Address to Sahaja Yogis, The need to go deeper

Sydney (Australia)


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(सहजयोगियों से बातचीत, प्रश्नोत्तर, बरवुड, सिडनी (ऑस्ट्रेलिया), 6 मई, 1987)

आज मैंने आपकी उन सभी समस्याओं को सोख लिया है जो कैनबरा में थीं और बाद में उस कॉफ्रेंस में थीं और उसके बाद यहां पर भी थीं। ये सभी समस्यायें मेरे चित्त में आती हैं और मैं उन पर वर्क करने का प्रयास कर रहीं थी। मेरी वर्क करने की शैली एकदम अलग है क्योंकि मेरा यंत्र अत्यंत तीक्ष्ण और प्रभावशाली है। लेकिन इसके लिये मुझे इस पर अपना चित्त डालना पड़ता है और कभी कभी मुझे थोड़ा-बहुत कष्ट भी उठाना पड़ता है लेकिन कोई बात नहीं।
आपके लिये भी यह महत्वपूर्ण है कि आप भी इन गहन भावनाओं को…. गहन संवेदनाओं को अपने अंदर विकसित होने दीजिये। लेकिन अधिकांशतया लोग अत्यंत बनावटी हैं। वे केवल अपने शरीर, अपने इंप्रेशन और वे किस प्रकार से स्वयं को लोगों के सामने पेश करते हैं ….इन्हीं बातों के विषय में सोचते हैं। ज्यादा से ज्यादा वे सोचते हैं कि हमें कानूनी तौर पर सजग होना चाहिये …. या हमें शराब नहीं पीनी चाहिये… सिगरेट नहीं पीनी चाहिये। वे सोचते हैं कि यदि हमने ये सब प्राप्त कर लिया तो हमने सब कुछ प्राप्त कर लिया। लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता है। दूसरी बात ये है कि हम सोचते हैं कि यदि हम एक दूसरे से प्रेम करते हैं … यदि हम माँ से प्रेम करते हैं तो हमने सब कुछ प्राप्त कर लिया है। ये भी सच नहीं है क्योकि मेरे प्रति आपका प्रेम अगाध है इसमें कोई संदेह नहीं है और इसको अत्यंत गहन होना चाहिये… तीव्र होना चाहिये। जैसे-जैसे आप इसमें गहरे उतरते जायेंगे आपको हैरानी होगी कि किस प्रकार से आपके अंदर एक खास गुण विकसित हो जाता है कि आप अपने आस-पास की गलत चीजों को ठीक करने लगते हैं। धीरे-धीरे इस गुण में सुधार आता जाता है। उदा0 के लिये एक सहजयोगी किसी के घर जाता है तो उस घर में शुभता आ जानी चाहिये लेकिन इसके लिये उस सहजयोगी का हृदय अत्यंत पवित्र होना चाहिये। यदि उसका हृदय पवित्र नहीं है …. उसके हृदय में अभी भी क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर आदि हैं तो ऐसे हृदय का कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला। लेकिन जिस व्यक्ति ने अपने हृदय को पावन बना लिया है तो यदि वह किसी के घर जाता है ….. किसी भी सोसाइटी में जाता है तो वहां पर पूरी तरह से बदलाव आ जायेगा। वहां की परिस्थितियां बदल जायेंगी। जो भी चीजें कार्यान्वित नहीं होती थीं वे भी एकदम से कार्यान्वित होने लगती हैं। उदा0 के लिये कुछ लोगों ने कहा कि माँ जैसे ही आपने इस रविवार से चीजें भेजनी प्रारंभ कीं तब से रेडियो और टेलीविजन से संबंधित सभी चीजें कार्यान्वित होने लगी हैं। मैंने तो कुछ भी नहीं किया। लेकिन आपके साथ भी ऐसा ही होना चाहिये। जहां-जहां भी कोई संत जाता है वहां-वहां चीजें बदलने लगती हैं। लेकिन पहले आपको एक संत होना चाहिये और एक संत की सोच दूसरे व्यक्ति के लिये अत्यंत गहन होती है और हम लोगों में इसी चीज की कमी है। हमें एक दूसरे की इतनी अच्छी समझ नहीं है। हो सकता है कि आपको अपने दोस्तों की … या अपने आश्रम में रहने वाले लोगों की थोड़ी बहुत जानकारी हो परंतु ये जानकारियां और भी गहन होनी चाहिये। आपको और भी आगे जाना चाहिये।
