Birthday Puja, Sahaja Yoga me pragati ki Teen Yuktiyaan

New Delhi (भारत)

1990-03-30 Birthday Puja Talk Hindi 42min and Music Delhi, 62' Download subtitles: CS,ENView subtitles:
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Janm Diwas Puja Date 30th March 1990 : Place Delhi : Type Puja Speech Language Hindi

आज नवरात्रि की चतुर्थी है और नवरात्रि को आप जानते हैं रात्रि को पूजा होनी चाहिए। अन्ध:कार को दूर करने के लिए अत्यावश्यक है कि प्रकाश को हम रात्रि ही में ले आएं। आज के दिन का एक और संयोग है कि आप लोग हमारा जन्मदिन मना रहे हैं। आज के दिन गौरी जी ने अपने विवाह के उपरान्त श्री गणेश की स्थापना की। श्री गणेश पवित्रता का स्रोत हैं। सबसे पहले इस संसार में पवित्रता फैलाई गई जिससे कि जो भी प्राणी, जो भी मनुष्यमात्र इस संसार में आए वो पावित्र्य से सुरक्षित रहें और अपवित्र चीज़ों से दूर रहें। इसलिए सारी सृष्टि को गौरी जी ने पवित्रता से नहला दिया। और उसके बाद ही सारी सृष्टि की रचना हुई। तो जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य हमारे लिए यह है कि हम अपने अन्दर पावित्र्य को सबसे ऊंची चीज़ समझें| लेकिन पावित्र्य का मतलब यह नहीं कि हम नहाएँ, धोएं, सफाई करें, अपने शरीर को ठीक करें किन्तु अपने हृदय को स्वच्छ करना चाहिए। हृदय का सबसे बड़ा विकार है क्रोध। क्रोध सबसे बड़ा विकार है, और जब मनुष्यमें क्रोध आ जाता है तो जो पावित्र्य है वो नष्ट हो जाता है क्योंकि पावित्र्य का दूसरा ही नाम निर्वाज्य प्रेम है। वो प्रेम जो सतत बहता है और कुछ भी नहीं चाहता। उसकी तृप्ति उसी में है कि वो बह रहा है और जब नहीं बह पाता तो वह कोंदता है, परेशान होता है। सो पावित्र्य का मतलब यह है कि आप अपने हृदय में प्रेम को भरें, क्रोध को नहीं। क्रोध हमारा तो शत्रु है ही लेकिन वो सारे संसार का शत्रु है। दुनिया में जितने जितने युद्ध हुए, जो जो हानियाँ हुई हैं ये सामूहिक क्रोध के कारण हुई हैं। क्रोध के लिए बहाने बहुत होते हैं। मैं इसलिए नाराज हो गया क्योंकि ऐसा था, मैं उस लिए नाराज हो गया क्योंकि वैसा था। हर क्रोध का कोई न कोई बहाना मनुष्य ढूंढ सकता है लेकिन युद्ध जैसी भयंकर चीज़ें भी इसी क्रोध से ही आती हैं। उसके मूल में क्रोध ही होता है। अगर हृदय में प्रेम हो तो क्रोध नहीं आ सकता और अगर क्रोध का दिखावा भी होगा तो वो भी प्रेम के ही लिए। किसी दुष्ट राक्षस को जब संहार किया जाता है तो वो भी उस पर प्रेम करने से ही होता है क्योंकि वो इसी योग्य है कि उसका संहार हो जाए जिससे वो और पाप कर्म न करे। लेकिन ये कार्य मनुष्य के लिए नहीं। ये तो देवी का कार्य है जो इन्होंने इन नवरात्रियों में किया है। तो, हृदय को विशाल करके हृदय में ये सोचें कि हम किससे ऐसा प्रेम करते हैं जो निर्वाज्य, निर्मम है, जिसके प्रति हमें ये नहीं कि ‘ये मेरा बेटा है, ये मेरी बहन है, मेरा घर है, मेरी चीज है। ऐसा प्रेम हम किससे करते हैं? किसके प्रति हमें ऐसा प्रेम है। मनुष्य की जो स्थिति है उससे आप ऊँचे स्थिति में आप आ गये हैं क्योंकि आप सहजयोगी हैं। आपका योग परमेश्वर की इस प्रेमकी सूक्ष्म शक्ति से हो गया है। वो शक्ति आपके अन्दर अविरल बह रही है। आपको प्लावित कर रही है, आपको सम्भाल रही है, आपको उठा