Mahashivratri Puja

New Delhi (भारत)

1989-03-06 Mahashivaratri Puja Talk, New Delhi Hindi, 52'
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Mahashivaratri Puja 6th March 1989 Date : Place Delhi Type Puja : Speech Language Hindi

[Original transcript Hindi talk, scanned from Hindi Chaitanya Lahari]

रहे हैं लेकिन मुझे भी तो कुछ देना चाहिए। इस कलयुग में ईमानदारी से जो काम किया जाता है उसके लिये काफी विपत्तियाँ, आपत्ति, संकट उठाने पड़ते हैं। हालांकि सबसे बड़ा समाधान ये है कि हम लोग इंमानदार हैं। और सहजयोग में एक बात जाननी चाहिए कि जो चीज़ जिस वक्त बननी है उस वक्त जुरूर बन जाएगी, उसमें रुकावट नहीं हो सकती। गर कोई रुकावट हुई हैं तो जुरूरी आपमें अभी कमी रह गई है। इसको बनाने में जो थरी, गर समय उसमें ज्यादा लग गया यो कम लग गया, रुपया अधिक लगा या कम लगा, ये सब जरूरी थे इसलिए किसी भी चीज़ में दोष निकालना कुछ एक खेल है, ये सब एक खेल है और इस नहीं चाहिए, लेकिन उसका आनन्द पूरा प्राप्त करना चाहिए। अब हमें सोचना चाहिए कि दिल्ली में सबसे पहले हिन्दुस्तान का, सहजयोग का आश्रम बनाया गया जो अभी तक सारे भारत वर्ष में कोशिश करने से भी नहीं बना। ये कोशिश अठारह साल से हो रही थी और आज ये आश्रम देखकर मुझे बड़ा आनन्द आया। इसका पूरा उत्तरदायित्वच आप लोगों ने और किस तरह से इस चीज को बनाइएगा। सिर्फ लिया था और सारा श्रम आपने किया और इसका श्रेय भी, सारा Credit भी आप ही को है। जब आप लोग मुझे किसी चीज़ का श्रेय देते हैं तो मेरी समझ में नहीं आता है कि आप लोग इतने अकर्म में उतर गए हैं कि आप जानते ही नहीं कि सब आप हो कर रहे हैं। अगर सब काम मुझसे ही होता तो मुझे जाती हैं और आप बड़ी गहरी ऐसी एक अनुभूति में आपको जोड़ने की क्या जरूरत पड़ जाती? आप ही मेरे हाथ हैं, आप ही मेरे आँख हैं, और आप ही मेरे कान हैं। आपके बगैर मैं कोई भी कार्य नहीं कर सकती और इसके लिए में आपके शरणागत हूँ एक तरह से, कहती हैँ कि जब भी आप लोगों को मेरे के खेल में जब आप उस गुडिया का छोटा सा घर लिए हुकुम जहाँ कहोगे वहाँ मैं स्थापित हो जाऊंगी। लेकिन इसमें आपका जो हमारे ऊपर अधिकार है वो बना रहना चाहिए, वो पूरी तरह से बना रहना चाहिए प्रतीत हो रही है। और जब वो अधिकार बना रहता है तो उस अधि कार की पूर्ति भी बहुत आसानी से हो जाती है। अब मुझे तो पता नहीं मैंने इसमें कितना रुपया दिया कि क्या दिया? ये तो सारा सहजयोगियों का रुपया है मेरी जेब से तो मेंने एक पैसा नहीं दिया। लेकिन में अपनी जेब से भी देना चाहती हूँ क्योंकि मेरे लिए भी तो आप यहाँ कमरा बना रहे हैं। तब श्रोड़ा सा मुझे भी तो पैसा देना चाहिए। आप लोग सहजयोग एक आनन्द का पर्व है, एक आनन्द का सागर है। हर चीज में आपको आनन्द गर मिले तो सोचना चाहिए कि आप सहजयोग की संवेदनशीलता को प्राप्त करते हैं। लेकिन आपमें वो आनन्द, उसकी प्रचीति न हो तो सोचना चाहिए कि कुछ भी कष्ट हुआ हो, जो कुछ भी परेशानियाँ हुई हो और जो कुछ भी आपको उठाना पड़ा हो, वे सब खेल को हमने किस तरह से खेला, उसका मजा हमने उठाया। घर बनाना, दुकान बनाना, विश्व बनाना, ये सब एक खेल है। गर आप विश्व के बनाने पर ये सोचे कि कैसे बनेगा, क्या होगा तो उसका मजा ही खत्म हो जाएगा। लेकिन आप बना रहे हैं, आप देख रहे हैं, किस तरह से बना रहे हैं चित्त शुद्धि हो आपका चित्त गर स्वच्छ हो जाए, और चित्त में यही प्यार हो कि कोई चौजू करनी है और ये परमात्मा के कार्य के लिए हम कर रहे हैं तो आनन्द द्विगुणित हो जाता है। और भी बढ़ जाता है, इसकी लहरें और भी आपको लपेटती चली जाते हैं जहाँ पर जाकर आप कहते हैं कि ‘अब मस्त हुए फिर क्या बोले?’ वही हाल आज मेरा हो रहा है। ये सारा दंखकर के, वैसे तो सारा विश्व ही वनाया है लेकिन ये जो अभी बनाया है, जैसे गुड़िया हो उस जगह में हाजिर हो जाऊंगी और बनाते हैं उसको देखकर के बड़ा अद्भुत सा आनन्द होता है। ऐसा ही विश्व में बसा हुआ ये हमारा आश्रम है जिसके प्रति मुझे वही एक अनुभूति है आज का दिवस भी बड़ा शुभ क आज शिवतत्व के दिन, जिस दिन हमारे अन्दर शिवतत्व तत्व प्रगटित होता है, वो आज का दिन है। जिस दिन शिवजी की पूजा की जाती है। शिव माने जो अटूट, अचल, अविनाशी और आज के दिन कोई और ऐसी चीज़ बन गई जो अटूट, अचल, अविनाशी-इन तीन स्तम्भों को प्रकाशित करने वाली है, ये तो एक सारे संसार के लिए बड़ी सीभाग्य तो बना ही ন

