Shri Ganesha Puja

मुंबई (भारत)

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Shri Ganesha Puja 18 sept 1988 Mumbai

परमात्माकी सृष्टिकी रचनाकारकी शुरुआत जिस टंकारसे हुई उसीको हम ब्रम्हनाद तथा ओमकार कहते है। इस टंकारसे जो नाद विश्वमे फैला वो नाद पवित्रताका था। सबसे प्रथम परमात्माने इस सृष्टीमे पवित्रताका संचारण किया। सर्व वातावरणको पवित्र कर दिया। पहले उन्होंने पुनीत किया जो चैतन्य स्वरुप आज भी आप लोग जान सकते है। उसे महसूस कर सकते है, उसकी प्रचिती आपको मिल सकती है। वही ओमकार आज चैतन्य स्वरुप आपकोभी पवित्र कर रहा है।

श्री गणेश की पूजा हर पूजामे हमलोग करते है और आज तो उन्हीकी पूजा का बड़ा भारी आपलोगोंने आयोजन किया है। लेकिन जब हम किसी भी चीज की पूजा करते है तो उनमे बोहोत सारी विविध स्वरुप की मांगे होती है। कुछ लोग

होते है कामार्थी होते है, कुछ लोग पैसा मांगते है, कुछ लोग कहते है हमारा कार्य ठीक से हो जाय, कुछ कहते है की हमारी दुनियामे बड़ी शोहरत हो जाय, सब दूर हमें मान मिले। कोई कहता है की हमारी नौकरी अछेसे चली तो अच्छा है, कोई कहता है हमारा बिज़नस चलना चाहिए , कोई कहता है हमारे मकान बनने चाहिए। ये सब कामार्थी बाते है। और इसी तरहसे मनुष्य की मांगे होते होते वोह गणेश की पूजन करता है। यहाँ पर जो सिद्धि विनायक है उसकी भी जागृति मैंने बहोत साल पहले की थी। सब लोग उस सिद्धिविनायक के पास जा करके हमें ये चीज देदो हमें वो चीज देदो मांगते है। लेकिन ये सिद्धिविनायक है। ये चीज देनेवाला नहीं है , ये वस्तु देनेवाला नहीं है। उसकेलिये दुनियामे बहोतसे चमत्कार करनेवाले बैठे है जो आपको हिरे दे देंगे पन्ने दे देंगे और आपका सर्वस्व छीन लेंगे।

ओमकार स्वयं निराकार है, उसका कोई आकार ही नहीं है। तो सर्वप्रथम जो ki गणेश का स्वरुप था वो निराकार का था। आज हम उनकी साकारमे पूजा करते है लेकिन सहज्योगियोंको जानना चाहिए की हमारे जीवनका अंतिम लक्ष्य क्या है , हम क्या चाहते है , उसकी पूर्ति हमने की है ? हैवे वी फुलफील्ड़ आवर डेस्टिनी (have we fulfilled our destiny) ? हम किस लिए सहज योग में आए है? इस लिए आये की हमारी तंदुरुस्ती ठीक हो जाये, हमारा बिज़नेस ठीक हो जाये और हमें बड़ी  मान्यता मिले, इलेक्शन में जीत जाये। ये तो सभी मांगते है। इसमें कौनसी बड़ी विशेषता है, लेकिन सहज योगियोंको ये सोचना चाहिए की आज जो हम एक नए स्तर पर उठ खड़े हुए है, एक नए मंजिल पर खड़े हुए है, तो इससे हमें क्या पानेका है ? और हमारी क्या इच्छा है ? फिर यही बात आती है, जिस गणेशको आप पूजते है आज साकारमे उसे हमें निराकारमे प्राप्त करना है। उसको अपने अंदर प्राप्त करना है, अपने अंदर विराजना है। ये नहीं की गए उनको फूल चढ़ाने , ये तो सभी करते है। उनको फूल चढ़ा दिया, उनकी पूजा

कर दी , माँ की भी पूजा हो गयी, गौरी की भी पूजा हो गयी। लेकिन उसकी शक्ति आप अपने अंदर संगृहीत कर सकते है, उसका आप परिणाम दे सकते है। अपने चित्त को , अपने मनको , अपने बुद्धिको , अपने वाणीको भी शुद्ध कर सकते है, और उसके अलावा आप दूसरोकों भी ये शुद्धि दे सकते है। ये गणेशहि के जैसा आपको बनाया। हमने आपको आत्मसाक्षात्कार, जिस तरह से गणेशजी को बनाया गया उसी प्रकार आपको बना दिया गया। उसमे कोई फर्क नहीं। एकहि तरहसे, एकहि ढंगसे बनाया गया लेकिन कहाँ गणेश ?

सो आप जब गणेश की पूजा करते है तो आपको ये  सोचना चाहिए की हमें निराकार की और उठना है। निरकारसे एकाकारिता लेनी है। हमतो साकारही के पीछेमे दौड़ते है। अभी एक साहब, रीवालीके सहज योगी पूना में आए। आकरके  मुझे कहने लगे की मेरी कृष्णा पूजा भी गयी क्योकि मै पूना नहीं आ सका और येभी पूजा गयी। मैंने कहा ये क्यों गयी ? कहने लगे असल में मै वहांसे गणपति लेकरके आता हूँ अपने भाई के यहाँ और हमारा तीन दिन का उत्सव होता है।  तो गणपति मै लेके यहाँ आया और वहांकी भी पूजा मेरी मिस हो गयी। माने अदन्यान अभी तक वहीँ के वहीँ बैठा हुआ है। यहाँ की पूजा मिस करके आप दस पंधरा रुपयेका गणपति  यहांसे खरीदकर ले गए, माने गणपतिको ख़रीदा भी जा सकता है। आप हमें नहीं खरीद सकते है पर गणपतिको आप खरीद सकते है। और फिर  गणपति के नाम पर जो धंधे कर रहे हैं। इसीलिए पुना में आजकल बरसात हो रही है और तब तक बरसात होनी चाहिए जब तक गणपति विसर्जित नहीं होता।  विसर्जन करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। वही भीग भाग करके विसर्जित हो जाएंगे। वहांके गणपति के जो किस्से सुने हैं तो मैं अवाक रह गई की श्री गणपति को बिठाया है और उसके सामने शराब पीते हैं। वहां बैठ कर शराब पीते हैं। गंदे गंदे गाने गाते हैं। उसके आगे गंदे गंदे नृत्य करते हैं। और सब गंदी तरह की औरतें वहां जमा रहती है और सब तरह के धंधे करते हैं। यह गणपति की विडंबना हो गई।

अब एक ये मार्ग लोकमान्य तिलक ने बताया था कि गणपति  को सामाजिक बना दीजिए और समाजिकतमे जो है आपके सामने चीज ऐसी रहेगी की जिसके सामने आप बड़े बड़े ऐसे संगीत या व्याख्यान मालाओं के कार्यक्रम बनाये जिससे लोगोंमें  एक तरह का जागरण हो जाए। पर यह तो अच्छे भले लोगों को खराबी के रास्ते पर ले जाने की पूरी व्यवस्था

ऐसे गणपतियोने की है।  जितना बड़ा गणपति उतना ही वहां पाप ज्यादा। और ऐसे गणपति के सामने पाप करने से वो कोई छोड़ेगा  ? वो इन लोगों को छोड़ने वाला  नहीं। जब तक हम बैठे हैं ठीक हैं, लेकिन बाद में वो ठिकाने लगा देंगे। क्योंकि वो जानते हैं कहां-कहां काम करना है और कहां मेहनत करनी है। अब मुझे यही डर लगता  है कि होने वाला क्या है? पुण्य पटनम  जिसे कहते हैं। ऐसे पुणे  शहर में वैसे ही एक राक्षस बैठा हुआ है। और भी बहुत सारे वहां इकट्ठे हो गए हैं। उसके अलावा यह जो गणपति के नाम पर अनाचार शुरू कर दिया है उसे क्या कहा जाए ?