रही है। बार-बार आपको प्रेरित करती है, आपका संरक्षण करती है और आपको अल्ल्हाद और मधुमय प्रेम से भर देती है। ऐसी सुन्दर शक्ति से आपका योग हो गया किन्तु अभी भी हमारे हृदय में उसके लिए कितना स्थान है ? ये देखना होगा । हमारे हृदय में माँ के प्रति तो प्रेम है ये तो बात सही है। माँ से तो सबको प्यार है और उस प्यार के कारण आप लोग आडुलित हैं, बहुत आनन्द में हैं। किन्तु और भी दो प्रकार का प्रेम होना चाहिए। तभी माँ का पूरा प्यार हो सकता है। एक तो प्यार अपने से हो कि हम सहजयोगी हैं, हमने सहज में शक्ति प्राप्त की लेकिन अब हमें किस तरह से बढ़ना चाहिए। बहुत से लोग सहजयोग के प्रसार के लिए बहोत कार्य करते हैं जिसे हम कहें कि हॉरिजॉन्टल मूव्हमेंट horizontal movement (क्षितिजीय प्रसार) पृथ्वी से समान्तर, चारों तरफ फैलता हुआ। वो लोग अपनी और नजर नहीं करते तो वो जो व्हर्टिकल मूव्हमेंट vertical movement( उर्ध्वाधर गती) हैं उत्थान की गति को नहीं प्राप्त होते। बाह्य में वो बहुत कुछ कर सकते हैं। बाह्य में दौड़ेंगे, बाह्य में काम करेंगे, कार्यान्वित होंगे। सबसे मिलेंगे-जुलेंगे। लेकिन अन्दर की शक्ति को नहीं बढ़ाते। बहुत से लोग हैं अन्दर की शक्ति की तरफ ज़्यादा ध्यान देते हैं और बाह्य की शक्ति की तरफ नहीं। तो उनमें सन्तुलन नहीं आ पाता और जब लोग सिर्फ बाह्य की तरफ बढ़ने लग जाते हैं तो उनकी अन्दर की शक्ति क्षीण होने लग जाती है, और क्षीण होते-होते ऐसे कगार पे पहुँच जाते हैं कि फौरन अहंकार में ही डूबने लगते हैं। वो सोचते हैं कि हमने देखिये कितना सहजयोग का कार्य किया। हम सहजयोग के लिए कितनी मेहनत करते हैं और फिर ऐसे लोगों का एक नया जीवन शुरू हो जाता है जो कि सहजयोग के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं। वो अपने को सोचने लगते हैं कि हम बड़े भारी एक अगुआ हैं और हमारा बहुत महत्व होना चाहिए। जैसे कि जिसे सेल्फ इम्पोर्टेन्स self importance (आत्म -महत्व) कहा जाता हैं। सो हर जगह देखते हैं कि हमारा महत्व होना चाहिए, हर चीज़ में वो कोशिश करेंगे कि अपना महत्व दिखाएं, अपनी विशेषता दिखाएं, अपने को सामने करें लेकिन अन्दर से hellowness खोखलापन आता जाता है। उसके बाद हठाक देखते हैं | कि उनको कोई बीमारी हो गयी, पगला गये वो। कुछ बड़ी भारी आफत आ गयी, तो फिर कहते हैं कि, माँ हमने आपको तो पूरी तरहसे समर्पित किया हुआ या, फिर ये कैसे हो गया ? ये हमने कैसे पाया ? ये गड़बड़ कैसे हो गयी ? इसकी जिम्मेदारी आप ही के ऊपर है कि आप बहकते चले गये। फिर ऐसे आदमी एकतरफा हो जाते हैं। वो दूसरों से सम्बन्ध नहीं कर पाते। उनका सम्बन्ध इतना ही होता है कि हम किस तरह से रौब झाड़ें लोगों पर और किस तरह से दिखाएं कि हम कितने ऊँचे इन्सान हैं। और वो दिखाने में ही उनको महत्व लगता है| सबसे आगे उनको आना चाहिए, सबमें उनका महत्व होना चाहिए, अगर किसीने उनका थोडासा महत्व नहीं किया तो तो गलती हो गयी। यहाँ तक हो जाएगा कि उसमें ये भूल ही जाएंगे वो कि माँ का भी कुछ करने का है। माँ के लिए भी कुछ दान देना है। इसी प्रकार मैं देखती हूँ कि राहुरी जैसी जगह, बम्बई में हर जगह इस तरह के कुछ लोग एकदम से उभर के ऊपर आते है और वो अपने को बहुत महत्वपूर्ण समझने लगे। फिर वहाँ न तो आरती होती थी और नसीब हमारा फोटो तो