Birthday Puja, Sahaja Yoga me pragati ki Teen Yuktiyaan

New Delhi (भारत)

1990-03-30 Birthday Puja Talk Hindi 42min and Music Delhi, 62' Download subtitles: CS,ENView subtitles:
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Janm Diwas Puja Date 30th March 1990 : Place Delhi : Type Puja Speech Language Hindi

आज नवरात्रि की चतुर्थी है और नवरात्रि को आप जानते हैं रात्रि को पूजा होनी चाहिए। अन्ध:कार को दूर करने के लिए अत्यावश्यक है कि प्रकाश को हम रात्रि में ही ले आएं। आज के दिन का एक और संयोग है कि आप लोग हमारा जन्मदिन मना रहे हैं। आज के दिन गौरी जी ने अपने विवाह के उपरान्त श्री गणेश की स्थापना की। श्री गणेश पवित्रता का स्रोत हैं। सबसे पहले इस संसार में पवित्रता फैलाई गई जिससे कि संसार में आए मनुष्य पावित्र्य से सुरक्षित रहें और अपवित्र चीज़ों से दूर रहें। इसलिए सारी सृष्टि को गौरी जी ने पवित्रता से नहला दिया। और उसके बाद ही सारी सृष्टि की रचना हुई। तो जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य यह है कि हम अपने अन्दर पावित्र्य को सबसे ऊंची चीज़ समझें| लेकिन पवित्र्य का मतलब यह नहीं कि हम नहाएँ, धोएं, सफाई करें, अपने शरीर को ठीक करें किन्तु अपने हृदय को स्वच्छ न कर सकें। हृदय का सबसे बड़ा विकार है क्रोध। क्रोध आ जाता है तो जो पवित्र्य है वो नष्ट हो जाता है क्योंकि पावित्र्य का दूसरा नाम निव्व्याज्य प्रेम है। वो प्रेम जो सतत बहता है और कुछ भी नहीं चाहता। उसकी तृप्ति उसी में है कि वो बह रहा है और जब नहीं बह पाता तो वह परेशान होता है। सो पावित्र्य का मतलब यह है कि आप अपने हृदय में प्रेम को भरें, क्रोध को नहीं। क्रोध हमारा तो शत्रु है ही लेकिन वो सारे संसार का शत्रु है। दुनिया में जितने युद्ध हुए, जो भी हानियाँ हुई हैं ये सामूहिक क्रोध के कारण हुई। क्रोध के लिए बहाने बहुत होते हैं। मैं इसलिए नाराज हो गया क्योंकि ऐसा था, में उस लिए नाराज हो गया क्योंकि वैसा था। हर क्रोध का कोई न कोई बहाना मनुष्य ढूंढ सकता है लेकिन युद्ध जैसी भयंकर चीज़ें भी इसी क्रोध से ही आती हैं। उसके मूल में क्रोध ही होता है। अगर हृदय में प्रेम हो तो क्रोध नहीं आ सकता और अगर क्रोध का दिखावा भी होगा तो भी वो प्रेम के लिए। किसी दुष्ट राक्षस को जब संहार किया जाता है तो वो भी उस पर प्रेम करने से ही होता है क्योंकि वो इसी योग्य है कि उसका संहार हो जाए जिससे वो और पाप कर्म न करे। लेकिन ये मनुष्य का कार्य नहीं। ये तो देवी का कार्य है जो इन्होंने नवरात्रि में किया। तो, हृदय को विशाल करके हृदय में ये सोचें कि हम किससे ऐसा प्रेम करते हैं जो निव्व्याज्य, निर्मम है, जिसके प्रति हमें ये नहीं कि ‘ये मेरा बेटा है, ये मेरी बहन है, मेरा घर है।’ ऐसा प्रेम हम किससे करते हैं? किसके प्रति हमें ऐसा प्रेम है। की जो स्थिति है उससे बहत ऊंची स्थिति में आप आ गये हैं क्योंकि आप सहजयोगी हैं। मनुष्य आपका योग परमेश्वर की इस सूक्ष्म शक्ति से हो गया है। वो शक्ति आपके अन्दर बह रही है। आपको प्लावित कर रही है, आपको सम्भाल रही है, आपको उठा रही है। बार-बार आपको प्रेरित करती है, आपका संरक्षण करती है और आपको आह्वाद, मधुमय प्रेम से भर देती है। ऐसी सुन्दर शक्ति से आपका योग हो गया किन्तु अभी भी हमारे हृदय में उसके लिए कितना स्थान है ? ये देखना होगा । हमारे हृदय में माँ के प्रति तो प्रेम है ये तो बात सही है। माँ से

