Public Program Day 2

New Delhi (भारत)

1990-04-05 Public Program Day 2, Ramlila Maidan, Delhi, India (Hindi), 31'
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Public Program, Ram Lila Maidan Delhi, India 05th April 1990

सत्य को खोजने वाले आप सभी साधकों को हमारा नमस्कार!

  कल आपसे मैने कहा था कि हमारे अंदर एक बड़ा भारी सत्य है और बाह्य में दूसरा सत्य। पहला सत्य तो ये है कि हम आत्मा हैं, हम आत्मा स्वरूप हैं और दूसरा सत्य ये है कि ये सारी सृष्टि, ये सारा संसार एक बड़ी सूक्ष्म ऐसी शक्ति है, उससे चलता है। और ये शक्ति जो है, इस शक्ति को ही पाना, उसमे एकाकारिता में जाना, यही एक योग है। ये दूसरा वाला सत्य है और इन दोनों सत्य को हमें इस वक़्त मान लेना चाहिए। संशय करना तो बहुत आसान है और पढ़ लिख कर मनुष्य और अधिक संशय करने लगता है, इसीलिए कबीर ने ये कहा है की “पढ़ी पढ़ी पंडित मूरख भये” क्योंकि पढ़-पढ़ के उनके अंदर संशय और ज़्यादा हो जाता है और उनकी संवेदना कम हो जाती है और वो बुद्धि से ही तर्क वितर्क से जानना चाहते हैं कि सत्य क्या है पर सत्य बुद्धि के परे है, सत्य बुद्धि से परे है और ये इस जीवंत क्रिया के साथ होगा। अब अगर आप एक साइंटिस्ट् है, आप एक शास्त्रीय आधार को देखना चाहते हैं तो उसके लिए सबसे पहले धारणा दी जाती है, हैपोथेसिस (hypothesis) दिया जाता है। अगर वो धारणा सही है तो उस धारणा को आपको पहले समझ लेना चाहिए और अपने दिमाग़ को खुला रखना चाहिए जैसे साइंटिस्ट् को चाहिए और उसके बाद देखिए कि अगर ये हो जाता है और ये अगर घटित हो जाता है तो फिर आपको ये मान्य कर लेना चाहिए। अगर आप इसे मान्यता देना चाहते हैं तो नहीं दे सकते, लेकिन जिस वक़्त ये सिद्ध हो जाए तब आपके लिए आवश्यक है कि आप अपनी इमानदारी में इस्तेमाल करें क्योंकि ये आपके हित के लिए हैं, सारे संसार के हित के लिए हैं। इसी प्रकार एक दूसरा प्रश्न हुआ है कि कलयुग मे अवतार कब होगा और ये अवतार होगा तो उसका समय क्या होगा, आदि आदि। तो बात ये है की अवतार अगर हुआ तो आप क्या पहचानेंगें? आज तक आपने किसी को पहचाना है? इतने अवतरण संसार मे हो गये, किसी ने किसी को पहचाना नहीं।

  पहले ये तो तैयारी हो जाए की हम उन्हे पहचाने जो अवतार होगा, नहीं तो कलयुग में भी जो अवतार है वो भी बेकार जाएगा। इसलिए सबसे पहले आपकी तैयारी होनी चाहिए, आप में आत्मसाक्षात्कार होना चाहिए और जब आपका आत्मसाक्षात्कार हो जाएगा तभी आप पहचान पाएँगे की अवतार कौन है और कौन नहीं। इसकी पहचान के लिए ही सहज योग है। आप पहले अपना आत्मसाक्षात्कार हासिल कर लीजिए, उसके बाद आप स्वयं ही जान जाइएगा कि सत्य क्या है और असत्य क्या है। क्योंकि जब हम देख नहीं पाते किसी चीज़ को, ऐसे समझ लीजिए आपने एक हाथ मे साँप पकड़ लिया है और अंधेरा है आपको दिखाई नहीं दे रहा तो हम अगर कहेंगे कि इसमें साँप है तो आप हमसे झगड़ा करेंगे कि नहीं ये तो साँप नहीं, ये तो रस्सी है। लेकिन जैसे ही प्रकाश आ जाएगा आप अपने आप से ही उस साँप को छोड़ दीजिएगा, उसी प्रकार असत्य की बात है कि असत्य अपने आप ही छूट जाता है। और कुंडलिनी जागरण, ये विषय बिल्कुल ही सहज है, ये कठिन बिल्कुल नहीं है क्योंकि हम उसके मीन-मेख निकालते हैं इसलिए ये कठिन हो जाता है जैसे  की एक बीज को आप पृथ्वी में छोड़ देते हैं तो ये माता उसे अपने ही आप उसे जागृति दे देती है क्योंकि उस बीज में भी ये बँधा हुआ है और उस माता में भी ये शक्ति है। क्योंकि माता में भी ये शक्ति है और क्योंकि उस बीज में भी ये शक्ति है तो ये अपने आप घटित हो जाता है, तो ये प्रकृति का नियम है। प्रकृति के नियम को आप समझा नहीं सकते कि ये कैसे होता है उसमे आप तर्क वितर्क करिए, आप किताबें पढ़िये, सर के बल खड़े हो जाइए तो क्या बीज उग आयेगा? वो तो जब तक आप माँ के उदर में नहीं डालेंगे तब तक वो बीज उग नहीं सकता। उसी प्रकार ये भी एक जीवंत क्रिया है। आज आप अमीबा से इंसान हो गए, इंसान हो गए सो कैसे हो गए ये कोई नहीं सोचता कि कौन सी शक्ति ने हमारे अंदर ये कार्य किया है। ये सूक्ष्म शक्ति हमारे अंदर कौन सी है, किस शक्ति के कारण हम आज इंसान हो गए। इस पर कोई विचार नहीं कर सकता और ना ही कोई कर सकता है।