विनाशी हैं और विनाशी चीज़ों के पीछे दौड़ना ये कोई भी अक्ल की बात नहीं है। विनाशी चीजें जहाँ वहाँ हैं, अपनी सीमा मे रहें। लेकिन उनका और बड़ी मुश्किल बात है। इसे हम लोग इस तरह से समझे कि सारे विश्व में हलचल और दुनिया भर की आफत, ये कलयुग की घोर यातनाएं और उसका प्रकाश तांडव चला हुआ है। ऐसे बक्त एक लेखना कोई होनो चाहिए जिसको हम पकड़ लें। उस लेखना के लिए एक गणेश तत्व को बिठाना होगा। उस गणेश तत्व को विठाने के लिए कोई न कोई पृथ्वी तत्व पे चीज खड़ी करनी पड़ती है। उसी प्रकार आज गणेशतत्व येहाँ बसाया गया, एक पवित्रता यहाँ लाई गई। ये एक पवित्र मन्दिर सा बन गया है और यहाँ से पवित्रता सारे संसार में कूद सकती है और उसका जो कुछ भी कार्य है वो बहुत हैं जरूरत से ज्यादा महत्व करना विनाश की ओर जाना है। यही चीज है जो शिवतत्व है इसे हमें प्राप्त करना है, जो सारी हमारी कार्यपद्धति, गतिविधियों का लक्ष्य भी है और वही हमारा केन्द्रबिन्दु और प्रोत भी है। यही चीज़ विदेश के लोग भूल गए हैं। विदेश में लोग विनाशी चीजों को बहुत महत्व देते हैं, और विनाशी चीज़ों के लिए भागते हैं, उसी को महत्वपूर्ण समझते हैं और उसी को सोचते हैं कि उसी से हम सब लाभ कर सकते हैं । उनको अविनाशी की शायद खुबर भी नहीं, बहुत से लोगों को, और जिनको है वो भी बस उसको विचारों में सुचारु रूप से हो सकता है। इर तरह का आक्रमण, आततायी लोगों को ये एक छोटा सा दिखने वाला आश्रम ही बहुत कार्य कर सकता है। तो जिसे कहते और तत्वों में और इस चीज़ में बाँधकर के एक हैं कि nucleus इस तरह से ये एक भारतवर्ष में आज दिल्ली में शुरु हुआ है। सर्वप्रथम संसार में देते हैं। लेकिन उसमें जान नहीं है, उसमें प्राण नहीं जो चीज़ बनाई गई वो है श्री गणेश। लेकिन उनसे भी पहले और आदिशक्ति से भी पहले जो तत्व था उस तत्व को हम ये कहेंगे कि वो जानते हैं कि इस अविनाशी शिवतत्व से ही सारा सदाशिव स्वरूप, सदाशिव था। उस सदाशिव कार्य होने वाला है! गर हमारा मस्तिष्क, गर किसी तत्व से ही उनकी जो शक्ति आई उसे हम आदिशक्ति कहते हैं। तो सबसे पहले ़ संसार में रही और रहती है और हमेशा रहेगी वो पैर टूट जाए तो भी हम जिन्दा रह सकते हैं, रीढ़ चाहे सुप्तावस्था में होती है तब कोई सा भी सृजन (Creation) नहीं होता है, ‘लेकिन जब वो जागृत जैसे ही हृदय बन्द हो जाता है जहाँ शिव का तत्व अवस्था में रहती हैं तब सारा सृजन होता है। उस वक्त हर तरह का सृजन आते रहता हैं। फिर उसके बाद, अवतरण आते हैं और सब तरह के कार्य होते चाहिए कि यह तत्व अत्यन्त भोला है। भोलेपन का हैं और फिर वही जा करके चीज़ जब सो जाती है है तो सब चीज़ फिर सुप्त अवस्था में चला जाता है। पवित्र, अत्यन्त पवित्र है। जैसे कि एक पवित्र चीज तो ये जो सुप्तावस्था में जाने की स्थिति है उस स्थिति से पहले ही हम लोगों को उस जागरण में उतरना चाहिए जो शिवतत्व है। शिव का तत्व समझना एक हिन्दुस्तानी के भी गलती करते हैं तो शिवतत्व के प्रकाश में बो लिए कठिन बात नहीं है क्योंकि अपने यहाँ, भारत वर्ष में जो कि भारतीय हैं, जो कि विदेशी लोग हैं को अगर आप ऐसा समझिए कि हमारे जीवन में या विदेशी संस्कृति से प्रभावित हैं उनकी बात नहीं, इस शिवतत्व का क्या उपयोग है तो जो आज आप पर सर्वसाधारण किसी भी भारतीय को आप गर देखें तो वो यही कहेगा कि इस अविनाशी तत्व को अनुभूति होती है ये ही शिवतत्व का प्रकाश है और ही पाना हमारे जीवन का लक्ष्य है। बाकी सब चीजें जब तक शिव आपके अन्दर जागृत नहीं होते, जब विनाशी हैं। ये हम लोग जानते हैं। सारी चीजें तक आत्मा आपके अन्दर जागृत नहीं होती आप बड़ा भारी सा, कहना चाहिए, कि कबन्ध सा बना हैं, उसके जो प्राण हैं, वो है शिवतत्व। और शिव तत्व जो है वो हम लोगों को मालूम है और हम तरह से काम से चला जाए तो भी हम जिन्दा हैं, गर हमारा हाथ टूट जाए तो भी हम जिन्दा हैं, गर हमारा जो चौंज की हड्डी भी टूटने पर हम जिन्दा रह सकते हैं। यर है, फिर हम संसार में नहीं रह सकते। तो शिव के तत्व के बारे में हमें जानना ये मतलब नहीं कि मूर्ख, भोलेपन का मतलब आपने यहाँ बिछा दी हो कुछ भी, इस पर एक छोटा सा भी दाग लग जाए तो फौरन दिखाई दे जाएगा। इसी प्रकार शिवतत्व का है कि जैसे ही थोडी सी एकदम साफ दिखाई देती है। और अब इस शिवतत्व चैतन्य को जानते हैं या चैतन्य की आपमें जो

सकेगी? ऐसी कोई सी भी चीज़ उनके लिए नहीं इस शिवतत्व को प्राप्त नहीं कर सकते, उसकी प्रचीति नहीं कर सकते, उसे जान नहीं सकते। है। इसी से आप जान सकते हैं कि गर हमारे अन्दर उसकी प्रचीति होना ही एक बोध है, इसी को विद् शिव तत्व चलता है तो पहले तो हम ऐसे इन्सान हो कहना चाहिए जो वेद है। इसी को कहते हैं जो ज्ञान है। यही शिवतत्व को जानना चाहिए। अब शिवतत्व है या नहीं ये तो आप जानते है, इसमें आपको शंका नहीं है कि शिवतत्व है या नहीं। किन्तु शिवतत्व पे हम जमें हैं या नहीं, ये हो जाती है, क्योंकि आप कालातीत हो सोचना चाहिए। शिवतत्व का सबसे बड़ा फायदा ये है कि ये प्रेम है, प्रेम का स्रोत है, प्रेम का लक्ष्य प्रेम का केन्द्र है, ये प्रेम है। सबसे बड़ी चीज़ आप अपने हृदय को खोल लें, शिवतत्व को अपने अन्दर समाने का मतलब है अपने हृदय को खोल लो। उसमें ये विचार ही नहीं आता है कि अब Time हो हृदय को खोलकर के बिल्कुल खुली तबियत से रखें इसके विरोध में क्या-क्या चीजें बैठती हैं वो हमें देखना चाहिए। इसके विरोध में जब हमें एक तो स्वार्थ ‘मैं’, ममत्व, ‘मैं, मेरा पति, मेरे बच्चे, मेरा ठीक ही हो रहा है। इसीलिए मैंने कहा कि ये कब घर’ जहाँ ममत्व शुरु हुआ वहाँ शिवतत्व खत्म होने लगता है। अब शिवजी को देखिए कहाँ रहते हैं? कैलाश पर, जहाँ कोई भी नहीं रह सकता, वहाँ बसे ये पूरा हो जाएगा। जब इसमें रहने लायक लोग हो हुए हैं। कपड़े क्या पहनते हैं वो तो आप जानते ही हैं। अलंकार उनके क्या हैं और जिस मस्ती में वो पहनते हैं वो भी आप जानते हैं। लेकिन उनको कोई मैने तो इनसे कहा था कि