Birthday Puja, Introspection

New Delhi (भारत)

1989-03-19 Birthday Puja – Introspection (Hindi)

जन्मदिवस पूजा दिल्ली, १९ मार्च १९८९ सहजयोग के कार्य में व्यस्त न जाने कैसे समय बीत जाता है। अब करिबन अठारह साल से सहजयोग कर रहे हैं हम और उसकी प्रगती अब काफी हो रही है। आपने देखा किस तरह से इसकी प्रगती बढ़ रही है। अब जन्मदिन के दिन अब हमारे तो आपकी सबकी स्तुति करनी चाहिए और सब अच्छा ही कहना चाहिए। लेकिन एक ही बात मुझे जो समझ में आती है और जो मुझे कहनी चाहिए वो है कि अपनी गहराई को बढ़ाना है। अपनी गहराई को बढ़ाना बहुत जरुरी है और ये गहराई हमारे अन्दर है, कहीं ढूँढने नहीं जाना है, अपने ही अन्दर बस ये गहराई है। लेकिन जब हम गहराई को बढ़ाते हैं तब ये देखना चाहिए कि हम पहले स्वयं कहाँ खड़े हैं। इसको पहले जान लेना चाहिए कि हम स्वयं कहाँ खड़े हैं। और उसे जानने के लिए एक तरीका है, सहज सरल तरीका है कि अपनी ओर दृष्टि करें जैसे कि हमारा व्यवहार कैसा है? हम क्या करते हैं? हम किस तरह से अपने मन में विचार लाते हैं? हमारे तौर-तरीके कैसे हैं? हम अपने को कहाँ तक सीमित रखते हैं। जैसे शुरुआत में जब दिल्ली में काम शुरू किया तो लोगों के तो अन्दाज ही कुछ और थे मैं तो एकदम सकुचा गयी थी क्योंकि उस वक्त किसी को कुछ मालूम ही नहीं था पूजा के बारे में। वह सब प्लास्टिक के डिब्बियों में सामान-वामान लेकर के सब लोग पहुँचे तो मेरी तो हालात ही खराब हो गयी। मैंने कहा कि, ‘अब तो क्या होगा बिचारों का। ये तो अज्ञानी हैं, इनको तो कुछ मालूम ही नहीं है। प्लास्टिक में कुमकुम लेकर आ गए हैं और घर का ही लोटा उठा लायें हैं पैर धोने के लिए तो बड़ी घबराहट हुई मुझे। मैं तो एकदम , मेरा तो सारा बदन | ही एकदम सकुचा गया। मैं रोके रही सबको कि ठण्डे रहो, सभी नहीं तो हनुमानजी कहीं बिगड़ न जाए। कहीं गणेशजी का गुस्सा शुरु हो जाए तो न जाने क्या दिल्ली वालों का हाल होगा! मेरे समझ में नहीं आया कि कैसे कहूँ कि प्लास्टिक से पूजा नहीं होती है। जिस घर में चोरी हुई, जिस घर में पूजा हुई उसके वहाँ पर कुछ-कुछ चीजें रखी हुई थी, बिचारे महोदय बड़े अच्छे थे, उन्होंने हमें जगह दी, उनकी चीज़ें गायब हो गयी। पूजा के बाद सब लोग कुछ-कुछ उठाकर चल दिये। तो इससे शुरुआत हुई। उसने कहा कि में अपने यहाँ तो नहीं दे सकता। आपको चाहिए तो आप हमारे कम्पाऊण्ड में कर लीजिए पूजा । ‘ये लेकिन कम्पाऊण्ड से वे घर में न आयें। पानी-वानी का सब बाहर इन्तजाम है।’ तो मुझे तो बड़ा वैसे लगा, तो बड़ा अपमान है किसी तरह से।’ इस प्रकार यहाँ सहजयोग शुरु हुआ। और उस वक्त दुनिया भर के बीमार लोग हमारे पास। मेरे तो सबेरे से शाम तक हाथ दुःख जाते थे। और सबको तो यही फिकर कि ‘मेरा लड़का ठीक नहीं, लड़की ठीक नहीं। मेरा तो बाप ठीक नहीं, मेरी तो माँ ठीक नहीं।’ दुनिया भर के मरीज़ खड़े कर दिये। सबेरे से शाम तक यही काम ! तो इसके बाद हमारे भाईसाहब के घर में शुरु हुआ। वहाँ भी यही मेरी तो जान खा जाये कि मेरे इसको ये हो गया, मेरे इसको वो हो गया, इसे तो देखना ही होगा, ऐसे कैसे आप नहीं देख रहे हैं, ये नहीं, वो नहीं । अब चार बज जाएं मुझे खाने को नहीं मिला तो भी वो जान को लग जाए। उसके बाद टैलिफोन पे टैलिफोन, टैलिफोन पे टैलिफोन कि ‘नहीं मुझे तो माताजी से बात करनी ही है।’ जैसे कोई सबका मेरे ऊपर अधिकार ही है, पूरी तरह से। तो उसके बाद में फॉरिनर्स आने शुरु हुए तो उसमें भी बड़ी हालत खराब कर दी हमारी यहाँ। एक तो बीमारी से मैं बिल्कुल तंग आ गयी थी | जिसको देखो तो ‘ये मिनस्टर आ रहा है, वो मिनस्टर आ रहा है। सब लोग समझते हैं कि हम बड़े महत्वपूर्ण हैं, हमारे बच्चे बड़े महत्वपूर्ण हैं, हमारे रिश्तेदार बड़े महत्वपूर्ण हैं। यहाँ तक कि वे अस्पताल तक की विजीट करवायें (अस्पष्ट)….. ये लोग तो इतने उथले लोग हैं कि इनको तो और कुछ सूझता ही नहीं, इतनी जबरदस्त। फिर इसके बाद हमारे भाईसाहब के यहाँ हमारा प्रोग्राम शुरू हुआ। तो वहाँ कुछ उन्होंने बिगड़ना शुरु किया कि ‘तुम लोग सभी स्वार्थी हो, सिर्फ हमारी बहन को इसलिए सताते हो कि बस इसकी बीमारी ठीक करो, उसकी बीमारी ठीक करो । बड़े

