Public Program Day 1

New Delhi (भारत)

1991-03-02 Public Program Day 1, New Delhi, India (Hindi), 101' Add subtitles:
Download video (standard quality): Download video (full quality): View and download on Vimeo: View on Youku: Listen on Soundcloud: Transcribe/Translate oTranscribe


Sarvajanik Karyakram Date 2nd March 1991 : Place New Delhi Public Program Type : Speech Language Hindi

[Original transcript Hindi talk, scanned from Hindi Chaitanya Lahari]

सत्य को खोजने की जो सत्य को खोजने वाले आप सभी साधकों को हमारा नमस्कार । आवश्यकता हमारे अंदर पैदा हुई है, उसका क्या कारण है ? आप क हैं गे कि इस दुनियां में हमने अनेक कलयु ग में मनुष्य भ्रांति में पड़ गया है, परेशान हो गया है । उसे समझ नही आता कि ऐसा क्यों हो रहा है । तब एक नए तरह के उसको विल्यिम ब्लेक ने ‘मैन । चारों तरफ हाहाकार दिखाई दे रहा है । कष्ट उठाए तकलीफें उठाई मानव की उत्पत्ति हुई है, एक सुजन हुआ है । उसे साधक कहते हैं ऑफ गाड’ कहा है । आजकल तो परमात्मा की बात करना भी मुश्कल है फिर धुम की चर्चा करना तो ही कठिन है क्योंकि परमात्मा की बात कोई करे तो लोग पहले उंगली उठा कर बताएँ गे कि जो में, मस्जिदो में चर्चों में गुल्द्वारां में घूमते है, उन्हंने कोन से बड़े इन्होंने कोन-सी बड़ी शांति से सन्मार्ग से चलते हैं । किसी भी धर्म में कोई भी मनुष्य हो किसी भी धर्म का बहुत लोग बड़े परमात्मा को मानते हैं, मन्दिरों भारी उत्तम कार्य किए है ? आपस में लड़ाई, झगड़ा, तगाशे खड़े किए हैं । दिखाई है ? ये कोन पालन करता है, परमात्गा को किसी तरह से भी मानता हो, लेकिन हर एक तरह का पाप वो कर सकता है । उस पर किसी भी तरह का वंधन नहीं, कोई रोक अभिप्राय: है ? ये धर्म किस काम को ? जब ऐसा हमारे सागने नजारा आ जाता है तो घबरा जाते हैं कि टोक नहीं, फिर ऐसे धार्मिकता का क्या क्या बात है ? लेकिन, अगर आप इस चीज को एक वैज्ञानिक, तरीके से देखना चाहे और दिमाग खोलकर सोर्च तो, आपको एक बात समा में आ जाएगी कि धर्म के तत्व को वकिसी ने भी नहीं पकड़ा । और धीरे धीरे राब उस घर्म से च्युत होते गए, हट ते गए । सारे धर्मों में जो इनके प्रणय ता ये, जो अवतरण थे जो महागुरू थे, उन्हनि एक वात कही थी कि पहले तुग अपने को खोज लो । काहे रे बन खोजने जाए, सदा निवासी, सदा अलेपा तोहे संग समाए । कहे नानक, “विन आपावीन्है मिटे न भ्रम की काई’। सो। नानक साह व ने कहा, अनादि काल से यही। बात सबने कहीं । कुरान में भी लिखा हुआ है कि तुम्हें बली होना है, तुम्हें रूह को जानना है । । ईसा ने कहा, कोनसा ऐसा शास्त्र है जिसमें ये लिखा नही है जब तक तुम्हारा दूसरा जन्म नहीं होता है, तुम सगा नहीं पाओ गे । कवीर ने कहा, ‘कैसे समझाऊँ सब जग अंधा ।’ अंधे को अगर आप बताना चाहे कि ये रंग कोन से हैं, तो बो समझ नहीं पाए गा । उसको बताने से फायदा नहीं । इस तरह की एक बड़ी रागस्या सगाज के सामने, अपने इस विश्व के सामने आज खड़ी है । इसका एक ही इलाज है कि आखं खुल जानी चा हुए आपकी । जब तक अखि आपकी बेकार की किताबें पढ़ नहीं खुलेगी, वेकार की बार्त हो जाएगी, बात की बात रह जाएगी आपस में लड़ते ही रहै गे । इसका कोई इलाज होने ही नहीं । इसका इलाज है ‘परिवर्तन पढ़ करके । और इस 2 औ

