Public Program, Sahajyog Ke Anubhav

कोलकाता (भारत)

1986-03-31 Public Program, Calcutta, India, DP (Hindi), 145'
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1986-0331- सार्वजनिक कार्यक्रम हिंदी कोलकाता भारत

 सत्य को खोजने वाले  सभी साधकों को हमारा प्रणिपाद है।  सत्य को खोजना  यह स्वाभाविक मनुष्य का धर्म है।  जहां भी उसकी रूची जाती है  या उसकी चेतना मुड़ती है  वहां वह सत्य को ही खोजता है।  और उसी मार्ग को अवलंबन करता है  जिसमें उसे सत्य प्राप्त होगा।  किन्तु जैसे श्री कृष्ण ने कहा है  कि मानवी चेतना  अधोगती के और दोड़ती है।  उसके मूल, उसके मस्तिष्क में  उसके ब्रेन में होते हैं  और जब मनुष्च अपनी चेतना को स्वयं बढ़ाता है  तो वह अधोगामी होता है।  किस तरह से हम लोग अधोगामी होते गए हैं  इसका अगर दिग्दर्शन  करना है  तो आप पाशची मात्य देशों में जाकर देखोगे  कि वास्तविक्ता मैं लोग नर्क में ही पहुँँच गए हैं  मुझे पहले कहा गया था कि आप अंग्रेजी में भाषण दें  तो मैंने ये कहा कि अंग्रेजी भाषा में  बहुत भ्रांतिया है  जिसके कारण कभी कभी बड़ी दिक्कत हो जाती है  किसी बात को सपश्ट रूप से कहना  जो की साइंस की बात नहीं है  लेकिन बहुत बड़ा साइंस है  परमात्मा का साइंस अचूक है  उसके कायदे’ पूरे पूरी तरह से  अपने अमल पे जाग्रत हैं।  उनका कोई भी आसन ऐसा नहीं है  जहां बैठने पर आप इस तरह से महसूस करें  कि इस में से आप डोल जाएंगे  लेकिन उस स्तिथि में पहुँँचने के लिए  जैसे श्री कृष्ण ने कहा है  हमें ऊर्ध्वगामी होना चाहिए  ऊर्ध्वगामी होने के लिए  कोई व्यवस्था परमात्मा ने की हो गी या नहीं  या सभी सब व्यवस्था हमी लोग कर रहे हैं  आज अमीबा के स्थिति से  इस  स्थिती तक हम किस शक्ति के द्वारा पहुँचें  और अगर इस स्थिती में ही हमारा अंतिम उत्थान है  और इसी स्थिती में पहुँचकर  अगर हम  अपने लछ्य पे आ गए हैं  तो फिर आज संसार  इतनी आफ़त में क्यों पड़ा हुआ है  साइंस की दृश्टी से आप विचार करें  तो साइंस में भी हर समय  जब भी कोई धारणा सामने रखी जाती है  तो उसे हाइपोथिसिस ही कहा जाता है  और उसको सिद्ध करने पे ही माना जाता है  कि ये सिद्धांत है, ये काइदा है, ये  नेचर कर ला है  पर वो भी बार बार वो बदलते ही रहते है  क्योंकि जो केवल सत्य है  जो ऐब्सल्यूट है  वो आपकी आत्मा है  जब तक आप आत्मा के  अंदर समाविष्ट नहीं होते हैं  जब तक आपका चित  आत्मा के प्रकाश से आलोकित नहीं होता है  जो कुछ भी आप जानते हैं, समझते हैं  वो सब कुछ अधूरा है  और कभी कभी गलत भी है  अब इसको देखें कि हमारी अधोगति  किस तरह से हमारे अंदर  अपने आप घटित होती रहती है  सर्वप्रथम  हमारे सहजोग में  हर एक चक्र का एक तत्व होता है  उसके अनुसार नाभि चक्र पे  हम स्वाहा की शक्ति पाते हैं  स्वाहा यह आपके वेदों से ही आया होगा  स्वाहा  स्वाहा माने हर एक चीज को खा लेना  हर एक चीज को हजम कर लेना  हर एक चीज पे हावी हो जाना  स्वाहा  देखें यह शक्ति जब परमात्मा की ओर उठती है  तो वो स्वधा हो जाती है  स्वधा माने  स्वा माने आत्मा और उसकी धारणा शक्ती  हमारे अंदर आ के, हम गुरु तत्वों को प्राप्त होते हैं  लेकिन जब यह स्वहा बाह्य की ओर दौड़ने लग जाती है  जैसे कि मनुष्य की चेतना हमेशा बाहर की और दौड़ती हैं  तो इसका उधारण आप पाश्चात्य देशों में बहुत अच्छे से देख सकते हैं। हाँ आज कल लोग स्वः ओर स्वधा की शक्तियों से डरने लगे हैं।   अपने यहाँ तो अभी लोग  स्वाहा और स्वधा की बीच में थोड़े से  चलने की कोशिस करते हैं  लेकिन वहाँ की जब  स्वाहा शक्ती बढ़ी  तो उन्होंने  हमारे देश पे आक्रमण किया  चाइना पे आक्रमण किया  जिस देश पे जाया उसको ही हडपते चले  यह तो परमात्मा की कृपा थी  मैं कहूं हनुमान जी ने कुछ काम किया होगा  जो कोलंबस अमेरिका पहुंचा, नहीं तो  आज यहां हम न होते।   यहां सब अंग्रेज बैठे होते  या तो अमेरिकन बैठे होते ;  हम लोग न होते।   यह स्वाहा की शक्ती वहां बड़ी  सपश्ट रूप से दिखाई देती है  कि सब चीज को किस तरह खा जाए  वही चीज    उन्होंने    हमारे    अर्थशास्त्र में ही किये  कि जहां तहां चाहें  वहां हम पूरी तरह से  सब पे हावी हो जाए  सब का हम हडप ले  यह बाह्य की शक्ती है।  उसके बाद  दूसरा जो चक्र होता है  जिसे की हम स्वाधिष्टान चक्र कहते हैं  जिसने की यह पूरा अंतरिक्ष बनाया है  उसकी भूर्व की शक्ती  वेदों ने निर्मित की हुई है;  इस भूर्व की शक्ती में  जब मनुष्य उतरता है  तो चंद्रमा पे जा, इधर जा, उधर जा  इससे क्या फायदा है  करोड़ों रुपिया फेके दे रहे हैं  इस विश्व में कितनी परिशानिया है  कितनी आफते हैं  उधर नजर नहीं है  करोड़ों रुपिया फेके दे रहे हैं  किस चीज के लिए  कि चंद्रमा पे जाए  वहाँ जाने से क्या होगा  कौन सा लाभ आपको होने वाला है  जनहित क्या होने वाला है  किसका कल्याण होने वाला है  यह विचार नहीं  वही आक्रामक स्थिति  कि हम चंद्रमा पे जाके बसेंगे  अंतरिक्ष में घुमा  लेकिन जिस वक्त ये शक्ति  अंदर की और मुड़ती है  तब उसमें सांदर्य दृष्टि  जिसको एस्थेटिक्स कहते हैं  जिससे की अनेक तरह की कलाएं  और सुन्दर्ता  जीवन में भी  और सारे वातावरण में  उत्पन हो सकती है  पर जब वह अंतरिक्ष में ही घुमने लग गए  इस पृथ्वी को छोड़ करके  तो वह भू पे आ गए हैं।  भू मानिये पृथ्वी  भू हम मानते हैं  सहजोग में  जिसे त्रिकोणाकार अस्थि  कहते हैं  जिसे कॉसिक्स कहते हैं अंग्रेजी में  वो भू तत्व से बनाया है  और इसकी रक्षा करने वाले  श्री गणेश भी  पृथ्वी तत्व से बनाये गए हैं  और वो भी  उसी के नीचे मुलाधार चक्र पे स्थित हैं,  लेकिन जब हम  भू पे भी आए  तो मशीने शुरू कर दी।   मशीन भी करना मनुष्य का कार्य है  पर कुछ संतुलन नहीं  मानव में और मशीन में कुछ तो  संतुलन होना चाहिए।   जमीन को खोदत्ते गए  ये निकालो, वो निकालो  उससे अब बना बना कर क्या बनाया  तो धूआ फैला दिया है सारे आकाश मैं  जिससे सारे पेड़ मरे जा रहे हैं  बेरोज़गारी आ गई  मनुष्य की हाथ की चीज़े न बनने से  कला खत्म हो गई  लोग सब दूर प्लास्टिक लिये घूमते हैं।   