Press Conference: The time has come to become the Spirit

Vienna (Austria)

1986-07-07 Press Conference: The Time Has Come To Become The Spirit, Vienna Austria DP-RAW, 98' Download subtitles: ENView subtitles:
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परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी,

पत्रकार सम्मेलन,

वियना, ऑस्ट्रिया,

7 जुलाई, 1986

सहज योगी: क्या समाचार पत्रों से आए लोग कृपया आगे आना चाहेंगे? आगे आ जाइए क्योंकि श्री माताजी से प्रश्न करना आसान रहेगा।

श्री माताजी: हां, यह बेहतर होगा अगर आप आगे बैठें। ठीक है! 

हम यहां हैं, आप सब अंग्रेजी भाषा जानते हैं, है ना, आप सब लोग जो यहां पत्रकार हैं? अंग्रेजी? ठीक है!

हम यहां आप को एक शक्ति के बारे में सूचित करने आए हैं जो हमारे अंदर है। शक्ति जो आप को वो दे सकती है, जिसका आश्वासन सभी संतों, शास्त्रों और सभी अवतरणों ने दिया था। 

आज जब आप हर देश में युवाओं को देखते हैं, विशेषकर परदेस में, तो आपको पता चलेगा कि वे अपने वातावरण और अपने जीवन से संतुष्ट नहीं हैं, और उन्हें लगता है कि किसी वस्तु की कमी है, और वह बहुत ही ज्यादा भ्रमित हैं। अब जब वो भ्रमित हैं, तो वे कुछ खोज रहे है, कुछ परे, कुछ जो उनके लिए अज्ञात है। इस खोज में वे किसी भी हद तक जा सकते हैं, मादक   पदार्थ, मदिरा का अत्यधिक सेवन हो सकता है, या कोई अन्य विकृतियां जिन के कारण भयानक रोग, असाध्य रोग होते हैं।

उनकी भर्त्सना करने के बजाय हमें ये देखना होगा, कि वे ये सब हरकते क्यों कर रहे हैं! उनका उद्देश्य क्या है? उन में कुछ, कुछ गुरुओं के पास भी गए जो बाजार में हैं। विशेषकर जब वे धार्मिक लोगों और धर्मों को देखते हैं, वो विश्वास नहीं कर पाते कि धर्म आप को इतने भयावह अनुभव दे सकते हैं, और उन में कुछ ईश्वर विरोधी, धर्म विरोधी भी हैं। परंतु अगर आप समस्याओं से सहानुभूतिपूर्वक निबटें, तो आप उन को दोष नहीं दे सकते, क्योंकि वे चतुर और जागरूक लोग हैं। 

तो अब हमारे पास दो श्रेणी के लोग हैं। एक वो जो साधक बिल्कुल नहीं हैं। और दूसरे वे हैं जो समस्याओं का हल ढूंढना चाहते हैं।

हर पीढ़ी में ऐसे लोग थे जिन्होंने क्रांति लाई, क्योंकि उन्हें एक विशेष प्रणाली पसंद नहीं थी, या उन्हें कोई विशेष जीवन शैली पसंद नहीं थी, जो कुछ भी था, परंतु अब अंदर से क्रांति आनी चाहिए। हमें अंदर से विकसित होना है, क्योंकि विनाश भी अंदर से ही आ रहा है। हम स्वयं को अंदर से ज्यादा बरबाद कर रहे हैं, क्योंकि हम इतने दुखी हैं, इतने भ्रमित हैं पूर्णत: काफी प्रतिशत सिजोफ्रेनिया रोग से पीड़ित हैं! 

तो तब हम हल खोजने लगते हैं, और उस खोजने में हम गलतियां करते हैं। और हम गलतियां इसलिए करते हैं कि हमें ज्ञात नहीं है, कि हमें क्या खोजना है, और कैसे पता करना है  और ये भी कि कैसे उस अवस्था तक विकसित होना है। तो युक्तिसंगत रीति से हमे किसी निष्कर्ष पर पहुंचना होगा, युक्तिसंगत रीति से, कि कोई उत्क्रांति की घटना होनी चाहिए। ये तर्कसंगत है, कि हमारे अंदर परिवर्तन के लिए कुछ उत्क्रांति होनी चाहिए।

(श्री माताजी अपनी दाईं तरफ बैठे योगी से -यूंग एक ऑस्ट्रिया वासी नहीं था। क्या वो था?

सहज योगी: हां! यूंग एक ऑस्ट्रिया वासी था।(अस्पष्ट) श्री माताजी: फ्राइड था। यूंग का मुझे मालूम नहीं।)

जैसे यूंग ने कहा है, ‘आप को सामूहिक चेतना प्राप्त करनी है।’ आप को बनना है। यह 

यथार्थी- करण है, ये सिर्फ एक प्रमाण पत्र नहीं है। ये अंदर से बनना होता है। ये एक सच्ची बात है। ये अंतर्निहित बात है। ये कोई उपदेश देना नहीं है, या कोई प्रमाण पत्र देना नहीं! ऐसा नहीं है! या कोई नाम लेना।  ये स्वयं आप के अंदर एक वास्तविक अनुभव है, जिस से की हमारे साथ कुछ घटित होना चाहिए। उदहारण के लिए, जैसे हम बंदर की अवस्था से विकसित हो कर मनुष्य अवस्था तक आए हैं, हम ने कुछ नहीं किया। यह एक जीवंत प्रक्रिया है जो सहज ही घटित हुई है।

पश्चिम में किसी भी पूर्व देश की विचारधारा को स्वीकारने में बड़ा प्रतिरोध होता है, बड़ा प्रतिरोध! मैंने देखा है कि पश्चिम में आने वाले किसी भी पूर्वी विचारधारा का बड़ा प्रतिरोध होता है। 

अब ये जो पूर्वी विचार आ रहे हैं, उन्हे खुले वैज्ञानिक दिमाग से देखा जाना चाहिए, क्योंकि पश्चिमी जीवन बाहर एक वृक्ष की तरह बढ़ा है। परंतु जड़ें शायद पूर्व में हैं, शायद! हम स्वयं को खुला रख सकते है देखने के लिए कि जड़ें कहां हैं? मान लीजिए, अब अगर जड़ें पूर्व में हैं, ये एक (हाइपोथेसिस) परिकल्पना है, तो आइए उन पर नजर डालते हैं, अगर उनमें कुछ हल है। 

तो आप पूर्वी विचार पर जाते हैं, पर वहां भी,  बहुत खतरनाक है, क्योंकि आप अज्ञात में जा रहे हैं। आप कुगुरुओं के पास जा सकते हैं, आप गलत लोगों के पास जा सकते हैं, और पूरी तरह बरबाद हो सकते हैं। तो हम क्या करें? 

पहली बात जो हम को ज्ञात होनी चाहिए, कि हम अपनी उत्क्रांति के लिए भुगतान नहीं कर सकते। आप कीमत नहीं दे सकते। धन का कोई काम नहीं है! ना ही हम किसी जीवंत प्रक्रिया के लिए भुगतान कर सकते हैं। कोई भी जीवंत प्रक्रिया, हम कीमत नहीं दे सकते। जैसे अगर बीज को अंकुरित होना है, धरती मां उसे अंकुरित करेंगी। हम धरती मां को उसकी कीमत नहीं देते! तो पहली बात जो उन्हें ज्ञात होनी चाहिए थी, कि कोई भी जो पैसा मांगता है, एक सच्चा इंसान नहीं है। पैसे का इस में कोई काम नहीं होना चाहिए!

फिर दूसरा तथ्य यह आता है कि हम मानवीय चेतना की इस अवस्था को सहज ही पा गए, बिना किसी प्रयास के, सरलता से। इसी प्रकार ये होना चाहिए। 

परंतु सब से प्रथम, हर उत्क्रांति में एक अगुआ रहा है। हम उन्हे आदर्श कह सकते हैं, जैसा उन्हे कहा जाता है, या जो कुछ आप शायद कहें या कहना चाहें। यूंग इस बिंदु पर ज्यादा स्पष्ट नहीं था। तो ऐसा व्यक्ति, चिन्हों और अन्य सब चीजों की जानकारी के गुप्त संदेश का अर्थ निकाल सकता है, और दूसरों से बिना कोई पैसा लिए, बिना कोई परितोषण लिए, सहायता कर सकता है। वो ये कर सकता है! यहां पर आ कर, पश्चिम में लोग चूक कर बैठते हैं। उन्हे पादरी से कोई आपत्ति नहीं, कैंटेबरी के (आर्चबिशप) मुख्य धर्माध्यक्ष से कोई आपत्ति नहीं, पर उन्हें आपत्ति है ऐसे व्यक्ति से, जो सब कुछ निशुल्क कर रहा है, सिर्फ प्रेम के कारण!

आप को आश्चर्य होगा, इंग्लैंड में टेलीविजन के लोगों ने मुझ से कहा, ‘हम ऐसे किसी को स्वीकार नहीं कर सकते जो धन नहीं लेता।’ (श्री माताजी हंसते हुए) क्या आप विश्वास कर सकते हैं? एक सच्चाई है! मेरे ख्याल से बॉस्टन में या कहीं और, उन्होंने मुझसे एक सवाल पूछा, ‘आपके पास कितनी रोल्स रॉयस हैं?’ (श्री माताजी हंस रही हैं) तो यह पत्रकारिता है! मैं यूंही आपको बता रही हूं।

और सेन फ्रांसिस्को में वह मेरा विज्ञापन छापने के लिए भी तैयार नहीं थे, क्योंकि हमने गलती से कह दिया था कि हम एड्स का उपचार कर सकते हैं। वह बोले, नहीं! हम नहीं चाहते कि एड्स का उपचार हो। हम नहीं चाहते की कोई भी हमारी समलैंगिकता पर काम करे।’ 

और उन्होंने इतनी खराब बातें कहीं, कि सेन फ्रांसिस्को में 65% लोग समलैंगिक हैं और एडिटर समलैंगिक है, चेयरमैन भी, और मेयर भी! तो मुझे समझ में नहीं आया कि मैं क्या करूं! मैंने सोचा, बेहतर होगा कि हम विज्ञापन न करें, क्योंकि हम उनके लिए बेकार होंगे। तो ये समस्या है!

फिर सबसे महत्वपूर्ण बात जो हमारे आधुनिक दिमाग द्वारा समझी नहीं जाती, कि वे मानते हैं कि हर नई वस्तु को आजमाना ही है। ये बहुत खतरनाक बात है।

अगर हम उत्क्रांति की जीवंत प्रक्रिया से गुजर रहे हैं, हमें समझना होगा कि आध्यात्मिक जीवन में जो कुछ भी होने वाला है, शास्त्रों से संबंधित होना चाहिए, सभी शास्त्रों से। वो उनसे संबंधित होना चाहिए! सिर्फ एक शास्त्र से नही, जैसे पवित्र बाइबल, जैसे पवित्र कुरान या अन्य, परंतु सभी से, क्योंकि ये एक बीज जैसा है जो अंकुरित होता है, फिर वो तना बन जाता है, फिर शाखाएं, फिर पत्तियां, फिर फूल और फिर फल। जीवंत प्रक्रिया किसी चीज पर आधारित है, किसी चीज से विकसित होती है। 

परंतु जो भी मृत है, जैसे हम एक फल बना सकते हैं, एक प्लास्टिक का फल कहीं से ऐसे ही, जिसका कोई आधार नहीं है, उसका कोई अर्थ नहीं है। उसका कोई आधार होना चाहिए कि वह कहां से आया है। उसका स्रोत देखा देखा चाहिए।

जिस प्रकार एक वृक्ष के विकास में जो कुछ भी व्यर्थ है वो समाप्त जाता है। इसी प्रकार, उत्क्रांति में भी, जो सब अनुपयोगी है, छूट जाता है। यहां तक के व्यर्थ परंपराएं भी छूट जाती है। सब कुछ छूट जाता है। फलस्वरूप आप ऐसे उच्चतम शिखर पर पहुंचते हैं, जहां आप फल बन जाते हैं। तो मनुष्यों के आत्मा बनने का समय आ गया है।

(श्री माताजी सहज योगीयों से- जर्मन भाषा में प्लुमुल -पौधे की भ्रूणनीय जड़ को क्या कहते हैं? सहज योगी – केइम्री) 

(श्री माताजी पत्रकारों को संबोधन जारी रहते हुए) तो हर बीज में केइम्री है, ठीक है! और उसी प्रकार हमारे अंदर हमारी केइम्री है। वो हमारी कुंडलिनी है और उसे वास्तव में जाग्रत करना है, वास्तव में जाग्रत!