परिवर्तन के ‘लिए कुछ न कुछ तो ऐसी विशेष व्यवस्था उस परमेश्वर ने जरूर करी होगी । क्या उसने हमें इस दुनियां में इसलिए भेजा है कि हम अपने जीवन को ऐसे भ्रांति में खो दें ? हमारे जीवन का कोई भी अर्थ न निकले ? कि हम अपना जीवन इस तरह से लड़ाई, झगड़ा घर गृहस्थी, इधर उधर की बातों में खत्म कर दे ? क्या हमारे जीवन का यही एक मूल्य है ? क्या इसका कोई और मूल्य नही ? इसकी कोई कीमत नहीं ? इसलिए क्या हम अमीवा से इंसान बने ? कोई न कोई तो विशेष काम होगा, जिससे परमात्मा ने हमें एक मानव का रूप दिया । और जब यह जागृति आपके अंदर आ गई कि, हमें सत्य को जानना है । कि इसकी दुकानें खुल गई और दुकानों में चीज़ बिकने भी लग गई । पैसे वाले सोचते है वो भगवान को खरीद सकते हैं । हो सकता है, यह सब गड़बड़ियां हो गई और उसमें भी बहुत से लोग बहक गए । किन्तु, असत्य है तो सत्य होना ही चाहिए । और बो सत्य क्या है ? उसे जान लेना भी एक परम कृत्त्तव्य है । उसके बाद सब धर्मों का अर्थ निकलेगा क्योंकि यही सबका सार तत्व है । उस तत्व को छोड़ने के कारण ही तो ये आज हमारे सामने अनेक तरह की रूकावटें आ गई । और हम धर्म की ओर मुड़ना नही चाहते । दूसरी बात ये भी है कि विज्ञान में धर्म की कोई चर्चा ही नहीं है । धर्म के बारे में कोई बोलता नहीं और आज सारा जमाना विज्ञान में ही चल रहा है । विज्ञान के सामने फिर हम झुक जाते हैं कि विज्ञान तो कोई धर्म की बात ही नहीं करता । लेकिन विज्ञान जिन वस्तुओं के बारे मैं कहता है, जिन तत्वों के बारे में बोलता है उन सब में उनके धम हैं, उनकी मर्यादाएं हैं । जो सोना है उसका एक धर्म है । वो धर्म नही बदल सकता विज्ञान कार्बन का भी एक धर्म है, पशु का भी एक धर्म है । अब मै मानती हूं कि जैसे आपने कहा पशु भी परमात्मा के पाश में है और जो जड़ वस्तुएँ हैं, जितने भी जड़ तत्व है, बो सब परमात्मा के पास मैं है । इसमे भी उसकी मर्यादा है । ऐसे ही मनुष्य में भी उसकी मर्यादा है । मनुष्य की दस मर्यादाएं हैं जो हमारे अंदर भवसागर में उसका वाक्तव्य है । आदि गुरू दत्त्रेय से लेकर जो भी महान गुरू हो गए, जिन्होंने अनेक बार जन्म लिया, उन्होंने हमारे अंदर धर्म की मर्यादाएं बिठाई है । पर इस धर्म की जब तक जागृति नहीं होगी, जब तक हम उस धर्म के साथ एकाकारिता नहीं स्थापित कर लेते, तब तक धर्म केवल बाहय काम हो जाता है । लोग कहते हैं, ‘माँ हम इतनी पूजा – पाठ सब करते हैं पर अंदर कोई शांति ही नहीं । सो आप परमात्मा की बात कैसे कर रहे हैं ? हमने कहा कि अब परमात्मा का अनुभव लेने का समय आ गया है, इसे ले लीजिए । एक सर्वसाधारण बुद्धि से भी सोचिए कि सब चीजों के लिए आप पैसा कैसे दे सकते हैं ? कोई आपसे पैसा मॉँगता है तो आपको पूछना चाहिए कि इसका पैसा कैसे दे सकते हैं हम ? क्योंकि ये एक जीवंत क्रिया है । आप अमीबा से इंसान हुए तो कितना पैसा आपने दिया था ? और जब ये फूल धरती माता ने आपको दिए थे तब धरती माता को आपने कितने पैसे दिये थे ? अगर कोई जीवंत क्रिया है तो उसको आप पैसा कैसे दे सकते हैं ? धरती माता पैसा समझती है सम क्या ? जब ये बात आप समझ लें कि ये एक प्रक्रिया है जो निसर्ग से आपके पास है और जिसे आप निसर्ग से ही प्राप्त कर सकते हैं, ये हमेिशा सहज माने स्वतः होती है । उसके लिए आपके अंदर ही सब कुछ बंधा हुआ है जैसे एक बीज में सारे पेड़, फल, पत्तियां और पुष्प जो कुछ बनने वाले है, एक छोंटे से बीज में उसका सारा चित्र है । उसी तरह से आपके अंदर भी इसी तरह का पूरा एक चित्र बना हुआ