जहां जाएं वहां प्लास्टिक  कपड़े में भी प्लास्टिक है  दर्वाजे को हाथ लगाई तो प्लास्टिक है  नल में हाथ लगाई तो प्लास्टिक है  कल हो सकता है पानी भी ये लोग  प्लास्टिक का देना शुरु कर देगे;  और इससे नुकसान होने लगा फिर  सो भू को इस तरह से तंग कर दिया  ऐसे भी ये पृथ्वी तो बहुत तंग है  इसको जितना हमने सताया है  जिसने हमें शस्य श्यामलाम  हर तरह से हमें पूरित रखा  उसके हमने कोई भी इज्जत नहीं की  उसके आगे की जो स्थिति है  वो तो इससे भी खराब है  फिर मुलाधार चक्र पे आ जाते हैं  जिससे हर चीज़ का निस्सरन होता है  एक स्क्रीटरी फ़ंक्शन होता है।   ये जो शक्ती है  गणेश जी की  क्योंकि गणेश साक्षात  ओंकार होने की वजह से  कहीं भी रख दिये जाये  कमल की जैसे खिलते हैं  और उसकी सुगंध सारे सृष्टि में फैलती है  सो इस गणेश का उपमर्द करके  और मनुष्य ने इतनी ज्यादा  अनैतिकता उस देश में पाई गई कि   ना कोई माँ है ना कोई बहन है  ना कोई भाई है  ना कोई रिश्तेदारी  नहीं  सिवाय इसके की कोई ना कोई  बहुत ही गन्दा संबंध आपस में होता है  जो की हम लोग मुह से कह भी नहीं सकते  और देख भी नहीं सकते।   अब लंदन में किसी तरह से  हमारा रहना हुआ है  तो रोज ही लगता है कि ये कहाँ  नर्क के बीच में फ़से हैं इस गर्त में  अब उर्ध्वगती को प्राप्त होने में  यही चक्रों पे क्या असर आता है  जब कि  जो निस्सरन की शक्ती है  उससे मनुष्य में अबोधिता  जिसे इननोसेन्स कहते है  अत्यंत शक्ति शाली चीज है  इननोसेन्स  इननोसेन्स के सामने  रावण को झुकना पड़ा था  जो पवीत्रता है  जिसे हम पावित्र कहते है  वो शक्ती हमारे अंदर  श्री गणेश की वजह से जाग्रत होती है  इसलिए  क्योंकि उर्धवगामी होना है  हमें कुंडलीनी का ही  जागरण करना पड़ेगा  इसलिए आवश्चक है  कि हम कुंडलीनी का जागरण करें  तब  सिद्धता भी हो जाएगी  कि सिर्फ ब्रह्म सत्य है  बाकि सब मिथ्या है,  लेकिन पहले  ब्रह्म तक तो हम पहुंचे  ये सारी सृष्टी में  कहते हैं परमात्मा का प्यार फैला हुआ है  जो ब्रह्म स्वरूप है  जो ब्रह्म की शक्ती है  जिसको हम महसूस नहीं करते  देखते नहीं  जिसे पातंजली ने  ऋतुमभरा प्रज्ञा कहा हुआ है  जिसे  क्रिश्चयनिटि  में  Power of the Holy Ghost कहा है  जिसे मुहम्मद साहब ने  रूह कहा हुआ है  यही ओंकार की  ब्रह्म शक्ती जो है  इसको हमने जाना ही नहीं।   उससे पहले ही  हमारे देश में एक और तरह की  उल्टी गाथाएँ चलीं ।   यह तो हो गई उर्ध्वगती  और अधोगती की बात  लेकिन और दो दिशाएं  हमारे अंदर विद्यमान हैं,  जिसको कि हम कहें  की left and right  इस तरफ भी हमारा  दोनों तरफ भी चलन वलन चलता है  और जब  हम  left की ओर जाते हैं  मेरा मतलब कम्यूनिश्ट्रों से नहीं  लेकिन जब हम left की ओर जाते हैं माने  हम अत्यंत भावना प्रदान हो जाते हैं  उसमें अनन्य भक्ती  मनुष्य भक्ती में बह जाता है;  भक्ती  ठीक है  लेकिन श्री कृष्ण कही बात  कृष्ण की ही बात आज करनी चाहिए  घनश्याम  दास जी की  मैंने कितावे पढ़ी हैं  उनका लेख पढ़ा हुआ है  और वो सुलझे हुए  हैं  पहुँचे हुए हैं, पुष्ट;  इसमें कोई शक्र नहीं है  और  श्री कृष्ण ने साफ बताया कि  भक्ति जो है  पत्रं पुष्पं फलं तोयं  सब तो मुझे दे दो  और अपने वक्त में एक ही शब्द में  उन्होंने सब को  बिल्टाया है जो समझना चाहिए  कह दिया उन्होंने  अनन्य भक्ति करो  बस इस पे उन्होंने  आप लोगों को सब को ठिकाने लगाया है  यह कहूँगी क्योंकि  श्री कृष्ण जो थे  यह बहुत मुझसदी थे  बहुत ज्यादा  पहुँचे हुए Diplomat  जिसको कहना चाहिए कि Divine Diplomacy थे  Divine Diplomacy  और जो बात उन्होंने कह दी  वो शब्दों में  आप नहीं पकड़ सकते हैं  शब्दों से परे उठना पड़ेगा  तब आप जानेंगे कि भक्ति अनन्य होती है  और इसको हम  आज के  रोजमर्रा के जीवन में बता सकते हैं बात  कि गर इसका connection  main से नहीं हुआ  तो इसका क्या काम हो सकता है  जब तक टेलीफोन का कनेक्शन आपका नहीं होगा आप राम राम राम राम करके कीसे फोन कर रहे हैं, ओर ये राम क्या आपकी जेब मैं बैठा हुआ है की जब देखिये तब निकाल के टेबल पर रखा हुआ है  कि ये करता है कि नहीं करता है तू  इस राम का नाम लेने का  भी अधिकार आपको नहीं है  ऐसा देखा जाएगा  क्योंकि  वो परमात्मा है  अब ये अपने राजिव गांधी साहब जो है  इनके दरवाजे जाकर आपने अगर  चिलाना शुरू कर दिया है  राजिव, राजिव, राजिव तो पुलिस पकड़ लेगी  जब इन प्राइम मिनिस्टरों का ये हाल है  तो उस परमात्मा का क्या कहने हैं ;;।   पागल जैसे लोग राम, राम, राम, राम, रस्ते भर करते फिरते हैं  हमारे वहाँ,  स्पष्ट स्ट्रीट में देखिए  तमाशा किये हैं; ये हमारे देश की विशेशता है  कि वहाँ पर खड़े हो करके राम, राम, राम, राम, चला  वहाँ उनकी धोतियां भीग रहीं, उनकी बोदियां लगाते  वह सुपर मारकेट में मिलती, वह भी अगर  इतना तमाशा करते हैं, कि लज्जा लगती हैं  और फिर रास्ते में भीख  माँगते फिरते हैं।  तेरे राम के तुम शिष्य हो, कि क्या हो, भिखारी हो, कि हो क्या?  सत्य को जिसको जानना है  उसे पहले श्री गणेश की शुद्ध बुद्धी आनी चाहिए  ये सत्य नहीं, हो ही नहीं सकता  जो राम का भक्त होगा, उसकी अपनी शान होनी चाहिए  वो पडा रहेगा एक जगेह, उसको क्या मतलब किसी से?  उसकी मर्जी है,  जहां चाहे खा ले, जहां चाहे बैठ ले  वो क्या किसी के सामने हाथ आगे करेगा मुझे खाने को दो?  या ऐसे पागलो कि तरे चिल्लाते  रहेगा  इस गलत फहमी में हम लोग पता नहीं कैसे बह गये?  श्री राम का नाम नारद ने दिया था  जो राम का नाम देते हैं, वो क्या नारद है?  उनकी पात्रता हो  तो, एक बार नाम लेना बहुत हो जाता है  राम जाग्रत होने चाहिए हमारे में  आप सहजयोग में जानियेगा कि राम का स्थान हमारे ह्रदय में कहाँ है।   अगर हमने राम को ठीक से नहीं पहचाना  और उनको ठीक से याद नहीं किया  तो आप जानते हैं क्या हो जाता है?  सबसे बड़े तो शारीरिक कष्ट ये होगा  कि आपके लंग्स वीक हो जाएंगे  और आपको अस्थमा की विमारी हो सकती है  लोग कहते हैं, माँ आप अस्थमा कैसे ठीक कर देते हैं?  कैसे ठीक करते हैं?  