैं जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम को काला या प्रकाशित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि आपके पास एक नकली आदमी है, वह परमेश्वर का नाम काला नहीं कर सकता क्योंकि वह स्वयं काला है, इसलिए किसी को उसकी परवाह नहीं। यदि कोई व्यक्ति ईश्वर के बारे में पढ़ा रहा है या ईश्वर के बारे में बात कर रहा है, धर्म के बारे में, और उससे पैसा कमा रहा है, वह अपना ही नाम काला करता है। वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम को काला नहीं करता। परमेश्वर का नाम, काला नहीं किया जा सकता, यह हमेशा चमकता रहता है। 

परंतु यह केवल  सहज योगी हैं जो उस बादल को बना सकता है, उसे ढकने के लिए। वे  ही केवल इस दुनिया की आशा को खत्म कर सकते हैं। वे ही इस संसार का वास्तविक विनाश ला सकते हैं। उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाएगा। और उन्हें समय पर सजा मिलनी चाहिए, ताकि परमेश्वर का नाम बर्बाद न हो। क्योंकि उन्हें परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने का अधिकार दिया गया है, अन्य बाहर हैं।

 वही सिर्फ वे लोग हैं जो अधिकार का दुरुपयोग कर सकते हैं। जो लोग इस इमारत के बाहर हैं वे इसे खराब नहीं कर सकते। आपको विशेष सौभाग्य प्राप्त हुआ है, इस खूबसूरत इमारत में प्रवेश करने का । आपने यह अधिकार अपने पिछले जन्मों के महान कर्मों के कारण प्राप्त किया हैं। और अगर अब आप इसे खराब करना चाहते हैं, तो आप बेहतर समझ ले कि आपको बहुत कड़ी सजा दी जाएगी। जो ज्योति प्रकाश दे सकती है वह जला भी सकती है। परंतु यह ज्योति उन सभी को जला देगी जो परमेश्वर के राज्य को जलाने की कोशिश करते हैं।

तो दीपावली के दिन, आइए जानते हैं कि हमें इस तरह से दीपक जलाने चाहिए कि उसमें शुद्धतम से शुद्ध प्रेम हो। दिखावटी प्रेम नहीं, प्रेम का दिखावा नहीं, लेकिन आपके हृदय से, इसे बहना चाहिए, जैसे प्रकृति बहाती है, अपना सारा आशीर्वाद आप पर ।

फिर जहां भी आपके चरणों के फूल स्पर्श करेंगे, प्रकृति आनंद से खिल उठेगी। वहाँ दीपावली होगी। जैसे मुझे बताया गया था जब रोम आने से पहले, इटली में बारिश नहीं हुयी थी। धरती माता सूख गई थी। और जैसे ही आप सभी सहजयोगी इस धरती माता पर आए, वर्षा होने लगी।

तो प्रेम की पवित्रता को पूर्ण विवेक से समझना है, क्योंकि यह पवित्रता कार्यान्वित होती है; यह प्रकृति में कार्यान्वित होती है, यह मनुष्यों में कार्यान्वित होती है, यह हर चीज में कार्यान्वित होती है। क्रिया वही है जैसी क्रिया, धरती माता की कोमल क्रिया है।

जो लोग ऐसे व्यक्तित्व के संपर्क में आते हैं, वे अचानक सुखदायक महसूस करने लगते हैं, पूरे अस्तित्व को एक आनंदमयी स्थिति में अनुभव करते हैं।

आशीर्वाद की अवस्था। लेकिन मुझे नहीं पता, इस शब्द के बाद,  कितना कुछ गलत हो गया है, क्योंकि हमारे शब्द भ्रष्ट हैं। हमारे शब्द भ्रष्ट हैं, वे व्यक्त नहीं करते, उनका क्या अर्थ है। वे शुद्ध भी नहीं हैं। वे प्रतिबिंबित नहीं करते जो प्रतिबिंबित किया जाना है। तो, यह हमारे लिए हैं शब्दों के नए अर्थ बनाना, स्पष्ट दृष्टि देना। जब आप एक स्पष्ट दृष्टि देखना चाहते हैं, आप दर्पण के सामने एक शक्तिशाली प्रकाश डालते हैं। अभिव्यक्ति की स्पष्ट दृष्टि- भाषा में, हावभाव में, व्यवहार में; और परमात्मा की स्पष्ट दृष्टि। लोगों को आपके प्रकाश में देखने दें, सुंदर सपना सच होते हुए।