  साइन्स (science) में भी ऐसे बहुत से प्रश्न हैं जिस पर डॉक्टर्स हों, साइंटिस्ट हों जवाब नहीं दे सकते, जिसका जवाब सिर्फ़ आपको सहज योग में मिल सकता है। कारण ये है कि सहज योग उस शक्ति से एकाकारिता प्राप्त करता है जहाँ से दुनिया भर की चीज़ें बनी और जिसका आप साइंस(science) जानते है, जो सामने है जो चीज़ दिखाई दे रही उसी का आप साइंस(science) जान सकते हैं, जो चीज़ अदृश्य में है उसके लिए आपको अदृश्य में उतरना पड़ेगा, सारे संसार में आज जो इतने पेड़ (unclear) के तरह से पाश्चिमात्य देशों में आप देखते हैं कि बड़ी वहाँ खुशहाली वगैरह है जो नहीं है। मैने आपसे पहले ही बताया कि वहाँ कोई खुशाली नहीं है, बड़ा बुरा हाल है। हम लोग जो हैं, कम से कम अपनी फॅमिली है, अपने बाल बच्चे हैं, अपने घर बार, हमारा समाज बहुत अभी अच्छा है, लेकिन वहाँ आप देखेंगे कि लोग ना तो उनके पास माँ बाप हैं, ना ही उनके पास बच्चे हैं, ना ही उनके पास कोई रिश्तेदार है, सब कुछ पैसा पैसा हो जाने से लोग बिल्कुल त्रस्त हो गये हैं और ये जो पेड़ बढ़ गया है बहुत बड़ा पहाड़, उसके मूल इस देश मे है और कल ही मैंने आपसे बताया था कि इसकी ज़िम्मेदारी आपके पास है कि इस मूल की शक्ति को आप सारे संसार को पहुँचाएँ। लेकिन अगर आप इस मूल की शक्ति को सब जगह नही पहुँचाना चाहते तो आप पे ये ज़िम्मेदारी आ जाएगी कि आपने इसको स्वीकारा नहीं। 

  अब ये हमारा धरोहर है। हमारा हेरिटेज(Heritage), अनादिकाल से कुण्डलिनी के बारे मे अपने देश मे लिखा है ऐसा नही कि सिर्फ़ अपने देश मे लिखा गया है, अनेक देशों मे लिखा गया है। Thou, thou जो है वो भी यही कुण्डलिनी है। (unclear) इसका वर्णन अनेक तरह से है। बाइबल में भी इसे कहा जाता है कि तुम्हारे अंदर इसका वृक्ष है और ये जो ट्री ऑफ लाइफ (tree of life) है, इसी की वजह से आपका पुनर्जन्म् होगा। हर जगह ये तो बात कही जाती है की दुनिया में जो लफ़ानी है, जो चीज़ें क्षणभंगुर हैं, जो नष्ट होने वाली हैं उसका इस्तेमाल सोच समझ के करना चाहिए, पर सारे जितने शास्त्र हैं, जितने धर्म हैं उसका मूल तत्व एक ही है कि आप उस अनंत जीवन को प्राप्त करें। और सब व्यर्थ है। अनंत जीवन को प्राप्त करना ही इसका मुख्य सबसे बड़ा हेतु है और इसमें कोई भी हेतु नहीं। जो कुछ भी हम कर रहे हैं, जो कुछ भी हम भगवान का नाम याद कर रहे हैं, स्मरण कर रहे हैं, दौड़ रहें है, मंदिर में जा रहें है मस्जिद में जा रहें है, प्रार्थना कर रहे हैं इसका एक ही हेतु है कि उस अनंत जीवन को प्राप्त करें और उस अनंत जीवन को प्राप्त करने के लिए हमें आत्मसाक्षात्कार लेना है।