स्वार्थी हो। तुम लोग क्या करने वाले हो सहजयोग के लिए। यहाँ रहने के लिए तक इनको जगह नहीं, कुछ नहीं। ये अपने पैसों से आती है बिचारी। ये है।’ सबको भगाया, जितने बीमार थे उन सबको भगाया कि खबरदार अगर किसी ने बीमारी की बात की तो उसको नहीं छोडूँगा मैं! जब उन्होंने ये शुरु कर दिया तब लोगों की संख्या बहुत कम हो गयी लेकिन कायदे से लोग थोड़े शुरु हो गये। उसके बाद यहाँ परदेसी लोग आयें और शादियाँ-वादियाँ की हमने तो वो परदेसी लोगों से भी वो ‘तुम हमको फारेन एक्सचेंज दे दो, इतना पैसा हमको दे दो। नहीं तो इसमें ऐसा ठीक हो जाएगा कि हम आ रहे हैं विलायत । विलायत में सबकुछ हमारे रहने का इन्तजाम कर दो।’ ऐसा सब काम कराया। फिर मुझसे इतना खाने-पीने का पैसा लिया कि मेरा तो दिवाला ही बज गया। साथ ही सारा बैंक बैलन्स ही खाली हो गयी। फिर मैंने कहा कि अब तो मैं दिल्ली ही नहीं आने वाली हूँ क्योंकि इनसे तो हम एक रूपया भी नहीं लेते थे खाने-पीने का और इतना खर्चा हुआ कि मैं तो बिल्कुल तंग आ गयी कि यहाँ पर इन दिनों में मैं बात कर रही हूँ इयर ७४-७५ की नहीं ७७ से ७९ तक सब बैंक खाली हो गया, अब मैंने कहा कि अब करें क्या? तो जैसे कि पहले यह कि बीमारियाँ ठीक करो, बड़े ये लो लेवल के लोग थे, जो सबकी बिमारियाँ ठीक कराने के पीछे लगे थे । इसका मतलब है कि इनको परम का मतलब ही नहीं मालूम है। परम पद में आना ही नहीं चाहते है। जिनकी बीमारियाँ ठीक करनी है उनको आप फोटोग्राफ दे दीजिए और उनसे कहना की करें। पर वो तो फोटो लेंगे ही नहीं क्योंकि वो मानते ही नहीं सहजयोग को। तो फिर क्यों उनके लिए परेशान कर रहे हो माँ को। फिर उस पर प्रेशर करने का कि वाइस प्रेसिडन्ट साहब मिलने को आ रहे है। मैं तो तंग आ गयी कि फारेनर्स को यहाँ लाने के लिए पैसे तो है नहीं और फिर कुछ और चीज़ शुरु करें। फिर सहजयोगियों की खोपड़ी में कुछ आया और उन्होंने कहा कि अच्छा माँ ये थोड़े से लोग आ जाएं और हमारे घरों में रहें। और उनका जो पैसा बचेगा वो हम पैसे दे देंगे आश्रमों में। हालांकि महाराष्ट्र से यहाँ लोगों के पास पैसे ज़्यादा है। यहाँ सबके पास मोटर है। महाराष्ट्र में एक मोटर मिलना मुश्किल है। एक भी किसी के पास में अॅम्बॅसिडर मोटर नहीं कि जो मैं उनके मोटर में जाऊं, ये हालत है। लेकिन पैसे की ऐसी तकलीफ कभी किसी को नहीं हुई। यहाँ इतने कंजूस लोग हैं कि मैं तो हैरान हो गयी हूँ कि ये मोटरों में घूमतेहैं । सबकुछ चाहिए, जेवर के जेवर, औरतों के कपड़े देखिए, आदमीओं के कपड़े देखिए सबकुछ बहुत बढ़िया, लेकिन वहाँ ये बाद नहीं कि ये परमात्मा का कार्य है। तो जिस वक्त हमने काम शुरु किया, तो सब कोई रुपया लाकर देने लगा। मैंने कहा कि ‘नहीं, अभी तो हमने कुछ बनाया नहीं है, ट्रस्ट-वस्ट तो अभी बनाया नहीं। जब ट्रस्ट बनायेंगे तब तक आपको रुकना होगा, तब तक आप अपना पैसा जमा कर के रखो।’ और जिस वक्त हमने ट्रस्ट बनाया, ऐसा कोई भी नहीं था जिसने हजार रुपये से कम दिया हो, ऐसा कोई भी नहीं था । उसी वक्त हजार, दो हजार, चार हजार, पाँच हजार, जिसको जो मिला , जो उन्होंने एकट्ठा किया वो उन्होंने ला कर दिया। पैसे की तो मुझे कोई जरुरत नहीं है। आप तो जानते हैं कि सारा पैसा कार्य के लिए ही होना है। उस वक्त हमें यहाँ अच्छी जमीन मिल रही थी। काश! हम उस वक्त खरीद लेतें, पर हमने सोचा दिल्ली वालों के पैसे से ही होना चाहिए और दिल्ली वाले करें। अब महाराष्ट्र में जो रुपया एकठ्ठा हुआ उससे जमीने खरीदीं गईं। और सब जगह हमने जमिने खरीद कर रखी है । और यहाँ भी जो रुपया बाद में दिया है वो सब महाराष्ट्र से ही आया हुआ है। इसका मतलब ये नहीं कि आप रुपया बहुत खर्च करें। आप इतने फैशन करते हैं। यहाँ दिल्ली की औरतें बड़ी फैशन करती है। रोज उनको नयी साड़ियाँ चाहिए। कपड़े चाहिए। और अगर किसीको नायलॉन की साड़ी दें तो कहते हैं कि हम नायलॉन नहीं पहनते, सिर्फ शिफॉन पहनते है। अगर आप इतने रईस हैं तो एकाद कभी कुछ रुपये सहजयोग के लिए तो देना चाहिए । हमने तो बहुत कुछ रुपया दिया है सहजयोग के लिए । मेरे हजबंड से तो मेरा झगड़ा हो गया था इस बात को लेकर एक बार। उन्होंने कहा कि, ‘अच्छे से मेरे बैंक को आपने पूरा खाली करवा दी। पिछले सब गुरु लोग तो बैंक भरते थे, तुमने तो मेरी बैंक खाली करवा दी।’ तो भाई ये शर्म की बात है, बहुत शर्म की बात है कि आप लोगों की तरफ से मुझे ऐसा करना पड़ा। आदमी लोग भी यहाँ कितना खर्चा करते हैं, मैंने देखा है कि मोटर होनी चाहिए, टेलिविजन होना चाहिए। महाराष्ट्र में कितने लोगों के पास टेलिविजन है ? ये होना चाहिए, वो होना चाहिए, पर सहजयोग के लिए पैसा नहीं है। और पहले उस जमाने में हमारे पास साढ़े चार लाख रुपये एकठ्ठा हये थे, उस जमाने में, तब कितने सहजयोगी थे, वैसे तो वो बहुत गरीब थे आप लोगों से पैसों के मामले में। कोई बड़े पोजिशन में नहीं है। महाराष्ट्र में आप जानते हैं कि वहाँ

