Public Program

(भारत)

1990-04-01 Public Program, Version 3, Yamunanagar, India, Hindi, 89'
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1990-04-01 Public Program Version 2, Yamuna Nagar, India, Hindi, 59'
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1990-04-01 Public Program, Yamunanagar, India, 25'
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Sarvajanik Karyakram Date 31st March 1990 : Place Yamaunanagar Public Program Type Speech Language Hindi

सत्य को खोजने वाले आप सभी साधकों को हमारा नमस्कार! सबसे पहले हमें ये जान लेना चाहिये कि सत्य जहाँ है, वहीं है, उसे हम बदल नहीं सकते| उसे हम मोड़ नहीं सकते। उसे तोड नहीं सकते। वो था, है और रहेगा। अज्ञानवश हम उसे जानते नहीं, लेकिन हमारे बारे में एक बड़ा सत्य है कि हम ये शरीर, बुद्धि आत्मा के सिवाय और कुछ नहीं। जिसे हम शरीर, बुद्धि और अहंकार आदि उपाधियों से जानते हैं वो आत्मा ही है और आत्मा के बजाय कुछ भी नहीं। ये बहुत बड़ा सत्य है जिसे हमें जान लेना चाहिए । दूसरा सत्य है कि ये सारी सृष्टि, चराचर की सृष्टि एक सूक्ष्म शक्ति है, जिसे हम कहेंगे कि परमात्मा की एक ही शक्ति है। कोई इसे परम चैतन्य कहता है और कोई इसे परमात्मा की इच्छाशक्ति कहता है। परमात्मा की इच्छा केवल एक ही है कि आप इस शक्ति से संबंधित हो जायें, आपका योग घटित हो जायें और आप उनके साम्राज्य में आ कर के आनंद से रममाण हो जाए। वो पिता परमात्मा, सच्चिदानंद अत्यंत दयालू, अत्यंत प्रेममय अपने संरक्षण की राह देखता है। इसलिये ये कहना की हमें अपने शरीर को यातना देनी है या तकलीफ़ देनी है ये एक तरह की छलना है। कोई भी बात से जब आप नाराज़ होते हैं तो आप कहते हैं कि अच्छा है,’ इससे कुछ पा कर दुःखी होता है, सुख तो होने वाला नहीं। सो, सिर्फ एक ही बात को आप समझ लीजिए कि परमात्मा नहीं चाहते हैं की आप किसी प्रकार का भी दुःख उसे दे। किसी तरह यातना का, वो चाहते हैं कि सहज में ही आप उस तरह को प्राप्त करें, इसमें आपकी सारी व्यथायें, जो अज्ञान के कारण हैं वो नष्ट हो जाएगी। आप निरानन्द में रममाण हो जाएंगे। उसकी पूर्ण व्यवस्था हमारे अन्दर परमात्मा ने की हुई है। जैसे की डॉक्टर साहब ने आप से बताया कि कुण्डलिनी की व्यवस्था हमारे अन्दर त्रिकोणाकार अस्थि में है। और इसके जागृति से आपका संबंध उस सूक्ष्म सृष्टि से हो जाता है, जो सृष्टि सारे संसार को चलाती है। सारे संसार में विचरण करती है, और सोचती है, समझती है। उसको प्लावित करती है, इसका सर्जन करती है और सब से अधिक इस सृष्टि के अन्दर जो सब से ऊँचा, पहुँचा हुआ मनुष्य प्राणी है उससे अत्यंत ब्रेक है। अब सिर्फ इस मनुष्य स्थिति में आने के