क्योंकि परमात्मा का इनसे संबंध नहीं है। गणपति की पूजा करना है ना ? अच्छा गणपति जी बैठ जाइए, तो बैठे हुए हैं। हमने आपको खरीद कर लाया। आप गणपति को बैठा दीजिए और उनके सामने जो भी करना है वह करिए वह तो मिट्टी है हमने खरीद कर लाया बाजार से और फिर हमारे ही हाथ में है ; जब भी चाहे विसर्जित कर दे ।

मनुष्य के अहंकार ने उसे  इतना नीचे तक उतार दिया है की वह भगवान के नाम पर हर तरह  की बुराइयां करता है ऐसे तो आप देख ही रहे है की हर मन्दिरमे आप जाइये , तो वहांपर देवियोंके मंदिरोंमें भूत नचाते है बिल्कुल बेशर्म जैसे।

उन्हें कुछ मालूम नहीं क्या आफत सकती है। आज हम बहुत धर्म धर्म करते घूम रहे हैं लेकिन धर्म का जो हाल है उसका तो किसी को ध्यान ही  नहीं है। अब धर्म को राजकारण में लाने का फायदा क्या ? धर्म ही नहीं रहा। हर एक धर्म में यही है। एक धर्म में बात हो तो आदमी बात करें की यह खराब है की वो खराब है। हर धर्म इस तरह से चल पड़ा है।

सो गणपति को जब आप लोग पूजते हैं तो आपको पता होना चाहिए कि आप सहयोगी है आप योगी जन है कृषि और बड़े बड़े  महान लोगों को भी जो  मिला नहीं वह आपको आज सर्व साधारण तौर पे मिला है। सबको मिला है। रास्ते पर ले आइये । सब कुछ पा लिया। लेकिन जब हम कोई बात कहते हैं तो आप लोग अपनी तरफ कभी भी नहीं देखते। आप सोचते हैं की मै किसी और को कह रही हूं।  यह नहीं सोचते कि हम भी उसी में से हैं, कि हमारी दृष्टि कहां है ? हम क्या सोचते हैं ? माताजी देखिए यह मैं एक घर ले रहा हूं इसको आप आशीर्वाद दीजिए। अरे भाई तुम हो तो वहां आशीर्वाद तो होना ही हुआ। अच्छा नहीं माता जी देखिए मेरी चाबी जो है मोटर कि उसको  आप  आशीर्वाद दीजिए। तो चाबी लिए खड़े हैं। मैं तो ऐसा आशीर्वाद दूंगी कीगाड़ी चलेगी ही नहीं। और फिर जबरदस्ती करना कि आप मेरे घर आओ। और फिर वहां जाकर हम सुनेंगे कि मेरा बिजनेस ऐसा है वैसा है। यह सहयोगियो के लक्षण नहीं है। सहज योग जो करते हैं उनको याद रखना चाहिए कि हमें निराकार में उतरना है।  याने  आप निराकार नहीं होने वाले, साकार में रहते हुए ही  आप निराकार के पूरी तरह से माध्यम बनने वाले है ।

आपसे तो अच्छे रेडियो है, जो रेडियो बना दिया। जिसने रेडियो बनाया और उसका कनेक्शन किया तो उसमें से संगीत सुनाई देता है। रेडियो धूल तो नहीं फेकता। तो सर्वप्रथम हमारे अंदर गणेश जी को अगर जगाना है, सिर्फ पूजा मात्र ही नहीं, हमें उसे अगर जगाना है तो सर्वप्रथम हमें देखना चाहिए की हमें  शुद्ध होना है। हमारे अंदर शुद्धता आनी चाहिए। तो सबसे पहली

शुद्धता है कि हमारी जो मौलिक बातें हैं उसकी और ध्यान दिया जाए।  आजकल के सिनेमा और आजकल की सब चीजे आने से हमारी आंखे तक खराब हो गई और वो अभोदिता, वह निश्चल और निरवाज्य प्यार संसार से मिट गया है। कोई सोच भी नहीं सकता ऐसा कोई प्यार कर सकता है। और इस उडेडबुन में मनुष्य रहता है किस तरह से हम इस कार्य को ऐसा करें कि जो सहज योग भी चलता रहे और हमारे ये धंधे भी चलते रहें। जैसे कल एक देवीजी आकर मुझे  कहने लगी कि मेरे पति एक दूसरी औरत के पीछे में पागल है। मैंने कहा उसको छोड़ो। नहीं वह कहते हैं मैं तो परम सहयोगी हूं, मुझे कैवल्य मिल गया है। माताजी  से संबंध  मेरा और है और यह संबंध मेरा और है। मगर के ऊपर चढ़ के आप नाव में नहीं उतर सकते।  और जो लोग इस तरह के कामों में और इस चीज में अभी उज्जवल उलझ रहे हैं उसको उचित है कि वह सहजयोग छोड़ के हमें रिहाई दे। और अपने से छुट्टी पाए । उनको जो होना है तो होगा ही लेकिन सहज योग बेकार में बदनाम होगा। अभी भी अगर चित्त इस तरह से उलझता है तो समझ लेना चाहिए कि जिसे कहते है की  बिल्कुल ही बुनियादी चीज (basics) आपने नहीं पाया है गणेश जी के।

जरा महाराष्ट्र में यह चीज की अक्ल कम है।  लोगों को औरतों के पीछे भागना समझ नहीं आता। यह अजीब चीज मानी जाती है। बस अपनी यही किसीसे शादी हो जाए चलो अपनी बीवी हो गई। इस तरह से वो आ जाता है। यहां पर औरतों का पागलपन नहीं है। लेकिन मैंने सुना है की साउथ इंडिया में भी बहुत है। एक कोई राजा थे  और सुनते हैं कि उनकी 12000 पत्नियां थी। बड़े आश्चर्य की बात है। उनमें से कुछ तो पैदल चलती थी बेचारी , कुछ पालखि में और कुछ घोड़े पर और कुछ हाथी पर ; फिर उनको ये  इच्छा हुई की एक और औरत करनी चाहिए। तो उन्होंने उस औरत की कोशिश करी, तो उस औरत ने मना कर दिया। मुझे नहीं आपके इसमें शामिल होना। तो उन्होंने चढ़ाई कर दी। उस वक्त में एक मुसलमान राजा वहां पर था तुघलक । उसने उस चढ़ाई का मुंहतोड़ जवाब दिया और वो हार गया और उसकी 12000 औरतें भी भाग गई। उसको एक औरत कठिन गई।

सो हमारे सहयोगियों को भी समझना चाहिए कि हमें किस तरह से अपनी शक्ति को अपने अंदर पूर्णतया जीवित रखना चाहिए। और किस तरह से हमें अपनी virginity  पर, अपनी कुंवारी अवस्था पर, अपनी गौरी स्थिति पर बहुत गर्व होना चाहिए। क्योंकि यही स्त्री की शक्ति है। अगर स्त्री की शक्ति छीन जाती है तो फिर ऐसी स्त्री किसी काम की नहीं रह जाती। और इसलिए ऐसी स्त्री को कोई पूछता भी नहीं और उसे मानता भी नहीं । हालांकि आजकल आप लोग दुनिया में देखते हैं कि लोग जो है बहुसंख्य है। ये लोग ऐसी औरतोंको मानते  हैं जो बिल्कुल गंदगी से लबालब है, जिनमें पवित्रता छुई भी नहीं। जो यह सो  बहुसंख्यक है तो एकहि मार्ग से जा रहे हैं, नर की और। वहां बहुसंख्योंका  जो हाल होने वाला है वह मुझे आज ही दिखाई दे रहा है। बहरहाल आप बहुसंख्य नहीं है आप अल्पसंख्या है और आपकी स्थिति और है। इसीलिए जान लीजिए कि इस तरह के कामों में उलझना आपको बिल्कुल शोभा नहीं देता। पर अभी भी थोड़े थोड़े लोगों में  मैं देखती हूं की उनका चित्त इधर-उधर बहुत घूमता है। यह तो सबसे प्रथम चीज हमें जाननी चाहिए की है प्रथम चीज हो है की  कम से कम हमारी नैतिकता ठीक होनी चाहिए।