वहाँ रहता था लेकिन फोटो पोछने की भी किसी को इच्छा नहीं थी। नसीब अपने फोटो नहीं लगाए। अपना ही महत्व, अपनी ही को डींग मारना और वो डींग मार-मार के अपने ही को बहुत ऊँचा समझ के लगे दूसरों से अलग |किसी से कुछ पूछना नहीं। कुछ नहीं हम ही करेंगे। फिर झगड़े शुरू हो गये। झगड़े शुरू होने पर ग्रुप बन गये। क्योंकि जिस सूत्र bondage में आप बंधे हैं वो आपके माँ का सूत्र है और उसी सूत्र में अगर आप बंधे रहे और पूरे समय ये जानते रहे कि हम एक ही माँ के बच्चे हैं, न हममें कोई ऊँचा है न कोई नीचा, न ही हम कोई कार्य को करते हैं। और ये चैतन्य ही सारा कार्य करता है, हम कुछ करते ही नहीं है। ये भावना ही जब छूट गयी और ये कि हम इतने बड़े हैं हम ने ये किया, हम ये करेंगे, हम वो करेंगे, तब फिर चैतन्य कहता है कि अच्छा तुझे जो कुछ करना है वो कर, जहाँ जाना है जा। जाना है तुझे नर्क में तो नर्क में जाओ। तुझे अपने को

मिटा लेना है मिटा ले। अपना सर्वनाश करना है, वो भी कर ले । जो तुझे करना है तू कर। वो आपको रोकेगा नहीं क्योंकि आपकी स्वतन्त्रता वो मानता है। आप स्वर्ग में जाना चाहे तो उसकी भी व्यवस्था है और नर्क में जाना चाहें तो उसकी भी व्यवस्था है। पर सहजयोग में एक और बड़ा दोष है। एक बहुत बड़ा दोष है कि हम एक सामूहिक, विराट शक्ति हैं। हम अकेले अकेले नहीं है। सब एक ही शरीर के अंग – प्रत्यंग हैं। उसमें अगर एक इन्सान ऐसा हो जाए या दो-चार ऐसे हो जाएं जो अपना-अपना ग्रुप (समूह) बना लें तो जैसे कैन्सर की मालिग्नसि होती है की एक ही सेल cell बढ़ने लग जाता है ऐसे ही एक आदमी बढ़ कर के और सारे सहजयोग को ग्रस्त कर सकता है। और हमारी सारी मेहनत व्यर्थ जा सकती है। हमको तो चाहिए कि समुद्र से सीखें कि जो सबसे नीचे रहकर के ही सब चीज़ को अपने अंदर, सब नदियों को अपने अन्दर समाता है और बगैर समुद्र के तो ये सृष्टि चल नहीं सकती। और अपने को तपा कर के भाप बना कर के सारी दुनिया में बरसात की सौगात भेजता है। उसकी जो नम्रता है, वही उसकी गहराई का लक्षण है और उस नम्रता में कोई ऊपरी नम्रता नहीं कि नमस्ते भाईसाहब! नमस्ते कुछ नहीं | सबसे नीचे, सबको ग्रहण ? सबको अपने अन्दर लेकर, सबको शुद्ध करके और फिर भाप बना कर बरसात करना। और फिर वही बरसात नदियों में पड़कर दौड़ती हुई उसी समुद्र की ओर दौड़ेगी और इस समुद्र की पहचान, अगर आप किसी समुद्र के किनारे पे गए तो देखिए कि वहाँ जितने भी नारियल के पेड़ हैं वो सब समुद्र के ही और झुके हुए हैं। इतनी जोर की हवा चलती है, कुछ भी हो जाए लेकिन वो कभी भी समुद्र से दूसरी ओर मुड़ते नहीं क्योंकि वो जानते हैं कि ये समुद्र है। इस समुद्र के समान ही अपना हृदय विशाल तब होगा जब हमारे अन्दर अत्यन्त नम्रता और प्रेम आ जाएगा। लेकिन अपना ही महत्व करना, अपने ही को विशेष समझना, ये जो चीज़ है इसमें सबसे बड़ी खराबी यह है कि परम चैतन्य आपको काट देगा जाओ। तुमको तुम्हारा महत्व है, तुम जाओ। हट जाओ और फिर जैसे की कोई नाखून काट कर फैंक देता है इस तरह से आप एक तरफ फेके जाएंगे । जो मेरे लिए तो बड़ी दु:खदायी बात होती है । और ऐसे दो-चार लोग जो निकल आए जो सोचते है कि हम बहुत काम करते हैं, हमने ये कार्य किया हमने वो कार्य किया, उनको फौरन ठण्डा हो जाना चाहिए। पीछे हटकर देखना चाहिए कि क्या हम ध्यान करते