Public Program, Sahajyog Ke Anubhav कोलकाता (भारत)

1986-0331- सार्वजनिक कार्यक्रम हिंदी कोलकाता भारत  सत्य को खोजने वाले  सभी साधकों को हमारा प्रणिपाद है।  सत्य को खोजना  यह स्वाभाविक मनुष्य का धर्म है।  जहां भी उसकी रूची जाती है  या उसकी चेतना मुड़ती है  वहां वह सत्य को ही खोजता है।  और उसी मार्ग को अवलंबन करता है  जिसमें उसे सत्य प्राप्त होगा।  किन्तु जैसे श्री कृष्ण ने कहा है  कि मानवी चेतना  अधोगती के और दोड़ती है।  उसके मूल, उसके मस्तिष्क में  उसके ब्रेन में होते हैं  और जब मनुष्च अपनी चेतना को स्वयं बढ़ाता है  तो वह अधोगामी होता है।  किस तरह से हम लोग अधोगामी होते गए हैं  इसका अगर दिग्दर्शन  करना है  तो आप पाशची मात्य देशों में जाकर देखोगे  कि वास्तविक्ता मैं लोग नर्क में ही पहुँँच गए हैं  मुझे पहले कहा गया था कि आप अंग्रेजी में भाषण दें  तो मैंने ये कहा कि अंग्रेजी भाषा में  बहुत भ्रांतिया है  जिसके कारण कभी कभी बड़ी दिक्कत हो जाती है  किसी बात को सपश्ट रूप से कहना  जो की साइंस की बात नहीं है  लेकिन बहुत बड़ा साइंस है  परमात्मा का साइंस अचूक है  उसके कायदे’ पूरे पूरी तरह से  अपने अमल पे जाग्रत हैं।  उनका कोई भी आसन ऐसा नहीं है  जहां बैठने पर आप इस तरह से महसूस करें  कि इस में से आप डोल जाएंगे  लेकिन उस स्तिथि में पहुँँचने के लिए  जैसे श्री कृष्ण ने कहा है  हमें ऊर्ध्वगामी होना चाहिए  ऊर्ध्वगामी होने के लिए  कोई व्यवस्था परमात्मा ने की हो गी या नहीं  या सभी सब व्यवस्था हमी लोग कर रहे हैं  आज अमीबा के स्थिति से  इस  स्थिती तक हम किस शक्ति के द्वारा पहुँचें  और अगर इस स्थिती में ही हमारा अंतिम उत्थान है  और इसी स्थिती में पहुँचकर  अगर हम  अपने लछ्य पे आ गए हैं  तो फिर Read More …