पर सारे जितने भी बड़ी-बड़ी जगह है वो सब मारवाडी लोगों की है, गुजराती लोगों की है और सिंधी। इन्होंने सारा बिजनेस ले लिया है। आपको एक भी सहजयोगी वहाँ बिजनेस वाला नहीं मिलेगा । और कितने कर्मठ लोग हैं। कैसे काम करते हैं आपने देखा। कितने, वहाँ तो बड़े-बड़े प्रोफेशनल लोग हैं पर आप किसी को भी पाईयेगा नहीं घमण्डीपना में। तो इस तरह से जब यहाँ सहजयोग शुरु हुआ तो मैं बहुत घबरा गयी थी कि यहाँ सहजयोग कैसे चलेगा । यहाँ के लोग तो अपने में ही हैं, बड़े सेल्फिश हैं । अपनी ही बात करते हैं। अपने स्वार्थ में ही रहते है। इनको क्या परमात्मा मिलेगा। पर धीरे-धीरे ऐसा आपकी माँ का प्यार है कि वो माँ की प्यार में बदलते गये। बहुत बदल गये। मुझे तो देखकर बहुत खुशी हुई कि अब बहुत, आप लोगों में अन्तर आ गया है। तो भी, मैं ये कहँगी कि एक जमाना था जिस वक्त कि गांधीजी खड़े हुए, उन्होंने कहा कि देश का काम करना है। देश भर का ही काम था कोई मनुष्य भर का काम नहीं था, दुनिया भर का काम नहीं था, कुछ नहीं । हमें याद है कि हमारी अम्मा ने जितने भी घर के जेवरात थे गिन के सारे उनको दे दिये। उनके दो-चार ट्रेडिशनल जो थे वो छोड़ के बाकी सब दे दिये। हम लोगों ने भी हमारी जो चुड़ियाँ थी वो उतार के दे दी। हमारी मदर ने भी ऐसे बहुत और किये हैं। और भी बहुतों ने ऐसे काम किये हैं। लेकिन ऐसी उन्होंने कौनसी बड़ी भारी बात कही थी……अस्पष्ट… आप लोगों का सबका भला हो गया है सहजयोग में आकर। सबके हालात ठीक हो गये है, सब कुछ ठीक हो गया है, तन्दुरुस्तियाँ ठीक हो गयी है। लेकिन सहजयोग के लिए लोग पैसा नहीं निकालते है। अगर आज पैसा होता तो ये जगह भर अच्छे से बना सकते थे हम। अब ये अटके पड़े है कि माँ, पैसा दो, पैसा नहीं है अब, माँ, आप पैसा दो। हमने कहा ठीक है तो आज हम ये ग्यारह हजार दे रहे हैं टोकन की तरह। आगे भी भेजेंगे। लेकिन आप लोगों को खुद सोचना चाहिए कि ये हमारा आश्रम है, हमें इसके लिए कुछ देना चाहिए। और इससे हमें कितने लाभ हुए हैं। सहजयोग से हमने कितना प्राप्त किया है। अब दूसरी बात ये है कि इससे जो एक हमारे अन्दर जो कैटेगरी है उसे देखना चाहिए। अब जब हम अपने अन्दर देख रहे हैं कि हम कंजुसी कर रहे हैं, जान बचा रहे हैं, कुछ काम कोई बताता है, तो कोई हाजिर ही नहीं होता है। तो हमें सोचना चाहिए कि हमारे अन्दर गहराई ही नहीं है। हम कंजुसी कर रहे हैं, हममें गहराई ही नहीं है। आगे चलना चाहिए, हम अपने रिश्तेदारों की बीमारी के लिए हम माँ को तंग कर रहे हैं, ये बहुत ही लो टाइप के सहजयोगी हैं। इसमें गहराई नहीं है। माँ को परेशान कर रहे हैं। अरे, अगर माँ से तुम्हारे सम्बन्ध ठीक हो जाए तो कुछ कहने की जरुरत नहीं है। वैसे भी रिश्तेदारी ठीक हो जाती है। ऐसे भी कुछ लोग है जिन्होंने बताया कि फलाने साहब न्यूयॉर्क में बीमार है और फौरन ठीक हो गये। ऐसे भी लोग है। लेकिन आपमें गहराई कम है। और जब आपमें गहराई कम हो जाती है तो ये सब होता है। और सहजयोग में पैसे कमाने का भी लोग विचार करते हैं। ये भी बड़ी गन्दी चीज़ है और बहुत लो कर देता है आपको । इसमें कुछ हो, कि किताब बिक | जाये, फलाना हो जाए, ठिकाना हो जाए ये सब गलत बात है। सहजयोग सत्ता के लिए नहीं है, पैसे के लिए नहीं है, आपसी रिश्तेदारों के लिए नहीं। ये आपके हित के लिए है। आपको अपना ही हित साधना है और परम पद को प्राप्त करना है। और जब तक हम इसका निश्चय नहीं कर लेते हैं कि हमें परम पद प्राप्त करना है और बाकी चीज़ें सब व्यर्थ है । फैमिली के झगड़े, लड़कों के झगड़े, मियाँ-बिवी के झगड़े ये सब मुझे कहने की बाते नहीं होती है। परम पद को पाने के बाद इसे आप अपने आप ही सॉल्व कर सकते हैं। अब सबसे बड़ा एक दोष उसमें आ जाता है जैसे कि आप लोगों से बात करने का यही सबसे अच्छा मौका है, जहाँ मैं आपको बता सकती हैँ की अहंकार को देखते रहना चाहिए कि हमें किस चीज़ का अहंकार है, किस चीज़ को हम महत्वपूर्ण समझते हैं । कौनसी चीज़ को हम सोचते हैं कि जरुरी है और हमें करना चाहिए। अपने विचारों को देखना चाहिए और सोचना चाहिए कि हम किस चीज़ को इतनी बहुत महत्वपूर्ण चीज़ समझते है। हम कौनसी चीज़ के लिए सोचते है कि ये चीज़ हमारे लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है । उसी को तोलना चाहिए। कोई कोई लोग तो कहते हैं कि हमारे लिए तो ये बहत महत्वपूर्ण है माँ कि परम पद को प्राप्त करना है। बस हो गया ऐसे लोग तो ठीक है। उनको तो कुछ कहने की जरूरत नहीं है । बाकी तो सब होते ही रहता है। नौकरी, खाना- पिना और दुनिया भर |