हैं? हमारा ध्यान लगता है? हम कितने गहरे हैं? और फिर हम किसको प्यार करते हैं? किस – किस को प्यार करते हैं ? कितनों को प्यार करते हैं? और कितनों से दुश्मनी लेते हैं। सहजयोग में कुछ लोग बड़े गहरे बैठ गये हैं, बहुत गहरे आ गये हैं इसमें कोई शंका नहीं। और बहुत से अभी भी किनारे पर ड़ोल रहे हैं। और कब वो फेकें जाएंगे कह नहीं सकते । क्योंकि मैंने आपसे पहले ही बताया है कि १९९० साल के बाद एक नया आयाम खुलने वाला है। और एक छलांग आपको मारनी होगी जो आप इस महौल से उतर करके और उस नयी चीज़ को पकड़ लेंगे। जैसे कि चक्का है जब घूमता है तो एक बिन्दु पर आकर फिर आगे सरक जाता है इसी प्रकार सहजयोग की प्रगति भी सामूहिक होने वाली है और इसमें टिकने के लिए पहली चीज़़ हमारे अन्दर पावित्र्य होना चाहिए जो नम्रता से भरा हो । वैसे तो दुनिया में लोग आपने देखे हैं जो अपने को बड़ा पवित्र समझते हैं। और सुबह-शाम सन्ध्या करते हैं और किसी को छूने नहीं देते । और ये खाना नहीं खाएंगे, वो आयेगा तो कहेंगे कि, ‘तुम दूर बैठो,’ उनको छू लिया तो उनकी हालत खराब । ये पागलपन है अगर आप एकदम स्वच्छ हैं, एकदम आप पवित्र हैं तो आपको किसी को भी छूने में, किसी से भी बात करने में, कभी अपवित्रता आ नहीं सकती क्योंकि आप हर चीज को ही शुद्ध करते हैं| आपका स्वभाव ही शुद्ध करने का है। तो आप जिससे मिलेंगे उसी को आप शुद्ध करते जाएंगे। उसमें डरने की कौनसी बात है? उसमें किसी को कंडेम condemn (निंदा ) की कौन सी बात है? उसके लिए कानाफूंसी करने की कौन सी बात है? तो ये तो लक्षण एक ही है कि आपकी स्वयं पवित्रता कम है। अगर आपकी पवित्रता सम्पूर्ण है तो उस पवित्रता में शक्ति और तेज है और वो इतना शक्तिशाली है कि कोई सी भी अपवित्रता को वो खींच सकता है। जैसे मैंने कहा कि हर तरह की चीज़ समुद्र में पूरी तरह से एकाकार हो जाती है। अब दूसरे लोग है जो सिर्फ अपनी ही प्रगति की सोचते हैं। वो ये सोचते हैं कि हमें दूसरे से क्या मतलब ? हम अपने कमरे में बैठ कर माँ की पूजा करते हैं, उनकी आरती करते हैं। उनको हम मानते है और हम चाहते है की हमारी उन्नति हो जाए ।हमें दुनिया से कोई मतलब नहीं और दूसरोंसे कटे रहते है। ऐसे लोग भी बढ़ नहीं सकते क्योंकि आप शरीर के एक अंग-प्रत्यंग हैं। समझ लीजिए एक अंगुली ने अपने को बाँध लिया और कहेगी कि नहीं मुझे और किसी से कोई मतलब नहीं। मैं अलग से रहूँगी । ये तो अंगुली मर जाएगी। क्योंकि इसमें रक्त कहाँ से आएगा? इसमें नस कैसे चलेगी? इसमें चेतना का संचार कैसे होगा? ये तो कटी हुई रहेगी। ये तो छूटी हुई रहेगी ।आप एक बार ऊँगली को बाँध के देखिए और पाँच दिन बाँधे रखिये। उसके बाद आप देखेंगे की कि अंगुली काम ही नहीं करेगी। किसी काम की नहीं रह जाएगी। फिर आप कहेंगे कि, ‘माँ, मैं तो इतनी पूजा करता हूँ मैं तो इतने मन्त्र बोलता हूँ, मैं तो इतना कार्य करता हूँ, फिर मेरा हाल ऐसा क्यों है।