Shri Ganesha Puja: Establishing Shri Ganesha Principle

YMCA – Camp Marston, San Diego (United States)

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                                                                                                                                                                                             श्री गणेश पूजा, "श्री गणेश सिद्धांत की स्थापना"।

सैन डिएगो (यूएसए), 7 सितंबर 1986।

आज हम श्रीकृष्ण की धरती पर श्री गणेश जी का जन्मदिन मना रहे हैं।

यह कुछ बहुत ही अभूतपूर्व और बहुत महत्वपूर्ण मूल्य का है कि आपको श्री कृष्ण के पुत्र का जन्मदिन उनकी ही भूमि में मनाना चाहिए। आप जानते हैं कि श्री गणेश ने इस पृथ्वी पर महाविष्णु के रूप में अवतार लिया था और वे राधा के पुत्र थे, जिन्होंने प्रभु यीशु मसीह के रूप में अवतार लिया था। तो आज यह जन्मदिन मनाकर आप सबसे बड़े सत्य को पहचान रहे हैं कि प्रभु यीशु मसीह श्रीकृष्ण के पुत्र थे। इसके बारे में यदि आप देवी महात्मायम में पढ़ते हैं तोएक कहानी है, किस प्रकार यह आदि बालक एक अंडे का रूप लेता है और इसका आधा हिस्सा श्री गणेश के रूप में रहता है और आधा महाविष्णु बन जाता है। उत्क्रांति की प्रक्रिया में पुरावशेषों की इन सभी घटनाओं को दर्ज किया गया है लेकिन आज मैं इतनी प्रसन्न महसूस कर रही हूं कि मानव स्तर पर लोग समझ गए हैं कि ईसा भगवान गणेश के अवतार हैं। वह शाश्वत संतान है लेकिन जिस रूप में वह मसीह के रूप में आये, वह श्री कृष्ण के पुत्र के रूप में आये। लेकिन जब पार्वती ने श्री गणेश को बनाया, तब तो वे अकेली पार्वती के पुत्र थे। कोई पिता नहीं था। स्वयं पार्वती अपना ही एक पुत्र पैदा करना चाहती थीं। ऐसे देवदूत थे जो या तो विष्णु को या शिव को समर्पित थे, जैसे गण अकेले शिव को समर्पित थे।
इसलिए, वह चाहती थी कि उसका अपना पुत्र हो जो इस पृथ्वी पर उसकी शक्तियों को प्रसरित कर सके। तो सबसे पहले जब शक्ति ने इस ब्रह्मांड की रचना की और सदाशिव उनके रचना कर्म को देख रहे थे, तो उन्होंने इस धरती पर जो सबसे पहली चीज बनाई थी, वह थी अबोधिता और उस मासूमियत के अवतार श्री गणेश थे। सारा ब्रह्मांड अबोधिता से आच्छादित था, जिसे हम ओंकारा कहते हैं। इस अबोधिता ने दुनिया की सारी सृष्टि की रक्षा की और जो कुछ भी पदार्थ है उसमें प्रवेश किया। पदार्थ सदा निर्दोष है। यदि आप किसी वस्तु को चोत करते हैं, तो यह आपको वापस मार देगा क्योंकि उसे उसी तरह का बनाया गया है। यह आपको किसी भी तरह से नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता, सिवाय इसके कि अगर आप इसे मारने की कोशिश करते हैं, तो यह आपको अपने स्वभाव वश वापस हिट करता है। इसलिए इसे जड़ कहा गया, जो अंतर्निहित प्रकृति के अनुसार कार्य करता है। जानवरों में मासूमियत दूसरे तरह की होती है, जहां जानवरों को पता ही नहीं चलता कि वे अपराध कर रहे हैं। जैसे,पशु किसी जानवर को मारतेभी हैं, दूसरे जानवर को याआप्की संपत्ति का अतिक्रमण करते हैं, सब तरफ उपद्रव भी करते हैं वे नहीं जानते कि वे पाप कर रहे हैं या वे कुछ कानूनों की अवज्ञा कर रहे हैं।

