Shri Krishna Puja: They have to come back again and again

Saffron Walden (England)

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श्री कृष्ण पूजा  

सेफ्फ़रॉन वाल्डेन (इंग्लैंड), 14 अगस्त 1989

(श्री कृष्ण अवतार, दाईं विशुद्धि) 

आज हम यहां श्री कृष्ण अवतार की पूजा करने के लिए एकत्रित हुए हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि श्री कृष्ण नारायण के अवतार हैं, श्री विष्णु के। प्रत्येक अवतार में, वे अपने सभी गुणों, अपनी सारी शक्तियों और अपनी प्रकृति को अपने साथ ले कर आते हैं। इसलिए जब उन्होंने अवतार लिया तो उनके पास नारायण के सभी गुण थे, और फिर श्री राम के, लेकिन हर अवतरण अपने पूर्व जीवन को संशोधन करने की चेष्टा करता है, जो भी उनके पूर्व जीवन में गलत समझ लिया गया और उन्हें अतिशयता में ले जाया गया । इसलिए उन्हें बार-बार वापस आना पड़ता है।

सही है इसलिए श्री विष्णु ने, जब उन्होंने अपना अवतार लेने के बारे में सोचा, क्योंकि वे ही हैं जो संरक्षक हैं। वे ही इस सृष्टि के संरक्षक और धर्म के भी संरक्षक हैं। इसलिए जब उन्होंने अवतरण लिया तो उन्हें यह देखना पड़ा कि लोग अपने धर्म पर कायम रहें। केवल धर्म को ठीक रखने से ही आपको आत्मसाक्षात्कार प्राप्त हो सकता है। तो यह कार्य अत्यंत कठिन था, मुझे कहना चाहिए, लोगों को महालक्ष्मी के मध्य मार्ग में बनाए रखने के लिए। अतः पहले अवतरण द्वारा, आप कह सकते हैं कि उन्होंने एक हितकारी राजा की संरचना करने की कोशिश की, श्री राम के रूप में। सुकरात ने एक हितकारी राजा का वर्णन किया है। लेकिन इसके परिणामस्वरूप, लोगों ने सोचना शुरू कर दिया कि अगर वे राजा या रानी बन गए हैं, राज घराने में पैदा होकर, तो वे देवता हैं।

श्री राम ‘पुरुषोत्तम’ थे अर्थात वे सम्पूर्ण मानवजाति में सर्वश्रेष्ठ थे। इसका तात्पर्य है कि उन्होंने एक मानव के रूप में अवतार लिया, पूर्णतयाः मानव रूप, मनुष्य के सभी गुणों को दर्शाते हुए। जैसे वे थे, उन्होंने विवाह किया लक्ष्मी विशिष्ट तत्व से, जो कि सीता जी थी, और फिर भी  उन्होंने एक सामान्य विवाहित जीवन व्यतीत किया । जब उन्होंने उन्हें त्याग दिया तब उन्होंने एक तपस्वी की भांति जीवन बिताया, यह दिखाने के लिए कि कैसे एक मनुष्य को उचित धर्म में अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए, एक विवाहित मनुष्य के रूप में। और यहां तक कि जब पत्नी चली गई तो वे कैसे पूर्णतयाः संयम का जीवन व्यतीत कर रहे थे । और उन्होंने कभी दूसरा विवाह नहीं किया, हालांकि कई लोगों ने कहा कि “आपको दूसरा विवाह करना चाहिए।”

अतः यह व्यवस्था सबसे अच्छी थी, एक पत्नीत्व की , उन्होंने उसका अनुसरण किया। अपने जीवन से, उन्होंने दिखाया कि एक पति को अपनी पत्नी के साथ कैसा होना चाहिए। लेकिन फिर बाद में उन्होंने राजा के रूप में एक और भूमिका निभाई। जब वे राजा बने, तब उन्हें पता चला कि लोग उनकी आलोचना कर रहे थे क्योंकि वे सीता जी को रावण से वापस लेकर आये थे। इसलिए श्री राम ने उन्हें स्वयं से दूर भेजने का निर्णय किया। इस दुनिया में ऐसे कितने लोग हैं, जो सत्ता में हैं, जो उस सत्ता के बारे में इतने संवेदनशील होंगे, कि जो सत्ता उनके पास है, कि उन्हें इस प्रकार का व्यवहार करना होगा कि वे आदर्श बने , उन सभी लोगों के लिए जो उनके अधीन काम कर रहे हैं, प्रशासन के लिए , देश की देखभाल के लिए? लेकिन सीताजी भी, क्योंकि वे भी महालक्ष्मी थीं, उन्हें सबकुछ समझ में आ गया, पूरा नाटक और वे चली गईं और फिर श्री राम ने भी सिखाया कि लोगों पर शासन कैसे करना चाहिए। इसलिए कहते हैं कि सबसे आदर्श राजपाठ था ‘रामराज्य’ ।

जब श्री राम ने इस दुनिया पर शासन किया तो वहाँ शांति थी , कोई प्रतिस्पर्धा नहीं, हर कोई  प्रसन्न और आनंदित था क्योंकि वे एक ऐसे (राजा) थे जो निष्पक्ष थे। कार्य, धर्म, आनंद, परम सुख और शांति का उत्सर्जन कर रहे थे । इसलिए कोई संघर्ष, कोई प्रतिस्पर्धा, कोई झगड़ा, कुछ भी ऐसा करने की जरूरत नहीं थी। इसलिए यह हितकारी राजा एक अवतरण के रूप में आए, हमें दिखाने के लिए कि एक राजा कैसा होना चाहिए, और उन्होंने एक गंभीर प्रकार का जीवन व्यतीत किया, बहुत समर्पित और गंभीर प्रकार का जीवन, जैसा एक हितकारी राजा का होना चाहिए। उनके अवतरण के परिणामस्वरूप, लोग हमेशा किसी न किसी चीज को अपना लेते हैं, ऐसी बात जो सामान्य नहीं है। तो क्योंकि वे एक तपस्वी के रूप में रहते थे , लोग वैराग्य का अनुसरण करने लगे। “हम विवाह नहीं करेंगे, हमारी पत्नियां नहीं होंगी, हम श्री राम की तरह रहेंगे,” ये सभी बातें उन्होंने शुरू कर दीं, इसलिए वैराग्य बढ़ने लगा। इससे पहले, श्री राम से पहले, सभी संत विवाह करते थे, उनकी पत्नियां होती थीं , बच्चे होते थे, वे एक बहुत ही सामान्य जीवन व्यतीत करते थे। वे संत केवल इसलिए थे क्योंकि वे बहुत विकसित लोग थे और वे आश्रमों में रहते थे , आत्मसाक्षात्कार का कार्य करते थे और मनुष्यों में अन्य सुधार भी करते थे।

अब जब श्री राम आए, तो लोगों ने सोचा कि “वे श्री राम थे, इसलिए हम भी उनके समान बनेंगे। क्योंकि वे एक तपस्वी की तरह रहते थे , हम भी एक तपस्वी की तरह जीवन निभाएंगे।” तो वैराग्य का यह मूर्खतापूर्ण विचार उनके भीतर आने लगा और फिर लोग बहुत रूखे हो गए, बहुत रूखे। कोई हंसता नहीं था, कोई मुस्कुराता नहीं था, सब कुछ बहुत गंभीर था, पूर्णतः, और सब कुछ बहुत शुष्क तरीके से किया जाता था। कई साधकों ने विवाह नहीं किया , लेकिन साधकों के अतिरिक्त, कई ऋषियों और संतों ने भी विवाह नहीं किया और क्योंकि उन में संतुलन नहीं था, क्योंकि विवाह से आपको संतुलन मिलता है । वे बहुत शुष्क, बहुत गर्म स्वभाव के लोग बन गए, और हमारे पास कुछ ऋषियों के उदाहरण हैं, जो अपने गर्म स्वभाव और तपस्वी गुणों के लिए जाने जाते हैं, जिनके द्वारा वे किसी को भी नष्ट कर सकते थे, उन्हें राख बना सकते थे, संस्कृत में इसे ‘भस्म करोति’ कहा जाता है । इसलिए इन गुणों का विकास हुआ, यही समय है जब श्री कृष्ण वापस आए, श्री राम के अवतार से वे श्री कृष्ण के रूप में वापस आए।