यदि आप मेरे विषय में सोचते हैं या मैं आपके विषय में सोचती हूं तो भी ये कार्यान्वित हो जाता है। लेकिन इसके लिये पहले सभी ध्यान की प्रक्रियाओं को बढ़ाना चाहिये। हम सब को ध्यान करना चाहिये … अत्यंत ईमानदारी से ध्यान करना चाहिये। ऐसा इसलिये नहीं कि हमें केवल ध्यान करना चाहिये बल्कि इसलिये कि हमें गहनता में उतरना चाहिये। हमें अपने अंतरतम में विकसित होना है ताकि हम अपनी दिव्य प्रेम की शक्तियों को अभिव्यक्त कर सकें…. अनेकों चीजों को ठीक करने के लिये …. जिन्हें हम अत्यंत सरलता से कर सकते हैं। मुझे मालूम है कि आप सब इसे कर सकते हैं। इसके लिये किसी बड़ी डिग्री की आवश्यकता नहीं है…. अधिक शिक्षा की भी आवश्यकता नहीं है… किसी भी चीज की जरूरत नहीं है। इसके लिये जिस चीज की जरूरत है वह है एक दूसरे के लिये …. पूरे ब्रहमांड के लिये प्रेम की भावना की… और इसी से सारे बदलाव आने लगेंगे। इससे सारी विनाशकारी शक्तियां अपनी राह बदलने लगती हैं। यदि आप अत्यंत ईमानदारी से …. गहनता से और समझ कर ध्यान करेंगे… तो ये सभी चीजें और भी अधिक तेजी से कार्यान्वित होने लगती हैं ठीक है?
परमात्मा आपको आशीर्वादित करें।

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ये हमारे संगीत से भी अधिक…. मेरे भाषणों से भी या अन्य किसी चीज से भी अधिक है और अब हमें इस प्रवाह को बदलना चाहिये। मुझे पूरा विश्वास है कि आप लोग इस प्रवाह को बदल देंगे। परमात्मा आपको धन्य करें।
क्या आप मुझसे कोई प्रश्न पूछना चाहते हैं?
योगीः यहां पर जो भी शरीर के अंग दिखाये गये हैं उनमें सब की राय कुछ भिन्न है। श्रीमाताजी क्या आप इस विषय में हमें कुछ बता सकती हैं?
श्रीमाताजीः देखिये ये चक्र हमारे शरीर के बाहर भी होते हैं। हमारे पैर में नाभि हमारा अंगूठा है। आप बैठ जाइये और मैं आपको इसके विषय में बताती हूं। नाभि हमारा अंगूठा है … दांयी और बांयी नाभि। अंगूठे से दूसरी अंगुली विशुद्धि है, तीसरी अंगुली स्वाधिष्ठान है, चौथी आज्ञा है और पांचवीं हृदय है।
लेकिन हाथों में ये बदल जाती है। मुझे हाथों के बारे में बताने की जरूरत नहीं है। आपको हाथों के बारे में अच्छी तरह से मालूम है। हाथों के बारे में हम कह सकते हैं कि …. बांये कंधे पर यहां ललिता चक्र है … जो विशद्धि चक्र का ही एक भाग है। ये ललिता चक्र विशुद्धि चक्र को कार्यान्वित करता है। हमारी कोहनी भी नाभि ही है और हमारी कलाई विशुद्धि है। स्वाधिष्ठान बीच में है। हाथ की छोटी अंगुली में हृदय है। यदि कभी भी आपकी छोटी अंगुली में दर्द हो जाय तो आपको मालूम होना चाहिये कि आपके हृदय में कुछ गड़बड़ है। कई बार आपकी ऊपरी बांई बांह में भी हृदय की अनुभूति होती है। हम ऐसा कह सकते हैं कि विशुद्धि, हृदय और नाभि फिर स्वाधिष्ठान और फिर सॉरी। ये विशुद्धि (कंधा) है, ये स्वाधिष्ठान (ऊपरी बांह का ऊपरी भाग), ये हृदय है (ऊपरी बांह का निचला भाग) और कोहनी आपका हृदय है और ये … वैसे मैं इनका कभी भी उपयोग नहीं करती हूं … तो मुझे मालूम नहीं है। ऊपरी बांह का निचला भाग हृदय है और ये कलाई में विशुद्धि है। ठीक है? लेकिन कई बार आप हृदय को यहां ऊपरी बांह में भी अनुभव कर सकते हैं। क्योंकि यदि स्वाधिष्ठान अत्यधिक सक्रिय है तो आपका हृदय खराब हो जाता है अतः आप इसे यहां भी अनुभव कर सकते हैं। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि हमारे अंदर वह विवेक होना चाहिये ….. क्योंकि यदि मैं आपको कुछ कहती हूं तो हो सकता हो आपका स्तर अभी उतना ऊंचा न हो … तो आप कई बार भ्रमित हो सकते हैं। कलाई में विशुद्धि है और यदि आपको यहां दर्द अनुभव होता है तो इसका अर्थ है कि आपकी विशुद्धि में कुछ गड़बड़ है। कभी-कभी आपकी विशुद्धि में यदि कोई समस्या होती है तो आप अपनी विशुद्धि की अंगुली को खींच सकते हैं। आपको हैरानी होगी कि आपकी बांयी विशुद्धि से वाइब्रेशह बह रहे हैं। किसी को बी यदि ये समस्या हो तो आप अपनी अंगुलियों को खींच सकते हैं। इसी तरह से सारे चक्र हमारे शरीर में स्थित हैं।
इसी प्रकार से नीचे की ओर यदि आप जांये तो आपको घुटना आपका नाभि है, ये स्वाधिष्ठान है, दोनों स्वाधिष्ठान हैं ( कूल्हा और पैर का ऊपरी भाग) और पैर का निचला भाग हृदय चक्र है। टखने की हड्डी पर विशुद्धि है। मुख्य बात विशुद्धि को याद रखना है क्योंकि विशुद्धि, नाभि और स्वाधिष्ठान तीनों मुख्य हैं। ये तीनों ही जल्दी खराब हो जाते हैं। माना आपके साथ कोई नाभि वाला व्यक्ति बैठा है तो आपको भी तुरंत ही अपनी नाभि (घुटने पर) पर समस्या अनुभव होने लगेगी। लेकिन कई बार ऊपरी और निचला पैर कभी-कभी ही अनुभव हो पाते हैं … हर बार नहीं अतः आपको थोड़ा सा भ्रम हो सकता है। खासकर स्वाधिष्ठान ….. जैसे मैं जब कैनबरा में उतरी तो मैं चल ही नहीं सकी, मेरे दोनों स्वाधिष्ठान पकड़ गये थे। मैं चल ही नहीं पा रही थी। मुझे बहुत दर्द हो रहा था क्योंकि कुछ समय के लिये मेरे दोनों स्वाधिष्ठान पकड़ गये थे लेकिन बाद में ठीक हो गये।

(सहजयोगियों से बातचीत, प्रश्न और उत्तर, बरवुड, सिडनी, 6 मई 1987)

(सहजयोगियों से बातचीत, प्रश्नोत्तर, बरवुड, सिडनी (ऑस्ट्रेलिया), 6 मई, 1987)

योगीः सहस्त्रार को कमल से दर्शाया जाता है लेकिन इस समय इस कमल की पंखुड़ियां गिरती जा रही हैं और इसमें फल विकसित हो रहा है?
श्रीमाताजीः देखिये, सहस्त्रार को कमल से दर्शाया जाता है क्योंकि हमारा मस्तिष्क वास्तव में कमल की तरह ही है। यदि आप इसे क्षैतिज रूप से काटें तो आपको लगेगा जैसे आपने पंखुड़ियों को काट दिया हो और यदि आप इसे उर्ध्व रूप से काटेंगे तो आप देखेंगे कि लिम्बिक क्षेत्र में यह बिल्कुल पंखुड़ियों की तरह से है। जब आपको प्रकाश प्राप्त होता है तो क्या होता है …. यो पंखुड़ियां फूलकर खुल जाती हैं और इनके अत्यंत सुंदर रंग दिखाई देते हैं। ये आग की ज्वालाओं के रूप में दिखाई पड़ते हैं जो अत्यंत सुंदर होती हैं। अब सहस्त्रार खुला है …कमल भी खुला है और इसके अंदर आपको पहले से रखा हुआ फल भी दिखाई पड़ता है जो आपका आज्ञा चक्र है। इसको आप स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। आज्ञा चक्र पीले रंग का होता है जो एक सुनहरी टोपी की तरह से दिखाई पड़ता है …. इसके अंदर एक सुंदर आज्ञा दिखाई पड़ता है।
इस कमल के फल को हम बाद में देखते हैं और इसको मैं बिंदु अवस्था कहती हूं जहां आप बिंदु के समान हो जाते हैं … एक छोटे बिंदु के समान। फिर इस छोटे बिंदु को विकसित होना होता है। जब आप इस कमल का फल बन जाते हैं तो आपकी दूसरी अवस्था प्रारंभ होती है।
योगीः श्रीमाताजी, क्या आप बिंदु और इसके ऊपर के ऊंचे चक्रों के बारे में कुछ बता सकती हैं?