की चीजें। मैं चाहती हूँ कि दिल्ली वाले आज इस तरह से पूरी तरह निश्चय कर लें कि माँ के जन्मदिन के दिन, अब हमारी भी उम्र ६६ साल की हो गई है, काफी उम्र हो गई है और एक क्षण भी हमारा बेकार नहीं गया है । इतनी मेहनत हमने की है। जितनी हमने मेहनत की है हम नहीं चाहते कि आप लोग उतनी मेहनत करें, बिल्कुल भी नहीं करने की जरुरत है। हम आपके लिए मेहनत करने के लिए तैयार है सिर्फ आप अपने अन्दर अपने को तौलते रहिए कि मैंने क्या किया है, सहजयोग के लिए क्या किया है ? जिसकी वजह से कि मैं आज ऐसा पहुँच नहीं पाया। सहजयोग के लिए मैंने क्या किया ? माँ के लिए नहीं, सहजयोग के लिए । बहुत से लोग हैं जो मुझे रुपये दे देते हैं, कभी कुछ दे देते हैं, उससे क्या फायदा है! वो तो सिर्फ मैं सहजयोग को ही दे देती हूँ, छोड़ती थोड़ी हूँ। बेहरहाल वो भी एक चीज़ है अगर ऐसा कोई दे तो वो सहजयोग के लिए दे सकते हैं। ठीक है आप प्यार के स्वरूप कुछ दे, जन्मदिन के दिन कुछ दे तो वो स्वीकार्य है। कोई बात नहीं है । लेकिन मेरे लिए कुछ खास जरूरत नहीं है किसी चीज़ की। मैं तो हरदम लड़ती रहती हूँ कि जितना हो कम से कम खर्चा करो । इसलिए कि रुपया कुछ बचे और आप लोग इसे सहजयोग पर खर्च करें । सहजयोग में आप जानते हैं कि हमारे पास कोई और तरीका तो है नहीं । हम तो ऐसे-वैसे लोगों से तो कभी रुपये लेते नहीं कि कहीं भीक माँगते फिरते है या किसीसे कहते हैं कि आप हमें रुपया-पैसा दे दें। सो, मेरी यही विनती है आप लोगों से कि आपको अपने को तौलना चाहिए कि हम कहाँ तक हैं और हम क्या चाहतेहैं । | तो सहजयोग में जब तक आपका चित्त परमात्मा की ओर पूरी तरह से लगा नहीं रहेगा और सब ऐसी-वैसी चीज़ों में लगा रहेगा तो आप या तो पैसे बनाने के बारे में सोचेंगे या फिर उसकी बात सोचेंगे, नौकरी की सोचेंगे, धन्दे की सोचेंगे तो जो असल चीज़ है वो नहीं मिलने वाली है। और असल चीज़ मिलते ही बाकी सब ठीक हो जाता है। ये ऐसी कुछ विशेष चीज़ है। और जब | | तक ये निगेटिवीटी बनी रहेगी तब तक आप का काम बनने ही नहीं वाला है। अभी आज की ही बात बताते हैं, आज चाबी नहीं खुल रही थी तब मैंने कहा कि आज चाबी किसने बन्द की थी। तो कहा की ‘इन्होंने’। तो मैंने कहा कि अच्छा इन्हें थोडी देर बाहर भेजो। और उनके बाहर जाते ही चाबी खुल गयी थी। आपका कोई काम बन ही नहीं सकता, जब निगेटिव होंगे तो कोई काम बन नहीं सकता। लेकिन अगर आप इस स्थिति पर आ जाए, आपके सारे काम अपने आप बन जाते हैं। और वो इतने सुन्दर बनते है कि कभी-कभी आपको लगता है कि ‘माँ मैं ये नहीं चाह रहा था।’ और फिर आप बाद में कहते है कि अच्छा हुआ यही हुआ और मैं छूट गया झंझट से। इस प्रकार सहजयोग की एक किमया है, अपनी एक उसका चमत्कार है कि जो चीज़ सामने आती है वो स्वीकार्य करना चाहिए। और अन्त में आप ये कहेंगे कि यही मेरे लिए हितकारी था, यही अच्छा था । उसको प्रेम से स्वीकार्य करना चाहिए और तौलते जाना चाहिए अपने को जीवन में कि जैसे ही जीवन में आगे बढ़ेंगे तो आपको पता होगा कि इसके बड़े ही आशीर्वाद है, इतने अनन्त आशीर्वाद है कि सारे देवी – देवता आपके साथ लग जाएंगे। आप जहाँ जाएंगे आपके साथ आगे-पीछे दौड रहे होंगे। कोई आपको सता नहीं सकता, कोई आपसे छल नहीं कर सकता, आपको कोई परेशान नहीं कर सकता, आप पर कोई केस नहीं कर सकता, कुछ नहीं। बिल्कुल आप पूरी तरह से, एकदम से ही आप सुरक्षित है। कोई आपको तकलीफ नहीं दे सकता। कोई अगर आपको तकलीफ देगा तो उसको बहुत तकलीफ होगा ये भी आप देख लीजिए । फिर हर तरह से आपकी हालत ठीक हो जाएंगी, आपकी तंदुरुस्ती ठीक हो जाएगी। ये ठीक हो जाएगा, वो ठीक हो जाएगा। लेकिन ये भी एक प्रलोभन है हमारे लिए, एक प्रलोभन है । जैसे कि हम जा रहे है और हमें प्लेन पकड़ना है । रास्ते में मदारी का खेल हो रहा है, ये हो रहा है, वो हो रहा है लेकिन उससे हमें क्या मतलब है। हमें तो प्लेन पकड़ना है। तो फिर इस प्रलोभन में आप भटके तो गये। तो अब लोगों को मैंने देखा है कि सहजयोग में आते ही लोगों को बड़े पैसे मिल जाते हैं और फिर भटक गये। भटक गये तो उसके बाद कैन्सर हो गया, और फिर वापस आये मेरे पास। ‘मैं छोड़ कर चला गया था सहजयोग। बिजनेस में बहुत काम था, ऐसा था, वैसा था।’ सबसे पहली जो चीज़ है-सहजयोग में अपना मन बनाए रखे। हरेक प्रोग्राम जो है उसे अटेन्ड करनी चाहिए । हर कलेक्टिविटी में आना चाहिए। हर पूजा में जहाँ भी होता है आना चाहिए। पूरा चित्त इसमें देना चाहिए। पूरा समर्पण इसमें