  ये सहज में है इसलिए लोग सोचते हैं कि ऐसे कैसे हो सकता है लेकिन आपको मालूम है गुरु नानक साहब ने भी कहा है “सहज समाधि लाओ”, ये सब सहज में ही होता है। अगर समझ लीजिए अगर ये असहज होता तो कितनी कठिन बात है कि समझ लीजिए कि आप श्वास ले रहें हैं श्वास लेना बहुत ज़रूरी है, नितांत आवश्यक चीज है। अगर उसके लिए आपको किताबें पढ़नी पड़ती और शास्त्र पढ़ने पड़ते तो कितने लोग जीवित रहते उसी तरह से ये भी नितांत आवश्यक है जिसे वाइटल (vital) कहते हैं। जो बिल्कुल बहुत ज़रूरी चीज़ है उसके लिए अगर आपको किताबें पढ़नी पड़ें और उसके लिए आपको शास्त्र को खोलना पड़े तो फिर कितने लोग उत्थान को प्राप्त करेंगे। ये क्रिया होने वाली थी और घटित होनी हैं इस पर भृगु मुनि ने भी एक बड़ा भारी ग्रंथ लिखा है, जिसका नाम ‘नाड़ी ग्रंथ’ हैं अगर बन पड़े तो आप लोग उसे पढ़ें तब आपको विश्वास होगा। मुश्किल ये है की सामने स्वयं सिद्ध चीज रहते हुए भी आपको मिसालें देनी पड़ती है पहले, किसी ने कुछ लिखा उस किताब मे लिखा हैं, इस किताब में लिखा हैं, ऐसा लिखा हैं तब लोगों को समझ में आता हैं पर मैं सीधी बात पूछती हूँ की अगर यहाँ मैने कहा हैं कि एक हीरा पड़ा हुआ है मूल्यवान हीरा हैं और उस हीरे को आप प्राप्त कर सकते हैं और आपको एक पैसा नहीं देना, आप क्या सोचते हैं आप कोई बैठे रहेंगे। सारी दुनिया से लोग दौड़ के आएँगे, वही बात मैं अगर कहूँ की आपके हृदय मे एक हीरा है जिसको आप चमका लीजिये जिसका आप प्रकाश अपने चित्त में ले लीजिए तो आप क्या शंका पे शंका कर बैठेंगे? फिर एक बात और पूछी गयी कि ये बात कहीं शास्त्रों मे लिखी नही गयी। बहुत सी बातें शास्त्रों में नही लिखी गयी, इसीलिए तो आपके सामने हम आए हैं। अगर सभी बात लिखी होती तो आज हम यहाँ क्यूँ खड़े होते, पहले ही सब लिख दिया होता। ये भी नही लिखा कि कुंडलिनी के जागरण के बाद आपकी ऊँगलियों में जागृति आ जाती है और ये भी नहीं लिखा की इसमें आप चक्रों को जानते हैं। सब चीज़ जो लिखा है वो अगर आखिरी शब्द होता, उसके बाद अगर कुछ बताना ही नही होता तो उन्होने क्या क्यूँ कहा कि उसके बाद रियलाइज़ेशन (realisation) होगा, क़यामा आएगा। किसी ने कहा कि ऐसा दिन आएगा की जब आपका लास्ट जजमेंट (Last Judgement) होगा, ये सब अगली बातें क्यूँ कही? भविष्य की बातें क्यूँ कही? कलयुग की बात क्यूँ कही? अगर उसी वक़्त सब बात कहनी होती, तो कुछ ना कुछ तो कलयुग मे भी कार्य होना है और बहुत बहुत बहुत ही महत्वपूर्ण और इतना ऊँचा कार्य, इतना भव्य और इतना दिव्य कार्य है ये कि इस कार्य के बारे में, आप जब तक इसमें उतरेंगे नहीं, आप समझ ही नहीं सकते। पहाड़ के नीचें खड़े होकर अगर आप चाहें कि किसी सुंदर शहर की आप शोभा देखें, देख नहीं सकते। आपको पहाड़ पर चढ़ना होगा, पहाड़ पर चढ़ कर आप अकस्मात देखते है कि अरे वाह कमाल है कितना बढ़िया नज़ारा है जिसे देख रहे है हम, कौनसी दुनिया में हम आ गये हमे समझ में नहीं आ रहा और अगर ये बात है ही और अगर ऐसा आपके अंदर छुपा हुआ इतना सौंदर्य, इतना गौरव और इतना सब कुछ है तो फिर इसे पाने में हिचकिचाना कोई बड़ी भारी अकल की बात तो मुझे लगती नहीं। इससे तो ऐसा जान पड़ता है कि लोग अभी तैयारी में ही नही हैं, वो अभी यही सोच रहे हैं की इसको पाएँ या नही पाएँ। 

