Conversation with Dr. Talwar

मुंबई (भारत)

26, 27 फरवरी 1987, शिव पूजा के सुअवसर पर मुंबई में माताजी श्री निर्मला देवी की डॉ. तलवार से बातचीत।

सहयोग का ज्ञान मुझे सदा से था। इस अद्वितीय ज्ञान के साथ ही मेरा जन्म हुआ। परंतु इसे प्रकट करना आसान कार्य न था। अतः इसे प्रकट करने की विधि मैं खोजना चाहती थी।
सर्वप्रथम मैंने सोचा कि सातवें चक्र (सहस्त्रार) का खोला जाना आवश्यक है और 5 मई 1970 को मैंने यह चक्र खोल दिया। एक प्रकार से यह रहस्य है। पहले ब्रह्म चैतन्य अव्यक्त था, इसकी अभिव्यक्ति न हुई थी। यह स्वतः स्पष्ट न था। जो लोग किसी प्रकार आत्म साक्षात्कार प्राप्त करके ब्रह्म चैतन्य के समीप पहुंच जाते तो वे कहते कि “यह निराकार का गुण है। व्यक्ति एक बूंद की तरह से है जो सागर में विलीन हो जाती है।”
इससे अधिक कोई भी न तो वर्णन कर पाता और न ही लोगों को बता पाता। ब्रह्म चैतन्य के सागर में अवतरित महान अवतरणो ने भी अपने गिने चुने शिष्यों को यह रहस्य समझाना चाहा, उनका परिचय ब्रह्म चैतन्य से करवाने का प्रयत्न किया। परंतु ब्रह्म चैतन्य के अव्यक्त रूप में में होने के कारण यह अवतरण स्वयं “इसी में लुप्त हो गए।” ज्ञानेश्वर जी ने समाधि ले ली। कुछ लोगों ने कहा कि वे उसकी बात नहीं कर सकते। यह तो अनुभव की चीज है। अतः बहुत कम लोग इसे प्राप्त कर सके। कोई भी अपनी उंगलियों के सिरों पर, अपनी नाड़ियों पर, अपने मस्तिष्क में इसका अनुभव करके या अपनी बुद्धि से समझ कर आत्मसाक्षात्कार के अनुभव का वास्तविकरण न कर सका। इस प्रकार यह बहुत बड़ी समस्या थी इसके लिए आधार बनाने का प्रयत्न किया।
अब ब्रह्मचैतन्य के विराट अवतरण के रूप में मैं आई हूं। निराकार सागर अब एक बड़ा बादल (साकार) बन गया है। इसने रूप धारण कर लिया है। इससे पूर्व जो भी “अवतरण आए वे इसके अंग-प्रत्यंग थे। पूर्ण विराट अवतार हुआ है इस बादल में जल है वर्षा का यह जल लोगों के मस्तिष्क पोषण कर रहा है शनै: शनै: वे उस स्तर पर लाए गए हैं जहां उनकी कुंडली उठ गई है, उन्हें आत्मसाक्षात्कार प्राप्त हो गया है और अब वह अपनी नस नाड़ियों और उंगलियों के सिरों पर सभी समस्याओं को महसूस कर सकते हैं| यही कारण था इसकी वजह से अब तक किसी ने स्पष्ट रूप से चैतन्य लहरियों के विषय में नहीं बताया उन्होंने चैतन्य लहरी की बात की परंतु अब तक यह अव्यक्त रूप में थी। केवल एक अवस्था थी, आनंद की एक अवस्था जिसकी अभिव्यक्ति स्थूल रूप में हुई थी| उस अवस्था में क्रोध और प्रलोभनो से ऊपर उठ गए। हमारे सम्मुख इसके प्रमाण हैं| वह ऐसा किस प्रकार कर पाए, ब्रह्मचैतन्य क्या था – इसका प्रत्यक्ष रूप वो न दर्शा पाए। केवल उपमाओं और निधि कथाओं के माध्यम से उन्होंने इसके विषय में बताया।
मैंने यही प्राप्त किया है – यह प्रत्यक्ष रूप है ब्रह्म चैतन्य का साकार रूप में सागर में से लाई हूं अब मैं आपको इस में विलीन हो जाने की आज्ञा नहीं देती| इसे मैंने एक बड़े घट (मटका) के रूप में स्थापित किया है| आप लोग छोटे घट हैं दूसरे शब्दों में सूक्ष्म कोषाणुओं के रूप में अपने शरीर में ले लिया है जहां मैं आपका पोषण करती हूं, आप की देखभाल करती हूं, आपकी अशुद्धियां स्वच्छ करती हूं| और यह सब कार्यान्वित करती हूं परंतु मैं “महामाया” हूं| इसलिए मुझे अत्यंत शनैः शनैः उचित समय तथा उचित परिस्थिति में काम करना होता है।
जब सातवां चक्र खोला गया तो सभी चक्र आपके सहस्त्रार में आ गए और मैं सभी चक्रों का और सभी देवी – देवताओं का संचालन कर पाई| किसी भी देवता से प्रार्थना करने भर से आपको चैतन्य लहरियाँ आने लगती है यह प्रमाणित करता है कि मैं ब्रह्मचैतन्य हूं।