है । अब ये कहना कि साइंस में ये चीजें नही है तो सब चीज विज्ञान में है क्या ? विज्ञान में प्यार की कोई बात है ? बताएँ कि माँ बच्चे से क्यों प्यार करती है ? मनुष्य अपने देश से क्यों प्रेम करता है ? बताएं । इसका कारण विज्ञान दे है । जो आँखों के साथने सक ती है ? विज्ञान तो बहुत ही सीमित चीज दिखाई देता है, वही वो बता सकते हैं, और हजारों चीजें ऐसी है जो विज्ञान नहीं बता सकती । इतनी सीमित है । क्योंकि ये जो दृश्य हम देखते है उसी को जानने का एक तरीका है, वो विज्ञान से समझ सकते हैं । पर, कहां तक ? एक मिट्टी का कण भी तो हम नहीं बना सकते अपनी तरफ से । जो उधर से बदल दिया । कोई पेड़ टूट गया तो मकान बना दिया, और बना- बनाया है उसी को इधर सोचने लगे वाह वाह हमने क्या काम कर दिया । अरे । मरे से मरा बनाया । कौनसा काम किया तुमने ? जिंदा काम कर सकते हो ? तो अंहकार इसा से आता है । जब मनुष्य सोचता है कि मैं ये करता हूँ, वो करता हूं, मैने ये विज्ञान ने जो किया वो देख ही लिया आपने किया, मैने वो किया । । सददाम साहब का क्या हाल कर दिया, और आगे क्या होगा भगवान जाने । तो विज्ञान की सीमा को देखते हुए आपने जानना है कि इस विज्ञान से परे एक और विज्ञान है । यह विज्ञान परमेश्वरी विज्ञान है । उसे देवी विज्ञान कह सकते है । लेकिन ऐसा कोई विज्ञान है, ऐसी कोई चीज़ है, इस पर लोग अबिश्वास करेंगे । लेकिन यह है, और इसके बारे में हज़ारों वर्षों से, इस भारतवर्ष में अनेक शास्त्रों में लिखा गया है शताब्दी में श्री ज्ञानेश्वर अपने गुरू से इसके विषय में लिखने की आज्ञा माँगी मुझे सर्वसाधारण मराठी भाषा । इतना ही नहीं, बारहवीं मैं यह सत्य क हने की तो आप इज़ाजूत दे दीजिए । इजाजत मिलने पर ज्ञानेश्वरी गीता मैं ये बात उन्होंने लिखी ज्ञानेश्वरी, जो कि गीता पर टिका है, उसके छठे अध्याय में उन्होंने साफ कुण्डलिनी के बारे में कि ऐसी आपके अंदर शक्ति है जो जागृत हो सकती है । साफ – साफ लिख दिया । लेकिन धर्ममार्तण्डों, धर्म के नाम पर पैसा बनाने वालों को क्योंकि कुण्डलिनी जगाना आता ही नही था इसलिए उन्होने ज्ञानेश्वरी साफ लिख दिया के छठे अध्याय को बेकार कह कर निषिद्ध घोषित कर दिया । उसके बाद तुका राम, करबीर, रामदेव और नानक साहब ने यह बात, महाराष्ट्र, पंजाब, बिहार और हर जगह कुण्डलिनी के बारे में कहा । उन्होंने बताया कि कुण्डलिनी नाम की शक्ति हमारे अंदर स्थित है । जब ये कुण्डलिनी आपके अंदर जागृत हो जाती है तभी आप चारों तरफ फैली हुई इस परमात्मा की शक्ति, जिसे हम परम चैतन्य कहते हैं, उससे एकाकारित प्राप्त करते हैं । इसका संबंध (योग) इसके स्रोत से हो अर्थ ही नहीं लगता है । ये जाता है । जब तक आपका योग ही उससे नहीं होता, तब तक आपका कोई बात बाद में सबको कही गई, बताई गई । जनसाधारण तक, ये बात तब आई । का आज तक जो कुछ हुआ है जो कुछ कहा गया है सहजयोग में बो प्रत्यक्ष में, अनुभव से कहा गया । इतना ही नहीं कि इसे आप प्राप्त करें, इतना ही नहीं कि जनसाधारण इसे प्राप्त करे, पर सहजयोगियों के पास ये भी शक्ति है कि वो और लोगों को भी दे सकें । ये होना ही था । ये जो चिजली आप देख रहे ह टिमाता हुआ एक बल्ब जला लिया था एडीसन ने, हैं पहले एक कही पर टिम