बाद एक और स्थिति उत्क्रान्ति की होती है इसे हमें प्राप्त करना है। यहाँ जैसे मैंने कहा था कि प्रथम सत्य है, यहाँ आप आत्मा हो जायें । आज कल के जमाने में हर तरह की गलत प्रणालियाँ चलती रही हैं। और इस तरह की बातें मैंने सुनी है कि इस में लिखा जाता है कि कुण्डलिनी का जागरण बड़ा कठिन है और इस में बहुत यातनायें हैं। ये सब आज कल की ही बातें हैं। हजारों वर्ष पूर्व मार्कडेय स्वामी ने लिखा है कि कुण्डलिनी जागरण के सिवाय हम आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त नहीं कर सकते। उसके बाद अनेक ॠषि- मुनियों ने इसके बारे में कहा। रामायण में भी आपने सुना होगा और उसके बाद हर प्रांत में, हर जगह, हर बार जब भी कोई विभूति पैदा हुई, उन्होंने यही कहा है कि आप अपनी जागृति करायें और इस कुण्डलिनी के द्वारा उस मोक्ष को प्राप्त करें। ন

महाराष्ट्र में, ज्ञानेश्वरजी ने इस पे बहुत कुछ लिखा और अभी अभी तक गुरुनानक साहब ने भी इस पर बहुत विवेचन किया है। इतना ही नहीं, कबीरदासजी ने इसको बहुत खोल कर बहुत काव्यमय कहने के कारण लोगों को कुछ बात समझ में नहीं आयी। फिर घबरा के वो कहते हैं, ‘कैसे समझाऊँ सब जगह अंधार!’ ये अंधापन वो ये है कि हम ये नहीं समझते कि जब से हमारा परमात्मा से संबंध नहीं होता तब तक हम कोई भी कोशिश करें, कोई भी मेहनत करें, तो वहाँ तक कैसे पहुँचेगा। जैसे कि ये टेलिफोन है। जब तक आपके टेलिफोन का संबंध किसी और टेलिफोन से नहीं हो तो उसको घुमाने से क्या फायदा। इसलिये बहुत से लोग मेरे पास आ के कहते हैं, ‘माँ, हम तो इतना भगवान को मानते हैं, इतनी पूजा करी, हमने इतने व्रत- वैकल्य करे, हम यहाँ गये, वहाँ गये, हम क्यों ऐसे? सीधी बात है, आपका संबंध नहीं हुआ। ये ब्रह्मसंबंध होना चाहिए। और इसको अनेक लोगों ने विपरित तरीके से इस्तमाल किया है, और बहुत बुरे ढंग से उन्होंने इस चीज़ को सामने रखा। और खास कर देखिये, इस में ऐसा काम करने से ब्रह्मसंबंध हो जाएगा, वैसा काम करने से ब्रह्मसंबंध हो जाएगा। इतना ही नहीं परमात्मा के नाम पे बेलगाम लोगों ने पैसे इकट्ठे किये। भगवान को तो पैसे से संबंध नहीं है, ये तो मनुष्य का संबंध है। भगवान को क्या मालूम पैसा क्या चीज़ है? तो भगवान के नाम पे पैसा लेने से फायदा क्या है, जिसको समझ ही नहीं आता कि पैसा क्या चीज़ है? लेकिन हर जगह आप देखिये, कुछ सुविधा के नाम पर इतना पैसा लेते है। हर धर्म में ये बात है। कोई हिन्दू धर्म में, या सिखों में या ईसाईयों में बात है ऐसे नहीं, हर धर्म में ये बात है। कि हर किसी को इसी प्रकार कि अगर आपको धर्म को प्राप्त करना है तो आप पैसा निकालिये। इसके धूल के बराबर नहीं है ये चीज़ें। वो तो आप जैसे सत्य को खोजने वालों साधकों की खोज में है । उन्हीं का