श्रीमाताजीः मुझे नहीं लगता है कि आपको इनकी चिंता करनी चाहिये। सहस्त्रार के ऊपर तीन ऊंची अवस्थायें हैं। बल्कि मैं तो कहूंगी कि अभी हमें केवल सहस्त्रार पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिये … यही ठीक होगा। बिंदु, अर्धबिंदु और वलय ये तीन अवस्थाये हैं जिनसे होकर सभी को गुजरना पड़ता है। जब आप क्षैतिज रूप से विकसित होने लगेंगे तो धीरे-धीरे आप इनमें से गुजरने लगेंगे और हमने ऐसा करना प्रारंभ कर दिया है। अतः ये समझ लें कि हमें क्षैतिज रूप से विकसित होना है। हमें देखना है कि हम किस प्रकार से सामने वाले व्यक्ति को प्रभावित करते हैं।
उदाहरण के लिये कुछ लोग … देखिये बहुत ही अहंकारी होते हैं वे आपके संपर्क में आते हैं और कहते हैं कि आप बहुत अच्छे व्यक्ति है …. बहुत ही मधुर स्वभाव के हैं… आदि आदि…। हो सकता है वह व्यक्ति शारीरिक रूप से सुंदर हो … या अत्यंत बुद्धिमान हो लेकिन उसमें कुछ विशेष बात न हो। लेकिन यदि आपके सामने वाला व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति का मूड और स्वभाव बदल दे तो आप कह सकते हैं कि वह व्यक्ति आध्यात्मिक है। चलिये देखते हैं कि आप किस प्रकार से प्रकृति को बदलते हैं …. फूलों को बदलते हैं….. आपने देखा कैसे उस दिन मैंने आपको फूलों का चमत्कार दिखाया था। इसी प्रकार से आपके चरित्र का प्रभाव पेड़ों पर …. आपके मित्रों पर …. आपके बनाये हुये भोजन पर भी दिखना चाहिये … हर चीज बदलती है … ये बहुत ही सुंदर है। हमें देखना चाहिये कि ये किस प्रकार से कार्यान्वित होता है।
मैं ऐसे लोगों को जानती हूं जिन्हें कविता के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं था …. और आज वे सब कवि बन गये हैं। जिन्हें संगीत का ज्ञान नहीं था वे बहुत सुंदर गाना गाने लगे हैं। जैसे क्रिस्टीन …. क्रिस्टीन पहले कभी भी गाती नहीं थी … उसकी आवाज काफी बेसुरी थी और अचानक से वह कोयल की तरह सुरीले स्वर में गाने लगी है। तो न केवल आपके लेकिन दूसरों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है … अऩ्य लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं? आप कितने दयालु, अच्छे और मधुर स्वभाव के हैं … लेकिन ऊपरी तौर पर नहीं … आपके व्यवहार में दूसरों को बदलने की शक्ति होनी चाहिये … उसका रूपांतरण करने की शक्ति होनी चाहिये। आपकी उपस्थिति से शुभता आनी चाहिये।
योगीः श्रीमाताजी, हम किस प्रकार से ऐसे हृदय विकसित कर सकते हैं जैसा कबीर जैसे कवियों का आपके प्रति था?