श्रीकृष्ण का अवतरण यह दिखाने के लिए हुआ कि यह पूरी सृष्टि खेल है, लीला है। इसलिए वे लीलाधर हैं , उन्हें लीलाधर कहा जाता है । वे ही थे, जिन्होंने दिखाया कि सब कुछ एक लीला है, कुछ भी नहीं है जिसके लिए आप गंभीर हों , शुष्क बनने की आवश्यकता नहीं है, कुछ भी वैराग्य नहीं है, लेकिन पूरा जीवन आनंद है। उन्होंने यह विचार इसलिए दिया क्योंकि लोग इतने कठोर हो गए थे। और फिर एक तरह का विचित्र ब्राह्मणवाद भी शुरू हो गया, जैसे वे खाएंगे नहीं, उन्होंने एक जाति प्रथा बना दी, जो फैलने लगी। जाति का निर्धारण जन्म से होता था, जो कि गलत था, और वे भोजन नहीं कर सकते थे। फिर ब्राह्मणवाद बढ़ने लगा, काफी मजबूत, और ये ब्राह्मण, दूसरों पर हावी होने लगे। इसलिए श्री कृष्ण आए और वे एक ग्वाले के पुत्र के रूप में आए । पर वे धनी ग्वाले थे, बहुत धनी ग्वाले। अब वह समय है, आप देखिये , पूरा नाटक सामने लाया गया, और यह नाटक काफी क्रूर था , मुझे कहना चाहिए, क्योंकि एक भयावह असुर, राक्षस, ने किसी न किसी तरह एक महिला का इस्तेमाल किया , जो कंस की माँ थी, और वह इनकी भी माँ हैं, आप श्री कृष्ण की नानी कह सकते हैं। उनका एक बेटा था जो एक राक्षस था, यह सब उसी का नाटक है। उनके एक मामा, जो कि एक शैतान थे, एक राक्षस थे, और उन्हें अपने इस मामा को मारना था, आप लीला देखें, यह सब  नाटक है, बस नाटक को देखें, कैसे यह कार्यान्वित हुआ । उन्हें इस मामा को मारना था जो बहुत शक्तिशाली था और एक शैतान था।

इसलिए अपने बचपन में खेलते थे। वे ग्वालिनों और अन्य महिलाओं के साथ खेल करते थे। वे बहुत छोटे थे, लगभग पांच साल की उम्र। और उन्होंने सभी प्रकार की शरारतें की और सभी प्रकार की लीलाएं कीं , जैसे कि उन्होंने एक सांप को मार डाला, बहुत बड़े सांप को , एक कोबरा को, बहुत ही प्रसिद्ध कोबरा। और उन्होंने अपनी शक्ति से, कई राक्षसों और राक्षसनियों को भी मारा, सब खेल में । बस एक नाटक में, वे ऐसा करते थे, और आपने उनके बारे में कहानियाँ पढ़ी होंगी, कि उन्होंने कैसे दिखाया कि एक बड़ी सेना होने की कोई आवश्यकता नहीं है जैसे कि श्री राम के पास थी , उन्होंने कोई वानर या किसी और का उपयोग नहीं किया, यद्यपि हनुमान हमेशा उनके रथ पर बैठे रहते थे। लेकिन उन्होंने इन सभी  बाह्य शक्तियों का कभी उपयोग नहीं किया। केवल उनके पास जो भी शस्र थे, जिनका उन्होंने प्रयोग किया वे यह दिखाने के लिए कि किसी सेना या अन्य लोगों को, राक्षसों को मारने के लिए, उपयोग करने की कोई आवश्यकता नहीं है। और सब बहुत खेल-खेल में था।

श्री राम के समय, उन्हें यह ज्ञात नहीं होना था कि वे एक अवतरण थे, पर यह उन्हें विभिन्न विधियों से प्रतिबिंबित किया जाता था, कि वे एक अवतार थे और तब भी वे इसे स्वीकार नहीं करते थे क्योंकि उन्हें ज्ञात नहीं होना चाहिए था। यह  ‘महामाया’ की तरह है। अब जैसे कि सभी कैमरे आपको वास्तविक महामाया का सब प्रमाण दे रहे हैं , वे कैसी हैं। लेकिन कोई यह दिखाने की कोशिश कर सकता है कि आपको याद नहीं है, आपके पास इसकी कोई स्मृति नहीं है। क्योंकि अगर इसको याद रखते है तो आपके क्रिया-कलाप मानवीय नहीं होंगे, वे ईश्वरीय कार्य बन जाएंगे, और यह मनुष्यों के लिए ठीक नहीं होगा क्योंकि वे सहन नहीं कर पाएंगे, या वे भयभीत हो जाएंगे, वे इतने आश्चर्यचकित हो जाएंगे। 

श्री कृष्ण ने साधारणतः एक बहुत ही सामान्य व्यक्ति की तरह व्यवहार किया। जैसे कि बचपन में, वे मक्खन के बहुत शौकीन थे । और जैसा कि आप जानते हैं कि मक्खन गले के लिए बहुत अच्छा है। विशुद्धि के लिए मैंने आपको कई बार बताया है कि अपनी चाय  में आप थोड़ा मक्खन डालें और इसे पिये ताकि आपका गला जो सूख गया है, आपको अच्छा लगेगा । तो उन्हें मक्खन बहुत पसंद था और वे जाकर अपने मित्रो से मदद लेते थे, और उनसे मिलकर पिरामिड बनाते थे, ऊपर चढ़ते थे और मक्खन के बर्तन को तोड़ कर , सारा मक्खन छोटे बालक की तरह खा जाते थे।

तो एक दिन उनकी माँ ने कहा, “ठीक है, तुमने मक्खन क्यों खाया?”

उन्होंने कहा, “मैंने नहीं खाया।”

(माँ ने) कहा, “फिर यह आपके मुखपर क्या है?”

उन्होंने कहा, “यह, इन सभी बालको ने मेरे मुख पर लगा दिया है।”

आप देखिये, उनके लिए, इस तरह के छोटे, छोटे झूठ बोलना भी एक लीला थी, माँ के साथ, एक सीमा तक। जैसे “असत्य मत बोलो! तुम्हे नहीं करना चाहिए!” नहीं, इस तरह की बातों में कोई आनंद नहीं था।

तो उन्होंने उन्हें असत्य कहा। “अब देखो, इन लोगों ने इसे मेरे मुख पर लगा दिया है। उन्होंने सारा मक्खन खा लिया है और अब आप मुझे पकड़ रही हो l ” आप देखिये ।

तो उन्होंने कहा, “सच में? अपना मुख खोलो!”