वो कल्याण करेंगे। आपका कल्याण आप ही के अन्दर निहित है। कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है। ‘काहे खोजन जाये। ‘ ये जब तक अपना आपा नहीं आप जानोगे तब तक कुछ नहीं मिलेगा। हम कहते हैं, ये मेरे बच्चे, ये मेरे पति, मेरे रिश्तेदार सब मेरे, मेरे और वो मैं कौन है जिसके लिए सब है? वहाँ पहुँचे कि मैं कौन हँ? जब वहाँ पहुँचते ही कि ‘मैं कौन हूँ?’ वो हम ने अभी तक जाना नहीं कि ‘मैं कौन हूँ ?’ …. (अस्पष्ट) और किस तरह से कुण्डलिनी के जागरण से हमारी विकृतियां ठीक होती है। ये एक सर्वसाधारण तरीके से मैं आपको समझा सकती हूँ। समझ लीजिए की ये हमारी लेफ्ट साइड है और ये राइट साइड है। ये दोनों हमारे पीठ की रीढ़ की हड्डी में इस तरह से बैठ गयी और इसके नीचे ये चक्र तैयार है। हम उपर नहीं जा सकते। अपने भावना से खेलते रहता है, अपने भूत काल में जमा रहता है। और हर समय रोते रहता है कि क्या मेरा भूतकाल था? मैं कहाँ पहुँच गया? ये भी गया, वो भी गया। वो तो अपने लेफ्ट साइड में चला जाएगा। जो मनुष्य आगे की बात सोचता है, हमेशा भविष्य की बात सोचता है। हर समय ये सोचता है कि मुझे क्या करना चाहिए, कहाँ जाना चाहिए, प्लॅनिंग करना है, हर समय। वो राइट साइड में चला जाता है। और बीच में आने के लिए उसको कोई मार्ग नहीं। या | तो हम पिछला सोचते हैं या अगला सोचते हैं। पागलों जैसे जो भी विचार हमारे अन्दर एक बार उठा जाता है। हम उसके उपर नाचते रहते हैं। इन दोनों के बीच में एक जगह है जो वर्तमान है। उस वर्तमान में रहने के लिए भी

कुण्डलिनी का जागरण होना जरूरी है। जब कुण्डलिनी का जागरण होता है तो सबसे पहले आप के अन्दर ये स्थिति प्राप्त होती है, इसे निर्विचार समाधि कहनी चाहिए। इसका हठयोग में, पातंजलि में बहुत है। ये पहली स्थिति आपने प्राप्त होनी चाहिए की जहाँ निर्विचार है। लेकिन निर्विचार समाधि में, निर्विचार समाधि माने उस वक्त आप सतत सतर्क होते है, कोई आप निद्रा में नहीं जाते, आप से कोई चक्कर नहीं आ जाते, आप कोई बेहोश नहीं हो जाते, लेकिन आप अत्यंत सतर्क हैं। लेकिन अन्दर से निर्विचार हैं, अत्यंत शांत हैं। अब देखिये, की अगर कोई सुंदर सी, शांत देवी, उसे देखने के साथ, आपके दिमाग में विचार चलने लगे कि ये कैसी चीज़ मैं पाऊँ, इसको कैसे ले लूँ? अगर वो मेरी चीज़ है तो और सतर्क है। लेकिन जब कोई विचार ही नहीं आता, तो उस सुन्दर चीज़ को बनाने वाला, उसके आनन्द में पूरा के पूरा अत्यंत ऐसा मन में हो जाता है जैसे कि गंगा-यमुना दोनों तरह से आनन्द में बहने लगती है। ये अनुभव करने के लिए है। कहने के लिए नहीं, भाषण देने के लिए नहीं, इसका अनुभव होना चाहिए। जब तक ये अनुभव सिद्ध नहीं होगा, तब तक ये व्यर्थ है। और यही अनुभव को प्राप्त करना ही