ब्रह्म चैतन्य ही आदि शक्ति है और सदाशिव भी मेरे हृदय में विराजित हैं| परंतु मेरे अधिक मानवीय होने के कारण मुझमे सदाशिव को खोज पाना सुगम नहीं है| आधुनिक मानव को आप यदि यह सब बातें बताएं तो उनकी समझ में नहीं आएगा यह तो केवल सहयोगियों को बताया जा सकता है| जिनमे इसे समझने की योग्यता है| इस सत्य को बर्दाश्त कर पाना अत्यंत कठिन है| आजकल तो अपने धन और पद के गर्व से मुक्त रहना भी अत्यंत कठिन है| लोग हिल जाते हैं उनके लिए यह बर्दाश्त करना असंभव होगा कि सभी “अवतरण मुझमें निहित है।
एक बार मैं औरंगाबाद गई वहां एक लड़के ने मुझे बताया कि ब्रह्मचैतन्य अनुभव करने या न करने से परे हैं इसके विषय में उसने किसी पुस्तक में पढा था| मैंने उसे बताया कि ये सच है परंतु इस सत्य को भूलकर वह ब्रह्मचैतन्य को केवल महसूस करें| इसके पश्चात मैंने इसके विषय में कुछ लोगों को बताने का निर्णय किया| इसको प्रकट करने से पूर्व, आप देखें, उपयुक्त समय भी आ गया था| अभी तक सभी धर्म विभाजित थे और असंगठित अब पूर्ण संगठन आ गया है| अब मैं ईसा मसीह, मोहम्मद साहब और अन्य लोगों के विषय में विस्तार से बता सकती हूं क्योंकि वे सब एक ही विराट के अंग प्रत्यंग है| उसी विराट के जो ब्रह्मचैतन्य है।
वैज्ञानिकों से मेरे विषय में बात न करें उन्हें केवल यही बताए कि एक अद्वितीय विधि विकसित है| यद्यपि इसे समझना कुछ कठिन है फिर भी यह घटित हुआ है| और हमने स्वयं इसे देखा है| वैज्ञानिकों को आप इस प्रकार बताएं| उनसे यदि आप मेरे विषय में कहेंगे तो उन्हें आघात लगेगा| अधिक से अधिक आप उन्हें इतना कह सकते हैं कि “यह ज्ञान श्री माताजी निर्मला देवी की देन है|” इसके द्वारा कुंडलिनी जागृत की जा सकती है| उन्होंने किस प्रकार यह कार्य को किया इसके विषय में हमें कुछ नहीं जानते संभवतः यह रहस्य है, सारी बात मुझ पर डाल दो।
आप समझने का प्रयत्न करें| क्या आप बता सकते हैं कि बीज का अंकुरण किस प्रकार होता है? पृथ्वी मां में बीज को डालने पर तो आप कह सकते हैं कि सभी कुछ श्री माताजी पर छोड़ने से हमारे अंदर बीज का अंकुरण हुआ है यह जीवन प्रक्रिया है जिसे हमने स्वयं देखा है।
अब तक कोई भी अन्य लोगों को आत्मसाक्षात्कार नहीं दे पाया| हो सकता है एक दो लोगों ने दूसरों को साक्षात्कार दिया हो| अधिकतर लोगों को तपस्या द्वारा ही आत्मसाक्षात्कार प्राप्त हुआ| उदाहरणार्थ महात्मा बुद्ध को तपस्या द्वारा आत्मसाक्षात्कार प्राप्त हुआ| ब्रह्मचैतन्य ने उनमें इसलिए प्रवेश किया क्योंकि उन्होंने इसके लिए प्रार्थना की| इसके लिए शुद्ध इच्छा की और तक ब्रह्मचैतन्य में उनका शुद्धिकरण किया| परंतु इसे पाने के पश्चात वे उस अवस्था में स्थापित हो गए| इसके बाद उन्होंने इसके विषय में कुछ नहीं कहा| अब यही चीज सामूहिक रूप से मिल रही है| इसका सामूहिक रूप से प्राप्त होना इस अवस्था के प्रकृटीकरण आरंभ होने का कारण हुआ| मान लो आप बिजली का अविष्कार करें और इसे अपने तक ही सीमित रखें? इसके विषय में किसी और से बात नहीं करें तो अन्य लोग किस प्रकार इसके विषय में जान पाएंगे? ऐसा नहीं है कि महान संत इसकी अभिव्यक्ति नहीं करना चाहते थे परंतु उन दिनों संपर्क के साधन नहीं थे| किसी व्यक्ति के पास यदि आंखें नहीं होगी तो किस प्रकार आप उन्हें दिखाएंगे या किस प्रकार किसी चीज की बात करेंगे? इस अवस्था को समझने वाला और आत्मसात करने वाला उन दिनों कोई न था| जिन लोगों ने आत्मसाक्षात्कार प्राप्त किया उनके सहस्त्रार खुल गए और वह इसी में ही विलीन हो गए| इस प्रकार यह सारा अनुभव व्यक्तिगत रहा सामूहिक नहीं बन पाया| अब वह स्थिति समाप्त हो गई है| आत्म साक्षात्कार अब सामूहिक बन गया है| एक बिंदु पर आकर हर चीज को सामूहिक बनना पड़ता है| इस बिंदु तक पहुंचने के लिए भी परीक्षाएं हुई अन्तोर्गवा ईसा मसीह ने अपना बलिदान दिया| इसी प्रकार मोहम्मद साहब, गुरु नानक और तुकाराम ने परीक्षाएं दी| आप देखें कि उनसे किस प्रकार व्यवहार किया बैकुंठ से आए इन संतों के साथ लोगों ने किस प्रकार व्यवहार किया? चीज़े तब कार्यान्वित ना हो पाई।