मेरे बचपन में, मैं सोचती थी, मेरे सपने बहुत शानदार हैं। क्या वे कभी साकार होंगे? मैं छोटे, छोटे पत्थरों को इकट्ठा करती थी, और मैं कहती थी ‘क्या ऐसे लोग होंगे, जो पत्थर नहीं हैं, परंतु जो हृदय हैं?’ भगवान की कृपा से, मैं आपसे मिली हूं। मैं आपका बहुत-बहुत धन्यवाद करती हूँ, सहज योग को स्वीकार करने के लिए। लेकिन यह निमंत्रण जो आपको दिया गया है, ऐसा नहीं होना चाहिए कि, मुझे दोषी ठहराया जाएगा, उन लोगों को देने के लिए जो कभी इसके लायक नहीं थे। कृपया करके मुझे निराश नहीं करें।

एक छोटी सी बात है, मैं एक ऐसे देश से आती हूं जो इतना परिष्कृत नहीं है, इस आधुनिक संसार में। लेकिन सत्य में बहुत गहराई में समाहित है, और मुझे खुशी है कि आप उस देश का सम्मान करते हैं, इसके बावजूद, वह आधुनिक नहीं है, प्राकृतिक अस्तित्व है, और आपको अपनी माँ पर गर्व है जो ऐसे देश से हैं। यह दीपावली है जो उस देश में हजारों और हजारों वर्षों से मनाई जाती है। और यह पहली बार रोम में है, जो यूरोप का केंद्र है, क्योंकि यहाँ सात पहाड़ियां हैं, जो पूरे सात चक्रों को व्यक्त करती हैं। इसीलिये एक बड़ी मशाल को इंग्लैंड से एरोप्लेन में लाना पड़ा, यूरोप के इन सात चक्रों को प्रकाशित करने के लिए।

कुंडलिनी मूलाधार से उठती है और सातवें चक्र तक ऊपर जाती है और सदाशिव के स्थान को छूती है। लेकिन इस प्रकरण में सदाशिव के स्थान से, प्रकाश नीचे आया है, सभी चक्रों को प्रकाशित करने और सम्मान देने के लिए, हृदय से। कुंडलिनी के जागरण की शुरुआत में मैं वास्तव में यही करती हूं, आपकी उंगलियों के माध्यम से, कुंडलिनी को आह्वान, आमंत्रण भेजा जाता है। जब तक वह इन केंद्रों से नहीं गुजरती, तब तक वह पर्याप्त रूप से इसे नहीं खोल सकती है, कुंडलिनी के उठने के लिए, और तब कुंडलिनी उठती है। तो निमंत्रण सबसे पहले यहां हृदय चक्र से आना चाहिए।

तो इच्छा को सबसे पहले नीचे आना होगा, इच्छा की शक्ति को हृदय से नीचे आना होगा, कुंडलिनी को ऊपर उठाने के लिए। तो कुंडलिनी कार्य करती है – क्रिया की शक्ति कार्यान्वित होती है।

इसलिए इंग्लैंड की जिम्मेदारी और यूरोप की जिम्मेदारी बहुत बड़ी है। जब तक ये सभी चक्र साफ नहीं हो जाते, विशुद्धि को एक तरफ नहीं धकेला जा सकता। इसलिए हमें पहले संगठित करना होगा, यूरोप में और इंग्लैंड में भी। मैंने इसे इंग्लैंड में शुरू किया, फिर यूरोप में। एक बार जब हमने इसे अच्छी तरह से संगठित कर लिया, तो मुझे यकीन है, सहज योग बहुत आसानी से अमेरिका में स्थापित हो जाएगा। भारत कोई समस्या नहीं है, जैसा कि आप जानते हैं; और यह बहुत आसानी से काम करने वाला है, और एक बार जब भारत जाग जाएगा, कुंडलिनी बहुत तेजी से, बड़ी गतिशीलता के साथ आगे बढ़ना शुरू कर देगी। लेकिन पहले इन ऊपरी चक्रों को ठीक करना होगा। नहीं तो कुंडलिनी कैसे बाहर आ सकती है?

