Shri Krishna Puja: The 16 000 Powers of Shri Krishna

Saint-Quentin-en-Yvelines (France)

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श्री कृष्ण पूजा
सेंट क्वेंटिन (फ्रांस), 16 अगस्त 1987।

श्री माताजी: वह क्या है?
सहज योगी: छोटे गणेश, एक उपहार।
कृपया बैठ जाएँ।
श्री माताजी : क्या हिल रहा है?
सहज योगी: ऐसा लगता है कि यह मंच है।
श्री माताजी: यहाँ क्या हिल रहा है? यह ऊर्जा है?
सहज योगी: ऐसा लगता है कि यह मंच है।

बच्चों का इस खूबसूरत तरीके से आना और मेरा स्वागत करना बहुत सुंदर था। यह आपको कृष्ण के दिनों में वापस ले जा सकता है, जब बचपन में, उनके दोस्तों द्वारा उनका बहुत सम्मान किया जाता था, और उन्होंने हर संभव सम्मान करने की कोशिश की। उनके जन्म की कहानी तो आप जानते ही हैं। इसके अलावा, आप कहानी जानते हैं –
श्री माताजी, [एक तरफ]: मुझे लगता है कि आपको पानी बंद कर देना चाहिए, अन्यथा मेरी वाणी थोड़ी-सी हो सकती है-

उनके जन्म की कहानी तो आप जानते ही हैं। यहां हमारे पास दोनों तरफ पानी का बहाव है। जिस तरह से वह जमुना नदी के किनारे अपनी बांसुरी बजाते थे। पूरी ही बात कभी-कभी इतनी मानवीय प्रतित होती है, लेकिन ऐसा नहीं है। सही समय पर, जब भी जरूरत पड़ी, बचपन में, उन्होंने अपनी शक्तियों को प्रकट किया, कि उन्होंने एक महिला को मार डाला जो एक शैतान [पुतना] थी। अंतत: उन्होने कंस का वध कर दिया।
उसके बाद, आप जानते हैं कि उन्होंने गीता का उपदेश दिया, लेकिन यह इतना जल्दि नही हुआ। कंस को मारने के बाद, वह वहां शासन करने के लिए द्वारका चले गये। और वहां उन्हे पांच और पत्नियों से शादी करनी है। पहले उनकी सोलह हजार पत्नियां थीं। तो, बहुत से लोग एक प्रश्न पूछ सकते हैं, “माँ वह कैसा पति होना चाहिए”। [हँसी]

इन सोलह हजार को इस तरह समझाना चाहिए कि विशुद्धि चक्र के अपने क्षेत्र में उसकी सोलह पंखुड़ियाँ हैं और ये सोलह पंखुड़ियाँ, सहस्रार की एक हज़ार पंखुड़ियों से गुणा करके सोलह हज़ार हो जाती हैं। तो, ये सोलह हजार शक्तियां हैं, जो हमें भी उपलब्ध हैं।

ये सोलह हजार शक्तियां मस्तिष्क में काम कर रही हैं। ये शक्तियाँ सहजयोगियों के रूप में नहीं आ सकीं, इसलिए वे उन स्त्रियों के रूप में आईं जिन्हें एक राजा ने कैद किया हुआ था – ठीक सोलह हजार – और उन्होंने उनसे विवाह किया क्योंकि विवाह से, यह सब बहुत धार्मिक हो जाता था। इसके अलावा, उन्होंने बाद में पांच पत्नियों से शादी की, जो पांच तत्वों का प्रतिनिधित्व करती थीं।
[एक अवतार को मानवीय दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता है – कभी नहीं समझा जा सकता है, मुझे कहना चाहिए, क्योंकि उनके तौर- तरीके अलग हैं। उनके अपने तौर-तरीके हैं और वे उन्हें अन्य लोगों के सामने उजागर नहीं करते हैं। ऐसा नहीं है कि वे बेनकाब होने से डरते हैं या वे बेनकाब नहीं करना चाहते हैं, लेकिन तब यह समझ में नहीं आएगा, इसे मनुष्य नहीं समझ सकता। यदि आप मुझसे कोई प्रश्न पूछते हैं, तो कहते हैं, “माँ, आप इसे कैसे संभालती हैं?” मैं विषय को बहुत चतुराई से बदल सकती हूं।
तो अब, मैं आपको सहस्रार की सोलह हजार पंखुड़ियों के बारे में बताने जा रही हूं और अब हम अनुवाद शुरू कर सकते हैं। संक्षेप में, आप उन्हें [अनुवादक को] बता सकते हैं।