करना चाहिए। बाकी चीज़ें परमात्मा सब सम्भाल लेता है। आप तो जानते हैं कि आपकी माँ को पैसे का बिल्कुल समझता नहीं है, बैंक का समझता नहीं है। अब जो लोग मेरे साथ रहते हैं वो भी कहते हैं कि माँ का ये क्या हाल है। ….अस्पष्ट…. मेरी कुछ समझ में नहीं आता है कि ये है क्या भला! क्योंकि ये आजकल के कायदे-कानून, ये, वो ये कुछ मैं जानती नहीं। पर ऐसे देखा जाए तो मैं कायदे में बहुत होशियार हूँ। जो पॉईंट मैं निकालती हूँ वो बड़े-बड़े लॉयर बोलते है कि आपको ये पॉईंट कैसे सूझा। क्योंकि इसी में सूक्ष्मता है, मनुष्य में एकदम बराबर इस जगह पर । जैसे हरेक चीज़ सस्ती मिल जाए, ये कैसे मिल जाती है ? हरेक चीज़ बढ़िया मिल जाए। ये कैसे मिल जाती है ? अभी आज ही के दिन इन लोगों ने पूछा कि वहाँ कौनसी चाबी लगेगी ? और मैंने कहा कि ये चाबी लगेगी और वो लग गयी। वो गुच्छा ले आये, मैंने तो वो चाबी कभी देखी ही नहीं थी । वो कहने लगे कि माँ कौनसी चाबी लगेगी? और मैंने कहा, ‘ये लगेगी।’ और वो चाबी लग गयी। अब कहो कि माँ कैसे जानती हैं? क्योंकि सूक्ष्म है। हम सूक्ष्म में बैठे है। चित्त हमारा सूक्ष्म में ही है। और बाह्य में हम सब कहेंगे कि ये भी करना है, वो भी करना है, फलाना है, ठिकाना है। तो इस प्रलोभन में आना नहीं है। एक बस आनन्द में रहो, प्रलोभन में नहीं। उसका आनन्द तो आप उठा ही नहीं सकते आप प्रलोभन में आये तो गये। धीरे-धीरे आप खिसकते ही जाएंगे, खिसकते जाएंगे| तो आज इतने सालों बाद इस बात को मैं कह रही हूँ आपसे और घबरा भी रही हूँ कि दिल्ली में शुरु का आना और आज का आना ये बहुत अन्तर हो गया है। पर इससे भी बहुत ज़्यादा परिवर्तन होना चाहिए। और दिल खोलकर के मनुष्य को देना चाहिए। जैसे अब आप लोगों को सोचना चाहिए और बहुत से लोग कहते हैं कि ‘माँमैं तो सोच तो रही थी कि दे दूं, इतना रुपया दे दूँ। फिर मैंने सोचा कि लड़की के लिए जेवर बना लूँ।’ ‘अच्छा ठीक ही किया।’ तो उसने पूछा, ‘माँ, बुरा आपने तो अपना जेवर बैंक में रखे हैं । लड़की भी वो सारे जेवर बैंक में रखेगी। और उसकी भी लड़की होगी तो वो भी बैंक में तो नहीं किया। ‘नहीं, नहीं बहुत अच्छा किया। पर रखेगी। सारा बैंक ही को पैसा देना है। उससे अच्छा अगर कोई चीज़ बना दो सबका हित होगा। कलेक्टिविटी में आनन्द आएगा। तो इस तरह की चीज़ों में प्रलोभन होना चाहिए। अब सबसे जो बड़ा सूक्ष्म प्रलोभन जो है सहजयोग में कि मैं करता हूँ। मैंने आश्रम की जमीन ली है। मैंने आश्रम बना दिया। और मेरी वजह से, या मैंने इतना रुपया इकठ्ठा कर दिया है या मैंने इसको ठीक कर दिया है, मैं, मैं, मैं….. ये बड़ा ही सूक्ष्म प्रलोभन है । मैं ऑर्गनाइजर हूँ, मैं लीड़र हूँ। मैं बड़ा आदमी हूँ। ‘मैं’ इस चक्कर से बिल्कुल बचना चाहिए। मैंने ये किया, मैंने वो किया अगर ऐसे विचार आये तो आपको सोचना चाहिए कि आप ऊँची सीढ़ी पर पहुँच गये है और इस उँची सीढ़ी से जब आप गिरेंगे तो थड़ाम् से नीचे आएंगे । ये ‘मैं’, ‘मेरा’ छुड़ा लीजिए । अभी डेहराडून में एक लेडी मिली थी । उनके बच्चे आयें तो उनका हाथ एकदम गरम, फूल दिये तो एकदम गरम। तो मैंने कहा कि ‘आप कर क्या रहे हैं?’ तो उसने कहा कि ‘माँ, मैं कुछ भी नहीं कर रही हूँ। और फिर बताने लगी कि माँ, आपने स्पाँडिलाइटिस मेरा ठीक किया। डाइबिटिज मेरा ठीक किया, फलाना मेरा ठीक किया, नौकरी मेरी कर दी। ‘अगर ये हो गया तो आप गरम क्यों हैं?’ ‘नहीं माँ, मैं तो ये चाह रही थी कि मैं अपने यहाँ एक सेंटर | चलाऊँ पर ये लोग परमिशन नहीं दे रहे हैं। पर मैं चला रही हूँ।’ मैंने कहा, ‘इसलिए आप गरम हैं। आप छोड़िए इसे। जिस लायक आप हैं उस लायक आप रहिए। आप ठीक होने के लायक हैं। आप ठीक होईये। अभी आप सेंटर चलाने के लायक नहीं है।’ तो ये बात आपको सोचनी चाहिए, आपको अपने को जज़ करना चाहिए। ये जो लास्ट जजमेंट है, जो टाइम आया है पुनरुत्थान का ये लास्ट जजमेंट है। इसमें हमको ही अपना जजमेंट करना है कि हम कहाँ हैं? हम कैसे हैं? हमारा चित्त कहाँ दौड़ रहा है? हम किसे देखते रहते हैं? विचार, कहाँ हमारे विचार जा रहे हैं? अपने चित्त की ओर नज़र रखें, कहाँ जा रहा है हमारा चित्त ? हमारा लक्ष्य कहां है? हम क्या सोच रहे हैं? इस पर बहुत सुन्दर लिखा हुआ है, नामदेव ने। जो कि आपके ग्रन्थों में भी है कि एक पतंग उड रही है और एक लड़का उसे उड़ा रहा है। इसे उससे बात करता है, मज़ाक करता है, पर नज़र उसकी पतंग पर है। बहुत सी औरते हैं वो सर पर घड़े रख कर चल रही हैं, हँस रही हैं, मज़ाक कर रही है, ठिठोली कर रही हैं पर नज़र उसकी सर पर है। एक औरत है, जो बच्चे को कमर पर ले कर घर झाड़ रही है, पानी भर रही है, सब काम कर रही है और बच्चा कमर पर है। ध्यान उसका कमर पर है। तुम्हारा ध्यान कहाँ पर है? हमारा ध्यान कहाँ है? ऐसे और भी प्रश्न खड़े हो जाएंगे कि माँ से हमें मिलने नहीं दिया। हम तो आयें पर माँ से मिलने नहीं दिया। बहुत गलत