हमारा राम से संबंध है ना  उनसे कह देते हैं, ह्रदय मैं जागृत हो जाओ  अस्थमा ठीक है  कुछ ज्यादा उसमें करना नहीं पड़ता है  ये सारी जो  देवी देवताओं की शक्ति हमारे अंदर स्थित है  उसको पाना चाहिए  ये वेदों से लेकर सारी ही चीजों में लिखा हुआ है  कि विद होना चाहिए, आपकी जो  मज्जा संस्था है  जो आपका सेंट्रल नर्वस सिस्टम है  उसमें आपको उसका महसूस होना चाहिए  ज्ञान का मतलब ये नहीं होता है  कि बुद्धी के चक्कर चला  या यूनिवर्सिटी’ की परिक्षाय करें  या लेक्चर जाकें सुनें  या किताबे पढ़ें  हमारे यहाँ  श्री राम कौन सी यूनिवर्सिटी में गए थे  और श्री कृष्ण कौन सी यूनिवर्सिटी में गए थे  इतना ही नहीं  जो हमारे यहाँ बड़े-बड़े संत-साधु हो गए  पूरे महाराष्ट्र के संत-साधु को मैं जानती हूँ  कोई भी यूनिवर्सिटी में नहीं गया  और किसी ने भी कोई किताब नहीं पढ़ी  तो कौन सी ऐसी किताब पढ़ी थी  जिससे वो स्वयं ही जानते है  कि राम का क्या स्थान है।  जो लोग सत्य के पुजारी हैं,  उनके लिए प्रथम आवश्यक चीज है  तो इस मामले में इमानदार हो जाए  और दूसरी परम परम आवश्यक चीज है  कि अपनी बुद्धी शुद्ध करें।  कुछ इधर पढ़ लिया, कुछ उधर पढ़ लिया  कुछ इधर  जान लिया, कुछ ये कर लिया  सब जो है सर में   जैसे अमेरिकन सहज योगी कहते है “ देर इस लॉट ऑफ गार्बिज इन माई हेड” , कचरा बहुत मेरे सर मैं भरा हुआ है।  सो शुद्ध बुद्धि से हमें कहना है कि हमें जानना है कि सत्य क्या है;  और सत्य जो होगा सो ही होगा  आपके कहने से तो नहीं होगा ना  अगर आपने यह फूल देखे  इनका रंग सफ़ेद अगर है  और अगर कोई कहें अन्धा नहीं, सफेद नहीं, इसका रंग लाल है  तो आप यहीं कहेंगे, भाईया तुम अभी अंधे हो, इसको देख लो  हम लोग देख रहे हैं, सब एक ही चीज़ देख रहे हैं  लेकिन मुश्किल तो यह है कि एक ही कि एक ही की बस आँख है और बाकी सब अंधे हो  तो वो आँख वाले को फिर जहर दे दो, उनको क्रूस पर चढ़ा दो;  उसको छलो, उसको सताओ, सारे जितने भी बड़े-बड़े संत हो गयें, उनकी छलाओ    तो हमारे देश की जो दुर्दशा है, वो इस वज़ह से है  कि हम या तो लेफ्ट को मूवमेन्ट  करते हैं, या राइट को मूवमेन्ट करते हैं,  अधोगती पर नहीं जाते हैं। यह तो गणेश जी की कृपा इस देश पर हैं, क्योंकि यह योग भूमी है।   इस भारत वर्ष को इतने धन्यवाद देने चाहिए  कि इसने अपनी गोद में आप लोगों को रहने की व्यवस्था की;  इतनी बड़ी महान भूमी में रहते हुए भी  हम इतने दुखी क्यों, सब लोग पुछते हैं।   तो मैं यही कहुँगी कि हम या तो लेफ्ट को जाते हैं या राइट को जाते हैं   अब बात यह है कि माँ को तो सची बात बोलनी चाहिए  मैं कोई यहाँ इलेक्शन लडने नहीं आई हूँ  जो आपकी पसंदी की बात करूँगी  जो सच होगा मुझे बताना पड़ेगा  और खास कर कलकत्ते वालों को मुझे ज़रूरी बताना है  कि जो सच है उसे आप जानिए ।   क्या बात है बंगाल सोनार बंगाल,  और बाहर सब कहते हैं भूखे बंगाली  सो क्यों;  सोनार बंगाल  यहाँ एक से एक कमल खिले  उसकी सुगंध से सारा विश्व इसे मानता है  इतनी पुण्य भूमी में  इतने बड़े उपद्रव क्यों हो गए  इतनी  क्लान परस्थिती क्यों है  कोई सोचता क्यों नहीं  क्या बात है  कि इसलिए ऐसी दशा आ गए  मा के लिए क्या बंगाल  और क्या महाराष्ट्र या पंजाब   सब ही एक होता है  और कभी कभी बहुत दुख लगता है  कि  यहाँ पर  महिषासुर को मारा गया था  वहाँ फिर महिषासुर का राज्या आ गया  और  महिषासुर को ही पूजते हैं  रामदास स्वामी ने कहा है  महिषा मरदीला चंदने  भैस को चंदन से  रगड़ रगड़ के ओर उसकी पूजा कर रहे हैं; उस महिषासुर की पूजा आज यहाँ होती है  और वो यह तांत्रिकों के नाम से  आपके घर घर में घुसे हुए लोग है।   मैं कलकत्ते आने से  शुरु से ही जरा  अन्य मनस हूँ  वज़ह  यह थी कि लोग  मानेंगे नहीं मेरी बात  यह चक्कर इनके बड़े खराब है  इनके जाल आपके उपर पड़े हुए हैं  यह तो लेफ्ट साइड  की बात हो गई। कि कोई तकलीफ हुई,   गए तांत्रिकों के पास  कोई परिशानी हुई तांत्रिकों के पास  और बहुत से तो इनमें से गुरू बनके घूम रहे हैं  और परमात्मा का नाम लेते हैं।   कृष्ण ने कहा हुआ है  जब आसुरी विद्या आएगी तो सारे सृष्टी को छा देगी  यह मैं बंगाल में देखती हूँ  यह मैं बंगाल में देखती हूँ  कि आसुरी विद्या ने सबको क्लांत कर दिया  और जब यह तांत्रिकों के पैर आपके घरों में आएंगे  आपके अंदर क्रूर और एक तरह सी  अत्यंत प्रतिशोध लेने की एक भावना उमड़  पड़ी है  हर आदमी गुस्से में; जैसे  किसी को छूने जाएँगे तो वो आगबबूला हो जाएँगे।   यह क्यों होता है?  शांती की बात करने से शांती कैसे आएगी  अब मैं कहूँ कि आप यह सब छोड़ दीजिए,  आप छोड़ेंगे नहीं यह मुझे मालूम  है,  क्योंकि मैं माँ हूँ। मैं सब कुछ जानती हूँ  बच्चों के बारे में अगर मा न जाने तो उसका प्यार किस काम का  लेकिन मैं कहने से आपको छोड़ने नहीं वाली।   यह तब छूटेगा  जब आपकी अपनी मा कुंडलिनी जाग्रत हो जाएँगी,  फिर मुझे कुछ कहना नहीं पड़ेगा;  मुझे कुछ नहीं कहना पड़ेगा  आप अपने, आप छोड़ करके दूर हो जाएंगे   क्योंकि जैसे ही आप किसी तांत्रिक के पास में जाएंगे  तो आपको उष्ण, उष्ण सी बहुत सी ऐसी हवा आईगी;  इतना की इन्हसे आपके हाथ में ब्लिस्टर्स भी आ जाएंगे  पैर में भी ब्लिस्टर्स है और भागेंगे वहाँ से  मुझे कहने की ज़रूरत नहीं।  यही आज का हमारा सहजयोग है।  पहले तो ठीक था  एक एक चक्र को साफ करो  मेहनत  करो कुंडलीनी को चढ़ाओ  बहुत से लोग कहते हैं  कि माँ कुंडलीनी का चढ़ाना बढ़ा कठेन है  वो तो है ही इसमें कोई शक्!  लेकिन हम भी कुछ हैं  तब ही तो ना ऐसे चढ़ जाती है,  लेकिन इस कलकत्ता शहर में  कुंडलीनी चढ़ाने के लिए  मुझे पहले देहातों में जाना पड़ेगा  जहां ये तांत्रिक नहीं बसते। ज्यादा  वज़ह ये है कि शहरों में पैसा है  वहीं इनका वास है;  पैसे वालों के पास से चिपकते हैं,  सत्ता वालों के पास से चिपकते हैं।   यही आपके करदन काल है  और इन तांत्रिकों से जब तक आप छुट्टी नहीं पाईएगा  आपके देश में लक्ष्मी नहीं बिराज सकती हैं।   इधर से तांत्रिक आया और लक्ष्मी के पैर छुट्टे।   