‘ क्योंकि आप विकलित हैं। आप हट गए हैं, उस सामूहिक शक्ति से आप हट गए हैं। सहजयोग सामूहिक शक्ति है। इस सामूहिकता से जहाँ आप हट गए वहीं पर आप अलग हो गए उस सामूहिक शक्ति से। तो दोनों ही चीज़ की तरफ ध्यान देना है कि हम अपनी शक्ति को भी सम्भालें और सामूहिकता में रचते जाएं। तभी आपके अन्दर पूरा सन्तुलन आ जाएगा। लेकिन बाह्य में आप बहुत कार्य करते हैं। मैंने ऐसे लोग देखे हैं जिन्होंने सहजयोग के लिए बहोत कार्य करते हैं और काफी अच्छे भाषण देते थे बोलते थे । उनके भाषणों की उन्होंने फिर टेप बना ली। फिर लोगों से कहने लगे कि अच्छा अब आप हमारे टेप सुनो। तो लोग हमारे टेप छोड़कर उन्हीं की टेप सुनते थे। और उनका यह हाल था कि जैसे आज के दिन हम यहाँ बैठे हैं, हमारे फोटों को तो नमस्कार करते थे , हमें नहीं करेंगे क्योंकि उनको फोटो की आदत पड़ी हुई है। हमसे उनको कोई मतलब नहीं। उनको फोटो से मतलब है। ऐसे-ऐसे विक्षिप्त लोग हमने देखे हैं। फिर उन्होंने अपने फोटो छपवाए और फोटो सबको दिखा रहे हैं कि हम ऐसे है, हम वैसे हैं। इस तरह से अनेक तरीकों से वो अपना ही महत्व बढ़ाते रहे। करते -करते ऐसे गड्डे में गिर गए। अनायास| उनके समझ में नहीं आया और एकदम पता हुआ कि छुट गये सहजयोग से । कहीं भी नहीं है। लोग मुझे कहते हैं कि माँ वो तो बड़े लीडर थे, वो तो इतने ये थे। हाँ, थे तो सही लेकिन वो गये कहाँ ? गफा ? क्या करें! एकदम काफूर हो गए। कहाँ? पता ही नहीं। तो ऐसे लोग क्यों निकल गए ? क्योंकि सन्तुलन नहीं और जब सन्तुलन नहीं रहता है तो आदमी या तो लेफ्ट में चला जाएगा या राईट में चला जाएगा। और जैसा मैंने बहोत बार कहा कि दो तरह की शक्तियाँ हमारे अन्दर हैं जिससे की हम सहजयोग की ओर खिंचते भी हैं और दूसरी शक्ति जिसे हम बहार फैंके जाते हैं। जैसे एक रस्सी में अगर आप पत्थर बाँध कर घुमायें तो पत्थर घूमता रहेगा, जब तक रस्सी से बंधा है। और जैसे ही रस्सी से छूट जाएगा, एकदम काटकोंन में त्यांजंट tangent( स्पर्शरेखा )में फैंका जाएगा। इसी प्रकार बहुत से लोग सहजयोग से निकल गए। तब फिर लोग कहते हैं ‘देखिये माँ, सहजयोग में बहुत से लोग कम हो गए हैं।’ मैं क्या करू? और अगर कम हो गये हैं तो उसमें सहजयोग का नुकसान तो हुआ नहीं । इसमें उनका ही नुकसान हुआ है । सहजयेग का बिल्कुल भी नुकसान नहीं हुआ है । क्योंकि जिसको नुकसान और फायदे से कोई मतलब ही नहीं है, ऐसी जो चीज़ है उसका क्या नुकसान हो सकता है? हाँ अगर आपको अपना फायदा करा लेना है तो आप इस चीज़ को जान लीजिए की सहजयोग को आपकी जरूरत नहीं है, आपको सहजयोग की जरूरत है। सो ये ‘योग’ का दूसरा अर्थ होता है युक्ति। एक तो है कि सम्बन्ध जुड़ जाना, दूसरा है युक्ति। ये युक्ति समझ लेनी चाहिए। की ये युक्ति क्या है? इसमें तीन तरह से समझाया जा सकता है। पहली तो युक्ति ये है कि हमें इसका ज्ञान आ जाना चाहिए। ज्ञान का मतलब बुद्धि से नहीं। किन्तु हमारे अंगुलियों में, हाथ में, और अन्दर से कुण्डलिनी का पूर्ण तरह जागरण होना ,ये ज्ञान है ,और जब ये ज्ञान हो जाता है तब और भी ज्ञान होने लग जाता है। बहुत सी बातें जो आप नहीं समझ पाते थे वह आप समझ पा सकते हैं। और आप समझने लग जाते हैं कि कौन सत्य है कौन असत्य है। और इस ज्ञान के द्वारा आप लोगों की कुण्डलिनी भी जागृत कर सकते हैं और उनको समझा सकते हैं। और उनसे आप पूरी तरह से एकाग्र हो सकते हैं। उनके साथ आप वार्तालाप कर सकते हैं, बातचीत कर सकते है, इस ज्ञान के कारण। तो आपको बौद्धिक ज्ञान भी इससे आ जाता है। आप सहजयोग समझते हैं। नहीं तो कोई समझता था पहले? ‘ईड़ा, पिंगला, सुखमन नाड़ी रे, एक ही डोर उड़ाऊंगा रे’