बैकुंठ से भी आगे की सब चीजें मैं जानती हूं परंतु इसे मैंने अभी तक प्रकट नहीं किया है| धीरे-धीरे मैं यह सब प्रकट करूंगी क्योंकि अभी तक लोग इसे आत्मसात करने के लिए तैयार नहीं है यह खिचड़ी पकने जैसा है जो अभी तक पकी नहीं है| तो अभी इसे तैयार होने दो| आप सब लोग इसमें हैं अब जो लोग तैयार हो रहे हैं उनकी गुणवत्ता भूतकाल के पैगंबरों के गिने-चुने शिष्यों की गुणवत्ता के बराबर है| अभी यहां पर आप सब लोग धीरे-धीरे उन्नत होंगे| जो भी लोग इस दिव्य रसोइये की हांडी में आ जाएंगे, वे तैयार हो जाएंगे| जो लोग इस हांडी से बाहर रह जाएंगे वे बाहर ही रह जाएंगे| यह सब समय से परे की चीज है हर व्यक्ति की प्राप्त करने की अपनी ही योग्यता है| वैसे ही जैसे यह कहना कठिन है कि साइकिल चलाने सीखने या सी.ए. या डॉक्टर बनने में किसको कितना समय लगेगा| कुछ लोग बहुत कम समय लेते हैं और कुछ लोग बहुत अधिक समय का बंधन माना कि अपनी रचना है|
वास्तव में शरीर का कोई समय नहीं है| आदतों के कारण मानव ने समय के आयाम (Time Dimension) की सृष्टि की| आदतें बनने के साथ-साथ काल या समय बंधन की सृष्टि हुई अगर आदत ना हो तो समय बंधन नहीं रह जाता।
सहज योग में आने पर आप बहुत से आदतों से मुक्त हो जाते हैं| परंतु इसमें भी समय लगता है आदतों से यदि आप मुक्ति चाहते हैं, तो उन्हें उचित न ठहराएं हैं| उचित ठहराने के कारण आदतें बनी रहती हैं| एक जीवन काल में यदि आप आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करना चाहते हैं तभी इस जीवन में वह स्थिति प्राप्त करना आपके लिए संभव होगा| इस जीवन में यदि आप अदकचरे रहे तो यह उपलब्धि पूर्ण करने के लिए आपको पुणे आना पड़ेगा| कुछ समय के लिए अब सहजयोग इसी प्रकार कार्य करेगा| यह “अंतिम – निर्णय” है सहजयोग अभिव्यक्तिकरण में जब मैं लोगों को विपरीत दिशा में कार्य करते देखती हूं तो मुझे बहुत बुरा लगता है समय-समय पर मुझे ऐसे बुरे अनुभव होते रहते हैं| परंतु ऐसे व्यक्ति सहजयोग से चले जाते हैं| ऐसा घटित होता है| परंतु आप लोगों को निरुसाहित बिल्कुल नहीं होना| पूरी शक्ति से इसमें बढ़ने के लिए लगे रहे।
सदैव मध्य में रहे| सहजयोग में अपनी उन्नति के विषय में चिंतित न हो| एक बार जब आप मध्य में आ जाएंगे तो उन्नति स्वतः होने लगेगी| मैं इसका पोषण कर रही हूं| प्रतिदिन आप बाएं दाएं होते रहते हैं अपनी आदतों के कारण आप बाएं को जाते हैं और आकांक्षाओं के कारण दाएं को| मुझे अपने हृदय में बिठाना एक भाव है, एक अनुभूति| जिस प्रकार अपमें आदतें विकसित होती है उसी प्रकार भाव के रूप में मुझे अपने हृदय में स्थापित करने का अभ्यास करें| आप यदि इतनी आसानी से आदतें बना लेते हैं तो इस सुंदर भाव को क्यों नहीं आसानी से प्राप्त कर सकते हैं? ऐसा करना भाव परिवर्तन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं| मस्तिष्क की अवस्था होने के कारण आदते बना लेना सुगम है।
एक बार जब आप अपने अंदर मेरा भाव स्थापित कर लेते हैं तो आपके पूरे शरीर में यह अपना स्थान ले लेता है| और शाश्वत बना रहता है| यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आप कितना इसे उपयोग करते हैं| कमरे में यदि बहुत सा धुआं कर दिया जाए तो सारे मच्छर भाग जाते हैं| तो अंततः शुद्धिकरण के लिए भी यह आप पर निर्भर करता है कि अपने हृदय में कहां तक आप मुझे बिठाते हैं| अब यह प्रश्न उठता है कि किस प्रकार मेरे भाव को अपने हृदय में स्थापित करें| उत्तर ये है कि चित्त को निरंतर रोकने से स्थिरता आती है| सदैव चित्त निरोध करें| आप जब बाहर जाकर किसी चीज को देखते हैं तो अपने चित्त को जानबूझकर उसकी ओर जाने से रोके| अभ्यास से ऐसा होता है| चित्त को अंदर