बेशक उथले लोग जिन्हें दुनिया की चिंता नहीं है, वे इसकी परवाह नहीं करेंगे। उनका सवाल ही नहीं उठता, उथले लोग! लेकिन एक दूसरे प्रकार के भी लोग हैं जो आत्मा के नाम पर पैसा बना रहे हैं या उस पैसे से अपना जीवन यापन कर रहे हैं और आयोजन कर रहे हैं, यकीनन हमारा विरोध करेंगे। निश्चित रूप से हम उनके लिए विवादास्पद बन जाते हैं, क्योंकि मूल रूप से, बिना हमारी किसी गलती के, हम उन् पर प्रहार करते हैं। हम ऐसा नहीं चाहते, परंतु ये बस होता है!

परंतु जिस व्यक्ति में शुद्ध प्रज्ञा होती है, वो चाहे ज्यादा पढ़ा लिखा ना हो, कुछ नहीं, परंतु शुद्ध प्रज्ञा खेल की असलियत को देख सकती है। वो समर्थ होनी चाहिए, खेल को समझ लेने के लिए।

अब सहज योग में सारे विश्व में हजारों लोग हैं। ऐसे लोग हैं जो समाज में उच्चतम हैं। ऐसे लोग  हैं जो निम्न कोटि के हैं तथाकथित समाज में। वे सभी, हर एक व्यक्ति आपस में बराबर हैं। ऊंच नीच की कोई भावना नहीं है। सभी उस समाज से सबंधित रखते हैं! (श्री माताजी किसी को हाथ ऊपर कर के कह रही है-ठीक हैं!)  उस समाज से संबंध रखते हैं। इसके अलावा जब ऐसा होता है, सभी धर्मों के झगड़े खत्म हो जाते हैं, क्यों की हम समझते हैं कि वे अवतरण क्या थे! हम इसे सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर समझते हैं। टकराव खत्म हो जाता है। ईसा मसीह की पूजा न करने का प्रश्न ही नहीं उठता। मुसलमान, यहूदी, हिंदू सभी ईसा मसीह की पूजा करते हैं। वे सब मोहम्मद साहब की पूजा करते हैं और वे सब राम, कृष्ण की पूजा करते हैं। क्योंकि वास्तव में वो देखते हैं, कि जब कुंडलिनी उठती है, वो कुछ चक्रों से गुजरती है, और वहां आप को उन महान अवतारणों के नाम लेने होते हैं।

तो, ये जड़ों का ज्ञान है और आप को ज्ञात होना चाहिए, कि उस ज्ञान को समझने के लिए आप को सुक्ष्म प्राणी बनना होगा। परंतु जब तक हमारे पास वो ज्ञान नहीं होगा, हमें आकस्मिक महाविपत्ति का सामना करना पड़ेगा! एक बहुत गहरा सदमा हमारा रास्ता देख रहा है! और हम उस से कैसे बचेंगे? सिर्फ शांति की बात करने से, आप शांति नहीं लाते। जो शांति की बातें करते हैं, उनके खुद के अंदर शांति नहीं है।

तो हम उस स्तिथि पर हैं, जहां हम उस (सहज योग) के बारे में बताने का, बात करने का प्रयत्न करते हैं, लोगों को राजी करते हैं, और इसमें मीडिया हमारी मदद कर सकता है। उसने इटली में हमारी बहुत मदद की है, और बेशक भारत में भी, क्योंकि भारत में लोग जानते है। उनको जड़ों का ज्ञान है। भारत के गांव में लोग बहुत ही सरल है, भारत के शहरों में भी। वह बहुत बढ़िया कर रहे हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, परंतु उदाहरण के लिए, दिल्ली विश्विद्यालय ने सहज योग को अनुसंधान के लिए स्वीकार कर लिया है, और जो डिग्री आप को मिलती है वो है (डॉक्टर आफ मेडिसिन) आयुर्विज्ञान चिकित्सक जो स्नातोक्ततर से ऊंची है। स्नातोक्ततर होने के उपरांत आप को ये डिग्री मिलती है। ये बहुत दुर्लभ है, ‘डॉक्टर आफ मेडिसिन फॉर सहज योग’, परंतु उन्होंने स्वीकार कर लिया है। यहां तक के कैंब्रिज विश्विद्यालय ने भी इसे अनुसंधान के लिए स्वीकार कर लिया है। 

तो आप को इस में उद्देश्य देखने का प्रयत्न करना चाहिए। उन्होंने इसे निंदा करने के लिए नहीं किया है लेकिन सम्मान के साथ, स्वीकार्यता के साथ, की इस में कुछ बात है। तो मैं मीडिया से निवेदन/अनुरोध करूंगी कि सच्चाई बताएं, उसको समझते हुए। हम को कुछ प्राप्त नहीं करना, परंतु ऑस्ट्रिया के लोगों को लाभ होना चाहिए। बस इतना ही!

कुंडलिनी जागरण के फलस्वरूप हम कई चीजों के दावे कर सकते हैं, परंतु ये देखना चाहिए, कि कैंसर ठीक हो सकता है। बहुत सारे शारीरिक असाध्य रोग ठीक हो सकते हैं, मानसिक रोग ठीक हो सकते हैं, मादक पदार्थों की लत को ठीक किया जा सकता है, और कुगुरुओं द्वारा उत्पन्न की गई समस्याओं का पूर्णत: इलाज भी किया जा सकता है। यह सभी चीजें करी जा सकती है जब आप आत्मा बन जाते हैं, परंतु यह सिर्फ एक परिकल्पना के स्तर तक होना चाहिए। जब हम ये करें, और यह साबित हो जाए, तब इसे स्वीकार करिए, अन्धवत नहीं। सहज योग में अंधी श्रद्धा नहीं है। हमारे यहां पुरोहिताई नहीं है, किसी को भुगतान नहीं किया जाता। ये एक मुक्त समाज है, और सभी बहुत बड़े ज्ञानी बन जाते हैं।

एक सहज योगी डॉक्टर न भी हो, तो भी लोगों का उपचार कर सकता है। वह एक मनोचिकित्सक ना भी हो, तो भी पागल लोगों का उपचार कर सकता है। वो उस शक्ति से सुसज्जित हो जाता है जिस के द्वारा वो ये करता है। जैसे ईसा मसीह कोई वैद्य नहीं थे, उन्होंने लोगों को निरोग किया, इसी प्रकार, उसी अंदाज में!

अब मैं चाहूंगी कि आप मुझ से सवाल पूंछे, क्योंकि ये एक बहुत विस्तृत विषय है, और इस पर आप बातें करते रह सकते हैं। मैं चाहती थी की पंद्रह मिनट तक ये लोग आप को सब अन्य बातें समझाएं, जिस से की आप अपने प्रश्न मेरे लिए तैयार रखेंगे!

प्रश्नकर्ता के पश्न को दोहराते हुए सहज योगी: हमने मुद्रित सामग्री में ऐसा कहा है, कोई भी ‘अनाधिकार छेड़छाड़’, आप के योग को किसी तरह से नुकसान पहुंचा सकती है। इसे आप कैसे समझायेंगी?

श्री माताजी: अनाधिकार छेड़छाड़ !?

सहज योगी: छेड़छाड़! हस्तक्षेप!

श्री माताजी: ये सहज योगियों ने लिखा है। उनकी भाषा बड़ी उच्च है! इस से इन का क्या अर्थ है, मैं खुद भी जानना चाहूंगी। (श्री माताजी हंस रही हैं)

सहज योगी – शायद जो कुंडलिनी जाग्रत करने का प्रयास करते हैं?

श्री माताजी: हां, बेशक! बेशक! आप देखिए कि कुंडलिनी उसी के द्वारा जागृत की जा सकती है जिसके पास अधिकार है, दिव्य अधिकार! आप व्यक्ति का चुनाव नहीं सकते। जैसे आप एक पादरी को चुनाव कर सकते हैं। यह ऐसा नहीं है। आपके पास कुंडलिनी को जागृत करने की शक्ति होनी चाहिए। अब जो लोग बहुत, आप कह सकते हैं एक शब्द में – गंदी जिंदगी, व्यतीत कर रहे हैं, कुंडलिनी जाग्रत नहीं कर सकते। आप को इस पवित्र धर्म का होना होगा, एक पवित्र धर्म और आप के पास ये शक्तियां होनी चाहिएं। वरना जो लोग दूसरी चालें चलते हैं, वो क्या करते हैं। वो आप के सिंपैथिक नर्वस सिस्टम की गतिविधि में विघ्न डालते हैं। कुंडलिनी उठती नहीं है। कुंडलिनी सिर्फ एक योग्य सहज योगी द्वारा ही जाग्रत होगी।

उदहारण के लिए मैं आप को बताऊं, अगर एक बीज है और आप उसे बोना चाहते हैं, तो आप को उसे धरती मां में डालना होगा। मान लीजिए आप उसे इस मेज पर रख देते हैं, वो नहीं होगा! पर मान लीजिए आप उसे आग में डाल देते हैं, वो जल जायेगा। सिर्फ धरती मां में ही उसे 

अंकुरित करने की शक्ति है। तो बात ये है! ठीक है?

(श्री माताजी सहज योगी से हंसते हुए-मेरा मतलब है जब आप संदेश देते हैं, तो आप उसे बिलकुल स्पष्ट भी करिए) 

(श्री माताजी पत्रकारों को संबोधित कर के हंसते हुए)  मैं स्वयं ही समझ नहीं पाई। मुझे उसे के लिए खेद है! ठीक है!

और क्या? इन्होंने बहुत अध्ययन किया है, मैं कहूंगी। बहुत बढ़िया! और इसीलिए आप ने अवश्य पढ़ा होगा। जर्मन भाषा में भी कुंडलिनी पर पुस्तकें हैं, भयावह पुस्तकें, कि वो आप को नुकसान पहुंचाती है, जलाती है। ऐसा कुछ नहीं होता। वो ऐसा नहीं करती। ये सिम्पेथेटिक से होता है, जब वो गलत चीजों द्वारा सक्रिय हो जाता है, चीजें जैसे यौन-क्रिया सक्रियण और दूसरे सक्रियण। कुछ लोग (श्री माताजी आज्ञा चक्र को घुमा कर दिखा रही हैं) इसे बंद करने का प्रयत्न करते हैं, और आप रोशनी इत्यादि देखने लगते हैं। ये सब शॉर्ट सर्किट करना है। वास्तव में आप उस से बहुत कष्ट पाते है, निस्संदेह। ये (कुण्डलिनी जागरण) इतना सहज है। ये आप को सहजता में प्राप्त होता है।

(श्री माताजी प्रश्नकर्ता से) 

क्या आप स्वयं में आराम महसूस कर रहे हैं? आप को प्राप्त हो गया है! आप को आत्म साक्षात्कार मिल गया है! केवल एक चीज है, कि आपको इस बारे में थोड़ा सा जानना है, बस इतना ही! आप पूर्णत: शान्ति में है। कोई विचार नहीं हैं।

प्रश्नकर्ता:  कोई प्रश्न नहीं!

श्री माताजी: कोई प्रश्न नहीं! (सब के हंसने का स्वर) आप को साक्षात्कार मिल गया। जब आप मुझसे बात कर रहे थे तभी मिल गया। क्योंकि आप सकारात्मक हैं और इसके बारे में जानना चाहते हैं। अगर आप लोग दृढ़निश्चयी प्रयास से सिर्फ निंदा करने आते हैं, तब कुछ भी कार्यान्वित नहीं हो सकता। आप को मिल गया! आप को मिल गया है। परमात्मा आप को आशिर्वादित करें! (श्री माताजी प्रसन्न हो रही हैं)

यह आप का अपना है। मैंने कुछ नहीं किया। मैं तो सिर्फ आप से बातें कर रही थी। आप की कुंडलिनी जानती है कि आप मेरे सामने बैठे हैं। वो स्वयं ही जाग्रत हो गईं। वो आप की मां है। आप की मां हैं। आप की अपनी व्यक्तिगत मां और वही (होली घोस्ट) पवित्र आत्मा हैं। यही वो आदिशक्ति हैं  जिस के बारे में ईसाई बात नहीं करते, और वो नहीं चाहते की आप अन्य कुछ भी जाने। जो कुछ भी वो सिखाएं, आप को सीखना चाहिए, कुछ अन्य नहीं!