वे उन नियमों के साथ जीते हैं जो उनके भीतर ही बने हैं, इसलिए उन्हें पशु कहा जाता है जिसका अर्थ है बंधन – पाश। पाश का अर्थ है बंधन। वे परमेश्वर के नियमों के बंधन में हैं। श्री शिव को पशुपति कहा जाता है। उस अवस्था तक मासूमियत बरकरार रहती है क्योंकि उनमें अहंकार का विकास नहीं होता। इसलिए वे निर्दोष हैं। बाघ गाय को खा सकता है, फिर भी वह निर्दोष है या हाथी मानव शरीर को रौंद सकता है, फिर भी वह निर्दोष है। लेकिन उच्च अवस्था में जाते समय, आदि माता, शक्ति माँ ने एक ऐसे व्यक्तित्व के निर्माण के बारे में सोचा जो मनुष्य की अबोधिता की रक्षा करेगा। पदार्थ से ऊपर, जानवरों से ऊपर, उन्होंने श्री गणेश की रचना की। और आप श्री गणेश की कहानी जानते हैं कि कैसे उन्हें एक हाथी का सिर मिला – यहा इस बात का प्रतीक है कि श्री गणेश, हालांकि वे एक इंसान हैं, वे एक जानवर की तरह हैं जहाँ तक उनके सिर का संबंध है, वह भी श्री गजानन का, इसअर्थ मे कि उसे एक हाथी का सिर मिला है जो जानवरों के साम्राज्य में सबसे बुद्धिमान जानवर है।
तो ऐसे सिर में, जो अबोध है, अहंकार विकसित नहीं हो सकता। कोई अहंकार नहीं है। यह अहंकार रहित अवस्था है। लेकिन इंसानों की एक अलग तरीके से रचना की गयी थी और जब कार्बन को अमीनो एसिड बनाने के लिए रखा गया था, तो इसने उन्हें गतिशील कर दिया, इंसानों में उत्क्रांति का एक नया प्रकार जिसमे विशुद्धि स्तर पर इंसानों ने अपना सिर इस तरह उठाया। जानवरों के सिर जमीन की तरफ होते हैं इसलिए ऊर्जा नीचे की ओर धरती माता में प्रवाहित होती है लेकिन जब मनुष्य ने गुरुत्वाकर्षण की ऊर्जा के खिलाफ अपना सिर ऊपर उठाया, तो ऊर्जा प्रवाह में एक नई जटिलता शुरू हुई और इस तरह विशुद्धि में, एक समस्या शुरू हुई जहां कुंडलिनी उस समस्याग्रस्त विशुद्धि का पोषण या देखभाल नहीं कर सकती थी। कारण यह है कि जब आप धरती माता से सिर उठाते हैं, तो आप स्वयं को धरती माता की प्राकृतिक शक्ति से दूर कर लेते हैं। जब आप अपनी विशुद्धि को इस तरह ऊपर की ओर ले जाते हैं, तो आप इस देश में (जो की विशुद्धि चक्र का देश है), उसका परिणाम देखते हैं, कि आप उन मशीनों कि तरफ जाने लगे जो प्रकृति के खिलाफ हैं, प्रकृति का शोशन कर रही हैं, परमाणु बम बनाकर प्रकृति को विचलित कर रही हैं, परमाणु को बदलना, उसे तोड़ना। इसका मतलब है कि आप अपना सिर उठाकर प्रकृति के खिलाफ ही गए। लेकिन अगर ऐसा परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण के साथ किया जाता, तो आपका सिर धरती माता की ओर होता, इससे आपको कोई नुकसान नहीं होता। लेकिन जब आप अपने आप को उस प्रकृति से पूरी तरह से विलग कर लेते हैं, जो इतनी उदार है, जो इतनी दयालु है।
कल आपने इस देश में चारों ओर फैली प्रकृति की खूबसूरत तस्वीरें देखीं। अमेरिका जैसे धनी देश ने, अपने रचयिता के प्रति कृतज्ञता के बिना, सिर ऊपर उठा लिया – इस तरह विशुद्धि की समस्या सामने आने लगी। जीवन के हर क्षेत्र में, प्रकृति के साथ चलने के लिए नहीं, प्रकृति से लड़ने के लिए पूरी सामाजिक संरचना का निर्माण किया गया था। तो पहला हमला मासूमियत पर ही हुआ- मूलाधार पर ही। इसलिए मूलाधार के प्राकृतिक तरीकों को छोड़ दिया गया। विवाह प्रणाली,-यहाँ ईसा-मसीह से बहुत पहले, अब्राहम से बहुत पहले, मूसा से बहुत पहले और एक पवित्र विवाह, जिसे समाज द्वारा आशीर्वाद दिया गया था, लंबे समय से स्वीकार्य था। लेकिन मनुष्य ने अपने अहंकार में विवाह के खिलाफ, स्वस्थ जीवन जीने के प्राकृतिक तरीके के खिलाफ आवाज उठाई। अगर लोगों का निजी जीवन जीने का तरीका स्वाभाविक होता, तो उन्हें हर तरह की बीमारियां क्यों होती हैं? यदि आप एक प्राकृतिक व्यक्ति हैं, तो आपको कोई रोग नहीं होता है। चुंकि आप प्रकृति-विरोधी हैं, इसलिए इस देश में अब ईर्ष्या के वशिभुत कई पुरुषों और महिलाओं की हत्या कर दी गई?

यदि दस पुरूषों और दस स्त्रियों मे परस्पर प्रेम सम्बंध होना स्वाभाविक होता तो फिर ईर्ष्या क्यों ? आपको खुश होना चाहिए था, यह बहुत स्वाभाविक है। चुंकि श्रीकृष्ण को समर्पण किए बिना विशुद्धि चक्र पर सिर उठाया गया था, जीवन-विरोधी, जैविक-विरोधी वातावरण बढ़ने लगा। और इस तरह का जीवन इस महान देश को अब पूर्ण विनाश के कगार पर ले गया है। मासूमियत पर हमला इस देश की सबसे बड़ी कमजोरी है। पवित्रता और पवित्र जीवन की शक्ति को महत्व न देना सबसे बड़ी गलती है जो सभी प्रकार की प्रवृत्तियों और सनक को शुरू करने वाले लोगों द्वारा बनाई गई थी। गणेश सृष्टि के मूल हैं। जब आप श्री गणेश के खिलाफ जाते हैं तो आप अपनी जड़ें खोने लगते हैं, आपकी कोई जड़ नहीं होती। तब तुम किसी भी बेवकूफी में बह जाते हो, कुछ भी नया जो सामने आता है। इतना अधिक कि फ्रायड जैसे व्यक्ति की पूजा की गई और वे मसीह को भूल गए, जिन्होंने कहा था कि, “तू व्यभिचारी आंखें न रखना।” गणेश उस स्तर तक, कि आंखों को भी निर्दोष होना हो। आँखों में वासना नहीं होनी चाहिए। लेकिन अहंकार ने उन्हें ऐसा महसूस कराया कि, “क्या गलत है? इसमें गलत क्या है? इसमें गलत क्या है?”
अभिमानी उद्यमों के कारण अब पूरा देश एक बड़े संकट का सामना कर रहा है। फिर भी वे सभी विनाशकारी चीज़ो को एक शहादत का रूप दे देते हैं। श्री गणेश की भूमि पर रहने वाले सहजयोगियों पर यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। लेकिन श्रीकृष्ण की भूमि में रहने वाले लोगों के लिए जिम्मेदारी बिल्कुल आपके गले में है और आप इससे मुक्त नहीं हो सकते। जब तक आप अपने जीवन में अबोधिता के महत्व को नहीं समझेंगे, तब तक आप इस देश को नहीं बचा सकते चाहे मैं इसके लिए कितनी भी कोशिश करू। यह तो केवल आप ही हैं जो इसे बचाने जा रहे हैं। यह केवल आप ही हैं जो इसे बनाने जा रहे हैं।