तो अब यह समझने के लिए कि आपके मस्तिष्क में जो सोलह हजार शक्तियाँ हैं, वे पहले से ही प्रकट हो रही हैं: जैसे ही आपको आपकी आत्मबोध प्राप्ति होती है, वैसे ही वे सोलह हजार शक्तियाँ प्रकट होने लगती हैं। सहस्रार की प्रत्येक पंखुड़ी में सोलह शक्तियाँ हैं। और ये हैं – मेरा मतलब है कि पंखुड़ियां – पांच तत्वों से बनी हैं। तो, इन एक हजार पंखुड़ियों को बनाने वाले इन पांच तत्वों की प्रत्येक पंखुड़ी पर सोलह शक्तियां हैं।

अब पांच तत्व हैं दाहिना पक्ष, जो सामग्री है या, हम कह सकते हैं, मस्तिष्क का पदार्थ है। मस्तिष्क का पदार्थ इस तरह से बनाया गया है कि इसमें एक सुरक्षात्मक पदार्थ भी है। तो हमारे पास ग्रे मैटर है (भुरा पदार्थ)और व्हाइट मैटर सफेद-पदार्थ) भी है जो ग्रे मैटर की रक्षा के लिए बाहर है।
अब जो सोलह शक्तियाँ प्रत्येक पंखुड़ी में अभिव्यक्त होती हैं वे बायीं ओर से आ रही हैं। श्री कृष्ण बाईं ओर के अवतार हैं। तो जो सोलह शक्तियाँ बायीं ओर से आ रही हैं, वे पाँच तत्वों से बनी पंखुड़ियों को सुशोभित करती हैं। लेकिन ये शक्तियां दिमाग में पहले से मौजूद हैं। इन पांच, प्लस (जमा) सोलह, शक्तियों से हम अपने तंत्रिका तंत्र का सारा काम करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि आपको अपना हाथ इस तरह उठाना है, तो यह काम किया जाता है, सबसे पहले, बाईं ओर से, जो चाहता है कि इसे उठाया जाए। और फिर पांच शक्तियों या पांच तत्वों को आदेश दिया जाता है: वे क्रिया में जाते हैं। इसके अलावा, हमारी प्रणाली में एक विशेष प्रकार की व्यवस्था होती है जहां एक प्रतिवर्त क्रिया reflex action होती है, जो हमारे विकास में पहले निर्मित होती है।

अतः मानवीय चेतना में जो कुछ भी कार्य होता है वह प्रतिवर्ती क्रिया reflex action नहीं है। लेकिन अब, जब आपका सहस्रार कुंडलिनी से प्रबुद्ध हो जाता है, तो ये सभी एक हजार शक्तियां इसे सोलह हजार में गुणा कर देती हैं। तो शरीर की सभी नसों को बोध प्राप्त होता है। आपका चित्त प्रबुद्ध हो जाता है। इन एक हजार आयामों से आप सामूहिक रूप से जागरूक हो जाते हैं। हम इस तरह कह सकते हैं: अगर पांच घरों में सोलह लोग रहते हैं और वे अलग-अलग काम कर रहे हैं और कभी-कभी समन्वय कर रहे हैं। लेकिन बाढ़ आ जाती है।
अनुवादक: कोड़े मारना?
श्री मताई: बाढ़, बाढ़।
बाढ़ के परिणामस्वरूप, ये सभी घर एक साथ ला दिये जाते हैं और वे उस बाढ़ की ऊर्जा में समा जाते हैं। फिर आपस में हाथ मिलाते हैं। वे अपने घरों को भूल जाते हैं और वे अब सामूहिक चेतना की एक नई ऊर्जा का उपयोग करने लगते हैं। तुम्हारे भीतर ठीक यही हुआ है, कि जैसे ही कुण्डलिनी तुम्हारे भीतर उठी है और तुम्हें आत्मसाक्षत्कार दिया है, बाढ़ ने तुम्हारे भीतर की इन सुप्त ऊर्जाओं को खेल में ला दिया है। आपको यह सोचने की ज़रूरत नहीं है कि बाढ़ आने पर आपको एक-दूसरे का हाथ पकड़ना है, आप बस स्वत: ही इसे पकड़ लेते हैं।