मैं स्वयं एक ईसाई परिवार में पैदा हुई थी। तो आप देखिए, कि आप के आंखों के दोनो तरफ अंखोडे होने चाहिए। आपको नहीं देखना है इस तरफ या उस तरफ। इसलिए नौजवान इन भयानक गुरुओं के जाल में फंस गए, जो यहां पैसा बनाने आए थे।

मैं किसी को जानती हूं जो जेल से आया था। जो जर्मनी आया गेरुआ वस्त्र पहन के, और वहां के केंद्रों में से कहीं किसी एक केंद्र में जाकर वह बैठा, और लोग झुंड बना कर उस के पास पहुंच गए! वह जेल से आया था! (श्री माताजी हंस रही हैं) क्योंकि यह लोग नहीं जानते अच्छे गुरु, सद्गुरु और अगुरु को कैसे पहचाना है। इन पर भारत देश में बहुत सारी किताबें ही किताबें हैं। परंतु यह बेचारे नहीं जानते, और मैं उन्हें दोष भी नहीं देती, क्योंकि वह बहुत ईमानदारी से निरंतर खोज रहे थे, और मुसीबत में फंस गए। परंतु ऐसे कुगुरुओं के बारे में, मैं 1974 से बता रही हूं।

परंतु दूसरी समस्या जो पश्चिम के नौजवानों की  थी, कि वे ईसाई धर्म से नफरत करते थे, यह एक मुख्य बात थी। तो जब मैंने ईसा मसीह के बारे में बात करी, वे मुड़ते और वापस चले जाते थे। हम उनसे बात नहीं कर पाते थे। उन्होंने कहा, ‘ईसा मसीह की बात मत करो।’ वह चले जाते। तो ईसाई धर्म ने उनके लिए कुछ नहीं किया अपितु उन्हें नुकसान पहुंचाया है। वे ईसा मसीह के बारे में कुछ सुनना ही नहीं चाहते। मेरा मतलब ईसा मसीह तो एक जीवंत ईश्वर है निःसंदेह, और मुझे उनके बारे में बहुत अधिक बातें करनी है, पर उन् को यह पसंद नहीं था। ये ऐसी एक समस्या है अवधारणाओं की, अवधारणा! अब देखिए वास्तविकता वह है जो वास्तविकता है। यह कोई अवधारणा नहीं है। यह वही है जो ये है!

आप देखिए कि ईसा मसीह परमात्मा के पुत्र हैं। वह वास्तव में एक सर्वगुणसंपन्न व्यक्तित्व है। जो कुछ भी चर्च उनके साथ करे, जो कुछ भी कोई उनके साथ करें, उनको कोई फर्क नहीं पड़ता! वो हैं, जो वे हैं। और यही असल में समस्या है। समस्या है अवधारणा! अवधारणा वास्तविकता नहीं है। यह सिर्फ एक मानसिक अनुमान है। सिर्फ एक मानसिक अनुमान! आपको उसके परे उठना होगा एक आत्मा बनने के लिए। ठीक है!

परमात्मा आपको आशीर्वादित करें! क्या मैं कृपया आपका नाम जान सकती हूं? कृपया आप का नाम? 

पत्रकार: जॉर्ज

श्री माताजी: जॉर्ज! अच्छा है! यह एक देवदूत का नाम है सेंट जॉर्ज, और भारतीय भाषा में सेंट जॉर्ज को भैरव कहते हैं। सेंट जॉर्ज भैरव कहलाते हैं। एक बहुत महान देवता, एक देवदूत!

तो यहां और कोई नहीं है अब? अगर आपके पास अभी भी कोई प्रश्न हैं (सभी हंस रहे है श्री माताजी भी) नहीं, जरूर होंगे क्योंकि आपको पत्रकारों का सामना करना पड़ता है। और पीटर आपका क्या? कोई सवाल पूछिए!

प्रश्न: ये संदेश विश्व में कहां कहां फैला है, किन देशों में?

श्री माताजी: हे भगवान!

सहज योगी: श्री माताजी अब ये सोलह देशों में है। इस में से ग्यारह देशों में यह बहुत जोरों में है। इन छ देशों में हज़ारों हजारों लोग हैं। 

प्रश्न: क्या वे अलग धर्मों से आ रहे हैं, मेरी तरह?

श्री माताजी: बेशक! बेशक! यहां एक हैं (अस्पष्ट) जो मुसलमान हैं अल्जीरिया से। आप उन्हे बहुत अच्छे से जानते हैं। और आप पायेंगे कि विभिन्न धर्मों के लोग एक साथ बैठे हैं। वहां एक महिला बैठी हैं जो हिंदू धर्म से हैं। मैरी तुम्हारा क्या धर्म था, ईसाई? बोर्न अगेन (दोबारा जन्मे)! (सब हंस रहे हैं) क्या यह स्वयं प्रमाणित ‘बोर्न अगेन’ है? (श्री माताजी हंसते हुए) मैं सोच रही थी की वही चीज है। ठीक है!

तो निस्संदेह हमारे यहां हर धर्म, हर जाति, पंथ के लोग हैं। जैसे सिएरा लियोन, अब वहां अफ्रीकी लोग भी हैं। हमारे पास स्पेन से भी है। बोलिविया में भी! बोलिविया में कौन से धर्म माना जाता है!

सहज योगी: एक प्रकार का ईसाई धर्म! 

श्री माताजी: एक प्रकार का ईसाई धर्म! बोलिविया में एक प्रकार का ईसाई धर्म है और पेरू में भी, सब जगह। तो ये असीम है। ये (सहज योग) हर एक के लिए उपलब्ध है। ये किसी को अस्वीकार नहीं कर सकता। मेरा मतलब है अगर परमात्मा एक है तो आप किसी पर प्रतिबंध कैसे लगा सकते हैं? हमारे यहां चीनी लोग हैं, जापानी हैं। हर प्रकार के लोग, सभी प्रजाति के और सब जगहों से यहां हैं। तो उसका प्रश्न ही नहीं है यहां।  

तो, और क्या? वास्तव में, मैं सभी देशों की सूची नहीं दे सकती। लगभग सभी हैं, सिवाय स्कैंडिनेविया देशों के जिन्हे हम ने संपर्क नहीं किया है। स्कैंडिनेविया के लोग भी सहज योग में हैं, परंतु अभी तक हम ने वहां केंद्रों की स्थापना नहीं की हैं।

प्रश्न: मिलान में क्या हुआ था, जब आप पहली बार वहां गई थीं, कितने सारे लोग वहां थे?

श्री माताजी: हां, आप देखिए, मेरे खयाल से इटली निवासी बहुत अधिक संवेदनशील हैं। इटली निवासी बहुत संवेदनशील हैं। आप को आश्चर्य होगा, कि इटली में कोई गुरु नहीं हैं सिवाय उत्तर इटली के। वे लोग संवेदनशील, बहुत संवेदनशील, बहुत भावुक हैं, और वो प्रेम का सम्मान करते हैं, और उन में मां के प्रति भी बहुत सम्मान है और जब उन्होंने मेरा फोटो देखा था, उन्होंने उस में कुछ महसूस हुआ। मुझे नहीं पता उन्होंने फोटो में क्या अनुभव किया। मुझे नहीं पता कि वह कौन सा फोटो था, परंतु शायद उन्होंने शांति का अनुभव किया, जो कुछ भी हो!

पर मुझे आश्चर्य हुआ कि पूरा हॉल पूर्णत:भरा हुआ था। और इटली निवासी, जहां तक उनकी सरकार का सवाल है, सभी सहज योग के प्रति 

उदार हैं। आचार्यजनक! वे बहुत संवेदनशील हैं और उन्हें मेरे बारे में पता चल गया होगा, कि मैंने सब का भला किया है। वहां किसी भी बात पर कोई आपत्ति नहीं है, और अब उन्होंने मुझे संवाददाता सम्मेलन में आमंत्रित किया है, जो गीडो आप को बताएंगे की वो क्या है। यह संवाददाता सम्मेलन इटली के सभी लोगों की है। ये बहुत बड़ा आयोजन है, जो कहलाता  है संवाददाता सम्मेलन..?

सहज योगी: मां आप इटली टेलीविजन पर  ‘गैस्ट ऑफ द ईयर’ हैं।

श्री माताजी: (श्री माताजी मुस्कुराते हुए)  ‘गैस्ट ऑफ द ईयर’ हां! अब देखिए आप!

प्रश्न: वहां पर राजनेता, लेखक, कवि, और हर तरह का समर्थन आप के साथ होगा और आप वहां मुख्य व्यक्तित्व होंगी।

श्री माताजी: उन सब से बात करना? (श्री माताजी और अन्य प्रसन्न हो रहे हैं) उन सब के साथ बात करना अच्छा होगा, अच्छा होगा, सच में बहुत अच्छा होगा, उन सब से मिलना। हां!

परंतु मेरा खयाल है ऑस्ट्रिया एक ऐसा देश है जो काफी ज्यादा मध्य में है। किसी तरह से यह बहुत अधिक मध्य में है। ऑस्ट्रिया वासी न पूर्व में हैं, ना पश्चिम में, इसलिए मध्य में हैं। और वे सहज योग के लिए बहुत उपयुक्त हैं। बहुत समझदार लोग हैं ऑस्ट्रिया में, और हम ने ऑस्ट्रिया में बहुत समझदार लोग पाएं हैं, इस में कोई संदेह नहीं। दूसरी बात ये है कि ऑस्ट्रिया ने हमारे लिए कभी कोई समस्या खड़ी नहीं की। हमें कभी ऐसे लोग नहीं मिले जो स्कीजोफ्रेनिया से पीड़ित हों, या बेतुके या लड़ाकू हों, अपितु बहुत ही अच्छे लोग मिले। आश्चर्यजनक! तो मेरे खयाल से ऑस्ट्रिया का यूरोप में एक विशेष स्थान है।

प्रश्न: क्या होता हैं अगर वे कुंडलिनी जागरण नहीं प्राप्त कर पाते या फिर वे प्राप्त कर लेते हैं? 

श्री माताजी: ओह! कुछ गिरा है, ठीक है! (दीवार से एक तस्वीर गिर गई है) ये बहुत, आप जानते हैं, ये बहुत भारी हैं और आप ने बहुत छोटी कीलें लगाई हैं। 

तो, क्या होता है?

प्रश्न: (अस्पष्ट)

श्री माताजी: क्या होता है मृत्यु के पश्चात अगर उन्हे प्राप्त नहीं होता या अगर उन्हे प्राप्त होता है?

प्रश्न – (अस्पष्ट – सब के हंसने का स्वर)

प्रश्न: कुछ लोगों की कुंडलिनी जाग्रत हो जाती है, कुछ की नहीं। लोगों के साथ क्या होता है मृत्यु के बाद, अगर उन्हे प्राप्त नहीं होता?  अधिकतर धर्म इस धारणा पर चलते हैं कि, आप हमारी तरह चलें अन्यथा आप का अंत किसी भनायक स्थान पर होगा।

श्री माताजी: (हंस रही हैं) नहीं, ऐसा नहीं हैं! आप देखिए, मेरे खयाल से अधिकतर लोगों को ये प्राप्त हो जाना चाहिए। पूरे विषय के बारे में बहुत उदार दृष्टिकोण प्राप्त करने के लिए, जैसी आज ये दुनिया है, यह लोगों द्वारा अपनाया जाएगा। वे आत्म साक्षात्कार को ग्रहण करेंगे। मैं आश्वस्त हूं अधिकतर लोग इसे प्राप्त कर लेंगे।

अगर ऐसा हुआ, कि अगर उन्हे प्राप्त नहीं हुआ और उनकी मृत्यु हो गई, तो वे फिर जन्म लेंगे और प्राप्त करेंगे। परंतु जिन्हे नर्क में जाना है वे तो हर हाल में नर्क ही जायेंगे, (श्री माताजी पुन: हंस रही हैं) हर हाल में! आप देखिए, ऐसे लोग हैं, मैं कहूंगी जो कभी भी कुछ अच्छी बात को नहीं अपनाते, हो सकता है ऐसे लोग हो सकते हैं जिन्हें मैंने नहीं जाना, परंतु शायद। हमें सभी लोगों को संदेह – लाभ देना चाहिए।

प्रश्न: ये परभाषित करना इतना कठिन क्यों है, कि क्या अच्छा है और क्या अच्छा नहीं है?