जब कुण्डलिनी उठती है तब श्रीगणेश आप में जाग्रत होते हैं, जिस गणेश का आपने कभी सम्मान नहीं किया, वे धीरे-धीरे उन पर लगी घाव और चोट से बाहर आ करअपनी निश्क्रियता से उठकर, फिर भी वह उठ खड होते है, लेकिन फिर भी कमजोर होते है। हम किस प्र्कार इसका पोषण करेंगे? हम इसके उत्थान की देखभाल कैसे करेंगे? अमेरिका के सहजयोगियों की जिम्मेदारी बहुत बड़ी है। वे अब खुद को धोखा नहीं दे सकते। वे अपने अहंकार से संतुष्ट नहीं हो सकते। गलतियाँ गंभीर रही हैं। तो आपको इसे उन गलतियों के खिलाफ सामना धर्मयुद्ध के रूप में करना होगा और अपने श्री गणेश को पूर्ण रूप में स्थापित करना होगा ताकि वे आपको आवश्यक संतुलन और खुद को पोषित करने के लिए जड़ें दें। पहले तो यह चौंकाने वाला है।
मेरा मतलब है कि, आप समझ नहीं सकते हैं; यह देखना असंभव है कि ऐसे बेतुके विचारों को कैसे आप स्वीकार कर सकते हैं; आप ऐसी अज़ीब चीज़ों को कैसे अपना सकते हैं, जो स्पष्ट रूप से भयानक हैं। क्या हम वेश्यावृत्ति जैसे कुछ शब्दों से अवगत नहीं हैं? और अन्य सभी गंदे शब्द जो वे उपयोग करते हैं, जो अभी मैं कहना नही चाहती, या वे अपने अर्थ खो चुके हैं? हम सभी इसके बारे में जानते थे, हम सभी इसके बारे में जानते थे। [ऐसा मत करो, स्थिर रहो, तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। जब मैं बोल रही हूँ तो चुप रहना चाहिए, ठीक है?] क्या हमने अपने दिमाग से सारा विवेक खो दिया है कि हम यह नहीं देख सकते कि हमने खुद के साथ क्या किया है? हमारा कोई स्वाभिमान नहीं है। उस सीमा तक अहंकार जाना बहुत खतरनाक है, बेहद अप्रत्याशित है। और भगवान जानता है कि ऐसी सभी हरकतो के क्या परिणाम हो सकते हैं।

मैं कहुंगी की, सहज योगियों के लिए, मैंने लोगों को कुछ निर्देश दिए हैं – किस प्र्कार उन्हे अपने जीवन की निजता का सम्मान करना चाहिए, खासकर अमेरिका की महिलाओं को। अगर उन्हें शक्ति बनना है, तो उन्हें अपनी शुद्धता का सम्मान करना होगा। लेकिन इतनी आश्चर्य की बात है कि जब हम बाहर इन सब चीजों को होते हुए देखते हैं, सहज योग में आने के बाद भी, हममें से कुछ लोग उन जैसा बनने की कोशिश करते हैं जो नरक में जा रहे हैं। यदि आपको उन्हें बचाना है, तो अपनी स्थिति को ठीक से सुधारने का प्रयास करें। श्री गणेश के चार हाथ हैं और जिस हाथ मे परशा जैसा विनाशकारी हथियार है, वह वह है जिससे आपको सावधान रहना होगा। यह उनका काम है और यदि आप उसकी उपेक्षा करते हैं, तो वह शक्ति कार्य करेगी और, इतनी प्रबलता से कार्य करेगी कि आपके आत्मसाकशात्कार के बावजूद आप खुद को बचाने में सक्षम न हों। अपने बोध प्राप्ति को हल्के में न लें। जब तक आपके गणेश जी की स्थापना नहीं हो जाती, तब तक आपकी बोध प्राप्ति का कोई अर्थ नहीं है। अपने आप को देखो, क्या तुम्हारे पास व्यभिचारी आंखें हैं? क्या आपके पास व्यभिचारी मन है?
सहज योग के बारे में आपकी क्या अपेक्षा है? बहुत से लोग सोचते हैं कि सहज योग में परमात्माआपको आशीर्वाद देते हैं, तो आपको अच्छी मात्रा में स्वास्थ्य, धन और पद, शक्ति प्राप्त करनी चाहिए। पहली चीज जो आपको मांगनी चाहिए वह है शुद्ध गणेश, निर्मल गणेश। कि,”ओह, माँ, कृपया हमें हमारे गणेश तत्व में पवित्रता की स्थापना का आशीर्वाद दें।” रिश्तों में, रवैये में, व्यवहार में, अपने आप को आंकने की कोशिश करो कि, क्या तुम अबोध हो? क्राइस्ट ने कहा है कि उनके खिलाफ कुछ भी बर्दाश्त किया जा सकता है लेकिन आदि शक्ति के खिलाफ कुछ भी नहीं। लेकिन मैं आपको आपकी माँ के रूप में बताना चाहती हूँ, यह सच नहीं है। हो सकता है कि मेरे खिलाफ कुछ बर्दाश्त किया जा सकता है लेकिन ईसा-मसीह के खिलाफ कुछ भी नहीं, भगवान, भगवान गणेश के खिलाफ कुछ भी नहीं। बोध के बाद उनके विरुद्ध जो कुछ भी किया जाता है, वह सब आपको जता देगा और आपको पूर्ण रूप से पतित लोगों के रूप में, परमेश्वर के राज्य से बाहर निकाल दिया जाएगा। यह एक ऐसी बात है जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, माफ नहीं किया जाएगा, कभी स्वीकार नहीं किया जाएगा। तुमने जो कुछ भी अतीत में किया है वह अब समाप्त हो गया है क्योंकि तुम एक नए पक्षी हो।

लेकिन यह बन जाने के बाद, अगर आप इन गलत विचारों को अपनाने या उनमें शामिल होने की कोशिश करते हैं, तो मैं आपकी बिल्कुल भी मदद नहीं कर सकती। आखिर श्री गणेश मेरे पुत्र हैं क्योंकि वे शुद्ध हैं। अब वह मेरा इकलौता बेटा नहीं है। मेरे इतने बेटे-बेटियाँ हैं और मैंने तुम्हें वैसे ही बनाया है जैसे मैंने श्री गणेश को बिना पिता के, अपने दम पर बनाया है। आपकी माँ को दिल की पवित्रता और आपके शरीर की पवित्रता के अलावा कुछ भी खुश करने वाला नहीं है। जो कुछ भी अशुद्ध है उसे फेंक देना है। मेरे नाम का अर्थ ही पवित्रता है। आप ऐसा कर सकते हैं। आप ऐसा कर पाने के लिए सशक्त हैं। ऐसा करने के लिए आपके पास कुंडलिनी है।