बात है ये। माँ को तो प्रसन्न रखना चाहिए। अगर आपके लिए कोई ऐसा करे तो आपको अच्छा लगेगा ? और ये दिल्ली में सबसे ज़्यादा बीमारी है। माँ से मिलने का। ये एक अहंकार का स्वरूप है। और मिलने नहीं दिया तो रोने बैठ गये या फिर चीखना शुरु कर दिया। ये बड़ी बारीक-बारीक चीज़ों को सोचना चाहिए । जैसे मेरा बर्थ डे हो रहा है, ऐसे आप लोगों का भी बर्थ डे होता है। जिस दिन आपने अपना रियलाइझेशन लिया, वो आपका बर्थ डे है। मैं तो अनादि हूँ। मेरी तो हजारों वर्षं की उम्र है। बहुत सी पुरानी उम्र है। मेरी तो कोई नयी उमर तो है नहीं। आप तो मेरा बर्थ डे मना रहे हैं। आप लोगों का बर्थ डे होना चाहिए कि जिन्होंने जन्म लिया, सहजयोगी बन कर के जो आज घूम रहे हैं। इन्होंने नया जन्म लिया है, नये स्वरूप में आये है। आपके बर्थ डे होना चाहिए। आप सारे मेरा क्या बर्थ डे मना रहे है। कैसे ये सहजयोगी है, आप देखिए कि मैं तो अनादि हूँ, मेरा क्या बर्थ डे मना रहे है? मैं चाहती हूँ कि आप लोगों का बर्थ डे मनाया जाय। और हर बर्थ डे में मनुष्य बढ़ते जाता है, घटता तो नहीं है। ऐसा भी कभी आपने देखा है कि मनुष्य बढ़कर के बाद में छोटा सा दूध पीता बच्चा हो जाए? पर सहजयोग में ऐसा होता है। अच्छे भले दिखते हैं, नज़र आते है, पर एकदम से पता नहीं क्या खोपडी बैठ जाती है। और लोग कहते हैं कि वो ऑफ हो गए है। मैंने कहा, ऑफ हो गये हैं? मर गये हैं क्या? तो कहने लगे, कि नहीं, नहीं, सहजयोग से चले गये हैं, फिसल गये हैं। और इतनी कठिन डगर नहीं है। बहुत आसान है, सहजयोग में बढ़ना बहुत | आसान है, हर घड़ी। अब आपको देखना है कि हम किस लेवल के हैं? आपको तो कुछ कहने की भी जरूरत ही नहीं पड़ेगी, मिलने की भी क्या जरूरत है! माँ को तो हृदय में ही बसा लिया है। जब चाहे अपनी गर्दन को झुका लीजिए। मिलने की कौनसी जरुरत है। पहले मिलो, फिर माँ की जान खाओ कि ऐसा है, वैसा है। इससे प्रसन्न होंगी क्या? इससे देखके तो कभी प्रसन्न नहीं होंगी। अपनी जगह आप सोचो कि अगर हमारे साथ कोई ऐसा करेगा तो क्या हमें अच्छा लगेगा ! तब आप देखियेगा कि आपकी विशालता इतनी बढ़ जाएगी, इतनी बढ़ जाएगी कि कौनसा भी प्रॉब्लेम ही नहीं आ सकता इतना साफ कर देगी। ये आप ही की विशालता है। आपको मेरी विशालता को आजमाने की कोई जरुरत ही नहीं है आप अपनी ही विशालता का उपयोग करे। ऐसे है अभी सहजयोगी जो महस कहने से ही सब मामला बन जाता है। ऐसे लोग हैं, ये नहीं कि नहीं । ऐसे तोड़ताड़ करके सब कुछ इसमें गहरा उतरना चाहिए। अब तो गणपतीपूले में आप लोगों के साथ मुलाकात होगी। और एक-एक जन्मदिवस मुझे याद आता है। जिस तरह से आप लोगों ने इतने प्रेम से इसे मनाया है और सुन्दर सजाया है। और यही कि आज ये आखरी दिन है और मैं चली जाऊंगी। और फिर इतने दिन बाद मुलाकात होगी। लेकिन मैं चाहती हूँ कि जिस वक्त भी मुलाकात हो तो आप लोग एकदम स्वच्छ, सुन्दर, अनुपम एक बढ़े हुए पेड़ के जैसे, जिसे मैं बड़े गर्व से देख सकूँ कि ‘ये मेरे बच्चे हैं,’ ये गर्व होना चाहिए। मानो मैंने बच्चों से कुछ बात कह दी और इन्होंने ठान लिया और करके दिखा दिया। लेकिन यहाँ मैं सोचती हूँ कि बहुत कम लोग इस तरह के हैं। अधिकतर तो लोग ऐसे ही हैं कि जो आयें, अपना फायदा किया और चल दिये। फिर सोचते नहीं कि भाई तुम कैसे कर रहे हो और क्या? ऐसा नहीं होना चाहिए। अगले साल भी यहाँ मेरा जन्मदिन हो ऐसी मेरी इच्छा भी है। हर एक आदमी कम से कम आसानी से सौ लोगों को सहजयोग दे सकता है। अभी जैसे, यहाँ तो पता नहीं कि जैसे गौरी पूजन होता है महाराष्ट्र में तो औरतें | | बुलाई जाती है, उनको हल्दी-कुमकुम देते है। तो अभी ये लोग क्या करते हैं कि, ये हमारा ही फोटो रखती हैं। हमारा ही पूजन करती हैं। और फ्रेन्डस को, सबको बुलाकर के हल्दी-कुमकुम देती हैं। तो फ्रेन्ड सर्कल में जहाँ पर भी आपकी दोस्ती है, पहचान है, रिश्तेदारी है सबसे बात करिए। देखिए इसमें कैसे लोग ठीक हो गये है। देखिए इसमें कैसे फायदे हो रहे है । कम से कम सौ में पचास आदमी तो आपको मिल ही जाएंगे। शादी में जाएंगे। बहुत जरुरी है शादी में जाना। बहुत से लोग कहते हैं कि ‘माँ, हम नहीं आ सकते, पूजा में। हमें शादी में जाना है।’ और शादी में जाकर आपने किसको जोड़ा। एक भी आपका कोई बना सगा। वहाँ तो यही हुआ कि तुमने क्या कपड़े पहने थे। उसने क्या पहने थे। मैंने जो बताई थी ‘बिना बात की बात।’ ऐसे शादी में जाकर | आपने कौन से लाभ उठाये हैं? यहाँ बहुत सी दुश्मनी है आपके साथ। तो यहाँ आपके अपने असली रिश्तेदार है । जो हमारी सारी विश्व की रिश्तेदारी है वो आज यहाँ बैठे हैं। सारा विश्व आज सब जगह, आपको पता होगा फ्रान्स में आज बहुत से लोगों ने आज सेमिनार किया है, हमारे बर्थ डे का, आज । पाँच -छः रोज का यहाँ पर हो रहा है, सेमिनार हो रहा है इस में खबर भेजी है,

‘माँ, हमने अठारह तारीख से शुरु कर दिया है आपके बर्थ डे का और सब एकट्ठे हुए हैं।’ और वहीं से, मेरा अब सब जगह जाना नहीं होता। पहले जाते थे, पहले ग्रीस गये वहाँ सहजयोग बिठाया। बाद में फिनलैण्ड गये वहाँ सहजयोग बिठाया। अब टर्की गये हैं वहाँ बिठाया। जो देश छूट गया है वहाँ जाकर पहले सहजयोग फिट करते हैं और फिर जाते हैं | यहाँ तो सब गणपती जैसे बैठे है, कोई हिलता भी नहीं। यहाँ से नोएडा तक का यही नसीब समझ लो। मैंने सोचा नोएडा कोई दूर ही जगह है लेकिन देखा तो यहीं रखी हुई। चलो नोएडा में तो ऐसे लोग मिल गये हैं जिन्होंने खींच लिया है आप लोगों को। इतने आकर्षक लोग हैं। पर इससे जरा आगे जाईये, धीरे-धीरे ये चीज़ फैलेगी, जोर से भी फैल सकती है। फैलाना बहत जरुरी है और टाइम बहुत कम है। और लोग देखिए अपने कैसे फैला बैठे हैं। किस तरह से काम कर रहे हैं और हम लोग है कि सो गये थे। और लोग हैं जो अपने का बखान करते रहते है हर वक्त। उनके गुरु एकदम चोर, उनसे सारा रुपया लूट लिया और बिल्कुल हालत खराब कर दिया। तो आज मुक्ति है, आप जो चाहे मेरे बारे में कहना चाहे कह सकते हैं। जो सहजयोग के बारे में कहना चाहते हैं कह सकते हैं। पहले कहा था आदिशक्ति मत कहो, पर अब आदिशक्ति कहने में अब कोई हर्ज नहीं, इसकी सिद्धता है हमारे पास में। खैर आप | पहचानेंगे कैसे? पहचानने के तरीके हैं आपके पास ! हमने तो पहचान लिया। अपने चैतन्य को सवाल पूछने से आप जान सकते हैं। तो सबसे बताना होगा। अपने सब दोस्तों को बताना होगा। अपने सब पहचान वालों को बताना होगा। सबको बताना होगा, आपके रिश्तेदारी है, रिश्तेदारी कम से कम एक-एक के हजारो रिश्तेदार होंगे। उनको चिठ्ठियाँ लिखो, उनको खबर करो , सबको। जितने भी रिश्तेदार हैं, जिनको आप शादी में बुलाते हैं उन सबकी लिस्ट बनायें और सबको चिठ्ठियाँ भेजो कि सहज से ऐसे-ऐसे लाभ हुआ है, इससे ये फायदे हुए है और इसे करना चाहिए। इससे आप उनका हित ही चाहते हैं। अपने घर में उनको डिनर पर बुलाते हो, बेकार का खर्चा करते हो। उससे क्या फायदा होता है। बाद में जाकर वो आपकी बुराई करेंगे और आप उनकी बुराई करेंगे। आप कहेंगे कि उन्होंने बहुत खा लिया और वो कहेंगे कि इन्होंने तो खाने को ही नहीं दिया। ऐसे लोगों को रास्ते पर लाना चाहिए या नहीं। आप जानते हैं, ये नहीं कि आप नहीं जानते और सहजयोग में आने से तो और साफ आप देखते हैं। सब चीज़ को आप साफ देखते हैं। फिर ऐसे लोगों को कहना चाहिए न साफ, ये बात है। अब तो हमारी जिंदगी बदल गयी है और आप भी बदल लीजिए, अच्छा है, बाकी सब बेकार है, कहने में तो कोई हर्ज नहीं और इस तरह से सहजयोग बहुत जोर से बढ़ सकता है। आज के दिन जाना मुझे अच्छा नहीं लगता क्योंकि आज अच्छा उत्सव का दिन है। आज ही बढ़िया सा प्रोग्राम होगा, पर वहाँ भी हजारों लोग बैठे होंगे। वहाँ भी जन्मदिन है और एक भावना से यहाँ से जाइये तो दूसरी भावना वहाँ शुरु हो जाती है। अब इसी तरह से दिन कट गये हैं हमारे , बड़े आनन्द से, सुख से दिन कट गये है हमारे। कोई तकलीफ नहीं है, ना ही कभी सोचा, कभी नहीं सोचा कि कैसे चल रहे हैं, क्या हो रहा है? कभी रात को दो-चार बजे से पहले तो सोये नहीं है । और दिन भर मेहनत चलती है। मैं तो चाहती नहीं कि आप लोग इतना मेहनत करें। लेकिन सहजयोग आपको चाहिए, मुझे नहीं ये जान लेना चाहिए। माँ इसलिए सोचती है कि आपको मिलना चाहिए, देना चाहिए इसलिए मैं आपको सहजयोग दे रही हूँ। लेकिन आपको मिलना चाहिए। आपकी चीज़ है ये, आपको प्राप्त करना चाहिए। ऐसा समझ लेने से आप समझ जाएंगे कि मेरे जीवन का इतना ही एक अर्थ है, एक इतना ही अर्थ है कि मेरे जीवन के कारण आपका कुण्डलिनी का जागरण हो गया और आप ऐसी स्थिति में आ गये कि जिससे आप