पहले ये तय कर लो आराम की जुरूरत नहीं, कि मुझे कौन सा आराम मिलेगा। हम लोग पहले सोचते हैं-भई वहाँ जा रहे कहने लगे माँ आप तो रहेंगे। मैंने कहा मैं कौन-से-कौन हैं तो वो कितने स्टार होटल हैं, वहाँ क्या इन्तजाम होगा, वहाँ ये चीज़ ठीक होगी या नहीं होगी, वहाँ किस तरह से रहने को मिलेगा, वहाँ कौन सा इन्तज़ाम होगा और किस तरह से खाना होगा? वो इस चीज़ की परवाह नहीं करते। शिव तत्व वालों हैं। उसको तो अपना घर चाहिए, अपनी बीवी का पहली पहचान है, वो मस्ती में कहीं भी रह सकते हैं। आप उनको जंगल में सुला दीजिए, वो जमाने के लिए चाहिए। ऊपर से ये कि उनको मोटर जंगल में आराम से हैं, महलों में रख दीजिए तो चाहिए अपनी। ‘अपना’ ‘मेरा’। ये मेरी, ये मेरी चीज महलों में आराम से हैं। जहाँ है वहाँ वो शिव हैं। है, मेरे बच्चे मेरे पास हैं, मेरी बीवी मेरे पास है। उससे ऊँची कोई चीज़ है ही नहीं जिसका वो कितने लोग ऐसे हैं कि जो सामूहिक तरह से रह आनन्द उठा सकें क्योंकि स्वयं आनन्दमय होने की वजह से और किस चीज़ से आनन्द उठाना है? बाकी तो सब कचरा ही है। जो असली परम चीज है वो उन्होनें पाई है अपने अन्दर में, शिव की और के चले आते हैं। भई क्या हुआ? अब तो घर-वर उस शिव के आनन्द में ही वो पूरी तरह से जम हुए बेच दिया, अब तो माँ आश्रम में रहेंगे। अब हमारे हैं। तो उनके लिए ऐसी कौन सी विशेष चीज़ होगी सारे प्रश्न ही छूट गए क्योंकि अब न तो घर का जो उनको दबा सकेगी या उनको मोहित कर जाते हैं जिसे कहते हैं, औलिया माने आप कहीं भी सो लीजिए, कहीं भी बैठ लीजिए, कहीं भी खाना खा लीजिए, किसी वक्त भी खाना खा लीजिए, कितना टाइम है सोलें और ये घड़ी जो है ये बन्द Knowledge गए, किस वक्त जाना, किस वक्त आना, किस वक्त क्या है करना, उसका विचार ही नहीं रहता। सब ये कि हो रहा है। जो भी चल रहा है ठीक है। अभी यहाँ बैठे थे यहाँ बैठ गए, कल को वहाँ जाकर बैठ जाएंगे। रहा है चलो, अब वहाँ पर ऐसा करना है ये करने का है, ये सब दिमागी जमाखर्च उसमें होते ही नहीं। क्योंकि जो हो रहा हैं वो कालचक्र के हिसाब से बनेगा, कैसे बनेगा, उसके लिए व्याकुल होने की जुरूरत नहीं। जब इसके लायक लोग हो जाएंगे तब जाएंगे, तब ये पूरा होगा, नहीं तो यहाँ पर क्या, कौन रहेगा? जानवर आकर रहेंगे, चिड़िया पंछी रहेंगे? दिल्ली वाले कि कौन रहने वाले हैं यहाँ आकर। से आश्रम में रहने वाली हूँ? ये बता दीजिए। तो एक मेरे लिए मत आश्रम बनाओ, आपमें से कितने लोग आश्रम में रहना चाहते हैं, ये पहले तय कर लो। क्योंकि हिन्दुस्तानी तो बहुत ही ज्यादा सीमित चाहिए, अपने बच्चे चाहिएं और बीवी पर रौब सकते हैं दुनिया में? परदेस में ये प्रश्न नहीं उठता। परदेस में तो गर आश्रम बनाया तो खट से बन जाता है क्योंकि सब अपना बिस्तर वगैरा लेकर किराया देने का, न कोई आफ्त, न कोई चीज़। बस

अब यहाँ रहंगे, सामूहिक में रहंगे, जो कुछ पैसा सारे लोग उसके साथ खड़े हो जाएंगे। उल्टे गर आप देना है वो देंगे और अपना आराम से रहेंगे। सब लोग मिलकर काम करेंगे, और कोई Problem ही नहीं। कोई आफत आई तो सब लोग मिलकर उठा लेंगे और कोई ऐसी विशेष वात हुई तो उसका भी आनन्द सब लोग उठा लेंगे। वो लोग तो इतने खुश हो जाते हैं कि इसमें हमें कुछ मिल गया, जैसे कि ही सत्य है, बाकी सब असत्य है और शिवतत्व का हम किसी चीज के हो गए, जिसको कहते हैं रिश्ता आप जानते है, वो चैतन्य से होता है इस belonging, किसी चीज़ को हम belong कर गए। और हम लोग हैं चिपटे-चिपटे घूमे रहते हैं। अच्छा उस घर में भी, घर के अन्दर भी, फिर् झगड़े शुरु होते हैं कि साहब ये बड़ा लड़का है, ये छोटा है, ये बड़ी बहू, सहजयोग में आएं तो आपकी टाँगें खींचेंगे। अच्छा गर आप सहजयोग में आए तो आपसे कहेंगे कि चलो फिर हमें ठीक कराओ। तुमने हमें ठीक नहीं कराया तो हम तुम्हें सहजयोग में नहीं जाने देंगे। फिर और भी तमाशे खड़े कर लिए। क्योंकि शिवतत्व प्रकार से जब आप चैतन्य को महसूस करते हैं, आप जानते हैं कि चैतन्य है तो आप समझ लेते हैं कि ये जो दूसरा सामने बैठा है इससे कितना कितना आनन्द आ रहा है। एक बार कलकत्ते में एक साहब मेरे पास आए। वो मेरे पैर पर आते ही साथ आठ-दस वहाँ जितने भी सहजयोगी थे दौड़ पडे! ये छोटी लड़का फिर उसका बच्चा, फिर मेरी बहन, फिर ये, ढिकाना। उसमें भी झगड़ा! क्योंकि ये जो रिश्तेदारी है कृत्रिम रिश्तेदारी मैंने कहा, क्या हुआ है? पता नहीं क्या? एकदम से है, ये असली रिश्तेदारोी नहीं। कोई किसी का बेटा कुण्डलिनी चढ़ गई एकदम खुल गई। हमने कहा हो जाए तो उससे उसका रिश्ता नहीं होता। गर होता रिश्ता गर बनता तो झगड़ा क्यों होता? मतलब इसमें सामने एक realized soull अब वो सब खड़े हो गए वास्तविकता नहीं है। उसमें फिर छोटी-छोटी बात की मांग क्यों होती? एक दूसरे में प्यार क्यों नहीं छोड़ो। पकड़ लिया उसको। उसका जो आनन्द आ होता? तो जिस तरह से हम आपको कहते हैं कि बाहर के धर्म सब झूठे हैं इसी तरह से बाहर के रिश्ते भी सब झूठे हैं। एक-एक आदमी को इसकी थे! ये असली रिश्ता हुआ कि बैठे कहाँ थे, प्रचीति आएगी। अब कोई कहेगा साहब मेरी माँ को भागे-भागे आए! क्या मज़ा आया! जब ये मज़ा आने बुला दीजिए माँ की बुला दीजिए। लन्दन में हम थे लग