हाँ हाँ क्यों नहीं। जरा कबीर की कठिनाई तो देखिये ….. आपको ऐसी कोई कठिनाई नहीं है। कबीर के पास आपके जैसी माँ नहीं थी ये बताने के लिये … प्रेम करने के लिये ….. उनकी देखभाल करने के लिये कोई नहीं था। उनके एक गुरू थे और आपको उनके जीवन के बारे में तो पता ही है। कबीर संत रामानंद के शिष्य बनना चाहते थे लेकिन रामानंद तक पंहुच नहीं पाते थे। वह एक मुसलमान थे या नीची जाति के थे। रामानंद स्वामी के शिष्य कबीर को अपने गुरू के पास नहीं जाने देते थे। एक दिन संत कबीर गंगा नदी की सीढ़ियों पर जाकर लेट गये और पूरी रात ठंड में वहीं लेटे रहे और रामानंद का इंतजार करते रहे क्योंकि वे हमेशा इसी रास्ते से जाते थे। जब वे इधर से गुजरे तो उनका पैर कबीर पर पड़ा … उन्होंने कहा अरे मेरे बच्चे तुम यहां क्या कर रहे हो?
कबीर उठ खड़े हुये और कहने लगे कि क्या आज से आप मुझे अपना शिष्य बना सकते हैं?
गुरू रामानंद ने कहा हाँ मैंने तुम्हें अपना शिष्य बना लिया है। स्वामी रामानंद ने उन्हें शिक्षा दीक्षा दी।
आपको ऐसी कोई परेशानी नहीं है … कबीर का कोई अपना उन्हें सहायता करने वाला नहीं था। उन्होंने अकेले ही पूरे संसार से लड़ाई लड़ी। उस समय उनके आस-पास काफी दुष्ट लोग थे। आज भी पटना के लोग जहां वे रहते थे उसके आस-पास के लोग तंबाकू को सुरति कहते हैं। कबीर कुंडलिनी को सुरति कहते थे और ये दुष्ट लोग तंबाकू को सुरति कहते हैं। इस प्रकार के दुष्ट लोग सारी चीजों का मजाक बनाते हैं। ऐसे लोगों के बीच में कबीर ने इस प्रकार का हृदय विकसित किया। आपको तो कोई ऐसी परेशानी नहीं है। आप सब एक ही भाषा बोलते हैं … आप सबके एक से विचार हैं … आपके पास आपकी माँ है जो आपको सारी बातें बता सकती है। अतः आप सब कबीर जैसा ही हृदय विकसित कर सकते हैं।
योगीः माँ, मैं जब ध्यान करता हूं तो मैं ध्यान में अपने सिर से एक बड़ा सा फूल निकलता हुआ देखता हूं …. एक सुनहरा फूल …. काफी कुछ किसी गुलदस्ते जैसा। मैं लोगों से इस बारे में पूछता हूं लेकिन उन्हें इसका उत्तर नहीं पता है और न ही मुझे इसका उत्तर पता है।
तुम शायद कुंडलिनी को देखते हो। ये एक टेलिस्कोप की तरह होती है ….. कुछ-कुछ पीली … सुनहरी सी … गर्म …..।
योगीः हाँ ये बिल्कुल भट्टी की तरह से होती है।
हाँ ये भट्टी की तरह ही होती है। तुम कुंडलिनी को देखते हो…. और कुंडलिनी को देखना अच्छा है। लेकिन जब तुम देखो कि तुम वहां नहीं हो …… ऐसा देखना अच्छा नहीं है। लेकिन ता जो देख रहे हो वो कुंडलिनी है। इसको देखना अच्छा है लेकिन इससे परे जाना ठीक नहीं है कहो कि मैं इसको देखना नहीं चाहता । अब मैं इसमें प्रवेश करना चाहता हूं।
योगीः उदाहरण के लिये कल रात मैं अपनी बेटी के साथ सो रहा था तो उसने मुझे अपने बिस्तर पर बुलाया। हमने बैठकर ध्यान किया ….. ये बहुत ही अच्छा अनुभव था और अचानक से मैं जाग उठा।
श्रीमाताजीः क्या तुमने स्वप्न में कुछ देखा?
योगीः मुझे मालूम नहीं है कि ये सपना था या मैं तब भी ध्यान ही कर रहा था।
अगर आप सपने में कुछ देखें तो ठीक है पर ध्यान में आपको कुछ नहीं देखना चाहिये। सपने में यदि आप इसे देखें तो ठीक है …. ये कुंडलिनी ही है …. ये एक भट्टी की तरह ते होती है …. ये एक खामोश जलती हुई भट्टी की तरह से होती है।
योगीः कभी-कभी ये पटाखों की तरह से दिखाई देती है और बहुत सुंदर लगती है।
हाँ परंतु तुम्हें इसे ज्यादा नहीं देखना चाहिये … ठीक है…. इससे बचने की कोशिश करो

(सहजयोगियों से बातचीत, प्रश्नोत्तर, बरवुड, सिडनी (ऑस्ट्रेलिया), 6 मई, 1987)
योगीः श्रीमाताजी क्या आप मुझे हंसा चक्र के बारे में बता सकती हैं?