तो, आप अपनी जिम्मेदारी का एहसास करें, कि भारत में हमारे पास एक ताकत है, निसंदेह । लेकिन यह कैसे उठेगी यदि यहाँ रुकावटें हैं ? आप इस ब्रह्मांड का एक हिस्सा  हैं, आप भारत से कहीं अलग नहीं लटक रहे हैं, इसलिए भारत को आप पर निर्भर होना होगा।

आपके सहस्रार के लिए, मैंने पहले ही सारी व्यवस्था कर ली है, अर्थयार्थ मैं यहाँ व्यक्तिगत रूप से हूँ। मैं कैलाश से नीचे आयी हूँ, इस धरती पर। तो, इस तरह मैंने पूरे अभिनय की व्यवस्था की है। लेकिन बीच के अभिनेता बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्हें जोकर, या मूर्ख लोगों की तरह काम नहीं करना चाहिए। यह काफी मूर्खतापूर्ण होता जा रहा है, माहौल, मुझे कहना होगा, आपको ऐसा लगता है जैसे आप बेवकूफों या पागलों में हैं।

तो, हमारे आस-पास हो रही ये हास्यास्पद चीजें हमें प्रभावित नहीं करनी चाहिए, लेकिन हमें वास्तव में उनका इस्तेमाल खुद का मनोरंजन करने के लिए करना चाहिए। और आप उस चढ़ाई पर पहुंच गए हैं, जहां आप देख सकते हैं कि ये चीजें वहां पतन के कारण आ रही हैं। और पतन विनाश है, चक्रों का भी विनाश है। तो हालांकि यह मूर्खता है, बेवकूफी है, हमें लोगों को उनमें से चुनना होगा, चक्रों के सहयोग के लिये । और उन लोगों से बहुत सावधान रहना होगा जो सहज नहीं हैं, जो सहज योग में चिपके हुए हैं। और अब समय आ गया है उन्हें हमेशा के लिए बाहर फेंक दिया जाए और उन्हें वापस नहीं लौटना हैं।

केवल वीर, साहसी ही माता की पूजा कर सकते हैं। और मुझे आशा है कि आप वह सब हैं, और आज वह महान दिन है जब सभी वीर और वीरांगना मेरी पूजा करते हैं।

भगवान आप सबको आशीर्वाद दें।

परमात्मा आप पर कृपा करे।

तो अब, आज की पूजा बहुत लंबी नहीं है, लेकिन पूजा के बाद एक और बात है। आज वह दिन है जब एक अन्य प्रकार का रक्षाबंधन होता है जिसे हम हिंदी में भाई द्विज और मराठी में भाऊबिज कहते हैं, जिसका अर्थ है आज चंद्रमा का दूसरा दिन है। और यह वह दिन है जब एक भाई बहन के घर जाता है और वह उसे स्नान कराती है, मेरा मतलब है कि चाहे वह छोटा लड़का हो या बड़ा आदमी भी कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हम आप लोगों की तरह स्नान नहीं करते हैं। तो उसे एक अच्छा स्नान और मालिश और तेल दिया जाता है और फिर, जब वह खत्म हो जाता है, तो वह भाई की आरती करती है और उसके लिए खाने के लिए अच्छा खाना बनाती है। इतना सब होने के बाद, भाई उसे कृतज्ञता के प्रतीक के रूप में कुछ देता है। एक बहुत ही सुंदर चीज है जिसे हम भाई दूज के रूप में करते हैं।

तो आज यह उसका दूसरा भाग है जहाँ आप सभी के बीच संबंधों की पवित्रता स्थापना और पूजा की जाती है। और महाराष्ट्र में विशेष रूप से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि वे रक्षाबंधन का उपयोग एक चीज के रूप में नहीं करते हैं, जितना कि वे भाऊबिज का उपयोग करते हैं।

तो इसके बाद आप सभी का एक अच्छा सम्मेलन हो सकता है- वह मिलन है जो पवित्र मिलन है, एक साथ, और एक दूसरे से बात करना, अपने राखी भाइयों, बहनों और वह सब जो आप थोड़ी देर के लिए कर सकते हैं। और जिस बहन ने राखी बांधी है वह आज भाई के मुंह में थोड़ा सा भोजन दे सकती है – यह एक अच्छा विचार होगा। 

परमात्मा आप पर कृपा करे।

इटालियंस बहुत कलात्मक हैं, है ना?