तो सबको प्यार है और उस प्यार के कारण आप लोग आनन्दित हैं, बहुत आनन्द में हैं। किन्तु दो प्रकार का प्रेम और होना चाहिए। तभी माँ का प्रेम हो सकता है। एक तो प्यार अपने से हो कि हम सहजयोगी हैं, हमने सहज में शक्ति प्राप्त की लेकिन अब हमें किस तरह से बढ़ना चाहिए। बहुत से लोग सहजयोग के प्रसार के लिए बहत कार्य करते हैं जिसे हम कहें क्षितिजीय प्रसार। पृथ्वी से समानान्तर, चारों तरफ फैलता हुआ। वो लोग अपनी तरफ नजर नहीं करते तो उत्थान की गति को नहीं प्राप्त होते। बाह्य में बहुत कुछ कर सकते हैं। बाह्य में दौड़ेंगे, बाह्य में काम करेंगे, कार्यान्वित होंगे। सबसे मिलेंगे-जुलेंगे। लेकिन अन्दर की शक्ति को नहीं बढ़ाते। बहुत से लोग हैं अन्दर की शक्ति की ओर ज़्यादा ध्यान देते हैं और बाह्य की शक्ति की तरफ नहीं। तो उनमें सन्तुलन नहीं आ पाता और जब लोग बाह्य की ओर बढ़ने लग जाते हैं तो उनकी अन्दर की शक्ति क्षीण होने लग जाती है, और क्षीण होते-होते ऐसे कगार पर पहुँच जाते हैं कि फौरन अहंकार में ही डूबने लगते हैं। सोचते हैं कि देखिये हमने कितना सहजयोग का कार्य किया। हम सहजयोग के लिए कितनी मेहनत कर रहे हैं और फिर ऐसे लोगों का नया जीवन शुरू हो जाता है जो कि सहजयोग के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं। और वो अपने को सोचने लगते हैं कि हम बहुत भारी एक अगुआ हैं और हमारा बहुत महत्व होना चाहिए। जैसे कि जिसे स्व-महत्व कहते हैं। हर जगह देखते हैं कि हमारा महत्व होना चाहिए, हर चीज़ में वो कोशिश करेंगे कि अपना महत्व दिखाएं, अपनी विशेषता दिखाएं, अपने को सामने करें लेकिन अन्दर से खोखलापन आता है। उसके बाद हठात देखते हैं | कि उनको कोई बीमारी हो गयी, पगला गये वो। कुछ बड़ी भारी आफत आ गयी, तो फिर कहते हैं कि, माँ हमने तो आपको पूरी तरह समर्पित किया हुआ है, तो फिर ये कैसे हो गया , हमने कैसे पाया, ये गड़बड़ कैसे हो गयी। इसकी जिम्मेदारी आप ही के ऊपर है कि आप बहकते चले गये। फिर ऐसे आदमी एकतरफा हो जाते हैं। वो दूसरों से सम्बन्ध नहीं रख पाते। उनका सम्बन्ध इतना ही होता है कि हम किस तरह से रौब झाड़ें लोगों पर और किस तरह से दिखाएं कि हम कितने ऊँचे इन्सान हैं। और वो दिखाने में ही उनको महत्व नहीं दिया तो गलती हो गयी। यहाँ तक हो जाएगा कि उसमें ये भूल ही जाएंगे कि माँ का भी कुछ करने का है। माँ के लिए भी कुछ दान देना है। इसी प्रकार मैं देखती हूँ कि राहरी जैसी जगह, बम्बई में हर जगह इस तरह के कुछ लोग एकदम से उभर कर ऊपर आ गये और वो अपने को बहुत महत्वपूर्ण समझने लगे। वहाँ तो आरती भी नहीं होती थी और नसीब हमारा, वहाँ फोटो तो रहता था लेकिन फोटो पोछने की भी