अब दूसरी चीज जो हिंदुस्तानियों में है खास करके जो परदेस में छूटी है। उनके यहाँ  नैतिकता का बल कम है लेकिन भौतिकता का बल वहां जबरदस्त है। क्योंकि उनको भौतिक चीजोंमें  दिलचस्पी नहीं है। भौतिक चीज उनको कोई मनोरंजक नहीं लगाती । पर हिंदुस्तानियों तो चाहते हैं कि हर एक दुकान में जब तक उसका सब एडवर्टाइजमेंट ना पड़े तब तक उनको चैन नहीं आता। पीछे  मुड़ मुड़ के पढ़ेंगे advertisement ।  यहां क्या लिखा है, वहां क्या लिखा है,यहाँ क्या खरीदना और वहां क्या खरीदना है। और जब परदेस में भी ये जाते हैं तो बाजारी की धुन में रहते हैं। बहुत शर्म आती है और जब यहां से भी परदेस में जाते हैं, शादी-वादी होकर जाते हैं, तो वो तो इस कदर भौतिक बन जाते हैं, हमारी समझ में नहीं आता है की उनकी भौतिकता क्या है ? गणपति पुले में भी लोग कहते हैं की हमें १ चीज मिली है पर अभी तक यह चीज नहीं मिली। तो यह भी दे दीजिए। कितना ओछापन ? सब पैर की ठोकर पर होना चाहिए तब आपने कही अपनी आंख उस निराकार  की ओर उठाई कि जहां सारी भौतिकता ठोकर पे हैं । जब तक यह शान आपके अंदर नहीं आएगी तो आप कहां के सहयोगी हो सकते हैं ?

तुकाराम को देखिये आप जिस पोजीशन में हैं उस तरह से रहिए। राजा जनक थे । राजा थे तो राजा बनकर रहते थे। सब ठोकरों पे चीजे रखते थे। जब तक आपके अंदर यह भौतिकता बंदी हुई है तो आप का  पहला ही  चरण मंदिर में नहीं आ सकता श्री गणेश जी के। ठीक है मां देना चाहती है क्योंकि इस तरह से तो मैं जता सकती हूं कि आपको प्यार करती हूं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मेरे लिए वह बहुत बड़ी चीज है। बहुत बार शब्दों से नहीं कहां जा सकता, मेरे कटाक्ष को आप समझ नहीं सकते। तब हो सकता है चीजों से मैं जाहिर करना चाहती हूं कि मैं आपके साथ हूं और आप मेरे साथ है। आप मेरे बच्चे हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप पागलों जैसे भौतिकता पर जुड़े रहें और कभी-कभी तो इतना कमाल होता है किसी को कोई चीज दे भी दो तो वह कहती है यह तो चीज मैं पहनती नहीं हूं मुझे यह चीज नहीं चाहिए मुझे दूसरी चीज चाहिए वैसी मैं पहनती हूं। धन्य है आपकी। अरे भाई शबरी के जिन्होंने झूठे बेर खाए, विदुर के घर जाकर जिन्होंने साथ खाया, ऐसे सब महान हमारे सब लोग है और आपके सामने भी है। आपसे कोई छिपे नहीं। तो फिर इस तरह की बातें करना ओछापन है। अगर मां ने छोटी सी भी चीज दी है तो उसे उसको बहुत ऊंचा समझकर सर पर रखना चाहिए। यह तक

अगर आपको नहीं आता है तो आपकी सारी फैशन बेकार है। जो चीज श्री गणेशजीकी है उसमें सबसे पहली चीज है की  मनुष्य को अपना चित्त स्वच्छ कर लेना चाहिए। चित्त स्वच्छ करने का तरीका ये है की चित्त कहां है आप का ? चित्त अगर परमात्मा में है तो शुद्ध है क्योंकि चैतन्य आप मैं बह रहा है। अगर आपका चित्त इधर उधर है तो उस चित्तका फ़ायदा क्या ? जबतक आपका चित्त शुद्ध नहीं होगा तबतक आप ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकते क्योंकि चित्त मेही आपका सारा चैतन्य बह रहा है। चित्तसेही आप सब जानते है। जिसका शुद्ध चित्त होता है सिर्फ विचार मात्र से कार्य हो सकता है। ध्यान देने से ही कार्य हो सकता है और कभी-कभी तो उसकी भी जरूरत नहीं पड़ती । जिस शक्ति को आप प्राप्त करना चाहते हैं, जीसेकी आपकी अंतिम जो कुछभी , जिसे आप ध्येय कहिये, या अपना लक्ष्य है जिसे आप प्राप्त करना चाहते है , वो चैतन्य जिसे आप अंदर बसाना चाहते हैं, जिसके अंदर ये शक्ति है जिस शक्ति के कारण आप अनेक कार्य कर सकते हैं, उसको छोड़ कर के  आप क्यों ये  बेकार की चीजों के पीछे पड़े हैं? चित्त सारा इसमें ही रहेगा की सहज योग में आने से हम कितने रुपए पैसे कमा सकते हैं।  नहीं तो क्या-क्या चीज मार सकते हैं ? उसे जरा ऊंचे उठे तो इसमें चित्त रहेगा की हमें  किसी तरह से अपनी बीमारी ठीक कर ले। उसके बाद और चित्त  उठा तो ज्यादा से ज्यादा  ये ही मां के दर्शन होनी चाहिए। हर जगहसे , कभी औरंगबादसे तो कभी संगमनेरसे तो कहीं औरसे लोग बस आ जाते है। दिल्लीसे , कल्कत्तेसे जम गए। हम जान करके (मराठीमें मुद्दामून ) आये। क्यों आये भाई ? मेरे पास टाइम नहीं है। तो सबसे लड़ाई करनेका की माँ के दर्शन करने हैं। दर्शन तो तुम्हारे हृदय में ही हो सकते हैं।

अरे तुमको इतनी शक्ति दे दी उसके ही दर्शन करो बहुत है। हम तो शक्ति ही है ना ? हमें  निराकार में तुमने प्राप्त नहीं किया है इसीलिए दर्शन चाहिए। की  बैठ करके घंटो इधर की बात उधर की बात, समय बर्बाद करना। क्या जरूरत है ? शक्ति स्वरूप होने में आप स्वयम शक्ति हो सकते हैं। लेकिन यह रुकावटें कब जाएँगी और कब हम समझेंगे कि हम स्वयं वो शक्ति स्वरुप हो सकते हैं और हमारे अंदर इतनी शक्तियां हैं। उसके  अंदर हमें रमना चाहिए जिसके कारण कुछ भी न करते हुए सारा काम हो जाए । लेकिन यह विचार दिमाग में नहीं आता आसानी से । अज्ञान ही नहीं, सिर्फ अज्ञान हो तो मैं कहूंगी ठीक है  सिर्फ अज्ञान है। लेकिन अज्ञान ही नहीं है, लालच जो जकड़े हुए हमें, और दूसरी ममता, माया – यह मेरा बेटा यह मेरी बेटी। और जिस वक़्त आप इसे सोचते हैं तो तब यह भी सोचना चाहिए कि हम माके भी तो बेटे हैं, उनकी भी तो बेटी है और उनके ही अब हम बेटे हैं। सहज योग में आने के बाद आपका जीवन बदल गया आप दूसरे खानदान में चले गए, आपका घर बदल गया, आप का गोत्र बदल गया, आपकी जाति बदल गई, आपका धर्म बदल गया, आप पूरी तरह से बदल करके एक नए व्यक्ति हो गए, नए मानव हो गए है वो क्यों ? क्योंकि आपकी मां ने आपको जागृति दी है। तो आप सब पूरी तरह से बदल गए जैसे एक गणेश जी को बनाने से हमारे हजारों काम, करोड़ो काम हो जाते हैं क्योंकि उनके अंदर पूर्णतया मांपे ही श्रद्धा मां के लिए सब पूर्णतया शरणागत होने की स्थिति है।