लेकिन सबसे पहले आपको इसे साफ करना है और बाकी आपको चिंता करने की ज़रूरत नहीं है, श्री गणेश इसकी देखभाल करेंगे। एक चक्र जिसे आप साफ रखते हैं, बाकी की देखभाल की जाती है। आपके सभी असाध्य रोग, सभी पेशीय समस्याओं जैसे मेलिटस और वह सब, कैंसर से लेकर आपके सभी असाध्य रोग, सिज़ोफ्रेनिया से लेकरआपकी सभी मनोदैहिक समस्याएं, सब कुछ मूलाधार में अशांति के कारण आता है। जब जड़ें ही ठीक नहीं हैं, तो आप पेड़ को कैसे ठीक कर सकते हैं? अगर जड़ें ठीक हों तो कोई भी दवा किसी भी केंद्र, किसी भी क्षेत्र, किसी भी स्थान, किसी भी फल तक पहुंच सकती है। लेकिन अगर जड़ें ठीक नहीं हैं, तो आप इसे कैसे ठीक कर सकते हैं? आज आपने मुझे यहां बुलाया है, मेरे भीतर श्री गणेश की पूजा करने के लिए। श्री गणेश मेरे भीतर एक शक्तिशाली शख्सियत हैं। उनकी पूजा करते समय आपको यह जानना होगा कि इतनी शक्तिशाली चीज आपको अपने भीतर स्थापित करनी है और उस स्थापना द्वारा आपको श्री गणेश की शक्तियों को अभिव्यक्त करना है और श्री गणेश की महानता की शक्ति शुभता है। हम वैज्ञानिक भाषा में कह सकते हैं कि, यह एक सह-दक्षता है; यह एक सूत्र है, जो शुभता का उत्सर्जन करता है।

धरती माता में यह एक चुंबक है। वही चुम्बक आपके भीतर है, जो श्री गणेश हैं। तुम मुझे अकेला छोड़ दो और मैं तुम्हें बता सकती हूं कि उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम कौन सा है। मेरी आँखें बंद करो, फिर भी मैं तुम्हें बता सकती हूँ। आप जानते हैं कि बहुत सारे पक्षी हैं जो पूरे रास्तेऑस्ट्रेलिया, साइबेरिया तक उड़ते हैं क्योंकि उनके पास वह चुंबक है, उनके पास वह मासूमियत है। ऐसी बहुत सी मछलियाँ हैं, जिनमें वास्तविक चुम्बक लगा हुआ है। वैज्ञानिकों को पता लगाना चाहिए। उसी तरह हमारे भीतर स्थित श्री गणेश चुंबकीय हैं। तो जो व्यक्ति श्री गणेश को अपने भीतर जगा लेता है, वह चुंबकीय हो जाता है और चुंबक लोहे को आकर्षित करता है – सूखे पत्तों को नहीं, नही करता, लोहे को। और लोहा गुरु तत्व के समान है।

लोहे वाला आदमी है, कहते हैं। “लोह-पुरुष” – एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास चरित्र, दृढ़ विश्वास है और जिस पर प्रलोभनों हावी नहीं हो सकता, वह स्टील का आदमी है। तो यह चुम्बक लोहे को अपनी ओर आकर्षित करता है। लोहे में केवल एक ही खराबी है, इसकी बुरी बात यह है कि यह लचीला नहीं है, बल्कि शुषक है लेकिन चुंबक आकर्षित करता है, इसका मतलब है कि यह लोहे में उस विशेष गुण को विकसित करता है ताकि वह चुंबक की ओर खिंचे। उसी तरह जब आपके भीतर यह चुम्बकत्व जाग्रत होगा, तो आप चकित रह जायेंगे। लोग तुम्हारे आश्रमों से भागने के बजाय तुम्हारी ओर दौड़ेंगे। मुझे यह असंभव लगता है। मैं किसी भी घर में जाती हूं, अगर उन्हें पता चल जाता है कि मैं वहां हूं, भगवान मुझे बचाएं – कहीं भी, कहीं भी। तो यह चुंबक क्या है? यह शुद्ध प्रेम है।
यह शुद्ध प्रेम है और शुद्ध प्रेम की अवधारणा यह है कि यह किसी भी चीज़ पर नहीं बल्कि स्वयं पर निर्भर करता है। इसका आधार यह खुद ही है। यह प्रकाश की तरह है जो अपने स्वभाव से ही फैलता है, कुछ नहीं चाहता, कुछ भी अपेक्शा नहीं करता। बस हर जगह फैलता है और दूसरे लोगों के दिलों को प्रकाशित करता है। इसलिए वे आकर्षित हो जाते हैं। जिन लोगों ने मुझे देखा तक नहीं, जिन्होंने मुझे जाना भी नहीं, बस मेरे नाम से, मैंने देखा है, कलकत्ता जैसी जगहें, हमें ऐसी समस्या हुई थी, इतनी भीड़ कि उन्होंने कहा, “हमें पुलिस बुलानी पडेगी” . मैंने कहा, “पुलिस को बुलाने की कोई जरूरत नहीं है लेकिन हम किसी तरह संभाल लेंगे।” पूना में हमारी इतनी भीड़ थी कि जिसने हमें हॉल दिया वह डर गया। उसने कहा, “माँ, मैं आपको बहुत बड़ा क्षेत्र दूंगा जहाँ आप एक बड़ी खुली जगह पर बैठ सकते हैं लेकिन मुझे खेद है, मेरा हॉल सब खत्म हो जाएगा।” मैंने कहा, “आप चिंता न करें, सब कुछ सही तरह से होगा।” हम लोगों की इतनी भीड़ थी कि लोग जमीन पर, सीढ़ियों पर, हर जगह बैठे थे और जब तक मैं बोलती रही कोई एक इंच भी नहीं हिला, आप देखिये, तस्वीर की तरह। और मैंने डेढ़ घंटे तक बात की। बिल्कुल एक तस्वीर की तरह।