  जब आपकी ही संपत्ति आपके अंदर है, कुंडलिनी  जब आप ही के अंदर है तो फिर उसको पाने मे आपको क्यों हर्ज़ होना चाहिए? इस कुंडलिनी के जागरण से आप ये समझ जाएँगे कि  सारे जितने भी धर्म हुए, वो सारे ही धर्म एक वृक्ष पर, एक जीवित वृक्ष पर एक फूल के भाँति अलग अलग समय आए और जिन्होंने लाएँ हैं वो सब असली लोग थें, वें सब आपस में रिश्तेदारी थे। लेकिन उनके लाने के बाद हमने फूल तोड़ लिए और उन फूलों को हमने अपने इसमें ले लिया चंगुल में और कहने लगे ये हमारे फूल हैं, ये हमारे फूल हैं और फिर ये फूल मर गये और इन मरे हुए फूलों के लिए हम परेशान हैं। असलियत मे हम आए नहीं, अगर हम असलियत पर आएँ तो ये लोग सब रिश्तेदार हैं और बहुत नजदिक के रिश्तेदार हैं और सब ये सोच कर दुनिया में आए थे कि एक के बाद, एक के बाद हम लोगों को समझाएँगे की ये काल आने वाला है और इस काल मे आपको आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त होना है और उसी के बाद आप परमात्मा को जान सकेंगे। किसने नहीं कहा, ईसा मसीह ने कहा “नो दाइसेल्फ” (Know Thyself)। किसने नहीं कही ये बात? आज तक कोई भी आप किताब उठा कर देख लें, आपको आश्चर्य होगा कि सारे विश्व में जिस जिस महान साधु संतों ने, महर्षियों ने और किन किन महान अवतरणो ने और पैगंबरो ने एक ही बात कही कि तुम अपने को जानो, अपने को पहचानो। अब इसमें ये हुआ कि कैसे पहचाने, कैसे जाने। सो उसमे भी यही बात है कि ये आपके अंदर शक्ति है, इसकी जागृति होनी चाहिए और जागृति होते ही आप उसे प्राप्त कर सकेंगे। 

  आप लोगों मे कुछ लोग ऐसे भी हैं जो किसी न किसी व्याधि से भी ग्रस्त हैं, जिस व्याधि से ग्रस्त हैं, उसके लिए कल बताया गया था कि किस तरह से कुण्डलिनी के जागरण से आपके चक्रों मे शक्ति आ जाने से आपकी व्याधियाँ दूर हो जाती हैं। अभी आपसे कहना क्या है लेकिन आप जानते हैं कि दिल्ली शहर मे ही यहाँ यूनिवर्सिटी मे दो डॉक्टरों को MD की पदवी मिल गई। अभी हम परसो गये थे करनाल में तो वहाँ पर एक महाशय आए थे, वो बचपन से बोलते नही थे, तीस साल की उनकी उम्र हो गयी थी, ना वो सुनते थे ना बोलते थे। कभी उन्होंने मुँह से एक शब्द भी नही निकाला था, तो उनको सहज योग में आते ही, उन्होने बोलना शुरू कर दिया और अब सब का नाम ले रहें है। इस प्रकार यहाँ पर ऐसे भी लोग हैं जिनके ब्लड कॅन्सर ठीक हो गये, बहुत सी बीमारियाँ ठीक हो गयीं। लेकिन किसी का ठेका लिया नही है और सहज योग कोई बीमारी ठीक करने के लिए नहीं है ये कुंडलिनी की जागृति के लिए है। अगर आपकी कुंडलिनी की जागृति हो जाएगी तो आपकी बीमारियाँ भी ठीक हो जाएँगी और आपको कभी बीमारी नहीं हो सकती। अगर आप ठीक से सहज योग में बैठें हैं और ध्यान धारणा में रहें तो आपको कोई भी बीमारी नहीं हो सकती । 

  अब उसके बाद ये जो है ये किस तरह से घटित होता है और ये किस तरह से हमारे पैरासिम्पथेटिक (parasympathetic) नर्वस सिस्टम को किस तरह से प्लावित करता है, ये सब बातें आप सेंटर पे आइए आप सब कुछ सीख सकते हैं और समझ सकते हैं। उसके लिए आपको कोई रुपया पैसा कुछ देने की ज़रूरत नहीं, कोई देने की ज़रूरत नहीं। ये तो सारा ज्ञान परमात्मा का है और परमात्मा के ज्ञान के लिए आप कुछ पैसा नहीं दे सकते। न ही आप पे इसमें कुछ किसी तरह का भी उत्तरदायित्व है। आपकी अपनी चीज है, उसको आप पा लीजिए और ये आपकी अपनी संपत्ति है, इसे आप जान लीजिए और फिर अनंत सागर मे डूब जाइए और जो कुछ भी शास्त्रों मे लिखा है, वो हर एक बात इससे सिद्ध होती है। कोई सा भी शास्त्र उठाइए, उसके लिए ज़रूरत नहीं की आप गीता में ही कुछ पूछें या आप ये कहें की हमे ये सिद्ध कर दीजिए कि रामायण मे ये लिखा था या उसमें ये लिखा हुआ था। असल में उनको भी समझने के लिए बहुत ज़रूरी है की हम आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त करें। जैसे गीता पे, पाँच सौ गीतायें लिखी। अगर एक ही सत्य है तो पाँचसौ टिकाएँ लिखी हैं अगर एक ही सत्य हैं तो पांच सौ टिकाएँ क्यूँ लिखी है। इसकी वजह ये है की सबकी दृष्टि सूक्ष्म नहीं है।