ऐसे इतने भाविक लोग हैं,  परमात्मा को मानने वाले इतने सुन्दर इतने कलाकार  सब कुछ होते हुए भी  आज इतने दुखी और दरिद्री हैं  इसका कारण एक ही हो सकता है  कि आसुरी विद्या ने जकड लिया है इस देश को  पूरी तरह से जकड लिया है  इस तरह की और आसुरी विद्याएं  बहुत सारी चल रही हैं  जब भी मैं किसी भी  आपके बंगाल के  लोगों से मिलती हूं  देखती हूं कितने बड़े साधक हैं  कितना परमात्मा को खोज रहे हैं  अंदर से इतनी धुन लगी हुई  कि परमात्मा मिल जाए  लेकिन कुंडिलिनी ने नहीं चढ के दिया,  वो अंदर में कुमल्हा के बैठी हुई है;   क्या बात है;  कभी-कभी तो जैसे कोई  दुखी सर्प के तरह  इधर-उधर छट  पटाती है।  कभी-कभी देखती हूं  उस पर इतने जख्म हो गए बेचारी पर  अब पागल खाने जाने की विवशता  हो रही है। इस साधक के  क्या बात है;  वज़ह ये है  कि इन दुष्टों ने यहाँ  सबको घेर रखा हुआ है।  आज कलकते में  आप लोग इतने बैठे हैं,  मैं यहाँ आई थी  आज उसे करीबन आट साल हो गए  जिस वक्त हॉल में गए  तो एक इनसान बैठा हुआ था  इतने लोग नहीं थे, एक ही  और उसी के पडोस में  एक तांत्रिक साहब हाथ में चाबुक ले कर के  पता नहीं क्या-क्या चीख रहे थे  तो मोटर का आना भी दूभर हो गया  वहाँ तक पहुँचने में मुझे आधा घंटा लग गया।   पडोसी  तो शुद्ध बुद्धी मनुष्य की होनी चाहिए  नानक साहब ने इस पर खूब लिखा है  कबीर ने इस पर खूब लिखा है  खासकर कलकत्ते  वालों के लिए लिखा हुआ है  नानक साहब ने कभी आप गर खोल कर  उनका ग्रंथ साहब पढ़े  एक तो पूरा चैप्टर का चैप्टर उस पर लिखा हुआ,  पूरा  आज फिर मैं आप से बताने आई हूँ  कि इन के चक्कर आप पहले छोड़े  यह तो लेफ्ट साइड की बात हो गई।   अब राइट साइड की बात  जो है उसमें  हमारे जो  यहाँ पे शासक हो चुके  तीसो वर्ष तक हमें जो गुलामी में रखा है  उनोंने वाकई में  हमारे अंदर जो भी बाते भरी थी;  वो जब तक हम लोग  संग्राम में लड़ते रहे  तब तक मामला कुछ नहीं हुआ  कोई हमारे उपर उसको  डाल न सका  उनकी जो कार्य प्रणाली थी  उससे हम लोग हटे रहे  पर जैसे उन्होंने अपना डेरा उठाया,  हम लोग जाके उनके डेरे पर बैठ  गए  जो राइट साइट का आदमी होता है  ये बहुत ज़्यादा अगली बात सोचते रहता है  उसमें फिर ये  कि सत्ता कैसे मिले  पैसा कैसे मिले  वही जो ये लोग करते थे  वही आप कर रहे हैं  अब उनके बच्चे वहाँ ड्रग पी पी के मर रहे हैं।   हमारे यह बहुत अजीब सी बात लगती है कि  इस लंदन शहर मैं एक हफ़्ते में दो बच्चे मार डालते हैं;   वो भी माँ बाप स्वयं,  अच्छे बच्चे  लंदन शहर के अंदर सिर्फ  ये वहाँ के स्टाटिस्टिक्स हैं।   कोई प्रेम नहीं  पैसे से प्रेम,  सत्ता से प्रेम  लेकिन अपने बच्चों से प्रेम नहीं।   गरीबी का एक फायदा है  कम से कम आपस में प्रेम होता है,  कम से कम बच्चों को प्यार करते हैं।   तो ये जो पैसे की धुन शुरू हो गई  तो उसमें क्या  उसमें पैसा मिला, उसमें बिजनेस हो गया  उसमें ठीक हो गया  जो भी करना चाहे  ठीक है, उसमें क्या है  इस प्रवृत्ति की वजह से  आज वो इस कगार पर जा के पहुंचे  कि उनके बच्चे  अब सब ड्रग ले रहे हैं  और आपके भी लेंगे  उसे; वो दिन दूर नहीं।   आप भी ले सकते हैं!  क्योंकि जब जान लिया  कि इस पैसे के पागल पन में  हम वहाँ नहीं पहुँचें जहां पहुँचना था  जब ये समझ गए  कि इस सत्ता में  कभी तो उपर होते हैं, तो कभी नीचे  तो कभी उपर, तो कभी नीचे  की शटल कोक की जैसे घूमा करते हैं  तब पता हुआ कि इसमें भी आनन्द नहीं है;  तो आनन्द कहा है?  ये हमारे शास्त्रों में  इतना सुन्दर लिखा हुआ है  आपको आश्चर्य होगा  कि सारे संसार में  जो आज आप देख रहे हैं  बड़े बड़े पेड़  Civilization के खडे हुए हैं  एक पत्ता  दूसरे पत्ते को नही जानता  एक पत्ता दूसरों से प्यार नहीं करता।   इससे मुझे क्या है कि इनकी जडे ही, इनको कि मानो है ही नहीं  इन्में जड है ही नही।  जड़ से उखडे हुए लोग क्या कर सकते हैं  फिर खासकर हमारे हिंदुस्तानी जो विलायत में जाके ठहरे हुए हैं  वो तो ऐसे हैँ, मैं कहती हूँ कि अगर   आम का पेड़ जाके इंग्लंड में लगाई है  तो उसमें आम तो आएगा ही नहीं  लेकिन उसमें ऐपल भी नहीं आने वाला  वो हालत इन लोगों की है  और जो हम यहां बैठे हुए हैं  वो इन्ही से बहुत ही प्रेरित हो करके  उनके ढंगों पे चले जा रहे हैं  और जब हम लेफ्ट साइड में रहते हैं  तो उपास, तपास, दुनिया भर की फाल्तू के कर्मकांड  स्त्री आचार और ब्राहमनाचार्  जिसे कहते हैं  इसमें फ़स गए  और जब राइट साइड में चलते हैं  तो इन लोगों का अनुचरण करके  उनी के खाई में हम जा के  गिरेंग। खाई दोनों ओर है। और  सो उर्धवगामी में जाने के लिए,  इस मूल की और जाने के लिए  कुन्डलिनी का ही एक रास्ता है। अब कोई कहेगा कि श्री कृष्ण ने  ये कहा नहीं है कि कुन्डलिनी कोई चीज है।  छह हजार वर्ष की बात है उस वक्त सिर्फ अर्जुन से ही तो ना बात हुई थी और वो भी युद्ध में उस वक्त कहने की बात न थी कि कुन्डलिनी क्या चीज़ है जो बात कहनी थी सो कह दी कि ये ऐसे होना चाहिए, स्थित प्रज्ञ होना चाहिए; पहले ही उन्होंने उतरते साथ कह दिया, वो कोई बिजनस वाले नहीं थे, तो जो सत्य था पहले कह दिया। पर कैसे? भाई! कृष्ण से पूछे की कैसे उन्होंने ये नहीं बताया है, समय नहीं था; समयाचार होता है। उन्होंने बताया नहीं कैसे उनके बाद कितने दिनों बाद महाराष्ट्र में ज्ञानेश्वर जी हुए, उन्होंने छटवें अध्याय में बिल्कुल पूरी तरह से लिख दिया कि कुन्डलिनी से ही ये कार्य होता है। लेकिन वहाँ फिर बताया गया देखो भाई छटा अध्याय नहीं पढ़ना इसी तरह से छटा अध्याय मत पढ़ो! क्योंकि लोगों के फिर पेट नहीं भर सकते क्योंकि कुन्डलिनी जागरण में कोई पैसे ऐसी की ज़रूरत नहीं उसमें अधिकार की ज़रूरत है तो ये हुआ कि छटा अध्याय पढ़ने का नहीं बाकी सब पढ़ो आपको आश्चर्य  होगा कि ज्ञानेश्वर जी जिन्होंने ने ध्यान धारना पर इतना कुछ लिखा उनका एक बड़ा सुन्दर मंदिर हमारे बंबई में बना हुआ है, वहाँ जब हमारा प्रोग्राम होना था उनहों ने कहा यहाँ ध्यान नहीं करने का तो मैंने कहा क्या करने का मराठी में उससे कहते हैं दिन्द्या गालने का जैसे हरे रामा