इस तरह की बात तो करता था कबीर , तो कोई समझता था उसको ? नानक की कोई बात समझता था? या ज्ञानेश्वरजी की कोई किसी ने बात समझी नहीं| लाओत्से की किसी ने बात समझी नहीं ।कोई बड़ी मिस्टेरियस चीज़ है ,कोई बड़ी गोपनीय बात कह रहे हैं ऐसे समझ कर के लोग रखते थे। लेकिन सहजयोग के बाद आप सब समझने लगे। तो आपका बुद्धि चातुर्य भी बढ़ गया। उसकी भी चतुरता आ गयी। आप उसको समझने लगे। ये तो बात ठीक है कि आप उसे समझने लग गये। और ऐसी बातें जो अगम्य थी वो भी गम्य हो गईं और सब बात आपने जान लिया। सो तो एक युक्ति हो गयी कि आपने अपना ज्ञान बढ़ा लिया। अब दूसरी युक्ति क्या है? वो है कि जो आप हमारे प्रति भक्ति करें। उस भक्ति को भी जब आप करते हैं तब आपको अनन्य भक्ति करनी चाहिए। माने आप हमसे तदाकारिता प्राप्त करें। जैसे हम सोचते हैं ऐसा ही आप सोचने लग जायें। आज देर हो गयी समझ लीजिए तो हम कह सकते थे कि भाई हम भी थक गये। रातभर से जग गये। अब हमारे बस का कुछ नहीं । लेकिन हमने ये सोचा कि नवरात्रि है, तो रात में ही करना है और यही मुहूरत हमको मिलना था, यही ये मूहूर्त है, इसी वक्त ये पूजा होनी चाहिए। और ये होना ही चाहिए, होना ही है और बड़े आनन्द से हम कर रहे हैं। क्योंकि शुभमूहर्त यही है। और उसवक़्त हमें सज्ज होना चाहिए। उसके बारे में सोचते भी नहीं की हम थक गये, आराम भी नहीं किया, कुछ भी नहीं । यही मूहर्त है। जैसे एक लढय्या अगर रणांगण में गया है और उसने देखा किउसके सामने दुश्मन खड़ा है, यही समय उसको मारने का है, उसी वक्त उसे मारना चाहिए। उसी प्रकार यही समय है जबकि हमे ये पूजा करनी चाहिए। तो हम बैठे हैं और आपको भी यही सोचना चाहिए कि यही समय माँ ने बाँधा है । यही समय हमारे लिए उचित है, इसीलिए हमें इसी वक्त पूजा करनी चाहिए । लेकिन जो आधेअधूरे लोग हैं वो उलटी बात सोचेंगे, ‘अब हम सबेरे से आकर बैठे हैं, हमने ये किया, अभी हमें भूख लग गयी, खाना नहीं खाया, बच्चे सो रहे होंगे’तो वो अनन्य भक्ति नहीं हुई क्योंकि मेरा जो सोच-विचार है वो आपके सोच- विचार में नहीं आया। मैं जैसे सोचती हूँ वैसा वो नहीं सोचते। किसी के लिए………. वो आपके सोच विचार में नहीं आया | (inaudiable) कभी-कभी ‘माँ ये आदमी इतना खराब है। ऐसा है’मैं कहती हूँ कि, ‘नहीं, बिल्कुल अच्छा है, बढ़िया आदमी है।’ ऐसे कैसे आप कह रहे हो ? कैसे कहा आपने ? फिर मैं सोचती हूँ कि मैं जो देख रही हूँ ये क्यों नहीं देख रहे ? अगर ये मेरी ही ऑंख से देख रहे है तो इन्हें वो ही देखना चाहिए, जो मैं देखती हूँ। वैसी तो बात नहीं, ये तो कुछ और ही देख रहे हैं। तो अनन्य नहीं हुए, अन्य हो गये। दूसरे हो गए ­| उसी प्रकार जैसे हमारा प्यार आपके प्रति है। और एक ही चीज़ से हम तृप्त होते हैं कि आप सबके प्रति वैसा ही प्यार रखें। अगर वो बात आपके अन्दर नहीं है तो फिर ये लगता है की अन्य है, अनन्य नहीं। अगर हमारे ही शरीर के ये अंग-प्रत्यंग हैं तो जो हम हैं ऐसे ही इनको होना चाहिए ना ? जैसे हम सोचते हैं वैसा ही उनको सोचना चाहिए, जैसा हम करते हैं वैसा ही उनको करना चाहिए। तो ये दूसरा क्यों सोचते हैं? ये उल्टी बात क्यों सोचते हैं? इनके दिमाग में ये सब अजीब- अजीब बाते कहाँ से आती है? सो अनन्य भक्ति नहीं हुई ये, ये भक्ति हो गयी अपनी ही तरह की । तो अपना सोच-विचार और अपना कार्य और अपना प्रेम ये सब वैसा ही होना चाहिए जैसा आप मुझसे प्रेम करते हैं। और यही