Navaratri, Shri Gauri Puja

पुणे (भारत)

1986-10-05 2nd Day of Navaratri, Shri Gauri Puja, 55' Add subtitles:
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Shri Gauri Puja 5th October 1986 Date : Place Pune Type Puja Speech Language Hindi & Marathi

पूना शहर का नाम वेदों में, पूराणों में सब जगह मशहूर है । इस को पुण्यपट्टणम कहते है। पुण्यपट्टणम और इस जगह जो नदी बहती है उसका नाम है मूल नदी | जो यहाँ से मूल बहता है, ऐसी ये नदी | यहाँ पर हजारों वर्षों से बह रही है और इस भूमी को पूरण्यवान बना रही है। हम लोगों को पुण्य के बारे में पूरी तरह से मालूमात नहीं है । बहुत से लोग सोचते है अगर हम गरीबों को कुछ दान दे दें या कोई चीज़ किसी को बाँट दें या कभी हम सच बोले या थोडी बहुत कुछ अच्छाई कर लें तो हमारे अन्दर पुण्य समा जाता है। इस तरह का पुण्य संचय होता तो होगा लेकिन वो एक बुँद, बुँद, बुँद बनकर के न जाने कब सरोवर हो सकता है। पुण्य का जो अर्थ है, उसको जैसा जाना गया है कि ऐसे कार्य करना कि जिसे परमात्मा संतोषित हो, जिसे परमात्मा खुष हो ऐसे कार्य हमें करने चाहिए । और जो आदमी ऐसे कार्य करता है वही पुण्यवान आत्मा होता है क्योंकि जब वो परमात्मा को खुष कर देता है, उस पर जो आशीर्वाद परमात्मा के आते है वो उसको पुण्यवान बना देते है। परमात्मा की शक्तियाँ उसके अन्दर आ जाती है वो उसके अन्दर एक नयीं चेतना कहिए या नया व्यक्तित्व कहिए, एक नयी हैसियत कहिए प्रगट करती है। उस हैसियत में मनुष्य ऐसा हो जाता है कि जो वो कहीं भी जायें, किसी भी घर में जाए, किसी भी दालान में जाए, किसी आँगन में जाए, किसी देश में जाए, विदेश में जाए जहाँ भी जाएँ वहाँ परमात्मा का आशीर्वाद झरने लग जाता है। जैसे की एक छत्रछाया सी उसकी बन जाती है। ऐसे पुण्यवान पुरुष कहीं भी रहते है उस जगह किसी भी तरह का प्रकोप होना हो तो वो टल जाता है। ऐसे लोग जब कभी शहर में, जंगलों में कहीं भी घूमते रहें तो वहाँ जितनी भी दूर्घटनायें होने वाली होती है वो सब खत्म हो जाती है इस पुण्यनगरी में इन्होंने जन्म लिया है वो विशेष पुण्य लोग है। पुण्यवान लोग है। और इस पुण्याई में उन्होंने जो यहाँ कुछ पाया है उसे उन्हे अब आगे पाने का है । लेकिन जब पुण्यवान मनुष्य पुण्यनगरी में पैदा होता है तो अपने को वो दूसरों के साथ तौलने लग जाता है । वो ये सोचता है कि ‘देखो, हमने तो इतना पुण्य किया इसलिए हम यहाँ पैदा हुए ।’ लेकिन यहाँ के लोगों के पास जो पैसा है, जिनके पास धन – दौलत है वो तो दूसरे ही लोग है। वो तो परमात्मा को भी नहीं जानते, भगवान को भी नहीं मानते और पूजा- अर्चा भी नहीं करते। पर इनके पास तो इतना पैसा है, इतने धनवान लोग है । ये तो इतने सुखी लोग है। तो हम क्युँ इतने दुःखी? अगर हम पुण्यवान है तो हम दुःखी क्यों है? ऐसा उसके दिमाग में विचार आता है। जब ये विचार उसके अन्दर आ जाता है तो फिर या तो वो सोचता है कि हमारे समझ में आयी नहीं बात कोई हर्ज नहीं ऐसा सोचकर के अपने धर्म में जुटा रहता है। और या तो वो बदल जाता है। और वो सोचता है कि नहीं किसी तरह से भी पैसा जोड़ना या दुनिया की चीज़े दौड़ना, | दुनिया की इज्जत जोड़ना यही सब से बड़ी बात है। और उसी एक नये दौर में वो दौड़ने लग जाता है। तब उसका | पुण्य क्षय हो जाता है। उसका सारा पुण्य नष्ट हो जाता है। लेकिन पुण्यवान पुरुष को पैसे की इच्छा होना बड़े ন