किसी को इच्छा नहीं थी। नसीब अपने कि स्वयं का फोटो नहीं लगाया। अपना ही महत्व, अपनी ही डींग मारना और वो डींग मार-मार के अपने को बहुत ऊँचा समझने लगे दूसरों से। अलग किसी से कुछ पूछना नहीं। कुछ नहीं हम ही करेंगे। फिर झगड़े शुरू हो गये। झगड़े शुरू होने पर ग्रुप बन गये। क्योंकि जिस सूत्र में आप बंधे हैं वो आपके माँ का सूत्र है और उसी सूत्र में आप बंधे हुए हैं वो आपके माँ का हुए सूत्र है और उसी सूत्र में अगर आप बंधे रहे और पूरे समय ये जानते रहे कि हम एक ही माँ के बच्चे हैं, न हममें कोई ऊँचा है न कोई नीचा, न ही हम कोई कार्य को करते हैं। ये चैतन्य ही सारा कार्य करता है, हम कुछ करते ही नहीं है। ये भावना ही जब छूट गयी और ये कि हम इतने बड़े हैं हम ने ये किया, हम ये करेंगे, वो करेंगे, तब फिर चैतन्य कहता है कि तुझे जो कुछ करना है वो कर, जहाँ जाना है जा। जाना है तुझे नर्क में तो नर्क में जा। तुझे अपने को

मिटा लेना है मिटा ले। अपना सर्वनाश करना है, वो भी कर ले । जो तुझे करना है वो तू कर। वो फिर आपको रोकेगा नहीं क्योंकि आपकी स्वतन्त्रता वो मानता है। आप नर्क में जाना चाहें तो उसकी भी व्यवस्था है। पर सहजयोग में एक और बड़ा दोष है। एक बहुत बड़ा दोष है कि हम एक सामूहिक, विराट शक्ति हैं। हम अकेले नहीं है। सब एक ही शरीर के अंग – प्रत्यंग हैं। उसमें अगर एक इन्सान ऐसा हो जाए या दो-चार ऐसे हो जाएं जो अपना-अपना समूह बना लें तो जैसे कैन्सर के जहर का एक कीटाणु ही बढ़ने लग जाता है वैसे ही एक आदमी बढ़ कर के और सारे सहजयोग को ग्रस्त कर सकता है। और हमारी सारी मेहनत व्यर्थ जा सकती है। हमको तो चाहिए कि समुद्र से सीखें कि जो सबसे नीचे रहकर के ही सब चीज़ को, सब नदियों को अपने अन्दर समाता है बगैर समुद्र के तो ये सृष्टि चल नहीं सकती। अपने को तपा कर के बाष्प बना कर के दुनिया में बरसात की सौगात भेजता है। उसकी जो नम्रता है, वही उसकी गहराई का लक्षण है और उस नम्रता में कोई ऊपरी नम्रता नहीं कि नमस्ते भाईसाहब! नमस्ते कुछ नहीं सबसे नीचे, सबको ग्रहण करके, सबको अपने अन्दर लेकर, सबको शुद्ध करके और फिर भाप बना कर बरसात करना। और फिर वही बरसात नदियों में पड़कर दौड़ती हुई समुद्र की ओर दौड़ेगी और इस समुद्र की पहचान, अगर आप किसी समुद्र के किनारे गए हों तो देखिए कि वहाँ जितने भी नारियल के पेड़ हैं वो सब समुद्र की ओर ही झुके हुए हैं। इतनी जोर की आँधी चलती है, कुछ भी हो जाए लेकिन वो कभी भी समुद्र से दूसरी ओर मुड़ते नहीं क्योंकि वो जानते हैं। कि ये समुद्र है। इस समुद्र के समान ही अपना हृदय विशाल तब होगा जब हमारे अन्दर अत्यन्त नम्रता और प्रेम आ जाएगा। लेकिन अपना ही महत्व करना, अपने को ही विशेष समझना, ये जो चीज़ है इसमें सबसे बड़ी खराबी यह है कि परम चैतन्य आपको काट देगा। तुमको तुम्हारा महत्व है, तुम जाओ। और फिर जैसे कोई नाखून काट कर फैंक देता है इस तरह से आप एक तरफ फेके जाएंगे । जो मेरे लिए तो बड़ी दु:खदायी बात होगी। और दो-चार लोग और ऐसे निकल आए जो सोचें कि हम बहुत काम करते हैं, हमने ये कार्य