हरे रामा यहां करते हैं ना वैसे महाँ हाथ में लेजिम ले करके हरे राम हरे राम हरे राम उसको दिन्द्या गालने कहते हैं वो करते हैं महीना भर जाते हैं पंधरपूर; और वहाँ जा करके वहाँ जो ब्राहमन बढ़वे होते हैं उनका सर फोड़ते हैं जैसे कि नारियल को फोड़ देते हैं। यह कौन सी संस्कृति यह क्या भारतिय संस्कृति हो सकती है जहां साधकों के सर फोड़ते हैं लोग। सो उन्होंने कहा यहां वो आप कर सकते हैं ध्यान नहीं कर सकते हैं इतनी सुन्दर मूर्ति बनाए हुए थी पता नहीं कौन मूर्तिकार ने ज्ञानेश्वर जी की बनाई; मैंने कहा अगर यह मूर्ति साकार हो जाए या सजीव हो जाए तो कोई बात करें या तो ज्ञानेश्वर  जी यहां खड़े हो तो बात करें अब तुम लोगों से क्या कहें क्या उन्होंने दिंदी की थी तो वो तो ज्ञानेश्वर  जी थे और हम तो ज्ञानेश्वर  जी नहीं तो मैंने कहा यह दिंदी की प्रथा निकाली किसने उन्होंने तो एक अक्षर भी कहीं लिखा नहीं कि ऐसे दिंदी करते चलो और दोड़ते चलो और कुदते चलो तो यह कहां से निकली प्रथा शास्त्रों में इसका कोई अधिकार है कि नहीं कुछ तो बताना चाहिए; अपने शास्त्र जो लिखे हैं उसमें कहीं है। ऐसे एक दूसरे महाशय आये कि जो कुन्डलिनी के वक्त जागरण का समय, तो दोनों पैर मेरे और करके बैठे तो इन लोगों ने कहा कि ऐसे तो नहीं बैठते ना माँ के तरफ पैर करके। 

उसने कहा, भई देखो मेरी कुन्डलिनी जाग्रत हो गई है और अगर मैं गोड डाल के बैठता हूँ तो मेंड़क के जैसे कुदता हूँ।  मैंने कहा है ये क्या बात है मैने बुलाया भाई ये कैसे हो गया तुम्हारी कुन्डलिनी जाग्रत होने पर क्या अब तुम मेंड़क होने वाले है; हरे अब तुम अति मानव होने के जगह मेंड़क कैसे होगए। तो आप विश्वास नहीं करिएगा इतनी बड़ी मोटी किताब लाके मुझे दिखाई। उनके गुरुजी महराज ने लिखा था कि जब कुन्डलिनी जाग्रत होती है तो मनुश्य मेंड़क के जैसे कुदता है। मैंने कहा ये क्या तमाशा है और मैंने इतना रुपिया कुण्डलिनी जागरण के लिए दिया ये तो ऐसी ही मुर्खता है जैसे कि किसी बीज को आपको बोना है तो आप जाकर पृथ्वी में वहाँ सब रुपिया रख दिजिए’ हे पृथ्वी माता इस हमारे बीज में अंकुर ला दो वो पृथ्वी को क्या पैसा कौड़ी समझ में आती है कि उसको आप अंकुरित कर दिजिए’ तो अंकुरित हो जाएगा, और नहीं करिये तो पड़ा  रहेगा।  उसको इसका क्या महत्व है, समझ में आता है; उसको तो एक ही कार्य मालुम है, कोई अगर बीज मेरे पेट  में आया उसको अंकुरित कर देना। इसी प्रकार अगर हम एक बात समझ लें तो सत्य आपको मिल सकता है सत्य जीवन्त चीज है मरी हुई चीज नहीं है। मनुष्य तो सिर्फ मरी हुई चीज पा सकता है जैसे कि एक पेड़ गिर गया बड़ा बढ़िया फर्नीचर बना दिया; वो पेड़ मर गया तो एक मरा हुआ फर्नीचर बना दिया आपने अब उस पर आप बैठ गये तो आपको अब कुर्सी की आदत हो गई, अब आप जमीन पर बैठ नहीं सकते, वो पेड़ आपके खोपडी पर बैठ गया अपने साथ कुर्सी लेके घूमना पड़ेगा नहीं तो आप बैठ नहीं पाएँगे। मरी हुई चीज से मरी चीज बनाई और आप भी उसमें लिप्त हो गये क्योंकि वो जो मरी हुई चीज थे उसने आप के उपर आसन जमा लिया मानें जड़ ने आत्मा के उपर आसन जमा लिया। तो सत्य एक जीवन्त चीज है, जीवन्त ही नहीं सर्व बुद्धी का स्त्रोत सत्य है। मैंने आजकल सुना कि नारणीकर ने, एक बड़े भारी साइंटिस्ट है, उन्होंने पता लगाया है कि जो विश्व में शक्ति भी है लेकिन उसके साथ इंटेलिजन्स भी है; चलिए कहीं तो पहुंझ गए साइंटिस्ट लेकिन ये जीवन्त चीज है और जो हम जीवन्त हैं उसका ये स्त्रोत है सारे दूर फैली हुई ये शक्ति इस जीवन्त शक्ति के लिए मरी हुई चीज करने से क्या फायदा होगा। परमात्मा एक जीवन्त वस्तू है, समझ लिए एक जीवन्त शक्ति है और वही जीवन्त शक्ति चारो तरफ फैली हुई है, ये जीवन्त प्रेम है यही चीज शायद हम भूल जाते हैं, इसलिए ऐसी चीजों का आलिंगन करते हैं कि जो जीवन्त नहीं। जिनको पार होना है और जो परमात्मा को पाना चाहते है उनके लिए एक मेरी हाथ जोड के विनती है कि ये जान ले कि ये जीवन्त क्रिया जो हमारे अंदर स्वयं चालित, अउटोनॉमस नर्वस सिस्टम, है उसमें जो पैरासिमपथेटिक नर्वस सिस्टम है जो शुशमण।  नाड़ी से चालित है वो सब जीवन्त शक्तिया हैं। अगर हमारे अंदर ये जीवन्त शक्तिया न होती तो हमने कारबन से ले करके आज तक की प्रगति कैसी की होती। ये धर्मशक्ति से हुआ है और ये धर्मशक्ति जीवन्त है अगर आप इतनी सी बात को मान लें तो मैं ये कहुंगी कि कुंडलिनी शुद्ध इच्छा है शुद्ध इच्छा जो परमात्मा की इच्छा है ये शुद्ध इच्छा आप सबकी एक-एक माँ है और वो आपको जागृति  देगी; और वो जानती है और सोचती है और आपने जो कुछ भी किया है और सोचा हुआ है वो सारा उसके पास रेकॉर्ड़ेड है, इतनी जानकार तो कोई चीजी नहीं जितनी कुंडलिनी है वो उस छण के इंतजार में है कि आपको आत्मसाक्षातकार हो। आज के सहजयोग में हमने यही सोचा कि अगर सामुहिक, आमास लोगों को जाग्रत कर दिया जाए तो क्रांती हो जाएगी। आदमी, लेकिन हर आदमी की खोपडी एक जैसी नहीं होती उसके अंदर की व्यवस्था एक जैसी नहीं होती कि हर एक के कोई ना कोई चक्र खराब होते हैं तो बहुत मनन पूर्वक यह जाना कि हर मनुष्य के आकार, प्रकार किस तरह से एक साथ बिठा जाए, जैसे की permutations, combinations कहते हैं और वो बिठा करके आज का सहजयोग खड़ा इसलिए किया कि अगर आज हम उनसे कहें कि भाई देखो तुम इसका त्याग करो, ये करो वो करो, तो यहां कोई बैठेगा ही नहीं और कोई त्यागने की बात ही नहीं होती असल में यह तो बाह्य की बात है। त्यागना तो अंदर से होता है, जिसने त्याग दिया है वो किस चीज को त्यागेगा; जब त्यागा ही हुआ है तो अब त्यागेंगे किसको, जब कुछ पकड़ी नहीं है तो त्यागने का क्या है? लेकिन यह जो बाह्य के मामले चलते हैं कि इसको त्यागो, उसको त्यागो उससे कुछ लाभ होने वाला नहीं। तो ऐसा क्यों न करें, कि सबके अंदर कुंडलिनी जाग्रत  कर दें थोड़ी धुक धुकी क्यों न हो? थोड़ा प्रकाश अजाए जिस में तो मनुष्य यह सोच लेगा कि हाँ यह कोई तो भी गड़बड़ चीज मैंने हाथ में पकड़ी है।  