गया तब रिश्तेदारी है। यही असली दोस्ती है, तो एक साहब मेरी जान के पीछे पड़ गए। कहा अच्छा भई तुम इतने पीछे पड़े हो तो माँ को बुला देते हैं। जब माँ को बुला दिया तो वो रोज़ कहें माँ इससे मुझे छुटकारा करें, मेरी जान खा गई है। झगड़ ही नहीं सकते। आपने गणों को देखा है कि इसको कैसे भगाऊँ? मैंने कहा पहले तो कह रहे थे माँ को बुलाओ, माँ को बुलाओ, मेरी जान खाली, कठिन काम सब लोग मिलकर करने लग जाते हैं, अब ये कि इसको यहाँ से निकालने की कैसे कठिन से कठिन बात हो, उसमें सब जुटकर के कोशिश करें। मैं कैसे इसको निकाल दूं. मेरा सर खा लिया। मैंने कहा, पहले बुलाया क्यों और अब भेज क्यों रहें है? वजह ये है कि ये जो रिश्ता था ये रिश्ता सच्चा नहीं था, ये झूठा रिश्ता था। अगर सच्चा रिश्ता होता तो एक प्रेम में विभोर मनुष्य आस्ट्रेलिया में हो गई, सबका चित्त वहाँ चला रहता। उसमें ये नहीं भावना आती कि ये मेरा है। ‘मेरा’ की जो भावना है ये झूठी भावना है, ये सच्ची उसमें हमें जानना चाहिए कि हम शिवतत्व में स्थित भावना बिल्कुल नहीं है। गर सच्ची भावना होती तो ह आप मुझे बताइए कि कौन सी रिश्तेदारी में आपने देखा है कि एक आदमी को शिकायत हो जाए तो बहू। जाकर देखे माँ को क्या हुआ? तो ये देखा कि वो बिचारा झुका ही बैठा था मैंने कहा उसको तो रहा था जैसे कि गुलाब के फूल से भी न आए, न कमल के फूल से आए, ऐसे उसका मजा उठा रहे वहाँ से मैंने यही असली सहजयोग की प्रेरणा, प्यार और उसका आनन्द है। ये सिर्फ शिव तत्व से मिल सकता है। ँ गर आपके अन्दर शिव तत्व है त आप आपस में गण कैसे होते है कि वो एक इशारे पे कठिन से करने लग जाते हैं। लेकिन गर हमारे यहाँ शिवतत्व की जब पूर्ण प्रणाली शुरु हो जाती है, मैंने देखा है, कि गर समझ लीजिए कोई चीज़ अमेरिका में हो गई तो सारे सहजयोगी उधर दौड़ पड़ेंगे। कोई घटना जाएगा। कितनी बड़ी बात है! लेकिन सबसे पहले हैं। शिव तत्व में स्थित होना माने में नहीं कहती कि आप सन्यासी बाबा बन जाएं। पर अन्दर से सन्यस्थ भाव आना चाहिए। अन्दर से सन्यस्थ भाव आने का 5 र

अर्थ ये होता है कि आप इस तरह से कि एक पेड़ कि आप उनको धुत्कारिए या बुरा कहिए, लेकिन के अन्दर उसकी शक्ति या उसके अन्दर का जो Sap होता है वो उठता है और हर जगह जाता है, भी कहना चाहिए कि आप अपने शिव तत्व को हर पत्ती पर, हर शै पर, हर फूल पर, हर फल पर जाता है और फिर लौट जाता है। इसी प्रकार आपका भी प्यार बिल्कुल निर्वाज्य, पूरी तरह से असंग में, कोई कहे कि दूध में आप दही डाल दें। क्या हर्ज detached होना चाहिए। तब आप शिवतत्व में स्थित है? हम सब तो detached ही हैं, ऐसे तो होता नहीं। होंगे और जब वैसे आप हो जाते हैं तब आपको एक दूसरे का मज़ा आने लगता है, नहीं तो एक दूसरे को देखकर के, वो ऐसा बोले, इन्होंने ऐसा किया। में तो ऐसा लगता था कि मैं किसी उनका भी शिवतत्व ठीक करना चाहिए और उनसे ठीक करें, क्योंकि गर ऐसे लोग बीच में आ जाएं तो उसमें कभी भी आनन्द नहीं आ सकता जैसे कि दूध में आपने दही डाल दिया तो दही हो जाएगा। आप कितनी भी कुछ Theory लगाओ, उस Theory का काम नहीं। उसके सामने जाकर प्रार्थना करो, नमस्कार करो, कुछ करो, दूध में आपने दही डाल शुरु- शुरु झगड़ालू घर में घुस गई हूँ। इसका उसका आपस में दी और जिन लोगों के vibrations खराब हैं उनको झगड़ा, न किसी को आपस में मजा आ रहा है, न कोई आपस में प्यार कर रहा है। इसका झगड़ा ठीक हो जाएंगे और सब ठीक हो जाएगा और उससे, उसका झगड़ा उससे, मैं तो देख-देख के सोचती थी हे भगवान! अब मैं क्या करू? यहाँ कुछ कहेंगे, “हाँ ठीक है।” ये आदमी कितना शान्ति में मेरा कार्य तो बनना ही नहीं। लेकिन धीरे-धीरे, धीरे-धीरे दिमाग ठण्डे हो गए, शिवतत्व अंदर स्थापित होने लग गया और अब लोग आपसी प्रेम को आनन्द से भोग रहे हैं और जान रहे हैं कि प्रेम में जब घुस जाएगा तो दूसरे लोग जिनके आपसी प्रेम जो है यही सबसे बड़ी चीज है। और रिश्तेदारों का भी अनुभव आने लग गया कि ये क्या चीज है। अपना रिश्ता एक ही चीजू से होता है वो सबको यही कोशिश करनी चाहिए कि हमारा हित है शिवतत्व से। जिस आदमी में शिवतत्व नहीं, काहे में है, हमारा हित इस तरह से पागल जैसे जिस आदमी में vibrations नहीं, जिसके घूमने में और भटकने में नहीं। उस अविनाशी चीज़ vibrations ठीक नहीं हैं उस आदमी से आपका रिश्ता हो ही नहीं सकता। कितनी भी कोशिश कर लो, तो भी वो रिश्ता बन नहीं सकता। उसको जब तक उसके vibrations ठीक नहीं हो जाएंगे तब तक आप कुछ भी कर लें, आपको उसके साथ मजा आ ही नहीं सकता। या तो आपके ही vibrations खराब हो जाएंगे या उसके vibrations खराब हो जाएंगे| तो आपको ऐसा लगेगा कि इसी के vibrations खुराब हैं तो क्या मेरे खुराब हो गए? और मेरे खराब हैं तो कहनी चाहिए। सो शिवतत्व की बात ऐसी है कि क्या उसके खुराब हो गए? और एक तरह से आपको पता होना चाहिए कि जब हृदय आपका संभ्रान्त, भ्रान्तिमय स्थिति आ जाएगी। आपको ये ही समझ में नहीं आएगा कि vibrations किसके खुराब है। पर में तो उल्टे कहूंगी, गर आपका आज्ञा चक्र हैं? तो इसलिए ऐसे आदमी जिनके कि vibrations ठीक नहीं हैं उनसे दूर रहना चाहिए। उसमें कोई संकुचित हो जाएगा, एकदम छोटा