की ओर ले जाएं| इसे निरलिप्सा कहते हैं| स्मरण रहे की बाहृा की चीजों से संपर्क केवल चित्त के माध्यम से होता है सदैव इसे देखें कि यह कहाँ जा रहा है? सदा अपने से प्रश्न करें, “मेरा चित्त कहां है?” वास्तव में हमारा चित्त भी हमारे अंदर इसी प्रकार बँटा हुआ है जिस प्रकार चेतना और बोध जब हमारी चेतना का एकीकरण हमारे बोध से होता है तो यह चैतन्यत बोध का रूप धारण कर लेती है| जो संतुलन प्रदायी होता है| यह संतुलन आपको मध्य में बनाए रखता है| ज्योंही आपका चित्त गलत दिशा में जाता है तुरंत आपको अपनी नस नाड़ियों पर तपन महसूस होने लगती है| इस प्रकार सर्वव्यापी शक्ति आपके अंदर कार्य करती है और बढ़ती है।
हमारी सभी आदतें और संस्कार हमारे मस्तिष्क के विकास के विकास को प्रभावित करते हैं मस्तिष्क में मरोड़ो (Crumples) (कुण्डल) के रूप में प्रकट होते हैं| यह कुंडल जब खुलते हैं तो मस्तिष्क में नए अंतरिछों की सृष्टि होती है जिनमें आत्मसात करने की शक्ति अधिक होती है| कुंडलीक्रत मस्तिष्क बड़े सूक्ष्म रूप से खुलता है| इस प्रकार परमात्मा से संबंध बनता है।
इस बात को सुनकर वैज्ञानिकों को आघात पहुंचेगा एक चिकित्सा संस्थान में जाकर मैंने पूरा अनुकंपा नाड़ी तंत्र परा-अनुकम्पी-नाड़ी-तंत्र (Pera-Sympathetic-Nervous-System) के विषय में बताया| वे भौचक्के रह गए| वे गुर्दे (Stiponitan-Adrenaline) की कार्य शैली का वर्णन नहीं कर सकते हैं| आप कार्बन को ही लें| कार्बन को यदि आप बाई ओर से देखेंगे तो इसका दायाँ भाग दिखाई देगा और दाएं से देखेंगे तो बायाँ| बाईं और से कार्बन देखने पर स्वास्तिक का आकार दिखाई देगा और दाएं और से देखने पर ओंकार का| नीचे से ऊपर को देखने पर यह क्रूस दिखाई पड़ता है यह वास्तविकता है परंतु चौका देने वाली इसे आप को परिकल्पना (Hypothesis) के रूप में लेना होगा कि मानव मस्तिष्क से ऊपर भी एक सर्वव्यापी शक्ति विद्यमान है| परिकल्पना केवल यही है| मानव मस्तिष्क का आकार (Pyramid) सूची स्तंभ जैसा है| सर्वव्यापी शक्ति या परम-चैतन्य चहुं ओर से आकर माँ के गर्भ में भुर्ण के बनने के तुरन बाद से ही इसके मस्तिष्क को प्रभावित करने लगती है।
वास्तव में इस सूची स्तंभ आकार के मस्तिष्क के तालू से बेरोकटोक प्रवेश करके परम चैतन्य रीढ़ की हड्डी से जाकर इसी रीढ़ के मूल में बनी त्रिकोणाकार अस्थि में साढ़े तीन कुण्डलों में स्थापित हो जाता है यह कुंडलिनी शक्ति है| इस प्रक्रिया में यह रीढ़ में रिक्त मार्ग (Vaccum Channel) बनाता है| अब परम चैतन्य को त्रिकोणाकार अस्थि को चारों ओर से छूते हुए भूरे और सफेद पदार्थ में प्रवेश करना होता है| इनका अपना घनत्व (Density) होता है और शरीर विज्ञान के अपवर्त्तन (Laws Of Refrection) के अनुसार चलते हुए परम चैतन्य बाएं से दाएं और दाएं से बाएं को प्रकाशमय (विकिर्णित) करता है| इसे सपरस्वीय विकिर्णिकरण प्रभाव (Prismatic Refrection Effect) भी कहते हैं| यह तथ्य केवल मानवीय मस्तिष्क के लिए ही कार्यरत है पशुओं में इतना प्रभावशाली नहीं है।
विकीणिऺकरण क्रिया में मानवीय चेतना को दोनों तरफ से खींच कर बाहर की दिशा में धकेला जाता है| चित्त और विकिर्णित चैतन्य दोनों बाहर निकलते हुए दोनों ओर से अगन्य चक्र को पार कर जाते हैं| इस खिंचाव के परिणाम स्वरुप एक अतिरिक्त शक्ति “परिणामी शक्ति” (The Resultant Force) की सृष्टि होती है| यहां पर भौतिक विज्ञान का शक्तियों का समानांतर चतुर्भुज का सिद्धांत कार्यरत होता है| परिणामी शक्ति दो भागों में बंट जाती है, हर एक भाग बाएं और दाएं दोनों और एक दूसरे के नब्बे अंश के कोण में होता है| परिणामी शक्ति अपने दोनों पूरकों के मध्य में कार्य करती है| एक हिस्सा भुर्ण के शरीर में नीचे की ओर उतरते हुए बाएं और दाएं अनुकम्पी मार्ग की सृष्टि करता है| दूसरा हिस्सा नस-नाड़ियों में से अपना मार्ग बनाते हुए मानवीय चेतना को बाएं और दाएं दोनों और खींचते हुए बाहर आने का अपना रास्ता बनाता है| दूसरा हिस्सा ब्रह्म जगत में क्रिया (Action) कहलाता है| ब्रह्म जगत में इस क्रिया के परिणाम स्वरूप प्रतिक्रिया होती है| (भौतिक विज्ञान का एक अन्य प्रसिद्ध सिद्धांत) क्रिया और प्रतिक्रिया का एक ही मार्ग होता है) बाई और यह प्रतिक्रिया प्रति अहं (बंधनों) की सृष्टि करती है और दाएं और यह अहम की रचना करती है।