तो उन्होंने अपना मुख खोला और उन्होंने उनके मुख में यह सब देखा [ब्रह्मांड] (माँ सौर मंडल की ओर इशारा करती है, जो पूजा की सजावट का हिस्सा है) । पूरा ब्रह्मांड विशुद्धि में घूम रहा था, पूरा विशुद्धि चक्र उन्होंने देखा, और झुककर उन्हें प्रणाम किया।

फिर उन्होंने (श्री कृष्ण) कहा, “आप मेरे समक्ष क्यों झुक रही हो?” मानो कुछ हुआ ही नहीं।

तो, आप देखते हैं, उनकी सभी चंचलता और उनके सभी बच्चों जैसे, मधुर झूठ, सिर्फ यह समझ पैदा करने के लिए थे, और यह बहुत ही मधुर (प्यारी)  मानी जाती है, भारतीयों के अनुसार, या हम कह सकते हैं, पूर्वी देशों में सोच के अनुसार, कि बच्चे माँ के साथ इस तरह चंचल होते हैं। वे सभी बच्चों के नटखटपन का आनंद लेते हैं, यहाँ थोड़ी चंचलता, वहाँ चंचलता । और काफी  सीमा तक बच्चों के साथ कठोरता भी होती है, क्योंकि, मुझे लगता है, लोग अपने बच्चों से नहीं जुड़े हैं। वे अपने बच्चों से प्यार नहीं करते। वे अपने कालीनों से प्यार करते हैं, बाकी सब से प्यार करते हैं क्योंकि वे इसे बेच सकते हैं, लेकिन वे अपने बच्चों को नहीं बेच सकते। और यह सब आनंद को ख़त्म कर देता है। तो बच्चे और माता-पिता भौतिक विचारों की वजह से अलग-थलग हो जाते हैं कि यह सामग्री आपके अपने बच्चों की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है।

तो अपने बचपन में उन्होंने बहुत सारी शरारतों और बहुत सी चीजों को दिखाया है, और किस तरह से वे चोरी करते थे। अब चोरी करना बुरा माना जाता है। कोई वस्तु किसी और की है और अगर आप चोरी करते हैं, तो बुरा है। लेकिन वे केवल अपनी माँ का मक्खन चुरा रहे थे जो उन्होंने बनाया था। और वे उन सभी महिलाओं का मक्खन भी चुरा लेते थे जिसे मथुरा लेकर जाती थीं , जहां कंस शासन करता था, और यह मक्खन सभी राक्षसों द्वारा खाया जाता था और वे बहुत शक्तिशाली बनते जा रहे थे। इसलिए उन्होंने सोचा कि बेहतर है कि वे सब जाकर मक्खन खा जाएँ ताकि ये महिलाएं इसे ले जाकर बेच न पाएँ । यदि आप इसे अभिप्राय की दृष्टि से देखें , तो यह है कि हम अपने बच्चों को भूखा रखते हैं, हम अपने परिवारों को भूखा रखते हैं, बस कुछ धन पाने के लिए। धन की ओर रुझान है, कि आप जा कर अपने मक्खन को किसी दूसरे को बेच देते हैं। इस विचार के साथ कि सब कुछ बाहर बेचा जाना है, हमें इस वस्तु को बेचना है, हमें उस वस्तु को बेचना है। कुछ भी अपने पास नहीं रखना है। इसलिए, बच्चे हमारे एकमात्र स्थायी दायित्व हैं और बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है जैसे कि वे सिर्फ बोझ हैं जबकि अन्य सभी चीजें अच्छी हैं क्योंकि आप उन्हें बेच सकते हैं। तो पूर्ण जीवन मूल्य, अगर यह पैसे के इर्द-गिर्द निम्न स्तर पर चला जाता है, तो बच्चों का परिवार में कोई स्थान नहीं रह जाता।

सहज योग के अनुसार, बच्चे दुनिया की सभी संपत्ति से अधिक महत्वपूर्ण हैं और उन की इस तरह से ही देखभाल की जानी चाहिए। निस्संदेह ,उन्हें बताया जाना चाहिए कि गरिमा क्या है, उन्हें कैसे व्यवहार करना चाहिए। लेकिन उनकी छोटी – छोटी शरारतों को समझना चाहिए और आनंद लेना चाहिए क्योंकि वे केवल बच्चे होने के कारण ही शरारतें कर सकते हैं, न कि बड़े होने पर , इसलिए उन्हें चंचलता करने और मज़ाक करने की इतनी आजादी होनी चाहिए। अन्यथा, वे बहुत गंभीर बन जाएंगे और सन्यासी बन सकते हैं। जो माता-पिता बहुत सख्त होते हैं, उनके बच्चे कभी सामान्य नहीं होते हैं, वे या तो अत्यंत विकृत होते हैं, विद्रोही होते हैं या वे बहुत चुप रहने लगते हैं और जीवन का सामना नहीं कर पाते। तो दोनों ही समान शैली के हैं , क्योंकि एक जीवन का सामना नहीं कर सकता, दूसरे का जीवन सामना नहीं कर सकता। ऐसी बात है। ऐसे लोगों का कोई सामना नहीं कर सकता।

इसलिए आपको बच्चों के साथ बहुत प्रेम और सूझबूझ से पेश आना होगा लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि अगर वे अनुचित करते हैं तो यह प्रेम समाप्त हो जाएगा। बच्चे केवल प्रेम की परवाह करते हैं। वे धन नहीं जानते। उन्हें कुछ पता नहीं है। इसलिए आप अपने बच्चे में जो प्रेम स्थापित करते हैं, वह अत्यंत अमूल्य गुण बन जाता है। सहज योग की प्रणाली, परमात्मा के प्रेम पर आधारित है और यह केवल तभी कार्य कर सकती है, जब लोग प्रेममयी हों। अगर वे धन से प्रेम करते हैं, अगर वे सत्ता से प्रेम करते हैं, अगर वे अपनी प्रतिष्ठा से प्रेम करते हैं, वे इस से प्रेम करते हैं, उस से प्रेम करते हैं, न कि अपने बच्चों या अपने परिवारों से, तो वे समाज के एक बहुत बड़े हिस्से को खो रहे हैं और परमात्मा जानते हैं कि इन बच्चों का क्या होगा, अगर आप में अपने बच्चों के लिए प्रेम नहीं है।

श्री कृष्ण के जीवन में, आप उनके द्वारा दिखाई गई विभिन्न चीजों को देख सकते हैं। उनके, आप कह सकते हैं, उनके महाकाव्य में या उनकी जीवनी में, यदि आप देखें, तो आप पाएंगे कि जीवन के कितने पहलुओं को उन्होंने इतनी सुंदरता से संभाला है। फिर अपने बचपन में, उन्होंने जाकर कंस जैसे राक्षस का वध किया । वह भी, वे कितनी खूबसूरती से, इसे करते हैं । वे अपने आसपास रहने वाले लोगों को कैसे मारते हैं । वे उनके रहस्यों को कैसे जानते हैं , उन्हें कैसे मारा जा सकता है, यह पूर्ण प्रतिभा और सभी बहुत सुंदर आयोजन को दर्शाता है। अब कल्पना कीजिए कि एक, कृष्ण ने युद्ध किया, एक कृष्ण ने कंस की पूरी सेना से युद्ध किया, उन्होंने ऐसा कैसे किया होगा, क्योंकि अंततः वे विराट हैं । और सर्वव्यापी परमात्मा की सारी शक्तियाँ, उनके हाथों में हैं। वे जो चाहे वे कर सकते है। वे जैसा चाहे वैसा खेल रचा सकते हैं । वे किसी को भी नष्ट कर सकते हैं अगर चाहें , और उनके लिए इन सभी कार्यों का एक साथ संचालन करना इतना आसान है।

फिर उनका जीवन शुरू हुआ जब वे राजा बने। जब वे राजा बने तो वे चाहते थे , मुझे कहना चाहिए कि इस तरह से, वे  लोगों को धर्म में स्थापित करना चाहते थे और उन्हें पांचों तत्वों की  आवश्यकता थी। इसलिए उन्होंने, उन्हें (पांचों तत्वों को) पाँच महिलाओं के रूप में बनाया, जिनसे उन्होंने विवाह किया, इसलिए उनकी पाँच पत्नियाँ हैं, लेकिन वे पाँच तत्व हैं, उनके अस्तित्व का अंग-प्रत्यंग। लेकिन वे योगेश्वर थे, पूर्णतः अनासक्त, अपने योग में, लेकिन उनके पास, व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए हम कह सकते हैं, पांच पत्नियां थीं । और सोलह हजार महिलाएँ थीं, जो उनकी पत्नियाँ बनीं। ये सोलह हजार महिलाएं और कोई नहीं बल्कि उनकी सोलह हजार शक्तियाँ हैं क्योंकि आप जानते हैं कि उनके चक्र में सोलह पंखुड़ियां हैं और इन सोलह पंखुड़ियों को विराट की प्रत्येक एक हजार पंखुड़ियों से गुणा किया जाये ,तो यह सोलह हजार शक्तियाँ बन जाती है। इसलिए इन सोलह हजार शक्तियों को महिलाओं के रूप में अवतरित किया गया, किसी भयानक राजा द्वारा इन्हें ले जाया गया और वे वहां गए , उस राजा से लड़े और इन महिलाओं को ले आये ।