हो जाएगा। और किसी को बुरा नहीं मानना चाहिए, उसमें दोनों का लाभ है। गुर आपके अन्दर शिवतत्व जागृत है तो आप उनसे अलिप्त रहिए। इसका मतलब ये नहीं पूरी तरह से guidance देना चाहिए। तुम्हारे vibration आपकी शान्ति आपके शिवतत्व से वो देखकर बैठा है मैं भी ऐसी शान्ति में बैठूं। इस शान्ति को मैं क्यों न पाऊं? उसका मैं क्यों न उपभोग करूं? इस तरह का आपका जीवन उस शान्ति में, सादगी में, vibrations ठीक नहीं हैं, जो इतने अभी बैठे नहीं हैं सहजयोग में, वो धीरे-धीरे बैठ जाएंगे। लेकिन है। को प्राप्त करना ही हमारे जीवन का लक्ष्य हम इसीलिए सहजयोग में भी आए हैं और सहजयोग में आकर के अगर हम आधे-अधूरे रह गए तो क्या फायदा? हमने क्या प्राप्त किया? उसमें हम जिस रास्ते पर आए हैं हम बीच ही में बैठ गए, मंजिल तक तो पहुँचे ही नहीं। इस शिवतत्व के बारे में मैंने अनेक बार बातें करीं हैं और बताया लेकिन दिल्ली वालों के लिए विशेष रूप से शिवतत्व की बात पकड़ जाता है तो आपका आज्ञा चक्र पकड़ जाता पकड़ गया, सामने का, तो आपका हृदय एकदम से जब आपका आज्ञा चक्र खुल जाएगा तो आपका हृदय एकदम ठण्डा ठण्डा उसमें से बहने शुरु हो जाएगा। आज्ञा चक्र चढ़ता है अहंकार से। क्योंकि

आप इस राजधानी में रहते हैं और सब घोड़े पर सवार लोग हैं, आप भी सोचते हैं (बच्चों को जरा- पता नहीं क्यों बच्चे रो रहे हैं इनको देखना चाहिए तब हमें एक मीनाबाग में एक जगह मिल गई थी, कहने लगी मीनाबाग में रहती हो? तुम्हारे पति क्या करते हैं? भई कुछ करते ही हैं सरकारी नौकरी ही जो बच्चे रो रहे हैं उनको देखना चाहिए) सो दिल्ली है, ऐसा ही after alll ये मीराबाग में तुम रहती हो शहर में मेरी जब शादी होकर आई तो मुझे लगा कि किससे शादी कर ली तुमने? तुमको और कोई नहीं ये कोई अजीब दुनिया है यहाँ लोग चलते तो मिला? मैंने कहा भई मेरे पति तो बहुत अच्छे आदमी हैं अच्छे। अरे उसको क्या चाटना है? ऐसे, और आप जब-तक कूदकर उनसे बात नहीं तुम क्या मीनाबाग में रहती हो? मैंने सोचा कि करिए उनको कुछ समझ में नहीं आएगा। एक इसको सारी दुनिया में कौन कहाँ रहता है, किसकी क्या Position हैं, उसको सब पाठ याद है कि कहाँ Time में जब देखा, मैं बहुत छोटी सी और भोली सी रहते हैं। मैने कहा कि तुम कहाँ रहती हो? कहने थी, मुझे हँसी आती थी कि ये सब पागल लोग जा लगी, मैं तो वहाँ रहती हूँ राउजुएवेन्यू में। मैंने कहा वो कहाँ हैं? तो वो पुल के पास है। मैंने कहा, तो जा रहे हैं, कुछ समझ में नहीं आता था। तो में देखा वो दूर होगा न जुरा यहाँ से। अरे तो क्या मेरे पास है, कहीं भी हो, रहते तो शान गर्दन यहाँ से उठकर छः फुट चलती थी और से हैं। मेरे पति तो ये हैं, मेरा पति। पहले तो मेरे यही नहीं समझ में आता था कि additional, under इन सारे prepositions का क्या मतलब है। मेरे Husband से में पूछती थी कि additional और under में क्या फर्क होता है? वो कहने लगे नाखून रंगाए हुए, लिपस्टिक लगाए हुए, चूड़ियाँ कि वैसे तुम्हारे पास वहुत ज्यादा अक्ल है लेकिन पहनी हुई बिल्कुल फैशनेबल। और मैं तो उसके तुम तीन पत्ती नहीं खेल सकती, इसमें तुम्हें याद नहीं रहता कौन सी चीज Higher-lower है। ये तुम्हें व्यूरोक्रेसी याद ही नहीं रहेगी। तो मैंने कहा साहब चाय लो, सोफे पे बिठा दिया और बो बैठे न, मैने मुझे समझ ही में नहीं आता है कि इतने सारे हैं, उसमें ऊपर नीचे क्या होता है जमीन पर हैं परन्तु गर्दन उनकी ऊपर हो चलती है बहुत अजीब अहंकार की दुनियां थी, बापरे जब उस वी कहाँ रहे हैं। सीधे जमुना जा रहे हैं, किसी घाट पर मोटर है, उसमें क्या करती थी और मुझे बड़ा आश्चर्य होता था, सबकी इसका कारण ये कि अहंकार, इतना अहंकार। एक चपरासी की गर बीवी घर में आए तो वो शनील के सूट पहनकर के, लिपस्टिक विपस्टक लगा करके पहुँची घर में, मैंने सोचा कोई मेमसाहब ही होगी। सामने बिल्कुल ही गाँव की औरत लग रही थी। तो मैंने सोचा कोई मेमसाहब होगी तो मैंने उनसे कहा कहा, आप बैठिए न, बैठिए न। कहने लगी, मैं कैसे बैठ सकती हूँ? मैंने कहा क्यों आप हैं कोन? में आपके चपरासी की बीवी हूँ, तो मैंने कहा, कोई हर्ज नहीं है, बैठ जाइए अब आप। और फिर जितनी उसमें घमण्ड थी, मैंने देखा कि उतनी तो Collector के नहीं होती। तो मैंने कहा कि जब इनका ये हाल है तो कलेक्टर की बीवी क्या होगी! और इस कदर अहंकार और झूठ और इतनी कृत्रिम जिन्दगी कि मैं तो नागपुर से आई थी, तो लगा कि ये है दुनिया, कैसी दुनिया है ये, कुछ समझ ही में नहीं आ रहा। अजीब-अजीब से अनुभव आने लगे। जैसे हमारे पति आए, वो शास्त्री जी के साथ थे ऐसा दुनिया में तो बड़ी भारी नौकरी, मुझे तो समझ में नहीं आता इसमें क्या बड़ा भारीपन है? तो एक हमारी सहेली हमें मिली, सो वो हमारे कॉलेज में पढ़ती थी। वो तो हमसे बात ही नहीं कर रही। तो मैंने कहा कि नमस्ते वमस्ते किया। तुम कहाँ रहती हो? Prepositions । बहरहाल जो भी हो, तो वो बहुत मुझसे बिल्कुल दूर भाग के खड़ी हुई कि ये तो कोई क्लर्क की बीवी है या जो भी सौचा हो, पता नहीं। तो मैंने उनसे ये कहा कि भई ठीक है, मैं मीना बाग में रहती हूँ तो इतने नाराज़ होने की कोई बात नहीं है। जो सरकार ने हमें जगह दी है हम रहते हैं । तो कहने लगी कि इतने में मेरे पति आ गए। अब तो भई यहाँ तो सब लोग नमस्कार कुर्सी को करते हैं, चाहे जो भी हो, तो वो आते ही साथ सब वो नमस्ते, नमस्ते, नमस्ते नमस्ते। तो ये भी उन्हें नमस्ते करने लगी। तो कहने लगी तुमने क्यों नहीं नमस्ते किया? वो तो मेरे पति हैं न, उनको क्या नमस्ते करनी। कहने लगी ये तुम्हारे पति हैं तुम मीना बाग में क्यों रहती हो? जैसे कि कोई वो यरवड़ा का जेल है कि मीना बाग। उसमें इतना objection क्या है? कहने लगी ये तुम्हारे पति हैं! अरे तुम तो बड़े आदमी की बी