हंसा चक्र? हंसा चक्र दोनों भंवों के बीच में स्थित है जहां पर इडा व पिंगला से आने वाली कुछ नर्व्स एक दूसरे को काटती हैं। ये विशुद्धि चक्र का ही एक भाग है … और विशुद्धि चक्र और आज्ञा चक्र का मिलन बिंदु है। जैसा कि आपने देवी महातम्य में पढ़ा होगा कि श्रीकृष्ण ईसामसीह के पिता थे। अतः यहां पर दोनों के बीच संबंध बनाये रखना चाहिये जो अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि आपका हंसा चक्र ठीक नहीं है तो आपका विवेक बहुत क्षीण है।
यह चक्र बहुत जल्दी सूख जाता है। जैसे कि आपने कुछ सूखा खाना खाया …. कई बार आप मुझे भी बहुत सूखा खाना खिलाते हैं …. मुझे आपको बताना है कि आपको मुझे सूखा भोजन नहीं खिलाना चाहिये… और न ही खाना चाहिये। आपको इसे सॉस या कुछ तरल चीज के साथ खाना चाहिये। यदि आप बहुत सूखा खाना खाते हैं तो आपका हंसा चक्र भी खराब हो जाता है। यदि यह खराब हो जाता है तो नाक में घी कपूर डालना अच्छा रहता है। लेकिन यहां से पेरिटोनियम और उसकी लाइनिंग सूखनी शुरू हो जाती है। यदि पेरिटोनियम सूख जाती है तो पूरा शरीर सूख जाता है। ये कहीं भी हो सकता है …. फेफेड़ों में यदि ऐसा हो जाता है तो फेफेड़ों का कैंसर हो सकता है। पैरिटोनियम में भी कैंसर हो सकता है। अतः आपको अत्यंत सावधान रहना होगा कि सूखी चीजें ज्यादा न खांय…. पूरे समय सूखा खाना और सूखी चीजें। इस चक्र में हमेशा कुछ तैलीय पदार्थ या लुब्रीकेंट डालना चाहिये ताकि इस चक्र में कोई समस्या न रहे। क्योकि इस चक्र में समस्या रहने से आप अपना विवेक खो देते हैं … आप कुछ समझ ही नहीं पाते हैं … आपको मालूम ही नहीं होता है कि आपको करना क्या चाहिये। आप कुछ अच्छा करना चाहते हैं पर कर ही नहीं पाते हैं। जब आप कुछ पाना चाहते हें तो आपको कुछ अच्छा नहीं प्राप्त हो पाता क्योंकि आपका विवेक क्षीण है। इसीलिये इसे …हंसा चक्र को सूखा नहीं रखना चाहिये। इस अवस्था से पहले और बाद में सविकल्प हो सकता है। सविकल्प …विकल्प का अर्थ है संदेह … सविकल्प का अर्थ है संदेह सहित। आप अभी भी अपने मन में संदेह के साथ विकसित हो रहे हैं। ऐसे लोग भी होते हैं जिनके मन में अभी भी संदेह होते हैं। उदा0 के लिये कोई व्यक्ति सहज में किसी चीज का बुरा मान जाता है ….. ये बात उसके अवचेतन में बैठ जाती है और उसके दिल में ये बात अभी भी रह जाती है कि ठीक है मुझे किसी बात का बुरा लगा है लेकिन मैं फिर भी सहज करना नहीं छोड़ूंगा क्योंकि सहज बहुत अच्छा है। मन ही मन वह इसे स्वीकार कर लेता है और सहजयोग करता रहता है तो वह निर्विकल्प स्थिति में जा सकता है या वह निर्विकल्प स्थिति में जाकर सविकल्प में जा सकता है। ये फ्लैशबैक है। या ये भी हो सकता है कि ठीक है मैं सहज को निर्विचार में करूंगा लेकिन निर्विचार से मैं फिर से अपने संदेहों में जा सकता हूं। आखिरकार मेरे मन में संदेह हैं …. ये भी हो सकता है … वो भी हो सकता है। कुछ लोगों के अंदर छुपा हुआ गुस्सा होता है या कोई छुपी हुई भावना जिसके बारे में उसको स्वयं भी मालूम नहीं होता है तो उसके अंदर भी विकल्प होते हैं।
अतः सविकल्प समाधि या तो निर्विचार के बाद या पहले आती है। मेरा मतलब है कि आप इसमें जाते हैं और फिर गिर जाते हैं। अतः हमें सविकल्प से परे जाना होगा क्योंकि निर्विचार समाधि ही काफी नहीं है। हमारे सभी विकल्प और सभी संदेह दूर हो जाने चाहिये तभी आप निर्विकल्प अवस्था में जा सकते हैं। तब आपके अंदर किसी प्रकार का संदेह नहीं रहता है … और न कोई समस्या रहती है। आपमें से बहुत से लोग इसी प्रकार के हैं। इसीलिये मैं आपसे इस नये आयाम को विकसित करने का अनुरोध कर रही हूं।
योगीः श्रीमाताजी, हम पूरे दिन भर गहन ध्यान की अवस्था किस प्रकार से प्राप्त कर सकते हैं?