आश्चर्य की बात है। कलयुग में सबकुछ हो सकता है। मुझे ये देखकर आश्चर्य होता है कि कलयुग में अगर कोई रियलाइज्ड सोल पैदा हो वो भी शराब पी सकता है, ड्रग्ज ले सकता है, मारामारी कर सकता है, दुनियाभर के काम एक रियलाइज्ड सोल, जिसे हम पुण्यवान मनुष्य समझते है वो ये सब कर सकता है, ये कलयुग का खिंचाव है। उसका एक तरह का असर है, उसका वातावरण इतना जबरदस्त है कि पुण्यवान मनुष्य भी जब संसार में आता है और इस चीज़ की तरफ उसकी नज़र जाती है तो वो उधर खिंच जाता है। और उसके अन्दर ये कमजोरियाँ धीरे- धीरे आने लग जाती है। ये कलयुग की एक बड़ी भारी हमारे उपर में दहशत है। लेकिन इसका एक दूसरा इलाज है, ये जो दहशत हमारे उपर है, और जो हमारे उपर कलयुग छाया हुआ है ये अगर सोच विचार करें तो क्यूँ आया? कलयुग आने की जरुरत क्या थी? अगर कलयुग आया है तो उसका भी तो कोई कारण होना चाहिए। उसके बारे में एक दमयंती आख्यान में लिखा हुआ है कि एक बार दमयंती के पती नल को ‘कली’ मिल गया। उसने उसे पकड़ लिया। उसने कहा कि “देखो, तुमने हमारे पत्नी से बिछो कराया था और इतना हमें दुःख-दर्द दिया, अब मैं तुम्हे मार डालँगा।” तो कली ने कहाँ, “हाँ भाई, ये तो बात सही है । तुम चाहो तो मुझे मार डालो। लेकिन मेरा भी एक महात्म्य है।” उसने कहा, “तुम्हारा क्या महात्म्य हो सकता है? तुम तो | सब दुनिया में भ्रम ड्रालते हो। उनको विभ्रम में फँसा देते हो और गलत रास्ते पर लोग चले जाते है।” तो उन्होंने कहा कि, “महात्म्य बहुत बड़ा है कि जब ऐसा होता है और ऐसी हालात में ही मनुष्य की अग्नीपरिक्षा होती है, उस वक्त वो जाना जाता है कि आदमी कितना सच्चा है, कितना झूठा है। इसी तरह से पहचाना जा सकता है कि आदमी में कितना पुण्य है, कितना अपुण्य है। अगर उसके आगे कोई अग्नीपरिक्षा न हो तो वो जाना नहीं जा सकता।” जैसे की बायबल में कहा गया है कि जो मनुष्य कलयुग में पैदा होगा उसका लास्ट जजमेंट हो जायगा। उसको जाना जायेगा की उसमें पुण्य कितना है, इसका ये महात्म्य है कि इस से हमारी अग्नीपरिक्षा होती है। और उसने ये भी कहा की इतना ही नहीं की अग्नीपरिक्षा होगी, अग्नीपरिक्षा जो हमारी होने वाली है इस कलयुग कितना है। तो अपुण्य में, इस कलयुग के वक्त में हमारे लिए एक और बड़ा भारी आशीर्वाद है, वो ये की नल को बताया गया की देखो जिस वक्त कलयुग आएगा, जिस वक्त ये अग्नीपरिक्षा होगी तब हजारो लोग पार हो जाएंगे। हजारो लोगों को आत्मज्ञान हो जाएगा, आत्मबोध हो जाएगा, आत्मसाक्षात्कार हो जाएगा। और इस आत्मसाक्षात्कार के सहारे | वो एक नयी जिंदगी को प्राप्त होंगे और उनमें परिवर्तन हो जाएगा। जो आज गिरीकंदरों में परमात्मा को खोजते फिर रहे है वो उसे प्राप्त करेंगे। ये इसका वरदान है इसी बीच हम यहाँ पुना में आए हुए हैं। जिसको की मैं पुण्यपट्टणम कहती हैूँ। जहाँ आने से को पुण्य का प्रभाव पता चल सकता है। यहाँ भी अगर आप सोचे तो आपको लगेगा की यहाँ भी वही मनुष्य कलयुग है जो जहाँ है, जैसे वहाँ पर था वैसा ही है । ये बात जरूर मानी जानी चाहिए कि जो बात छिपी हुई है, चीज़ दिखायी नहीं देती उसके बारे में बात करने से कोई फायदा नहीं। लेकिन जब ये चीज़ खुल जाती है, आपके जो अन्दर की चेतना जब खुल गयी है उससे जब आप जानेंगे तो आपको आश्चर्य होगा की इस पुना में इतने गहनता के कार्य हए है यहाँ पर अनेक साधुसंतों ने बैठकर के तपश्चर्या की हुई है। तुकाराम जैसे इतने बड़े महान पुरुष इसी पुना के पास ही में आये और रहे । उनका यही वास्तव्य है । तो इसका जो आकर्षण है वो उन लोगों के लिए है जो