तो, सभी ऊर्जाएं अचानक गतिशील होने लगती हैं। तो, यह शक्ति, जहां मस्तिष्क की एक हजार ऊर्जाएं अचानक जागृत हो जाती हैं, वह शक्ति विराटांगना कहलाती है। वह विराट की शक्ति है। वह शक्ति है जो श्री कृष्ण को विराट बनाती है। तो, वह आपके अस्तित्व में जो सोलह हजार शक्तियाँ प्राप्त करती हैं, वह विराटांगना की शक्ति के माध्यम से होती हैं। और इस आधुनिक समय में आप जानते हैं कि वह कौन है। तो, आदि शक्ति विराटांगना का रूप लेती है। उस ज्ञानोदय के साथ, आप अपना आत्मसाक्षत्कार प्राप्त करते हैं।

तो, कुंडलिनी, विभिन्न केंद्रों से गुजरते हुए, विभिन्न ऊर्जाओं को प्रबुद्ध करती है, अंततः मस्तिष्क में आती है और विराटांगना शक्ति को प्रकाशित करती है। इस बिंदु पर, मस्तिष्क बिंदु पर, सिर में कुंडलिनी फैलने लगती है। वह बेशक सहस्रार से निकलती है, लेकिन साथ ही मस्तिष्क की इस प्लेट (मेधा) के माध्यम से नीचे की ओर वह अनुकम्पी पर छलकती है। इससे आपको आराम मिलता है। इसलिए आप आराम महसूस करते हैं। यह अनुकम्पी को आराम देता है। इससे केंद्रों का विस्तार होता है। यह इसे अपनी सामान्य स्थिति में वापस लाता है।

पैरासिम्पेथेटिक(परनुकम्पी), या सुषुम्ना का विस्तार, कुंडलिनी के उत्थान को और अधिक मात्रा में बढ़ाता है। यह सब कुंडलिनी की प्रतिवर्ती क्रिया reflex action द्वारा किया जाता है। तो, कुंडलिनी पहले से ही इस तरह से बनाई गई है कि जब वह उठती है, तो वह स्वचालित रूप से इन सभी चीजों को कार्यांवित करती है। तो, आपकी कुंडलिनी में आपके सभी चक्रों को प्रबुद्ध करने और आपके मस्तिष्क को प्रबुद्ध करने और आपको आराम देने, चक्रों के आकार को बढ़ाने और कुंडलिनी को फिर से जगाने की शक्ति है।

लेकिन कुंडलिनी में एक बहुत ही खास शक्ति है: कि हर इंसान की कुंडलिनी मुझे जानती है। बहुत से लोग जिन्होंने अभी-अभी मेरी तस्वीर देखी है, उनकी कुंडलिनी जाग्रत हुई है। लेकिन अगर आपके चक्र बहुत बादल से घिरे हैं, या थक गए हैं, या एक साथ जाम हो गए हैं, या एक दूसरे से अलग हो गए हैं, तो कुंडलिनी वहीं रुक जाती है। इसलिए कुछ लोगों को बोध बहुत जल्दी हो जाता है और कुछ को समय लग जाता है। ये जड़ बद्ध मन सबसे कठिन हैं।

[माइक में शोर]।
श्री माताजी: क्या हो रहा है?
सहज योगी: मुझे नहीं पता।
श्री माताजी : क्या यह एक दूसरे को छू रही है?
ऊर्जा एक साथ जुड़ गई [हँसी।]

श्री माताजी: क्या हो रहा है?
सहज योगी: ठीक है?
[श्री माताजी सिर हिलाते हैं]