जागृत के कार्य की अनाधिकार चेप्टा कर ते हा । आग जो चात में आपके सामने रखना चाहती हूं वो ये कि आप अपने को ये सगडों कि हग मानव स्थिति में तो आ! लेिन, इससे भी क ऊँची स्थिति है, जिस स्थिति को हम आत्मसाक्षात्कारी कहते हैं । जिसको हम साक्षात्कारी मानव कहते है, जिसको द्विज (पुनः अवतरित) कहते तो उसके अधिकार, उसकी सारी शक्तियाँ आपको मिल जाती है क्योंकि ये सव नि हित है, अंदर ही है, बंधा हुआ है तो मिलना ही हुआ । तो पहले से शंका मत करिए । पहली वात यह है कि, आपको जानना चा हिए कि क्राति में, विकास में आप चरम शिखर पे हैं । जहां अप वेठे हैं वहां से साढ़े तीन फुट से हैं । ये एक वास्तविक स्थिति है । जब आत्म साक्षात्कारी आप हो जाते हैं ज्यादा आपको चलना नहीं । ओर ये कार्य पटित हो जाता है क्योंकि आप साधक है अनेक जन्मों के दैना आपके पुण्य हैं और उन पुण्यों के फलस्वरूप ये आप सहज में प्त कर लेते हैं । मेरा लेना कोई नहीं बनता, ये भी समझ लीजिए क्योंकि एक अगर दीप हैं तैयार और दूसरा जला हुआ दीप है । । तो उस दीप का कोन सा वड़ा भारी उपकार हो गया अगर वो उसे छू ले तो ये दीप जल जाए गा जेत क्योंकि ये दीप भी तो दूसरे दीप जला सकता है । इसी प्रकार सहजयोग में जव आप इसे प्राप्त करते हैं तो आपकी शक्त से ही आप अन्य लोगों को भी पार कर सकते हैं। । इरसी तरह से सहजयोग फैल रहा । ऐसा कहते हैं कि 54 देशों में सहजयोग का कार्य चल रहा है । हालांकि, मैं सब देश में तो नहीं गई हूं लेकिन, कम से कम तीस देशों में मने देखा है कि यहगयोग बहुत जो रो फैल गया है । है हम रूस गए थे । तो चौद ह हजार, सोलह हजार से कम लोग नही आए । कभी हमें देखा नहीं था नहीं था । सिर्फ फोटो देखकर के वो लोग आए । उन्होंने सोचा कि कुछ न कुछ तो है इनकी शक्ल में सब पार हो गए । मैं तो हैरान हो गई कि इन्होंने कभी भगवान का नाम नहीं सुना, कभी इन्होंने कोई घर्म की बात नहीं करी । ये लोग कुछ भी नहीं जानते, विचारे । ये कैसे पार हो गए ? परन्तु धर्म के नाम पर जो कुसंस्वार हम लोगों के बन गए हैं उनकी कभी कावरटे आ जाती है तथा मिथ्यावाद को हमें त्याग देना चाहिए । इससे जाना | पता नही कैसे मे हैरान । और सबके वजह से हम में कभी धर्म बदनाम हो रहा है, हमारे कषि -मुनी बदनाम हो रहे हैं । स्स मे जहाँ पर कि लोगों ने कभी मने सोचा जैसे कोई एकदम साफ सुथरी कोई चद्दर थी । ‘दास कबीर धर्म का नाम ही नहीं सुना । जतन से ओढ़ी और एकदम से पार हो गए और गहरे उतरने लगे । बड़े आश्चर्य की बात है । और हम जो सब उसके बारे में सुने मैं खड़े विवाद गो सव जानते हैं, वड़े ज्ञानी लोग हैं हमारे ऐसे अगर कोई वाद है, हों तो आपको लगेगा कि समुद्र में ही कूद पड़ो । लेकिन, अंदर खोखले हैं क्ल्कुल । ऊपरी तरह से जो हमने इतना कुछ जाना है और सगझा है, इस चीज की वजह से हमारे अंदर जो असलियत है उतर नहीं पाती क्योंकि नकलिएत को हमने असली मान लिया है । तो पहली चीज है कि इस तरह के कुसंस्कार है वहुत गलत है । वो आप समझ जाइए गा कि, ये गलात है । जैसे अभी एक साहब ने बताया गुरओं के चक्कर ‘ । ये भी वहुत है । जो हमारे गुरू थे फलाने, उन्होने हमको नाम दिया । अरे कि ‘ भई, नाम देने को गुम् काहे को चाहिए । गधा भी दे सकता है, नाम गुरू काहे को चाहिए ? मनुष्य को समझना चाहिए कि जो सत्य है, वो हम पैसे से नहीं मिल सफता । सत्य को आप खरीद नहीं सकते । और सत्य जो भी हें मिला है आज तक वो इन्सान होने के नाते हमारे मस्तिपक में, हमारे केन्दरीय स्नायु है । किसी के लेक्चरबार्जी से तंत्र पर यह हमारे शरीर में न्सो की तरह से बह रहा है, उसी से जाना