  अब गीता की ही बात लीजिए, जैसे कि लोग कहते हैं की कृष्ण ने पहले ही कह दिया कि ज्ञान योग करो। ज्ञान योग का मतलब लोग लगाते हैं कि पढ़ना, लिखना और किताबें रटना और खूब जानना। ये ज्ञान योग  नही है, ये तो बुद्धि योग है। ये बुद्धि योग है जिससे आदमी को घमंड आ जाता है। जो लोग गीता पे प्रवचन देते हैं वो लोग सोचते हैं की वही व्यास मुनी हैं और उस तरह से बात करते हैं कि आश्चर्य होता है, मुझे उनसे गर्मी गर्मी लगती है, जैसे कोई पता नही क्या हवा मे उड़ रहे हैं। उनको कोई होश ही नहीं है और फिर वो रुपया पैसा भी बहुत लेते हैं, उनके दर्शन के लिए भी कभी कभी वो लोग पाँच सौ रुपया ले लेते हैं क्यों कि वो गीता सुनाते है ये जो गीता प्रवचन होते है इसमें गीता नही सुनाते, वो अपनी ही बकवास सुनाते है। मैं आपको अभी समझाऊंगी। ज्ञान का मतलब होता है अपने नसों पे जानना। ‘ग्न’ शब्द जो है या ‘ज्ञान’ शब्द जो है, ‘ग्न’ ‘ज्ञान’ दो शब्द हैं जिन्हे एक ही ढंग से कहा जाता है। उत्तर में जिसे आप ‘ज्ञ’ कहते हैं, दक्षिण में उसे ‘ज्न’ (jna) कहते हैं, दोनों एक ही चीज हैं। अब इससे भी पहले, ईसामसीह के जो पहले शिष्य थे उनको नोस्टिकस (gnostics) कहा जाता था। नोस्टिकस (gnostics) माने जिन्होने जाना, जिसे बुद्ध कहते है, बुद्ध माने जिसने जाना। जिसने जाना माने कोई बुद्धि से थोड़ी न जाना। ये लोग कोई कॉलेज गये थे, यूनिवर्सिटी गये थे, स्कूल गये थे? उन्होने जाना कैसे? जाना अपने नसों में, जाना अपने अंदर, ये जो जानना है ये ज्ञान मार्ग है इसलिए कृष्ण ने कहा था तुम ज्ञान मार्ग को ही प्राप्त करो। पर अर्जुन ने तो भी जो सवाल किए, तो उन्होने कहा अच्छा ठीक है तुम भक्ति मार्ग करो। भक्ति मार्ग पर उन्होने कहा कि (पुष्पम फलं तोयं) जो भी तुम फूल, पत्ती, पानी मुझे दोगे मैं स्वीकार करूँगा लेकिन एक शब्द पे नचाया हैं क्योंकि कृष्ण हैं। कृष्ण जो थे वो बड़े डिप्लोमॅटिक थे। वो जानते थे कि मनुष्य जो है उसकी बुद्धि उल्टी बैठी हुई है उल्टे ही काम करता है तो उन्होने सोचा कि टेढ़ी ऊँगली घी निकलेगा उन्होने एक शब्द ऐसा रखा, उन्होने कहा कि तुमको अगर भक्ति करनी है तो अनन्य भक्ति करो।