अब कुंडलिनी के उत्थान को उस स्थान पर बेहतर तरीके से प्राप्त किया जाता है जहां संत अक्सर आते हैं या आते हैं या रहते हैं। उन लोगों के लिए भी जो इतने जटिल नहीं हैं। उदाहरण के लिए, आज ही, मैंने पाया कि कैथोलिक चर्च ने आपके जीवन को इतना जटिल बना दिया है। मुझे नहीं पता था कि वे प्रचार करते रहे हैं कि सेक्स एक पाप है! फिर, यदि ऐसा है, तो इसका अर्थ है कि केवल आदम और हव्वा, दो इस पृथ्वी पर रहते। और ये लोग आदम और हव्वा के साथ यह जानने के लिए नहीं थे कि उन्होंने क्या किया। और यह बेतुका विचार भारतीयों के बीच श्री कृष्ण के समय भी बहुत था। और उसके परिणामस्वरूप हमारे पास ऐसे तपस्वी थे जो बहुत गर्म स्वभाव के थे। उन्होंने एक तरफा व्यक्तित्व विकसित किया, कहते हैं, एक सूरज जैसा। अगर वे किसी को देखते, तो वे उसे जला सकते थे: “भस्म” [राख]। और उनकी इतनी तपस्या थी कि, अगर आपको उनसे बात करनी है, तो आपको कम से कम एक दूर का, कोई खंभा [बार्जपोल], खोखला खंभा इस्तेमाल करना होगा। ऐसे भयानक लोग!

लेकिन श्री कृष्ण, जब उनका जन्म हुआ, तो उन्हें पता चला कि यह असंतुलन पैदा हो रहा है। उसी समय उनके चचेरे भाई, जिसका नाम नेमिनाथ था, जो एक जैन तीर्थंकर थे, को मांस खाने से उपरति उत्पन्न हुई। उसके परिणामस्वरूप, एक और चरम प्रकृति शुरू हुई, और लोगों ने सोचा कि मांस खाना पाप है। सभी प्रकार के ‘पाप’ के विचार फलने-फूलने लगे। और उनके पास [पापों के] ब्रांड थे; यह ब्रांड, वह ब्रांड। जैसा कि आपके पास क्रिश्चियन डायर जैसे ब्रांड हैं – जैसे: यह पाप, यह पाप, ऐसा। लेकिन अंदर ही अंदर वे सेक्स के बहुत ज्यादा दीवाने थे। वे ही हैं जिन्होंने भारत में इन कामुक मंदिरों की शुरुआत की – जैन।
अब इसका दूसरा पहलू यह है कि भयानक हिंदू ‘संत’ – संत नहीं मैं कहूं, हम उन्हें क्या कहें? – तपस्वियों और भयानक, इन सभी जैन लोगों ने मिलकर धर्म के बारे में एक भयानक विचार बनाया। तो कृष्ण ने अवतार लिया। यह केवल कंस को मारने के लिए नहीं था, बल्कि लोगों को यह बताने के लिए भी था कि इस तरह की बेवकूफी करना धर्म नहीं है। धर्म कभी भी प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध नहीं हो सकता। लेकिन उत्थान एक मर्यादा विहीन यौनाचार से दुरी बनाने से शुरू होता है। (अन्यथा निचले जानवरों में यह उससे भी बदतर है) – मनुष्य में एक बिंदु तक पहुंचना है जहां उसे मर्यादित होना है: उस व्यक्ति को एक व्यक्ति के प्रति समर्पित होना और, वफादार होना। और फिर उन्होंने प्राकृतिक मर्यादाओं के धर्म को सामने लाया [जहां] आपको उस व्यक्ति से शादी करनी है।
अब, उन्होने पाँच पत्नियाँ और सोलह हज़ार और शादी कर ली थीं। इसलिए उन्होंने (उसे) चुनौती दी, “आप एक व्यक्ति के साथ एक विवाह के बारे में क्या कहते हैं? आपकी पहले से ही बहुत सारी पत्नियाँ हैं!” फिर, मैंने आपको एक कहानी पहले ही बता दी है [कि] उन्होने कैसे साबित किया कि वह एक योगेश्वर थे। वह इन सभी रिश्तों से परे थे। और इससे पता चलता है कि, योगेश्वर के लिए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसने कितनी बार शादी की या मेरे जैसी योगेश्वरी के लिए, मेरे कितने बच्चे हैं।
तो समय – या जिसे हम “समयाचार” कहते हैं – एक व्यक्ति को जो एक अवतार है एक विशेष तरीके से व्यवहार करना होता है ।
हरे राम हरे कृष्ण [पंथ] का अनुसरण करने वाले एक व्यक्ति के लिए एक हत्या का मामला था। बेशक यह स्थापित नहीं हुआ था, लेकिन उसे लगा कि आखिरकार, वह कृष्ण है, इसलिए वह लोगों को मार सकता है। अब, कृष्ण एक अवतार थे, उन्हें पता था कि किसको मारना है और कैसे मारना है। उन्होंने कहा कि, “कोई भी जीवित नहीं है, मैं उन्हें पहले ही मार चुका हूं।” एक अवतार का विवेक परिपूर्ण है। तो तुरंत ऐसा नहीं सोच लेना चाहिए कि चुंकि एक अवतार ने ऐसा किया है, तो हम भी कर सकते हैं। लेकिन इंसान हमेशा इस्से भी आगे चला जाता है। मुझे कहना होगा कि यह सभी मनुष्यों की मूर्खता का हिस्सा है। ईसाइयों की तरह, वे सभी मानते हैं कि उन्हें सूली पर चढ़ जाना चाहिए और उन्हें भुगतना होगा। क्या आप मसीह हैं? इतने सारे मूर्ख ईसाइयों को सूली पर चढ़ाने से हम क्या हासिल करने जा रहे हैं? इस तरह की बेतुकी बातों से तमाम तरह के जटिल विचार निकलते हैं, सिर्फ यह कहने के लिए कि कयामत होना ही है। जैसे, कल जैसा मैंने तुमसे कहा था, यह दयनीय लोग हैं। क्राइस्ट ने खुद को सूली पर चढ़ा दिया ताकि आपकी आज्ञा को साफ किया जा सके और आप जीवन का आनंद लें, क्योंकि क्राइस्ट खुद एक अवतार थे, और चाहे आप क्रूस पर चढ़ाएं, या सूली पर न चढ़ाएं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

