Public Program, Sakshi Swaroop

(भारत)

1990-02-07 Public Program, Hyderabad, Hindi, 103'
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साक्षी स्वरूप हैद्राबाद, ७.२.१९९०

सत्य के बारे में बताया था कि सत्य अपनी जगह अटूट, अनंत है और उसे हम अपने बुद्धि से, मन से, किसी भी तरह से बदल नहीं सकते। और सत्य क्या है? सत्य ये है कि हम, जो आज मानव स्वरूप हैं वो वास्तविक में आत्मास्वरूप है। एक आज ऐसी स्थिति पर हम खड़े हैं जहाँ हम स्वयं को एक मानव रूप में देख रहे हैं। और इससे एक सीढ़ी चढ़ने से ही हम जान लेंगे कि हम इस मानव स्वरूप से भी एक ऊँचे स्वरूप में उतर सकते हैं जहाँ हम आत्मास्वरूप हो जाते हैं। ये एक महान सत्य है। लेकिन परम सत्य ये है कि ये सारी चराचर सृष्टि, सारी दुनिया, मनुष्य, प्राणीमात्र, जड़ चेतन सब जीव है। एक ब्रह्मचैतन्य के सहारे जी रही है, पनप रही है, बढ़ रही है। और ये परम चैतन्य चारों तरफ सूक्ष्मता से फैला हुआ है जो कि सब चीज़ों को बनाता है, सब चीज़ों को सृजन करता है, बढ़ाता है और जो कुछ भी आज हम इन्सान बने हैं वो भी इस परम चैतन्य के कृपा से ही बने हैं। इस परम चैतन्य में ऐसी शक्ति है कि जिससे वो हमें ज्ञान दे सकता है, ऐसा ज्ञान कि जो एकमेव ज्ञान है। जिसे कि हम ये जान सकेंगे कि हम क्या है? हमारे अन्दर क्या स्थिति है? हम कहाँ हैं? और हमारा लक्ष्य क्या है? वो ज्ञान देता है कि जिससे हम अन्दर से ही महसूस करते हैं, अन्दर से ये हमें ज्ञात होता है कि हम एक विराट के अंग-प्रत्यंग हैं। इसे हम अंग्रेजी में कलेक्टिव कॉन्शसनेस कहते हैं और हिन्दी भाषा में सामूहिक चेतना कहते हैं। ये सामूहिक चेतना का प्रादुर्भाव उसका मैन्यूफस्टेशन हमारे अन्दर सहज में हो सकता है जिससे हम आत्मास्वरूप हो जाते हैं क्योंकि आत्मा जो है वो हमारे अन्दर एक सामूहिक वस्तु है। जिस दिन ये घटित होता है, ये घटना हो जाती है उस दिन हम उस परम सत्य को भी जान जाते हैं कि हमारे चारो ओर ये सूक्ष्म सृष्टि फैली हुई है और इस सूक्ष्म सृष्टि से हमारा जो योग हो जाता है, जब हम उससे एकाकारिता पा लेते हैं तब हम ये जान जाते हैं कि हमारा चित्त भी आलोकित हो गया और इस चित्त के साथ हम बहुत कुछ जान सकते हैं जो हमने कभी भी पहले जाना नहीं। ऐसी दशा में हमें ये सोच लेना चाहिए कि आज का जो संसार है, आज जिसे हम बहुत बड़ा सत्य समझे बैठे हैं इसके पीछे एक बहुत बड़ा सत्य छिपा हुआ है जिसे हमें प्राप्त करना है। और इसे प्राप्त करना बहुत सहज है। सहज का मतलब दो होता है एक तो सहज माने आपके साथ पैदा हुआ और सहज माने आसान, इझी । होना ही चाहिए। अगर ये उत्क्रान्ति, ये इव्होल्युशन अत्यावश्यक है, तो वो सहज ही होना चाहिए । जैसे कि हमारा श्वास लेना। ये अत्यावश्यक है हमारे लिए। वो हम सहज में लेते हैं। इसके लिए अगर कहीं जाना पड़े और किसी गुरु को बनाना पड़े और कुछ चुकाना पड़े तो बहुत कठिन हो जाए। इसी प्रकार ये घटना भी सहज में ही घटित होनी चाहिए । कारण ये एक जीवंत शक्ति है। जिसे आज हमने मानव का रूप दे दिया अमिबा से, और यही जीवन शक्ति जो है वो जीवन्त है वो ही हमारे अन्दर कार्यान्वित होती है, काम करती है और जिसके कारण हम इस ऊँची दशा में पहुँचते हैं। कल आपको मैंने कुण्डलिनी के बारे में बताया था कि कुण्डलिनी शक्ति हमारे अन्दर इस त्रिकोणाकार अस्थि में बैठी है। इस त्रिकोणाकार अस्थि में ये कुण्डलिनी