सो जब तक वह शुद्धता हमारे हृदय में नहीं आएगी, जब तक हमारे मन में हम उस शुद्धता को प्राप्त नहीं करेंगे तब तक वह शरणागति आएगी नहीं। यह तो ऐसा ही है की जब तक आप गंगा पर नहीं जाएंगे और उसमें गगरी नहीं डुबाएंगे और गगरी के अंदर जगह नहीं होगी तो उसमें पानी कैसे आएगा ? यह सीधा हिसाब है। सो जरुरी है कि हम अपने चित्त को

शुद्ध करें, और चित्त को शुद्ध करके और वो  शुद्ध चित्त ही हम अपनी मां कोदे सकते हैं। अशुद्ध चीज से तो हमें तकलीफ ही होती रहती  है। और जब शुद्ध चित्त होता है तो आपको आश्चर्य होता है कि आप स्वयं ही एक पुष्प की तरह महकते रहते हैं, और आप को देख करके मैं भी बहुत प्रसन्न हो जाती हैं हूं की क्या मेरा बेटा खड़ा हुआ  है क्या मेरी बेटी खड़ी हुई है। और सब चीजोंसे मुझे प्रसन्नता नहीं होती कि आप बड़े अच्छे कपड़े पहन के मेरे सामने खड़े हो जाए, सूट बूट पहन के, या बाल कटा के, या मुंह में लिपस्टिक लगाकर लगा के। उसे

मुझे बिल्कुल प्रसन्नता नहीं होती उल्टा मुझे लगता है कि यह  जा रहे हैं, अब रस्ते से हट रहे हैं। इस तरह की जो आधुनिकता है उसे प्राप्त कर लेना गणेश से मुंह मोड़ लेना है। इसकी क्या जरूरत है ? वह तो पुरातन है, और हम भी बहुत ही पुरातन है, इसलिए अगर आप हमारे बेटे हैं और हमारी बेटियां है तो जिस संस्कृति को हम पुरातन मानते है उसी से आपको चलना होगा और रहना होगा। और इसका नजारा बहोत खराब दिखाई देता बाहर। लोग हमसे खुद कहते है की जो फॉरेन के लोग है वो हमें कहते है की आप हमें आज्ञा दें दो तो हम साड़ियां और कुर्ते पजामे पहनकर घूमेंगे। लेकिन हमारे यहां उलटा है।

तो जो गणेश की संस्कृति है जिस संस्कृतिकी अन्तरतम जो स्थाई भाव है वह है सौंदर्य। अब आप देखिये की ऐसे तो वह बहुत मोटे हैं, वो इतने बड़े है महा काय है, गणेश इतने मोटे दिखाई देते हैं। लेकिन उनका सौंदर्य क्या है ? किस चीज का आकर्षण है ? लोकमान्य तिलक ने क्यों गणेशही  की मूर्ति को माना ? ऐसे तो महाराष्ट्र में विठल विठल ही लोग करते रहे हैं सुबह से शाम तक। वहां के विट्ठल भी उठ गए, यहां तो विट्ठल ही  की बीमारी है सबको तंबाकू खाकर। लेकिन क्यों लोकमान्य तिलक ने श्री गणेश को ही पूजा और क्यों वही सारे दृष्टि की जितनी भी सुंदरता है उसे बनाते हैं। उनका कौनसा स्थाई भाव है जिसके बगैर श्री राम, श्री कृष्णा, ईसा मसीह , या बुद्ध  या कोई भी नहीं सौंदर्य वह कर सकते थे। वह कौन सा उनके अंदर भाव था? उनके अंदर वही बाल्य स्वभाव, एक बालक का स्वभाव जिसमें अभोदिता – innocence पूरा भरा है।   – पूरा innocence जिसके अंदर भरा होता है । यही चीज जो है जो सबसे मोहक और सुंदर होती है, ना की आप की चालाकी और आपका बन्ना थन्ना यह कोई मोहकता, यह दो क्षणों की बात है। एक मुंह पर लोग अच्छा बोलेंगे और पीठ पीछे बुरा कहेंगे, लेकिन जो अभोदिता श्री गणेश की है, वही सारे सौंदर्य की सृष्टि, सारे संसार में है।

तो सारी सृष्टि का जो रूप है वह श्रीगणेश की कार्रवाई है। उनकी जो बालिश बाते है। श्री कृष्ण का भी वही वर्णन सबसे अच्छा लगता है जो सूरदास ने किया है। कैसे वह चलते थे और कैसे उनके पैनगन बजते थे, गिर जाते थे और आश्चर्य की बात है कि वो  शीशे में अपना स्वरूप देखकर बड़े खुश होते थे हालांकि वह विश्व के करता है। जहां उन्होंने अपनी मां को अपना मुंह खोलकर सारे विश्व का दर्शन कराया और बच्चों जैसे  बातें करते थे। श्री राम के लिए भी यही कहा गया है। ईसा मसीह के बारे में लोगों ने उनका बचपन बताया नहीं, लेकिन उनका बचपन श्री गणेश के रूप में आप जान सकते हैं और इसी  लिए जहां जहां बचपन  का लोगोंने  उल्लेख नहीं किया तो बड़ी भारी गलती कर गए क्योंकि ऐसे लोगों में आनंद और उल्हास नहीं होता, रोने धोने का धर्म बन गया। जैसे आप देखते हैं कि जैनिओमे रोने धोने का धर्म है , बुद्ध मार्गियोंमे रोने धोने का धर्म है, मुसलमानों में रोने धोने का धर्म है, बाप रे बाप उनसे तो भगवान ही बचाए रखें और ईसाईयों का तो बहुत ही रोने धोने का धर्म है।  इसाह मसिहने सबके लिए अपनेको क्रूज़पे टांग लिया और सबके पापोंकी क्षमा मांग ली एक बार में । अब आपको आश्चर्य होगा की ऐसी ऐसी जगह है जहाँ इसाह मसीह को टांग नहीं सकते तो खुद ही तंग लेते है और बड़े प्रोसेशन के साथ वो टेंगा हुआ आदमी सब जगह  घुमाया जाता है। बताइए इस तरह के  तमाशा करने से क्या  आप  ईसा मसीह को प्राप्त कर सकते हैं ?