भगवान जी चिढ़ाती हैँ। कहने लगे बस करो, आप हो। मैंने कहा मेरे लिए तो पता नहीं, पर जरा लम्बे हैं मेरे Husband। तो कहने लगी, तुम तो निरी गवार मुझे मत चिढ़ाया करो। इस कदर का घमण्ड, इस हो। तुमको तो वो फलानी जगह में कोठी माँगनी चाहिए थी मेंने कहा काहे के लिए? तो कहने लगी वाह इतने बड़े आदमी हैं तो क्या तुमको बड़ी कोठी नहीं चाहिए? मैंने कहा कि भई मुझे तो छोटा ही बर अच्छा लगता है, सफाई वफाई करने में मुश्किल position है और उन लोगों को तो सारी Civil list ज्यादा नहीं होती कहने लगी तुम्हारे घर में नौकर मालूम है कि इनका नम्बर इतना, तो उसका नम्बर नहीं हैं, मैंने कहा, है पर उसको बहुत ज्यादा काम पड़ेगा न। तो बेहतर हैं छोटा ही घर अच्छा है। इस कदर यहाँ पर artificiality, ऊपरी तरह से बीत, ऊपरी तरह से तामझाम। बस, उसके बाद तो वो समझ लीजिए कि वो मुझे रोजू एक फोन करती थी, क्योंकि बैठे-बैठे discussion करती रहती थी थी। मैं तो परेशान हो गई। मैंने कहा इसको क्या हो इसको ये promotion मिला उसको वो Promotion गया भई ये? अभी तो ये मीना बाग से घबराती थी और वो रोज ही आने के लिए बैठी है मीना बाग, समझ ही में नहीं आता। इस तरह की चीजें जब मैंने देखी तो मैंने सोचा कि यहां के लोगों का दिमागू, क्या हो जाएगा? गर समझ लीजिए कोई बिल्ली से आप कह दें कि आप घोड़ा हैं तो बो घोड़ा रहा एक तरफ तो वो बिल्ली क्या हो जाएगी ये बता दीजिए। वही हाल यहाँ के लोगों का है कि हर आदमी जो हैं ये सब खत्म हो चुकी है। अब असलियत पर है वो अपने को पता नहीं क्या समझता है। और ये सब बाहर के लादे हुए गोवर के टुकड़े उनको लेकर के कौन सी शान बघारते हैं? ये तो कल गिर जाएगी। ये सब चीज़ गिर जाएगी, ये सब विनाशी लेकिन अपनी सीमा में। अपनी सीमा में। और इस चीजें हैं, इसमें रखा क्या है? आज बड़े कुर्सी पर कृत्रिमता को जब आप हटाएँगे तभी आप देखिएगा बैठे हैं, कोई भी आदमी हो, कितना भी खराब हो, कि अन्दर वो शिवतत्व आपके अन्दर चमक रहा बस एकदम लोफर हो, कैसा भी हो, वो कुर्सी पर बैठा है, सब हाथ जोड़े खड़े हुए वो कोई हैं ना एक ऐसे एक साहब हैं। आप मिले हैं उनसे? प्रतिबन्ध है ही नहीं, किस तरह का आदमी कुर्सी पर बैठे? अच्छा और गर वो आदमी उस कुर्सी से उतर गया उसका सारा कच्चा चिट्ठा आप पूछ सारी दुनिया उनके नाम से ही सोचेगी वाह क्या नाम लीजिए। जब तक कु्सी पर है बो तो समझ लीजिए दे दिया? ये सहजयोगियों की बात होनी चाहिए। भगवान से भी बढ़कर हैं। भगवान ही लोग उसको एक ऐसा चरित्र होना चाहिए, एक ऐसा विशेष कहते हैं। आपको आश्चर्य होगा कि बहुत से लोग मेरे Husband को मिलने आते तो पूछते थे वो कि ये, वो तो राक्षसों को भी क्षमा करते थे। इस प्रकार वो भगवान जी हैं? तो मैंने कहा कौन भगवान जी? जिस शिवतत्व को हमने मान्य कर लिया और साहब, श्रीवास्तव साहब। वो भगवान जी हैं, भगवान जी? तो, मैंने कहा फिर शास्त्री जी कौन हैं। कहने कोई सता ही नहीं सकता, कोई ही नहीं दे लगे, अरे वो परमभगवान हैं। आप कोन? मैंने कहा, यहाँ मैं नौकरानी हूँ। तो तब से मैं अपने पति को कदर का जोर, इस कदर की जुबरदस्ती और उसमें एक औरतों में जो एक विशेष रूप से एक विचार आता है, कि ओ, मैं इसकी पत्नी हूँ। मुझे तो ये भी नहीं पता था कि मेरे पति कहाँ, कितना, क्या उनकी ली इतना, तो उसका ये। मैंने कहा कि ये क्या घोड़े की list बना रहे हो या काहे की list बना रहे हो। ये किसलिए तुम इस तरह की बातें करते हो? और उन लोगों की बातें मुझसे समझ में मेरे आती नहीं मिला। अच्छी भली पढी-लिखी औरतें, edurcated। हम लोगों के साथ पढ़ी लिखी औरते थीं वो अपना कुछ पढ़ना न लिखना ने कुछ जानना न कोई बातें, वस ये कि पति की नौकरी कौन सी है। उसी के प्रकाश में मार अपने को….! इस कृत्रिम जीवन से आप एकदम हट जाइए, इस कृत्रिम जीवन को एकदम आप छोड़ दीजिए। ये जो कुछ भी मेमसावियत आना है क्योंकि हम सहजयोगी हैं। और सहजयोगी के लिए ये जुरूर है कि कायदे के कपड़े पहने कायदे से रहे, सुशोभित रहे । ये सब चीज़़ ठीक हैं है। आपकी जो शान है वो देख रही है दुनिया, कहते हैं! आह क्या चीज है! फिर वो कु्सी से उतरें या कुर्सी पर बैठें चाहे वो बाहर जाएं, चाहे वो अन्दर जाएं, स्वरूप होना चाहिए कि जो कहें कि शिवजी जो थे उनका क्षमा तत्व जब हमारे अन्दर बस गया तो हमें दुख सकता क्योंकि जब हमें याद ही नहीं रहा किसने क्या तकलीफ दी तो हमें कौन सा दुख होगा? इस ০