श्री माताजी: हां, क्योंकि आप देखिए, यही बात है! अब मैं आप को बताऊंगी क्या होता है। अब जो आप की आत्मा है, वो संपूर्ण है, संपूर्ण! आत्मा संपूर्ण है। मान लीजिए आप जानना चाहते हैं कि मैं अच्छी हूं या नहीं, या ये अच्छे हैं या नहीं। अच्छा माने वो तरीका नहीं, जिस तरह से हम चीजों को देखते हैं, जैसे आप किसी का परिधान देखते हैं, चेहरा देखते हैं, ये बात नही है। ये ऊपरी है। परंतु जब हमें देखना हो कि व्यक्ति अच्छा है या नहीं, हम देखते हैं, हम अनुभव करते हैं उसके चक्र। आप समझे! उस के कौन से चक्र पकड़ रहे हैं, आप अपनी उंगलियों के पोरों पर् अनुभव कर सकते हैं। जैसे मोहम्मद साहब ने कहा था, कि आपके हाथ बोलेंगे। तो आप अपने चक्रों पर दूसरे व्यक्ति को महसूस करते हैं। तो हम उन्हें अच्छे और बुरे में प्रमाणित नहीं करते। यह श्रेणी सहज योग में मौजूद नहीं।

हम क्या कहेंगे, कि एक व्यक्ति के कौन से चक्र पकड़ रहे हैं। अब एक व्यक्ति में क्या पकड़ आ रही है, कौन से चक्र खराब हैं, हम उन्हे सही करने का प्रयास करते हैं। जैसे कि एक मरीज अस्पताल में आता है। डॉक्टर ये नहीं कहते, आप अच्छे हैं या बुरे। वे इस तरह से श्रेणीबद्ध नहीं करते। वो ये कहते हैं, क्या बीमारी है? चलो बीमारी का इलाज करें! ये इस तरह होता है। तो अच्छा या बुरा सहज योग में वर्णित नहीं होता, जो वर्णित होता है, वो चक्र जो खराब हैं।

परंतु कुछ लोगों ने अपने चक्र पूरी तरह बर्बाद कर लिए हैं। उनके पास कुंडलिनी है ही नहीं। वे  दानव की तरह हैं। कुछ अवश्य रहे भी होंगे। मैं उनका नाम नहीं लेना चाहती, पर रहे होंगे। तो ऐसे लोगों के साथ क्या किया जाए? उनकी इच्छा होनी चाहिए। मेरा मतलब है, कि हम किसी के साथ जबरदस्ती तो नहीं कर सकते। यह बड़ी समस्या है।

अगर वह इच्छा करते हैं, तो यह अच्छा है। अगर वह इसकी इच्छा नहीं रखते, तो आप उनसे यह करवा नहीं सकते। नहीं आप नहीं कर सकते। उन्हें अपनी स्वतंत्रता में इसकी इच्छा करनी होगी। तब उन्हें प्राप्त होगा वह आनंद! कुछ भी बल प्रयोग से नहीं किया जा सकता। यही रुकावट है।

हम श्रेणीबद्ध नहीं करते। हम किसी की भर्त्सना नहीं करते बुरा बता कर, या हम किसी को उत्कृष्ट व्यक्ति कह कर दर्जा नहीं उठाते, परंतु हम उन्हे बताते हैं कि उनके कौन से चक्र पकड़ रहे हैं। जब आपको आत्म साक्षात्कार प्राप्त हो जाता है तो आप जान जायेंगे, आपके कौन से चक्र पकड़ रहे हैं। और आप यह भी जान जाएंगे कि इन में कौन सी पकड़ आ रही है। और तब अगर मैं आपको बताऊं, मान लीजिए मैं इनसे कहूं कि, ‘डॉ वारेन आपका आज्ञा चक्र पकड़ रहा है।’ इस का अर्थ हुआ कि, ‘आप का अहंकार बढ़ रहा है।’ वह बुरा नहीं मानेंगे, क्योंकि उनके सिर में दर्द हो जाएगा और वह कहेंगे, ‘मां इसे ठीक कर दीजिए।’ इस अहंकार के कारण उनको थोड़ा सिर दर्द हो जाएगा। ठीक है, ‘इसे सही कर दीजिए।’ तो आप समझे कि कोई इस बात का बुरा नहीं मानता। 

अच्छे और बुरे जैसा कुछ नहीं है। हमारे प्रयोग किए गए शब्द बहुत ही अस्पष्ट होते हैं। वह बहुत अस्पष्ट शब्दावली हैं। इस में कोई सटीकता नहीं है। क्योंकि आत्मा असीम है इसलिए आत्मा से संबंधित सब कुछ भी संपूर्ण ज्ञान है। आप कह सकते हैं कि यह व्यक्ति बहुत बढ़िया है, बहुत शानदार है। वो हम स्वीकार नहीं करते। हम जो स्वीकार करते हैं वो ये, कि उसके चक्रों की क्या स्थिति है, और हम उसकी कितनी मदद कर सकते हैं। बस इतना ही! हम यह परेशान नहीं होते, कि कौन अच्छा है कौन बुरा है। इस श्रेणी का अस्तित्व नहीं है। इस प्रकार की श्रेणी का अस्तित्व ही नहीं है। परंतु बेशक चक्रों की स्थिति बहुत महत्वपूर्ण है। 

और कोई प्रश्न? स्टीव बेहतर होगा आप मुझसे पूछिए। ये एक अमरिकी हैं।

प्रश्न:  आप आत्म साक्षात्कार के अनुभव का कैसे वर्णन करेंगी?

श्री माताजी:  वर्णन करूं? हे भगवान! वह मेरे साथ हुआ नहीं। तो उसको कैसे समझाऊं? मैं ऐसी ही जन्मी हूं। पर मैं बताऊंगी, आत्म साक्षात्कार का अनुभव, जो लोगों को होता है, जो मैंने देखा है।

सबसे पहले जब कुंडलिनी उठती है, बेशक तंत्र में पूरी ताकत आ जाती है, और जब वह ब्रह्मरंध्र का छेदन करती है, तो पहली चीज आप जो आप अनुभव करते हैं, ठंडी हवा हाथों में। परंतु आवश्यक नहीं है, कुछ लोग अपने सिर के ऊपर अनुभव करेंगे, उन के सिर से ठंडी हवा जैसे बाहर निकलती हुई, अपने सिर से।

तो यहां स्वयं प्रमाणन है, ठंडी हवा! परंतु हो सकता है कुछ लोगों से बहुत गर्मी निकल रही हो। मान लीजिए कोई कैंसर का रोगी है, या कोई इस प्रकार का है, कोई गंभीर रोगी, आप पायेंगे की गर्मी बाहर आती है। मान लीजिए कोई व्यक्ति है जो भूत बाधा ग्रस्त है, और अत्यधिक दुखी तरह का व्यक्ति है शायद, या अक्खड़  व्यक्ति, जो कुछ भी हो। कुंडलिनी को आप अपनी आंखों से देख सकते हैं, विभिन्न चक्रों पर स्पंदित होते हुए, विशेषकर रीड की हड्डी की बुनियाद में, जिसे हम सैक्रम बोन कहते है। सैक्रम पवित्र अस्थि है। तो पवित्र अस्थि पर आप बहुत साफ देख सकते है। हमारे पास उसके फोटो हैं, पूर्ण स्पंदन एक हृदय की तरह, आप देख सकते हैं।

फिर अनुभव कुछ लोगों के साथ चलता है, वो चलता है, मैं कहूंगी। अगर यह धीमा उठना हुआ (कुंडलिनी का) तो लोग उठने को महसूस करते है। परंतु अगर वो तीव्रता से उठती है तो आप को कुछ महसूस नहीं होता। आप सिर्फ अपने सिर से ठंडी हवा बाहर आते हुए अनुभव करते हैं। फिर आप अपनी उंगलियों के पोरों से भी बाहर आता हुआ भी अनुभव करने लगते हैं।

परंतु प्रथम अनुभूति जो आपको होती है, जब वो इस चक्र (आज्ञा चक्र) से ऊपर उठती है, आप को अनुभव होता है आप विचारों से परे हैं। आप वर्तमान में होते हैं विचारों से परे, सिर्फ शांति का आनंद लेते हुए, शांति आप के अस्तित्व की। स्वयं का आनंद लेते हुए, और जब वो भेदन करती है, एक प्रकार के आनंद की  धारा बाहर बहने लगती है। विभिन्न लोगों की विभिन्न भावनाएं होती हैं, परंतु मान लीजिए भारतीय लोग, आप देखिए वो इतना नहीं सोचते जितना आप सोचते हैं, सोचना, सोचना, इतना ज्यादा सोचना! तो वो नहीं सोचते, तो वे वहां पहुंच जाते हैं। सब से पहले उन्हें आनंद प्राप्त होता है।

परंतु पश्चिम में लोगों को, मुझे लगता है, इस के बारे में ज्यादा जागरूकता मिलती हैं। वह चक्रों का अनुभव करने लगते हैं, इनके चक्र, उनके चक्र। वो इसका उसका अभ्यास करने लगते हैं। अन्त में उन्हे आनंद प्राप्त होता है। परंतु भारतीयों को पहले आनंद प्राप्त होता है और वे कहते हैं, ‘हम किसी बारे में चिंता नहीं करना चाहते।’ तो ये व्यक्ति की स्तिथि पर निर्भर करता है, कि क्या अनुभव हो सकता है।

परंतु कुल मिलाकर एक चीज है जो आप सब को होती है, कि आप की आंखें की भीगी सतह चमकने लगती है, उसमें एक चमक होती है। आंखों में एक झिलमिलाहट होती है, जगमग। ये वही है जो ये है। और चेहरा शांत हो जाता है, आप देखिए झुर्रियां खत्म हो जाती हैं, और आप कभी कभी दस साल कम उम्र के लगने लगते हैं। जैसे मेरी उम्र चौंसठ साल है। चौंसठ मेरी उम्र है, परंतु लोग विश्वास नहीं कर पाते, क्योंकि आप देखिए, मुझे अपनी उम्र का बिलकुल एहसास ही नहीं होता। हम सब भूल गए हैं, कि हमारी उम्र क्या हैं। और यही आपके साथ घटित होता है क्योंकि आप सिर्फ अस्तित्व की अवस्था में चले जाते हैं। परंतु समय लगता है धीरे-धीरे उसमें बढ़ने में, परंतु उसकी शुरुआत बीज के अंकुरित होने से होती है, जो कि कुंडलिनी है।

परंतु जो अनुभव लोगों को होते हैं, भिन्न हैं। जैसे की इनका प्रसंग बहुत गहन था (श्री माताजी सहज योग स्टीव की तरफ देखते हुए)। मैं जानती हूं, क्योंकि यह बहुत बड़े साधक थे। और इन्होंने एक बैंड की शुरुआत की थी बिना स्वयं ‘सहज’ शब्द को जाने, सहज बैंड। मैं नहीं जानती उन्होंने यह कैसे शुरू किया। शायद उन्हें अचेतन से आया होगा, वास्तव में। और इनको इतना भारी अनुभव हुआ, क्योंकि उसके बाद मैं उनसे लगभग 5 मिनट के लिए मिली, और फिर वह बोस्टन चले गए। बोस्टन से उन्होंने मुझे टेलीग्राम भेजा, ‘मां हम आपका बोस्टन में इंतजार कर रहे हैं।’ उन्होंने कहा, मां ये कौन है?’ मैंने कहा, ‘यह स्टीव है। मैं इसे बहुत अच्छी तरह जानती हूं। मैं नीचे जा रही हूं।’ और वे आश्चर्यचकित हुए और बोले, आप कैसे पहचानेंगी? आपने तो ने उसे पांच मिनट के लिए ही देखा है!’ मैंने कहा, ‘मैं उसे पहचान लूंगी, आप चिंता ना करें। मैं वहां नीचे जा रही हूं।’ तो आप देखिए, मैं स्वयं भी उसे अनुभव कर सकती हूं। एक व्यक्ति जिसे प्राप्त हो गया है, वह मेरे स्वयं के अंदर है। (श्री माताजी अब पत्रकार जॉर्ज को संबोधित करते हुए) जैसे मैंने आपको बताया, कि अब आप निर्विचार हैं।

यह सामूहिकता की घनिष्ठता है, ये सामूहिक घनिष्ठता है। सामूहिक चेतना के कारण आप दूसरे व्यक्ति को महसूस कर सकते हैं, और आप स्वयं को भी महसूस कर सकते हैं। परंतु ये  अनुभव आपके सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर होता है। परंतु जब आपको आनंद प्राप्त होता है, आपको अपनी जागृति प्राप्त हो जाती है, वह व्यक्ति के स्वयं की स्तिथि पर निर्भर करता है।

ज्यादातर पश्चिमी लोग जागरूक बन जाते हैं, ज्यादा जागरूक। वो चीजों को बेहतर देखने लगते हैं, जो उन्होंने पहले कभी सतर्कता से देखा नहीं। उदाहरण के लिए, एक बहुत अच्छा पर्दा यहां पड़ा है। परंतु लोग आएंगे, ऊपरी तौर पर उसे देखेंगे और चले जाएंगे। परंतु एक सहज योगी देखेगा, कि कितना सुंदर परदा है, कितनी अच्छी रंग आकृति की व्यवस्था है, कितने सुंदर फूल हैं, कितने अच्छे! आप समझे हर चीज में घुसना, हर चीज का अनुभव करना, यही भेदन है। परंतु अनुभव कठिन और भिन्न होते हैं। मैं सोचती हूं, कि सब को उनके बारे में लिखना चाहिए। आप इतने सारे हैं।

सहज योगी: सवाल जो बहुत से लोग ऐसे सम्मेलन में पूछते हैं यह है, कि भूतकाल में इतना मुश्किल क्यों था (आत्म साक्षात्कार मिलना) और वर्तमान में यह इतना सरल क्यों है?