संक्षिप्त में, परिणामी ब्रह्म चैतन्य की जीवन शक्ति के साथ हमारा चित्त ब्रह्म जगत में गया और एक प्रतिक्रिया को साथ लेकर बाई और से अपने साथ किसी बंधन को साथ लेकर वापस आ गया और इस प्रकार “मनस” की सृष्टि की, क्रिया और प्रतिक्रिया, दोनों अगन्य और विशुद्ध चक्र में से गुजरते हैं| प्रकृति में बिखरे होने के कारण चित्त में पूरे शरीर के अंदर प्रसारित होने की शक्ति है| बाई और की प्रतिक्रिया इच्छा तत्व है, जिसकी संभावना शक्ति बाएं अनुकम्पी मार्ग पर ईड़ा नाड़ी को जन्म देती है| इस प्रकार दाएं और की प्रक्रिया-क्रिया तत्व है| जिसकी संभावना शक्ति पिंगला नाड़ी की रचना करती है| ईड़ा नाडी का अत्यधिक बहाव अगन्य चक्र के पिछले हिस्से में गुब्बारे जैसा बादल बनाता है जिसे हम प्रतिअहं (Super Ego) कहते हैं| तथा पिंगला नाड़ी का अत्यधिक बहाव आज्ञा चक्र के सामने वाले हिस्से में वैसे ही बादल की रचना करता है जो अहं (Ego) कहलाता है। अगन्य चक्र इन दोनों गुब्बारों ( अहं और प्रतिअहं ) के बीच में होता है, अगन्य चक्र के आगे का हिस्सा-मस्तिष्क के पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland) द्वारा प्रचालित होता है और पीछे का हिस्सा शीर्ष ग्रंथि (Pineal Gland) द्वारा|
अगन्य चक्र में प्रवेश करके कुंडलिनी इसे ज्योतिर्मय करती है| आपके अंदर ईसा मसीहा जागृत हो जाते हैं| वे अहं और प्रतिअहं के गुब्बारों को अधोगति की ओर ले जाते हैं और पूरा अगन्य चक्र खुल जाता है| इसलिए कहा जाता है कि हमारे पापों के कारण ईसा मसीहा बलिदान हो गए| इसी के साथ साथ सहस्त्रार खुल जाता है| मैंने विराट के सहस्त्रार को खुलते देखा है, ऐसा लगता था जैसे टनो शोले हो| जब मानवीय मस्तिष्क की चीर फाड़ करते हैं| तो इसकी फाड़ियाँ शोलों की पंखुड़ियों सी लगती है| इसका मध्य भाग पीले रंग के छेद जैसा दिखाई देता है| सहस्त्रार का खुलना अचानक होता है, झटके के साथ ये खुल जाता है| इसका वर्णन मैं किस प्रकार करूं, यह एक दूरबीन का प्रभाव दूसरी ने दर्शाता है, अगन्य और विशुद्धि चक्र के खुलने से प्रायः अहं और प्रतिअहं नीचे की ओर खींच जाते हैं| मनस प्रतिअहं है और अहंकार अहं (Ego) है| हमारी आत्मा पंचतत्वों तथा उनके कारणात्मक (Casual) अभिव्यक्ति से घिरी हुई है| कुंडलिनी इसकी परिधि पर है पंचतत्वों में पृथ्वी और जलतत्व मुख्य है और ज्योत-मात्रा उनका कारणात्मक तत्व है।
जब आत्मसाक्षात्कार घटित होता है तब देवी देवता जागृत हो जाते हैं और पोषण पाकर सभी चक्कर सशक्त होने लगते हैं| चक्र खुलते हैं और शक्ति प्रसार करने लगते हैं| मस्तिष्क में बने पीठों पर सभी संबंधित चक्रों में गतिविधि शुरू हो जाती है| दोनों ही स्तरों पर समन्वय आरंभ हो जाता है| और सभी चक्कर संगठित हो जाते हैं अपने मस्तिष्क का एक उदाहरण लें-यह कुछ करना चाहता है,आपका शरीर कुछ और करना चाहता है, और आपकी बुद्धि कुछ और, उनमें एकीकरण (समन्वय) नहीं है| आत्म साक्षात्कार के पश्चात शरीर, मन और बुद्धि (मनसा, वाचा, कर्मणा) एक हो जाते हैं| कपड़े के टुकड़े का एक और उदाहरण ले यह चित्त का प्रतीक है| आत्मसाक्षात्कार के पूर्व यह चारों तरफ सभी दिशाओं में फैला होता है, इस कपड़े को उंगली पर ऊपर की ओर उठाएं क्या होता है? कपड़ा उंगली पर कुछ ऊपर