और उसके बाद आज संसार जगम ग है क्योंकि जो चीजू इस संसार के उद्धार के लिए, इस संसार को उठाने के लिए है, इसको संपूर्णता में लाने के लिए बनाई गई है वो जरूर आनी ही है । इसलिए बो आई है । अब जब हम सत्य को खोज रहे हैं तब हमें जान लेना चाहिए कि सत्य क्या है ? सत्य की खोज क्या है ? सीक्षप्र में सत्य को जानना माने अपने आत्मा को जानना है । उसको जानते ही चारों तरफ फैली हुई परमात्मा की शक्ति को भी जानना है । अब जानना शब्द जो है, उस पर हम लोग गड़बड़ कर जाते हैं । जानने का मतलब बुद्धि से नही । बुद्धि से तो बहुत लोग जानते हैं । सुबह से शाम तक पाठ चलते रहते हैं । मैं आत्मा हूं, । जानने का तवार अहम् ब्रहमस्मि । और फिर भ्रम में लडने भी लग जाते हैं मतलब है अपनी नसों पर अपने केन्द्रीय स्नाय तंत्र पर आपको जानना है । इसी को बोध कहते हैं, विद कहते हैं जिससे वेद हुआ । इसी ‘न शब्द से ज्ञान बना उसी से बली हुई कश्यप हुए । हरेक धर्म में दो, एक – दो, ज्यादा नही । माने गए लोग होते हैं कि जो आत्म साक्षात्कारी हों । लेकिन एक कार्य कलयु ग मैं ही होना था । एक तरफ तो कलयु ग का गहन अंधकार, अज्ञान और पहाड़ों जैसा अहंकार और ये पहाड़ो जैसा जो अहंकार है वो रोकता है इंसान को कि इस कलयु ग मैं हम इस ज्ञान को प्राप्त कर सकते हैं । । किसी से भी बात कीजिए जवाब मिलेगा हो ही नही सकता, आश्चय, असंभव लेकिन, जब हो सकता है तो क्यों न इसे प्राप्त करें ? और ये सहज ही है । सहज । इंसान कभी सोच भी नहीं सकता हुम इस शक्ति को प्राप्त कर सबते हैं ‘सह’ माने आपके साथ, ‘ज’ माने पैदा सहज का दूसरा अर्थ होता है ‘आसान’ क्योंकि ये योग आपका जन्म सिद्ध अधिकार है। हुआ । य । ये बहुत ही आवश्यक तत्व से भरी चीज है वो होना ही चाहिए । आसान’ जैसे कि हमारा श्वास लेना बहुत जरूरी है तो बो आसान है । यदि श्वास लेने के लिए गुरू बनना और सब करना आवश्यक हो तो कितने लोग जीयें गे । और ये गुरू बनाने का भी रिवाज बन गया है यहां पर । अरे भई । वो तो गुरू बने हैं, तुम कौन हो ? तुम तो अभी भी वही बने हो पैसा भी नहीं लेते । ऐसे बहुत से गुरू हैं पैसे वैसे नहीं लेते, अच्छे हैं बिचारे । अच्छी बात है । पर । तो फायदा क्या ऐसे गुरू को रखने से ? मानों तुमको कुछ बनाएं गे न तभी तो तुम ही क्यों न अपना गुरू बन जाओ ? बहुत आसान है सहजयोग में आप ही अपने गुरू हो जाते हैं । आप ही अपने को जान जाते हैं और सारा ज्ञान आप ही के सामने आ जाता है । कुण्डलिनी का जागरण के समय बहुत लोग कहते हैं कि बड़ी तकलीफ होती है, गर्मी होती है और परेशानी होती है । कुछ नहीं होता । क्योंकि कुण्डलिनी आपकी मां है, ये समझ लीजिए । ये आदि अपनी व्यक्तिगत मां है ओर ये हैं शक्ति मां का ही आपके अंदर प्रतिबिम्ब है, ये आपकी अपनी आपकी शुद्ध इच्छा की शक्ति । आपकी मां ने जब आपको जन्म दिया था तो आपको क्या तकलीर्फे दी बिचारी ने । सारी तकलीफे तो खुद ही उठाई । तो इस तरह की भी बातें बहुत से लोग करते हैं कि इसमें बड़ी तकलीफ होती है । शायद वो नही चाहते कि आप कुछ पा लें, या वो जानते ही नही और तीसरा यह हो सकता है कि वो गलत लोग हों, उनको कुछ मालूम ही न हो । तो हो सकता है वे म