अब , आज भी ऐसा है कि एक वृद्ध आदमी भी, उसके साथ एक अल्पायु महिला है, तो लोग कभी नहीं सोचेंगे कि यह एक अच्छा रिश्ता है। वे हमेशा सोचेंगे कि अवश्य कुछ अनुचित होगा। तो उन्हें (श्री कृष्ण को ) उनसे शादी करनी पड़ी, क्योंकि उन्हें इन महिलाओं को रखना था, इसलिए उन्होंने उनसे शादी की। लेकिन माँ की स्थिति अलग होती है क्योंकि माँ के हजार बच्चे हो सकते हैं। लेकिन बेचारा आदमी, यदि उसके आसपास एक ही महिला हो, प्रत्येक व्यक्ति यही कहेगा कि वह एक बुरा व्यक्ति है। इसलिए उन्हें उन सभी से विवाह करना पड़ा, तथा कथित शादी, और ये सोलह हजार शक्तियां उनके साथ रहीं, जिसके द्वारा उन्होंने हमारे विशुद्धि चक्र की स्थापना की ।

अब जब हमारे पास हमारी विशुद्धि की समस्याएं होती हैं, तो हमें यह जानना होगा कि दोनों तरफ कौन से देवता हैं और उनके क्या गुण हैं, जिनकी हमारे अंदर कमी है, जिस वजह से हम, हम पीड़ित हैं। अब देखते हैं जब हमारी दायीं ओर विशुद्धि पकड़ी जाती है। श्री कृष्ण का सार मिठास है – माधुर्य , माधुर्य। और उनकी शक्ति थी राधा। “रा” माने ऊर्जा, ” धा ” माने जिसने ऊर्जा को धारण कर रखा है। और उनकी शक्ति थी- उसे आह्लाद कहते थे । “आह्लाद” का अर्थ है, आनंद देने वाले गुण, जो उनके पास थे। तो श्री कृष्ण के गुण थे कि वे योगेश्वर थे , इसलिए वे साक्षी और मधुर थे। अब एक व्यक्ति जो चिल्लाता है , चीखता है, ऊंचे स्वर में बात करता है और बहुत तेज आवाज में अपना संयम खो देता है, या जो हर समय बहुत ऊँचे स्वर में बोलता है, वे सभी दायीं विशुद्धि से पीड़ित होते हैं , इसलिए किसी को यह समझना चाहिए कि आपने जब किसी व्यक्ति को डांटना भी है , तो आपको बस यह कहना है, “आप क्या कर रहे हैं? आप ऐसा क्यों कर रहे हैं? “अन्यथा” मैं तुम्हें दूँगी… आपने ऐसा किया?” ख़त्म l दायीं विशुद्धि ख़त्म। अब यह समाप्त हो गयी ।

तो दायीं विशुद्धि के लिए हम विठ्ठल और रुक्मिणी के मंत्र लेते हैं, इन दो देवताओं के । आप देखते हैं कि यह भी बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि कहते हैं कि एक पुंडलिकक्ष था , एक लड़का जो अपने माता-पिता की सेवा कर रहा था। और उसके माता-पिता सो रहे थे, वह उनके पैर दबा रहा था, जब विठ्ठल और उनकी शक्ति रुक्मिणी, वे दरवाजे पर आए।

लेकिन उसने कहा, “अभी चुप रहिये । मेरे माता-पिता सो रहे हैं, इसलिए आप वहीं रहिये!”

उसके निकट एक ईंट थी, जिसे उसने फेंका और उनसे कहा, “आप उसी पर रुकिए।”

इसलिए वे चुप रहे, वे चुप रहे क्योंकि वे सो रहे हैं। अब यही बात है। दायीं तरफ, अगर आप ऊँचे स्वर में बात कर रहे हैं, अगर आप बहुत ज्यादा बात करते हैं, अगर आप अपनी बातों से लोगों को धमकाते हैं तो आपकी दायीं विशुद्धि में पकड़ आती है । तो इसके लिए सबसे अच्छा है कि आप आराम करिये और आप बोलना रोककर अपनी दायीं विशुद्धि को थोड़ा आराम दें। कहते हैं, मौन में जाईये; बस बात नहीं करिये। कुछ समय के लिए यदि आप बात नहीं करते हैं तो आप देखेंगे कि आपकी विशुद्धि में सुधार होगा, आपकी समस्याओं में सुधार होगा।

तो जैसा कि होता है , दाईं ओर, क्या होता है कि पेट से गर्मी आने लगती है। यह सब एक ही खेल में है। यहाँ से हम कह सकते हैं, पेट से नहीं बल्कि वास्तव में यकृत (लिवर) से, गर्मी ऊपर कि ओर बढ़ने लगती है। यह पहले दाएं ह्रदय में जाती है, जिसके परिणामस्वरूप आप बहुत गर्म स्वभाव के पति या पिता या कुछ और बन सकते हैं। आप को अस्थमा, कुछ भी, इस दाएं ह्रदय के कारण हो सकता है। फिर यह आपकी दाईं विशुद्धि में जाता है । जब यह आपकी दाईं विशुद्धि पर जाता है तो आप बहुत चिड़चिड़े, गर्म स्वभाव के व्यक्ति बन जाते हैं। हर समय आप किसी पर चिल्लाते रहते हैं। कोई भी आपसे बात नहीं कर सकता। अगर किसी को आपसे बात करनी है, तो उसे बीच में एक नौका छड़ी (बार्ज पोल) रखनी होगी। भगवान जाने कि किस समय वह आप पर चिल्लाएगा। या हो सकता है, मैंने देखा है कि कई महिलाएं अपनी सुनने की शक्ति खो देती हैं या पुरुष अपनी सुनने की शक्ति खो देते हैं, जब वहाँ कोई व्यक्ति है जो उन पर चिल्ला रहा होता है। इसलिए चिल्लाना बहुत बुरा है, दूसरों के लिए और अपने लिए भी, क्योंकि निस्संदेह, आपकी विशुद्धि चली जाती है, कुछ समय बाद आप की आवाज चली जाती है, कुछ समय बाद आप बात नहीं कर पाते हैं, और कभी-कभी आपको बस चुप रहना पड़ता है। लेकिन दूसरों के लिए यह और भी बुरा है क्योंकि अगर आप इस तरीके से अपने गुस्से का इस्तेमाल करते हैं, तो वह व्यक्ति आपसे सिर्फ भयभीत हो सकता है, उस में हीन भावना का विकास हो सकता है, वह एक बायीं पक्षीय व्यक्ति बन सकता है, उसे भूत की कड़ हो सकती हैं या भगवान जाने, कि ऐसे व्यक्ति के साथ क्या हो सकता है जिस पर हर समय एक व्यक्ति चिल्लाता रहता है। लेकिन सबसे बुरी शारीरिक बात यह हो सकती है कि वह बहरा हो जाए।

तो श्री कृष्ण के जीवन से एक सीख लेनी चाहिए कि कैसे वे सिर्फ अपनी बांसुरी बजाते थे और पूरा वातावरण बिल्कुल शांत हो जाता था, बिना किसी परेशानी के लहराने के, किसी भी तरह की गड़बड़ी के, बस शांति । लेकिन आधुनिक समय में विपरीत ही है। उनके पास संगीत है, जिस से दायीं विशुद्धि टूटने या फटने लगती है। मुझे पता नहीं यह किस तरह का संगीत है। जब वे इस संगीत को सुनते हैं, तो आप देखते हैं, यह उत्तेजित करता है, यह आपको उत्तेजित करता है। यह आपको शांत नहीं करता। यह आपको उत्तेजित करता है, आपको और अधिक से अधिक उत्तेजित करता है। लेकिन, जैसे ही श्री कृष्ण विराट बन जाते हैं , आपका तालु  क्षेत्र भी इसके साथ सुन्न हो जाता है। और जब यह चिल्लाने वाला संगीत बहुत अधिक होता है, तो वे  लाउड स्पीकर का उपयोग करते हैं, और अधिक चीखने के लिए। फिर उन्हें कुछ सुनने के लिए कान पर कुछ लगाना पड़ता है अन्यथा उन्हें कोई उत्तेजना नहीं होती। सभी रोमांचक, हम कह सकते हैं कि सभी रोमांचक कोशिकाएं शिथिल हो जाती हैं। और आपको उन शिथिल कोशिकाओं में उत्तेजना भरने के लिए वास्तव में भयानक प्रयास करना पड़ता है ।