जाकर उंगली को चारों ओर से घेर लेता है| इसी प्रकार जब कुंडलिनी उठती है तो यह उंगली की तरह से चित्त को उठाकर सहस्त्रार तक ले जाती है| जहां यह ब्रह्मचैतन्य के प्रकाश से प्रकाशमान हो उठता है| प्रकाशरंजीत होकर यह मध्य में सुषुम्ना नाड़ी पर कुंडलिनी मार्ग की रेखा में आ जाता है| वास्तव में घटित यह हुआ है कि आत्मसाक्षात्कार के पश्चात हमारा चित्त बाहृा भोतीक संसार से अंदर की ओर खींचता है| इस प्रकार यह ज्योतिर्मय हो उठता है| यह एक प्रकार की अवस्था है परंतु हम मानव वास्तव में अपनी आदतों के दास हैं| आदतों के वशीभूत होकर हम अपने चित्त को उस स्थिति में स्थाई रूप से बने नहीं रहने देते| वास्तव में चित्त को बाहर नहीं जाना चाहिए| एक सामान्य स्थिति ये है कि मैं स्वयं को आप लोगों समेत अपने अंदर पाती हूं, मैं आप लोगों को नाव पर बैठाकर तैराना चाह रही हूं| परंतु आप निरंतर अपना एक पैर पानी में डालकर मेरी इस सहायता में बाधा डाल रहे हो| आपका चित्त तुच्छ चीजों पर है, आदतन आप अपना एक पैर बाहर निकाले रखते हैं, यद्यपि आप यह जानते हैं कि मैं आपको पार लगाने के लिए अंदर बैठी हुई हूं, मैं भी देख सकती हूं कि आपकी निकली टांग को किसी भी समय कोई मगरमच्छ निकल ले लेगा, परंतु अपनी आदतों के कारण आप मगरमच्छ को देख पाने में असमर्थ हैं| अब क्या आप मेरी चिंता की कल्पना कर सकते हैं| कल्पना करें कि मुझे कैसा लगता होगा।
यही कारण है कि मैं आपको कहती हूं कि सत्संग करो अपने चित्त को मध्य में रखने के लक्ष्य से अन्य सहयोगियों के साथ समय व्यतीत करो, चित्त का निरंतर मध्य में होना बहुत आवश्यक है| आत्मसाक्षात्कार के पश्चात दिव्य शक्ति को प्राप्त करके हमारी बाई और दाई नाडिया शांत हो जाती है, तनाव दूर हो जाने के कारण हमारे चक्र और अधिक खुल जाते हैं| यह घटना चक्र है| तब कुंडलिनी के अधिक तन्तु उठ सकते हैं| इस अवस्था में आकार चित्त मध्य में बने रहने का गुण विकसित कर लेता है| तब आप किसी विशेष कार्य को करने के लिए चित्त को निर्देश देते हैं, और इस कार्य को करने के पश्चात बिना किसी प्रतिक्रिया के आपके मध्य में यह अपना स्थान ग्रहण कर लेता है| अब तक इसने नीरलिप्सा का गुण प्राप्त कर लिया होता है।
मेरी बात कुछ और है, मेरा चित यदि आप पर हो तो मैं आपकी सभी समस्याओं का अपने मैं खींच लूंगी, उन्हे साफ करके में कष्ट उठाऊँगी| ऐसा मैं चाहूंगी तभी होगा| सहज योगियों को मैंने बिना सोचे समझे अपने शरीर में डाल दिया है| इसलिए मुझे कष्ट उठाना पड़ता है, इस मामले में सहयोगी दबाव मापी यंत्र (Baro Metric) सम है| वे मेरी तरह से कष्ट नहीं उठाते कभी थोड़ा बहुत कष्ट हो सकता है| क्योंकि जो भी कुछ भी नकारात्मकता वे आत्मसात करते हैं वह विशाल सागर में चली जाती है| अब रूस में भौतिक पदार्थ के पांचवे आयाम पर शोध हो रहा है, जीव बीज (Bio Plasma) पर शोध| यह पूर्णतया दायी और की गतिविधि है, हर मनुष्य का अपना एक परिमल (Auro) है| व्यक्ति के गुणों के परिवर्तन के साथ साथ उस गुण के प्रतिनिधित्व करने वाले रंग या परिमल परिवर्तित हो जाते हैं| आप बंधन किसको देते हैं? अपने परिमल को ताकि यह सुरक्षित रहे| केवल भौतिक पदार्थों में ही परिमल हो सकता है। अतः यह सब भौतिक है| पांचवा आयाम वास्तव में सूक्ष्मदर्शी (Microscopic) है या हम कह सकते हैं कि यह छायाचित्रण (Photographic) आयाम है, जब आप मेरे फोटो में कोई प्रकाश देखते हैं, तो यह परिमल का ही एक रूप होता है| चैतन्य का अपना ही प्रकाश होता है यह केवल मुझे दिखाई देता हैं, कुछ लोग जिनका आज्ञा चक्र खराब होता है वह भी इस प्रकाश को देख सकते हैं वह बाहर से इसे देख सकते हैं।
सिद्धांत यह है कि जब आप ब्रह्मचैतन्य से दूर हो जाते हैं तो आप इसे देख सकते हैं परंतु यदि आप इस में समाए हुए हो तो क्या देखेंगे?