अगर साप हाथ में पकड़ा हो और हम कहे छोड़ो तुम्हारे हाथ में साप है क्या  कहते हैं? हमारे हाथ में तो डोर है साप है छोड़ते क्यों नहीं? नहीं यह तो डोरी है अच्छा थोड़ी सी लाइट आते साथ अरे बाब नहीं, छोड़ दिया। इसी प्रकार हमें आश्चर्य होता है इस सहजयोग में परदेस में इतने जादा शराबी लोग अलकोहॉलिक्स, दुनिया भर के गंदे काम करने वाले लोग जिनकों की आरोपित किया जाता था कि ये छटे हुए बदमाश हैं, और बड़े वाले लोग हैं एक दम शांत चित हो गए और उसके बाद स्थित हो गए; उस जगह जहां उनका स्थान है उस गौरव में क्योंकि छूट जाती चीज।  आज जबकि एक आदमी को देखा था आज आप अनेकों को देखा है।  जीवन तो चीज ऐसे  धीरे धीरे ही चलता है। आज देर भी हुई और काम देर से भी शुरू हुआ है लेकिन एक बात जाननी चाहिए कि हर एक चीज को योग साधन बनाने से पहले उसका समय आना पड़ता है। कभी भी देर हो जाए तो जिन में सबुरी होती बैठे रहते हैं लोग, जिन में नहीं होती चले जाते हैं; वो चाहे आप काम पहले शुरू करें  या बाद में, जो चले गए बेकारी लोग होते हैं। आज देर भी हुई तो हम देख रहे थे क्या करें पहुँच नहीं पा रहे हैं जो भी असुविधा थी उसे देख रहे थे और ये सोच रहे थे कि जो भी है जैसे परमात्मा की इच्छा जब पहुचना होगा तभी पहुंचेंगे, उससे पहले तो पहुँच नहीं पाएंगे। कोई भी व्याकुलता नहीं हुई; और Music भी जो हुआ आप लोग सब इस इंतजार में थे कि माँ कब बात करेगी और हम तो खुद मजा उठा रहे थे क्योंकि उससे भी तो कुंडलिनी जागृत हो सकती है। अगर हम बोलें चाहें न बोलें कुंडलिनी तो जागृत हो सकती ही है पर आजकल ऐसा है कि अगर बोलिये नहीं तो लोग कहते हैं कि ये कुछ नहीं कर सकती और अगर बोलिये तो भी झगड़े करते है, बहराल जो भी हो माँ  तो ऐसी होती है कि वो सब अपने बच्चों के सारी ही बाते खुद प्यार से देखती है; ये सब चलते ही रहता है ये सब होना ही है ऐसा नहों तो आप लोग मानव कैसे हैं लेकिन एक बात माननी पड़ेगी कि जब मानव हुए है तो जो चीज़ आपकी अपनी है अपनी संपदा है, आपका सब कुछ है उसे क्यों न पाले क्यों ऐसी चीज़ों के पीछे में इन धार्णाओं के पीछे में एक mental projections बना बना करके मनुष्य ने जो बना लिया है अपने तरफ, चारों तरफ, एक किले बना के रखे है। मैं कहती हूँ, कृष्ण ने जो कहा, सो हुआ राम ने जो कहा, सो हुआ चलिए आज आप सामने मेरे हैं पुछे मुझसे और लीजिए इसे, पाईये इसे, फिर बात करेंगे कृष्ण और राम इसलिए बुद्ध ने हमेशा कहा कि बाबा पहले तुम लोग आत्मसाक्षातकार को प्राप्त करो, भगवान की बात ही नहीं करो सिर्फ एक ही बात करो कि आत्मसाक्षातकार हो जाए क्योंकि उससे पहले बोलना तो ऐसा ही हुआ कि आपके बगैर ही आप इतने  सुंदर सभागार उसके बारें मैं बताए; जिसको दिखाई ही नहीं देता उससे झगडा करने से फायदा क्या इसलिए उनको लोग कहते हैं कि वो अनिश्वरवादी थे; यहाँ जैनियों में भी यह विश्वास है कि उनके यहाँ भी अनिश्वरवाद है सो बात थी आप तो जानते हैं कि महाबीर जी और बुद्ध बिल्कुल समकाली थे और दोनों ने यहीं सोचा कि मनुष्य जो खो गया है इन सब बेकार की चीज़ों मैं, इसमें से निकालने का एक ही तरीका है कि सिर्फ आप निराकार की बात करो। और उसमें भी सिर्फ आत्मा ही की बात करो यही बात मुहम्मद साहब की हुई है कि उन्होंने सिर्फ निराकार की बात करो पर बात की; बात बात ही रहेगी हर जगह यह तो दिखाई देता है इसका प्रत्यक्ष होना चाहिए और साक्षात होना चाहिए और अगर आपके अंदर वो साक्षात हो जाए तो आपके भाग्य के और हमारे तो हैं ही। आप सबको परमात्मा सुबुद्धी दे कल और परसों ज्यादा विस्तार पुर्वक सारी बातें बताएँगे। आज जो भी संगीत हुआ है उससे सब लोगों में शान्ति प्रदान हो और आप लोग अपने उत्तम मार्ग में परमात्मा को पाएं यही माँ की एक सदिच्छा है और कोई चीज मुझे नहीं चाहिए। मेरे पास से जो कुछ भी मेरी शक्तियां हैं जिसे शायद आप सोचते हैं वो सब आप पा लीजिए तो मैं धन्य हो जाऊ। अभी तो आपको साक्षात हुआ है? हुआ है नहीं चले जा रहे हैं पार हो जाओ! बहुत से लोगों को सिर्फ लेक्चर सुनने का ही शौक होता है अभी मेरा लेक्चर सुना फिर अभी शाम को और किसी का होगा वहाँ जाएंगे इसलिए मैं कहती हूँ कि भाई पार हो जाओ ना। अब आप लोगों में से किसी को बाहर जाना तो थोड़ी देर हो आए उसके बाद एक दस मिनिट और लगेगी मैं कोशिस करती हूँ कि आपकी कुंडलिनी सबकी जाग्रत हो जाए। देखिंये कृपया आप बीच में ना उठियेगा क्योंकि दूसरे बीच डिस्टर्ब हो जाते हैं और कुंडलिनी का जागरण ये सहज है spontaneous  क्योंकि ये जीवन्त क्रिया है। ‘सह’ माने आपके साथ और ‘ज’ माने पैदा हुआ ये योग का अधिकार  हरेक मनुष्य मात्र को है; और हरेक इसके लिए पात्र भी हो सकता है ये मैं नहीं कहूंगी कि किसी की योग्यता नहीं है कि जो बोझे हमने अपने सर में लाद लिए हैं वो अगर कुंडलिनी भस्म कर दे या उनको हटा दे तो कार्य जल्दी हो जाता है। तो उसके लिए सहायक होने के लिए मैं आपसे ये विनती करूँगी कि आप सबसे पहले ये सोचें कि आप परमेश्वर के मंदिर हैं आप परमात्मा के मंदिर हैं; मानव को परमात्मा ने बहुत सँजो कर, प्रेम से बनाया हुआ है और हर समय कहना कि मैं पतित हूँ और मैं दोषी  हूँ ये बात ठीक नहीं। माँ की दृश्टी में तो बहुत ही दुखदाई बात होती है अगर बच्चा आ के माँ के सामने सर पीट पीट कर कहे कि मैं बड़ा दोषी  हूँ, मैं बहुत बुरा हूँ सो तो माँ सह नहीं सकती। यही आपकी कुंडलिनी का हाल है कि वो इस बात को नहीं मांनती कि आप दोषी  हैं क्योंकि वो सोचती है कि पर्मात्मा की क्षमा  शक्ती इतनी जोरदार है कि कोई सा भी दोष  आप में लग नहीं सकता इसलिए सर्व प्रथम आपको अपने को ही क्षमा  कर देना है पूरी तरह से अपने को क्षमा  कर दीजिए पूर्णतया  अपने को क्षमा  करें और ये जानें कि आप पर्मात्मा के मंदिर हैं कोई सा भी दोष  आपके अंदर नहीं है किसी भी तरह का दोष  आप अपने उपर मत उठाएं। हमारे भाषण में भी हो सकता है कोई ऐसी बात हो गई हो जिससे आप में ये धारणा हो गई कि आपने दोष  किया या गलत काम किया है तो कृपया हमारा भाषण भी आप भूल जाये ये तो अच्छा रहेगा सिर्फ ये जानीए कि आप में कोई भी दोष  नहीं है आप पर्मात्मा के बनाए हुए अत्यंत सुन्दर मंदिर है बस; इसमें एक दीप मात्र जलाना है सबसे पहली बार हिंदुस्तानियों में ये विशेषता है कि बहुत ज्यादा अपने को नीचे गिरा हुआ समझते हैं और बहुत लोग ये भी कहते हैं कि माँ हम इस योग्य कैसे कि कुन्डलिनी जाग्रत होगी।  