हाथ, पैर, आंखों की कोई हलचल नहीं – कुछ भी नहीं। बस एक तस्वीर की तरह बैठा है। और उस हॉल के मालिक ने ऐसा पहले कभी नहीं देखा था। पूरे डेढ़ घंटे तक किसी प्रकार की कोई हलचल नहीं हुई। वह क्या चीज़ है, जो काम कर रही है, वह चुंबक है। आप लोहा हैं तो भी आकर्षित करेंगे लेकिन अगर आप चुंबक हैं तो यह इस तरह आकर्षित करेगा कि यह इस चुंबक को कभी नहीं छोड़ेगा। तो, योग के लिए यह महत्वपूर्ण है कि आप श्री गणेश रुपी अपने चुम्बक को ठीक करें जो कि बाल-समान व्यक्तित्व हैं। एक बच्चा, एक बालक है, हर कोई बच्चे की ओर आकर्षित होता है। कही भी यदी कोई एक बच्चा हवा में फँस जाता है, चाहे आप रूसी हों, अमेरिकी हों या अरब, बच्चे को लेकर हर कोई चिंतित होगा। बच्चे को क्या हो रहा है?

वे नहीं सोचेंगे: यह एक अरब बच्चा है या एक अमेरिकी बच्चा है, नहीं। जहाँ तक और जब तक यह एक शैतान न हो। बच्चों के प्रती यह आकर्षण क्यों? क्योंकि उनके चुंबक बरकरार हैं। उनका अहंकार अभी विकसित नहीं हुआ है। हमारा अहंकार विकसित हुआ, विकसित होना पड़ा क्योंकि हमें अपनी स्वतंत्रता में तय करना था कि क्या सही है और क्या गलत। तो विकसित अहंकार ठीक था। एक हद तक हमें अपना अहंकार विकसित कर लेना चाहिए था। लेकिन हमने इसे अति-विकसित कर दिया और इसे अति-विकसित कर दिया, प्रति-अहंकार को भी अति-आरोपित कर दिया। कोई कंडीशनिंग नहीं, कुछ भी नहीं।

हमें जो अच्छा लगेगा हम करेंगे। आज हम हाफ-पैंट पहने हुए हैं, कल हम एक लंबी पैंट पहनेंगे, ठीक है। फिर हम अपने बाल काटेंगे या हम यह करेंगे, हम वह करेंगे। किसी प्रकार की कोई संस्कार-बद्ध्ता नहीं। सारा अहंकार भी ढका हुआ था-अहंकार। यह अहंकार भी ठीक रहता यदि आप अपना गणेश तत्त्व बनाये रखते। और वह क्या है गणेश की विवेक शक्ति। गणेश की दूसरी शक्ति यह है कि वे आपको विवेक देते हैं। अगर आप किसी किसान और बड़े प्रोफेसर या बहुत पढ़े-लिखे आदमी को देखें और उन दोनों से बात करें। आप पाएंगे कि किसान के पास इस एमएडी- पीएचडीसे कहीं अधिक ज्ञान है।
क्यों? क्योंकि वह हर रोज धरती माता के साथ व्यवहार करता है। वह जीवन की प्रक्रिया जानता है। वह धरती माता की मासूमियत के बारे में जानता है। तो एक अबोध व्यक्ति सबसे विवेकवान है … एक बच्चा जो अबोध है वह दस अहंकारी लोगों की तुलना में अधिक विवेक वान है। तो श्री गणेश की दूसरी क्षमता है कि आप एक विवेकशील व्यक्ति बनें। जब आप बोलते हैं तो लोग आपको देखने लगते हैं। आप कबीर की तरह बोलते हैं, आप नानक की तरह बोलते हैं। आप कुछ ऐसा बोलते हैं जिससे लोगों को उनकी आत्मा का अहसास हो। इन्हे मैं सहजयोगी कहती हूं।

एक सहज योगी जिसके पास विवेक नहीं है, वह किसी काम के लियेअच्छा नही है। वह सहज योग में आता है और वह चीनी बर्तन की दुकान में एक बैल की तरह है, वह मारता चला जाता है, इस व्यक्ति को ,उस व्यक्ति को मारता है और उस व्यक्ति को मारता है। और जब आप इन तीन घायल व्यक्तियों से पूछते हैं, तो वे कहते हैं, “वह बैल, वही बैल”। हर कोई एक ही बैल के बारे में रिपोर्ट करता है। “ओह, वही तो ठीक है।” तो यह आपको विवेक प्रदान करता है। जब आपके पास श्री गणेश की शक्ति होती है, तो आपकी आंखों की रोशनी तेज हो जाती है। आपकी आंख में एक चमक, आपकी आंखों में एक रोशनी, जब वह आपको प्रबुद्ध कर रहा होता है; तब तुम किसी को काम लोभ से नहीं देख सकते। लेकिन यह दृष्टि इतनी शक्तिशाली है कि हजारों लोगों को शुद्ध करने के लिए एक नज़र भी काफी है। बस आंखें खोलना जरूरी है और आप पाते हैं कि पूरी चीज एक पूरी अंधेरी रात से एक खूबसूरत सुबह में बदल जाती है। दृष्टि कुंडलिनी को जगा सकती है।
जब तक श्री गणेश अनुमति नहीं देते, तब तक मां कुंडलिनी हिल नहीं सकती। वे सभी चक्रों पर बैठे कुलपति के समान हैं। उसे प्रमाणित करना होगा, “ठीक है। आप उत्तीर्ण हो। जाओ, ”हर चक्र पर। और जब कुंडलिनी उठती है, तो श्री गणेश जागते हैं, अन्यथा कुंडलिनी नहीं उठ सकती। लेकिन फिर जब वे सो जाते हैं, तो कुंडलिनी लौट आती है, उनके द्वारा चूसा जाता है। अब हमें लगता है कि हमने अपनी मासूमियत खो दी है। इसका खो जाना आसान नहीं है। यह अविनाशी है।