श्री माताजी: मुझसे पूछना मेरे लिए काफी झेपांने वाली बात है! (श्री माताजी मुस्कुराते हुए) परंतु व्यक्ति को एक निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए। मेरे बारे में जरूर कुछ विशेष है, कि मैं ये इतनी सरलता से कर लेती हूं। ठीक है! यह पहला तथ्य है! दूसरा तथ्य यह हो सकता है, कि एक उपमा से इसकी व्याख्या की जा सकती है, कि आरंभ में एक पेड़ पर बहुत कम फूल होते हैं, बहुत कम, एक दो। जब उस वृक्ष की उम्र बढ़ती है, और जब (ब्लॉसम टाइम) पुष्पन काल शुरू हो जाता है, तब हजारों होते हैं। तो, समय आ गया है। समय आ गया है, और मैं आ गई हूं। हो सकता है, शायद की दोनो चीजों एक साथ हो गईं! शायद मैं व्यापार के दांव पेंच बेहतर जानती हूं। यह है जो मैंने खोजा है, सामूहिक रूप से साक्षात्कार देना, एक व्यक्ति को नहीं बल्कि सामूहिक। यह मैंने खोजा है। अगर आप चाहते हैं कि मैं घोषणा करूं, तो मैं इसकी घोषणा करूंगी। परंतु, मैं सोचती हूं, इस में कोई बड़ी बात नहीं है, क्योंकि अगर तुम्हारे पास कुछ है, इस में क्या बड़ी बात है। मैंने कुछ हासिल नहीं किया है, आप ने हासिल किया है। ये मुख्य बात है! आपने हासिल किया है। मैंने कुछ हासिल नहीं किया। ये तो मेरे साथ है। आपने पाया है। 

(अस्पष्ट) आप मुझ से कुछ प्रश्न करें। आप देखिए, ये बैरिस्टर हैं।

प्रश्न: इतिहास में, पुस्तकों में, सभी धर्म कहते हैं कि वे सर्वोत्तम हैं। अगर आप देखें, तो सभी धर्म एक समान हैं। बहुत से लोग जब सहज योग में आते हैं, तो पूछते कि जब सारे धर्म एक ही बात कहते हैं, जैसे सहज योग में भी कहते हैं, तो लोग गुमराह क्यों हुए?

श्री माताजी: गुमराह किए गए, गुमराह किए गए! किस प्रकार उन्होंने भिन्न-भिन्न समूह बनाए। ये एक अच्छा विषय है! अब आप देखिए कि सहज योग में आप सभी के तत्व में पहुंच जाते हैं, वृक्ष के तत्व में। वृक्ष के सत्व का तत्व हर फूल को जाता है। वो कोई भेदभाव नहीं करता। पर फूल भिन्न है। अब इन लोगों ने क्या किया है, उन्होंने इन फूलों को तोड़ लिया है। जैसे कोई कहता है, ‘ये मेरा धर्म है।’ फूलों को तोड़ लिया। तो अब फूल मृत हो चुके हैं, और वे मृत फूलों को उठाये घूम रहे हैं। धर्म अब मर चुके हैं, परंतु वे एक ही वृक्ष पर खिल रहे हैं। और आप जड़ों के रास्ते सत्व के अंदर पहुंचते हैं, तो आप देखते हैं कि सब चीजें हुबहू हैं। ये सभी उन्ही समान चीजों का सिर्फ एक प्रदुर्भाव है।

अब बिजली बह रही है। वो हवा दे रही है। वो वातानुकूलन दे रही है। वो वहां कार्यान्वित हो रही है। परंतु बिजली वही है क्योंकि आप तत्व बन जाते हैं। परंतु अगर आप बाहर से देखें वो भिन्न लगते हैं, विशेषकर जब जान बूझ कर उन्होंने इन फूलों को तोड़ा और स्थापित किया है। ‘ये मेरा है। ईसा मसीह मेरे हैं। कैसे? इस्लाम मेरा है। कैसे? नहीं है! आप उनको जायदाद की तरह नहीं रख सकते। वे आप की जायदाद नहीं हो सकते।

तो ये आप जानने लगते हैं, और इसलिए आप देखते हैं कि सभी चीजें समान हैं। आप समझिए कि अब आप तत्व बन चुके हैं। आप की आंखे खुल गई हैं। आप देखते हैं कि सभी चीजें समान हैं। अब आप कट्टर नहीं बन सकते, आप नहीं बन सकते! अगर आप प्रयत्न भी करें, तो भी नहीं। (श्री माताजी हंस रही हैं) आप बिलकुल अब और कट्टर नहीं बन सकते, क्योंकि आप देखते हैं की सभी में तत्व समान है। मेरा मतलब है कि चीनी इस में डाली, चीनी उसमें डाली, चीनी उस में डाली। अगर आप चीनी बन जाए, आप सब में हैं। है ना?  मेरा मतलब है कि धर्म को अपने स्वरूप में थोड़ा भिन्न होना था, जो अतीत में समय थे उस के कारण । समय आप समझे इस तरह, या उस तरह से थे। हर बार उनको बाहरी स्वरूप और इस तरह की चीज़ें बदलनी पड़ती थीं, सारी सामाजिक स्तर, राजनीतिक स्तर, ये वो। परन्तु मूल तत्व एक समान था।

सहज योगी: तो श्री माताजी जिस निष्कर्ष पर हम पहुंचते हैं वो ये है, कि आखिरकार सहज योग इस सब कट्टरता का अंत कर सकता है?

श्री माताजी: बेशक! अब ये (कट्टरता) और नहीं हो सकती! ये बिलकुल सत्य है क्योंकि आप देखिए मूल तत्व एक समान है। आप देखिए  फैनेटिज्म (कट्टरता) फाइनाइट (सीमित) शब्द से आता है, हम कह सकते हैं। जब आप (इनफिनिटी) अनंतता में चले जाते हैं, कट्टरता कैसे हो सकती है। आप खुद को सीमित कर लेते हैं। ‘मैं ये हूं। मैं ये हूं।’ ये क्लब बनाना है। 

वास्तव में ये कुछ नहीं है, सिर्फ साधारण क्लब बनाने जैसा है। हमारे यहां क्लब हैं। जैसे मान लीजिए कोई मेज पर खाने के बर्तन को बाएं तरफ रख देता है, ये एक क्लब  है। अगर वे दाएं तरफ रखा तो दूसरा क्लब, फिर वो वितरण कर देते हैं। आप देखिए यह एकदम मूर्खतापूर्ण क्लब बनाने जैसा है। बस इतना ही! आप परमात्मा, या ईसा मसीह या इन में से किसी भी अवतरण को को क्लब में नहीं डाल सकते। वे भाई और बहने हैं, और एक दूसरे के रिश्तेदार हैं। वे सभी एक दूसरे से संबंधित हैं। परंतु वे लोग जो कर्ता-धर्ता थे, उन्होंने जितनी जल्दी संभव हो, प्रयास किए उन को नष्ट करने और कार्यभार लेने का। ईसा मसीह चार साल जिए। मोहम्मद साहब कैसे जिए आप जानते हैं। उनमें से हर एक को,  कैसे उन्हे प्रताड़ित किया गया। ये ही हुआ क्योंकि वो उनका लाभ उठाना चाहते थे। 

परंतु अब उनको क्षमा कर देते हैं। ठीक है, कोई हर्ज की बात नहीं! एक दिन वो रास्ते पर आ जायेंगे।

आप का और कोई प्रश्न? हां, वहां?

प्रश्न: (अस्पष्ट)

योगी: हम ऐसे देशों के साधकों को कैसे संपर्क कर सकते हैं जो स्वतंत्र नहीं हैं, जैसे हंगेरी, चेकोस्लोवाकिया और इसी तरह के अन्य देश?

श्री माताजी: मैं कहूंगी, एक तरह से वे बेहतर हैं। मैं रूस गई हूं। मैं चेकोस्लोवाकिया गई हूं। (श्री माताजी हंसते हुए) मैं जानती हूं वह स्वतंत्र नहीं हैं, पर आप देखिए, स्वतंत्रता को भी संभालने में हमें सक्षम होना चाहिए। स्वतंत्र देशों को क्या हो रहा है? अगर आप उन्हे देखें, भयावह! 

अगर आप अमरीका जाते हैं तो आप अपनी घड़ी नहीं पहन सकते। आप अपनी चूड़ियां या और कोई चीज नहीं पहन सकते। शायद कल वो आपके बाल भी खींच कर निकाल लें। ऐसा अव्यवस्थित देश! तो यह आजादी भी एक प्रकार से मनुष्य संभाल नहीं सकते। जहां तक इन देशों का सवाल है जो स्वतंत्र नहीं हैं, मैं आपसे कहूंगी कि यह लोग बहुत सरल हैं। मैं चाइना गई थी। मैं  रूस गई थी अपने पति की नौकरी की वजह से। लोग अत्यधिक सरल है। सारी सरकारें भयावह हैं। ठीक है! पर आपको जरा भी वक्त नहीं लगेगा वहां सहज योग की अग्नि प्रज्वलित करने में, बिल्कुल वक्त नहीं लगेगा! वास्तव में, ये पहले ही वहां जा चुका है एक तरह से। वे अब तर्क से समझ रहे हैं कि सहज योग क्या है। तो इन बड़े देशों से ये अब रूस में आएगा, चीन में आएगा। परंतु सबसे पहले इन स्वतंत्र देशों का क्या? मुझे बताइए उनके बारे में। (श्री माताजी हंसते हुए) स्वतंत्र होना एक प्रकार का लाइसेंस है।

प्रश्न: सहज योग का सामाजिक स्तर, राजनीतिक स्तर और अन्य पर क्या प्रभाव है?

श्री माताजी: बहुत ही बढ़िया है क्योंकि हमारे पास उस गुणवत्ता के लोग हैं। हमें आवश्यकता है मनुष्य में परिवर्तन की। पाखंडी लोग बड़ी बड़ी बातें कर सकते हैं, सहज योग में कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते। परंतु जो लोग विश्वास करते हैं, विश्वास ही नहीं बल्कि जानते है असली बात, कि हम विराट के अंग प्रत्यंग हैं, एक सरकार या दूसरी सरकार के बारे में नहीं सोचेंगे। वह एक विश्व, विराट के बारे में सोचेंगे।

यह सारी तथाकथित राजनीति इसीलिए है, क्योंकि हम लोग विभाजित हैं। नाक आंखों से लड़ रही है। आंखें नाक से लड़ रही हैं। और जब उन्हें पता चलता है, हम एक ही शरीर हैं तो लड़ना क्यों? तो अधिकतर राजनीति लुप्त हो जाएगी पूरी तरह। जैसे की अब, हमारी ओर देखिए, हमारे पास शक्तियां हैं तो हम लोग कैपिटलिस्ट हैं, और हम दूसरों को देना चाहते हैं इसलिए हम पहले से ही कम्युनिस्ट हैं। हम उनसे साझा करना चाहते हैं। हम उसे संरक्षित करना नहीं चाहते। तो हम पहले से ही सही काम कर रहे हैं, समन्वय! 

तो सारी समस्याएं मनुष्यों से आती हैं और जितनी शीघ्र वह आत्मा बन जायेंगे, तो समस्याएं भी समाप्त हो जाएंगी। सामाजिक समस्याएं, आप देखिए हमने सहज योग में पहले ही बहुत सारी सामाजिक समस्याएं सुलझा ली हैं। हमें वो समस्याएं नहीं हैं जो आप सामान्यत देखते है। हमारे बच्चे बढ़िया हैं, हमारी शादियां  बढ़िया हैं। हम अपने जीवन का आनंद ले रहे हैं। ये स्वर्ग जैसा है। एक या दो अप्रिय प्रसंग हुए है, कोई फर्क नही पड़ता!  परंतु अधिकतर हमारा एक बहुत सुंदर समाज है, कोई झगड़े नहीं, कोई ईर्ष्या नहीं, कोई मारपीट नहीं, कोई दुर्भावना नहीं, कोई नफरत नहीं, कुछ नहीं। क्या ऐसा समाज होना अच्छा नहीं है? और कोई तानाशाही नहीं, कुछ नहीं और पूर्णत: स्वतंत्र!