निर्विचार चेतना तभी आती है जब आपकी कुंडलिनी अगन्य चक्र को पार कर लेती है| जब कोई विचार नहीं होता, यह संयम द्वारा आती है| शनै: शनै: यह आपका भाग बन जाती है, और पूरे शरीर में छा जाती है| तब यह निर्विकल्प चेतना होती है| आप ब्रह्मचैतन्य बन जाते हैं या ब्रह्मचैतन्य की एक अवस्था।
अभी आप सबके लिए आवश्यक है कि मेरे लिए कार्य करें केवल उस अवस्था में प्रवेश करके समाधि में न चले जाएं| समाधि की यह स्थिति मैंने आपके लिए प्राप्त कर ली है| अभी तक आपको दी नहीं, तो आप इसे मांगते क्यों हैं? आपको पता होना चाहिए कि आप वहां हैं| इसके विषय में कोई संदेह नहीं है| अब यह अंतिम खेल है| वास्तव में इस अवस्था को पाना अत्यंत सुगम एवं स्वतः है| परंतु मैं चाहूंगी कि आप इसके लिए परिश्रम करें, और प्रयत्न करें| जब आप इसी क्षण, केवल अपने लिए यह अवस्था प्राप्त करना चाहते हैं तो मैं कहूंगी कि यह आपका स्वार्थपन है| और एक प्रकार से आप पलायन कर रहे हैं| सर्वप्रथम आपको सामूहिक होना होगा अन्यथा व्यक्तिगत रूप में तो आप निराकार में खो जाएंगे मेरे दर्शन भी नहीं कर सकेंगे क्योंकि आप उस अवस्था में चले जाएंगे, सागर में आप विलीन हो जाएंगे| अतः सागर से विकसित होना या उस में विलय हो जाना कोई अद्वितीय या महान कार्य नहीं है, सागर से वाष्पीक्रत होकर बादल बनना और फिर सब पर वर्षा करना अद्वितीय उपलब्धि होगी| मेरा यही लक्ष्य है और यही खेल| जिस तरह से हर खेल का कोई लक्ष्य होता है, वैसे ही मेरे खेल का भी कोई लक्ष्य है।
केंद्र में बने रहने के लिए शरणागत हो जाइए कहिए, “श्री माता जी आप ही सभी कुछ है, कृपया करके सभी कार्यों को कीजिए|” यही पूर्ण समर्पण है।
वैज्ञानिक मस्तिष्क के लोगों को आप यह विद्या धीरे-धीरे दें| जितना बड़ा घड़ा हो उसके अनुसार ही उसे भरा जाता है| अतः धैर्य रखें| एकदम पूरा सागर आप उन्हे नहीं दे सकते| याद रखें कि विज्ञान विराट का एक छोटा सा अंश है| लोगों को सहजयोग का परिचय देते हुए सर्वप्रथम उनमें सहजयोग की इच्छा पैदा करें| जब वे आ जाएं तो उन्हें देखें, समय को सदा याद रखें| आप सब के साथ भी ऐसा ही हुआ है| पहले आपने इसको अनुभव किया और फिर इसको अधिक से अधिक पाने की आकांक्षा की, यह प्रक्रिया भी वैज्ञानिक है।
संसार में धनार्जन के लिए जब आप कार्य करते हैं| तो भी आपको माया का सामना करना पड़ेगा| याद रखें कि आप मेरे लिए धनार्जन कर रहे हैं| बस| आगे बढ़े और जितना चाहे धनार्जन करें| आपके भौतिक सामर्थ्य के लिए मैं यह बात कह रही हूं।
आप के माध्यम से जो लोग सहयोग में आते हैं वह मेरे द्वारा लाए गए सहयोगियों से कहीं अच्छे बन जाते हैं| मेरे साथ रहकर वे माया में फँस जाते हैं नए लोगों के लिए मेरा मानव रूप कुछ विशेष नहीं है|

रोग निदान मिर्गी रोग
कारण:–चित का अत्यधिक बाई ओर को चले जाना| इसके कारण व्यक्ति सामूहिक अवचेतन अवस्था में चला जाता है| दुर्बल या बाई ओर के व्यक्ति होने के कारण जब मस्तिष्क में भय की भावना उत्पन्न हो जाए तब यह रोग घटित होता है| या किसी दुर्घटना या अचानक आघात के परिणाम स्वरुप यह रोग हो सकता है।
उपचार : चित्त को मध्य (साहस्त्रर) में लाएं ऐसा करने के लिए गायत्री मंत्र कहकर चित्त को पहले दाएं और को लाएं और फिर ब्रह्मदेव सरस्वती का मंत्र उच्चारण करते हुए चित्त को मध्य में ले आएँ| दाएं और चित्त के आते ही आपको चैतन्य लहरिया आने लगेंगी| चैतन्य लहरियों के आते ही मंत्र बोलना बंद कर दें अन्यथा आप बहुत अधिक दाएं को चले जाएंगे, (आक्रामक हो जाएंगे) जिससे चैतन्य लहरिया कम हो जाएंगी| उदाहरण के रूप में श्री जालान के माता जी का यह रोग ठीक हो गया इसके लिए बाएं और दाएं में पूर्ण संतुलन करना आवश्यक होता है| चैतन्य लहरियों का आना बहुत आवश्यक है| चैतन्य लहरियां नहीं आ रही है तो बार-बार कुंडलिनी को उठाए ताकि चैतन्य लहरियाँ आने लगे।