दूसरों का जागरण कर सके और जिससे सारी दुनिया बदल जाए। तो इस जीवन का अर्थ कोई बहुत बड़ा मैं लगाती नहीं हूँ। अगर आप लोग नहीं होते तो मेरे जीवन का कोई अर्थ ही नहीं होता क्योंकि आप लोग हैं और आपके बच्चे हैं। ये काम तो बढ़ता ही जायेगा और बहुत से लोग पार हो जाएंगे। लेकिन मेरे जीवन में ही अगर कुछ विशेष चीजें हो जाए तो उससे जरूर संतोष रहेगा कि अपने ही जीवन में कोई चीज़ प्राप्त कर ली है। इसलिए जैसे-जैसे उम्र बढ़ रही है आप लोगों की जिम्मेदारी भी बढ़ रही है कि माँ के सामने दिखाना है कि हमने कौन-कौन सी चीजें पायी है और किस तरह से हमने सहजयोग को बढ़ाया है। सबसे बड़ी चीज़ ये है कि माँ के सामने हम कौनसा कमाल दिखा रहे हैं सहजयोग का, वो दिखाना है । जैसे नोएडा का देखा, बड़ी खुशी हुई। इसी प्रकार कोई मुश्किल नहीं है। आप हरियाना की तरफ चले जाईये, उधर यु.पी. की तरफ चले जाईये। यही दिखाना है माँ को कि माँ हमने यहाँ ऐसे-ऐसे सहजयोग का सेंटर खोल दिये हैं। वहाँ इतने सारे सेंटर्स खोल दिये है।

बस इसी से मुझे हो गया है सन्तोष। और मुझे कुछ नहीं चाहिए। एक फूलों की मुझे लालच है और वो भी आपने इतना अती कर दिया है कि अब तो नहीं चाहिए। वो भी छूट गया है। अब तो यही है कि कहाँ-कहाँ आपने बगीचे बनाये हैं, कहाँ-कहाँ आपने उद्यान खड़े किये है, कहाँ-कहाँ चमन खड़े किये है, वही सब सुनना है। पहले तो जब सहजयोगी नहीं थे तब में फूलों को देखती थी, लेकिन अब सहजयोगी आ गये हैं तो फूलों को कौन देखेगा। लेकिन अभी आपको ऐसे ही बगीचे हर जगह चलाने हैं। और कोई-कोई लोग इतने अच्छे हैं कि जहाँ बिजनेस होता है, जहाँ ट्रान्सफर होता है, जहाँ जिससे सम्बन्ध आता है फिर चाहे जापान जाए, चाहे वो अमेरिका जाए वहाँ जाकर वो बताते रहते हैं सहजयोग के बारे में। छोड़ते नहीं है। सहजयोग उनके लिए जीवन हो गया है। और जब तक ये आपका जीवन नहीं होता है आप इसको पूरी तरह से पा नहीं सकते। ये हमारे लिए जीवन है। बाकी सब चीज़ें तो चलती रहती है। वो कोई महत्वपूर्ण नहीं है। | | तो आज के दिन मैं आप सबको क्या कहूँ। मैं आपको धन्यवाद भी नहीं दे सकती कि मेरा बर्थ डे मनाया गया है। सिर्फ यही कि आप भी अपना बर्थ डे मनायें और आगे बढ़ते जाएं। बढ़़ते -बढ़़ते एक काल में मैं ऐसा देखूँ कि दिल्ली के सहजयोगी बहुत ऊँचे पद पर चले गये हैं। दिल्ली बहुत महत्वपूर्ण जगह है। आप जानते हैं कि दिल्ली बहुत महत्वपूर्ण जगह है। यहाँ सहजयोग का लाभ होना और सहजयोगियों का एक विशिष्ट स्वरूप आना विशेष जरुरी है, अत्यन्त जरुरी है। सारी दुनिया दिल्ली को देख रही है। तो दिल्ली के लोगों में एक विशेष प्रगति होनी चाहिए और बढ़ना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि जैसे अब अपने | यहाँ हिन्दी बोलने वाले बहुत से लोग हैं, उसी प्रकार यहाँ बहुत से लोग हैं जैसे यहाँ साऊथ इंडियन्स हैं उनको अप्रोच करना चाहिए। उनसे बात करनी चाहिए और बहुत कुछ काम हो सकता है। इस पर मैं चाहँगी कि हर आदमी रोज लिखे कि आज हमने कितनों को सहजयोग दिया है। ये पता करना चाहिए कि हमने कितना आज काम किया है? कितनों को दिया है? फिर अपने बारे में सोचना चाहिए कि हम रात-दिन क्या फिक्र करते रहते हैं। हमारा जब सारा काम माँ करती है तो हम क्या फिक्र करते रहते हैं। हमारे दिमाग में क्या चलते रहता है। जब भी आप फिक्र करियेगा तो कोई काम नहीं होगा। जिस वक्त आपने मेरे ऊपर छोड़ दिया उस वक्त ही तो सारा काम होगा। जब आप कहते हैं कि ‘हम ही बीच में कुछ लगाते हैं आधा।’ तो अच्छा है, लो तुम्ही लगाओ आधा। पूरी तरह से छोड़ना आना चाहिए। और आप पूरी तरह से तब छोड़ सकोगे जब आप इस दशा में आएंगे। नहीं तो छोड़ ही नहीं सकते। अब कहने के लिए इतना ही है कि अब आप लोग जान ही गये हैं कि हम कौन है? छिपाने की कोई बात ही नहीं रह गयी। और उसकी सिद्धता भी हो गयी है अनेक तरह से। लेकिन इसका एहसास अभी नहीं है। अहसास अगर हो जाए तो किसकी फिक्र, किस चीज़ की है फिक्र ? आदिशक्ति कहाँ बैठी हैं? किसके सामने बैठी हैं, बाते कर रही हैं। ऐसा कभी हुआ है क्या? सारे इतिहास में ऐसा कभी हुआ है। कहीं भी नहीं । और आप जानते हैं कि हम आदिशक्ति हैं। अभी आप हमारे बेटे हैं, आपको कैसे होना चाहिए! जैसे हमारा नाम है वैसे ही आपको होना है। यही आशीर्वाद है कि सब लोग समझदारी से काम लेंगे। सहजयोग आपका जीवन है और उसको आप अपने अन्दर पूरी तरह से उतारें। और उसके प्रकाश में आप भी प्रकाशित हों और दूसरों को भी प्रकाशित करें। यही हमारा आशीर्वाद है ।