शिवतत्व में उतरने के लिए सबसे पहले आपको उसमें अन्तर्निहित जो चेतना है उसी का प्यार है। समझ लेना चाहिए, कि बिल्ली बिल्ली है, ये घोड़ा जैसे मैने आपसे बताया था कि मैं कश्मीर गई थी नहीं है और बिल्ली पर बैठा नहीं जाता है नहीं तो तो वहाँ पाँच मील दूरी पर मुझे vibrations आए. विल्ली मर जाती है। ये नहीं सोचना है कि हम दिल्ली में रह रहे हैं तो हम कोई विशेष हो गए। जैसे ये सोच लिया ऐसे ही आपका जो हैं सारा चरित्र ही एक हास्यास्पद, Idiotic हो जाता है। एक और भी मजेदार बात है कि एक साहब minister साहब से मिलने गए एक साहब वहाँ बहुत कुंद रहे यहाँ हजरत इकबाल का एक बाल है। मेरे अब भी थे, तो उन्होंने कहा, साहब आप इतना क्यों कुद रहे रोंगटे खड़े हो जाते हैं, एक वाल, इकबाल, माने हैं? आपको पता नहीं मैं पी.ए. हूँ। उन्होंने कहा, अच्छा आप पीए हैं, अच्छा नमस्कार! ये तो पीए और पाँच छः मील पर मैंने उसे पकड़ा। इतने हुए आदमी हैं। तो इस प्रकार इस दिल्ली का बहुत अनुभव मुझे आया। और उस पर भी मेरे जैसी एक दो गवार औरते थीं, तो हमलोग बैठे-बैठे धर्म की इसकी मिट्टी, पत्थर सीमेंट, फीमेंट जो भी लगा है चर्चा, इसकी चर्चा करते थे। बहुत कम लेकिन अधिकतर सबमें ऐसी बातें। जो लड़कियाँ हमारे हुए मेरे बच्चों का महात्म्य है जिन्होंने अपनी मेहनत साथ कालेज में सादगी से रहने वाली, उनको पता नहीं एकदम उनके पर कैसे चढ़ जाते हैं ? फिर हर चीज़ में ये मेरा घर है, एक गर उनका नैपकिन खो गया तो बो तो ये आपके ऊपर निर्भर है कि जब आप इसके सारे ब्रह्माण्ड को फोन करेंगी, भई तुम गलती से मेरा नैपकिन तो नहीं ले गए। अरे भई एक गया तो को जागृत करने आ रहे हैं, शिवतत्व पाने आ रहे हैं. गया, चूल्हे में गया। एक किसी का चम्मच खो गया तो उसके लिए वो सारी दुनिया को फोन करेंगे कि भई बो एक मेरे यहाँ से चम्मच खो गया है, इन्हें है। जो लोग Serious होते हैं उनको रोज चाहिए शर्म भी नहीं आती। किसी चीजू की, इतनी बंशर्मी अपने मुँह पर दो थप्पड़ मारें। क्योंकि मैं जब देखती से इस तरह की कंजूसी की बातें करना और ऊपर हूँ तो मेरा ही मन करता है कि दो थप्पड़ इनको से लगाऊ। जब आपके अन्दर शिवतत्व जागृत हो गया मैंने driver से कहा कि यहाँ से चलो, वहाँ से चलो। तो वो मुझसे कहने लगा, यहाँ तो कोई भी चीज नहीं, तो मैंने कहा नहीं चलिए यहाँ कुछ होंगा जरूर| जाके देखा तो बहुत मुसलमानो के ऐसे छोटे-छोटे घर थे, आगे जाकर पूछा यहाँ क्या है? कहने लगे, कौन मोहम्मद साहब, एक बाल वहाँ रखा हुआ था vibrations थे। आप सोच लीजिए एक बाल में क्या शक्ति होगी। इसी तरह से ये आपका जो आश्रम है, ै, उसका महात्म्य नहीं है लेकिन इसके अन्दर बसे से प्यार से इसे बनाया और हर चीज़ इसकी vibrate करी है। आगे लोग मेरा फोटो न मिले तो इसी के बाहर बैठकर के vibrations ले सकते हैं। पढती थी इतनी सीधी, सरल, अन्दर आएं तो याद रखें कि आप अपने शिवतत्व उसी को जानने आ रहे हैं। और जिस आदमी में शिवतत्व होता है बो आनन्दमय, हँसता खेलता रहता आप लिपस्टिक लगाओ ये बनाओ पना श्रृंगार करो और अन्दर से तो आप इतने टूच्चे, छोटे हैं तो आप इतनी मनहूस शक्ल बनाकर क्यों आए तबियत के लोग हैं। उनको क्या इतना महत्व देना, हैं? और सवेरे से माफ करो, माफ़ करो, भई काहे जो कि छोटी-छोटी चीजों के लिए, इतनी बरबाद चीजों के लिए परेशान हैं। कभी-कभी तो आश्चर्य करो, माफ करो। मैंने कहा देखो फिर से मत कहना हो जाता है कि किस तरह से ये लोग अपने को इतना बड़ा बनाकर दिखाते हैं और होते हैं कितने है कि हम लोग तो शिवतत्व को प्राप्त हैं और हमारे टूच्चे, कितने Iow level के। उनसे तो एक चौजू अंदर आनन्द की उदियाँ उठ रही हैं हम Serious नहीं छूटती, एक इतनी सी चीजू किसी के पास रहे केसे हो सकते हैं? कोई हमारे घर में मातम हो रहा जाए तो उनके प्राण निकल जाएंगे। वी सब अपने साथ ले जाने वाले हैं तो शिवतत्व में जब हम अविनाशी चीज की सोचते हैं तो संसार को सारी उनकी बीवी के साथ होते हैं तो देख लेना चाहिए, चीजू जो है वो हमारे लिए क्षण भंगुर है। किसी वो ऐसा मुँह लटका लेते हैं जैसे किसी पशानी में चीज का महात्म्य ही नहीं। उसके पीछे छिपी हुई या की माफ करो। सवेरे से चलता है माफ करो, माफ माफ करो, नहीं तो एक लगाऊँगी। क्योंकि बात ये है कि कोई मर गया है? और ये भी एक बीमारी उत्तर हिन्दुस्तान में है खासकर आदमी लोग जब चले जा रहे हों । कभी मैंने इधर के आदमियों को

औरतों से हँसते खेलते वोलते नहीं देखा। ज्यादातर तो कहते हैं हमारे भैया लोग जो यू.पी. के हैं कि आदमी आगे चलता है और बीवी घूँघट निकालकर है, सब आनन्द हमारे लिए पूरा भरा हुआ है और हम उससे अछूते ही रहें । आपस में जो सहजयोगियों का आपस में मेल-जोल है वो तो बहुत अच्छी बात दस कदम पीछे चलती है। वो बिचारी देखती चलती है लेकिन अपनी गृहस्थी में भी इसी तरह से है कि उसका चमरोदा कहां जा रहा है उसके पीछे मेलजोल होना चाहिए। न कोई स्त्री पुरुष को dominate करे न पुरुष स्त्री को dominate करे, सब लोग करना किसी आप होटल में जाकर बैठिए, किसी अपनी अपनी जगह आनन्द में रहें। इसमें आपको ये रेस्तरां में बैठिए, वहाँ अगर आप देखिए कोई भी है यहाँ औरतें इसलिए भी चिढ़ती हैं आदमी से आदमी किसी औरत से बहुत बात कर रहा है तो बहुत, दिल्ली मैने देखा, इनके पति काम में बहुत व्यस्त हैं। अब अंगर आपके अन्दर शिवतत्व है, आपके हृदय में शिवतत्व है इस शिवतत्व से ही आनन्द मिलता है। गर