तो एक अवतार और एक इंसान के बीच के अंतर को सबसे पहले कृष्ण के जीवन में समझना है। जब तेज बारिश होने लगी और जब इंद्र ने श्रीकृष्ण को नीचे गिराना चाहा, तो बारिश इतनी तेज थी। उन्होंने अपनी एक अंगुली पर एक पर्वत गोवर्धन उठा लिया। तो बाकी जो उसके अनुयायी थे, उसके गोप थे, उनके पास भी कुछ लाठी थी, इसलिए उन्होंने कुछ लाठी भी डाल दी जो तुम देखते हो। (हंसते हुए) लेकिन वे बच्चे थे! अब, मैं उन लोगों को नहीं समझ पाती जो इतने बड़े हो गए हैं, जो बड़े दिखते हैं, और बच्चों से भी बदतर व्यवहार करते हैं! प्रकृति हमें हर समय सिखाती है। अब देखिए, लोग समझ रहे हैं कि जहां तक ​​शादी का सवाल है,उन्होंने जो कुछ भी किया है, वह गलत बात है और अब वे श्रीकृष्ण की कही हुई बातों पर आ रहे हैं।
श्री माताजी (अनुवादक से): आपने क्या कहा?
अनुवादक: “जहाँ तक बात है”
श्री माताजी : फिर विवाह। (हँसी) उनके लिए सांड को लाल कपड़ा दिखाने जैसा है! और बहुतों को! वह भी, मुझे लगता है, यही कैथोलिक चर्च है। लेकिन मसीह एक शादी में क्यों शामिल हुए थे? मेरा मतलब है, यह समझा जाना चाहिए: अगर वह शादी के खिलाफ थे तो वह एक शादी में क्यों गये और उनके लिए वाईन भी बनाई? लेकिन उन्होंने उस घटना का इस्तेमाल सिर्फ इसलिए किया क्योंकि वे शराब पीना चाहते हैं! (हँसी) लेकिन वहाँ भी, मसीह बहुत सावधान थे, उन्होने क्या किया, उन्होने पानी को शराब बना दिया, एक सेकंड में, लेकिन शराब बनाने के लिए, आपको इसे किण्वित करना होगा। मैं भी ऐसा कर सकती हूँ, तो क्या? लेकिन मैं शराब नहीं बना सकती, मुझे इसमें कुछ फंगस डालना होगा।