केवल एक चीज जो आपने की है उसे किसी ऐसी चीज से ढक दिया है कि, श्री गणेश के सिद्धांत को हम में प्रकट नहीं होने दे सक रही है। आपने इसे नीचे धकेल दिया है। आपने उस पर दबाव बनाया है। आप उस पर बहुत सारी बकवास और ढेर सारी बकवास लाए हैं। बस इतना ही, लेकिन यह कभी नहीं मरती। यह पूरे ब्रह्मांड का एक शाश्वत सिद्धांत है। श्री गणेश की शक्तियों से संपन्न व्यक्ति का एक अन्य गुण यह है कि वह सभी बाधाओं को दूर करता है। यदि इस प्रकृति का कोई एक व्यक्ति किसी स्थान पर है यदि कोई दुर्घटना होती है या कोई समस्या आती है, जो विनाशकारी है, तो सभी अन्य व्यक्ति जो आस-पास हैं, बच जाएंगे। आप ऐसा होते हुए पाएंगे। गणपति होने के कारण अब वे सभी गणों के स्वामी हैं।

वह आपका मार्गदर्शन करते है। श्री गणेश के बिना सहज योग नहीं चल सकता। वह वही है जो सहज है। वह वह है जो दुनिया की सारी सहजता पैदा करते है। वह वही है जो आपको सही रास्ते पर ले जाते है। वह वह है जो आपको आसानी से सब कुछ देते है। वही है जो दुनिया के सारे चमत्कार, सारे जादू, सारे चमत्कार पैदा करते है। वह गणपति हैं। वह गणों से उपर विराजमान है, इस अर्थ में कि वह सभी गणों के राजा के समान है। जिसने श्री गणेश को प्रसन्न किया है, उसने सभी देवी-देवताओं को प्रसन्न कर लिया है क्योंकि सभी देवी-देवता श्री गणेश को प्रसन्न कर रहे हैं, तो इसकी क्या आवश्यकता है?

और श्री गणेश बड़े चतुर हैं। वह जानते है कि, अपनी माँ को प्रसन्न करना ही केवल एक सरल काम है जो उन्हे करना है। संसार की समस्त शक्तियों को प्राप्त करने के लिए बस माताजी को प्रसन्न रखना। श्री गणेश के अनेक गुण हैं, जिनका वर्णन किया जा सकता है। वह वह है जो हमें खाने का आनंद देते है। यदि आप कुछ खाना खाते हैं, तो आप इसे पसंद कर सकते हैं अथवा, आपको यह पसंद नहीं भी हो सकता है, लेकिन यह वही है जो आपको बताएगे कि यह सहज योगियों द्वारा बनाया गया है, जिन्हे आपकी माँ ने बनाया है। इसका मतलब है कि वह आपके लिए पकाए गए भोजन में आपको प्यार का स्वाद देते है। चुंकि वह प्रेम है। वह आपको ऐसे विचारआ देते है कि आप अपने प्यार का इजहार कैसे करें। एक बार उन्होंने मुझसे एक गाना गाने के लिए कहा।

कभी मैं बहुत अच्छा गाती थी लेकिन फिर, कई बार व्याख्यान देने के बाद, आप देखिये कि, मुझे लगता है कि मैंने अपनी आवाज खो दी है। मैं अच्छा नहीं गा सकती थी, मुझे ऐसा लगा। एक दिन उन्होंने मुझसे एक गाना गाने के लिए कहा और मैंने कोई गाना सोचा और उनके लिए गाया। और एक-आध साल बाद एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा, “माँ हम आप के लिये एक गाना गाना चाहते हैं।” यह गीत हर किसी के लिए अनजान था, मुझे नहीं पता कि उन्हें यह कहां से मिला, कहां से उन्होंने धुन बनाई। वे वही गीत गाने लगे। और ऐसा आनंद, मेरा मतलब है, यह सब मेरी आंखों में आंसुओं की लहर बन गया। मैं अपने आनंद को नियंत्रित नहीं कर सकी। अब यह सब आनंद की अनुभूति श्री गणेश द्वारा निर्मित यंत्रों से होती है। वह सुंदर सबंध बनाने में व्यस्त है।

कैसे एक जन्मदिन पर, एक बच्चे के जन्मदिन पर, हम क्या कहते हैं? “ठीक है, तो कल सुबह एक चिड़िया आपके लिए उपहार देने जा रही है।” और फिर बच्चा उठता है और देखता है कि कोई पक्षी नहीं है। यह केवल गणेश हैं जिन्होंने ऐसा विचार दिया है। हम कह सकते हैं कि वह एक सांता क्लॉस है। वह आपको ऐसे तौर-तरीके देते है और वह आपको बताते है कि कैसे रिश्तों को, शुद्ध संबंधों को नज़ाकात तरीके से बनाया जाए। आप कैसे छिपते हैं, कैसे आप एक छोटे से उपहार को लपेटते हैं, बस इसे वहीं रख देते हैं और एक व्यक्ति जिसे इसे लेना होता है, वह देखता है, “हे भगवान।” और फिर आप देखते हैं कि जो फूल आप अचानक बाहर लाते हैं, आप उन्हें लगाते हैं, वे सभी श्री गणेश के प्रयास, उनके तरीके, उनके सुझाव हैं। सृष्टि के बीच फूल, श्री गणेश के सार को ही व्यक्त कर रहे हैं। और श्री गणेश का सार धरती माता के सार से आता है, जो कि सुगंध है। तो श्री गणेश की कृपा से संपन्न व्यक्ति सुगंधित होता है, कभी चंदन, कभी गुलाब, कभी यह गार्डेनिया होता है। तुम नहीं जान पाते कि सुगंध कहाँ से आ रही है।

सुगंध श्री गणेश से आ रही है और वही आपके भीतर स्थित चुम्बक है। ऐसा व्यक्ति हर समय सुगंधित, बिल्कुल सुगंधित होता है। ऐसे व्यक्ति से श्री गणेश हर प्रकार की सुगंध छोड़ते हैं। और यह आप तभी महसूस कर सकते हैं जब आपके श्री गणेश ठीक हों। आपके भीतर स्थित इस महान देवता के वर्णन का कोई अंत नहीं है। वह बस वहीं बस गये है, वह हर समय वहां है, शुद्ध होने की प्रतीक्षा कर रहे है, ताकि वह अपना सिर इस तरह उठाए, जैसे कीचड़ में कमल। आप बस उनका सम्मान करके उनकी मदद करें और वह आपके भीतर सुगन्धित रहेगे। इतना महत्वपूर्ण, इस देश के लिए जहां, हमने अपने सिर को बिना विराट, बिना सामूहिकता, बिना श्री कृष्ण को समर्पित किए उठा लिया है। हमने अपना सिर उठाया है, श्री गणेश के साथ हम अपना सिर झुकाते हैं, ईश्वर ने हमें जो भी वरदान दिये है, उसके लिए हम अपना सिर झुकाते हैं। श्रीगणेश के चरण कमलों पर सारा अहंकार मिट जाएगा।