बस आप गणेश पूजा कर सकते हैं – अगर आपके पास कुमकुम है, तो आप इसे – चीज़ में डाल दें, और उसमे मेरे पैर होंगे [?] और मैं इसे रगड़ूंगी, और आप सभी एक सौ आठ नाम गणेश के ले सकते हैं आप चाहें तो, या लक्ष्मी के, जिस तरह से आप चाहें, क्योंकि वह वही है जिसका उपयोग किया जाना है। तो यह पैसा भी उसी कुमकुम के साथ साथ डाल दो,  और मैं अपने पैर रगड़ूंगी। तो पहले आप अर्थव शीर्ष और फिर देवी के नाम कह सकते हैं।

पहले यह, कि आप अथर्वशीर्ष कहेंगे, वे सभी जो जानते हैं, वे इसे कह सकते हैं, इसके साथ आप इसे जानते हैं, और यह एक बार कहा जाएगा। उसके बाद… यह मेरे पैरों पर कुमकुम से साथ कहा जाएगा। उसके बाद यह पैसा मेरे पैरों पर डाला जा सकता है, और मुझे इसे अपने पैरों से रगड़ना होगा, और यह पैसा प्रसाद के रूप में आप सभी के पास जा सकता है।

श्री माताजी पुजारी से पूछते हैं कि क्या उनके पास कोई चंदन, चंदन का तेल है। शायद वह जवाब देता है कि कोई नहीं है, क्योंकि वह कहती है: “कोई फर्क नहीं पड़ता।” उनके पैरों पर तेल डाला जाता है और वह उन्हें एक साथ रगड़ती हैं, जबकि सहज योगी महालक्ष्मी की प्रार्थना करते हैं। बाद में श्री माताजी के चरणों में कुछ सिक्के डाले जाते हैं।

श्री माताजी पूछते हैं: ये सब तरफ से हैं? आपको पता है?

पुजारी: ये ज्यादातर इटली के हैं।

श्री माताजी: केवल इटली?

गुइडो: जर्मनी, इंग्लैंड से भी…

श्री माताजी: मुझे आशा है कि आप सभी ने दिया होगा। बेहतर डालें। स्विस जर्मन। बस कुछ सिक्के ले आओ। सिक्के डाल दो। अब तुम कहते चले जाओ।

कई लोग उसके चरणों में सिक्के चढ़ाने जाते हैं, इतना कि थोड़ी देर बाद वह कहती है: “बस, बहुत हो गया!”।

जबकि अधिक सिक्के चढ़ाए जाते हैं, श्री माताजी अधिक तेल डालने के लिए कहते हैं। यह उसके पैरों के बीच के सिक्कों पर डाला जाता है। वह अपने पैरों से सब कुछ रगड़ती रहती है।

श्री माताजी : कुछ और तेल डाल सकते हैं। बस इतना ही। कुबेर के लिए तेल।

फिर पांच पवित्र तत्वों को उसके हाथों पर डाला जाता है, जबकि एक सहज योगी आरती का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ता है।

देवी पूजा के लिए, श्री माताजी सात अविवाहित महिलाओं को मंच पर बुलाते हैं जो “विवाह करना चाहती हैं”।

श्री माताजी: आप कितने हैं? एक, दो, तीन, चार, पांच, छह… एक और। कोई नहीं?

तब एलिसन नाम की एक योगिनी उठ खड़ी होती है और जनता के उल्लास और श्री माताजी की सामान्य हँसी के बीच दूसरों तक पहुँचती है। फिर लड़कियां देवी पूजा करती हैं।

फिर रोम से सात विवाहित महिलाओं को पूजा समाप्त करने के लिए बुलाया जाता है। इसके बाद श्री माताजी को उपहार दिया जाता है।

श्री माताजी: यह क्या है?

गुइडो जवाब देता है (बहुत स्पष्ट नहीं) कि यह रोम के सहज योगिनियों द्वारा दिया गया एक मंगल सूत्र है।

श्री माताजी : यह सुंदर है।

वह लगाती है। तालियाँ।

इसके बाद बच्चे मंच पर श्री माताजी के चरणों में फूल चढ़ाने आते हैं।

श्री माताजी : बहुत-बहुत धन्यवाद (…) परमात्मा आपका भला करे। धन्यवाद। (एक बच्चा उन्हें एक चित्र देता है) परमात्मा आपको आशिर्वादित करें। चलो अब फूल चढ़ाते हैं। क्या आपने फूल लगाए हैं? नहीं? क्या आपने डाल दिया? क्या तुमने कोई फूल लगाया? साथ चलो। क्या आपने फूल लगाए हैं? आओ, एक फूल लो। यह लो। कम से कम बच्चों को अंग्रेजी सिखाई जानी चाहिए, आप देखिए, यह महत्वपूर्ण है। नहीं तो मुश्किल होगी। आपको उन्हें अंग्रेजी भाषा सिखाना चाहिए।