एक अन्य अच्छा तरीका यह भी है कि बायां हाथ श्रीमाताजी की फोटोग्राफ की तरफ करके दायां हाथ जमीन पर रखकर महाकाली का मंत्र कहें ताकि चैतन्य लहरिया बने रहें| पीठ के बाएं और मोमबत्ती (अग्नि) जलाकर उपचार करें, ऐसा करना काफी सहायक होगा।
यह उपचार विधि कैंसर एवं मनोदैहिक रोग में भी लाभकारी है| मांस पेशियों की समस्याएं भी इससे ठीक हो सकती हैं| श्री गणेश तत्व बिगड़े होने के कारण महिलाओं में हयस्टेरेक्टोमी (Hysterectomy) के मामलों में जहां गर्भाशय निकाल दिया जाता है| वहां भी श्री गणेश तत्व की समस्या होती है, तथा भय भी इसका कारण होता है| किसी महिला को यदि संतान नहीं होती तो बाएँ स्वाधिष्ठान की समस्या इसका कारण हो सकती है| पराअनुकंपी (Para Sympathetic) में समस्या होने के कारण महिलाओं को बहुत अधिक रक्तस्राव हो सकते हैं| आंत्रशोथ एवं बहु-मूत्र की समस्या भी हो सकती है।
उपचार : अपनी बाई तरफ को विकार मुक्त करें साथ ही आवश्यक दवा भी ले, अजवाइन की धूनी भी आप ले सकते हैं| कटीवेदना (Lumbago) के लिए अजवाइन का पानी दिया जा सकता है| मांसपेशियों के दर्द के लिए अजवाइन ली जा सकती है| और गेरूँ का लेप किया जा सकता है| लुंबागो में हड्डियां मुड़ जाती हैं इसके लिए चैतनयित मिट्टी का तेल किसी अन्य तेल में मिलाकर मालिश करें| कुछ ही दिनों में यह ठीक हो जाएगी| किसी भी तरह के उपचार के लिए सभी कुछ आपकी इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है| अतः ईड़ा नाड़ी बहुत महत्वपूर्ण है| क्योंकि यह आप में शुद्ध इच्छा जागृत करती हैं, गलत इच्छाओं से यदि आप कार्य करेंगे तो सभी कुछ मशीनीकृत और पाखंड बन जाएगा| उत्थान की इच्छा ही शुद्ध इच्छा है| आपमें यदि पुत्र प्राप्ति आदि की स्थूल इच्छाएँ हैं| तो इच्छा पूर्ण होने के पश्चात भी कोई और इच्छा इसका स्थान ले लेगी| इस प्रकार आप पाखंड में फंसते चले जाएंगे| शुद्ध इच्छा में आपको सभी कुछ एकदम प्राप्त हो जाएगा| शुद्ध इच्छा करने से ही आपका उत्थान होता है| इच्छा शक्ति के प्रति आपका दृष्टिकोण ही मुख्य चीज है| आप क्रिया शक्ति को लें, इसके दो पक्ष हैं- शारीरिक और मानसिक| निर्विचार समाधि प्राप्त करने के लिए शारीरिक रूप से बैठकर आपको ध्यान करना होगा, और मानसिक रूप से देखना होगा कि आपका मस्तिष्क सांसारिक स्थूल चीजों की ओर न दौड़े| आप प्रार्थना करें कि, “श्री माता जी आप ही सब कुछ करती हैं, मैं कुछ नहीं करता|” यह आपके विचारों को संयमित करेगा ध्यान करने से पूर्व सबके लिए आवश्यक है कि अपने बाएं, दाएं को शुद्ध करें| ध्यान से पूर्व कुंडलिनी अवश्य उठाएं| पूजा में बैठते समय मशीन की तरह से न बने रहे| उन्नत होने की आपकी इच्छा शुद्ध होनी चाहिए| आर्य समाज से आए हुए व्यक्ति मूलतः आक्रामक प्रवृत्ति के (Right Sided) होते हैं| उन्हें भक्ति भजनों द्वारा मुझे अपने हृदय में बिठाना चाहिए| अर्थात बाईं और को आना चाहिए| मंत्र बोलते समय चित्त मध्य चक्रों पर रखें| महाकाली और महासरस्वती शक्ति भी दोनों ओर से मध्य नाड़ी पर ही कार्य करती हैं और इस प्रकार अंतः संबंधित होती हैं| बाएं और दाएं के मंत्र भी कुंडलिनी उठाने के लक्ष्य से बोले जाते हैं।
दाएं और को उठाकर बाईं ओर के डालने से तथा गायत्री मंत्र कहने से भी बाईं और के विकार दूर होने में सहायता मिलती है परंतु इनका प्रभाव अत्यंत सीमित है| मैंने जब आप को ठीक करना होता है तो आपकी कुंडली उठाकर मैं इस कार्य को करती हूं और इससे पूर्व भी आप दूसरी ओर को अधिक झुक जाएँ समय पर संभाल कर मैं इसे नियंत्रित करती हूं| यह पूरी तरह से नियंत्रण में है| इसे नियंत्रित न कर पाने के कारण लोग भटक जाते हैं| कुछ राम राम राम कहे जाते हैं और कुछ पांडु रंगा पांडुरंगा और इस प्रकार बाएं या दाएं में जाकर खो जाते हैं।
माँ अब आप सब से पूछ रही है — “तुम्हारा चित्त कहां है?” पहले भक्ति भाव आना चाहिए और भक्ति भाव से श्रद्धा भाव में चला जाना आवश्यक है।
(श्री माताजी से वार्ता का शेष भाग वर्ष 2000 के अंक 1, 2 में पढ़े।)