किया हमने वो कार्य किया, उनको फौरन ठण्डा हो जाना चाहिए। पीछे हटकर देखना चाहिए कि क्या हम ध्यान करते हैं? हमारा ध्यान लगता है? हम कितने गहरे हैं? और फिर हम किसको प्यार करते हैं? किस – किस को प्यार करते हैं ? कितनों को प्यार करते हैं? कितनों से दुश्मनी लेते हैं। सहजयोग में कुछ लोग बड़े गहरे बैठ गये हैं, बहुत गहरे आ गये हैं इसमें कोई शंका नहीं। और बहुत से अभी भी किनारे पर ड़ोल रहे हैं। और फिर वो कब फेकें जाएंगे कह नहीं सकते । मैंने आपसे पहले ही बताया है कि १९९० साल के बाद एक नया आयाम खुलने वाला है। और एक छलाग आपको मारनी होगी जो आप इस स्थिति से निकल कर उस नयी चीज़ को पकड़ लेंगे। जैसे कि चक्का है जब घूमता है तो एक बिन्दु पर आकर आगे सरक जाता है इसी प्रकार सहजयोग की प्रगति भी सामूहिक होने वाली है और इसमें टिकने के लिए पहली चीज़़ हमारे अन्दर पावित्र्य होना चाहिए जो नम्रता से भरा हो । वैसे तो आपने दुनिया में बहुत से लोग देखे हैं जो अपने को बड़ा पवित्र समझते हैं। सुबह-शाम सन्ध्या करते हैं और किसी को छूने नहीं देते । ये खाना नहीं खाएंगे, वो आयेगा तो कहेंगे कि, ‘तुम दूर बैठो,’ उनको छू लिया तो उनकी हालत खराब । ये पागलपन है अगर आप एकदम स्वच्छ हैं, पवित्र हैं तो आपको किसी को छूने में, बात करने में, अपवित्रता आनी ही नहीं चाहिए क्योंकि आपका स्वभाव ही शुद्ध करने का है। आप हर चीज़ को ही शुद्ध करते हैं तो आप

जिससे मिलेंगे आप उसी को शुद्ध करते जाएंगे। उसमें डरने की कौनसी बात है? उसमें किसी को ताड़ने की कौन सी बात है? उसमें कानाफूंसी करने की कौन सी बात है? तो ये तो लक्षण एक ही है कि आपकी स्वयं की पवित्रता कम है। अगर आपकी पवित्रता सम्पूर्ण है तो उस पवित्रता में भी शक्ति और तप है और वो इतना शक्तिशाली है कि वो कोई सी अपवित्रता को भी खींच सकता है। जैसे मैंने कहा कि हर तरह की चीज़ समुद्र में एकाकार हो जाती है। अब दसरे लोग हैं जो सिर्फ अपनी ही प्रगति की सोचते हैं। जैसे मैंने कहा कि हर तरह की चीज़ समुद्र में एकाकार हो जाती है। अब दूसरे लोग है जो सिर्फ अपनी ही प्रगति की सोचते हैं। वो ये सोचते हैं कि हमें दूसरे से क्या मतलब ? हम अपने कमरे में बैठ कर माँ की पूजा करते हैं, उनकी आरती करते हैं। ऐसे लोग भी बढ़ नहीं सकते क्योंकि आप एक ही शरीर के अंग-प्रत्यंग हैं। समझ लीजिए कि एक अंगुली ने अपने को बाँध लिया और कहेगी कि मुझे किसी और से कोई मतलब नहीं। अलग से रहँगी। ये तो अंगुली मर जाएगी। क्योंकि इसमें रक्त कहाँ से आएगा? इसमें नस कैसे चलेगी? इसमें चेतना का संचार कैसे होगा? ये तो कटी हुई रहेगी। आप एक बार इसे बाँध कर देखिए और पाँच दिन बाँधे रखिये। आप पाएंगे कि अंगुली काम ही नहीं करेगी। किसी काम की नहीं रह जाएगी। फिर आप कहेंगे कि, ‘माँ, में तो इतनी पूजा करता हूँ इतने मन्त्र बोलता हूँ, में तो इतना कार्य करता हूँ, फिर मेरा हाल ऐसा क्यों है।’ क्योंकि आप विचलित हैं। आप हट गए हैं, उस सामूहिक शक्ति से आप हट गए हैं। सहजयोग सामूहिक शक्ति है। इस सामूहिकता से जहाँ आप हट गए वहीं पर आप अलग हो गए उस सामूहिक शक्ति से। तो दोनों ही चीज़ की तरफ आपको ध्यान देना है कि हम अपनी शक्ति को भी सम्भालें और सामूहिकता में रचते जाएं। तभी आपके अन्दर पूरा सन्तुलन आ जाएगा। लेकिन बाह्य में आप बहुत कार्य करते हैं। मैंने ऐसे लोग देखे हैं जो सहजयोग के लिए बहुत कार्य करते हैं और काफी अच्छे भाषण देते थे । उनके भाषणों की उन्होंने फिर टेप बना ली। फिर लोगों से कहने लगे कि आप हमारे टेप सुनो। तो लोग हमारे टेप छोड़कर उन्हीं की टेप सुनते थे। और उनका यह हाल था कि जैसे आज के दिन हम यहाँ बैठे हैं, हमारे फोटों को तो नमस्कार करते थे , हमें नहीं करेंगे क्योंकि उनको फोटो की आदत पड़ी हुई है। हमसे उन्हें कोई मतलब नहीं। उन्हें फोटो से मतलब है। ऐसे-ऐसे विक्षिप्त लोग हमने देखे हैं। फिर उन्होंने अपने फोटो छपवाए और फोटो सबको दिखा रहे हैं कि हम वैसे हैं, कैसे हैं। इस तरह वे अनेक तरीकों से अपने ही महत्व को बढ़ते हैं । करते -करते ऐसे खड्डे में गिर गए। अनायास उनके समझ में नहीं आया और एकदम पता चला कि सहजयोग से छुट गये। कहीं भी नहीं है। लोग मुझे कहते हैं कि माँ वो तो बड़े अगुआ थे, ये थे। हाँ, थे तो सही लेकिन वे गये कहाँ सहजयोग से। क्या करें! एकदम काफूर हो गए। कहाँ? पता ही नहीं। तो ऐसे लोग क्यों निकल गए क्योंकि सन्तुलन नहीं और जब सन्तुलन नहीं रहता है तो आदमी या तो बायें में चला जाएगा या दायें में चला जाएगा। और जैसा मैंने कहा कि दो तरह की शक्तियाँ हमारे अन्दर हैं जिससे हम सहजयोग की ओर खिंचते भी हैं और फैंक भी दिए जाते हैं। एक रस्सी में अगर आप पत्थर बाँध कर घुमायें तो पत्थर घूमता रहेगा, जब तक रस्सी से बंधा है। जैसे ही रस्सी से छूट जाएगा, दूर फैंका जाएगा। इसी प्रकार बहुत से लोग सहजयोग से निकल गए। और फिर लोग कहते हैं ‘देखिये माँ, सहजयोग में बहुत से लोग कम हो गए हैं।’ मैं क्या करू? और अगर कम हो गये हैं तो उसमें सहजयोग का कोई नुकसान नहीं

हुआ है। इसमें उनका ही नुकसान हुआ है । सहजयेग का बिल्कुल भी नुकसान नहीं हुआ है । क्योंकि जिसको नुकसान या फायदे से कोई मतलब ही नहीं, ऐसी जो चीज़ है उसका क्या नुकसान हो सकता है? हाँ अगर आपको अपना फायदा करा लेना है तो आप इस चीज़ को जान लीजिए की सहजयोग को आपकी जरूरत नहीं है, आपको सहजयोग की जरूरत है। ‘योग’ का दूसरा अर्थ होता है युक्ति। एक तो है कि सम्बन्ध जुड़ जाना, दूसरा है युक्ति। ये युक्ति समझ लेनी चाहिए। ये युक्ति क्या है? इसमें तीन तरह से समझाया जा सकता है। पहली तो ये है कि हमें इसका ज्ञान आ जाना चाहिए। ज्ञान का मतलब बुद्धि से नहीं। किन्तु हमें अंगुलियों में, हाथ में, और अन्दर से कुण्डलिनी का पूरी तरह जागरण होना ये ज्ञान है और जब ये ज्ञान हो जाता है तब और भी ज्ञान होने लग जाता है। बहुत सी बातें जो आप नहीं समझ पाते थे वह आप समझ पा रहे हैं। और आप समझने लग जाते हैं कि कौन सत्य है कौन असत्य। इस ज्ञान के द्वारा आप लोगों की कुण्डलिनी भी जागृत कर सकते हैं और उनको समझा सकते हैं। उनसे आप पूरी तरह से एकाग्र हो सकते हैं। उनके साथ आप वार्तालाप कर