आप चाहे अपने पति से, आप आनन्द तो नहीं पा सकती, उससे सुख पा सकती हैं, उससे अपने अहंकार को अपने पाल उससे बात भी नहीं करने का, न उसे कहीं बाहर सकती हैं लेकिन पति से आपको आनन्द नहीं मिल ले जाने का, उसे कोई companionship, नहीं। और सकता। आनन्द के लिए तो आप ही का अपना शिव और पार्वती ये दानों अटूट सम्बन्ध से बँधे हैं, शिवतत्व है उसको पा लीजिए। तो फिर दुखी रहने जैसे चन्द्र और चन्द्रिका जैसे अटूट सम्बन्ध में की कौन सी बात है? गर उसको काम करना है, किसी और के साथ उनका सम्बन्ध चल हो नहीं मेहनत करना है, हम तो अपने जीवन में आप बताएं सकता और आनन्द आ ही नहीं सकता क्यांकि स्त्री तो आपको विश्वास हो नहीं होगा। जितने साल तक हम India में रहे हमारे पति ने एक भी छुट्टी नहीं ली, एक भी वो भी इसलिए छुट्टी ली एक दिन उस दिन मौलाना आज़ाद मर गए थे और सब चीज़ बन्द ही हो गई थी। लेकिन मैंने कभी शिकायत नहीं की, मैं अपने आनन्द में मग्न हैूँ, मुझे क्या? वो तो अच्छा ही काम कर रहे हैं, देश का काम कर रहे चाहिए कि ये जो है ये शिव और पार्वती का हैं, मेहनत कर रहे हैं, तो काम करने दो और उनके काम की वजह से मुझे भी तो कितने लाभ हो रहे की हैं, शिवजी ये नहीं कहते कि तुम मेरे ढंग की हैं, तो उनको बार-बार सताने से फायदा क्या? और हो जाओ और पार्वती ये नहीं कहतीं कि तुम मेरे तकलीफ देने से फायदा क्या ? उल्टे अगर वो थके आए, उनको तकलीफ हो, उनको देखना चाहिए. उनको आराम देना चाहिए, उनको संभालना चाहिए। (Love) जिसे कहते हैं, प्यार मनमुटाव चलते रहता है। यही चीज़ू हमारे यहाँ हो नहीं पाती है इसलिए भी आनन्द बढ़ता नहों। औरतें तो दिन भर आराम करती हैं और शाम को चाहती हैं कि आदमी बारह एक बजे तक उनको छुमाते फिरे। सो इसमें आपको ये पता होना चाहिए कि आपको अगर पूरे रात भी घुमाए तो आपको आनन्द नहीं आने वाला क्योंकि आपका आत्मा ही जागृत नहीं हैं। आपका आत्मा जागृत जब हो जाए तो आपको इसकी जुरूरत ही है कि नहीं होती हैं। हम दोनों आदमी आज तक कभी चलूं। और आदमी लोगों को तो बीवी से बात समझ लेना चाहिए. कि इसकी वो बीवी नहीं है, impossjblel क्योंकि बीवी से बात करते वक्त उनको पता ही नहीं क्या बिच्छू काट जाता है कि सॉँप काट जाता है। ऑर experience मैंने देखा है कि बीवी घर में है गर, ये इतना common। उनकी शक्ति है और यही कार्य करती है जो ये चाहते हैं। कितना आपस में मधुर उनका सम्बन्ध है और किस तरह से आदान-प्रदान और किस तरह से आनन्द! तो आदमी जो है वो हँसता खेलता रहे. औरते जो हैं बो भी हँसती खेलती रहें और आपस में बड़ा प्रेम और आनन्द आता रहे, उसे कहना पाट (अस्पष्ट)। शिव अपने ढंग के हैं पार्वती अपने ढंग ढंग के हो जाओ। न कोई जुबरदस्ती, न कोई ये और आपस में एक तरह की बड़ा सा ही अच्छा शिवतत्व से हमें ये भी समझना है कि जो विवाह हमारे अन्दर होते हैं वो तभी पूर्णतया सुखी हो सकते हैं जब पुरुष और स्त्री दोनों ही अपने आनन्द को प्राप्त करें। जब तक स्त्री ये सोचेगी कि मैं आदमी को कितना कव्जा करूं और आदमी सोचेगा कि मैं अपनी औरत को कितने कब्जे में रखं तो उस बक्त में ये समझ लीजिए ये आनन्द खत्म हो जाता है। और इतनी बेवकूफी की बात जब अपने सामने सब कुछ थाली भरकर रखा हुआ

घूमने अकले नहीं गए, आपको आश्चर्य होगा, लेकिन कुछ मुझमें कमी नहीं हैं, मैं तो मस्त हूँ। किया है जो आनन्द लोग देखकर के सोचें कि हाँ मुझे कोई नहीं और उनमें भी कोई कमी नहीं है गर ये चीज़ समझ ली जाए कि हमारी आत्मा से ही हम आनन्द को प्राप्त कर सकते हैं और जिस सुख को देखकर के मैं ही खुश हो जाती हूँ। मेरे बच्चे इतने हम सोचते हैं वो विनाशी सुख है। तो जब तक आनन्द में रहना है आनन्द में रहो। ये चीज नहीं दूसरे का मजा उठा रहे हैं। यानि जब इन लोगों की की, वो चीजू नहीं की, ऐसा नहीं किया, दोनों का भी कहना ये दुख का कारण है। आज इसलिए मैं है अब बदल रही है। जहाँ पर दोस्ती नहीं, आपस बता रही हूँ कि मनुष्य निसंग में आ जाए, निसंग में, बिल्कुल, कोई भी चीज उसको न रोके, जहाँ किसी भी चीज़ की लालसा, किसी भी चीज की इच्छा उसको न दबाए। तब कहना चाहिए कि वो सहजयोगी दोस्ती, प्यार के लिए प्यार, इससे बढ़के और माँ है। तब वो सहजयोगी हो गया| जहाँ वो किसी भी को कुछ नहीं चाहिए। ये जिस दिन हो जाए तो मैं इच्छा से- पूरा नहीं, ये चीज़ नहीं हुई चलो दूसरी कहूं कि इस आश्रम बनाने का और मेरी जो मेहनत चीज, वो चीज़ नहीं हुई चलो दूसरी चीज़, ऐसा जो मस्त रहता है आदमी उसको कहना चाहिए वो सहजयोगी है। और आशा है इस दिल्ली शहर में आप इस तरह के लोग तैयार होने वाले हैं और होएंगे क्योंकि अब हमारा आश्रम बन गया है और आज इस शुभ अवसर पर हमने शिवतत्व को प्राप्त साहब आनन्द में है, और आनन्द की जो लहर होती है एक आपस में जो एक उसका फैलाव होता है, आपस में खुश हैं, इतने प्रेम से बैठे हैं और एक दोस्ती देखती हूँ तो ऐसा लगता है कि ये दिल्ली जो में इसको काट, इसको खींच, इसको ये कर, एक को नीचा कर, एक को ऊपर कर, उस जगह ये दोस्ती का वातावरण और इतना शुद्ध, दोस्ती के लिए है उसका सब मुझे फल मिल गया। आशा है, आज आप अपने शिवतत्व को स्थापित करें। परमात्मा आपको धन्य करें। (मूल आडियो के अनुरूप)