अब अनन्य शब्द पे हम लोग कहें कि हम अनन्य भक्ति करते हैं। अनन्य का मतलब है जब आपका संबंध परमात्मा से हो गया तब आप अनन्य हो गये। जब दूसरा कोई नही होता, जब आप एकाकारिता मे आ गये, वो उन्होने कहा कि वो भक्ति करो। उससे पहले की भक्ति नहीं बतायी है। लेकिन ये अनन्य शब्द को ना समझने से लोग सोचते है की रात दिन ‘हरे राम हरे कृष्ण’ करो तो आपको परमात्मा मिल जाएँगे। कभी नहीं मिल सकते। उल्टे आपको कॅन्सर (cancer) की बीमारी हो जाएगी। मैं आपको बता रहीं हूँ। इस तरह की  क्योंकि श्री कृष्ण जो हैं, वो हमारे विशुद्धि चक्र में बैठे हैं और उनका अगर हम नाम इस तरह से बेकार में लें, वो कोई हमारे जेब में तो नहीं हैं, हमारे नौकर नहीं हैं जो हर समय हम उनका नाम लें। एक साधारण गवर्नर का भी नाम आप लें तो आपको पुलिस पकड़ लेगी, और जिस परमात्मा को, परमात्मा जो सबसे ऊँचा है उसका नाम ये इस तरह से लेते हैं जैसे वो हमारे जेब ही मे बैठा हुआ है। जैसे वो इतना सस्ता है कि उसका नाम लें। और जब हम इस तरह से उसका नाम लेते हैं तो वही नाराज़ हो जाता है और हमारे ऊपर आफत आती है और लोग कहते हैं की माँ ऐसा क्यों हुआ। की हम तो इतना ये करे, हमने दस लाख जप करे, फलाना  किया, ढिकाना  किया। आपको अधिकार नही है। आपको अधिकार नहीं, आपको अनाधिकार हैं जब तक आपकी एकाकारिता नही होगी, तो आपके हित की नहीं बात हुई। आपकी अच्छाई के लिए इससे आपको कोई फायदा नही। आप पहले आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त करें फिर एक अक्षर, एक अक्षर उनका लेने से ही कार्य हो जाएगा। आपके हृदय मे ही वो बैठे हैं एक ही अक्षर उनका लेने से आपका कार्य हो सकता हैं आपके कार्य मे पूरी तरह से, आपको बिल्कुल ऐसा लगेगा कि आप परमात्मा के साम्राज्य मे आ गए। इस तरह से आपके सारे कार्य होते रहेंगे। लेकिन अगर आप चाहें कि परमात्मा का नाम लें, उनके नाम का ढिंढोरा पीटें, उनके नाम से ये करें वो करें, (unclear) दुनिया भर की बेकार की बातें करें उनसे अगर फ़ायदा होना होता तो आज तक हो जाता। कहाँ हुआ है? दुनिया के किस कोने मे हुआ है?

  लोगों ने तरह तरह के धन्धे करें हैं धर्म के नाम पर। किस कोने मे, कौन से धर्म में मनुष्य को फ़ायदा हुआ है, ये मुझे बताइए। हर जगह आफ़त, ग़रीबी, परेशानी, हर तरह की जो रईस लोग है उनके यह इतनी बीमारियाँ हैं इतनी बीमारियाँ हैं, इतना असंतोष है इतने झगड़े हैं। ये क्यों हो रहे? तो यही कलयुग में होने का है, जब मनुष्य समझता है कि ये कैसे? तो लोग फिर कहने लग गये कि भगवान ही नही है, परमात्मा ही नही है, कुछ  ऐसी चीज़ ही नही है जो परमात्मा है। इस तरह फिर बहुत से लोग तैयार हो गये। ऐसा कहने से भी, परमात्मा जो हैं सो हैं और उनको जानने के लिए सिर्फ़ आपकी दृष्टि नहीं थी, जो दृष्टि आप प्राप्त करें। जब आप उसको जान लीजियेगा, तब आपका ज्ञान मार्ग पूरा हो जाएगा और तभी आप भक्ति कर सकते है। फिर कर्म योग मे भी उन्होने अपनी होशियारी दिखाई है। कृष्ण तो लीला ही करते थे, वो जानते थे कि लीला से ही आप लोग ठीक होंगे तो इसलिए उन्होने लीला की कि कर्म योग में उन्होंने एक शब्द पर सबको नचा दिया कि तू जो कुछ कर्म कर रहा है, वो कर, पर सब कर्म परमात्मा के चरणों मे रख दे। हो ही नही सकता, जब तक आपको आत्मसाक्षात्कार नही मिलता है तब तक आपका अहं भाव कि मैं ये कर रहा हूँ, वो जा ही नहीं सकता। जा ही नहीं सकता क्योंकि आपको यही लगता है कि मैंने ये किया है। तो फिर कोई आदमी खून कर के भी ये कहेगा कि मैंने तो परमात्मा पे छोड़ दिया, परमात्मा ने किया, परमात्मा जानें। ग़लत काम कर के भी कह सकता हैं मैंने परमात्मा पे छोड़ दिया। आपका अहं भाव अभी आपके अंदर है और उस अहं भाव के ही सहारे आप सब कार्य कर रहे हैं और आप हमेशा कहेंगे कि मैने किया, आपके अंदर ये भावना बनी रहेगी। लेकिन जब कुंडलिनी का जागरण  होता है, तो आज्ञा चक्र को जब ये भेदती है, तो आज्ञा चक्र मे दो तरफ से, (श्री माताजी अपने दोनों हाथ अपने सिर पे दोनों तरफ रखती हैं) आप देखते हैं कि आपके अंदर अहंकार और कुसंस्कारों का एक  बड़ा भारी balloon (गुब्बारा) जैसा बना होता है। ये पूरा का पूरा खिच जाता है, अंदर की ओर और आपके ब्रह्मरंध्र से कुंडलिनी  बाहर आती है। 