शक्ति बैठी है और ये साढ़ेतीन कुण्डलों में हैं। उसका भी एक गणित है। और इससे अनेक शक्ति के तंतु हैं जैसे कि एक डोर में अनेक छोटे-छोटे डोर होते हैं। अब इस कुण्डलिनी के नीचे में जो आप देख रहे हैं लाल रंग का चक्र है ये हमारा मूलाधार चक्र है और जिससे कुण्डलिनी बटी हुई है उसे हम मूलाधार कहते हैं माने वो उसका घर है। नीचे जो लाल रंग का आप देख रहे हैं वो मूलाधार चक्र है और ये बहुत महत्वपूर्ण चक्र है। इस चक्र के ही कारण कुण्डलिनी को सबकुछ ज्ञात होता है। और ये चक्र हमारे अबोधिता का, हमारे भोलेपन का, हमारे इनोसेन्स का कर्ता-धर्ता है। जब हम बच्चे होते हैं। बचपन में जब हम बहुत ही अबोध होते हैं उस वक्त हमारे अन्दर ये चक्र बहुत ही कार्यान्वित होता है। धीरे -धीरे जैसे उमर बढ़ने लग जाती है इस चक्र पे आघात आते हैं और हमारा इनोसेन्स जो है, हमारी |

जो अबोधिता है, हमारा जो भोलापन है वो कम होने लग जाता है। इस चक्र के उपर आप देख रहे हैं यही कुण्डलिनी है। ये चक्र जो है ये हमारे अन्दर जो पेल्व्हिक प्लेक्सस है उसे प्लावित करता है और उसका पोषण करती है। और ये जो पेल्व्हिक प्लेक्सस है ये हमारे जितने भी मलोत्सर्जन वगैरा के जितने भी कार्य हैं वो करता है। इसलिए अब ये जान लेना चाहिए कि कुण्डलिनी के जागरण के समय आपके सारे ये व्यवहार बंद हो जाते हैं। और जो लोग ये बता रहे हैं, कि सैक्स करने से कुण्डलिनी का जागरण होता है ये महापाप है क्योंकि ये तो उसके नीचे है, जो सारा पवित्र और उत्तम है वो ये मूलाधार चक्र है। और जैसे कि कमल एक गन्दे, मैले, सड़े हुए एक पानी के छोटे से जगह में से जन्म लेता है और उसका सुगन्ध सारी ओर फैलता है। इसी प्रकार, उसी प्रकार ये चक्र कमल की भाँति हमारे अन्दर जन्म लेता है। जैसे कि कमल के पत्तों पर कोई पानी नहीं छिडकता इसी तरह इस चक्र पे कोई सा भी गन्दा ठहर नहीं सकता और ये कभी भी नष्ट नहीं होता है। हलांकि अगर हम लोग गलत काम करते हैं तो जैसे बादल सूर्य को भी ढक लेते हैं उसी प्रकार ये ढक सकता है। तो जो लोग इस तरह की गलत बातें सिखाते हैं तो समझ लेना चाहिए कि आपको पतन की ओर ले जा रहे हैं और आपकी कमजोरियों को बढ़ा रहे हैं। अधिकतर ये लोग आपकी कमजोरियों को ही बढ़ाते हैं और उस कमजोरी का पूरा फायदा उठाते हैं, जिसे कि आप इस गर्द के अन्दर और भी घुस जायें और इनको रुपया-पैसा दें। आज – कल, जो मैं आपको बता रही थी कल कि अमेरिका में जो उपद्रव शुरू हआ है उसका कारण ये है कि अवनीति के कारण इस चक्र को उन्होंने बहुत बुरी तरह से ढ़क लिया है। इसकी शक्ति ही नष्ट होने की वजह से वहाँ इतनी गन्दी -गन्दी बीमारियाँ जैसे कि एड्स वो इस चक्र की खराबी हो जाने से हो जाती है, और इस चक्र की खराबी हो जाने से अगर आपकी पत्नी या पति को कोई इस तरह की बाधायें हों तभी ये चक्र खराब हो जाता है और उस वक्त मनुष्य की मस्तिष्क के अन्दर इसका असर आ सकता है और बहुत से रोग , जिन्हे कि हम साइकोसोमेटिक कहते हैं, उनमें से खास कर जिससे कि मसल्स कमजोर होते जाते हैं वो इसी चक्र के बिगड़़ जाने से होते हैं। अब इस चक्र का सम्बन्ध आपके पेल्व्हिक प्लेक्सस के साथ सिर्फ शारीरिक स्तर पे है, फिजीकल, और मानसिक से भी है। क्योंकि आप देख रहे हैं कि इसी चक्र से एक पूरी नाड़ी उपर की तरफ जा रही है और यही आपकी इड़ा नाड़ी है और चंद्र नाड़ी। तीनों नाड़ी उपर में जा करके जो नीले रंग की एक संस्था