सो जो आनंद है उस आनन्दको प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम आपको गणेश जी जैसे होना चाहिए। उसकी और कौन ध्यान देता है ? आज पूजा के बाद भी क्या आप सोचिएगा कि मां ने हमसे बताया की गणेश जी जैसे अबोध होना चाहिए। चलो कोई आपको ठग भी ले। हमें भी बहुत लोग कहते हैं कि माँ आप बहुत सीधी है, आप बहुत भोली है, आप को लोग ठग लेंगे। मुझे ठगनेवाला अभी तक पैदा नहीं हुआ, लेकिन मैं। ….disconnected ………..29.30.. ….. मैं जानू तो कि तुम कैसे ठग हो, नहीं तो मैं जानूँगी कैसे की ठगी क्या होती है ? क्योंकि मुझे तो मालूम ही नहीं ठगी चीज क्या होती है ? जब यह मुझे ठगते हैं तब मुझे पता चलता है कि यह ठग है और यह ठगी होती है। फिर उधर चित्त देने से वह ठग भी खत्म हो जाता है और ठगी भी ख़तम हो जाती है। तो जरुरी है कि मनुष्य को उस भोलेपन को स्वीकार्य करना चाहिए। शंकर के लिए भी यही कहा जाता है कि वे भोले है, उनमें भोलापन है। कौन से ऐसे देवता हैं जिनमें भोलापन नहीं है ? देवी के लिए कहते हैं कि जिस वक्त उनको बहुत क्रोध आया और उन्होंने सारी दृष्टि का संहार करने का विचार कर दिया, बिलकुल तंग आ गयी, तब सब लोगों में हाहाकार मच गया जब मां ही बिगड़ गई तो अब क्या होगा हमारा और सबको लगा कि अब तो हमारा सर्वनाश हमेशा के लिए हो जाएगा और फिर से सृष्टि की रचना नहीं होगी। उस वक्त शंकर जी को एक बात सूझी कि उन्हीं के बच्चे को उनके पैर के नीचे डाल दिया पहले की तोडना है तो इसी बच्चेको तोड़ो। इतनी बड़ी जीब उनकी निकल आई। बाप रे, मैं अपने बच्चे को ही मिटा रही हूं ?

यह बच्चों के तरफसे जो हमारे लिए एक तरह से प्यार, आल्हाद, एकता और जिसे हम कहते है  एकाग्रता, समग्रता ये प्राप्त होता है। सब ने कहा है कि बच्चों के कारण दुनिया एक हो जाती है। जब एक बच्चे पर आफत आती है तो सब मां- बाप की आंखें उस बच्चे की और दौड़ती है इस बच्चे को बचाओ। क्योंकि हम लोग विश्वव्यापी है एक तरह से। सबसे बड़ी चीज है कि बच्चों को पनपने देना चाहिए। यह विश्वव्यापी शक्ति है और इसका एहसास, इसका अनुभव हम सबके अंदर है। इसीलिए ईसा मसीहा ने कहा है कि तुम को अगर परमात्मा के साम्राज्य में जाना है तो छोटे बच्चों जैसे तुम्हें होना चाहिए।

यही गणेश की पूजा है जहाँकि वो अभोदिता है। और उनका सहज नृत्य जो है, सहज झगड़ा जो है, सहज बातें जो है वो  कितनी सुंदर लगती हैं ? उसके हर एक जगह आपको दर्शन होते हैं और आप देखते हैं। पर उसके अंदर आप में अगर ममत्व आ जाए, बच्चों में बिल्कुल ममत्व नहीं होता। वह हर चीज को खेल बना देगा। आप उनको अगर एयरपोर्ट पर ले जाइए, तो वहां वह कुछ ना कुछ खेल ढूंढ लेगा, कूदनेका हिसाब , या दौडनेका हिसाब या तो कुछ न कुछ वो खेल बना देते है । हर चीज उनके लिए लीला है और फिर उसे छोड़ भी देते हैं। उसे अटैचमेंट नहीं। उसके साथ झूठा पन नहीं है कि यह खेल मेरा है। जब ये हो जाता तो सोचना  चाहिए कि बच्चा जो है उसमें अभी बहोत बच्चापन नहीं रहा। जो बच्चा होगा तो तुमको चाहिए तो तीन बार लाकर देगा। कोई खेल खेल रहा है तो उसे छोड़कर दूसरा खेल खेलने लिए भाग जाएगा। उसको  किसी के प्रति यह नहीं लगता है कि हमें इसे चिपकना चाहिए या कुछ रहना चाहिए ।

वो जो भोलापन है, उस भोलेपन में उस एक चिजकी न्यूनत्व है वो आपमें पूरी हो गयी है क्यों की उनको कोई ज्ञान नहीं है, बगैर ज्ञान के  भोला पन है। लेकिन आपने ज्ञान को पाया है और उसका सरताज आपका भोलापन है। इतने बड़े ज्ञान को प्राप्त करके भी अगर हमसे उस चीज की प्राप्ति नहीं हो सकती, उस गणेशकी श्रद्धा और उसकी समर्पण शक्ति को हम अपने अंदर प्राप्त नहीं कर सकते तो बाकी सब करना तो व्यर्थ ही है एक तरह से मेरे ख्याल से बिल्कुल यह उस मशीन की तरह है। आये मंत्र कहे डाले गणेश के। मै तो सोचती हूँ की इतनी पूजा में इतनी बार  हम गणेश को पूजते है। ठीक है उनका मंत्र जरूर कहा करिये लेकिन मेरे ख्याल से गौरी की पूजन  ही ठीक रहेगी। वह चालना देती है, वह कुंडलिनी है, वह आपको उठाती है।

गणेश को आपका साकार ही में देख सकते हैं। अब निराकार में देख नहीं पाते क्योंकि अभी तक आपने गौरी का संचालन नहीं किया और गौरी का आसरा नहीं लिया। आप सिर्फ गणेश ही को ही देखना चाहते हैं। आज गौरी का ही दिन है ऐसा कुछ इत्तेफाक है की सहज योग में हमेशा सहूलियत से पूजा होती है। मुहूरत से नहीं होती। कुछ भी हो, सहूलियत होनी चाहिए, संडे का दिन होना चाहिए और संडे के रोज में भी वो टाइम होना चाहिए जब सिनेमा नहीं हो। मैंने आजतक संडे को कोई सिनेमा ही नहीं देखा और मुझे समजमे नहीं आता की संडे को सिनेमा होता है की नहीं होता है। पर संडे को सिनेमा होता है इसीलिए पूजा सवेरे ही रखना अच्छा। माँ जल्दी आप ख़तम करना क्योंकि वहां सिनेमा का टाइम हो जाता है।

यह अगर हमारी स्थिति है तो क्या फायदा है गणेश जी की पूजा करके। अगर हमारा चित्त  ऐसी ही चीजों में उलझा हुआ है तो आप लोग यह समझ लीजिए कि इसका कोई इलाज हम नहीं कर सकते। इसका कोई इलाज नहीं है। सो चित्त को जो है हर समय आपको देखते रहना चाहिए कि इस में कौन से विचार खड़े हो रहे हैं ? उसपर नामदेव ने कहा हुआ है कि जैसे एक छोटा बच्चा हाथ में पतंग की डोरी लिए हुए सबसे बातें कर रहा है, खेल रहा है, हंस रहा है, मजाक कर रहा है। लेकिन उसका चित्त पूरा उस पतंग की ओर है। उसी प्रकार एक योगी जन को अपना चित्त पूरा उस पतंग पर रखना चाहिए। अपने आत्मा पर। नहीं तो यह सारी शक्तियां जो दी भी है उसकी कोई पूर्ति नहीं हो सकती उसका कोई प्रादुर्भाव नहीं हो सकता। कुछ स्फोट नहीं हो सकता। बहोतलोग पूछते हैं कि मैं ऐसा क्यों होता?