देखिये आप एक प्रकार से ध्यान में ही हैं। आप आधा ध्यान में हैं और आधा नहीं हैं। अब यदि आप साक्षी अवस्था विकसित करने का प्रयास करें तो भी आप ध्यानावस्था में हैं …. केवल साक्षी अवस्था। जो कुछ भी आप देखते हैं … बस इसे देखते जाइये …. देखते जाना ही सबसे अच्छा तरीका है। तब आपको आश्चर्य होगा कि आप एक नये ही विश्व में हैं और ये लोग एक दूसरे ही विश्व में हैं। आप उन्हें किसी और ही विश्व से देख रहे हैं। तब आपको उनके लिये करूणा उपजेगी … दया उपजेगी … आप उन्हें पसंद भी नहीं कर सकते हैं। आपके अंदर ये सभी भावनायें आ जायेंगी लेकिन आप फिर भी उन लोगों से स्वयं को अलग कर पायेंगे।
योगीः कई बार आपको लगता है कि आपके चक्र बिल्कुल ठीक हैं परंतु आप किन्ही ऐसी परिस्थितियों में पड़ जाते हैं जिससे आपके अंदर असंतुलन आ जाता है।
ये सविकल्प अवस्था है। इसका अर्थ है कि आप निर्विचार अवस्था में हैं, फिर भी आप सविकल्प में चले जाते हैं जहां आपको फिर से विकल्प मिल जाता है। लेकिन आखिरकार आप एक साक्षात्कारी व्यक्ति हैं। इसके लिये तीन स्पष्ट चीजें बनाई गई हैं – कि आप सविकल्प समाधि में जा सकते हैं …. आप निर्विचार समाधि में जा सकते हैं और आप निर्विकल्प समाधि में जा सकते हैं। लेकिन यहां से भी आप सविकल्प समाधि में जा सकते हैं और इसी को आपने छोड़ना है। जैसे ही आप ऐसी स्थिति में आंयें जहां आप लिप्त हो रहे हैं … आप कह सकते हैं नेति…नेति अर्थात ये नहीं …ये नहीं और इससे बाहर आ जांय। ये अभ्यास करने से हो सकता है ….. थोड़े से अभ्यास से हो सकता है। जिस प्रकार से आप थोड़े से अभ्यास के बाद ड्राइविंग में निपुण हो जाते हैं, उसी प्रकार से इसमें भी आप निपुण हो जाते हैं।
जब मुझे मालूम होता है कि कुछ गड़बड़ है या मुझे लगता है कि वे गड़बड़ कर रहे हैं तो मैं एकदम चुप हो जाती हूं और उन्हें पता चल जाता है कि कहीं कुछ गलत है । लोगों को बताने की अपेक्षा उन्हें उनकी गलतियों से सीखने का अवसर देना चाहिये। किसी को भी अच्छा नहीं लगता यदि उसे बताया जाता है कि उसे क्या करना चाहिये। वे अपने आप अपनी गलतियों से सीखते हैं कि हां मैंने ये गलती की है …. वो गलती की है। मैंने अपना जीवन बरबाद कर दिया है। लेकिन यदि आप उन्हें बतायेंगे तो उन्हें बुरा लगेगा और वे आपसे बदला भी ले सकते हैं … और वे स्वयं को बदलने के इच्छुक भी नहीं रहेंगे।