पुण्य को खोजते है और पुण्य में डूबना चाहते है । उन लोगों के लिए नहीं जो पैसा दूँढते है और दुनियाभर की दौलत ढूँढते है क्योंकि वो तो सिर्फ अपने लिए है । किसी दुसरे के लिए नहीं। जो हम पैसा इकठ्ठा करते है या चीज़े इकठ्ठा करते है। जो हम अपने लिए सत्ता इकठ्ठा करते है या हम इसी तरह का बड़ा भारी नाम, जिसे फेम कहना चाहिए इस तरह का नाम इकठ्ठा करते है ये सब अपने लिए। लेकिन पुण्य जो है वो दुसरों पर असर करता है। जैसे एक दीप है। आपको उसकी सफाई करनी है। तो आप उसमें कुछ भी चमका दीजिए, कुछ आप चाँदी का बना दीजिए, चाहे आप सोने का बना दीजिए उसे जिस भी चाहे चीज़ का बना सकते है । उसमें जो भी मेहनत करना चाहे कर सकते है। लेकिन बेकार क्योंकि इस में दीप नहीं जला। जब इस में दीप जलेगा तभी इस का उपयोग है। इसी प्रकार भी हो बेकार है। जब तक उसके अन्दर आत्मा का दीप नहीं जलता तब तक वो बेकार है। जब उसमें मनुष्य कुछ दीप जल जाता है, तो वो पुण्यवान आत्मा हो जाता है। और उसके अन्दर से बहता हुआ प्रकाश हजारो दीप संसार में जला सकता है। इसलिए आज की पुण्यनगरी में इस पूजा का आवाहन बहुत बड़ी चीज़ है। शक्ति का संचार जब पुण्य में हो तो वो पुण्य हजार गुणे बढ़कर के अत्यंत शक्तिशाली बन जाता है। पुण्य की शक्तियाँ अनेक हैं। लेकिन उसके अन्दर शक्ति ही संचलित हो जाये तो फिर क्या कहने ! पुण्य अभी तक हमने जो जो जाना है वो ऐसा ही है, पुण्यवान लोग जो होते है उनको सब लोग सताते है। उनको परेशान करते है । किसी तरह का कोई संरक्षण, प्रोटेक्शन नहीं होता है। वो हर समय दबे रहते है लोगों से। और उपर जो चाहे वो खिंच उनके पास कोई धनसंपत्ती नहीं होती। उनके पास ले जाता है। जो चाहे उन्हे बेवकूफ बना सकता है। लेकिन शक्ति का संचार होते ही वो प्रगाढ़, प्रचंड प्रकाश निकलते है कि किसी की मजाल नहीं की किसी पुण्यवान आदमी को हाथ लगाये। जो हाथ लगाएगा वो जानेगा की ये कोई प्रचंड चीज़ है। इसी प्रकार अगर कोई आदमी ये चाहेगा कि उनका पैसा नोच ले या उनको ठग ले या सताये तो सता नहीं सकता। ये कलयुग है और आप पर बड़ा भारी आशीर्वाद है कि कलयुग में ही प्रकाश आ सकता है। और जैसे ही अन्दर ये प्रकाश आ जाएगा कोई आपको छू नहीं सकेगा। कोई आपको परेशान नहीं कर सकता। कोई आपकी हत्या नहीं कर सकता । कोई आप से कोई चीज़ छीन नहीं सकता। आप पूरी तरह से संरक्षित हो जाते है। और आप स्वयं इतने शक्तिशाली होते है कि जहाँ खड़े हो जाईयेगा वहाँ कौनसा भी आतंक, आफत, परेशानी हो उसे आप एकदम खड़े होने से ही खत्म कर सकते है । तो में शक्ति का संचार यही आज का पुण्य आवाहन है और आज की पूजा में यही करना है।