बाद में वह प्रसाद चैतान्यित करती है, फिर आरती और नमस्कार करती है। फिर वह कहती है: “कृपया खड़े न हों। (…) नीचे झुक जाएँ।”

साथ ही ग्रेगोइरे आगे बताते हैं, अगर नमस्कार करने के लिए जगह नहीं है, तो बैठना चाहिए या झुकना चाहिए, श्री माताजी की ओर सिर रखना चाहिए, लेकिन खड़ा नहीं होना चाहिए।

अंत में श्री माताजी लक्ष्मी की मुद्रा में ध्यान करती हैं कि उनका बायां हाथ देने के लिए खुला है, और दाहिना हाथ आशीर्वाद में उठा हुआ है: 

परमात्मा आपको आशिर्वादित करे। ईश्वर आप पर कृपा करे। ईश्वर आप पर कृपा करे।

गुइडो उन्हें कुछ सजाए गए पत्रक दिखाता है जो पूजा की स्मारिका बनने जा रहे हैं।

श्री माताजी: परमात्मा आपका भला करे,

सुंदर, सुंदर, सुंदर। अब यह पैसा सबको लेना चाहिए, एक-एक, एक सिक्का, जो कुछ भी मिले, चाहे वह आपका देश न हो। समय क्या हुआ है? (अश्रव्य उत्तर)। देखें (…), हम समय पर हैं।

गुइडो: अंग्रेज आपके 500 चित्र लेकर आए हैं।

श्री माताजी : किस लिए?

गुइडो दोहराता है।

श्री माताजी : सुंदर।

गुइडो: श्री माताजी, आपकी अनुमति से हम आपको सामूहिक उपहार दिखाना चाहते हैं।

श्री माताजी: सामूहिक।

गुइडो: हाँ। सामूहिक, बिल्कुल सामूहिक।

श्री माताजी (मंगल सूत्र को छूते हुए): लेकिन यह क्या है, सोना है?

गुइडो: चांदी सोने में मढ़वाया जाता है।

श्री माताजी : ठीक है। सिल्वर प्लेटेड गोल्ड, या गोल्ड प्लेटेड सिल्वर?

गुइडो: नहीं, नहीं, चांदी,सोने में मढ़वाया।

श्री माताजी : ओह, मैं देखता हूँ। ठीक है, कोई बात नहीं।

ग्रेगोइरे जनता के लिए अनुवाद करते हैं कि हर कोई जा सकता है और अपने लिए एक सिक्का ले सकता है।

श्री माताजी: और हर बच्चे के पास भी एक हो सकता है।

Guido इतालवी में अनुवाद करता है। वह ‘बच्चों’ का अनुवाद ‘बाम्बिनी’ के रूप में करता है।

श्री माताजी : बम्बिनी, भी, हाँ। बम्बिनी एक (…अश्रव्य) नाम है, बम्बिनी।

(योगिनी के लिए) यह मंगल सूत्र आपको अपने पास रखना है और अगली बार जब भी पूजा के लिए आती हूं, हर बार पूजा के लिए आती हूं।

(एक तरफ) कृपया इसके लिए कैरोलीन भेजें, आपको (…अश्रव्य) सत्यापित करना होगा।

इटालियंस से एक और मौजूद: विलियम ब्लेक पेंटिंग के कुछ पोस्टर।

श्री माताजी : बस उन्हें दिखाओ। यह इतालवी सहज योगियों (…) के लिए विलियम ब्लेक है।

इटालियंस मोती का हार भी देते हैं।

श्री माताजी : कि जब भी तुम आओ। यह बहुत महंगा है। उस ओर देखो। हर बार गहनों के साथ (…) कैसे कर सकते हैं, आप ऐसा नहीं कर सकते, इतनी महंगी चीज देना बहुत महंगा है। इतना महंगा क्यों? बहुत ज्यादा। यह कितना सुंदर है। बहुत महंगा है, बहुत ज्यादा है। आपने मुझे अब सब कुछ दिया है। बहुत ज्यादा, मेरा मतलब है, अब इस तरह पैसा क्यों खर्च करना है?”