आत्मसाक्षात्कार है। आत्मा को सच्चिदानंद स्वरूप है। माने आत्मा को प्राप्त करने से आप खो जाते हैं। सत्य को जानने वाले हैं क्या? अभी तक हम जो सत्य जानते हैं वो पारस्पारिक है । रिलेटिव है। माने ये कि कोई कहेगा ये सत्य है, कोई कहेगा वो सत्य है, वो कहेगा वो सत्य है। एक चीज़ नहीं है कि सब कहें कि हाँ, यही सत्य है। इसकी वजह ये है कि अभी तक सत्य का अनुभव हमने नहीं किया। जब हमारी आत्मा हमारे चित्त में आ जाती है, उस प्रकार से हम केवल सत्य खोजते हैं। अंग्रेजी में कहना चाहिए अॅबसल्यूट ट्ूथ। केवल सत्य को हम नहीं जानते और असत्य को भी हम जानते हैं। क्योंकि जो सत्य नहीं वो असत्य है। सब लोग, जितने भी लोग आत्मसाक्षात्कारी होते हैं वो एक ही बात है। उनमें न झगड़ा होता है न पार्टी होती है, न जश्न होता है। अब हमारा सहजयोग चालीस देशों में चल रहा है। हर तरह अलग अलग तरह के लोग हैं, बढ़िया बढ़िया हैं, और सब जब भी सम्मिलित होते हैं, ना कोई ऐसी बात, सब आपस में एक जैसे, एक साथ सामूहिक रूप में होते है, मानो छोटे छोटे बिंदु में सागर से बने हैं। (अस्पष्ट) इसलिये आत्मसाक्षात्कार का ये कार्य कलियुग में ही होना है। ये कार्य पहले नहीं हो सकता। लेकिन आज समय ऐसा आया है कि बहार आ गयी है। देखिये इतने सारे सागर, ये कलियुग की ही कमाल है। ये कलियुग की ही कमाल है और इस कलियुग में ही ये चीज़ होने वाली है कि मनुष्य सत्य को खोजेगा क्योंकि वो संभ्रांत हैं । परेशान है, टेन्शन है, आफ़त है, बिमारियाँ हैं। फिर जब वो सत्य को खोजता है तो उसका चित्त हो जाता है। आत्मा के प्रकाश से उसका चित्त हो जाता है। इसके कारण शुद्ध शुद्ध उसकी सारी जो शारीरिक व्याधियाँ हैं दर हो जाती है । कोई प्रकार की व्याधि नहीं रह जाती। अधिक तर व्याधियाँ लुप्त हो जाती है।…….(अस्पष्ट) इस प्रकार ६० डॉक्टर लोग लंडन में प्रक्रिया करायी। …(अस्पष्ट) और वो आश्चर्यचकित हो गये। खुशखबरी कि अभी हम ऑस्ट्रेलिया गये थे। दो पेशंट्स थे। बिल्कुल मरती हुई हालत में आयें, एड्स के पेशंट्स थे, वो दस मिनट में ठीक हो गये। और दो-तीन बाद वो आ गये कि बिल्कुल ठीक चल रहे है। लोगों ने शराब पिना, ये सब लेना, ड्रग लेना, अपने देश में तो ऐसा ही नहीं होता है। लेकिन बाहर के लोग…..। क्योंकि हम लोगों के सामने तो बड़े-बड़े आदर्श हैं। हमने देखा श्रीराम, सीता, सब बड़े-बड़े आदर्श