श्री माताजी: हां! मैरी तुम क्या पूछना चाहती हो?

मैरी:  इस सत्य के बारे में कि सहज योग सामूहिक स्तर पर अच्छा कार्य करता है, परंतु ये कैसे होता है कि लाखों लोग, उदहारण के लिए यहां वियना में, जो कार्यक्रमों में आमंत्रित किए जाते हैं, वे पोस्टर्स देखते हैं पर वे बार बार ये मौका गवां रहे हैं। पोस्टर लगे हैं, ये मेरे साथ भी हुआ 1982 में। मैंने आप का पोस्टर देखा, मैंने पढ़ा और मैं वहां से गुजर गई। मैं अभी डेढ़ साल पहले आप के कार्यक्रम में आई। मैं 1982 में आ सकती थी। ऐसा ही बड़ी संख्या में लोगों के साथ हो रहा है। क्यों?

श्री माताजी: अच्छा! मैं इस बारे में क्या कर सकती हूं? (श्री माताजी हंसते हुए और अन्य लोगों के भी हंसने का स्वर) मैरी! आप देखिए कि कुछ लोग उथले होते हैं, और कुछ लोग अपने को बहुत विशेष समझते हैं। उन्हे लगता है कि उन्हें किसी की जरूरत ही नहीं है। हर प्रकार के लोग हैं। मैं जानती हूं। मैं आपसे सहमत हूं, परंतु ऐसा होता है। (किसी अन्य व्यक्ति से) हां कृपया बताइए!

प्रश्न: आपके विज्ञापन के बारे में, जर्मन भाषा में छपे आप का पोस्टर के शब्द ‘इंस्टेंट कॉफी’ के निमंत्रण जैसा सुनाई देते हैं।

योगी: इनको लगता है कि इस कार्यक्रम के लिए सहज योगियों द्वारा छपा विज्ञापन ‘इंस्टेंट कॉफी’  के विज्ञापन जैसा सुनाई पड़ता है।

श्री माताजी: यह है एक इंस्टेंट कॉफी! पर क्या कर सकते हैं? (श्री माताजी हंसते हुए और फिर अन्य लोगों के हंसने का स्वर) 

आप देखिए, मैं बताऊं आपको, आप इंस्टेंट कॉफी खरीदते हैं। है ना? अब आधुनिक समय में सब कुछ तत्काल (इंस्टेंट) है, इसलिए अब हमारे पास तत्काल योग भी होना चाहिए। यह है भी! क्या कर सकते है? यह है। पर आप समझिए कि हम भी कह सकते हैं, कि बहुत ज्यादा कष्ट उठाने के बाद ये आपको मिलता है। आप को ये त्याग करना पड़ता है। आपको वो त्याग करना पड़ता है। ठीक है? परंतु यह सत्य नहीं है। अब क्या कर सकते हैं! ये एक इंस्टेंट कॉफी है। परंतु हम इंस्टेंट कॉफी पीते हैं, और हम इस आधुनिक संसार में चाहते हैं कि सब कुछ इंस्टेंट हो, तो योग क्यों नहीं?

प्रश्न: (अस्पष्ट)  ऐसा लगता है कि जैसे की खुशी तत्काल मिलेगी (अस्पष्ट)

श्री माताजी: तो आप हमें बताइए कि किस तरह से विज्ञापन दिया जाए। (श्री माताजी हंस रही हैं)  हां! आप देखिए जो मैं कह रही हूं, सच्चाई है। मैं सच कहती हूं कि यह एक सच्चाई है! कुंडलिनी को मैं कहूंगी कि आजकल के आधुनिक काल में यह ‘जेट कुंडलिनी’ है। सच में! मैं खुद आश्चर्यचकित हूं उसकी चालना से, तीव्रता से उठती है, आप जानिए! हजारों लोग भारत में, हजारों लोग! तीव्रता से जाती है। मैं क्या कर सकती हूं? ये ऐसे ही कार्य करती है! मेरे ख्याल में परमात्मा आतुर है, ‘चलो इसे अभी प्राप्त कर लो’ ऐसे ही। यह है! आधुनिक काल में ये बहुत तेज़ी से कार्य कर रही है। सिर्फ मैं ही नहीं, इन से पूछिए कितने लोगों को इन्होंने आत्म साक्षात्कार दिया है। उनमें से हर एक ने हजारों को आत्म साक्षात्कार दिया है। मेरा मतलब है देखकर ही विश्वास किया जा सकता है। परंतु विज्ञापन देना, हमें नहीं पता कि अब क्या कहा जाए।

सहज योगी: शायद अंग्रेजी शब्द थोड़े बहुत चमकीले, थोड़ा चतुराई भरे, कुछ ऐसा है। शायद आप का मतलब ज्यादा गहन, ज्यादा गहरा से है, कि ये दूसरे गुरुओ जैसा सुनाई पड़ता है।

श्री माताजी: (बगल में बैठे सहज योगी से) मैं अन्य गुरुओं के बारे में नहीं जानती कि वो क्या पसंद करते हैं। पर आप यह क्यों नहीं देखते कि आपको क्यों लिखना है। मुझे पता नहीं है। पर मैं क्या कह रही हूं कि-

सहज योगी: (श्री माताजी के आगे बोलने से पहले ही, दीवार पर लगा विज्ञापन दिखाते हुए) यहां लिखा है कि ‘समय आ गया है, असली आत्म साक्षात्कार यहां और अभी’

श्री माताजी: तो हमें क्या देखना चाहिए? तो हमें क्या कहना चाहिए? ‘यहां और अभी’ यह एक सच्चाई है। मैं आपसे कहूंगी वास्तव में। (श्री माताजी हंस रही हैं) हमें क्या कहना चाहिए? ठीक है! यह सच है! पर मैं क्या कह रही हूं कि लोगों को आकर्षित करने के लिए- वो ये कह रहे है, कि जब आपको लोगों को बाहर से आकर्षित करना हो, तो हम को लगाना चाहिए। इसे बदलने की कोशिश कीजिए। मुझे पता नहीं क्या!

सहज योगी: शायद मैरी कहना चाहती है, क्या कोई निश्चित समय है, क्या कोई निश्चित चरण है जब आप सहज योग में आते हैं या ऐसा है कि अभी तुरंत हर एक को यहां लाना चाहिए? या क्या आप अपनी चेतना की एक अवस्था में पहुंचते हैं, जब आप उस के लिए तैयार हों, या ये कुछ है जहां बस आप आ जाते हैं, विज्ञापन विभाग अच्छा है या नहीं? (हंसने का स्वर)

श्री माताजी: मुझे नहीं मालूम कि मैं इस बिंदु पर  क्या कहूं, क्योंकि आप निश्चित तौर पर ये नहीं कह सकते कि लोगों को एक निश्चित अवस्था तक पहुंचना है, क्योंकि एक व्यक्ति को, आप देखिए, उसकी पत्नी यहां लाई ये कहते हुए कि वो सब से बुरा आदमी है। इसमें लिप्त होता है, उस में लिप्त होता है, और हर प्रकार की बातें, उस व्यक्ति के बारे में सारे बुरे प्रमाण पत्र! पर जैसे ही वो अंदर आया उसको आत्म साक्षात्कार मिल गया! ये वास्तव में सच है, मै कहती हूं। जो लोग कैंसर से पीड़ित हैं उन्हें तत्काल ही आत्म साक्षात्कार मिल गया। कौन सी अवस्था है, मैं नहीं जानती। परंतु शायद हम कह सकते हैं, जीवन के प्रति दृष्टिकोण। शायद जीवन के प्रति दृष्टिकोण। 

उदाहरण के लिए, पश्चिम में  बीबीसी के लोगों ने मुझसे कहा कि, ‘अगर आप कहेंगी कि यह निशुल्क है, तो कोई आपको नहीं सुनेगा।’ पर मैं यह नहीं कह सकती, कि ये पैसे के लिए है! यह मुख्य बात है। उसने कहा, ‘जब आप कहते है प्रवेश निशुल्क, वो सोचते हैं कि ये बेकार है।’ ये धारणा इतनी खराब है, कि अगर आप कहें प्रवेश निशुल्क। वो कहेगा, ‘ ओह ये तो जरूर कोई अजीब सी चीज होगी।’

सहज योगी: उस ने कहा कि ये एंग्लो-सैक्सन दिमाग है।

श्री माताजी: यही कहा था उस ने, ‘एंग्लो सैक्सन दिमाग बिना धन के कुछ नहीं समझ सकता।’ क्या आप कल्पना कर सकते हैं? उसने साफ साफ मुझ से कहा। उसने कहा, ‘आप इसे बदलिए।’ मैंने कहा, ‘मैं क्या कहूं?’ मैं वास्तव में पैसा नहीं लेती। मुझे क्या कहना चाहिए? तो ये बात है! आप देखिए, उनके दिमाग में यही धारणा है।

परंतु भारत में ऐसा नहीं है। भारत में अगर आप देखें, तो गांव से लोग बैल गाड़ियों में आते हैं, वे मीलों यात्रा करते है, पैदल आते हैं, जब उन्हे पता चलेगा कि मैं वहां आ रही हूं।

फिर यहां ज्ञान भी नहीं है। उन के पास कोई पृष्ठभूमि भी नहीं है, कि मैं क्या कहूंगी। एक पृष्ठभूमि की आवश्यकता है या मैं नहीं जानती, संवेदनशीलता की आवश्यकता है। इटली वासियों में पृष्ठभूमि नहीं है, पर संवेदनशीलता है। सबसे बुरा जो है सो मैं कहूंगी स्विट्जरलैंड में है, या अमेरिका में। सबसे बुरी हालत है।

अमरीकी हर प्रकार के गुरुओं के चक्कर में पड़ जाते हैं, पर सहज योग के लिए शून्य! बहुत बुरा! मुझे खेद है पर ये सत्य हैं। पर ऐसा ही है। वह सहज योग की तरफ देखते ही नहीं पर अब देख रहे हैं। जब उन्होंने सारे गुरुओं की शॉपिंग का सारा अनुभव हो गया। अब वे आ रहे हैं। वे शॉपिंग करना चाहते हैं, आप जानते हैं। ये एक फैशन है! गुरु एक फैशन है। कुछ भी गहन नहीं है। ये एक फैशन है इस गुरु पे जाना, इस गुरु पे जाना। तो उनसे कैसे बात की जाए? उन के पास पैसा है। वो उस से शॉपिंग करना चाहते हैं।

अमेरिका सबसे बुरा था, में ये कहूंगी, अनुभव के हिसाब से, जो की सब से अधिक उन्नत माना जाता है, सब से अधिक स्वतंत्र है। वे सब से ज्यादा खराब हैं । परंतु ऑस्ट्रिया में मैंने देखा है हाल भरे होते हैं। वो पूरे भरे होते हैं। ऑस्ट्रिया में हॉल हमेशा पूरे भरे हुए मिलते हैं। जैसे इटली में भी। लोगों की कभी कमी नहीं होती। मेरा मतलब ऑस्ट्रिया में लोगों को सीढ़ियों पर बैठना पड़ता है, है ना? हमें वो समस्या नहीं है।

परंतु आत्म साक्षात्कार पाना हर एक के लिए संभव नहीं है शायद। एक प्रकार की समझ की आवश्यकता है। मैं समझा नहीं सकती क्यों। क्योंकि हॉल पूरा भरा होता है मैं बताऊं आपको। आप देखिए कि हॉल पूरे भरे होते हैं। लोग सीढ़ियों पर बैठते हैं और कुछ लोग बाहर बैठे होते हैं, कुछ लोग सड़कों पर खड़े होते हैं। यह है उनके सैक्सन दिमाग होने के बावजूद भी। (सहज योगी की ओर मुड़ते हुए) क्या आप ने निशुल्क लिखा? 

सहज योगी: हां!

श्री माताजी: हां, यह बात है! वे धीरे-धीरे रास्ते पर आ जायेंगे, वे आयेंगे। देखिए उन्हें अपने सबक थोड़ी ज्यादा सीखने हैं, मैं सोचती हूं। बस इतना ही! 