जब प्रेम का स्रोत है तो जो कुएं में है वही घट में आना चाहिए। दूसरे चीज़ कैसे आ सकती है आरै जब कोई दूसरी चीज़ आती है तब मैं सोचती हूँ कि किसी दूसरे घट से इन्होने कोई और कुएं से पानी भरा हैं­| ये घट मेरा नहीं है। अब तीसरी बात जो युक्ति है कि जब दूसरी बात मैंने आपको बताई कि आप अपने अन्दर एक अनन्य भक्ति रखें। माँ हम आपकी शरणागत हैं । हम तो शरणागत है । जब शरणागत हैं तो अगर हम कोई बात कह भी दें, या हम आपको कोई चीज़ समझा दें या कोई आपके सामने प्रस्ताव रखें कुछ रखें तो उसको मना करने का सवाल ही कैसे उठेगा ? अगर आप और हम एक हो गए तो उसका सवाल ही कैसे उठना चाहिए! माँ ने कह दिया तो ठीक है। क्योंकि हम तो माँ ही हो गए हैं तो हम नहीं कैसे कर दें । जैसे कि मेरी आँख आपको देख रही है तो मेरी आँख जाने की आप लोग बैठे हैं सामने क्योंकि मेरी आँख मेरी अपनी है। तो मैं जो जान रही हूँ उसमें और मेरी आँख के जानने में कोई भी अन्तर नहीं। एक ही चीज़ है । जो मैं बुद्धि से जान रही हूँ वही मैं अपनी आँख से भी जान रही हूँ। तब फिर आपमें तदाकारिता जिसे कहते है वो नहीं हैं | सो ये दूसरी युक्ति है कि, ‘माँ, मेरे हृदय में आप आओ, मेरे दिमाग में आप आओ, मेरे विचारों में आप आओ, मेरे जीवन के हर कण में आप आओ।’ आप जहाँ भी कहोगे हम हाजिर हैं, हाथ जोड़कर। पर आपको कहना तो पड़ेगा ना ? और पूर्ण हृदय से कहना होगा। किसी मतलब से अगर आप मुझसे सम्बन्ध जोड़ें तो भी वो ठीक नहीं। लेकिन अगर सम्बन्ध जुड़ गया तो सारे मतलब अपने आप ही पूरे हो जाएंगे। आपको कुछ करना ही नहीं पड़ेगा। अपने आप ही जब आपके सारे मतलब पूरे हो गये तो आपका चित्त उसी में लग जाएगा। अब तीसरी जो बात है कि हम ये काम कर रहे हैं। हमने सहजयोग का ये काम किया, हमने ये सजावट की, ये ठीक – ठाक किया। मैंने किया तो सहजयोगी आप नहीं है। सहजयोग में आपके सारे कर्म है वो अकर्म हो जाने चाहिए। मैं कुछ कर रहा हूँ, मैंने ये कविता लिखी, मैंने ये किया। ये जहाँ तक आप बारीक, सूक्ष्म में देखते जायें क्या मैं सच में ऐसा सोचता हूँ क्या में ऐसा सोचता हूँ की मैंने किया ? ऐसे मेरे दिमाग में बात आती है क्या ? इसका मतलब यह है कि मेरा योग पूरा नहीं हुआ| जब योग पूरा हो जाता है तो फिर आप ऐसा नहीं सोचते। सोच ही नहीं सकते। विचारही नहीं आता , अकर्म में ही आप हो जाते हैं | ये हो रहा है, वो हो रहा है, ये घटित हो रहा है। वो सब हो रहा है, ऐसे आप बोलने लग जाते हैं और तब कहना चाहिए कि आप पूरी तरह से तदाकारिता आ गयी। अब मेरा हाथ है वो कुछ कार्य कर रहा है, वो थोड़े ही कहता है कि मैं कर रहा हूँ, उसको तो पता भी नहीं कि वो कर रहा है। वो तो हो ही रहा है। उसकी जितनी भी गति है, सो हम ही तो कर रहे हैं। लेकिन अगर वो ये सोचे की हम कर रहे है तो समझ लें कि ये हाथ कट गया, इससे जुड़ा हुआ नहीं। अगर जुड़ा है तो उसको कभी लगेगा नहीं कि मैं घूम रहा हूँ, मैं पकड़ रहा हूँ, कभी भी नहीं लगता । और जब आप ऐसा सोचते हैं कि ‘मैं कर रहा हूँ,’ तभी चैतन्य कहता है ‘अच्छा तू कर’ और तब सबसे ज़्यादा गड़बड़ी शुरू होती है। ये तीसरी युक्ति है, की उस युक्ति को सीखना चाहिए कि जहॉं मैं कुछ कर रहा हूँ? एक क्षण विचार करें कि मैं कर रहा हूँ, मैं क्या कर रहा हूँ? जब तक आप प्रकाश ढूंढ रहे थे तब तक आप कुछ कर रहे थे