तैयार करती है यही हमारा एक तरह का मन है। और ये जो मन के अन्दर हर तरह के कुरसंस्कार भर जाने पर वो इस तरह के गुब्बारे के जैसे, लाइक अ बलून, अपने शहर में इस स्तर में इस तरह से फैल जाता है, जिसे कि हम कह सकते हैं कि जो कुसंस्कार होते हैं, उसको लोग कहते हैं कि वो सुपर ईगो बन जाता है। कुसंस्कारों में ऐसे संस्कार कि हम अगर किसी गलत गुरु के पास जायें, हमने कोई गलत धर्म ले लिये, हम लोग गलत लोगों के पीछे भागते रहे, इसके अलावा हम तांत्रिकों के पीछे भागते रहे हैं या हम ऐसे लोगों के पास गये कि इनका से धर्म से कोई सरोकार नहीं, मतलब नहीं और जो धर्म के नाम से बड़े ही दुष्ट गुरु लोग हैं जिनके पास जाने से दूसरे बहुत दोष आ जाते हैं। इस नाड़ी को हम लोग चंद्र नाड़ी भी कहते हैं। और आप जानते होंगे लुनार अंग्रेजी में कहते हैं चंद्र को, और लुनसी कहते हैं पागलपन को। जब ये चंद्र नाड़ी खराब हो जाती है तो मनुष्य में सारे मानसिक विकार आ जाते हैं। दूसरी तरफ आप देख रहे हैं कि दूसरा जो चक्र है वो है स्वाधिष्ठान चक्र। ये चक्र पीले रंग का दिखाया है जो कि ये सूर्य की गति से चलता है। और इस चक्र से हमारी जो राइट साइड की नाड़ी है जिसे हम पिंगला नाड़ी कहते हैं वो चलती है। पिंगला नाड़ी जो है वो हमें कार्य करने की शक्ति देती है। तो पहली वाली जो नाड़ी है उसे इच्छा शक्ति की नाड़ी कहते हैं। और जो दूसरी नाड़ी है उसे हम क्रिया शक्ति की नाड़ी कहते हैं। क्रिया शक्ति के नाड़ी में भी दो अन्तर हैं कि एक जो हम अपने शारीरिक क्रिया को करते हैं और दसरे जो हम अपने बौद्धिक क्रिया को करते हैं। दोनों ही इस नाड़ी से कार्य करते हैं ।

अब ये स्वाधिष्ठान चक्र बहुत महत्वपूर्ण है। खास कर मैंने कल देखा कि बहुत से लोगों को स्वाधिष्ठान चक्र की तकलीफ थी। इसका कारण ये है कि आप लोग बहुत पढ़े-लिखे हैं और ये कि आप लोग बहुत ज़्यादा सोचते हैं। दूसरा अति सोचने से ये चक्र ज़्यादा चलने लग जाता है। कारण ये है कि जब आप बहत सोचते हैं तो आपके जो मस्तिष्क अन्दर , में, आपके ब्रेन में जो ग्रे-सेल्स हैं उसको आप बहुत इस्तमाल करते हैं। जब उनको आप बहुत ज़्यादा इस्तमाल करने लग जाते हैं तो उसकी जगह दूसरे भी आने चाहिए तो वो कहाँ से आएंगे ? तो उसकी क्रिया, ये जो चक्र है ये अपने पेट के जो चाहिए, उसको मेंद से बनाता है ग्रे-सेल्स के लिए क्योंकि अपना ब्रेन जो है वो भी मेंद याने फैट से बना है। तो फैट सेल्स से वो ग्रे सेल्स बनाता है यही चक्र और इसको इस तरह से ये हमारे ब्रेन में सेल्स चले जाते हैं। जब हम इस तरह से बहुत ज़्यादा सोचते हैं और हम बहुत ही ज़्यादा सुपरइस्टिक हो, या हम हमेशा भविष्य की ही बात सोच रहे हो तब ये नाड़ी ज़्यादा चलती है। और जब हम अपने भूतकाल की, अपने गये बिते दिनों की ज़्यादा सोचते हैं तब हमारी दूसरी नाड़ी ज़्यादा चलती है। तो समझ लेना चाहिए कि इस तरफ से सबकॉन्शस माइंड है तो इस तरफ से आपका सुप्रा-कॉन्शस माइंड है। और ये दोनों माइंड आपके जब तक संतुलन में नहीं आते हैं तब तक आप बीचोबीच रह जाते हैं। अब तीसरी जो बीच में नाड़ी है, उसका नाम है सुषुम्ना नाड़ी। ये नाड़ी हमारे अन्दर जो बनी हुई है ये जब हम पहले तो लक्ष्मी को खोजा, इसको खोजा, उसको खोजा और जब उससे हम पूरी तरह से उब जाते हैं कि, ‘अब बहुत खोजा अब नहीं चाहिए।’ जब आप परमात्मा को खोजना सीख जाते हैं, तब ये नाड़ी, महालक्ष्मी जी हम जिसे कहते हैं, ये नाड़ी का काम शुरु हो जाता है। यही नाड़ी ऐसी है कि जिसके अन्दर एक बड़ी सूक्ष्म सी नाड़ी है ये भी एक जैसे कि एक कॉइल हो, उसके साइज की कॉइल्स बनी हो। उसकी जो सूक्ष्मतम अन्दर की नाड़ी, जिसे ब्रह्मनाड़ी कहते हैं, उसी में से पहले कुण्डलिनी का, पहले दो-चार धागा किसी के दस धागे इसी तरह से धीरे-धीरे कुण्डलिनी उठती है। उसके उठने से ये और भी खुलता जाता है और उसके खुल जाने से और भी आपके अन्दर जो शक्ति के धागे हैं वो उपर उठने लग जाते हैं। इस प्रकार ये तीन नाड़ी इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियाँ हमारे अन्दर हैं। ये तीनों नाड़ियाँ हमारे आज्ञा चक्र से मिलती है, जो आप देख सकते हैं। ऐसे तो अब यहाँ पर किताबें हैं, उसमें आप पढ़ सकते हैं हर एक चक्र के बारे में और ये चक्र किस तरह से गतिमान रहते हैं और किस तरह से कार्य करते हैं। अब लोग कहेंगे कि ‘माँ, कैन्सर कैसे ठीक हो जाता है ?’ आपको थोड़ा समझाऊं कि हमारे अन्दर लेफ्ट और राइट, ऐसे दोनों साइड हैं। समझ लीजिए ये लेफ्ट और राइट की जो सिम्परथैटिक नव्वस सिस्टम, माने इड़ा और पिंगला नाड़ी से बनी हुई ये हमारे दोनों तरफ काम कर रही है और बीचोबीच जो आपको दिखाई दे रहा है ये एक चक्र है । अब जब कोई एक साइड ज़्यादा बढ़ जाती है तो यहाँ इस तरह से ये चक्र बहुत छोटा होते जाता है और एनर्जी उसकी कम होती जाती है और इस तरह से बीमारी बढ़ने लगती है। पर जब ये बिल्कुल ही टूट जाता है तब हमारे मेरुदंड का जो सम्बन्ध हमारे ब्रेन के साथ होता है। वही टूट जाता है। और उस जगह पर ऐसी कुछ व्यवस्था हो जाती है कि ये अपने ही आप …….. अपने ही आप बनना शुरु हो जाते हैं। इसके जो सेल्स हैं उनको किसी और की परवाह ही नहीं । जैसे अब हमारा नाक है, या आँख है, कान आँख है हर चीज़ बराबर उसी प्रपोरशन में, उसी प्रमाण में बढ़ती है जैसे कि बढ़ना चाहिए। ये नहीं कि नाक ही बड़ी हो गयी, ही बड़ी हो गयी कि कान ही बड़ा हो गया। लेकिन जब ऐसा घटित हो जाता है जब उसका सम्बन्ध मस्तिष्क के साथ नहीं रहता है तब वो चीज़ अपने आप से खूब जोरो में बढ़ना शुरू हो जाती है और कभी अगर कैन्सर आपके अगर उंगली का हो गया तो एक उंगली बढ़ जाएगी, अगर आपके नाक पे होगा तो नाक ही बढ़ जाएगी, कान पे होगा तो कान ही बढ़ जाएगा तो वो चीज़ जा कर के दूसरी जो सेल्स हैं उनको दबाती है और इसी तरह से कैन्सर का रोग घटित होता। अब कुण्डलिनी का जब जागरण होता है तो वो जैसे ये टूटी हुई चीज़ है उसमें से जोड़ते-जोड़ते इस तरह से उसके जैसे

कि आप उसी मणी के अन्दर के जोड़ को पिरो लीजिए, उस तरह से ये झुक जाता है। ये झुकते ही साथ ये जो चक्र है जो कि अब क्लांत है और जो कि बीमार है और कमजोर है और जिसमें शक्तिहीनता आ गयी है उसे शक्ति कहते हैं। उस शक्ति के कारण आपका कैन्सर ठीक होता है। वो बहत ही सहज, सरल एक गती है जिससे कि ये रोग ठीक हो जाता है। और ऐसे लोगों में जिनकी कुण्डलिनी जागरण हो जाती है इसी प्रकार अनेक रोग ठीक हो सकते है। क्योंकि इन चक्रों की ही खराबी के कारण जो बीमारी आ जाती है और जब ये चक्र ठीक हो जाते है और उन चक्रों में जब शक्ति आ जाती है तो वो बीमारी भी आदमी की नष्ट हो जाती है और वो सुदृढ़ हो जाता है। अब सब चक्रों के बारे में आज नहीं कहँगी। लेकिन इतना ही बताऊंगी कि वे सब आप किताब में पढ़ सकते हैं और बारीकी से समझ सकते हैं। और जब आप हमारे सेंटर