है, इसकी वजह से हमारे अन्दर उन आदर्शों को प्राप्त करने से, विचार न करते हुए उन आदर्शों की सिर्फ हम कॉपी करते हैं। लेकिन उसको हम पाना नहीं चाहते। पर परदेश में ये हालत इतनी नहीं है, उनको देखते ही, जागृत हो जाती है। और एकदम चीज़ को पकड़ लेते है। एक लाख लोगों ने ड्रग छोड़ दिया, शराब पीना छोड़ दिया। दुनिया भर की गंदी आदतें छोड़ दी और इतने सुन्दर हो गये हैं कि जैसे एक कीचड़भरे एक सरोवर में कमल खिलें। मैं तो पहले कहती थी कि, ‘बाबा, परदेस में तो जाना आफ़त आ जाएगी। इतने खराब वहाँ पर वाइब्रेशन्स है, वहाँ चैतन्य लहरी नहीं। वहाँ कहाँ पती ने मुझे भेजा।’ लेकिन मैंने देखा , वहाँ कमल की कलियाँ हैं। और वही कमल खिल रहे हैं और सब सुरभित हैं। लोगों को अभी ये समझ में नहीं आता है कि इन देशों ने बहुत सारी सांसारिक प्रगति की। लेकिन कोई हम प्रगति नहीं। इनका हालत आप सुनिये। आप आश्चर्यचकित होंगे, माँ-बाप का कोई ठिकाना नहीं, बच्चे बारह साल के होते ही घर से निकले। माँ-बाप को मार डालते हैं, दादा-दादी को मार डालते हैं, माँ-बाप बच्चे को मार डालते हैं। लंदन शहर के अन्दर एक हप्ते में दो बच्चे माँ-बाप मार डालते हैं। आपको विश्वास नहीं होगा कि इन लोगों को क्या हुआ है? इनके हृदय सूख गये हैं कि क्या बात हो गयी थी कि ये बच्चों से तंग आ कर उनको मार दिये। हर रोज वहाँ इस तरह की बातें सुन के हैरान हो गयी कि कैसे ये कर सकते हैं इस तरह। अभी इस भारतवर्ष में ऐसे भी लोग हैं जिनके अन्दर इतना प्रेम है, इतना आदर है। ये सब उन लोगों ने जो भी प्रगति की है वो बाहर की प्रगति है, जैसे कि कोई पेड़ बढ़ जाए और उसको अपने मूल का पता न हो उसके कारण शुष्क हो जाए। बिल्कुल शुष्क हो गये। सारी दुनिया आपके चरणों में बसी हुई है। जिस दिन वो जानेगी कि यहाँ के लोग कितने आत्मसाक्षात्कारी हैं। इतना और इस देश से जाने वाली चीजें हैं, यही आपका धरोहर है, यही आपका हेरिटेज है और सब होते हुए भी हिन्दुस्थान में, सहजयोगी जो हैं पहले कोई नहीं। क्योंकि यहाँ तो चैतन्य जागृत है। आप जानते ही नहीं कि इस भारत वर्ष में जन्म लेने के लिए आपने न जाने कितने पुण्य किये हैं। ऐसा बड़ा देश, इतना महान देश, ऊपरी उपरी चीज़ों को आप देखते हैं। इसकी गहनता को आप जानते ही नहीं । एक बार मैं अपने पति के साथ आ रही थी। यहाँ आते ही मैंने कहा कि, ‘आ गया हिन्दुस्थान छू लिया। कैसे कहती हो कि हिन्दुस्थान छू लिया?’ ‘जिसमें सबकुछ चैतन्य बह रहा है।’ तो उन्होंने जा के पायलट से पूछा, तो उसने कहा, ‘अभी छुआ है।’ एकदम चारों तरफ। मैं अभी रास्ते से आ रही थी। यही देख रही थी कि कितना चैतन्य है। शाकंभरी देवी का यहाँ अवतरण हुआ शायद आप लोग नहीं जानते। और शाकंभरी देवी का यहाँ अवतरण बहुत बड़ा कार्य है। ……. इसी प्रकार हमको | ये भी जान लेना चाहिए इस भूमी में अनेक साधुओं ने, संतों ने अवतार लिये जहाँ बड़े-बड़े महान अवतरण जन्म लिये, जैसे श्रीराम जैसे। देवी ने अनेक अवतार यहाँ ले कर के, | लेकिन वो आज वही दिन आया है, उनकी जो परंपरायें उन्होंने जो दी थी जो हमारे उपर इतने दिनों से हमारे उपर छायी हुई हैं। आत्मसाक्षात्कार पाते ही आप पहले शांति में चले जाएंगे जो कि आपकी अपनी चेतना है । से लोग बहुत शांति की बात करते हैं। शांति के विश्राम बनायें । शांति का एक उमेदवार अनुष्ठान बनाया था और उनके पास जाईये तो खड़े नहीं हो सकते। इतने क्रोधी लोग होते हैं। ऐसे लोगों को शांति कैसे मालूम! जो लोग शांति की बात करते