श्री माताजी मुस्कुराते हुए और सिर हिलाते हुए सभी को दिखाते हैं: बहुत-बहुत धन्यवाद। यह मजेदार है कि मुझे हर बार धन्यवाद कहने के बजाय यह कहना पड़ता है। मुझे हमेशा कहना पड़ता है कि ‘इतनी महंगी चीज क्यों’?

फिर रोम से दो योगिनियों को दो कुत्तों को मंच पर लाते देख हर कोई हंसने लगता है।

श्री माताजी : वही श्रेष्ठ है! ओह, बहुत-बहुत धन्यवाद, धन्यवाद।

गुइडो: हम सभी सहज योगियों के हृदय को प्रतीकात्मक रूप से अर्पित करना चाहते थे।

श्री माताजी: ओह, धन्यवाद, सुंदर, बल्कि महंगा, ठीक है। ईश्वर आप पर कृपा करे।

गुइडो योगियों को बताता है कि पिछली बार जब श्री माताजी अलसाटिया में थे, तो उन्होंने कहा था कि सुंदर कुत्ते हैं और उन्हें भारत में रखना अच्छा होगा।

श्री माताजी : आप उन्हें भारत ले चलो, यहाँ से, मैं सुनिश्चित करुँगी कि वे मिलें।

योगिनियाँ एक कुत्ते को श्री माताजी को सौंपती हैं जो उसे अपनी गोद में रखते हैं।

श्री माताजी : ये कौन से कुत्ते हैं? अलसैशियन? वे अल्साटियन हैं। अच्छी तरह से बस जाओ, नीचे नहीं उतरना चाहता (…)। एक अल्साटियन है, सुंदर।

Guido: यह रोम में उपलब्ध एकमात्र जोड़ा था!

श्री माताजी कहते हैं कि उन्हें भारत भेजने की व्यवस्था करो। गुइडो सुझाव देते हैं: “भारतीय सहज योगियों के साथ। श्री माताजी : जब वे आते हैं। गुइडो: प्रमाण पत्र के साथ… श्री माताजी: हाँ, हाँ, हाँ।

(…)

श्री माताजी कुत्ते को नीचे रखते हैं – जो नीचे नहीं उतरना चाहता – और दूसरे को ले जाता है।

ग्रेगोइरे: कुछ कुत्ते वास्तव में भाग्यशाली होते हैं!

श्री माताजी: वे सबसे अच्छे कुत्ते हैं, मुझे लगता है…(अश्रव्य)। क्या हम उन्हें वही नाम देंगे?

ग्रेगोइरे: एक नर है और दूसरा मादा?

श्री माताजी : कोई बात नहीं!

ग्रेगोइरे: कोई बात नहीं।

श्री माताजी: धन्यवाद। अब वह क्या है? हमें दूसरा विमान लेना होगा, मैं बताता हूँ!

ग्रेगोइरे: यह मिलानो का एक सामूहिक उपहार है, श्री माताजी ।

श्री माताजी : सामूहिक, फिर से! सामूहिक। क्या…(अश्रव्य) सामूहिक, एह? धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद। खोलने से पहले मैं आपको धन्यवाद देती हूं। यह दो कटोरे और एक सुंदर ट्रे है। आपका बहुत बहुत धन्यवाद। खूबसूरती है। आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

एडिलेड आश्रम (ऑस्ट्रेलिया में) के सहज योगियों का एक उपहार।

श्री माताजी बड़ा पार्सल खोलते हैं और आश्चर्य और प्रशंसा के साथ देखते हैं।

श्री माताजी: क्या आपने इसे विकसित किया है? बहुत खूबसूरत। सब कुछ खूबसूरत है। बहुत सुन्दर फोटो है।

फिर वह लोगों को दिखाने के लिए उसे घुमाती है और फ्रेम को छूती है। ग्रेगोइरे का कहना है कि एंटोनियो नाम के एक योगी ने चित्र के रंगों के आधार पर ही फ्रेम भी बनाया है।

श्री माताजी : बेहतर है कि ये सारी बातें लिख लें, देखिए, किसने क्या दिया…. वह कहाँ गई है? डेनिएल (?), उन सभी उपहारों को लिखिए जो उन्होंने दिए हैं, कहाँ से (…)। यह अब बहुत महत्वपूर्ण है (…)। डैनी, एक कागज़ और एक पेंसिल ले आओ और लिखो। ये वाला यूके का है.