में आएंगे तो आप जान जाएंगे कि ये चक्र क्या हैं। जब आपके कुण्डलिनी यहाँ से ब्रह्मरन्ध्र से छेदती है, तो आप इसमें जो जगह देखते हैं उसे मेडिकल टर्म में लिम्बिक एरिया ऐसा कहते हैं। इस लिम्बिक एरिया को ही हम कहते हैं सहस्रार। लेकिन इस वक्त कुण्डलिनी जो है आज्ञा चक्र से होते हुए गुजरती है, तो ये आज्ञा चक्र जागृत होने के कारण ये दोनों संस्थाये एक तरह से इगो बना हुआ है और एक तरफ से सुपर इगो या एक तरह से अहंकार और दूसरी तरफ महत् अहंकार, इन दोनों को अपने अन्दर खींच लेती है। इसको खींच लेने से बीच में जगह हो जाती है। जगह हो जाने से उसी के अन्दर से कुण्डलिनी बाहर निकल आ जाती है। इसलिए आपने अपने सर में ठण्डी- ठण्डी हवा आते देखी। आप ही के अपने हाथ से आपने इसको महसूस किया। इस प्रकार आपको आत्मसाक्षात्कार होता है। आत्मा तो आपके हृदय में है। आत्मा आपके हृदय में है। लेकिन ये जो है ये हृदय का चक्र है यहाँ पे। ये हृदय का चक्र है और अपने सर में भी जैसे सात चक्र हैं उसी प्रकार सात इन चक्रों के बीच जिस वख्त यहाँ याने ब्रह्मरन्ध्र में आ कर के कुण्डलिनी भेदन कर देती है तो हृदय में ही इसका प्रकाश चला जाता है और आत्मा का सम्बन्ध हमारे चित्त से हो जाता है और हमारे चित्त के अन्दर कुण्डलिनी का असर ये आ जाता है कि हम आलोकित पाते हैं अपने चित्त को| जैसे कि आप देख रहे हैं कि ये मेरी साड़ी है इसी प्रकार समझ लीजिए कि चित्त यहाँ फैला हुआ है। जब कुण्डलिनी इस तरफ से यूं ऐसे जाती है तो चित्त अन्दर की ओर फिसला जाता है। अन्दर की ओर जब यहाँ पर आ कर उपर में जब ये कुण्डलिनी इसको छेद देती है तब इस कुण्डलिनी की आभा उसकी शक्ति इस चित्त में चली जाती है। और तब आपका चित्त जो है वो आलोकित हो जाता है। ये बहुत ही सहज, सरल चीज़ है। लेकिन इसको करने के लिए ऐसे ही लोग चाहिए कि जो इसमें अधिकारित हैं। मैं सोचती हैँ कि वो सहजयोगी हैं, जिन्होंने सहजयोग में आ कर के और पूरी तरह से जान लिया है कि कुण्डलिनी क्या है और वो इस वक्त अब वो एक ऐसी दशा में आ गये हैं कि वो सामूहिक चेतना में समझ सकते हैं कि आपके अन्दर क्या दोष हैं? और उसको किस तरह से ठीक करना है? वो आपकी कुण्डलिनी सहज में ही जागृत कर सकते हैं । इतना ही नहीं ये लोग आपकी बीमारियाँ भी ठीक कर सकते हैं। अब कल ही आपने देखा कि पटेल साहब जो यहाँ खड़े हुए थे, उन्होंने तो मुझे कभी देखा ही नहीं था और पैरेलिसिस में पड़े थे। डॉक्टर ने कहा, ‘ये तो ठीक नहीं हो सकते ‘ रोज कुछ न कुछ इंजक्शन दे रहे थे। क्या-क्या हो रहा था और इसके बाद फिर वो एकदम ठीक हो गये। आज भी एक महाशय आये थे। वो भी एकदम से ठीक हो गये थे। इस प्रकार कोई लोग एकदम ठीक हो जाते हैं, कोई लोगों को थोड़ा और टाइम लगता है। पर आपका जो शारीरिक है वो कम से कम ठीक हो जाना चाहिए। अब अगर आप किसी गुरु के पास जाते हैं, किसी के पास जाते हैं और आपकी अगर तबियत नहीं ठीक रहती, तो मैं आपसे एक माँ की तरह ये कहँगी कि बेटे, जो आदमी तुम्हारी तबियत भी नहीं ठीक रख सकता है ऐसे को गुरु क्यों मानना? ऐसे गुरु को रख के क्या फायदा! कम से कम तुम्हारी