तो यह बहुत खतरनाक प्रक्रिया है , पूर्णतया , यदि आप देखते हैं कि यह यकृत (लिवर) से शुरू होता है, दाएं ह्रदय में जाता है, फिर विशुद्धि में और फिर मस्तिष्क में। तो फिर आप ड्रग्स लेते हैं , क्योंकि आपका मस्तिष्क सुन्न हो चुका है। इसलिए आप ड्रग्स लेते हैं और जब आप ड्रग्स लेते हैं तो आपको लगता है कि अब आप ठीक हैं। तब फिर आपको लगता है कि ये ड्रग्स पर्याप्त नहीं है, तो आप प्रबल ड्रग्स लेते हैं। आप और ड्रग्स लेते हैं। ऐसा एक के बाद एक चलता जाता है। अंतत: यह उस अवस्था में पहुंच जाता है जब आप कहीं के नहीं रहते हैं। अतः यह सब आत्मघाती है।

मैं भी अपनी दायीं विशुद्धि का बहुत अधिक उपयोग कर रही हूँ ।

दायीं विशुद्धि के लिए आपको मौन रखना सीखना होगा , जिसका अर्थ है शांत रहना जो लोग सोचते हैं, जो बहुत प्रबल होते हैं, जो बहुत ही  प्रबल होकर बात कर रहे हैं, जिनकी दायीं  विशुद्धि पकड़ रही है , उन्हें मौन रहना चाहिए और कम से कम कुछ समय के लिए, बिल्कुल भी बात नहीं करनी चाहिए। ऐसा हो सकता है कि आप एक दिन तय कर सकते हैं, जैसे कि आप इसे कर सकते हैं .. कहे “मैं सोमवार को बात नहीं करूंगा।” लेकिन सोमवार को अगर आपको काम करना है, इसलिए आपको कहना चाहिए “मैं रविवार को बात नहीं करूंगा।” लेकिन मनुष्य ऐसे होते हैं कि अगर वे निश्चय कर लें कि वे रविवार को बात नहीं करेंगे, तो रविवार वे सबसे ज्यादा बात करेंगे l 

और यह चिल्लाना और फिर लोगों को धमकाना – आपको कोई अधिकार नहीं है। आपको किसी पर चिल्लाने का कोई अधिकार नहीं है चाहे कुछ भी हो। चिल्लाने की क्या जरूरत है? अन्ततः, आप एक मनुष्य हैं, दूसरा भी एक मनुष्य है। ईश्वर ने यह अधिकार किसी को भी नहीं दिया है चाहे वह पति हो , पत्नी हो , बच्चे या कोई भी हो। लेकिन मुझे पता लगता है कि इन दिनों बच्चे भी चिल्लाते हैं, मां चिल्लाती है, पिता चिल्लाते हैं। यदि आप घर में जाते हैं, तो आप वापस भागना चाहते हैं क्योंकि आप कुछ नहीं पाएंगे, सुनेंगे सिवाय चिल्लाहट के। तो इस तरह की पारिवारिक प्रणाली हिल जाएगी , उस परिवार को पूरी तरह से खत्म कर देगी और एक दूसरे के बीच और अन्य लोगों के बीच में कोई सुंदर संबंध नहीं होगा।

कभी-कभी कोई कह सकता है पूरे देश के पास, कुछ नहीं है, सिवाय एक पर चिल्लाने के या दूसरे पर चिल्लाने के। आप कही भी जाएँ आपको चिल्लाने के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलेगा। यहां तक कि अगर आप अपनी कार को थोड़ा सा भी इस तरफ ले जाते हैं, तो चिल्लाया जाएगा, अर्थात ज़रा सी बात के लिए, वे चिल्लाना शुरू कर देते हैं और अपनी दायीं विशुद्धि को खराब करते हैं । अब, नेताओं के लिए, उन्हें लगता है कि चिल्लाना सबसे अच्छा तरीका है क्योंकि वे लोगों को अपनी चिल्लाहट से वास्तव में प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए वे बहुत चिल्लाते हैं, लोगों को बताते हैं-  यह, वह। जब वे बोलते हैं, तो आपको सुनना चाहिए कि उनकी जिह्वा में कोई मिठास नहीं है, कुछ भी ऐसा नहीं है। लेकिन वे चिल्लाते हैं और चिल्लाने से दूसरे व्यक्ति भयभीत हो जाता है।

ठीक है, आप वोट चाहते हैं? हम आपको देंगे लेकिन आप चिल्लाओ मत। इस तरह बहुत से लोग चुने जाते हैं और बड़े हो जाते हैं और सोचते हैं कि वे बहुत सफल हैं क्योंकि वे चिल्लाते रहे हैं।

फिर उनके पास चिल्लाने का प्रशिक्षण है और वे चिल्लाने के लिए उच्च और उच्चतर शिक्षा के लिए जाते हैं, कैसे चिल्लाना है, कैसे तेज आवाज से लोगों को धमकाना है। सहज योगियों के लिए यह शोभा नहीं देता है। सहज योगी को, बात करने में बहुत मधुर व्यक्ति होना चाहिए, अत्यंत मधुर । अब जब आप श्री राम के बारे में सोचते हैं, जैसे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जो एक राजा थे और फिर श्री कृष्ण आपके पास हैं, जो एक राजनयिक थे। तो दिव्य कूटनीति क्या है? आपको चिल्लाने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन आप विषय बदल दीजिये । यदि आप किसी को, किसी निष्कर्ष पर पहुँचाना चाहते हैं, तो सबसे अच्छा यह है कि आप पहले विषय को बदल दें और धीरे-धीरे, यदि आप तीव्रबुद्धि हैं, तो आप बदलते, बदलते इसे सही विषय पर वापस ले आईये। यही दक्षता की बात करनी है। अन्यथा, केवल चिल्लाने से अगर कोई कह दे, “हाँ, ठीक है, मैं इसे करूँगा,” जब आप चले जाएंगे, वे कहेंगे, “हुंह, मैं इसे करूँगा!” इसका मतलब कुछ और है। तो आप देखिए, वे “हाँ” और “हुंह” कभी भी कह सकते हैं ।

तो किसी अन्य व्यक्ति के साथ पूर्ण सारुपय (सारुप्य) रखना उस व्यक्ति के साथ खेलना है। यही मैंने रूस में भी किया। मैं गोल – गोल, गोल और गोल घुमाती गयी और उन्हें इस बिंदु पर ले आयी कि हमें अति स्वतंत्र बनना है, और मैंने यह संभाल लिया । यह श्री कृष्ण की शैली है। आप देखिये, क्योंकि इसका सामना करने के लिए। मान लीजिये कोई कहता है, “ओह, यह मेरा विचार है; मैंने ऐसा करने का फैसला किया है और पैसा और सब कुछ” , तो आपको धीरे से कहना चाहिए, ” ठीक है, मैं तो  कहूँगी कि आप जो कह रहे हैं वह सही है, बिल्कुल सही है। मैं आपसे सहमत हूँ और अब आप दूसरे विषय के बारे में क्या सोचते हैं? ” ऐसा ही कुछ। और फिर आपको कहना चाहिए, “अब, मैं सुझाव दे सकती हूँ। लेकिन मैं सुझाव देना चहुंगी, इस तरह, यदि आप इसके लिए सहमत हो सकते हैं।” आप देखिये, धीरे-धीरे अगर आप इस तरह की बातें करते हैं, तो यह काम बन सकते हैं और लोग वास्तव में महसूस करेंगे कि आपने इतना समय निकाला है और आपने समय खर्च किया है और उनके प्रस्ताव और बातों को स्वीकार किया है। और उन्हें बुरा नहीं लगता।