अब यह हमें तय करने दिजिए, आप क्यों परिशान हो रहे हैं अपने लिए आप अपने को क्यों दोष दे रहे हैं, तो सबको प्रसन चित्त होकर बैठ जाएँ; परमात्मा के सामराज्य में जा रहे हैं तो इतना सीरियस होने की कौन सी बात है प्रसन चित्त होकर के प्रफुल्लित होकर के बैठ जाएँ क्योंकि कुन्डलिनी जो है वो अल्हाद दायनी शक्ती है। वह  अल्हाद पहले आप पाए, इसलिए अपने ऊपर पूर्ण विश्वास रखे आप। अब ये छोटा सा मार्ग है, बहुत ही छोटा सा है जो की त्रिकोणा-कार  अस्थि से ब्रह्मरंद्र तक कुछ थोड़े से ही अंतर पे आपको परमात्मा का सामराज्य मिल सकता है; इसलिए कोई भी प्रयत्न करना नहीं, कोईसी भी दुविधा में जाना नहीं, आराम से बैठे कोई भी तरह का अपने ऊपर आरोपन करना नहीं। दूसरी बात की किसी भी तरह से कोई चीज अगर कस रही हो उसे आप ढीली कर लें, आराम का मतलब ये नहीं कि आप ढीले हो के बैठे, लेकिन अपने को सीधा कर लें गर्दन सीधी कर लें और दोनों पाँव जमीन पर ऐसे रखें कि वो समांतर रहें। इस तरह से वो समांतर रहें यह नहों कि एक के ऊपर एक चढ़ जाए लेकिन इसका ख्याल रखें कि दोनों पाँव समांतर हो; अब जैसा कि मैंने पहले आप से कहा कि आप अपने को किसी प्रकार भी दूशित न समझें और दोषी  न समझें दूसरी बात है कि आपको ही मैं आपकी कुंडलिनी जगाने की क्रिया बताती हूं। असल में ये तो है प्रक्रिया पर अपने चक्र कौंन से कौंन से है उसका थोड़ा सा ज्ञान इससे हो जाएगा इसलिए बेहतर है मैं आपको ही बता दू ये जो हाथ है ये आपकी इच्छाशक्ति है लेफ्ट हैंड मैं, इसलिए मैं कहती हूं क्योंकि हिंदी में भी कभी इसे कोई दाई कहता कोई बाई कहता तो ये जो लेफ्ट हैंड है इस लेफ्ट हैंड को आप अपनी इच्छाशक्ति को मेरी और ऐसे रखें जिसका अर्थ ही होगा कि आपकी इच्छा है कि आप आत्मा को पाना चाहते है, आपको आत्म साक्षात कर सकते है और ये आपका जो हैंड है, राइट हैंड इससे ही क्योंकि ये क्रिया-शक्ति है, क्रिया-शक्ति है इससे आपकी कुंडलिनी के चढ़ने पर या उसको जाग्रत करने में जो सहायता लेनी है, वो ली जाएगी बहुत आसान चीज है। लेकिन आप लोग अपने पर विश्वास रखते हुए इस कार्य को करें तो पहले तो मैं कहुंगी कि हाथ अपने हृदय पर रखें, यहाँ आत्मा का स्थान है पेट के उपरी हिस्से में रखें जो की गुरू तत्व है सब काम हम लेफ्ट  साइड में करेंगे। सब काम लेफ्ट  साइड में करें तो लेफ्ट  साइड में पेट के उपरी हिस्से में रखें फिर निचली हिस्से में रखें फिर उपरी हिस्से में रखें फिर से हृदय पर रखें फिर गर्दन में यहाँ पर यह विशुद्धि चक्र श्री कृष्ण का है लेफ्ट  साइड में इस तरह से गर्दन मोड़ के रख ले। उसके बाद यहाँ माथे पर इस तरह से इसे कपाल कहा जाया इस तरह से रखना और दोन तरफ से दबाना है, यहाँ फिर पीछे ले जा करके सर फेर के और आग्या चक्र के पिछे की ओर रखना है फिर अपना हाथ ऐसे तान कर इसका तलवा जो है यह बराबर तालू पर दबा करके रखना और उसे साथ बार घुमाना है सब लोग यह कार्य करें। लेकिन इसके बाद अब हम लोग सब आँख बंद कर लेंगे आँख नहीं खोलना। इसमें मेसमेरीज्म नहीं है, यह अंतर योग है इसलिए क्योंकि चित अंदर खिचता है। अच्छा है कि हम आँख बंद कर लेंगे अगर आँख बंद नहीं रहेगी तो चित जो है वो बाहर की ओर खीचेगा इस वज़ह से आँख बंद कर लेंगे कोई भी मंत्र नहीं कहना है कोई भी हाव भाव नहीं कहना है किसी भी बाह्य चीजों को नहीं करना है यह अंधर अपने आप घटित होने वाली चीज है उसे अपने आप सहज में ही घटित होने दीजिए। किसी को कोई तकलीफ नहीं होती किसी को कोई परिशानी नहीं होती मैं जानती हूँ कि आप में से कुछ लोग मुझसे सवाल पूछने के लिए भी बहुत लालाईत है मैं सब कुछ जानती हूँ लेकिन मैं चाहती हूँ कि आज कोई सवाल नहीं पूछे आपको जो भी सवाल है आप लिख करके और मुझे कल आप मेरे आने से पहले यहां किसी के पास दे दीजेगा मैं उनका उत्तर दे दूँगी। पर आज उन सवालों को पकड़ के मत रखे उनको जरा थोड़ी देर को छोड़ दीजिए’; सवाल का जवाब देने से भी कुंडलिनी जागरण नहीं होगी और अगर नहीं होनी होगी तो होगी ही नहीं यह तो आपका भाग्य है और हमारा भाग्य है; जिसकी होगी उसी की होगी इस वज़ह से मैं कहती हूँ कि बाह्य के उपकरणों को बिलकुर छोड़ करके और छोड़ दीजिए, कुंडलिनी पर ही छोड़ दीजिए, आपकी अपनी वो माँ है और वो आपको आत्मदर्शन कराएगी इसलिए आप कृपया इसका विचार ही छोड़ दें। कुंडलिनी के जागरण होने पर आपको पता चलेगा कि आपके तालु भाग से ही ठंडी ठंडी हवा निकल रही है, सलीलम सलीलम जो वर्णन किया हुआ और उसके बाद आपके हाथ में भी चारो तरफ यह जो परमात्मा की शक्ति है वो भी महसूस होने लग जाएगी; किसी किसी को हाथ में जलदी होती किसी को सर में होती है। जो भी बात है, कुछ नहीं; कुछ चक्रों का दोष  होता है उसको साफ करना होगा तो सबसे पहले अपने उपर विश्वास रखे और एक महान परमसत्य है कि आप स्वयं आत्मा है शरीर, बुद्धी, अहंकार आदी चीज़ आप नहीं, आत्मा हैं आप को आत्मा मात्र होना है अब इस हाथ को आप यहां रखें हृदय पर यह हाथ मेरी और करें और दोनों पैर समानतर, पैरलल रखें जमीन में अब कृपया आँख बंद कर लें और आँख न खोले, कोई भी आँख न खोले; हृदय  पर हाथ रखे आपको एक सवाल मुझसे पूछना है जो की मूलभूत प्रश्न है जैसे कंप्यूटर से पूछा जाता है ऐसा ही ये मूलभूत प्रशन है जो पूछे श्री माता जी क्या मैं आत्मा हूँ तीन बार ये सवाल पूछे मन में पूछे सवाल। अब ये हाथ पेट के उपरी हिसे में लेफ्ट साइड में रखे राइट हैंड को पेट के उपरी हिसे में लेफ्ट साइड में रखे यहाँ पर गुरू तत्व का चक्र है मानें गुरूने जो हमें प्रदान किया है वो तत्व यहाँ पे स्थित है अगर आप आत्मा हैं तो आप ही आपके गुरू हो जाते हैं इसलिए यहाँ पर हाथ रखे या उंड्लियों से दबा कर दूसरा प्रशन आपको मुझसे से तीन बार करें श्री माता जी क्या मैं स्वयम का गुरू हूँ, पूर्ण विश्वास के साथ; इसमें कोई भी सद्गुरूं की अवहेलना नहीं हो रही है, श्री माता जी क्या मैं स्वयम का गुरू हूँ आँख नहीं खो लिए कृपया  और सब लोग करें कोई छूट न जाए अब अपने राइट हैंड को पेट के निचले हिस्से में लेफ्ड साइड में आप दबा कर, ये शुद्ध विद्या  का स्थान है शुद्ध विद्या   माँने  परमात्मा की जो विद्या है।  जिसे हम जान सकते हैं।  इस जगह हाथ रखे  आपको मुझसे कहना होगा।  क्योंकि आप स्वतंत्र हें  मैं आप पर जबरदस्ति नहीं कर सकती हूँ।  इसलिए आपको कहना होगा  कि मा मुझे शुद्ध विद्या  दीजिये।  श्री माता जी मुझे शुद्ध विद्या  दीजिये।  क्योंकि इसकी जबरदस्ति नहीं हो सकते।  ये छे मरतबा कहिए  ।  क्योंकि इस चक्र में  छे पंखुडिया हैं। 