  तो आपके जो कर्म हैं, जिसको आप कहते कि मैं कर्म भोग रहा हूँ, वो सारे के सारे ख़त्म हो गये। जानवरों मे तो कोई कर्म का विचार भी नही है। एक शेर है वो कोई सा भी जानवर खा सकता है और गाय को मार सकता है, कोई भी काम कर सकता है। कोई भी जानवर कोई सा भी काम करता है, उसे वो पाप नही। मनुष्य ही सोचता है कि पाप है पुण्य है, ये उसके अहंकार की वजह से है की मैने ये काम किया, ये पाप ये पुण्य है। और जिस वक़्त ये कुंडलिनी आपके आज्ञा चक्र को भेदती है उसी वक़्त में आपको आश्चर्य होगा ये पूरी की पूरी दोनों संस्थाएँ खिंच जाती हैं और आप पूरी तरह से स्वच्छ हो जाते हैं और आपके ब्रह्मरंध्र से कुंडलिनी निकल कर के एकाकारिता प्राप्त करती है और इसलिए मैं बार बार आपसे कहती हूँ कि आप सबको माफ़ कर दीजिए और अपने को भी माफ़ कर दीजिए। इसी से आज्ञा चक्र खुलता है। ये दो चीज से आज्ञा चक्र खुलता है। इसका खुलना बहुत ज़रूरी है। तो इस प्रकार उन्होने कर्म की जो बात कही की कर्म अकर्म में उतर गए है। अब जब सहज योग मे आने के बाद लोग जो काम करते हैं, तो वो क्या कहते हैं, वो ये कहते हैं कि माँ ये हो रहा है, ये चल रही है, ये बन रही है।

  देखिए हम एक बार अमेरिका गये थे, तो हमारे साथ एक गयीं थीं। उनका लड़का होलुलू से आया तो वो कहने लगीं कि माँ इसको आप पार करा दीजिए। मैने कहा मुझसे तो हो नही रहा है, तो कहने लगीं कि फिर क्या करें। मैने कहा कि तुम पार कराओ तो कहने लगीं कि मुझसे तो नहीं हो रहा है। तो मैंने कहा इसको झूठा सर्टिफिकेट तो दे नही सकते। इसमें झूठा सर्टिफिकेट तो हो नही सकता(Unclear) सहज योग मे आपको पार होना पड़ता है और उससे आगे भी आपको बनना पड़ता है। ये नही कि आप सिर पे तमगा लगा के घूमें कि हम सहज योगी हैं, हम विश्व निर्मल धर्म के एक अनुयायी हैं, कुछ नही। ना हमारे यहाँ मेंबरशिप है, ना कुछ है, आपको बनना पड़ता है। जैसे एक बीज को पेड़ बनना है, ऐसे ही आपको भी एक वृक्ष बनना है। आप अपने ऊपर तमके लगाकर घूम नहीं सकते कि मै ये हूँ, मै वो हूँ, मैं सहजयोगी हूँ, मैंने ये प्राप्त किया, ये चलने वाली चीज़ नहीं है। ये आपके अंदर घटित होना पड़ता हैं और धीरे धीरे कुण्डलिनी आपको बनाती है और उधर आपको ध्यान देना पड़ता हैं जब तक कुण्डलिनी के जागरण का सवाल है तब तक तो मैं ये कहूँगी कि वो सहज में हो सकता है। लेकिन उसके बाद उसे सवारना पड़ता है, उसे समझना पड़ता है और उसकी उपाध्यता देखते हुए उसका use देखते हुए वो देखते हुए की उसको किस तरह से हम इस्तेमाल कर सकते है| आपको आश्चर्य होता है कि आप स्वयं ही उस शक्ति मे विलीन हो जाते हैं आप ही मे से शक्ति बहने लग जाती है और इतना मज़ा आता है लोगो को पार कराने में, इतना मज़ा आता है (unclear)।

  इस तरह का कार्य सारे भारत वर्ष में होना चाहिए, मैने आपसे कहा था, लेकिन सब से अधिक ये तो के मैं कहूँगी दिल्ली शहर में होना चाहिए क्योंकि दिल्ली तो राजधानी है ना भारत वर्ष की और यहाँ होता क्या है, झगड़े के सिवा तो मैने कुछ देखा नहीं। हर बार  दिल्ली के बारे में पूछो तो यही नज़र आता है  हर बार यही आता है कि ये झगड़ा कर रहे हैं, वो झगड़ा कर रहें हैं। धर्म के नाम पे झगड़ा करना भी महा बेवकूफी की बात है। अरे धर्म कभी भी झगड़ा नहीं सिखा सकता ना। परमात्मा तो रहमत है, रहीम, परमात्मा जो दया के सागर हैं, उनके आश्रय मे रहने वाले कैसे झगड़ा कर सकते हैं।  अब सहज योग मे हर तरह के लोग हैं, हर जाति के, मुसलमान, हिंदू, ख्रिशचियन, हर तरह के लोग हैं और हर लोग इतने आपस में प्रेम से रहते हैं, ये विचार ही नही रहता क्योंकि जिस एक तत्व को पा लिया और उस तत्व में प्लावित हो गये और जब उसके आनंद मे रंग गये फिर ये अनेक और ये जो बेकार के फर्क हैं, खत्म हो जाते हैं और आपको ऐसा लगता है कि मै इस विराट के अंग-प्रत्यंग में एक छोटा सा एक सेल (cell) हूँ। या ऐसा कहिये कि इस बड़े विशाल सागर में मैं एक बिंदु मात्र हूँ, लेकिन वो बिंदु भी खो गया और वो बिंदु खो कर के और एकाकारिता आ गई है। मैं सागर ही हूँ। ये चीज़ हो जाने पर ही आप जानेंगे कि आज तक जो आपने मेहनत करी है। वो सफलीभूत हो गया।