तो आपको यह जानना होगा कि इस सभी कूटनीति का सार क्या है। क्या आप मुझे बता सकते हैं? इस कूटनीति का सार क्या है? वह है भलाई। आपको पूरी मानवता का हित करना है। यही इसका सार है। यदि आप इसे कर रहे हैं, तो आप अपने लाभ के लिए, अपने लिए नहीं कर रहे हैं। आप किसी व्यक्ति विशेष के लाभ के लिए नहीं कर रहे हैं। लेकिन आप इसे पूरी मानवता के हित के लिए कर रहे हैं। तो एक बार, जब आप जान जाते हैं कि यह सार है, तो चिल्लाने की क्या आवश्यकता है? चिल्लाने से आप कुछ हासिल नहीं करने वाले हैं। तो इसके इर्द गिर्द खेलकर इसे उस बिंदु पर लाएं जो हितकारी है।

जैसे श्री कृष्ण से पूछा गया कि “आपने कहा था कि आपको सच बोलना है और वह भी बहुत प्रिय होना चाहिए। ‘सत्यम वदेत, प्रियं वदेत’। उन्होंने पूछा, “यह कैसे हो सकता है? ये दोनों चीजें नहीं हो सकतीं। मान लीजिए कि आप सच कहते हैं तो हो सकता है लोग इसे पसंद ना करें, उस व्यक्ति को प्रसन्नता न दें।”

इसलिए उन्होंने कहा, “नहीं, यह होना चाहिए ‘सत्यम वदेत, हितम वदेत, प्रियं वदेत ।” यानि, ” सच बोलो, हित के लिए बोलो और मनभावन बात बोलो । “

मान लीजिए कि आप किसी को सच्चाई बताते हैं, तो हो सकता है वह उसे उस समय पसंद न करे । मान लीजिए आप उस व्यक्ति को बताते हैं, “आज आप विमान से मत जाइये ।”

वह इसे पसंद नहीं करेगा, “तुम्हारा क्या मतलब है? मैं तो जा रहा हूँ।”

“नहीं, कृपया मत जाओ। मैं आपसे विनती करता हूँ।”

तब उसे पता चलता है कि उस दिन विमान उड़ा और दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इसलिए वह सोचता है, “यह अच्छा था क्यूंकि यह मेरे हित के लिए था । तो यह कुछ, बहुत अच्छा है।” इसलिए तुरंत, वह आपके प्रति आभारी महसूस करता है और सोचता है कि आपने उसे सत्य बताया, जिससे उसी का हित हुआ और इसलिए वह प्रसन्न हो जाता है। इसलिए आखिरकार यदि आप किसी व्यक्ति के हित के लिए कुछ बात करते हैं, आत्मा के हित के लिए, तो ऐसा व्यक्ति तत्काल सोचता है कि आपने वास्तव में उस पर बहुत बड़ा उपकार किया है, कि आपने उसे बचाया है।

यहां तक कि अगर आपको हितकारिता के लिए कुछ झूठ बोलना पड़े, तो कोई बात नहीं। इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि श्री कृष्ण, जो कि ईश्वर हैं, यह जानते हैं। उदाहरण के लिए, एक आदमी किसी को मारने के लिए आ रहा है और आप जानते हैं कि वह आदमी कहां छिपा है। वह आता है और आपसे पूछता है “वह आदमी कहाँ है?” क्या आप उसे सच बता देंगे? “ठीक है, वह वहाँ है। जाओ और उसे मार दो”? नहीं | तो आपको क्या बताना है? आपको उसे बताना होगा कि “देखिये । मुझे आपको कुछ नहीं बताना है। मुझे नहीं पता। कोई फर्क नहीं पड़ता। ” क्योंकि वह जो पूछ रहा है, वह अनधिकृत है , अनाधिकार है । उसका कोई सरोकार नहीं था , कोई अधिकार नहीं है, इस तरह के सवाल पूछने का । और उनके पास आपसे जवाब निकालने का कोई प्राधिकार नहीं है। चाहे आप उसे जवाब दें या जवाब नहीं दें, यह आपका अधिकार है। यदि आप समझते हैं कि, यह उस आदमी के हित में नहीं है, जो हत्या करना चाहता है, क्योंकि कल उसे फांसी हो जाएगी, और ना ही उस व्यक्ति के हित में है जिसे वह ढूंढ रहा है। इसलिए अगर आप ऐसा करते हैं , तो कोई समस्या नहीं है। आप पाएंगे कि अधिकांश लोग आपको पसंद करेंगे क्योंकि उन्हें पता चलेगा कि आप सच्चे हैं, बहुत ईमानदार हैं, यह कि आप हितेषी हैं।

अब जैसा कि आप जानते हैं कि मैंने आप सभी को सब कुछ बता दिया है, जो भी मुझे आपके बारे में महसूस हुआ, अधिकांशतः मुझे कहना चाहिए – हर समय नहीं, निस्संदेह, अधिकांश समय। मुझे थोड़ा बहुत झूठ भी कहना पड़ता है। लेकिन मैं जो कुछ भी करती हूँ , आपको पता चलेगा कि आपके  हित के लिए है, आपकी भलाई के लिए है। मुझे आपसे कहना होगा। मैं उससे दूर नहीं भाग सकती । मुझे इसका सामना करना होगा। तो आप भी दूर नहीं भाग सकते, लोगों को यह बताने से कि आपको उनके लिए क्या सही लगता है । विशेष रूप से, जिनके लिए आप प्रभारी हैं। जैसे आपके बच्चे हैं, आपका एक परिवार है, आपके अन्य संबंधी हैं, जिन के लिए आप जिम्मेदार हैं तो सबसे उत्तम बात यही है कि आपको उन्हें स्पष्ट रूप से  बताना होगा , आप क्या सोचते हैं और क्या सही है। यह आपका कर्तव्य है। फिर लोग इससे पलायन भी करते हैं। बहुत से लोग जो अपने बच्चों का सामना नहीं करना चाहते हैं, मैंने देखा है, वे उन्हें खिलौने, खिलौने के बाद खिलौने देंगे। वे अपने बच्चों का सामना करना पसंद नहीं करेंगे, उन्हें नहीं बताएंगे , “नहीं, मुझे यह पसंद नहीं है। यह अच्छा नहीं है। मैं चाहूंगा कि आप इसे इस तरह और इस तरह से करें। ”

तो अनुशासन का मतलब यह नहीं है, अनुशासन का मतलब किसी एक व्यक्ति या दो व्यक्तियों पर बहुत शासन करना नहीं है, लेकिन अनुशासन का अर्थ है कि हम जो भी करते हैं , वह आपकी आत्मा और दूसरों की आत्मा के हित के लिए होना चाहिए। यही ही सहज अनुशासन है , जहाँ आप सब कुछ दूसरों के हित के लिए और अपने उत्थान के हित में करते हैं। एक बार जब आप इस हित के विचार को स्थापित कर लेते हैं, इस परोपकार को, तो आप क्राइस्ट के जीवन के बारे में जानते हैं, मोहम्मद के जीवन, इन सभी महान लोगों के जीवन। क्योंकि उन्होंने जो कुछ भी किया है वह लोगों के हित के लिए है। तो अब मैं कहूंगी कि हमारे पास बायीं विशुद्धि है और आप अच्छी तरह जानते हैं कि बायीं विशुद्धि, आकाशीय विद्युत् है, विद्युत् में। अब आकाशीय बिजली क्या है? वह सिर्फ चिल्लाता है और दहाड़ता है। तो एक व्यक्ति, जिसकी बायीं विशुद्धि है , वास्तव में एक ऐसा व्यक्ति बन जाना चाहिए, जो चिल्ला सकता है ,चीख सकता है और – मुझे कहना चाहिए – जो दूसरों को आवरण-रहित कर सकता है जैसा उसने (विष्णुमाया) किया था। उसी तरह, आपको यह करना होगा। उस में, आपको भय नहीं होना चाहिए, आपको चिंता नहीं करनी चाहिए, और आपको यह नहीं सोचना चाहिए कि “आखिरकार मैं यह कैसे कर सकता हूं?” लेकिन अधिकांशतः लोग जो स्वयं को दोषी महसूस करते हैं, वे, वे हैं जो अपना आत्मविश्वास खो चुके हैं और अहंकार बाईं ओर प्रवेश कर चुका है, यह एक बहुत ही जटिल स्थिति है।