सकते हैं इस ज्ञान के कारण। तो आपको बौद्धिक ज्ञान भी आ जाता है। आप सहजयोग समझते हैं। कोई समझता था पहले? ‘ईड़ा, पिंगला, सुखमन नाड़ी रे, एक ही डोर उडाऊ रे’ पहले नानक की कोई बात समझता था? या ज्ञानेश्वर की कोई बात समझता था पहले? कोई रहस्यमय चीज़ या गोपनीय बात कह रहे हैं ऐसे समझ कर लोग रख देते थे। लेकिन सहजयोग के बाद आप सब समझने लगे। तो आपका बुद्धि चातुर्य भी बढ़ गया। उसकी भी चतुरता आ गयी। आप उसको समझने लग गये। ये तो बात ठीक है कि आप उसे समझने लग गये। और ऐसी बातें जो अगम्य थी गम्य हो गईं और सब बातों को आप जानने लग गये। सो तो एक युक्ति हो गयी कि आपने अपना ज्ञान बढ़ा लिया। अब दूसरी युक्ति क्या है? वो है जो कि आप हमारे प्रति भक्ति करें। उस भक्ति को भी जब आप करते हैं तब आपको अनन्य भक्ति करनी चाहिए। आप हमसे तदाकारिता प्राप्त करें। जैसे हम सोचते हैं वैसा ही आप सोचने लग जायें। आज देर हो गयी समझ लीजिए तो हम कह सकते थे कि आज बहुत देर हो गयी थी, हम थक गये हैं। लेकिन हमने ये सोचा कि नवरात्रि है, रात में ही करना है और यही मुहूरत हमें मिलना था, यही मूहूर्त है, इसी वक्त ये पूजा होनी चाहिए। और ये होना ही चाहिए, होना ही है और बड़े आनन्द से हम कर रहे हैं। क्योंकि शुभमूहर्त यही है। और हमें सहज होना चाहिए। उसके बारे में सोचते भी नहीं। थक गये या आराम भी नहीं किया, कुछ भी नहीं । यही मूहर्त है। जैसे एक योद्धा अगर लड़ाई में गया है और देखा कि दुश्मन खड़ा है, यही समय उसको मारने का है, उसी वक्त उसे मारना चाहिए। तो हम बैठे हैं और आपको भी यही सोचना चाहिए कि यही समय माँ ने बाँधा है । यही समय हमारे लिए उचित है, दूसरा नहीं। इसी वक्त पूजा करनी चाहिए । लेकिन जो आधेअधूरे लोग हैं वो सोचते हैं कि, ‘हम सबेरे से आकर बैठे हैं, हमने ये किया, हमें भूख लग गयी, खाना नहीं खाया, बच्चे रो रहे होंगे’ तो वो अनन्य भक्ति नहीं हुई क्योंकि मेरा जो सोच-विचार है आपके सोच- विचार में नहीं आया। मैं जैसे सोचती हूँ वैसा वो नहीं सोचते। किसी के लिए भी मैं सोचती हूँ। कभी-कभी ‘माँ ये आदमी इतना खराब है।’ मैं कहती हूँ कि, ‘नहीं, बिल्कुल अच्छा है, बढ़िया आदमी है।’ कैसे कहा आपने? सोचती हूँ कि जो मैं देख रही हूँ ये क्यों नहीं देखते ? अगर ये वैसे ही हो जाते हैं तो इन्हें वो ही देखना चाहिए, जो मैं देखती हूँ। वैसी तो बात नहीं, ये तो कुछ

और ही देख रहे हैं। तो अनन्य नहीं हुए, अन्य हो गये। उसी प्रकार हमारा प्यार आपके प्रति है। और एक ही चीज़ से हम तृप्त होते हैं कि आप सबके प्रति एक जैसा प्यार रखें। अगर वो बात आपके अन्दर नहीं है तो फिर लगता है अन्य है, अनन्य नहीं। अगर हमारे ही शरीर के ये अंग-प्रत्यंग हैं तो जो हम हैं वैसे ही इनको होना चाहिए, जैसे हम सोचते हैं वैसा ही उनको सोचना चाहिए, जैसा हम करते हैं वैसा ही उनको करना चाहिए। तो ये दूसरा क्यों करते हैं? ये उल्टी बात क्यों सोचते हैं? इनके दिमाग में ये सब अजीब- अजीब बाते कहाँ से आती है? सो अनन्य भक्ति नहीं हुई ये, अन्य हुई। तो आपका सोच-विचार और कार्य और आपका