हैं, अगर उनके हृदय में शांति नहीं तो वो क्या शांति प्रस्थापित कर सकते हैं। तो ये आपके अन्दर की, आपकी संपत्ति, आपके अन्दर की चीज़ है जिसे आपको क्रॉस करना है, उसे लेना-देना कुछ नहीं। आपके अन्दर की ये शक्ति, जैसे कि एक बीज में उसकी सृजन शक्ति होती है। आप उसे जमीन में छोड़ दीजिए वो अपने आप बढ़ेगा | ये जिवंत क्रिया है और इसीलिए ये सहज है। सह मतलब आपके साथ और ज माने पैदा ये योग का अधिकार हुआ। आपके अन्दर ही पैदा हआ है। क्योंकि आप मानवरूप में पैदा हये हैं। त्रिकोणाकार अस्थि में बैठी हुई कुण्डलिनी ये आपकी अपनी व्यक्तिगत एक माँ है। जैसे कि एक कनेक्शन जरूर होता है जुड़ा हुआ। उसी प्रकार एक आपके अन्दर, सब के अन्दर आपकी माँ बसी हुई है और उसको अपने बारे में सब मालूमात होती है। ….. जैसे कि उस तरह से उस जनम, इस जनम के बारे में सब जानती है कि ये क्या है। और वो लालायित है. (अस्पष्ट) अब आजकल के साइन्स के जमाने में वो सोचते हैं कि ये कौनसी बात माँ ने कही। परमात्मा का नाम भी उन्होंने सुना नहीं। लेकिन परमात्मा है। यही नहीं, पूरी सृष्टि में इन्हीं का साम्राज्य चलता है। वो ही सर्व को मानते हैं। इसकी सिद्धता की सहजयोग के बाद ही हो सकती है, उसके पहले बात बात है। और बात इसी से करते है , इसलिये ये अनुभव आप सब लोग आज शाम करे। ऊपरी बात को आप भूल जाईये। एकदम झगड़ा वरगैरे सब बेकार है। जब तक इन लोगों को ये अनुभव नहीं आयेगा, ये ऐसे ही हैं बेचारे। लेकिन आप लोग आत्मसाक्षात्कारी हो जाएं। क्योंकि इसकी भविष्यवाणी हजार वर्ष पहले हुई है। भृगु मुनि ने इस पर भविष्यवाणी की है कि सहजयोग इस तरह से आयेगा| कि किस तरह आश्चर्य जनक है। चकित करने वाले है। इसके बारे में एक भाषण में मैं आपको क्या बताऊँ। इसपे तो अनन्त भाषण देके, अंग्रेजी में, मराठी में …… (अस्पष्ट) लेकिन भाषण सुनने से, तर्क-वितर्क करने से … (अस्पष्ट) सिर्फ जाना है, छ: चक्रों को पार करना है, अन्त में ब्रह्मरंध्र को भेदना है। उस कुण्डलिनी को ….. जैसा भी हो उसके अन्दर एक शिव की इच्छा है कि योग घटित होना है। कुण्डलिनी काम करती है, क्योंकि कुण्डलिनी के शुद्ध इच्छा की शक्ति शुद्ध है, बाकि इच्छायें हमारी अशुद्ध हैं। एक ही हमारी शुद्ध इच्छा है, चाहे हम जाने या न जाने कि हमारा आत्मसाक्षात्कार और इसके बाद इस तरह से हल निकल आये हैं, आपको लगने ही लगता है कि आप परमात्मा के साम्राज्य के भाग है। आप सबको आशीर्वाद !