अब आप! आपके साथ मैं बताती हूं, क्यों! क्योंकि आप यू.एन. में हैं, और एक बड़े बॉस हैं। यू.एन. में काम करना ही आपका दिमाग खराब कर देता है, मैं कहूंगी। मैं जानती हूं मेरे पति वहां हैं। तो मैं वहां सब को जानती हूं और यू.एन. व्यक्ति होने से उनके दिमाग फूल जाते हैं। फिर आप बड़े बड़े सम्मेलन में भाग ले रहे हैं आप देखिए, तथाकथित बड़े बड़े लोग, बड़े बड़े दिमाग। तो स्वाभाविक है कि बड़े-बड़े दिमाग में यह बातें नहीं जाएंगी। तो ठीक है! परंतु अब आप ठीक है। 

ये एक बात है यू.एन. के सरकारी लोग सब से ज्यादा खराब हैं। वे सहज योग में आने वाले आखिरी लोग होंगे। मेरे पति एक सरकारी अफसर हैं, और मेरा ऐसे लोगों से वास्ता पड़ता रहता है। मैं उन लोगों से सहज योग के बारे में कभी बात नहीं करती, कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं। सरकारी अफसर सिर्फ सरकार की सेवा करना चाहते हैं, बस इतना ही! वे उसके परे कुछ समझते ही नहीं हैं। तो नौकरशाही ऐसी है। 

तो ऑस्ट्रिया में और अन्य क्या है? नौकरशाही और फिर उसके बाद सेना? विद्यार्थी? वे लोग आएंगे।

प्रश्न: (अस्पष्ट) पर किसी तरह मैं अंतिम कदम नहीं ले पा रही हूं। मैं वियना में बहुत से लोगों को जानती हूं, और मैं उनसे बातें करती हूं। उनमें से कुछ लोग सहज योग के संदेश को समझते तो हैं, पर फिर वह अटक जाते हैं कि हम श्री माता जी की पूजा क्यों करें? 

श्री माताजी: श्री माताजी के पास क्यों जाना चाहिए?

सहज योगी: श्री माता जी की पूजा क्यों करनी चाहिए?

श्री माताजी: इसकी बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। मुझे बहुत खुशी होगी कि अगर वह मेरी पूजा ना करें। परंतु आप समझिए कि जो लोग मेरी पूजा करते हैं, उन्होंने उसमें कुछ लाभ पाया है, इसीलिए वे मेरी पूजा करते हैं। पर आप जानते हैं कि वास्तव में मुझे उससे नफरत है। मैं इस बात का हमेशा ध्यान रखती हूं कि पूजा इतनी लंबी हो, कि मुझे कुछ समय आराम के लिए मिल जाए। परंतु मैं बिल्कुल नहीं चाहती कि लोग मेरी पूजा करें। ये बहुत अच्छा है! यह उनकी बहुत अच्छाई है।

पर मैं आप को बताऊं, जब उनमें से कुछ लोग मेरे पैर छूते हैं, तो मेरे छाले पड़ जाते हैं। भयानक! जैसे मैं कल बता रही थी आपको, बिच्छू जैसे, मेरे पैरों पर बड़े-बड़े छाले आ जाते हैं। अगर आप मुझसे पूछे, तो मैं नहीं चाहती कि वे मेरी पूजा करें। परंतु वे करना चाहते हैं, क्योंकि आप जानते है कि उसका क्या अर्थ है, मुझे पूजना। आप सब इसे अच्छी तरह जानते हैं।  पूजा करना, आप मुझे क्या देते हैं? कुछ नहीं! आप कुछ मंत्र कहते हैं, ये वो। आप मुझे क्या देते हैं? कुछ नहीं! मेरी पूजा करने के लिए कुछ भी नहीं है। 

उदहारण के लिए, अब मेरा फोटो देखें, ये वाला, जब मैं एक गांव में बैठी थी। जब मैंने गांव में प्रवेश किया, मैंने उन्हें बताया कि कोई महान आत्मा है जो इस गांव में रहती थी। उन्होंने कहा कि एक ऐसा व्यक्ति था जो मुस्लिम था। उसका  नाम ‘मिया’ था। तो मैंने कहा वो अभी भी यहीं रहते होंगे। और मैं अपना प्रवचन देने के लिए बैठ गई और मैंने आत्मा को दो षडभूजों की रोशनी के रूप में आते देखा, आप देखिए, मेरे सिर के ऊपर। मैंने उसे देखा, पर आप उसे नहीं देख सकते। मेरा मतलब है कि लोग नहीं देख सकते।

परंतु वह कैमरे की पकड़ में आ गया। कैमरे ने उसे कैद कर लिया। और फिर सूर्य की किरणें प्रिज्म जैसी, आत्मा के बीच से मुझ पर सात रंगों की तरह आने लगी। मैं उसे देख सकती थी, मैं देख सकती थी, फिर मैं उस से बहुत प्रसन्न हुई, आप देखिए, इस सामंजस्य से। परंतु और कोई उसे नहीं देख सकता था। फिर मैंने कहा, ‘ठीक है! यह ग्रहण करने की क्षमता से अधिक है, इस तरह!’ 

मैंने ऐसा कहा परंतु अभी उसे कोई नहीं देख सकता, तो उसके बारे में इनसे बात करने का क्या लाभ? ‘आपको देखना चाहिए, क्योंकि आप नहीं देखेंगे।’ तो किसी को मेरी पूजा के बारे में भी क्यों बताना है, जब तक कि वह इसे नहीं समझते? परंतु कैमरे ने उसे कैद कर लिया। इसमें मैं क्या कर सकती हूं? ईश्वर का धन्यवाद है कि कैमरे ने इसे कैद कर लिया। मैंने नहीं कहा।

वह ईसा मसीह की पूजा क्यों करते हैं? उन्होंने उन्हें कभी नहीं देखा। वे ईसा मसीह की माता की पूजा क्यों करते हैं? उन्होंने उन्हें भी कभी नहीं देखा। उन्होंने क्या किया? वह अपनी पूरी जिंदगी में सिर्फ रो रही थीं। उन्होंने किसी को आत्म साक्षात्कार नहीं दिया। ईसा मसीह ने भी किसी को आत्म साक्षात्कार नहीं दिया। फिर वे उनकी पूजा क्यों करते हैं? आप एक ईसाई हैं। आप को उन से इस प्रकार का सवाल करना चाहिए। मुसलमान काबा की इबादत क्यों करते हैं?

परंतु सहज योग में, मैं आप के लिए एक खोज हूं। मैंने कभी किसी से मेरी पूजा करने के लिए नहीं कहा। कभी नहीं! यह मेरे लिए भयानक है। मैं लोगों से भयभीत हूं जो मेरी पूजा करने का प्रयास कर रहे हैं, क्योंकि आप देखिए मुझे सब कुछ लेना पड़ता है, आप का सब कुछ अंदर खींचना पड़ता है। वे आप को बता सकते हैं कि मुझे ये बिलकुल पसंद नहीं है। मैं बीच में एक बड़ा फासला बनाना चाहती हूं, जिस से की मेरे पास कुछ समय तो हो आराम करने के लिए, पूरी चीज को सोखने, पचाने और फिर उसे बाहर निकलने के लिए। तो आप को उन्हे कुछ भी बताने की जरूरत नहीं है। आरंभ में आप को उन्हे कुछ भी नहीं बताना चाहिए।

उन्हे कहिए, ‘आप महान हैं। आप आइए!’ उन्हे उनका आत्म साक्षात्कार प्राप्त करने दीजिए। फिर अगर वे कहें, फिर हमें विचार करना चाहिए, उन्हे मुझे पूजना चाहिए या नहीं। और हरेक को पूजा करने के अनुमति है भी नहीं।

मैरी क्या तुम जानती हो, कि हम हरेक को आने की अनुमति नहीं देते? आपको एक शुद्ध व्यक्ति होना चाहिए अन्यथा उन्हें अनुमति नहीं है। यह पूजा आपका सौभाग्य है, मेरा बिलकुल भी नहीं! (श्री माताजी हंसते हुए) बिल्कुल भी नहीं! जिस पर आप कहेंगे कि मां इस से मुंह मोड़ती हैं। मैं वास्तव में इस से मुंह मोड़ती हूं। ये कुगुरु क्योंकि उन्हें कुछ नहीं होता, वे ये पसंद करते हैं।

तो उसके लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं है। इस को देखने की अवश्यकता है। अगर वो सहज योग में आ जाते हैं, वो उसे अच्छी तरह देख सकते हैं। जब तक की वे इस में आ नहीं जाते, आप को मेरे बारे में, एक अवतरण बता कर, बात नहीं करनी चाहिए। कुछ भी, इस बारे में बात करिए ही मत! आप को उन्हे पूजा के बारे में या कुछ भी और नहीं बताना चाहिए। उनसे सिर्फ इतना कहिए, कि आपको अपना आत्म साक्षात्कार पाना है। पहले उनको अपनी आंखें खोल लेने दीजिए, फिर उसके बारे में उनसे बात कीजिए। अगर शुरुआत में ही आप उनसे बातें करना शुरू कर देते हैं, निस्संदेह वो अटक जायेंगे। वह अटके हुए हैं, क्योंकि उस बिंदु पर नहीं पहुंचे हैं। उन्हे समुद्र में होने के लिए समुद्र-यात्रा योग्य होना चाहिए। (श्री माताजी हंसते हुए) है ना?

शुरू करने के लिए कुछ भी आवश्यक नहीं है,  और मैं वास्तव में कुछ नहीं चाहती। अगर कोई  काम है जिसे करने की जरूरत है, वह है सब को आत्म साक्षात्कार देना। बस इतना ही! पर आगे उन्नति के लिए, उन्हें मेरी पूजा करनी होगी।

वे उस की पूजा करेंगे, जिसकी मृत्यु हो चुकी है और वह जा चुका है। उन्होंने ईसा मसीह की कभी पूजा नहीं है की जब वे जीवित थे। उन्होंने उन की मां की कभी पूजा नहीं की, जब वे जीवित थीं। उन्होंने श्री राम की कभी पूजा नहीं की। उन्होंने श्री कृष्ण की कभी पूजा नहीं की। अब जब वे सब मर चुके हैं, बहुत अच्छा है उनकी पूजा कर रहे हैं। परंतु अब वे पत्थर हैं। अब वो क्या कर सकते हैं? ये मनुष्य का स्वभाव है। जब कोई मर जाता है, तो ये पूर्णत: सही है। जिन्होंने ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया, उन्होंने ये चर्च खड़ी कर दी हैं। जब कोई व्यक्ति जीवित होता है वर्तमान में, आप देखिए, तो आप कभी उसकी सराहना नहीं करते। 

क्योंकि हम किसी को पूजा करने की अनुमति भी नहीं देते। वहां होना किसी के लिए भी बहुत बडे सम्मान की बात है, ये आप जानते हैं। यह हर एक के लिए नहीं है। बहुत सारे लोगों को इंग्लैंड में मना कर दिया गया। अभी आपको स्वयं को तैयार करना है। ओह नहीं! नहीं! नहीं! हर जगह!

और कल मैं वीडो को बता रही थी, कि आप  को उस महिला को नहीं लाना चाहिए था। वह किसी काम की नहीं थी। वो जो तुम्हारे कमरे की सफाई करती थी, जो तुम्हे बार बार तंग कर रही थी। और मैंने कहा उसमें बहुत ज्यादा पकड़ आ रही है, और तुम्हें उसे यहां पूजा में नहीं लाना चाहिए था। वो मुझे परेशान करता है। यह बहुत महत्वपूर्ण है। परंतु उस व्यक्ति की तरह जिससे स्नातकोत्तर विद्यार्थी होना है, कुछ चीजों को समझने के लिए, आपको सहज योग में स्नातकोत्तर होना होगा, पूजा के लिए। वरना आपको नहीं करनी चाहिए। तो आप को इन चीज़ों के बारे में बात नहीं करनी चाहिए। वे निसंदेह अटक जाएंगे।  मुझे इस बारे में कोई संदेह नहीं है। कोई भी अटक जाएगा, क्योंकि यह बहुत हास्यास्पद लगता है, है ना? कि आप को किसी अन्य मनुष्य को पूजा करनी है। तो आप को विवेक का इस्तेमाल करना है। कोई भी इस तरह से अटक जाएगा, जब तक कि आप प्रथम दर्जे के सहज योगी हों, और आप इसका महत्व समझते हों, और आप उस में गहरे जा चुके हों, तभी आप जान पाएंगे। इसकी सराहना होनी चाहिए।

मैंने कभी किसी से अपने बारे में बिल्कुल बात नहीं की। कभी नहीं, जब तक की कुछ संतो ने मेरे बारे में बात करना शुरू किया। कुछ संतो ने सिर्फ कुछ लोगों को बताया, कि ये ऐसा है। तब वे आए और मुझ से पूंछा, और मैंने कहा,’ठीक है! आप स्वयं पता कीजिए।’ आप देखिए कि मनुष्यों के साथ आपको बहुत ज्यादा सावधान और सतर्क होना पड़ता है। मैं सूली पर नहीं चढ़ाना चाहती, आप समझे! आपको उनके साथ बहुत अधिक सतर्क होना पड़ता है, क्योंकि अहंकार पहली चीज है जिसके साथ वे आते हैं। वे नहीं समझते कि उनके लिए क्या लाभदायक है।

आप देखिए, ईसा मसीह ने उनके साथ क्या किया था? क्या उन्होंने उन लोगों को बर्बाद किया था या उनके साथ कुछ बुरा किया था? परंतु उन लोगों ने उन्हें सूली पर चढ़ा दिया। हैं न? उन्होंने मोहम्मद साहब को जहर दिया। क्यों? क्या बात थी? क्योंकि अहंकार? तो आपको उसके साथ सावधान रहना चाहिए। जब आप लिखते भी हैं, मान लीजिए,  हां जब भी आप लिखते हैं, आपको सतर्कता से लिखना चाहिए। अपनी समझ से उसे ऐसा बनाएं, कि वे मेरे कार्यक्रम में आएं। अपनी बुद्धि का प्रयोग करिए।

जो आप रखना चाहते हैं, उसे कैसे रखें, या अगर आप कहना चाहते हैं, आप कह सकते हैं कि प्रथम क्षण में कुंडलिनी उठ जाती है, फिर आप को उस में बढ़ना होता है। अगर आप इसको शीघ्र इंस्टेंट – काफी वाली बात नहीं कहना चाहते, आप इस तरह भी कह सकते हैं। यह अच्छा लग सकता है। मैं उस तरह का सुझाव दूंगी। ठीक है? इससे मदद मिलेगी!