प्रेम वैसा ही होना चाहिए जैसा आप मुझसे प्रेम करते हैं। यही अगर प्रेम का स्रोत है तो जो कुएं में है वही घट में आना चाहिए। दूसरे चीज़ कैसे आ सकती है आरै जब कोई दूसरी चीज़ आती है तब मैं सोचती हूँ कि उन्होंने किसी दूसरे घट कुएं से पानी भरा। ये घट मेरा नहीं है। अब तीसरी बात जो युक्ति है कि जब मैंने दूसरी बात आपको बताई कि आप अपने अन्दर एक अनन्य भक्ति रखें। माँ हम आपकी शरणागत हैं और जब शरणागत हैं तो जब हम कोई बात कह भी दें, या हम आपको कोई चीज़ समझा दें या कोई आपके सामने प्रस्ताव रखें कुछ रखें तो उसका मना करने का सवाल ही कैसे उठेगा ? अगर आप और हम एक हो गए तो उसका सवाल ही कैसे उठना चाहिए! माँ ने कह दिया तो ठीक है। हम तो माँ ही हो गए हैं तो हम नहीं कैसे कर दें । जैसे कि मेरी आँख आपको देख रही है तो मेरी आँख जाने की आप लोग बैठे हैं सामने क्योंकि मेरी आँख मेरी अपनी है। तो मैं जो जान रही हूँ उसमें और मेरी आँख के जानने में कोई भी अन्तर नहीं। एक ही चीज़ है । जो मैं बुद्धि से जान रही हूँ वही मैं अपनी आँख से भी जान रही हूँ। तब फिर आपमें तदाकारिता नहीं आती सो ये दूसरी युक्ति है कि, ‘माँ, मेरे हृदय में आप आओ, मेरे दिमाग, विचार, जीवन के हर कण में आप आओ।’ आप जहाँ भी कहोगे हम हाजिर हैं, हाथ जोड़कर। पर आपको कहना तो पड़ेगा न और पूर्ण हृदय से कहना होगा। किसी मतलब से अगर आप मुझसे सम्बन्ध जोड़ें तो भी वो ठीक नहीं। लेकिन अगर सम्बन्ध जुड़ गया तो सारे मतलब अपने आप ही पूरे हो जाएंगे। आपको कुछ करना ही नहीं पड़ेगा। अपने आप ही जब आपके सारे मतलब पूरे हो गये तो आपका चित्त उसी में लग जाएगा। अब तीसरी जो बात है कि हम ये काम कर रहे हैं। हमने सहजयोग का ये काम किया, हमने ये सजावट की, ठीक – ठाक किया मैंने, तो सहजयोगी आप नहीं है। सहजयोग में आपके सारे कर्म अकर्म हो जाने चाहिए। मैं कुछ कर रहा हूँ, मैंने ये कविता लिखी, मैंने ये किया। ये जहाँ तक बारीक, सूक्ष्म में देखते जायें कि मैं सच में ऐसा सोचता हूँ क्या में ऐसा सोचता हूँ? क्या इसका मतलब यह है कि मेरा योग पूरा नहीं हुआ? जब योग पूरा हो जाता है तो फिर आप ऐसा नहीं सोचते। सोच ही नहीं सकते। अकर्ममय हो जाते हैं आप| ये हो रहा है, वो हो रहा है, घटित हो रहा है। वो सब हो रहा है, ऐसा बोलने लग जाते हैं और तब कहना चाहिए कि पूरी तरह से तदाकारिता आ गयी। अब मेरा हाथ है वो कुछ कार्य कर रहा है, वो थोड़े ही कहता है कि मैं कर रहा हूँ, उसको तो पता भी नहीं कि वो कर रहा है। वो तो हो ही रहा है। उसकी जितनी भी गति है, हम ही तो कर रहे हैं। तो समझ लें कि ये हाथ कट गया, इससे जुड़ा नहीं। अगर जुड़ा है तो उसे कभी लगेगा नहीं कि मैं कर रहा हूँ, पकड़ रहा हूँ कभी भी नहीं लगता । और जब आप ऐसा सोचते हैं कि ‘मैं कर रहा हूँ,’ तभी चैतन्य कहता है ‘तू कर’ और तब सबसे ज़्यादा गड़बड़ी