कुछ नही होता । ये अंदर की जागृति से ही होता है और जब इसकी जागृति हो जाती है तब मनुष्य समझता है कि मैं कितना गौरवशाली हूं । मै कितना विशेष हूं । मेरी क्या व्यवस्था परमात्मा ने कर रखी है । और हर क्षण ऐसा लगता है कि किसी नई दुनियां में आप आनंद मग्न हैं । जीवन चमत्कारों से भर है. जाता है । हर सहजयोगी के इतने अनुभव है कि उन्हें लिखने की भी सामर्थ्य उनमें नही । हम जानते ही नहीं उस परमात्मा के प्यार को, उसकी शक्ति को और जो वह हमें देना चाहता धर्म के नाम पर उपचास करना, शरीर को कष्ट देना आदि कुसंस्कार ब्राहूमणाचार ने हमें दे दिए आप सोचिए कि कोई पिता अपने बच्चों को कष्ट में देखकर प्रसन्न हो सकता है ? माँ को यदि आपने सताना हो तो आप खाना नही खाते । ये सब पाखण्ड हमारे देश में इतने फैले है कि इन्हें छोड़ना बहुत गास मुश्किल है । प्रेम के सागर परमात्मा तो चाहते हैं कि आप आनन्द में रहें । आत्मसाक्षात्कार के बिना धर्म का मर्म आप नही समझ पाते, इसीलिए धर्म के नाम पर इतना कष्ट आप उठाते हैं । कितना बड़ा ये विज्ञान है कुण्डलिनी का | कैसे मूलाधार पर बैठी है । कैसे ये उठती है । इसकी जागृती जब होती है तो सब्से पहले आपकी शारीरिक व्याधाएं दूर हो जाती है । कैंसर , कैंसर तक ठीक हो जाता है । ऐसे लोग यहां मौजूद है । पर यह तभी हो सकता है जब नमता और ब्लड ३ शुद्ध इच्छा पूर्वक आप हम से मांगे और अपनी जागृति करवा लें । यहां दिल्ली में तीन डाक्टरों ने इस पर एम.डी. पाई है । इनमें से एक का विषय सहजयोग द्वारा अस्थमा रोग का इलाज था । कुण्डलिनी जागृत होकर हमारे सारे चक्रों को प्लावित कर देती है इसके पोषण से चक्र ठीक हो जाते हैं और हम मानसिक, शारीरिक बौद्धिक और आर्थिक उन्नति की ओर बढ़ते हैं । पर यह बाद आपको कोई बिमारी ही नही होती । कारण यह कि सहजयोग में आने के बाद जो ध्यान धारणा तथा प्रगति आपने करनी होती है वो आप नहीं करते फिर भी आपके कष्ट बहुत घट जाते हैं । भी नहीं कि सहजयोग में आने के सहजयोग में आने के बाद एक महीने में आप पूरी तरह से सहजयोग को समझ सक ते हैं और उसमें उतर भी सकते हैं । प्रकार रोज अपने चक्रों को भी आपको साफ करना पड़े गा । इसके लिए दस मिनट से ज्यादा नहीं चाहिएँ । ये इतनी सहज, सरल पद्धति है । जैसे भी आप हैं पहले साक्षात्कार पा लीजिए । थोड़ा सा भी प्रकाश पर जिस प्रकार रोज हम लोग स्नान करके अपने शरीर को साफ करते है उसी अगर आ जाय तो काम हो जाता है । अंधेरे में रस्सी समझ कर गर आपने सांप पकड़ा हो और अचानक रोशनी हो जाए तो आप फौरन सांप को फेंक देंगे । इसी तरह कुण्डलिनी जागरण के प्रकाश में आप स्वयं ही सब बुराइयां छोड़ देंगे । सभी तरह के तनावों से मुक्त हो कर आप शांति को पा लेते हैं । तनाव (टैन्शन) रोग आज कल बहुत फैल गया है पहले ये रोग किसी को होता ही नही था क्योंकि लोगों की जरूरते बहुत कम थी और बो बहुत सादा जीवन बिताते थे । पर आज ऐसा नहीं है ।