 अब कुन्डलिनी का जागरण शुरू होता है।  अब आप अपना राइट हैंड उठाकर   लेफ्ट साइड में पेट के ऊपरी हिस्से में रखें।  यहाँ पर पूर्ण आत्मविश्वास के साथ  आपको कहना होगा  श्री माता जी मैं स्वयम का गुरू हूं।  कारण आपके आत्मविश्वास के ही फलस्वरूप  आपका स्वाधिष्टान चक्र खुलेगा  और उसमें कुन्डलिनी बढ़ सकती है।  इसलिए कृपया कहें कि मा मैं स्वयम का गुरू हूं।  यह आपको दस बार कहना होगा  क्योंकि हमारे अंदर गुरू के तत्व दस हैं।  धर्म के तत्व दस हैं  और इसलिए गुरूत्व के भी तत्व दस हैं। 

अच्छा  अब इस राइट हैंड को उठा करके  अपने हृदय  पे रखें, अपने हार्ट पे रखें  और कहें पूर्ण आत्मविश्वास से  जो की परम सत्य है  श्री माता जी मैं आत्मा हूं।  बारह मरतबा कहें  श्री माता जी मैं आत्मा हूं।  बारह मरतबा कहें   अब इस राइट हैंड को उठा करके  गर्दन और आपका कन्धा  इसके बीच में जो त्रिकोण होता है  उस पे रखें  जरा हाथ पीछे की और ले जाएं, सामने से  पीछे से नहीं, सामने से  आडा करके  और गर्दन को  अपनी राइट साइड में मोड ले  राइट साइड  यह चक्र फिर विशुद्धी का है 

 विशुद्धी का चक्र है  इस विशुद्धी चक्र में  अगर आप अपने को  दोषी  समझते हैं  तो बड़ी भारी  अरचन आ जाती है  इसलिए  यहाँ पर आपको कहना होगा  सोलह मरतबा  क्योंकि श्री कृष्ण का चक्र है  सोलेह  मरतबा आपको कहना होगा  श्री माता जी  मैं बिल्कुल दोषी  नहीं हूँ  पर्मात्मा  दया  और करुणा के सागर है  लेकिन उससे भी बढ़कर  उससे भी  गहन में  अपनी क्षमा  की शक्ति इतनी  सुन्दर है  और इतनी तेजस भी है  कि आप कोई साभी ऐसा दोष  नहीं कर सकते हैं 

 कि जो वो  अपनी शक्ति के द्वारा  नष्ट न कर दें  इसलिए कृपया  अपने को क्षमा  करते  हुए कहें  अगर आप अभी सोचते हैं आप बड़े दोषी  हैं  तो आप अपने को सजा दे लीजिए।   आप चाहें तो  एक सो आठ वर्तवा कहिए कि  विशुद्धी का चक्र है   मैं दोषी  नहीं हूँ, दोषी  नहीं हूँ, दोषी  नहीं हूँ  लेकिन मैंने आपसे पहले कहा था कि  प्रसन चित हो करके ही  परमात्मा के दरबार में जाना चाहिए।  अब इस राइट हैंड को उठा करके   

 अपने कपाल पे आड़ा पकड़े  और दोनों तरफ से दबाए  जैसे कि सरदर्द होते वक्त हम दबाते हैं  यह आज्ञा चक्र की  बाहर की खिड़की है  इस चक्र पे हमें एक चीज़ कहनी होगी  मा मैंने सबको क्षमा  कर दिया  श्री माता जी मैंने सबको क्षमा  कर दिया  हृदय से कहें कितने बार का सवाल है  कपाल पे सर पे नहीं कपाल पर रखें  कपाल माने सामने जो फोर हेड होता है उस पर  फोर हेड पर रखें  और उसे दबाएं  हृदय से कहें, हृदय से कहें  बहुत से कहते हैं कि बहुत कठिन है;  लेकिन न क्षमा करना कठिन है  और नहीं करना कठिन है  दोनों ही मिथ्या चीज है  किन्तु  अगर आप क्षमा  नहीं करते हैं  तो आप किसी के हाथों खेलते हैं  इसलिए पूर्ण हृदय से एक  बार कह डाले  कि माँ मैंने सब को क्षमा  कर दिया  एक दम, पूरे मन से कह डिजिया   इसके पश्चात अपना हाथ  सर के पीछे की और ले जा करके  जोर से  दबाएं और सर को पीछे फेकें  तो उस पे झेल ले  बहुत ज़्यादा नहीं थोड़ा सा  और इस जगह   अपने समाधान के लिए चाहिए तो  एक बार पर्मात्मा से कह दें  कि मुझसे अगर कोई गलती हो गई हो तो मुझे क्षमा  कर दीजिए  बस।  पर इसका यह मतलब नहीं  कि आप अपने दोष  निकालने लगें  और उसकी सब बड़ी भारी लिस्ट पर्मात्मा के सामने रखने लगें,  सिर्फ इतना ही कहना है  और वो आपको क्षमा  कर दीजिए   आप जो है अपना हाथ पूरी तरह से तान करके  और अपने तालू पर रखें बराबर बीचों बीच ।  और इसको जोर जोर से घुमाना नहीं है  धीरे धीरे धीमे धीमे घुमाना है  दबा के धीमे धीमे सात बार आप घुमाईए  अब अपना हाथ धीरे से नीचे ले लेगे  और धीरे धीरे आँख खोले। 

  हमारे और देखिये  और विचार नहीं करें  विचार से परे है सब  विचार नहीं करें  अब अपना right hand हमारे और ऐसा करें  जरा उपर को  और left hand से कोई समझ लीजे  तीन इंच चार इंच पर इस तरह से  देखें कि यहाँ कोई ठंडी ठंडी हवा तो नहीं आ रही है।  Right hand हमारे और करें।  सर पे यहाँ चित रखें।  तालु पर चित रखें देखें।  आँख खोलें।  अब इस हाथ को मेरे और करें।  अब इस हाथ से देखें। 

 कोई ठंडी ठंडी हवा आ रही है।  अब यह ना सोचे कि एयर कंडिशनर है, कोई चीज़ है।  आपके सर में एर कंडिशनर तो नहीं है ना।  उसमें से ठंडी ठंडी हवा आ रही है।  फिर यह हाथ करें।  अब दोनों हाथ आकाश की और करकें।  सर पीछे फेक कर एक सवाल पूछें “मा! क्या यही ब्रह्म शक्ति है! यही परमात्मा की प्रेम शक्ति है! यही क्या वोह शक्ति है जिसे कि रूह कहा जाता है। अब हाथ नीचे कर लीजिए। अब दोनों हाथ हमारे और करें।  देखिए हाथ में कोई ठंडी ठंडी हवा आ रही है।  जीज़ नहीं है कोई ठंडी ठंडी हवा आ रही है।  जिन लोगों के तालु से या हाथ में ठंडी ठंडी हवा लगी हो।  वो दोनों हाथ उपर करें।  सारा कलकता ही पार हो गया।  यही तो है पार उतर गए संत जन।  फिर कल फिर आयेगा।  परसो आयेगा।  तीन दिन में पक्का बिठाना है सब कुछ। आज जो यह ठंडी ठंडी हवा है  यही वो सलीलं, सलीलं जिसका वर्णन है।  यही वो शीतल  जिसको की वर्णित किया हुआ है, सौन्दर्य लहरी  है।  इसको आपने थोड़ा सा महसूस किया है, किसी ने नहीं भी किया, कोई बात नहीं।  कल आप आईएगा, परसों  आईएगा  मैं पूर्ण विवेचन कर दूँगी  और जो कुछ भी  जाना है, आप मुझसे जान सकते हैं  आज पैर वैर छूने की  कोई जल्दी नहीं है  क्योंकि हमने आपको अभी कुछ दिया नहीं है  परसों आईएगा…