शुरू होती है। ये तीसरी युक्ति है, उस युक्ति को सीखना चाहिए कि क्या मैं कुछ कर रहा हूँ? एक क्षण विचार करें कि मैं कर रहा हूँ, मैं क्या कर रहा हूँ? जब तक आप प्रकाश ढूंढ रहे थे तब तक आप कुछ कर रहे थे क्योंकि आपके अन्दर अहम् भाव था। आप अकेले एक व्यक्ति थे, एक व्यष्टि में थे, अब आप समष्टि में, सामूहिकता में आ गये हैं। तब आप कुछ भी नहीं कर रहे थे। आप अंग-प्रत्यंग है और वह कार्य हो रहा है। ये तीसरी युक्ति है इसे समझें| मैं इसलिए यह युक्तियाँ बता रही हूँ कि अब छलांगे जो लगानी है! इस तरह से आप अपना विवेचन हमेशा करते रहें। और अपनी ओर नजर रखें। इस वक्त भलाई इसमें है कि हम अपनी ओर नजर करें और अपनी ओर देखें कि क्या मैं ये सोचता हूँ कि वो मुझसे काफी श्रेष्ठ है और मुझे उनसे कुछ सीखना चाहिए। उसके कुछ अच्छे गुण मुझे दिखाई देते हैं कि बुरे गुण ही मुझे दिखाई देते हैं। दूसरों के अगर अच्छे गुण दिखाई दें और अपने बुरे गुण बहुत अच्छी बात है क्योंकि दूसरों के तो दुर्गुण आप हटा नहीं सकते। तो दूसरों ने तो क्या किया ? दूसरे ऐसे हैं ऐसे सोचने वाले पूरी तरह योग में उतरे नहीं है। मेरे में क्या त्रुटि है? यह देखने से ही आप ठीक हो सकते हैं दूसरों को कहें कि तुम्हें अपना दोष ऐसा ठीक करना चाहिए और वहाँ के प्रधानमंत्री को जाकर कुछ अक्ल सिखायें तो वो हमें बन्दी कर लेंगे क्योंकि हमारे देश में तो हम कह सकते हैं क्योंकि ये हमारा देश है। इसी प्रकार हमें जानना चाहिए, इस युक्ति को समझ लेना चाहिए कि इसमें जो हम डावांडोल हैं वो हम अपनी ही वजह से हैं। सहजयोग तो एक बहुत बड़ी चीज़ है, बड़ी अभिन्न चीज़ है। लेकिन इसका जो हम पूरी तरह मजा नहीं ले पा रहे इसका मतलब हममें कोई खराबी है। और इस सबको इस युक्ति को अगर आपने सीख लिया तो मिलेगा क्या? सिर्फ आनन्द, निरानन्द और कुछ नहीं। और फिर चाहिए क्या आपकी शक्ल ही बदल जाएगी। आप आनन्द में ही बहने लग जाएंगे। हमारे जन्मदिवस पर में चाहूँगी कि आज आपका भी जन्मदिवस मनाया जाए कि आज से हम इस युक्ति को समझें और अपने को इस पवित्रता से भर दें, जैसे श्री गणेश। और पवित्रता से ही मनुष्य में सुबुद्धि आती है क्योंकि पवित्रता प्रेम ही का नाम है। उसी से सुबुद्धि का मतलब भी प्रेम ही है। सब चीज़ का मतलब प्रेम है। और अगर आप सुबुद्धि को प्राप्त नहीं कर सकते, अगर आप प्रेम को अपना नहीं सकते तो सहजयोग में आने से आपका समय बर्बाद हो रहा है। इस वक्त ऐसा कुछ समां बंध रहा है कि सबको इसमें एकदम से एकाकार हो जाना चाहिए। अपने को परिवर्तन में डालना है, परिवर्तित हमें होना ही है। हम में खराबियाँ हैं, हमें अपने को पवित्र बना देना है। ये आप अपने साथ कितना प्रेम कर रहे हैं। आप का बच्चा जरासा गन्दा हो जाता है तो आप दौड़ कर उसे साफ कर देते हैं क्योंकि आपको उससे प्रेम है। उसी प्रकार जब आपको अपने से प्रेम हो जाएगा तो आप भी अपने को परिवर्तन की ओर लगायेंगे कि मेरा परिवर्तन कहाँ तक है। मेरे अन्दर अब भी यही खराबी रह गयी अब भी मैं ऐसा हूँ और इस परिवर्तन के फलस्वरूप जो आशीर्वाद हैं, उस जीवन का वर्णन नहीं किया जा सकता। जो कबीर ने कहा कि अब मस्त हुए फिर क्या बोलें। तो आप सब उस मस्ती में आ जाइये, उस मस्ती को प्राप्त करें और उस आनन्द में आप आनन्दित हो जायें। ये हमारा आशीर्वाद है ।