बड़ी संस्थाएं बन रखी है और लोगों से लाखों रूपये ऐंठे जा तनाव से मुक्ति दिलाने के नाम पर बड़ी – रहे हैं । जब आपकी कुण्डालनी चढ़ जाती है तो आप निर्विचारिता में आ जाते हैं और तनाव अपने आप समाप्त हो जाते हैं । हमारे अन्दर तीन नाड़ियां है । इड़ा, पिंगला, सुषमन नाड़ी रे ‘ कहा है कबीर दस जी ने सुपुम्ना नाड़ी हमारे सूक्ष्म नाड़ी तंत्र (पैरा सिम्पथेटिक नवस है । और बायीं ओर ईड़ा तथा दायीं ओर पिंगला नाड़ियां बायें और दायें स्नायु तंत्र को प्लावित करती है । इस प्रकार हमारे स्वायत्त स्नायु तंत्र (आटो नोमस नवस सिस्टम) का कार्य स्वचालित (आटो ये । ं । सिस्टम ) को प्लाविव करती है पोषण करती बोर्न) हैं । स्वचालित पद्धति क्या है ? ‘आटो यही आत्मा है इसके विषय में डाक्टरों को कुछ पता नही उन्हें बायें और दाये स्नाय तंत्र में अन्तर नही पता। हालांकि अब वैज्ञानिकों का ध्यान इधर जाने लगा है । लेकिन सहजयोग में आप एकदम जान जाते हैं कि जब आप बायी ओर होते हैं आप भूतकाल में रहते अवचेतन में पहुंच जाते हैं, सामूहिक अवचेतन में चले जाते हैं । तो ईड़ा नाड़ी का काम यह है कि जो भी काम हम करते हैं उसे वो हमारे पास में भरती जाती है । इसके कारण जो । हमारे सभी अच्छे या बुरे – जैसे भी हों, इस नाड़ी की तरफ से बनते हुए लहरों की तरह बायीं ओर को चेतन बना है और हमारे अन्दर है । उसके बाद हमारे जो अनेक जन्म हुए हैं वो भी उसी में हैं । माने हमने पशुयोनी से निकलकर मनुष्य रूप में जो जन्म लिये बो भी इसी रूप में है । आज भी एक पल, जो अभी आप यहाँ है, पिछली बातें सोचते हैं और अन्त में सुप्त भी हमारे शरीर में कार्य है वो संस्कार युक्त हो जाते हैं संस्कार तब से ही हमारे अन्दर को सुप्त बड़ते जाते हैं । जब से ये संसार बना है ि है, और जो पल आया और गया, वो भी हमारी पूरी बांयी तरफ से है । हमारे दांयी ओर मैं जो व्यवस्था है वो ऐसी है कि जो भविष्य की ओर नजर करे । उसमें हमारा शारीरिक कार्य होता है और जिससे हम भविष्य के बारे में सोचते रहते हैं – कि कल क्या करना है, परसों क्या करना है । ये सारा कार्य दांयी तरफ से होता है । तो दांयी तरफ से कार्य करते वक्त जो कुछ भी शारीरिक कार्य हमें करने हैं वो रह जाते हैं क्योंकि हम सोचते ही रहते हैं इसलिए जो लोग बहुत ज्यादा सोचते हैं उनके लिए आजकल की बहुत सारी समस्याएँ खड़ी हो जाती है । इसका एक कारण यह है कि वो लोग एकागीय है, दांयी ओर के है । दांयी ओर झुका हुआ मनुष्य सदा आने वाले कल के बारे में सोचेगा और योजनाएँ बनाये गा । आज तक कभी कोई योजना ठीक हुई है ? योजना की असफलता से निराशा ही हाथ लगती है । तो हर वक्त भविष्य के बारे में सोचने बाला व्यक्ति दांयी ओर को होता जाता है । ऐसे आदमी को भी बहुत सारी बिमारियाँ हो जाती हैं । पहली बिमारी उसको लीवर की हो जाती है दूसरी बिमारी लीवर की गर्मी की है जिसकी वजह से अस्थमा की विमारी हो सकती है | काी ऐसे मनुष्य को दिल का दौरा आ सकता है, अंगघात हो सकता है । लीवर की गर्मी जब नीचे की ओर जातीं है तो ऐसे आदमी को जानलेवा गुरदा रोग हो सकता है । उसे कब्ज के रोग भी सकते हैं । जब

हमारे अंग आलसी हो जाय, (लैथाजिक) हो जाय उस वक्त हमें दांपी और की विमारयां हो जाती है । अपन का सताता है दाया ओर का आदमी दूसरों को सताताहै और जा बांयी और का होता उसका हाथ टूट रहा है और कभी पर कभी उसे जोड़ों का दर्द हो जाता है । सत दिन अपने लिए रोता ही रहता है । भी वायो और का रंग है । दिल बा दौरा दूसरी चीज है बांयी ओर के व्यक्ति की मांस पेशियां क्षीण होती जाता है । ये बिमारियों डाक्टर लोग ठीक नहीं कर सकते । कभी है वो । एन्जोइना हृदय शुल) बाया ये बिमारियों नहज में हो ठीक हो सकती है । फिर ऐपीलल्सी (मिरगी) का