तंदुरुस्ती तो ठीक है। वो भी अगर ठीक नहीं रख सकता तो उसकी क्या जरुरत है। फिर आप स्वयं ही अपने गुरु हो जाते हैं । क्योंकि आपका आत्मा ही आपको प्रकाश देता है। और आप ये चैतन्य लहरियों से जान सकते हैं कि आप क्या कर रहे हैं? आपमें क्या दोष हैं? आपमें कौनसी चीज़ गलत है? जैसे आज ही एक साहब ने मुझसे कहा कि, ‘माँ, मेरा आज्ञा बहुत पकड़ रहा है, इसे ठीक कर दो।’ इसका मतलब है मुझे अहंकार आ गया है। और आप किसी से कहेंगे कि ‘ हाँ, अहंकार आ गया है।’ तो मारने बैठेंगे। कोई करेगा ऐसी बात और वो स्वयं ही आ के कहता है कि, ‘माँ मेरा आज्ञा बहुत पकड़ रहा है। इसे आप साफ कर दीजिए। इससे बड़ी तकलीफ हो रही है। मेरा सरदर्द हो रहा है।’ इस प्रकार आप खुद ही जान जाते हैं कि आपमें कौनसे चक्र पकड़े हैं और अब अगर ये जान जायें कि जो चक्र आपमें पकड़े हुए हैं वो चक्र इस तरह से आप ठीक कर सकते हैं। अब तो स्वयं ठीक हो ही जाएंगे। लेकिन आप दुसरों के बारे में भी जान सकते हैं। कुण्डलिनी के बारे में मैंने कम से कम हिन्दी भाषा में ३-४ हजार तो भी लेक्चर्स दिये होंगे। और ये ज्ञान बहुत कगार और विशाल और गहन है। इसको एक दिन में सारा समझाना तो बहुत कठिन है। कल आप लोगों ने बड़े अच्छे प्रश्न पूछे। इसके मैंने अधिकतर उत्तर दिये हैं। और मैं चाहूँगी कि फिर से आप आज कुछ सवाल पूछें और उसके मैं उत्तर दें, वही अच्छा रहेगा बजाय इसके कि कुण्डलिनी के बारे में मैं और विस्तारपूर्वक आपको बताती रहं । ये कुण्डलिनी जो है ये हमारी शुद्ध इच्छा है। बाकी जितनी भी हमारे अन्दर इच्छायें हैं वो शुद्ध नहीं। क्योंकि अगर शुद्ध मोटर होनी चाहिए । मोटर होनी चाहिए तो अगली होती तो आज लगा कि आज हमारे पास घर होना चाहिए। घर आया, तो बार और कुछ होना चाहिए। माने कि आप जानते हैं कि इकोनोमिक्स में कहा जाता है कि, ‘इन जनरल वाँटस आर नॉट सॅटिसफिबल।’ माने पूर्णतया कौन सी भी इच्छा होती है उससे मनुष्य को समाधान नहीं प्राप्त होता। इसका मतलब है कोई ऐसी भी इच्छा हो सकती है कि जिससे मनुष्य समाधान प्राप्त करें। और वही ये कुण्डलिनी शक्ति है। जो कि हमारे अन्दर पूर्णतया एक शुद्ध इच्छा और जब ये शुद्ध इच्छा हमारे अन्दर जागृत हो जाती है तब हम सारी इच्छाओं को एक साक्षी स्वरूप में बदलते हैं। सहजयोग से अनेक लाभ हैं । शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और सबसे बड़ी चीज़ ये आध्यात्मिक। बड़ी उन्नति हो जाती है। और सबसे बड़ा लाभ मैं कहूँ कि ये है कि आप आनन्द के सागर में रहते हैं। और सब चीज़ की ओर एक बहुत ही साक्षी स्वरूप से आप देखने लग जाते हैं। जैसे कि ये सब पानी में है। एक विचार आता है, चला जाता है। दूसरा विचार आता है और चला जाता है। आप उसी के उपर नाच रहे हैं। इन दोनों के बीच में एक जगह है जिसे विलम्ब कहते हैं। कुण्डलिनी उस जगह को बढ़ा देती है। और इन विचारों को इस तरह से छोटा कर देती है। फिर आप चाहे निर्विचारिता में उतर जाते हैं। माने क्या है कि आप उस पानी से डर रहे हैं और उसके लहरों से आप डर रहे हैं। उस पानी से उठ कर के आप नांव में बैठ गये। नांव में बैठ कर के आप देख सकते हैं कि ये क्या हो रहा है? नांव में बैठ कर के आप समझ सकते हैं कि ये क्या हो रहा है? जब आप देख रहे हैं तब आपको तकलीफ नहीं होती। पर समझ लीजिए कि आप तैराक हो, आपने तैरना सीख लिया तो आप पानी में कूद सकते हैं और जो लोग डूब रहे हैं उन्हें भी बचा सकते हैं । या इस तरह से आज कल के आधुनिक मोटर के आप लोगों को उदाहरण देती हूँ। जैसे कि मोटर। इस मोटर में दो चीजें होती हैं, एक तो ब्रेक होता है, एक एक्सिलेटर। इसी प्रकार हमारा लेफ्ट साइड ‘ब्रेक’ है और राइट साइड एक्सिलेटर। पहले जब हम मोटर सीखते हैं तो हम उसको बैलन्स करते हैं कि लेफ्ट और राइट दोनों किस तरह से सम्भालें माने एक्सिलेटर और ब्रेक को हम किस तरह से सम्भालें, समझें इस तरह से। एक चीज़ अगर छोड़ दीजिए, अगर ब्रेक लगा दीजिए तो गाड़ी चलेगी नहीं और अगर एक्सिलेटर चढ़ा दीजिए तो गाड़ी जा के पता नहीं कहाँ लगेगी। तो दोनों का इस्तमाल जब आ जाता है तब लोग कहते है कि, ‘हाँ, तुम्हें ड्राइविंग आ गयी है।’ लेकिन ड्राइविंग आने पर फिर आप निष्णात हो जाते हैं। आप होशियार हो जाते हैं। और फिर आप आटोमैटिकली चलाते हैं। आपका हाथ बराबर चलता है। आपको ये नहीं हर बार

कहना पड़ता कि, ‘हाँ ब्रैक लगाओ, अब ये करो । ‘ अपने आप हो जाता है। पर उसके बाद भी जो, उसका मालिक, मोटर का जो मालिक है वो पीछे बैठता है। वो आपको बता रहा है कि ऐसे चलाओ, वैसे चलाओ। उसके बाद आप ही मालिक हो जाते हैं। आप जब मालिक हो गये तो आप अपने अन्दर का ड्राइवर, अपने अन्दर का ब्रैक और अपने अन्दर का एक्सिलेटर तीनों को चालना करते हैं पूरी तरह से और आप अपने मास्टर हो जाते हैं। और इसी कारण जिस वक्त आपकी लेफ्ट साइड ढ़िली हो जाती है तो आपमें जो कुछ भी ऐसी आदतें हैं जिससे आप छुट्टी करना चाहते हैं एकदम छोड़ कर भाग जाती है क्योंकि आप समर्थ हो गये। सम+अर्थ हो जाते हैं। आपका जो अर्थ है वो पूरा हो जाता है। और उस समर्थता में आप इस तरह से बहादूर हो जाते हैं कि कुछ कहे बगैर ही वो सब चीजें चली जाती हैं। दूसरी चीज़ ये है कि जब आपका लेफ्ट साइड ठीक हो जाती है तब आपको सही तरीके से अपने इमोशनल बैलन्स करना पड़ता है। आप समझ लेते हैं कि आप कहाँ बहक रहे हैं, कहीं आप ज़्यादा चले जा रहे हैं कि कम आ रहे हैं। तो इस के पूरी कारण ही मनुष्य जो है वो एक ऐसी दशा में आ जाता है कि उसके चक्र, जो मैंने आपको अभी दिखाये थे, संतुलन तरह से खुलना शुरु हो जाते हैं । ये प्रणाली धीरे -धीरे से चैतन्य का काम करती है, किसी – किसी में बड़ी ही जोरों में बहुत ही जल्द हो जाती। किसी-किसी में तो इतने जोरों में चलती है कि कुछ लोग हैं, मैं देखती हूँ कि दो-दो साल तक सहजयोग करते हैं उनको इतना लाभ नहीं होता। और कोई है कि कल आये और आज बैठ गये। इस तरह के भी लोग हैं। तो ये उनकी क्वालिटी कहना चाहिए या कहिए अन्तरिक इच्छा। ये इच्छा, उसको प्राप्त करने की शुद्ध इच्छा, बहुत जबरदस्त है । जिसकी शुद्ध इच्छा बहुत जबरदस्त है वो कार्य बहुत जल्दी करता है। इसमें उम्र आपकी कोई भी हो आपकी कोई भी जाति हो, आपका कोई सा भी धर्म हो , आपके रंग कोई सा भी हो, आप किसी भी देश के हो इससे कोई भी मतलब नहीं है। हर आदमी में कुण्डलिनी है लेकिन उसकी जागृति और उसकी गतिविधियाँ ये उस आदमी की क्वालिटीज पर, उसके अपने एक कहना चाहिए कि मनुष्यत्व पर निर्भर है। उसके मनुष्यत्व पे निर्भर है माने उसकी तंदरुस्ती कैसी है ? उसकी मानसिक स्थिति कैसी है ? उसकी आध्यात्मिक स्थिति कैसी है ? ये सब चीज़ें ध्यान में लेते हुए ये कुण्डलिनी का जागरण होता है। और सबसे तो बड़ी चीज़ है कि जब आपमें आ जाती है तो कम से कम दस साल तो आपकी उमर बैठ ही जाए। मुँह पर शान्ति आ जाएगी, चमक आ जाएगी। और स्वभाव में एक तरह की दया, प्रेम और अन्दर से बड़ा आनन्द स्थापित होगा। अपने जो सद्गुण हैं उसको आनन्द से उपभोगता है। पहले तो अगर कोई इमानदार आदमी होगा तो वो कहेगा कि, ‘देखो, बेवकुफ हूँ। मैं इमानदार हूँ। इसलिए मैं Suffer कर रहा हूँ।’ फिर वो कहता है कि, ‘नहीं, मैं इमानदार हूँ इसकी वजह से में खुश हूँ। और सब लोग हो जाए तो बड़ा अच्छा है।’ इससे एकदम जो जीवन चक्र, उसकी जो दृष्टि है, उसका जो एटिट्यूड है वो एकदम बदल जाता है और उसकी जो प्रायोरिटीज हैं, उसके जो मूल्यांकन हैं वो बदल जाते हैं। और वो एक विशेष तरह का आदमी हो जाता है। सबसे इस में सबसी बड़ी लाभदायक बात ये है कि आपका सम्बन्ध उस परम चैतन्य से हो जाता है। और वो आपकी सारी गतिविधियों को सम्भालता है और आपको पूरी तरह से आशीर्वादित करता है। और इसके अनुभव तुरन्त आना शुरू हो जाते हैं। आप स्वयं आश्चर्यचकित होंगे कि किस तरह से हर एक चीज़ अपने आप घटित हो जाती है। किस तरह से हर एक चीज़ बनती जाती हैं। और आपको लगता है कि ‘मैं, मुझे’ ये कैसे हो गया? इसलिए कि आप आत्मसाक्षात्कारी हैं। इसलिए कि परमात्मा ने आपको अपने साम्राज्य में विराजित किया है । वो साम्राज्य ऐसा है कि मोस्ट एफिशियन्ट अपने ये गवर्नन्मेंट ऑरगनाइझेशन हैं, ऐसे नहीं, मोस्ट एफिशियन्ट। इतना ही नहीं वो गतिविधियों को देखता है और आपको इतने प्यार से रखता है, आपको इतना सम्भालता है कि आप आश्चर्यचकित हो बहुत प्रेममय है और आपकी हर एक जाते हैं कि इतना मेरा गौरव और इतनी मेरी शक्ति कहाँ से आ गयी! ये सब आपके अन्दर विहित है। आपके अन्दर है।

इसको आपको प्राप्त करना चाहिए, यही मैं आपसे कहना चाहती हैँ और उसके लिए कुछ मेरा, आपका लेना-देना नहीं है। आपकी अपनी शक्ति है एक दीप जला हुआ दूसरे दीप को जला दे उसमें कौनसा उपकार है। फिर उस दीप को चाहे कि वो भी दूसरे दीप को जला दें। यही उनका कार्य है और इसी से उसको भी एक तरह का बड़ा भारी आशीर्वाद है। इस तरह से आज हैद्राबाद में मेरा आखरी दिन है। और मैं चाहती हूँ कि आप लोग इतने बड़े तादाद में यहाँ आयें हैं और आप उसी तादाद में फिर से हमारे सेंटर पे आइये। हमारे सेंटर बहुत सीधे, सरल है क्योंकि हम पैसा-वैसा लेते नहीं किसी से और सादगी से रहते हैं। उसकी कोई जरूरत नहीं कि कोई बड़ी इमारत में ही स्थित हों, वहाँ आ कर के परम चीज़ को आप प्राप्त करें। और इससे अपने जीवन को और सबके जीवन को खुशहाल कें । ये हुए बगैर संसार बदल नहीं सकता। संसार के लोग उपर से बहुत अच्छे बनते हैं और अन्दर से उनके अन्दर बहुत विरोधी बाते हैं, बहुत ज़्यादा स्वार्थ, और यही नहीं समझ पाते कि हम सब एक ही परमात्मा के बनाये हुए हैं और हम सारे इस परमात्मा के अंग-प्रत्यंग हैं। अगर ये घटित हो जाता है तो उसका साक्षात ही हो जाता है कि दूसरा कोई है ही नहीं। और सारी चीज़ जो है एकदम बदल जाती है। हमें अपने बच्चों के बारे में भी सोचना चाहिए। और हमें सारे दुनिया के बारे में सोचना चाहिए । और ये हमारे भारतवर्ष का एक बड़ा भारी धरोहर है। हेरिटेज है हमारा। और इसीसे सारी दुनिया को हम प्लावित कर सकते हैं। तो हमारे उपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि हम इसे प्राप्त करें। जिन्होंने गणपती का ‘ग ‘ भी नहीं सुना, जिन्होंने इसा मसीह को नहीं समझा, जिन्होंने मोहम्मद साहब को नहीं समझा ऐसे लोग आज कहाँ से कहाँ पहुँच गये। जब आप लोग इतने ज़्यादा इस चीज़ को जानते हैं, आपको क्या कहें, और आप विशेष लोग हैं कि इस योगभूमि में पैदा हुए हैं और इस योग को आप प्राप्त कर सकते हैं । हजारों वर्षों से संत-साधूओं ने योग का महत्व सीखाया है कि इस योग को प्राप्त करों। योग का मतलब सर के बल खड़ा होना नहीं।