जैसे कि आप जानते हैं कि कोई सी भी स्पुटनिक जैसी चीजे जोकि आकाश में और अंतराल में जो फेकि जाती है उसका तरीका यही है की जब एक के अंदर एक बिठाये जाती है जातीहै, और जब पहला एक हद तक पहुँचता है तो उसमे एकदम स्फोट होकर उसको धकेल देता हैं। फिर दूसरा वाला फिर स्फोट होता है उससे दूसरा धकेला जाता है इससे अक्सेलराते होती है उसकी शक्तियां माने उसमे एकदम बढ़ावा आ जाता है। ऐसे ही स्फोट हमारे अंदर क्यों नहीं हो जाता है ? क्योंकि अभी भी हम 10 पैसे में खरीदे जाने वाले गणपति जैसे ही है। इस वजह से। अगर असली गणपति हो तो उसका स्फोट होना चाहिए और लोगों को पता चलना चाहिए की एक-एक आदमी क्या कमाल का है। वैसा नहीं होता है।

हम अपनी ही चीजों में उलझे रहते है। अपनेही बातों में, अपनेही बारेमे सोचते  है और हर समय सोचते हैं कि इसमें हमारा क्या लाभ है सहज योग में आने से? असल में पूरा ही लाभ है। क्योंकि जिस वक्त आप अपने सिंहासन पर बैठ गए तो पूरा राज आपका की है लेकिन आप सिंहासन पर न बैठते हुए हर दरवाजे पर जा कर भीख मांगेंगे तो आप तो भिखारी ही है। आपको सिंहासन पर बैठा ने का फायदा क्या? और सिंहासन पर बैठकर भी आप कहेंगे कि, माताजी को, की आप थोड़ा रूपया पैसा देदो तो इस चीज का क्या अर्थ हो सकता है?

गणेश की शक्ति अगर अपने अंदर जागृत करनी है तो सबसे प्रथम जानना

चाहिए कि हमें निराकार की और चित्त देना चाहिए, चैतन्य की और देना चाहिए  और चैतन्य जो हमारे अंदर से बेह रहा है उसको देखना चाहिए। जिनका चैतन्य दूषित है वह यही कहेगा मुझे भूत लग गया। क्यों लगा? गणेश को कभी भूत नहीं लग सकता ।

तुमको तो अपने शरीर में मैंने स्थान दिया है, ऐसा तो किसी ने नहीं किया होगा। और मै  तकलीफे उठाती हूं आपकी सफाई के लिए।  लेकिन आप लोग अपनी सफाई क्यों नहीं कर सकते? और आकर लोग कहेंगे मां मेरा आज्ञा पकड़ गया, मुझे अहंकार हो गया। क्यों हुआ? सब करने वाला जब परमात्मा है तो आपको अहंकार क्यों हो गया ?उसकी वजह यह है कि अपने दोषों को हम नहीं देखते हैं, दूसरों में टाल देते हैं और कहते हैं कि यह तुम्हारा काम है, और यह तुम्हारी वजह से है। उसके उलट श्री गणेश है, उनको पता भी चल जाए और मेरी नजर अगर उन पर नहीं हो तो सब को ठिकाने लगा देंगे। मैं आपसे  बता रही हूं। इतने वो माहिर है, होशियार है, सतर्क है, दक्ष है। वो जानते हैं की कहां पर कौन बैठा है? मुझे भी सब मालूम है, यह नहीं कि मुझे नहीं मालूम। लेकिन मैं सुरक्षित रखना चाहती हूँ आपको, लेकिन वो नहीं। वह कहते हैं कि बेकार के लोगों को क्यों मां के पीछे लगाना? वह तो ऐसे ही ठिकाने कर दे।

लेकिन सबसे बड़ी चीज जो मेरी समझ में नहीं आती अबभी, की यह सब होने के बाद आपकी वाणी शुद्ध नहीं। वाणी में बहुत से लोग गालियां देते हैं अभी भी सहज योग में, चिकते हैं, चिल्लाते हैं, जोर से बोलते हैं। उसमें प्रेम, माधुर्य कुछ है ही नहीं। इसका मतलब आप की वाणी भी शुद्ध नहीं। और ऊपर से दांभिकता जिसे कहना चाहिए की ढोंग करना ऐसा दिखाना कि हम बड़े मुस्कुरा रहे हैं, बड़े हंस रहे हैं, बहुत ही खुश हो रहे हैं और अंदर से तो मैं देख रही हूं की उनका ऋदय ही स्वछ नहीं। वह जो असली आनंद का गाम्भीर्य है, उसकी चमक ही और होती है। और हम से तो छीप  नहीं सकती वो। आप कुछ भी पोत के आईये, हम पहचान जाएंगे कि आप कितने गहरे पानी में है। लेकिन वो  किसलिए? हम भी आपको क्यों परखते हैं? किस वजह से परखते हैं ? इतनी मेहनत क्यों करते हैं ? वजह ये चाहते हैं कि आप लोग सब चमक जाएं। लेकिन जब तक आपके मन में अपना हित ना आए, जब तक आप अपने अंतिम लक्ष्य को पूर्ति की तरफ ध्यान नहीं दे और फालतू चीजों में उलझे रहेंगे और उसीसे मुझे तंग करते रहेंगे। मुझसे लोग argue करते हैं और कहते के मां हम आपकी इतनी पूजा करते हैं फिर भी ऐसे कैसे हो गया? क्यों आपके अंदर कोई

दोष नहीं है? आप संपूर्ण हैं ? और तुम कहिए कि आप पार हो गए? इस तरह की जब हम बातें सोचते हैं, तब हमारा चित्त ऊपर की ओर जाता है, और चैतन्य की और हमारे हाथ फैलाए हुए है ,उस वक़्त चैतन्य हमारे अंदर बहना शुरु हो जाता है और इतना खुश होता है वो। कि चलो मेरा स्थान यहां मिल गया। जैसा कोई बाढ आ जाए, उस तरहसे पूरा शरीर अलौकिक हो जाता है।  एक दो आदमियों को अलौकिक करना तो बहुत आसान चीज है लेकिन मैं तो चाहती हूं कि सामूहिकता से हम लोग इस तरह से बने। क्योंकि आज उसकी जरूरत है, नहीं तो सोचो की यह समाज कहां जा रहा है ? एक से एक चोर उचक्के बैठे हुए हैं। सारी दुनिया भर की परेशानियां लोगों को लगी हुई है और इसके अलावा इतनी अनैतिकता मने घोर घोर कलयुग है। आप अपने बच्चोंको इसीमे चाहते है  क्या कर दे ?या आप चाहते हैं की कोई विशेष महान कार्य के लिए आप इस संसार में आए हैं उस कार्य को आप करे।

हो गया आपको पैसों का प्रॉब्लम था सॉल्व हो गया, नौकरी का प्रॉब्लम था सॉल्व हो गया, और कोई प्रोब्लेम्स थे  सॉल्व हो गए , आगे क्या ? अभी लालच तो खत्म ही नहीं हो रही। और उसके लिए भी मुझे परेशान करना हर समय बिलकुल उचित नहीं । सिर्फ मुझसे  प्रश्न सहयोग पर ही करने चाहिए और कोई सा भी दूसरा प्रश्न करना गलत है। और वो भी प्रश्न बेकार में जानने के लिए बहुत सारी बातें करने की जरूरत नहीं। शांति में ही पूछने से अपने आप ही आपको उत्तर आ जाएगा। नहीं तो हर बार आपको मेरा लाउडस्पीकर लगाना पड़ेगा। की मां ने इसमें क्या कहा ? तो औरों में और आप में क्या फर्क है? एक साहब मेरे पास आए, कहने लगे मुझसे भगवान बोलते हैं। मैंने कहा कैसे? कहने लगे मेरे पास गीता है, उसे खोल लेता हूं, जो पेज खुल जाता है उसमे जो लिखा है उसी से मैं समझ जाता हूं भगवान को क्या कहना है। मैंने कहा वाह भई वाह। वही हाल मेरा दिखता है। पेज खोल दो मां, ने क्या कहा? ऐसे कहा। आपके अंदर सुर्जन सकती हैं स्वयं है, आपके अंदर विचार शक्ति स्वयं है। आपके अंदर वो शक्ति है जिससे आप दुनिया को चमका सकते हैं। तब आप क्यों बार-बार यह चाहते हैं माही इस बात पर बताएं? आप स्वयं ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। मैंने देखा उत्तर देने के लिए सिर्फ एक मैं ही हूं। मेरे सामने तो सब प्रोब्लेम्स ही सब लोग लेके आते हैं। इसमें ऐसा प्रॉब्लम है उसमें ऐसा प्रॉब्लम है। लेकिन कोई नहीं मिलता की नहीं इसका सलूशन है मां। आप चिंता न करें हम कर दिखाएंगे। ऐसे भी तो कोई चाहिए जो कहेंगे ये हम कर दिखाएंगे, हैं यह कोई मुश्किल काम नहीं है। 