तो यह ऐसा ही है: किस प्र्कार लोगों ने -अपने छोटे दिमाग के अनुसार और अपने स्वार्थ के अनुसार, ईश्वर या अवतार को बना दिया है। क्योंकि यदि आप ऐसा कहते हैं कि आप मूल रूप से पापी हैं तो आप कहते हैं, “अब हम क्या कर सकते हैं?” “अब प्रायश्चित के लिए, आप बहुत सारा पैसा देते हैं,” और परमात्मा पैसे को नहीं समझते हैं – क्या फायदा है? यह सब गलत है, बिल्कुल गलत है। तुमने कोई पाप नहीं किया है। जिन चीज़ों के बारे में वे बात कर रहे हैं,वे सभी गैर-मौजूद चीजें हैं। लेकिन मैंने पश्चिम में देखा है, लोग कहेंगे, “हमारी कुंडलिनी कैसे उठ सकती है? हम पापी हैं।” बेहतर होगा कि आप इन सभी जड़ताओं को छोड़ दें! कोई भी पापी नहीं है: ऐसा श्री कृष्ण ने कहा है। बेशक, उन्होने लोगों को मूल रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया। लेकिन उन्होंने कहा कि कोई भी आत्म-साक्षात्कार प्राप्त कर सकता है और प्रबुद्ध हो सकता है। यदि उन्हे विश्वास होता कि लोग पापी हैं तो वह ऐसा नहीं कहता। ऐसा कहना बिल्कुल ईश्वर-विरोधी और मसीह-विरोधी और कृष्ण-विरोधी है। यहां आप हैं, विराट ने आपको बनाया है, एक बिंदु तक, आपको एक बिंदु पर लाया है। अब जबकि तुम बस खिलने ही वाले हो और पहले ही तुम्हे बता दिया जा चुका है कि बीज के रूप में तुम्हारे भीतर कोई रोग था। तो विकास के सभी महान कार्य, आपको परमेश्वर के राज्य में ले जाने का महान कार्य पूरी तरह से बर्बाद कर दिया गया है।
तो आज का दिन है आनंदित होने का, खुश रहने का – लेकिन समुद्र में कूदने का नहीं [बल्कि] अपनी मर्यादा की नाव पर टिके रहना – क्योंकि अब आपका दिमाग प्रबुद्ध हो गया है। यह मस्तिष्क अब आपके पास इतनी शक्तिशाली चीज है, कि यह आपके आस-पास के सभी पांच कोशों को, आपके चारों ओर के पांच तत्वों द्वारा बनाई गई सभी पांचों प्रभामंडल को भेद देता है। यह मस्तिष्क ईथर के सूक्ष्म, पृथ्वी माता के सूक्ष्म, सभी तत्वों के सूक्ष्म को स्पर्श करता है। इस बोधज्ञान से तुम सूक्ष्म हो गए हो। इसलिए हमें स्थूल चीजों के बारे में भूलना होगा। स्थूल वस्तुएं बस ऐसी किसी भी चीज का अनुसरण करती हैं जो सूक्ष्म है बिल्कुल उसी तरहजैसे चुंबक आकर्षित करता है।
एक बार ऑस्ट्रेलिया में, श्री गणेश की पूजा थी और हिबिस्कस, लाल फूल, श्री गणेश का फूल है। और जब हम पूजा के लिए जा रहे थे, तो मैंने देखा कि यह गुड़हल का फूल खिल रहा है। तो मैंने सहजयोगियों से कहा, “बेहतर है कि गाड़ी कहीं रोक ली जाए, और पूजा के लिए इनमें से कुछ फूल ले लो।” लेकिन फिर वे भूल गए! आप मंत्र जानते हैं, “या देवी सर्व भूतेषु भ्रांति रूपेण संस्थिता”, तो भ्रम। और फिर, उन्हें अचानक याद आता है, “हे माँ, हम फूल भूल गए हैं!”। मैंने कहा, “यह अच्छा है कि आप भूल गए हैं, किसी अन्य ने आप से ले लिया है। इसलिए आप भूल गए हैं।” जब हम पूजा की वस्तु पर पहुँचे, तो सारा स्थान उन्ही फूलों की टोकरियाँ और टोकरियाँ भर चुका था!