वह हमें विवेक देगे। वह हमें समझने की समझ देगे। वह हमें हमारे भीतर के अहंकार को दूर करने की शक्ति देगे। वही ज्ञान दाता है। वही हमें प्रकाश देते है। भारत में बहुत से लोग श्री गणेश की पूजा भी करते हैं, और “श्री गणेश, श्री गणेश, श्री गणेश” जपते जाते हैं, और हर तरह की अज़ीब बातें करते हैं। यह बेवजह खुद को धोखा देने जैसा है। श्री गणेश को अपने भीतर स्थापित करना कितना आसान है। लेकिन आप जो सहज योगी हैं, यह समझें कि यह महत्वपूर्ण है कि श्री गणेश की स्थापना करें, जो आपके भीतर एक मूक शक्ति है, बात नहीं करते। यह एक मूक शक्ति है, जो कार्य करती है।
बस एक शक्ति जो बिना किसी शोर के, बिना किसी दिखावे के गतिशील है। और यही मैं कहूंगी कि आज जब मैंने अपने दिल से ये सब बातें कही हैं, तो आप सहजयोगी अपने भीतर श्री गणेश की स्थापना करेंगे। और आप स्वयम ऐसी शक्तियों का उत्सर्जन करेंगे कि अन्य लोग इस देश में अपने श्री गणेश की स्थापना कर सकेंगे।

परमात्मा आप को आशिर्वादित करे!

श्री माताजी ने बच्चों के नाम हिंदी में रखने का आह्वान किया:

सहज योगी ने बच्चों वाले माता-पिता को नाम रखने के लिये बुलाया।

तो हम उसे गौरी कहेंगे। आज गणेश का दिन है, गौरी का दिन है।

नमस्ते…

जो अब दीपावली के दिन श्री गणेश और श्री लक्ष्मी की भी पूजा करने के लिए है, इसलिए आज जैसे आप श्री गणेश की भी पूजा कर रहे हैं, हमें श्री लक्ष्मी की पूजा करनी है, इसलिए मैं उन्हें आज लक्ष्मी कहूँगी। ठीक है…

इस छोटे से बच्चे को देखो, रोओ मत। तुम इतनी बड़ी लड़की हो। लेकिन देखिए छोटे बच्चे रोते नहीं हैं। तुम बड़ी लड़की हो… रो क्यों रही हो? और आपने अपने पैरों पर क्या पहना है? मुझे देखने दो। क्या वे शोर करते हैं? नहीं? तो हम आपको बेहतर दे सकते हैं। मुझे देखने दो कि तुम्हारे पैर कितने बड़े हैं। मुझे देखने दो। वे बहुत छोटे हैं, है ना। आप बड़ी लड़की हैं या छोटी लड़की? छोटा? नहीं, नहीं, वह बड़ी है, वह खड़ी हो सकती है, देखते हैं? आइए देखते हैं। नमस्ते। साथ आओ, इधर आओ। उसके साथ क्या मामला है? वह हमेशा इसे पसंद करती है? हम उसे सिद्धि कहेंगे। यही शक्ति है। सिद्धि एक अच्छा नाम है। बस एक मिनट, बस एक मिनट… ईश्वर आपका भला करे। वह ठीक हो जाएगी।

सहज योगी: वो देखो। एक तस्वीर ले लो। एक तस्वीर ले लो।

श्री माताजी:

परमात्मा आप को आशिर्वादित करे!। परमात्मा आप को आशिर्वादित करे!।

अब उठ जाओ। ठीक है। आपको उठना होगा। यहाँ आओ। यहाँ आओ। आह। तो अब हम उसे विनायक कहेंगे। वह श्री गणेश, विनायक का नाम है। अच्छा। ओर कौन है वहाँ?

साथ चलो।

नमस्ते। हम उन्हें गणपति कहेंगे। परमात्मा आप को आशिर्वादित करे!।

यहाँ आओ। हम उन्हें गौरी और गणेश कहेंगे। गौरी और गणेश।

क्या वह आ सकता है? गणेश का दूसरा नाम ओंकारा है। हम उसे ओमकारा कहेंगे।

परमात्मा आप को आशिर्वादित करे!। यहाँ आओ। अच्छा। अब तुम ओंकार हो। ठीक है? अच्छा नाम, ओमकारा। सहस्रार गर्म है।

तो अब… रमा, रमा देवी का नाम, पार्वती का नाम। गणेश जी की माता का नाम रमा है। रमा वही है जो दिल में खेलती है।

जानकी, जानकी।

शर्मिला, शर्मादायिनी, शर्मिला, शर्मादयानी शर्मादयानी आनंद दाता हैं। आनंद दाता। आनंद दाता। देवी का नाम शर्मिला है। वह आनंद की दाता है, शर्मादयानी, आनंद की दाता है। परमात्मा आप को आशिर्वादित करे!।

आप यहां सिर्फ पूजा में मदद के लिए आ सकते हैं।

और बच्चों को भेजो….