क्योंकि आपके अन्दर अहम् भाव था। आप अकेले एक व्यक्ति थे, एक व्यष्टि में आप थे, अब समष्टि में आप आ गए हैं, जब आप सामूहिकता में आ गये है। तब आप कुछ भी नहीं कर रहे। आप अंग-प्रत्यंग है और वह कार्य हो रहा है। ये तीसरी युक्ति है इसे समझें| मैं इसलिए यह युक्तियाँ बता रही हूँ कि अब छलांग जो लगानी है! इस तरह से आप अपना विवेचन हमेशा करते रहें। और अपनी ओर नजर करे । इस वक्त सबसे भलाई इसमें है कि हम अपनी ओर नजर करें ओर देखें कि क्या मैं ये सोचता हूँ मैं दूसरे केलिए सोचता हूँ| मैं ये सोचता हूँ क्या कि वो मुझसे काफी श्रेष्ठ है और मुझे उनसे कुछ सीखना चाहिए। उसके कोई कुछ अच्छे गुण मुझे दिखाई देते हैं कि बुरे गुण ही मुझे दिखाई देते हैं। दूसरों के अगर अच्छे गुण दिखाई दें और अपने बुरे गुण तो बहुत अच्छी बात है क्योंकि दूसरों के तो दुर्गुण आप हटा नहीं सकते। उसमे तो आपका अधिकार नहीं | जहॉं अधिकार हैं अपने ही दुर्गुण आप हटा सकते हैं | तो दूसरों ने तो क्या किया ? दूसरे ऐसे हैं ऐसे सोचने वाले अभी पूरी तरह से योग में उतरे नहीं है। मेरे में क्या त्रुटि है? यह देखने से ही आप ठीक कर सकते हैं, दूसरों के दोष देखने से ठीक नहीं हो सकते | ये तो ऐसा हुआ की आप दूसरों के घर की बात सोचते हैं | इनके घर में ये खराबी , उनके घर में ये खराबी (inaudiable) हमें जानना चाहिए, इस युक्ति को समझ लेना चाहिए कि इसमें जो हम डावांडोल हैं वो अपनी ही वजह से हैं। सहजयोग तो बहुत बड़ी चीज़ है, बड़ी अभिनव चीज़ है। लेकिन जो हममे खराबी आ रही हैं , या जो इसकी हम पूरी तरह मजा उठा नहीं पा रहे इसका वजह इसमें कोई न कोई दोष हैं । और इस सबको इस युक्ति को अगर आपने सीख लिया तो मिलेगा क्या? सिर्फ आनन्द, निरानन्द और कुछ नहीं। और फिर चाहिए क्या ? आपकी शक्ल ही बदल जाएगी। आप आनन्द में ही बहने लग जाएंगे। और आज इस हमारे जन्मदिवस पर में चाहूँगी कि आप लोगोंका भी आज जन्मदिवस मनाया जाए कि आज से हम इस युक्ति को समझें और अपने को इस पवित्रता से भर दें, जैसे श्री गणेश। और पवित्रता से ही मनुष्य में सुबुद्धि आती है क्योंकि पवित्रता प्रेम ही का नाम है। उसी से सुबुद्धि का मतलब भी प्रेम ही है। सब चीज़ का मतलब प्रेम है। और अगर आप सुबुद्धि को प्राप्त नहीं कर सकते, और प्रेम को आप अपना नहीं सकते तो सहजयोग में आने से आपका समय बर्बाद कर रहे है। इस वक्त ऐसा कुछ समां बंध रहा है कि सबको इसमें एकदम से एकाकार हो जाना चाहिए। अपने को परिवर्तन में डालना ही है, परिवर्तित हमको होना ही है। हम में खराबियाँ ही हैं, हमें अपने को पूरी तरह से पवित्र बना देना है। ये आप अपने साथ कितना प्रेम कर रहे हैं। आप का बच्चा जरासा गन्दा हो जाता है तो फ़ौरन आप दौड़ कर उसे साफ कर देते हैं क्योंकि आपको उससे प्रेम है। उसी प्रकार जब आपको अपने से प्रेम हो जाएगा तो आप भी अपने को पूरी तरह से परिवर्तन की ओर लगायेंगे कि मेरा परिवर्तन कहाँ तक है। मेरे अन्दर अब भी यही खराबी रहेगी ?अब भी मैं ऐसा हूँ ? और इस परिवर्तन के फलस्वरूप जो आशीर्वाद हैं, उस जीवन का, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। जो कबीर ने कहा कि अब मस्त हुए फिर क्या बोलें। तो आप सब उस मस्ती में आ जाइये, उस मस्ती को प्राप्त करें और उस आनन्द में आप आनन्दित हो जायें। ये हमारा आशीर्वाद है ।