इसलिए जब आप भूल जाते हैं, तो यह न सोचें कि आप कुछ भूल गए हैं, तो आपके साथ कुछ गलत हो गया है। नहीं, यह आपकी सूक्ष्म समझ में चला गया है, जो प्रतिवर्त reflex तरीके से काम करता है, लेकिन सोलह हजार आयामों में। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि सोलह हजार तारों वाला कोई उपकरण सोलह हजार तारों से जुड़ा हुआ है और अन्य सोलह हजार तारों से जुड़ा है, और हर समय इतनी कुशलता से काम कर रहा है? यह विराट का काम है और यही इस प्रबुद्ध मन का काम है।
तो आपको स्थूल भाग के बारे में चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। तुम्हें एक आश्रम चाहिए, वह तुम्हारे पास होगा। कुछ भी स्थूल, सांसारिक, कर्यांवित होगा।
लेकिन, इस स्तर पर, आपको यह याद रखना चाहिए कि आपको अपना चित्त केवल एक मिनट के लिए उस पर लगाना है। बस एक चित्त – जो हम कहते हैं वह बंधन है – और यह काम करता है। लेकिन मुख्य बात यह याद रखनी है [है] कि हम योगी हैं, हम प्रबुद्ध आत्मा हैं। हम विशेष शक्तियों वाले लोग विशेष रूप से धन्य हैं। और बहुत ही सरल तरीके हैं जिनसे इन सभी सांसारिक चीजों को नियंत्रित किया जा सकता है। और यह सब कुछ इतनी खूबसूरती से होगा कि आप हैरान रह जाएंगे।

यही है वह बात जिसे आपको महसूस करना है: आपके सहस्रार की शक्तियाँ। मैंने तुमसे कहा है कि सोलह शक्तियाँ पहले से ही थीं। तो, सोलह शक्तियाँ जो थीं, हृदय की बारह और श्री गणेश की चार, आपके मस्तिष्क में पहले से ही थीं। और इसी तरह आप एक भावुक व्यक्ति थे और आपके भावनाओं के रिश्ते थे और दूसरों के साथ अबोधिता के रिश्ते के साथ-साथ शादी के रिश्ते भी थे। यह सब तुम्हारे भीतर अंतर्निहित था। लेकिन इस तरह के मूर्खतापूर्ण विचारों के कारण, इन सभी प्राकृतिक भावनाओं को दबा दिया गया था, कि कोई बहन नहीं थी, कोई बच्चा नहीं था, कोई भाई नहीं था, और इन सभी बेवकूफी के विचारों ने फूलों की सुगंध की सुंदर भावनाओं को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है। यह।
झूठे भय और झूठे विचारों और झूठे निषेधों ने मस्तिष्क के उस हिस्से को बर्बाद कर दिया है, और दाहिनी बाज़ु ने काम करना शुरू कर दिया है। केवल दायां पक्ष काम कर रहा हो: तब बाईं बाज़ु मौजूद नहीं रहती है, बायें पक्ष के सभी मुल्य का अस्तित्व नही रहता हैं। केवल दायां पक्ष और दाईं ओर से संबंध, उन चीजों के साथ जो हम दाईं ओर से करते हैं। साथ ही इसमे जोड़ने के लिए, औद्योगिक क्रांति और युद्ध जैसी बहुत सी चीजें आईं और वह सब, इसलिए दाहिना पक्ष प्रमुख हिस्सा बन गया और यह अहंकार विकसित हुआ। अहंकार आपको बहुत महत्वपूर्ण महसूस कराता है और प्यार और कुछ नहीं बल्कि अहंकार केंद्रित बन जाता है। इसके अलावा, जब पैसा महत्वपूर्ण हो गया, तो यह ऐसा है जैसे कोई व्यक्ति जो पहले से ही नशे में है, और एक बिच्छू उसे काटता है। स्थिति बहुत खराब थी। इस स्थिति को बढ़ाने, इस अहंकार को बढ़ाने के सभी तौर-तरीके, क्रमपरिवर्तन और संयोजन इसी एक अहंकार द्वारा बनाए गए थे।