हर आदमी को जानना चाहिए कि जो भी चीज जिसे आज हम कह रहे हैं भौतिकता, साकार, या कोई  भी चीज है उसमें शक्ति का संचार होते ही वह चीज कुछ और ही हो जाती है। जैसे यह चीज बेकार है, उसमें जैसे ही शक्ति का संचार हो गया तो आप लोग मुझे सुन रहे हैं। इसी प्रकार कोई सी भी जिसे हम कहते हैं की जो  व्यर्थ है , उसमे शक्ति का संचार होते ही वो कमाल की हो जाती है। आपको अपने बच्चों से प्यार है। अच्छा उनमें शक्ति का संचार करो, वह बच्चे कमाल के हो जाएंगे। होही जाएंगे। अगर आपको अपने घर से प्यार है चलो  उसमें शक्ति का संचार करो तो वो मन्दीर हो जाएगा। आपकी बुद्धि में अगर कोई दोष है या आपको हर समय सवालात बहुत दिमाग में आते हैं, आप उसमें शक्ति का संचार करो सब चीज का उत्तर आपके सामने आ जाएगा। आपको मुझसे पूछने की जरूरत क्या है? ……..आदि शंकराचार्य को क्या मै ने जाकर बताया था महीने मैंने तुकाराम को क्या मैंने जाकर बताया था……To be  verified…… सबसे बड़ा ज्ञानेश्वर जी है। अगर उनकी किताबे पढ़ो तो आश्चर्य लगता है, कभी उन्होंने मुझे साकार स्वरुप देखा नहीं, लेकिन उन्होंने शक्ति के …..43min  59 ………not clear………. अगर आप अभी भी साकार स्वरुप से ही तृप्त है तो आप आगे नहीं बढ़ सकते। आपको निराकार में हमें प्राप्त करना होगा जिससे कि आपके अंदर की सृजन शक्तियां बढ़े । श्री गणेश को कहते हैं कि वह हमारे महागुरु है, उसकी वजह यह है कि उनकी शक्ति के संसार से हम स्वयं ही गुरु हो जाते हैं। हम कितनी बार कहते हैं कि हम स्वयं के ही गुरु है, लेकिन ऐसे कितने लोग हैं मुझे नहीं दिखाई देते जो अपनी टांगों पर खड़े होकर कर सकते हैं की हाँ माँ, यहचीज है, इसके हमारे पास उत्तर है।  हमी ईसका उत्तर मांगते हैं और जब वह देने लगते है उत्तर तो वो ऐसे उत्तर होते हैं की सारी दुनिया निरुत्तर हो जाती हैं। क्योंकि जो उत्तर देते हैं इतने अहंकार भरे इतने बेवकूफी के और इतने निम्न स्तर के होते है कि समझ में नहीं आता की ये सहज योगी है की कहाँ जा रहे है। अश्रद्धा वालोंको को नुकसान होता है, यह एक बात है। नुकसान भी होता है और उनको सीखना पड़ता है। उनको बहुत से lessons लेने पड़ते हैं समझ लीजिए। लेकिन वो भी होने के बाद भी आप अगर जिंदगी भर स्कूलों में ही पढ़ते रहे तो आपको नौकरी कैसे मिलेगी ? हर साल अगर आप फेल होते रहे तो आप को नौकरी मिल ही नहीं सकती। परमात्मा आपको क्यों अपना नौकर बनाएगा? तुम कहते हैं हे प्रभु तुम हमें अपना माध्यम बना लो। वो भी तो सोचते है की माध्यम किसे बनाया जाय ? ऐसे दीफेक्टिव लोगों को क्या जरूरत है माध्यम बना करके हर बार आफत हो ? उनकी गाडी ही नहीं चल सकती। हम उनके माध्यम बनने के लिए हमारे अंदर सारी शक्तियां हैं, हमारे अंदर जागृति है, हम उसके बारे में जीतना जानते हैं कोई भी नहीं जानता था। सहस्त्रार के बारे में किसी ने लिखा तक नहीं वो तक हम जानते हैं। सारी चीज आज हमारे सामने पुस्तक के जैसे खुली हुई है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पुस्तक को पढ़ने से हो जाएगा या मंत्र के कहने ही से आप शक्तिशाली नहीं हो सकते। मंत्रा का जो स्थायीभाव पवित्रता है और उसकी फेक, कहते है की कहां नजर है ? जबतक दोनों चीजोंमें सामंजस्य नहीं आ जायेगा, जैसे कि हाथ में पतंग हो और उड़ान उसकी ऊपर हो। इसी प्रकार जबतक आपके जीवन में न हो की हमारी उड़ान कहाँ है ? बहुत से लोग यह जरूर कहते हैं कि मां हमें Gods Realisation कब होगा ? ऐसा मैं कोई लिखके दे सकती हूं guarantee और दूसरी मर्तबा गए वहां किसी की बुराई करने लग गए। साधा एक क्रोध जिस आदमी को कण्ट्रोल नहीं हो सकता वह क्या सहयोग करेगा? कृष्ण ने क्रोध को सबसे पहले condemn किया। सबसे बुरा बताया। क्रोध सबसे खराब चीज है।सम्मोहन लाने वाली चीज है।

सो हमारे अंदर जो गणेशकी शक्ति है उसे जागृत करने में यह सोचना चाहिए कि हमें पवित्र होना है और पवित्रता में उनका सौंदर्य स्वरूप जो भोला स्वरूप उसे लेना चाहिए। नहीं फिर लोग कहेंगे, ठीक है , हम गणेश है। हम हाथमे परश लेकरके इसको उसको मारते फिरते सकते हैं। वह शक्ति आपके पास नहीं है। वह परश आपके हाथ में नहीं है, वह जिस दिन आपके हाथ में आएगी तो आपके हाथ में परश दिया जाएगा। अभी जिससे आप मार रहे हैं वो आपही का भूत आप को मार रहा है। आप भूत हैं जो आप चीख रहे हैं, चिल्ला रहे हैं और गुस्सा कर रहे हैं दूसरों को मार रहे हैं यह गणेश शक्ति नहीं हो सकती। क्योंकि आपको पता ही नहीं कि आप किस पर चला रहे हैं? क्यों चिल्ला रहे हैं? क्या कर रहे हैं? जिस आदमी का इस तरह से दिमाग खराब है उसे सहयोग छोड़ करके पागलखाने में चले जाना चाहिए। उसका स्थान यहां पर नहीं।

जो आज का भाषण है उसमें धार है उसी परश की। समझ लीजिए आप। यह हमें अधिकार है। आपको अधिकार नहीं कि आप इस परशको दुनिया भरमें घुमाते फिरे। अपनी नाक काट लीजिएगा, कान काट लीजियेगा। किसीको आप काट नहीं सकते। सहज योग में जो भी आदमी ऐसा होता है उस पर दुनिया थूकती है, हसती है , मजाक करती हैं, पीठ पीछे उसकी निंदा करती है। और ऐसे लोग सहयोग से बहुत जल्दी घाट उतर जाते हैं।