  अब लौट कर जब आप जाएँगे तब आप समझेंगे कि क्या अच्छा है, क्या बुरा है, किस चीज का फ़ायदा हुआ, किस चीज का नहीं, और आप आश्चर्य करेंगे कि परदेश में, जहाँ पर लोगों ने परमात्मा का नाम ही छोड़ दिया और Russia जैसा देश जहाँ की वो भगवान को मानते ही नहीं थे, वहाँ हज़ारों लोग, हज़ारों लोग सहज योग में आ गये। वहाँ की गवर्नमेंट (Government) ने भी सहज योग को मान लिया, यहाँ तक की वहाँ के ministers ने मान लिया हैं। और अपने यहाँ जो हम लोग इतना धर्म धर्म करते हैं, हमारी खोपड़ी में बात नहीं जाती क्योंकि कुछ ना कुछ अजीब सी चीज सिर पे बैठी हुई है जो अच्छी बात नहीं है। अब ये आपके लाभ की बात है, आपकी अपनी शक्ति की बात है आपके अपने उत्थान की बात है और सारे विश्व के कल्याण की बात है, जिसे आप समझ के, सूझ बूझ से प्राप्त करें और उसमें जम जाएँ। आशा है, अगले साल फिर मैं आऊँगी और आप सबको यहाँ पर मिलूँगी और आपसे भेंट होगी। और मैं जानूँगी जिन जिन को भी आज, जिसको भी आत्मसाक्षात्कार मिल गया है और जिनको नहीं हुआ, सबके लिए यही कहना है कि आप सेंटर में आएँ। सेंटर में आ कर के और अपना आत्मसाक्षात्कार पूरी तरह से जान लें और उसको बढ़ाए। और वो समझा देंगे आपको सब अच्छी तरह से, यहाँ पर दिल्ली में बहुत अच्छे सहज योगी हैं। बड़े संजीदा तरीके से आपको समझा देंगे और आप में वो चैतन्य भर देंगे जिसकी हमें आज तक आशा रही| आप सबको अनंत आशीर्वाद |

  किसी ने अपने बेटे के लिए पूछा था तो ये कहना है बेटे का अपना फोटो आश्रम में भेज दीजिए बाद में मैं इस पर विचार करूँगी। और भी कोई समस्या है तो एक एक कर के आश्रम में भेजिए। अब तो आप परमात्मा के साम्राज्य में आ गये हैं, तो ये तो अब हमारा कर्तव्य हो जाता है कि आपकी सब परेशानियाँ, दुविधाएँ, ठीक करें, लेकिन सबसे बड़ी चीज़ है कि अपने को आत्मसाक्षात्कार बना कर के आप स्वयं ही अपने को ठीक कर सकते हैं। क्योंकि जिस पानी में आप डूब रहे थे, उस पानी से आप उठ गए, अब आप नाव में आ गये, उसको आप देख रहे, अब जब आप तैराक हो गये तो उसी पानी में कूद कर के आप हज़ारों को बचा सकते हैं। यही एक बड़ी भारी स्थिति थी जिसके बारे में लोग कहा करते थे, वो आप सहज में प्राप्त करिए। पहले तो आपको निर्विचार समाधि आएगी, जिसे थॉटलेस अवेयरनेस (thoughtless awareness) कहते हैं, जहाँ आप सतर्क रहते हैं लेकिन विचार आपके ठहर जाते हैं। और उसके बाद एक दूसरी स्थिति आएगी है जिसे निर्विकल्प समाधि कहते हैं, जहाँ आप में कोई विकल्प नहीं रह जाएगा और इस चैतन्य लहरियों से आप अनेक कार्य कर सकते है। आशा है आप लोग पूर्ण विश्वास से अपने उपर भी विश्वास रखें और पूर्ण विश्वास से इस कार्य को करें और ऐसा ना हो कि आधे अधूरे रह जाएँ जैसे कि कोई बीज उगाये थे और वो सड़क पर पड़ गए, इस तरह से ना हो जाए। आप लोग सब वृक्ष बनने के काबिल हैं आप पढ़े लिखे हो, चाहे आप छोटे हो, चाहे बड़े हो, रईस हो, ग़रीब हो, कोई जाति, धर्म, पंथ कहीं के भी रहने वाले हो, किसी भी देश के हो, सबके लिए ये हासिल हो सकता हैं इसे आप सब लोग प्राप्त करें यहीं एक माँ की विनती है।