यह सबसे खतरनाक चीज है जो हमारे पास पश्चिम में है। उनके लिए, पत्नी के प्रति प्यार भी ऐसी चीज़ है जिसका पैसे में मूल्य आंका जाता है। सब कुछ धंधा है, चाहे चर्च हो, चाहे माफिया हो, चाहे राजनीति हो, सब कुछ पैसा है। पैसा ताकत बन जाता है। फिर, अगर पैसा ही सब कुछ है, तो पवित्रता की परवाह क्यों करें? मासूमियत की परवाह क्यों करें? कला की परवाह क्यों करें? जो कुछ भी बिक सकता है उसे कला माना जाता है !! जो कुछ भी पैसा ला सकता है वह एक रिश्ता है! तो, बाएं पक्ष मे छाये रुखेपन ने बाईं ओर की अति को शोषित करने के लिए फिर से एक समस्या पैदा की। इसलिए, सामूहिक अवचेतन को आपके अवचेतन मन में और फिर आपके चेतन मन में खिंच लिया गया। और आप कह सकते हैं कि अहंकार आपके मस्तिष्क में इस हद तक पहुंच गया कि वह अति-अहंकार में जाने लगा और एक बहुत ही गन्दा व्यक्तित्व निर्मित हो गया।
तो, मुझे आपको एक बात बतानी है: आप का उद्देश्य अपना उत्थान हैं, आप का उद्देश्यअपनी सारी शक्तियों को प्राप्त करना हैं, और आप यहां अपने परमात्मा के राज्य में प्रवेश के लिए आये हैं, लेकिन आपको अपने बाएं हिस्से को पवित्रता एवम, शुद्ध रिश्तों, की समझ के साथ कार्यंवित काम करना चाहिए, और दाहिनी ओर का क्रियांवयन इसका सामना, अपने प्लास्टिक अहंकार का सामना करके करना पड़ता है।
जब आप किसी कार्य को नहीं करना चाहते हैं, तो अपने आप से पूछें, मैं वह क्यों नहीं कर रहा हूँ? और जब बायें पक्ष पर खिंचाव पड़ता है, एक सुस्ती, एक जड़ता आ जाती है। पुरा दाहिना पक्ष पूरी तरह से डुब जाता है या बाईं ओर की शक्तिशाली बाधाओं वाली संस्थाओं द्वारा पूरी तरह से आच्छादित हो जाता है। लोग हर समय बहुत थके हुए महसूस करते हैं और वे चाहते हैं कि हमेशा शराब पीएं या बाईं ओर जाने के लिए ड्रग्स लें और जड़ता आ जाए। इसलिए समस्या है। लेकिन सामूहिक रूप से, अगर हम समझ लें हैं कि यह समस्या है, तो हम सब मिलकर इसे सुलझा सकते हैं। किसी का तिरस्कार नहीं करना, किसी को सुधारना नहीं, बल्कि खुद को सुधारना और अपने नेताओं को नहीं सुधारना। यह काम करेगा, मुझे यकीन है कि यह काम करेगा।

आज एक महान दिन है, और मुझे यह फ्रांस याद है, जिब्राल्टर की चट्टान जैसी जड़ता। मुझे नहीं पता था कि उनके दिमाग को कैसे चलाना है; दिमाग प्लास्टिक से बने थे – उनका क्या करें? क्या आप विश्वास कर सकते हैं, पहले वर्ष में, मैं तीन बार आयी थी! मैं फ्रांस में आ कर टकराती रही और अंग्रेज भी बोले, “माँ, आप इतनी बार फ्रांस क्यों जाती हो?” [हँसी] अब, यहां तक कीअंग्रेज भी तुलनात्मक रूप से वही हैं! मुझे उनके बारे में भी समान रूप से गतिशील होना चाहिए था, और मैं थी। यह जानना जबरदस्त धैर्य, प्रेम और समझदारी का काम था कि वे ऐसे सुपात्र मामले हैं जोअहंकार के जंगल में खोए हुए हैं; लेकिन वे वही हैं जो यूरोप, इंग्लैंड और अमेरिका को बचाएंगे।

परमात्मा आपको आशिर्वादित करें।