अपनी वाणी अत्यंत सुंदर, स्वच्छ होनी चाहिए। अच्छी होनी चाहिए। मधुर होनी चाहिए। पर उसके पीछेमें चल छल कपट नहीं होना चाहिए। जैसे बिजनेस वाले कहते हैं, आप बहोत अच्छे है, आइए पान खाइए, फलाना खाइये और जेब खाली करके जाइए। बात हृदय से केहनी चाहिए। और जब हृदय बात कही जाती है तो बड़ी गुणकारी होती है क्योंकि हृदय जो है यही सब चीज को समाता है। वही चीज हमेशा के लिए सनातन हो जाती है। बाकी चीजें ऊपरी उपरी, बुद्धि की चीज ऊपरी उपरी रह जाती है। 

लेकिन जो चीज हृदय को छू जाती है ह्रदय स्पर्शी है वही चीज ह्रदय में बैठ जाती है। इस चीज की आप गांठ बांधकर रखिए। की श्री गणेश का स्थान है तो मूलाधार पे, पर जब वो अपने हृदय में आ जाता है तभी वह आत्म स्वरूप हो करके चैतन्यमय हो जाता है। आत्मा जो है वही श्रीगणेश है और वही श्रीगणेश जब हमारे ह्रदय से प्रकाश देता है वही वह फिर वो चैतन्य हैं। जिसने श्री गणेश को अपने हृदय में बिठा दिया उसके लिए फिर कुछ कहने की जरूरत नहीं। उसको कहते हैं कि हर समय निरानंद में डूबा रहता है। उसे और चीजों की खराब ही नहीं होती और ना परवाह रहती है। और रिद्धि सिद्धि जब उसके पैर के पल। वो खुद जानता भी नहीं, सोचता भी नहीं, सारे काम अपने आप होते रहते। है यह अनुभव सिद्ध है। यह बात मैं ऐसी वैसी नहीं कह रही हूं। यह अनुभव सिद्ध है, ये आप लोग जानते हैं। मेरे बारे में जानते है वो आपके बारे में क्यों नहीं होना चाहिए। अभी तो हम ही आपके लिए रिद्धि- सिद्धि बने आपके पीछे पीछे घूम रहे हैं पर सबका समय होता है। आपको भी अपनी मंजिल को छोड़ कर के दूसरी और मुड़ना नहीं चाहिए। अपनी नजर उन्नत करके उस और जाना चाहिए जहां आपको जाना है और जिसे आप को प्राप्त करना है। यह ऐसा आज तक कभी हुआ नहीं था और जो हो रहा है उसको अगर आप भूल जाएंगे तो इसमें दोष हमारा नहीं। और इसकी सजा हमारे को देने की जरूरत ही नहीं, श्री गणेश बैठे हुए हैं परस लेकर के। इसलिए अपनी और दृष्टि करें। अपनी अंदर वो गांभीर्य। श्री गणेश की जो शक्ति है उस गांभीर्य लाये। अपने अंदर वह आनंद का गांभीर्य, आनंद एक सागर जैसे गंभीर। ऐसे गंभीर आत्मा को देखते ही मनुष्य पुलकित हो जाए, आनंद से भर जाए। फिर तो आप ही के दर्शन से काम हो जाएगा मेरी तकलीफें बहुत कम हो जाएगी। यह स्थिति आनी पड़ेगी और यही आज निश्चय करके आप पूजा करे कि वही हम स्थिति हम लाने वाले हैं और आज विशेषकर गौरी की पूजा है, कुंडलिनी की पूजा है, जो हमें शक्तिचालना देती है, जो गणेश को ही वो शक्ति देती है जिसके कारण वह चलायमान है। और अब निराकार स्थिति से साकार आ करके और आप लोगोके साकार स्वरूप से वो आपको निराकार में उतार सकती है वही वह गौरी शक्ति है।

तो हम शक्ति के पुजारी हैं और जो शक्तिशाली नहीं है, निशक्त है, जो अपनी शक्तिकी पूजा नहीं करता और जो अपने अंदर में  वो शक्तिको जगाता नहीं है और उसमें रममाण नहीं होता, उसका प्रकाश नहीं देता, उसके लिए अपने को सहयोगी कहना व्यर्थ है। ऐसे तो बहुत से बंदर और गधे मिल सकते हैं जिनपे मैं लेबल लगा दूं सहयोगी सहयोगी। सहज गाढवे, सहज फलाने। तो क्या आप हो जाएंगे? तो यह लेबल लगाने की बात नहीं है अंदर की बात है। अंतरतम की ह्रदय की बात है। इसको ह्रदय से प्राप्त करना चाहिए, हृदय में उतरना चाहिए और जितनी भी समाज में, राजकारण में, भायमें, बाहरी बातें हैं, उनको अपने अंदर नहीं घुसने देना चाहिए। क्योंकि सब लोग ऐसा करते हैं इसलिए हम भी ऐसा करते हैं। यह सहज योग हैं इसमें आपका अपना व्यक्तित्व है। यह नहीं कि अपनी individuality है, व्यक्तिगत नहीं है व्यक्तित्व है। हमारी personality है। हम सहज योगी हैं। दुनिया करती हैं इसलिए हम क्यों करें? हम इसे नहीं करने वाले। जब तक आप लोग इस हिम्मत के साथ आगे नहीं बढ़ेंगे, सहज योग यहां पर कोई पहाड़ नहीं कर खड़े कर सकता कुछ दल दल शायद खड़ी हो जाए तो हो जाये। मां के मंसूबे बहुत है और मेहनत भी हमने बहुत की हैं मेहनत की कमी नहीं की लेकिन अब चाहते हैं कि आप लोग इधर ध्यान दें और अपने को समाधान में रखें लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मुंह पर मुस्कुराहट लाके कि हम बड़े समाधानी  है। नहीं। समाधान को अंदर तौले। क्या आप वाकई समाधानी है ?

आशा है आप लोग सब पूरी तरह से ध्यान करेंगे और ध्यान के और अपना पूरा सर्वस्व लगाएंगे। तभी काम बननेवाला है। और जब आपके अंदर खुद यह शक्ति आ जाएगी तो आप आश्चर्य करेंगे की माँ , हम तो सारे पहाड़ों से ऊँचे हो गए , सारे पेड़ों से भी ज्यादा हरित हो गए,इस पृथ्वी से भी हम विशाल हो गए। जैसे तुकाराम ने कहा था कि मैं तो दिखने में छोटा हूं लेकिन आकाश इतना बड़ा हूं। यह जब तक आपके अंदर नहीं होता तो फायदा क्या सहयोग में आने से ? आज की बातों पर आप कृपया ध्यान दें और उधऱ  चित्त करें और पूरी मन से आज यही पूजा करें – श्री गणेश जी की हम गौरी मां के सहायत से, उसकी शक्ति के साथ उस निराकार में उतरे जहां हम पूर्णतया आनंद में रहें और हमारे रोम-रोम में वो शक्ति ऐसी बहे की लोग दुनिया में जाने कि सहज योग ने क्या कमालात  की है। अपने कमाल को पूरी तरह से हासिल कर लेना, उसे excellence कहते हैं। वो चीज आप में आनी चाहिए। सहज योग में हमें excellence आया है या नहीं यह खुद आप जज करना चाहिए। और हर एक आदमी उसको कर सकता है। उसको पढे लिखने की, किसी चीज की, किताब की किसी भी चीज की जरूरत नहीं है। सिर्फ शुद्ध इच्छा की जरूरत है जो हमें अपने अंदर रखना चाहिए। आशा है आज पूजा में आप लोग इसे प्राप्त करे। महान शक्ति के साथ ही आप बाहर जाइए। उसको छोड़े बगैर नहीं। छोटी- छोटी बातें जो भी मन में आए कि मेरा यह ठीक हो जाना चाहिए। सब छोड़-छाड़कर आज उसी महाशक्ति को प्राप्त करें। सब अपने आप ही ठीक होने वाला है ।