लेकिन कुछ लोग बहुत ही गहन होते हैं। उन्हे तुरंत ही आत्म साक्षात्कार प्राप्त हो जाता है, क्योंकि वे सभी जीवनों में गहरे व्यक्ति रहे होते हैं। एक जीवन नहीं, परंतु अनेक जीवन। तो, उन्हे एकदम मिल जाता है। 

तो ये (सहज विज्ञापन) उन लोगों को आकर्षित करता है जो उथले होते हैं। फिर ये अच्छी बात नहीं है कहने के लिए। ये भी एक कारण हो सकता है की सिर्फ उथले लोग हमारे कार्यक्रम में आते हैं। हमें पता करना चाहिए कि कैसे लिखें की गहन लोग आकर्षित हों। है ना? आपको तौर तरीके ढूंढने चाहिए जिससे कि गहरे लोग आकर्षित हो ना कि उथले

मैं आपसे सहमत हूं कि हॉल भर जाता है, क्योंकि शायद उथले आते हैं। जैसे कोई सेल चल रही हो। कोई कुछ नहीं खरीदता। ये सिर्फ एक सेल चल रही है। सब सेल को देखने आते हैं। (श्री माताजी हंसते हुए) आप देखिए, ये कलियुग है। ये एक भ्रमित अवस्था है! ये भ्रम का युग है। ये भ्रम का युग है, असली भ्रम!

कुछ लोग ये भी कहते हैं, कि मैं क्यों आत्म साक्षात्कार देती हूं। मैंने कहां, ‘बेहतर होगा, आप दें। बहुत अच्छा विचार है। मैं सेवानिवृत्त होना चाहूंगी।’ आप देखिए, ये अहंकार हैं। है ना? ‘आप’ क्यों करें? मेरा मतलब है, मैं कर रही हूं, क्योंकि मुझे करना है। ठीक है? लेकिन अगर आप ऐसा कर सकते हैं, तो इस से बढ़िया कुछ नहीं! मैं सेवानिवृत्त हो जाऊंगी। मुझे बहुत खुशी होगी। मेरा मतलब है मेरी उम्र अब सेवानिवृत्ति की आयु से आगे निकल गई है। मुझे बहुत पहले ही सेवानिवृत्त हो जाना चाहिए था। देखिए चलती ही जा रही हूं (श्री माताजी हंस रही हैं)।

तो आपको भी लोगों को देखना चाहिए कि वे कौन हैं, और तब उनसे बात करनी चाहिए। आपको विवेक का प्रयोग करना चाहिए। विवेक का प्रयोग करना बहुत महत्वपूर्ण है। जैसा उसने कहा, शायद कुछ लोगों को ये इस जीवनकाल में प्राप्त नहीं होगा। शायद अगली बार! और ऐसा भी होता है कि, आप देखिए, उदाहरण के लिए,

कुछ लोगों को आत्म साक्षात्कार मिल जाता है,  वे परिवर्तित हो जाते हैं और बहुत सुंदर बन जाते हैं। तब औसत दर्जे, औसत दर्जे के लोग, आप देखिए, शायद वो देखें और उनका अनुसरण करने का प्रयास करें। औसत दर्जे के लोग शायद अनुसरण करें।

जैसे जब मैं इटली गई, तो ये महोदय जो एक बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति हैं, जिन्होंने मेरा इंटरव्यू लिया बोले, ‘पहले आप मुझे आत्म साक्षात्कार दीजिए, तब मैं आपका इंटरव्यू लूंगा।’ क्योंकि शायद वह मुझ पर विश्वास करते थे या जो भी कुछ, या शायद विश्वास नहीं करते थे, या उन्हें संदेह था, जो कुछ भी था, उन्हे आत्म साक्षात्कार मिल गया। तब वह हंसने लगे और बोले ‘ओह! तो मुझे मिल गया!’ मैंने कहा, ‘हां तुम्हें मिल गया!’ अब वही हैं जो सारा प्रबंध कर रहे हैं। तो शायद इस प्रकार ये कार्यान्वित हो जाए। निर्भर करता है। 

आप देखिए, आधुनिक काल में मनुष्य बहुत ज्यादा जटिल है। उन्हे पकड़े रहना बहुत कठिन है। अगर आप उन्हे ये दें, वो उस राह पर आ जायेंगे। अगर आप उन्हीं वो दें, वो इस राह पर आ जायेंगे। वो उसे प्राप्त नहीं करना चाहते। सिर्फ कुछ पुस्तकें और कुछ बहाने। ये भयावह है! मैं जानती हूं। विशेषकर पश्चिम में ये बहुत मुश्किल है। बहुत कठिन! परंतु वे कुछ मूर्खतापूर्ण स्वीकार कर लेंगे, जैसे पंक्स! पंक्स अब आप को हजारों में मिलेंगे। बहुत अच्छे पदों पर लोग अब पंक्स हैं। क्या आप विश्वास कर सकते हैं! कल्पना कीजिए हमारा प्रधानमंत्री एक पंक जैसे जा रहा हो। वे मूर्खतापूर्ण बातें बिना सवाल किए स्वीकार कर लेते हैं। इस बारे में सोचिए! उदाहरण के लिए मादक पदार्थ, वे बिना किसी समझ के, बिना पूंछे स्वीकार कर लेते हैं और बहुत ज्यादा शिक्षित और ऊंचे पदों पर बैठे लोग ऐसा बेतुकी बातें करते हैं! शराबखोरी, व्यभिचार, सब कुछ, सब बकवास चीजें! परंतु स्वयं के साथ कुछ अच्छा करने में समय लगता है। वे बहुत ही आत्म विनाशकारी प्रवत्ति के हैं। स्वयं के लिए कुछ अच्छा करने में, स्वयं के लिए कुछ आशीर्वाद प्राप्त करने में, हम बहुत धीमें हैं। परंतु सब ठीक हो जाएगा। उनको अपने सबक सीखने होंगे। इतना ही मेरे विचार से! हां उन्हे अपने सबक सीखने होंगे।

सहज योगी: हम समाप्त करें!

श्री माताजी: ठीक हैं! आप सब संतुष्ट हैं?

परमात्मा आप सबको आशीर्वादित करें।

मुझे खुशी है कि यह बहुत बुद्धिमान व्यक्ति हैं। उन्होंने अपनी तैयारी की हुई है। अन्य लोग सिर्फ आए हैं, ऐसे ही कोई भी। आप देखिए ऐसा नहीं चलेगा! यह बहुत गहन विषय है। यह बहुत गहन विषय है! आप बस प्रकट हों और बाहर चले जाएं! आप नहीं कर सकते। है ना?

स्टीव, क्या आप बोस्टन में कुछ लोगों से इस प्रकार बात करने वाले हैं? 

स्टीव: हां, हम बात कर रहे हैं।

सहज योगी: इस प्रकार से, आप का अर्थ पत्रकार सम्मेलन है?

श्री माताजी: हां, इसी तरह से! हां इसी तरह से! 

स्टीव: वहां एक महिला है जिसने हमें संपर्क किया है एक लेख लिखकर। उसने लेख पूरा कर लिया है, और वह उसे छपवाने का प्रयास कर रही है। उस ने हमसे संपर्क किया। 

श्री माताजी: सच में?!

स्टीव: हां! जब वो सहमति दे देंगे हम आपको एक प्रति भेजेंगे जिस से की आप प्रचार के लिए सहमति दे सकें।

श्री माताजी: बढ़िया! बढ़िया!

सहज योगी: इसे उचित परिप्रेक्ष्य में रखने के लिए- सारी दुनिया में हमें हजारों लोग मिल जाते हैं। हमें बड़े पत्रकार सम्मेलन मिल जाते हैं। हमें मुख्य समाचार में प्रचार मिलता है और ये कार्यान्वित होता है। ये बहुत गतिशील चीज है। ये पहली बार है कि कोई इस प्रकार कह रहा है, और हमें सोचने के लिए बाध्य कर रहा है, परंतु सकारात्मक पहलू पर हमारा विज्ञापन कार्य असर डालता है, और हमें असाधारण प्रतिक्रिया मिलती है, और हजारों की संख्या में लोग आते हैं।

श्री माताजी: ऑस्ट्रेलिया बहुत बढ़िया हैं। ऑस्ट्रेलिया अत्यधिक अच्छा हैं। नहीं पर आप देखिए, यह जो कह रहे हैं इसलिए मैं एक तथ्य देखती हूं। एक बात जो वास्तव में मेरे दिमाग में आई है, वह यह है हो सकता है कि हमें उथले लोग मिलते हों।

सहज योगी: ये सच है। सच हो सकता है।

श्री माताजी: हो सकता है। तो हमें कुछ गहन उस में (विज्ञापन में) रखना चाहिए, क्योंकि यह बहुत गहरा अनुभव है। इस के सुझाव कुछ ऐसे होंगे, जो कुछ चीजें समझाते हैं। वे मेरे प्रवचन पसंद करते हैं। ठीक है! वे मेरे प्रवचन सुनना पसंद करते हैं, क्योंकि आप देखिए, ये उनके मन को भाता है। परंतु उन्हें आत्म साक्षात्कार नहीं मिलता। तो इसका अर्थ है वे बहुत गहन लोग नहीं हैं।

सहज योगी: श्री माताजी मुझे एक बात समझ आई, कि काफी लोग फोटो को अच्छी प्रतिक्रिया देते हैं। (अस्पष्ट)

श्री माताजी: हां! ये एक बात है। हां

उदहारण के लिए, स्विट्जरलैंड में हम ने ये चीज़ें लगाईं। किसी ने हटाई नहीं। ये अभी भी वहीं है। तीन साल बाद भी वहीं है। यह आश्चर्यजनक है स्विट्जरलैंड में जहां लोग इतने नुक्ताचीन हैं, उन्होंने मेरे फोटो रखे हुए हैं। इटली में भी मेरे  तीन साल पुराने सारे फोटो वहां है। इटली! तो इटली में भी हैं।

और मैं यह भी कहूंगी, विज्ञापन का काम जो भी ऑस्ट्रेलिया में था, वह उत्कृष्ट था। ऑस्ट्रेलिया पूर्णत: ऊर्जावान है। निस्संदेह वो सहज योग में बहुत प्रगति कर रहा है। ऑस्ट्रेलिया के निवासी कल्पना करिए, क्या आप विश्वास कर सकते हैं, कि वे वहां अपने पूर्वजों द्वारा अपराधियों की तरह भेजे गए थे। और आज वे ही हैं जो सबको अध्यात्म की ओर ले जा रहे हैं। ये देखिए! तो आप कैसे कह सकते हैं अच्छा या बुरा? आप अच्छे और बुरे के बारे में बात नहीं कर सकते! ऑस्ट्रेलिया सबसे बढ़िया है। ऑस्ट्रेलिया सबसे बढ़िया है अब, मेरा मतलब है उन्नति में। ऑस्ट्रेलिया से हमारे यहां लीडर है डॉक्टर वारेन, जिन्होंने सब कुछ आरंभ किया था और हमारे यहां जेम्स हैं। क्या वह आए हैं? ओह वह रहे जेम्स!

तो परमात्मा आप सबको आशीर्वादित करें! 

परमात्मा आप सबको आशीर्वादित करें!!