रोग है । किसी किसी का तो दिमाग खराब हो जाता है इस तरह की सारी मानांसिक विमारियां गा कि शरीर पर दिखाई देती है वो बांबी और की विमारियां हैं होता है । । पागल आदमी को कभी दिल का दोरा नहीं पड़ता क्योंकि वो बांयी आर इस तरह बांयी और दांयी दोनों ओर की बिमारियों को तहजयाग में आप एक साथ ठीक कर सकते हैं सुपुम्ना साग से जब कुण्डलिनी ऊपर को पढ़ती है तो आप के चित्त को दांयी और बांयी और से खींच कर मध्य में ले जाती है । लेकिन यदि मनुष्य बहुत अधिक वांयी या दांयी और का हो और उसी तरफ से अचानक कोई अधिक जार केन्द्रिय ल्नाय तंत्र पर बने किती चक पर पड़ जाये तो यह चक्र टूट भी सकता है और मुनुष्य का सम्बन्ध पूरे में ल्दंड से टूट सकता है । और हो गई आपको । इस तरह के रंगों को मनोदैहिक (साई को सामेटिक) रोग कहते हैं । इन बिमारियों को डॉक्टर लोग ठीक नहीं कर सकते हैं परन्तु सहजयोग में इन्हें ठीक करने के आसान तरीके हैं । सहजयोग में मूलभूत सात चक्र हैं और तीन नाड़ियां । इन्हें ठीक करने से ज्यादा कुछ करना ही नहीं है । जिस ऑर को रोग हो उसका इलाज कर लो । कैसर जेसी बिमारी वहुत आसान है । कोई पेड़ वदि बिमार है ता उसके सूल में उतर । उसके पत्तों का इलाज करने से कोई फायदा नहीं । अपने रोगों कर उसकी जड़ां का इलाज करना होगा को ठीक करने के लिए आपको अपने मूल में उतरना होगा । सूक्ष्म बनना होगा । इसके लिए आपको आत्म साक्षात्कार चाहिए । पर आजकल इस पर कोई विश्वास ही नहीं करता । अपनी आंख को देखिया े, क्या कमाल का कैमरा है और आपका दिमाग क्या कमाल का कम्प्यूटर है । आप क्या कमल के बने हुए है । इसकी जो आत्नमिक चीज है उसके ज्ञान को प्राप्त करें । जब आत्म साक्षात्कार द्वारा सभी लोग उस हैं। कैवल ज्ञान को प्राप्त कर लेंगे तो सब झगड़े समाप्त हो जाये गे । वही सत्य है और वही परमात्मा का ार प्रेम भी है । आपकी कुण्डलिनी ऐसी उठती है ‘शोभना सुलभागति’ धीरे उठती है । किसी की खटाक से भी उठती है । पर लेकिन आपको पता भी नहीं चलेगा क्यांकि यह बड़ो शोभा से बड़े आराम से धीरे चारों तरफ फैले हुए परमात्मा के प्रेम को कार्य है छोटे से, कोमा के आकार के, कण चमकते हुए दिखाई देते है । यही सोचते है, सब जानते हैं, संयोजन करते हैं और सबसे बड़ी बात है कि ये प्यार करते है । जब आप पार हो जাयें गे तो वातावरण में छोटे इतने इतने प्यार के इंतने सुन्दर, सुलभ मनभावन संयोजन को देखकर आप आश्चर्य चकित रह जाये गे । और सोचेंगे कि मैरे जीवन की सारी योजना पहले ही बन चुकी है । लंदन जैसे शहर में जहाँ हजारों लोग बेरोजगार है वहाँ पर आश्चर्य की चात है । हम समझ जाते हैं कि जब सारा ही कि एक भी बेरोजगार सहजयोगी मिलना मुश्किल है। इन्तजाम बो करने वाला है तो हम बेकार में परेशन हो रहे हैं । उसका प्रत्यक्ष हो जाता है । केवल ज

आको ने कप नवय ना ह। कुण्डलिनी का जागरण अनदर आ । क लि। भीना चाहिगए ह । होना आवश।। हो जाय कि ताया कि आप. मन की रचना । सव । ये ह नहीं सोचें कि ये बेकार की नााल्कार पाने की इच् ता हो गाये] । इस का। कीमत आप अकि । चीग है । नहजयोग का बहाने के एबहुत लोगो ने त्याग ये उन्हीं की मैहनत से आज सहजयोग कि यह स्थिति आ गई है कि आपकी विना किसी मेहनत के फल प्राप्त हो जाती है । इसलिए मां का आपसे अनुरोध है कि संदेह की छोडकर अपनी जागात का आप्त कर लें । ईश्वर आपको आशीवादित करे ।