अब आओ, मेरे पांव धो लो। साथ आओ, तुम दोनों, साथ आओ। अब सबसे पहले अपनी स्लीव्स को ऊपर करें, अपनी स्लीव्स को ठीक से ऊपर रखें। अच्छा। दोनों हाथ…

सहज योगियों द्वारा श्री गणेश के नामों का पाठ

सहज योगी 1: अतीत के रूप में अवतार लेने वाले को नमस्कार।

सहज योगी 2: भूत भव।

श्री माताजी: सम्पुर्ण बाईं बाजु। वह बाईं ओर के आधार पर है, इसलिए आप समझेंगे कि वह क्या कह रहा है। वह बाईं ओर है, अतीत है।

सहज योगी 2: भूत भव।

सामूहिक: Om त्वमेव साक्षात, श्री भूत भव नमो नमः

श्री माताजी: “भूत” अर्थात”अतीत” है।

सहज योगी 1 : जो अभी तक निर्मित का जो भाव है, उसे प्रणाम।

सहज योगी 2: भुवहः

सामूहिक: Om त्वमेव साक्षात, श्री भुवहः नमो नमः

सहज योगी 1: उसे नमस्कार जो अब तक सभी विद्याओं में निपुण है।

सहज योगी 2: भूत करण

सामूहिक: Om त्वमेव साक्षात, श्री भूत करण नमो नमः

श्री माताजी : नहीं, मीका, पहले तुम अर्थ बताओ। तब वह कहेगा, तो वे समझेंगे; यह दिमाग में चला जाता है, ठीक है? पहले तुम अर्थ कहो। अब, अगला आप इसे कहे।

सहज योगी 1: उसे नमस्कार है जो सभी का कारण है।

श्री माताजी: अब भूत करण

सहज योगी 1: उसे नमस्कार है जो सभी के भीतर है।

सहज योगी 2: भूत साक्षी

सामूहिक: Om त्वमेव साक्षात, श्री भुत सक्षिना नमो नमः।

सहज योगी 1: उसे नमस्कार जो सृजित सभी चीजों को प्रबुद्ध करता है।

सहज योगी 2: प्रभुत:

सामूहिक: Om त्वमेव साक्षात, श्री प्रभुत नमो नमः।

सहज योगी 1: जो सृष्टी है उसके साथ निवास करने वाले को नमस्कार।

सहज योगी 2: भूत संघ विदेह मनः

श्री माताजी: “भूत संघ विदेह मनः”

“भूत संघ” का अर्थ है जो कुछ भी बनाया गया है उसका संग्रह। “भूत संघन विदेह मनः”: “विदेह” का अर्थ है “शरीर में”, “मनः” का अर्थ है “उस के ह्रदय में, सटीक रुप से, में, ह्रदय के रूप में”

सहज योगी 1: जो सृष्टी है उसके साथ निवास करने वाले को नमस्कार।

सहज योगी 2: भूत संघ विदेह मनः
श्री माताजी:भूत संघ विदेह मनः ,भूत संघ,अर्थात अभी तक सृजित सारी सृश्टी
भूत संघ विदेह मनः; विदेहअर्थात शरीर मे स्थित, मनः अर्थात “उसके ह्रदय मे स्थित
सामूहिक: ओम त्वमेव साक्षात, श्री भूत संघ विदेहे मनः नमो नमः।

सहज योगी 1 : उसे प्रणाम , जिसमें सृजित सभी की आत्मा वास करती है ।

सहज योगी 2: भूत मनः

श्री माताजी: भूत मनः। स्पिरीट ही आत्मा है। “भूत” का अर्थ है “सृजित”, जो कुछ भी बनाया गया है, वह उन्हें आत्मा के रूप में निवास करता है।

सामूहिकः Om त्वमेव साक्षात, श्री भुत मनः नमो नमः।

सहज योगी 1: सत्य को नमस्कार।

सहज योगी 2: सत्य नमो नमः

सामूहिक: ओम त्वमेव साक्षत, श्री सत्य नमो नमः
श्री माताजी: अब यहाँ मैं कहना चाहूंगी कि श्री गणेश ही ओंकार हैं, जो चैतन्य हैं। तो वह सत्य है। वे जो कहते हैं वह सत्य है, इसलिए स्पंदन जो कहते हैं वह सत्य है। वह सत्य है। तो ओमकारा ही चैतन्य है, वह श्री गणेश है।

श्री माताजी ने विवाहित महिलाओं को बुलाया…

सहज योगी 1 : जो सर्वोच्च धाम है उसे नमस्कार ।

सहज योगी 2: परायादमे…

श्री माताजी: “परमधाम”।

सामूहिक: Om त्वमेव साक्षात, श्री परमधाम नमो नमः।

श्री माताजी : हिंदी में कहते हैं महा गणेश मंत्र को चार बार बोलना।

सामूहिक: ओम त्वमेव साक्षत,

                 श्री महा गणेश साक्षात

                 श्री आदि शक्ति साक्षात

                 श्री निर्मला देवी नमो नमः x 4

पूजा के बाद:

श्री माताजी : नहीं नहीं, मैं कह रही हूं कि,सामने से एक बड़ा फोटो खींचो। आपके पास एक लेंस है ना।

एक साथ लेना बेहतर है….

अब, आपको इसे बांधना होगा ….

देखिये,बस उन्हें मेरे पैरों की तस्वीर लेने दो । भारत मेइसकी ज्यादा चाहत होगी।

अब, बस रुकिए… सावधान रहें। अब, क्या आप बाँध सकते हैं?

क्या आपने फोटो में इन चीजों से परहेज किया? क्या आपने परहेज किया?

योगिनी : किसी में दिखा रहे थे, दिखा रहे थे।

श्री माताजी : नहीं, नहीं, निकालो, निकालो। एक अच्छी फोटो खींचो, ठीक है? ताकि यह एक दुर्जेय तस्वीर हो, श्री गणेश का सिर मिला।

परमात्मा आप सबको आशीर्वादित करे।

उपहारों का खोला जाना:

सहज योगी : श्री माताजी,इसे दुनिया में एक ही कंपनी बनाती है।

श्री माताजी:

हे भगवान…वाह! यह चीजों की अति-सीमा है। इटली से, इटली के लोगों से। यह अति-सीमा है। यह मेरे लिए बहुत ज्यादा है। आपका बहुत बहुत धन्यवाद। धन्यवाद।

वो क्या है? (एक क्रिस्टल ह्रदय) दिल, यह बहुत सुंदर है! शुक्रिया!

और वह क्या है?

कुर्सी…

वाह, सुंदर, कहाँ से पाए? ओह, अच्छा बहुत अच्छा है। यह कहीं भी बैठने के लिए बहुत सुंदर है। यह क्या है?

वह पूरे रास्ते ऑस्ट्रिया से आई है? … ऑस्ट्रिया से! आपका बहुत बहुत धन्यवाद …। आपका बहुत बहुत धन्यवाद। कितनी ख़ूबसूरत है, बहुत ख़ूबसूरत।

आपका बहुत बहुत धन्यवाद।