इसलिए हमें सचेत रहना चाहिए कि हम दोषी महसूस न करें , यह बहुत महत्वपूर्ण है। इसके लिए दोषी, उसके लिए दोषी, यह केवल एक मिथक है। हम वास्तविकता से बचना चाहते हैं, इसलिए हम कहते हैं कि हम दोषी हैं। तो आपको इसका सामना करना होगा, इसका सामना करो, अपनी वास्तविकता का । यह पता लगाने की कोशिश करें कि आपके साथ क्या गलत है और अन्य व्यक्ति के साथ क्या गलत है और इसका सामना करें। यह बेहतर है, अपितु यह कहना कि , “ओह, मैं बहुत दोषी महसूस करता हूँ”, और स्थिर हो जाना क्योंकि विष्णुमाया और कुछ नहीं, लेकिन बिजली जैसी हैं और बिजली लोगों को अनावरण करती है, वह लोगों पर चीखती है, लोगों पर चिल्लाती है, वह लोगों पर गरजती है। अगर आपकी बायीं विशुद्धि है तो आपको इन विधियों का उपयोग करना होगा। मैं कहूंगी कि एक ऐसा व्यक्ति जो हीन भावना से ग्रस्त है, उसे समुद्र तट पर जाना चाहिए और समुद्र को संबोधित करके कहना चाहिए, “मैं समुद्र का स्वामी हूँ , मैं यह हूँ , मैं वह हूँ !” जोर से।

जो लोग मंच पर नहीं बोल सकते, जो मंच पर नहीं आ सकते, उन्हें जाना चाहिए, उसी तरह, जब वे चेष्टा करेंगे तो वे महान वक्ता बन जाएंगे। आपके लिए यह बहुत अच्छा विचार होगा कि आप जाएं और वहां एक बड़ा व्याख्यान दें और उस बड़े व्याख्यान से आप हमेशा यह दिखा सकते हैं कि आप किसी हीन भावना से ग्रस्त नहीं हैं बल्कि आप अपने आप को  स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त कर रहे हैं। तो अब आप देखेंगे कि श्रीकृष्ण की कंठ शक्ति, दाईं ओर की, जहां उन्हें क्या कौन सी और क्या शक्ति मिली है? उनकी शक्ति यह है कि वे माधुर्य है। उन के पास चिल्लाने की शक्ति है ,या आप कह सकते हैं कि जिसके साथ, स्वर-रज्जु (vocal-cord) आप कहते हैं। वे स्वर-रज्जु की शक्ति है लेकिन वे कैसे इस शक्ति का उपयोग करते हैं माधुर्य के लिए, जो विरोधाभास है। और यही बात विष्णुमाया के साथ भी होती है। अब विष्णुमाया , बादलों में, रहने वाली शक्ति है। लेकिन वे क्या करती है – चीखती है, चिल्लाती है और अपना अस्तित्व दिखाती है , कि वे उपस्थित हैं ।

अब, ये सभी तस्वीरें जो आपको मिलती हैं और ये सभी चमत्कारिक तस्वीरें जो आप मुझे दिखाते रहे हैं, वे विष्णुमाया के प्रयोजन से हैं । वे ही हैं , विद्युत् के रूप में, वे कार्य करती है। और वे ही हैं जो इन सभी चीजों का अच्छी तरह से प्रबंध करती हैं । यद्यपि , वे श्री कृष्ण की बहन है , वे एक तरह से बहुत अधिक सूक्ष्मतर हैं, क्योंकि वे सूक्ष्म तरीके से आपकी मदद करती हैं । अब यह माइक [माइक्रोफ़ोन] इसमें विद्युत् है , आपको आश्चर्य होगा कि मेरा चैतन्य इसके माध्यम से बह रहा है। इस पर बौछार कर रहा है और यहाँ से यह कहीं भी जा रहा है, जहाँ कहीं भी आप इसे ले जाना चाहते हैं। आप एक कंप्यूटर को इसकी दूसरी ओर रख सकते हैं और आप मुझे कम्प्यूटरीकृत कर सकते हैं। यह एक इतनी उल्लेखनीय बात है कि जिसे चिल्लाना, चीखना और दहाड़ना है, वही हैं, जो बायीं ओर हैं ताकि यह लोगों में शक्ति के रूप में उपस्थित है। उन लोगों में जो स्वयं को दोषी महसूस करते हैं, जो हीन भावना से ग्रस्त हैं, जो धूर्त हैं, जो महसूस करते हैं कि वे किसी काम के लिए अच्छे नहीं हैं। वे उनमें उपस्थित है। फिर से अंतर देखिये। वे उनमें मौजूद है, उनकी शक्ति, वे एक ऐसे व्यक्ति में मौजूद है, या एक ऐसे व्यक्ति में अभिव्यक्त होती हैं, जो आत्मविश्वासी नहीं है । और फिर वे अपनी शक्ति का हक जमाती हैं जिसके द्वारा व्यक्ति आत्मविश्वासी बन जाता है। इस तरह से उनकी कार्य प्रक्रिया है और हमारे भीतर भी संभावित रूप से विद्यमान है।

इसलिए जब हम विष्णुमाया की बात करते हैं तो हमें ज्ञात होना चाहिए है कि वे वहीं विराजमान हैं । किसी भी क्षण हम तय करें, हम महान वक्ता बन सकते हैं, हम लोगों को आवरण हीन कर सकते हैं। हम आकाशीय विद्युत की तरह होंगे, हम गर्जना कर सकते हैं। लेकिन आम तौर पर हम नहीं करते हैं। तो यह दोनों पक्षीय लोगों को संतुलन देती है। लेकिन मध्य में जब आप ऊपर उठते हैं , कुंडलिनी चढ़ती है , अधिकांश लोगों की विशुद्धि पकड़ी होती है , अधिकांश लोगों की। इसलिए उन्हें या तो यह देखना होगा कि वे दोषी महसूस नहीं करें या उन्हें यह देखना होगा कि कोई चिल्लाना न हो, कुछ भी नहीं,वे अपने चिल्लाने में आक्रामक नहीं हो । और, साथ में , उन्हें यह देखना होगा कि वे पूरी तरह से अपने संतुलन में हैं। वे मध्य मार्ग में हों जिससे वे मधुर, दयालु और अच्छे बन जाएँ ।

अब ऐसे कई लोग हैं जो कृत्रिम रूप से मधुर बनते हैं। कृत्रिम रूप से। उन्हें कुछ पैसे निकलवाने होंगे तो वे बहुत मधुर और अच्छे बन जाएंगे। ऐसे लोग वास्तव में नरक में जाने वाले हैं क्योंकि वे श्री कृष्ण की शक्ति का उपयोग बहुत असंगत ढंग से कर रहे हैं और इसके लिए उन्हें क्षमा नहीं किया जा सकता। जो लोग कृत्रिम रूप से मधुर होते हैं , वे किसी काम के लिए उपयुक्त नहीं होते। आपको वास्तव में मधुर और दयालु होना चाहिए, यदि आप उनके बारे में सोचें जो नारायण हैं , जो श्री राम हैं, जो श्री कृष्ण हैं और जो आपकी विशुद्धि के परमेश्वर हैं ।

