Guru Puja

(Austria)


Send Feedback
Share

Guru Puja

आपका चित्त कहाँ है? यदि आप गुरू हैं तो फिर आपका चित्त कहाँ है? यदि आपका चित्त लोगों को व स्वयं को सुधारने और अपना पोषण करने पर है तो फिर आप सहजयोगी हैं। फिर आप गुरू कहलाने योग्य हैं। जो भी चीज जीवंत है वह गुरूत्वाकर्षण के विपरीत एक सीमा तक उठ सकती है …. ये सीमित है। जैसे कि हमने पेड़ों को देखा है… वे धरती माँ की गोद से बाहर आते हैं और ऊपर की ओर बढ़ते हैं लेकिन केवल एक सीमा तक ही। हर पेड़ … हरेक प्रकार के पेड़ की अपनी एक सीमा होती है। चिनार का पेड़ चिनार का ही रहेगा और गुलाब का पेड़ गुलाब ही रहेगा। इसका नियंत्रण गुरूत्वाकर्षण बल द्वारा किया जाता है। लेकिन एक चीज ऐसी है जो गुरूत्व बल के विपरीत दिशा में उठती है…. जिसकी कोई सीमायें नहीं हैं …. और ये है आपकी कुंडलिनी माँ।
जब तक आप कुंडलिनी को नियंत्रित नहीं करना चाहते हैं तब तक इसे गुरूत्व बल से नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। इसको कोई चीज नियंत्रित नहीं कर सकती है लेकिन आप और केवल आप इसे नियंत्रित कर सकते हैं। अतः जब आप अपनी कुंडलिनी के इंचार्ज बन गये तो आपने एक कदम आगे रख लिया है कि आपने उस बल पर विजय प्राप्त कर ली है जिसको गुरूत्व बल कहते हैं। शायद सहजयोगी लोग नहीं जानते हैं कि उनको क्या प्राप्त हुआ है। आदि गुरू और गुरू के बीच केवल एक ही अंतर है और वो है सद्गुरू। मैं कहूंगी कि आदि गुरू जानते हैं कि वे ही नियंत्रण करने वाली शक्ति हैं …. वह जानते हैं कि वही ब्रह्मतत्व … ब्रह्मांड के साथ एकरूप हैं। जिस अधिकार से वह बोलते हैं …. जिस पूर्ण आत्मविश्वास के साथ वह बातें करते हैं… उनके मन में लेश मात्र भी संदेह नहीं रहता है। अपनी शिक्षा देते समय भी वह कहते हैं कि मैं सच कहता हूं कि मैं ब्रह्म तत्व के साथ हूं …. मैं ही ब्रह्म हूं और सभी तत्वों पर मेरा ही अधिकार है ….. इन सब बातों से वह पैगम्बर बन जाते हैं। क्योंकि भूतकाल के विषय में जो कुछ भी वह कहते हैं … वह सत्य होता है। और वह इसके बारे जानते भी हैं … उन्हें इसमें कोई संदेह नहीं रहता है। जिस अधिकार से मोजेज ने … सॉक्रेटीज ने … लाओत्से ने और इन सभी महान गुरूओं ने बातें कीं …. आदि गुरू से लेकर साईंनाथ तक ने … यह बताया …. यदि आप भी इसी प्रकार से करेंगे तो अच्छा रहेगा …. या उस प्रकार से कहेंगे तो ठीक रहेगा। लेकिन आधुनिक समय में वे गुरू शायद काम न कर पाते। इसीलिये एक माँ को आना पड़ा … सबसे पहले आपको आत्मसाक्षात्कार देने के लिये।
सबसे पहले एक गुरू बनने के लिये आपको स्वयं को देखना पड़ेगा कि आपमें वह गुरूत्व है या नहीं जो धरती माँ के गुरूत्व से बिल्कुल भी नहीं बंधा हुआ है। आपमें कम से कम ये गुण तो होना ही चाहिये। इसका अर्थ ये नहीं है कि आप बाहर से काशाय वस्त्र धारण कर लें और सन्यासी बन जाँय। आपको अंदर से सन्यासी बनना होगा। जो अंदर से सन्यासी है, हो सकता है उसका बहुत बड़ा बैंक बैलेंस हो …. लेकिन उसे इसके बारे में कुछ भी पता नहीं होगा। वह सबसे अलग होगा और वह कभी भी इस धन दौलत का परित्याग कर सकता है।
सन्यासी को वासना से भी दूर होना चाहिये। उसे मालूम ही नहीं होता कि वासना क्या चीज है … इसका आकर्षण क्या है? अपनी कुंडलिनी और मूलाधार से वह इसको प्राप्त कर सकता है क्योंकि अब आपके अंदर गुरूत्व बल के विपरीत उठने की क्षमता है। आपके अंदर अब इस वासना से ऊपर उठने की शक्तियाँ हैं ….. यहीं पर आपका चित्त सबसे ज्यादा खराब हो जाता है।
सहजयोग में हमारे पास सब कुछ है। सबसे पहले आपको आत्मसाक्षात्कार प्राप्त हो गया है जिसके बारे में कहा जाता है कि ये सबसे कठिन कार्य है। आपने गुरूत्व बल पर भी विजय प्राप्त कर ली है और दूसरे आपकी माँ … सभी आदि गुरूओं की भी गुरू हैं। उन्होंने ही सभी आदि गुरूओं को भी शिक्षा दी …. उन्होंने ही सभी आदि गुरूओं का सृजन किया और वही आपके अंदर से भी आदि गुरूओं का सृजन करेंगी। लेकिन इसके लिये आपके अंदर गुण भी सोने जैसे होने चाहिये। गुरू को स्वयं सभी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है …. चुनौतियों को कार्यान्वित करना पड़ता है … स्वयं को स्वच्छ करना पड़ता है …. ये देखना पड़ता है कि वो अभी कहाँ पंहुचा है। इसके लिये उन्हें आपमें से किसी के भी प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है। ये बनावटीपन नहीं है … ये झूठ नहीं है … ये वास्तविकता है। जब आप वास्तविकता को जान जाते हैं तो आपको जानना चाहिये कि सबसे पहले आपको स्वयं से संतुष्ट होना चाहिये। इसके बाद आत्मविश्वास आता है। इसी से अधिकार आता है कि आप अपने बारे में संतुष्ट हैं और जो कुछ भी आप कर रहे हैं वह वास्तविकता है… केवल वास्तविकता है और कुछ नहीं है। ये शक्तियां आपके अंदर हैं… आपके अंदर कुंडलिनी है जो आपकी अपनी माँ है। सारा जीवन आपने बेकार के कार्य करने में व्यर्थ कर दिया है। लोगों ने बहुत ज्यादा तप आदि किये हैं और संस्कृति के विरोध में कार्य किये हैं और अपना विनाश किया है। इससे उन्हें क्या प्राप्त हुआ? इसके बाद उन्होंने एक नया कार्य किया। आज वे एक कार्य में व्यस्त हैं तो कल दूसरे में व्यस्त हो जायेंगे। जो कुछ भी वे करते हैं वो सब मूर्खतापूर्ण है लेकिन वे इस कार्य को बहुत गंभीरता पूर्वक करते हैं। ये सबसे अधिक आश्चर्यजनक बात है। इन कार्यों को वे अत्यंत विस्तारपूर्वक करते हैं। इसमें से कुछ भी छूटना नहीं चाहिये। इस मूर्खतापूर्ण कार्य को पूरी गंभीरता से किया जाना चाहिये। मुझे इसी से बहुत आश्चर्य होता है। और इसके बाद जरा उनका आत्मविश्वास तो देखिये। यदि आप उनसे पूछें कि आपने ऐसा क्यों किया तो वे कहेंगे कि इसमें क्या बुराई है। आप हैरान रह जाते हैं। इस प्रकार की चीजों के लिये एक नया शब्द गढ़ा जाना चाहिये। आप अपनी नाक काट लेते हैं और यदि डॉक्टर आपसे पूछे कि आपने अपनी नाक क्यों काटी तो आप कहेंगे कि इसमें क्या गलत है? मैंने इसे आपसे अच्छी तरह से किया है। मनुष्य का स्वभाव इसी प्रकार का है। हम अपने विनाश के लिये कार्य करते हैं। क्या हम अपने उत्थान के लिये भी इतनी ही अच्छी तरह से …. इतनी ही सावधानी से….इतनी ही समझदारी से कार्य करते हैं? सबसे अच्छी बात तो ये है कि जब आप इस कार्य को करते हैं तो आप अत्यंत प्रसन्न होते हैं और आपको इसका इनाम भी तुरंत ही मिल जाता है। तो क्यों न इस कार्य को पूरी समझदारी के साथ किया जाय … अच्छी तरह से … सावधानी से …क्यों नहीं …. पूरे चित्त और ध्यान के साथ किया जाय। क्योंकि इसका पुरस्कार बस आनंद है।