इसलिए हमें नियंत्रित करना है , कि हम फिर से दोषी महसूस नहीं करना , क्योंकि कुछ लोग हो सकते हैं, जो महसूस कर रहे होंगे कि “माँ मुझसे कह रही है।” मैं किसी अमुक व्यक्ति को इस तरह  से नहीं कह रही हूँ , यह एक सामान्य बात है। तो मैं जो कह रही हूँ , वह यह है कि यदि आप एक ऐसे व्यक्ति हैं, जो चिल्लाते रहते हैं , तो कृपया इसे ठीक करें और इसे नियंत्रण में रखें और आराम करें, अपने गले को आराम दें। कुछ लोग बहुत खुश होते हैं अगर उन्हें बताया जाए कि “आज कलेक्टर साहब आराम कर रहे हैं।” उन्होंने कहा, “स्थायी रूप से या थोड़े समय के लिए?” क्योंकि वह एक ऐसे व्यक्ति हैं , यदि वह  एक चिल्लाने वाला व्यक्ति हैं , तो कोई भी उसे देखना नहीं चाहता। कोई भी ऐसे व्यक्ति को पसंद नहीं करता, जो चिल्लाता है, कोई भी पसंद नहीं करता। यहां तक कि निकटतम और उनके प्रिय भी इसे पसंद नहीं करते हैं। निस्संदेह वे सहन करते हैं – वह अलग बात है – लेकिन उन्हें यह पसंद नहीं है , वे ऐसा नहीं चाहते।

इसलिए हमारे लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि हमें  विशुद्धि को पहले साफ रखना है, हमारे पास एक सुंदर हृदय होना चाहिए , एक बहुत ही निष्कपट हृदय होना चाहिए, जहां श्री कृष्ण के मधुर संगीत की सुगंध हो । जब तक हमारे हृदय में एक सुंदर, मधुर संगीत नहीं होगा, हम कभी भी, कभी भी अच्छे सहज योगी नहीं बन सकते। मुझे उम्मीद है कि आज की संध्या कालीन पूजा, यद्यपि देर हो गई है, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है, इससे आपको इसके बारे में सोचने में मदद मिलेगी, अपनी विशुद्धि को सुधारने , इसपर कार्य करने में। और फिर विराट को देखने के लिए और यह पता लगाने के लिए कि आपके साथ क्या गलत है, इसे ठीक करें, कोई भी इसे कर सकता है, और देखें कि आपको बस अपने बारे में, अपने विशुद्धि के बारे में पूर्ण जानकारी हो। और यह केवल तभी संभव है, फिर से यह एक विषम चक्र है, अगर आपके पास एक अच्छी विशुद्धि है, यदि आपकी एक अच्छी विशुद्धि नहीं है , तो आप स्वयं को कभी नहीं देख सकते क्योंकि विशुद्धि बिन्दु पर ही आप साक्षी बनते हैं।

आप सिर्फ एक साक्षी होते हैं, जब आप विशुद्धि बिन्दु पर होते हैं। तो आपको विशुद्धि पर एक साक्षी होना होगा । यदि आपने साक्षी अवस्था प्राप्त कर ली है, तो आप अपनी विशुद्धि में देख सकते हैं कि , आप में क्या गलत है, आपकी  समस्याओं में क्या गलत है, आपके वातावरण में, सब कुछ, और आप अंत में यही सोचेंगे , “ओह, यही है जो कि गलत है।”

इसलिए आज, जब हम श्री कृष्ण की पूजा कर रहे हैं, तो हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि हमारी विशुद्धि और हमारा मस्तिष्क, क्योंकि अंततः वे मस्तिष्क बन जाते हैं, श्री कृष्ण मस्तिष्क बन जाते हैं । यही मैंने आपसे कहा था कि पेट की चर्बी मस्तिष्क में जाती है। अतः श्री नारायण मस्तिष्क में प्रवेश करते हैं और बन जाते हैं , जिसे हम विराट , अकबर कहते हैं। और जब वे अकबर बन जाते  हैं , तो वे ब्रह्माण्ड में मस्तिष्क होते हैं । वे मस्तिष्क हैं । तो जो लोग श्री कृष्ण की पूजा करते हैं, वे अहंकार रहित के बुद्धिमान लोग बन जाते हैं। उनका मस्तिष्क विकसित होता है और उन्हें इसका कोई अहंकार नहीं होता । निरहंकार बुद्धि, जिसे मैं शुद्ध बुद्धि कहती हूँ , प्रकट होने लगती है।

परमात्मा आप सबको अनंत आशीर्वाद दें।

इस पूजा के बाद, आप सब जानते हैं कि मैं फिनलैंड जा रही हूँ और आपको मेरा यात्राक्रम देखना चाहिए। यह भयंकर है। और फिनलैंड से मास्को, मास्को से भारत, भारत से जापान और जापान से लॉस एंजिल्स और लॉस एंजिल्स से न्यूजीलैंड, न्यूजीलैंड से ऑस्ट्रेलिया तक। तो यह हर रोज ऐसा ही होगा, मुझे लगता है। लेकिन जो भी हो, मैं अभी जा रही हूँ और अब आपके पास कुछ समय है। हमारे पास बीच में अभी बहुत समय है, जब तक मैं अक्टूबर में आती हूँ, आपको फिर से परेशान करने के लिए। तो इस समय में आप सभी को यह तय करना चाहिए कि आप क्या करने जा रहे हैं, आप सहज योग की मदद कैसे करेंगे, आप कैसे कार्य करने वाले हैं। यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि मुझे किसी सहज योग की आवश्यकता नहीं है , आपको इसकी आवश्यकता है और दुनिया को इसकी आवश्यकता है। लेकिन इसके बावजूद मैं इतनी मेहनत कर रही हूँ। तो आपको सोचना चाहिए कि “माँ अब बाहर गयी हैं , कोई अंतर नहीं पड़ता। हम इस पर कार्य करेंगे और हम यह पता लगाएंगे कि हम इसके बारे में क्या कर सकते हैं। ‘

इसलिए कृपया वापस आने तक कुछ काम करें। मैं अक्टूबर में फिर से यहां आऊंगी, फिर हम देखेंगे कि हम क्या कर सकते हैं और इसके आगे क्या प्राप्त करेंगे। लेकिन आइए देखें कि आपने क्या प्राप्त किया है और उन्हें कुछ निष्कर्षों तक पहुंचाएं, उनका कुछ परिणाम निकाले । और यही मैं उम्मीद कर रही हूँ ।

अब, मुझे उन सभी लोगों को धन्यवाद देना चाहिए जिन्होंने सहजयोग के लिए पहले से ही बहुत कुछ किया है और उन सभी केंद्रों और सभी देशों में जहां सहज योग शुरू हुआ है और इतना बढ़ रहा है। मुझे नहीं पता कि आप सभी को नेताओं (लीडर्स) के नाम पता हैं या नहीं, लेकिन यह सभी देशों के सभी नेताओं को जानने और उन पर अपना ध्यान देने और यह प्रार्थना करने के योग्य है कि वे सभी को सहज योग का आशीर्वाद देने में सक्षम हों । इसके अतिरिक्त, दूरदर्शिता होनी चाहिए, यह देखने के लिए कि वे क्या कर सकते हैं और कैसे वे विभिन्न देशों को जोड़ सकते हैं और कैसे वे अपने स्वयं के देशों के माध्यम से काम कर सकते हैं।

तो यही है और मुझे संसार के सभी नेताओं (लीडर्स) और सभी लोगों को धन्यवाद देना है, जहां मैं अब तक गयी हूँ , व्यवस्थाओं और उनके द्वारा की गई हर चीज के लिए। उन्होंने बहुत मेहनत की और बहुत सारी चीजें अर्जित कीं। और मुझे उन सहज योगियों को भी धन्यवाद देना है, जो उनके साथ हैं, जिन्होंने इतनी सहायता की है। आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद।