Birthday Puja Talk

New Delhi (भारत)

1991-03-10 Birthday Puja Talk, Delhi, India (Hindi), 29'
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Birthday Puja, Delhi, India, 3rd of Octoer, 1991

आज आप लोगों ने मेरा जन्म-दिवस मनाने की इच्छा प्रगट की थी I अब मेरे कम-से-कम चार या पांच जन्म-दिवस मनाने वाले हैं लोग I इतने जन्म-दिवस मनाइएगा उतने साल बढ़ते जाएंगे उम्र के I लेकिन आपकी इच्छा के सामने मैंने मान लिया कि इसमें आपको आनंद होता है, आनंद मिलता है तो ठीक है I
लेकिन ऐसे दिवस हमेशा आते हैं I उसमें एक कोई तो भी नई चीज हमारे जीवन में होनी चाहिए, क्योंकि हम सहजयोगी हैं, प्रगतिशील हैं, और हमेशा एक नयी सीढ़ी पर चढ़ने का यह बड़ा अच्छा मौका है I सहजयोग में जो आज स्थिति है वो बहुत ही अच्छी है I
जबकि हम देश की हालत देखते हैं आज, तो लगता है की सहजयोग एक स्वर्ग है हमने हिंदुस्तान मे खड़ा किया है I और, इसकी जो हमारी एक साधना है, इसमें जो हम समाए हुए हैं, इसका जो हम आनंद उठा रहे हैं, वो एक स्थिति पर पहुंच गया है I और इसका आधार भी बहुत बड़ा है I इसका आधार है कि आपने अपनी शुद्धता को प्राप्त किया है, अपनी शांति को प्राप्त किया और अपने आनंद को प्राप्त किया I यह आपकी विशेष स्थिति है जो औरों में नहीं पाई जाती I और इसको सब लोग देख रहे हैं समझ रहे हैं कि यह कोई विशेष लोग हैं और उन्होंने कोई तो भी विशेष जीवन प्राप्त किया है I मैं जहां भी जाती हूं और जगह, लोग मुझसे बताते हैं कि हम एक सहजयोगी को जानते हैं वह बहुत नेक आदमी है बहुत बढ़िया आदमी है I उनका जीवन एकदम परिवर्तित हो गयाI अब उन्होंने पूर्णतयः समर्पित कर दिया और उनका सारा कारोबार बहुत अच्छे से चल रहा है, उनका कुटुंभ भी बहुत सुखी हैI सब तरह से वो एक आनंदमय वातावरण में रहते हैंI ऐसा दूसरे लोग देख कर कहते हैं, और फिर कहते हैं कि मां हमें भी आप बताइएI मैं कहती हूं – “आओ हमारे मंदिर में आओ, सहजयोग में आओ, लोगों से मिलो, उनसे बातचीत करो”I
और आप सब लोगों ने जिस तरह से सहजयोग को अपनाया है, बढ़ाया है, एक कमाल की चीज़ हैI लेकिन इसमें एक बात जान लेनी चाहिए कि हमारे पास जो विशेष शक्तियां हैं, वो आज तक किसी के पास भी नहीं थीI आज तक कोई भी कुंडलिनी का जागरण इतनी आसानी से नहीं कर सकता थाI कोई भी चक्रों का निदान लगा नहीं सकता थाI यह किसी को मालूम ही नहीं था कि उंगलियों पे आप चक्र जान सकते हैI आज तक किन्हीं शास्त्र में मैंने नहीं पढ़ाI किसी ऋषि-मुनि, किसी ने यह बात नहीं बताई की आप उंगलियों पे निदान बता सकते हैं चक्रों काI चक्रो तक बात करी है, सहस्त्रार पर भी बहुत कम लोगों ने बात करी हैI आप लोग इतने सूक्ष्म ज्ञान को इतनी आसानी से प्राप्त कर गए, क्योंकि आपने इस पर बहुत ध्यान दिया और आत्मा के प्रकाश में इस सूक्ष्म ज्ञान को आपने प्राप्त कर लियाI अब आप सहजयोग बड़ा रहे हैं और सहजयोग के जो नियम हैं उनमें आप बहुत ही सहजता से आ गएI किसी को इसमें मैंने रुकावट करते हुए देखा नहीं, किसी ने इसपे मुझसे वाद-विवाद नहीं किया और आसानी से सब बातों को मान गएI
जैसे कि मैंने कहा कि हम बाह्य के धर्म -जाती आदि भेद को नहीं मानते, अभेद को मानते हैं आपI हम सब एक हैं, परमात्मा के अंश हैं और उस अंश को, उस विराट स्वरूप को जानना चाहिए, उसमें जागृत होना चाहिएI और यह जो बाह्य में विकृतियां आ गई हैं उनको छोड़ करके अंतःकर्म में हमें अपनी एकता जाननी चाहिएI और धीरे-धीरे मैं देखती हूं कि सब लोगों में इसका आनंद आने लग गयाI यही आनंद है जो कि आपको यहां खींच कर लाता है और हर बार आप कहते हैं कि यह आनंद हम दूसरों से भी बांट खाएंI जैसा एक शराबी अकेले शराब नहीं पी सकता, उसी प्रकार आप लोग भी अकेले इस आनंद को नहीं उठा सकतेI तो अगर एक आदमी सहजयोग में आ गया उसके सारे रिश्तेदार सहजयोग में आने चाहिएI उसके सब मिलने वाले आने चाहिए, उसके सब दोस्त आने चाहिए, वह सबको सहज में उतारते रहता हैंI तो पहला प्रलोभन तो शारीरिक होता हैI शरीर की व्यथा दूर हो गई, मानसिक व्यथायें दूर हो गई और आपसी रिश्ते ठीक हो गएI आपस में मेलजोल भर गया, बच्चे ठीक से चलने लग गएI हर तरह की आपकी प्रगति हो गई, यहां तक की लक्ष्मी जी की भी कृपा हो गईI और हर पल हर घड़ी आप देखते हैं कि आप परमात्मा के साम्राज्य में है और परमात्मा आपकी मदद कर रहे हैंI
इतने चमत्कार हो गए सहज योग में की उनको लिख कर निकालने की किसी की हिम्मत नहीं होती हैI वो कहते है माँ आप पहले छान लो इसमें से जो आप सोचते हो, की मां आप पहले [UNCLEAR] से जो आप सोचते हो की इसको न जाने [UNCLEAR] गर्व होता हैI
सामाजिक स्तर पे हम लोगों ने बहुत उन्नति की इसमें कोई शक नहींI और धर्म में भी लोग जम गए हैंI नेकी हमारे अंदर आ गई है, प्यार आ गया है और हम सच्चाई को बहुत ऊंची चीज मानते हैं और उस पर चलते हैंI सिर्फ बोलते नहीं, लेकिन हमारे जीवन में यह सच्चाई आ गईI यह बहुत बड़ी बात हैI आपस में मैंने देखा है, खास कर सहजयोग में, कोई पैसा-वैसा नहीं खाताI सहजयोग के लिए कुछ रुपया दीजिए पैसा दीजिए तो कोई वो पैसा नहीं खाता हैI लोग बहुत से कहते हैं कि मां यह भगवान से डरते हैं इसलिए पैसा नहीं खातेI किंतु मैं सोचती हूं कि सहजयोग में एक तरह का समर्थ बनना अपने आप घटित होता हैI समर्थ – सम माने आप अपने को उसके साथ अर्थ बनना, जो आप इंसान हैI वो १० धर्म जो एक इंसान में बसे हुए हैं वो जागृत हो जाते हैं और मनुष्य समर्थ हो जाता हैI उसको अपने गुण जो हैं अपने वर्चूज़ हैं वो अच्छे लगने लग जाते हैI उसी में उसको मजा आता है और दुर्गुण से वो भागता हैI अगर कोई दुर्गुणी दिखता है तो या तो उससे भागता है, या शांतिता-पूर्वक कोशिश करता है किसी तरह से चुपचाप कभी-कभी कोशिश करता है, कि इस आदमी के दुर्गुण ठीक कर जाएI और वो दुर्गुण निकालने के भी उसको तौर -तरीके मालूम हैI उसे वो इस्तेमाल करता है और बहुत बार यशस्वी हो जाता है, उसमें यश पा लेता हैI इसी प्रकार आपने देखा है कि कला में भी बहुत कुछ सहजयोग में कार्य किया, बहुत से कलाकारों में एक नया आयाम आ गया है नया नई दिशा आ गई हैI और यही नहीं पर परदेस में भी मैंने देखा है, कि कलाकार हर तरह से नयी-नयी बातें सोचने लग गए हैं I बहुत से पेंटर, आर्टिस्ट, म्युज़िशियन्स, सब में एक नया उत्साह, एक नई धारणा, एक नया विचार, प्रगटित होता हैI यह सब वो क्या, सामाजिक समाज के प्रश्न बहुत से कुछ हल हो गए हैंI और आप लोगों के जो छोटे-छोटे प्रश्न थे वो भी हल हो गएI जो छोटी तबीयत वाले लोग थे वो ठीक हो गए, और जो बहुत गर्म मिजाज थे वो भी ठंडे हो गएI जो बहुत ही ठंडे थे वो भी उठ खड़े हो गएI अब यह सारी सेना तैयार हो गईI एक विशेष रूप की सेना हैI इसी देश में नहीं आप तो जानते हैं कि सहजयोग, ऐसा कहते हैं कि ५६ देशों में फैल रहा हैI और मैं कह सकती हूं कि ३० देशों में बहुत ही कार्यान्वित है और बहुत कार्य हो रहा है और सहजयोग बढ़ रहा हैI सहजयोग को बढ़ाना भी बहुत बड़ी चीज हैI जो लोग सहजयोग को बढ़ाते हैं वह बहुत बड़ा परमात्मा का कार्य कर रहे हैंI
वो आप संगीत के द्वारा बढ़ाएं चाहे कला के द्वारा बढ़ाएं या भाषणों के द्वारा बढ़ाएं, जिस तरह से भी बन सकता है आप सहजयोग बढ़ा रहे हैंI वैज्ञानिक तौर पे भी बहुत से विज्ञान के लोग जैसे अमेरिका में है उन्होंने बहुत सी बातों पे लिखने का सोचा हुआ हैI और बहुत से डॉक्टरों ने, आप जानते हैं, बहुत कुछ यहां कार्य किया हैI अपने ऊपर जिम्मेदारी लेकर के, और लड़-झगड़ के इस चीज को स्थापित कर दिया की सहजयोग एक वास्तविक सत्य हैI
जब मैं इस संसार में आई और जब मैंने दुनिया की तरफ नजर की तो मैं सोचती थी कि इस अंधेरे में मेरी एक छोटी सी रोशनी क्या काम कर पाएगी? कोई देख भी नहीं पायेगा और किसी से इसके बारे में कहने की तो बात छोड़िए, इसके बारे में विचार भी करने के लिए मैं सोचती थी कि क्या फायदाI यह तो लोग इतने अहंकार में है इतने अज्ञान में है I और जिन्होंने ज्ञान भी इकट्ठा किया था वो सिर्फ बौद्धिक, किताबें पढ़-पढ़ के बौद्धिक बातें सीख गए थे उनके आगे कोई बात कहने से कोई विश्वास किसी को नहींI कोई सोच भी नहीं सकता था कि उस वक्त मैं एक परिवर्तन की भाषाअर्थ कर सकती थीI लेकिन अब साध्य हो गया और आप लोग जानते हैं कि यह सब कुछ हो गया हैI
आज के शुभ घड़ी पर मैं सोच रही हूं कि अपने देश कि यह हालात इतने हुए है, और जिस तरह से सब चीज हो रही है हम लोगों को राजनितीय क्षेत्र में भी उतरना चाहिएI जब तक हमारे जैसे लोग राजकीय क्षेत्र में नहीं आएंगे यह हमारे देश की हालत ठीक नहीं हो सकतीI एकदम सड़-गल के यह पता नहीं क्या हो गयीI और इसकी आंच सहज योगियों पे भी आने वाली है Iयह नहीं कि आप उतर जाए, हालाँकि आपको इससे तकलीफ नहीं होगी या हालांकि आप इसमें से निकल आएंगेI लेकिन अगर आपको अपने देशवासियों का ख्याल है और आपको अपने बच्चों का ख्याल है, तो बेहतर है कि हम लोग ही समाज में जो कार्य कर रहे हैं, करते रहे हैं, उसको एक राजकीय स्वरूप देंI और राजकीय में उतर के हम सिद्ध कर दें के जो लोग नेक है जो धार्मिक हैं जो सत्य पे चलने वाले लोग हैं जिनमें लालच नहीं, ऐसे लोग एक नये तरह का राजकीय राष्ट्र बनाएंI कोई भी देश में जाइये चाहे वो डेमोक्रेसी हो चाहे कम्युनिज्म हो या कुछ होI डेमोक्रेसी में तो आप देखिए कोई ऐसा मैंने देश नहीं देखा जहां पर बेईमानी ना हो, कहीं कम कहीं ज्यादाI अनैतिकता खुलेआम बहुत जगह चल रही हैI और अगर आप कम्युनिस्ट कन्ट्रीज में जाइए वह तो लुट ही गए हैं सारे, लेकिन तो भी वहां पर जो लोगों को जबरदस्ती काम कराया जाता है उससे उनकी स्वतंत्रता तक चली गई है I इसलिए दोनों तरह से, एक तरफ तो सत्ता और दूसरी तरफ पैसा इन दोनों का ही सब दूर अभिभाव हैI सभी दूर आप देखते है कि यही अभिभाव हो रहा है और लोग इन्हीं दो चीजों के पीछे भाग रहे हैं और कोई भी देश के बारे में नहीं सोच रहाI
अब हमें अपनी जो सतह है, इस सतह से हम पृथ्वी की तरफ देखते हैं फिर वह अंतर्राष्ट्रीय प्रश्न हो, चाहे राष्ट्रीय हो, और चाहे हमारे छोटे-छोटे कस्बे गांव का हो, हम लोगों की सतह से जब हम उसे देखते हैं, तो विश्वत्व की दृष्टि से देखते हैंI उसकी विशालता से देखते हैंI दूसरे उसकी गहनता से देखते हैं, कि उसमे कौन सी खराबियाँ है और यह खराबियाँ हम कैसे निकालेंI यह खराबियाँ भी हम लोग बहुत आसानी से निकाल सकते हैं क्योंकि आपके पास बहुत बड़ी शक्तियां हैंI आप जानते हैं कि बंधन के सहारे आप बहुत कुछ काम कर सकते हैंI और बहुत लोगों को अपने सहजयोग में ला सकते हैंI बहुत से अभी मुझे लोग मिले थे कि जो एयर फोर्स में हैI वो कहने लगे कि मां हमें भी ले लीजिये, हम जानते हैं कुछ एयर फोर्स के लोगों को और वो सहजयोग में है और उन्होंने बड़ा कमाल करके दिखाया हैI फिर कुछ पुलिस वाले हैं वो भी हमारे साथ लग गए हैंI महाराष्ट्र में तो पोलीस टाइम्स है वो हमेशा जो कुछ भी सहजयोग के बारे में छापे, वो छापते हैंI इसी प्रकार कुछ अखबार वाले भी हमारे साथ मिल गए हैंI और बहुत से आप जानते हैं अब सरकारी नौकर भी सहजयोग में आ गए हैंI जब उनकी बदली हो जाती है तो सहयोग फैलाते हैंI इसी प्रकार हमें अगर राजकीय में हम उतर जाए तो जो राजकीय समस्याएं है उनका भी हाल हम लोग निकाल सकते हैंI इसमें पहली चीज यह रखना चाहिए कि हमारी जो कुछ भी इच्छा है इस मामले में, वो साफ सुधरी होनी चाहिए, उसमें शुद्धता होनी चाहिएI हम सिर्फ देश के हालात ठीक करना चाहते हैंI और हम लोगों तक, उनका जो अधिकार है , उनको पहुंचाना चाहते हैंI इतना ही नहीं उनके अंदर धर्म जागृत करना चाहते हैं, जिससे कि देश हमारा जो है, वह एक बहुत सुचारु रुप से और सुंदरता से बढ़े, आगे बढ़े और सारे संसार के लिए एक आदर्श बन जाए I इस देश में अनेक शक्तियां है, बहुत ही ज्यादा आध्यात्मिक देश हैI और अध्यात्म की शक्तियां आप जानते हैं, कोई माने ना माने आप लोग तो जानते ही हैं कि आध्यात्म में कितनी शक्तियां हैI और इस देश की जो शक्तियां हैं उसको हम बहुत अच्छी तरीके से अपने इस्तेमाल में ला सकते हैंI इसमें एक बात और हमें याद रखनी चाहिए कि हमें भारतीय संस्कृति में उतरना चाहिएI विदेशीय संस्कृति में हम लोग जो जाने लग जाएं तो विदेश की जो खराबियां है वो बहुत आसानी से हमारे अंदर आ जाएI
भारतीय संस्कृति का जो शुद्ध स्वरूप है वह आत्म-साक्षात्कार के लिए बहुत पोषक हैI गर हम भारतीय संस्कृति में नहीं आएंगे तो कभी भी इस देश का हाल ठीक नहीं होगाI यह तो ऐसा ही है मैं हमेशा कहती हूं कि गर आम का पेड़ जाकर जो आप विदेश में लगाइये तो उसमें आम भी नहीं आएंगे और सेब भी नहीं आएंगेI इसलिए जो आदमी भारतीय है उसे भारतीय ही संस्कृति में आना चाहिएI और जो परदेस में जितने भी सहजयोगी हैं आश्चर्य की बात है वो हमेशा कहते हैं कि मां हमें भारतीय संस्कृति में आप उतारिये, क्यूँकि यह बहुत सौम्य संस्कृति हैI
इसमें बच्चे देखते हैं हम, लोग देखते हैं, अत्यंत सौम्य है, सहनशील है और इतना ही नहीं धार्मिक हैंI तो जो शुद्ध स्वरूप भारतीय संस्कृति का है उसको हमें बनाना है और उस पर विचार करना है, और हमारे घर में भी वो संस्कृति आनी चाहिएI बहुत से लोग सोचते हैं कि भारतीय संस्कृति वो है जिसमें की, मुसलमान लोगों ने जो हमारे ऊपर कुछ चीज़ लाद दी , जैसे पर्दा करना, वगैरह- वगैरह, यह बिलकुल नहीं है I यह तो हमारे साउथ में जो महाराष्ट्र में है, वहां कोई औरतें पर्दा- वर्दा कुछ नहीं करती, वह सब भारतीय संस्कृति से रहती हैI गुजरात में भी जो कुछ पर्दा- वर्दा नहीं करतीI यह पर्दा वगैरह की जो सिस्टम है वो सिर्फ इधर हिंदुस्तान में चल पड़ीI इतना ही नहीं औरतों को दबाना औरतों के साथ दुष्ट व्यवहार करना, वगैरह, यह बिल्कुल भारतीय संस्कृति में नहीं हैI
भारतीय संस्कृति में तो बहुत-बहुत विद्वान औरतें हो गई हैं आप जानते हैं, उनको बताने की जरूरत नहींI और उन्होंने बड़े-बड़े विद्वानों के साथ वाद-विवाद सब कियाI और बड़ी-बड़ी पंडिताई उन्होंने हासिल करी I और अपने देश में इस चीज के लिए कभी सोचा भी नहीं की औरत नीची है या औरत को दबाना चाहिए या उसमें कोई कमी हैI सबका अपना-अपना स्थान माना गया है, स्त्री का स्त्री की जगह, पुरुष का पुरुष की जगह I तो जब वो लोग अपनी संस्कृति ले रहे हैं, जब उन देशों से लोग अपनी संस्कृति ले रहे हैं, तो क्या हमारे लिए जरूरी नहीं कि हम भी अपनी संस्कृति को जाने और समझें और उस तरह से रहेंI बहुत सी बातों में हम सोचते हैं कि आसान है, कि हम उनका अनुकरण करेंI लेकिन अब वो लोग समझ रहे हैं कि उन्होंने जो-जो गलतियां करी है, वो इसलिए की, क्योंकि उनके पास कोई भी किसी भी तरह का अंकुश नहीं था, कोई अंकुश नहीं थाI जैसे एक पतंग कट जाए इस तरह से वो लोग जो उनके मन में आता वो करते और अति में चले जाते और एक्सट्रीम्स मे I जब वहां जाते तब उनको पता होता है कि यह गलती हो गई और उससे यह बीमारी हो गई, वह बीमारी हो गईI सारे इनके जो समाज है नष्ट भ्रष्ट हो गएI हमारा अंकुश जो है वो हमारे सहजयोगी की नैतिकता है जिसे हमें समझ लेना चाहिएI और वो जब तक हमारे अंदर पूरी तरह से उतरेगी नहीं तब तक हम लोग असली सहजयोगी भी नहीं हो सकतेI क्योंकि यह बहुत सहजयोग के लिए पोषक हैI इसलिए मैं नहीं कह रही हूँ कि मेरा जन्म हिंदुस्तान में हुआ है तो तुम्हें हिंदुस्तानी होना हैI जो बाहर की चीजें अच्छी है, वो सीखनी चाहिएI पर वो भी भारतीय संस्कृति को अगर आप पूरी तरह से अपना लें तो अपने आप ही आ जाएगा I वो तो थोड़ी सी उम्र-पार चीजें हैं जिनके प्रति हम समझ सकते हैं कि उन्होंने जो कायदे कानून बनाए हैं बाहर, या जिस तरह से उन्होंने अपनी प्रगति की है, और उसमें भी एक तरह का कोई नियम और कोई discipline रखा है, वो हमारे अंदर नहीं हैI वो भी अपने आप ही आ जाएगा क्योंकि भारतीय संस्कृति ऐसी चीज है कि वो सब चीज में असर करती है, सब चीज को वो ठीक करती है I जीवन के जितने प्रांगण है, जितने भी आयाम है, सब में वो एक दैविक प्रकृति को प्रस्थापित करती हैI वो दैविक प्रकृति को प्रस्थापित करने की बात और किसी भी संस्कृति में नहींI इसलिए हमारे भारतीय संस्कृति को स्वीकार्य करना चाहिए और उसमें अपने को बहुत महत्वपूर्ण समझना चाहिए कि, हमारी हम लोग भारतीय संस्कृति में उत्तर रहे हैंI
मैं गांधीजी के पास ७ साल की उम्र से थी और मैं उन्हें देखती थी तो मैंने देखा कि उन्होंने धर्म पर बहुत बात की थीI लेकिन गांधीजी बहुत कड़क स्वभाव के आदमी थे बहुत ज्यादा कड़क थे [UNCLEAR] सहजयोग में नहीं सहजयोग में जैसा चाहो रहो, जैसे आराम से, जैसे बन पड़े जितना आगे चलो, कोई इसमें आप को जबरदस्ती नहीI उनका तो यह स्वभाव था, गांधी जी का कि, सवेरे ४ बजे उठना है, चाहे कुछ हो जाये I अब सहजयोगी करते हैं, परदेश के सहजयोगी बहुत मेहनत करते हैं, हम लोगों से बहुत ज्यादाI एक तो अपने यहां कोई आश्रम में ही नहीं रहना चाहताI अब वो लोग कहते हैं कि मां आप ही आश्रम में रहो और तो कोई रहना ही नहीं चाहताI इतना आश्रम बनाया तो लोगों को आश्रम में रहना अच्छा नहीं लगता है वो घर से चिपक के रहते हैं.
पर गांधी जी का आश्रम में नियम यह था ४ बजे उठने काI और सवेरे उनके साथ आप नहा धो कर के और प्रार्थना में जानाI तो वहां सब सांप वगैरह सब घूमा करते थे तभी प्रार्थना में भी देखते थे तो सामने सांप बोल रहे हैं आपकेI लेकिन आप चुपचाप बैठ कर के वहां ध्यान करिए Iउसके बाद जब उसकी प्रार्थना हो जाती थी, उसके बाद वो बहुत जल्दी चलते थे, उनके साथ सब को दौड़ना पड़ता था Iऔर इतने उनके कायदे-कानून थे, कि खाने के लिए सिर्फ उबला हुआ खाना और अगर आपको चाहिए तो ऊपर से थोड़ा सा सरसों का तेल आप ले सकते थे और ना उसमें कोई मिर्च न कोई चीज नहीं और बिल्कुल आपको ऐसा खाना खाना पड़ता थाI वो चाहे फिर कोई भी हो चाहे जवाहरलाल हो चाहे अबुल कलाम आजाद हो चाहे कोई होI सबके लिए नियम था, कि खाना यही सबको मिलेगा और सभी इसी तरह का वहां खाना भी खाते थे I बहुत ज्यादा उनका डिसिप्लिन था और खुद अपने मामले में भी अपना जीवन भी उनका इसी तरह का था, जिसमें वो बिल्कुल ही कहना चाहिए बड़े भारी बाबाजी थे सन्यासी थेI
और बहुत कड़क उनका स्वभाव था पर, और इतने जबरदस्त थे कोई अगर जरा सी गलती कर ले तो उसको सबके सामने खोलकर के इस तरह से कह देते थे कि दूसरा आदमी जो है वो बिल्कुल लज्जित हो जाएI उस वक्त ऐसी चीज की जरूरत भी थीI लेकिन न जाने उस वक्त ऐसे लोग थे जिन्होंने बहुत त्याग कियाI देश के लिए बहुत त्याग किया I हमारे पिताजी-माताजी हमने देखा है कि ऐसे लोग तो आप सोच भी नहीं सकतेI कितना उन्होंने त्याग दिया, सब चीज उन्होंने त्यागीI हम लोग छोटे छोटे बच्चे थे, मैं 8-9 साल की थी तो इतनी बड़ी चाबी लेकर घूमती थी, सब भाई बहनों को संभालती थीI घरों से निकाल दिया मोटरें भेज डाली और हम लोग तो झोपड़ियों में रहते थेI इतना त्याग, इतनी श्रद्धा, देश को आजाद करने कीI जो अब देखो अब आज देश आजाद हुआ है और क्या हो रहा हैI आज आजाद होकर के देश का क्या हाल हो रहा हैI इसी प्रकार एक तरह के बड़े वीर लोग थे, बहुत वीर लोग थेI और ऐसी अगर भावना, गर हमारे अंदर जाग जाए, तो हम अपने देश की कायापलट पूरी तरह से कर सकते है, इसमें मुझे कोई शंका नहींI लेकिन वो त्याग वो जूनून होना चाहिए और उस त्याग में बड़ा गर्व होना चाहिएI वह त्याग करने में कोई रोता नहीं हैI बहुत से मैं देखती हूं सरकारी नौकर होते भी हैं तो कहेंगे भाई मैं बड़ा ईमानदार हूं, इसलिए मेरे पास कुछ नहींI अरे भाई, तुम ईमानदार हो तो उसमें रोने की कौन सी बात है, बड़ी खुशी की बात हैI तुम तो ईमानदार हो कम से कमI अगर मैं ईमानदार नहीं होता तो मेरे पास मोटर होती, यह होती, वह होतीI तो मत करो भाई, वो ही धंधे करोI काहे के लिए आप ईमानदार बनेI
पर पहले इसका बड़ा गर्व था और लोग बहुत सोचते थे यह बच्चे किसके हैं, इनके बाप ऐसे इनकी मां ऐसी, इस कदर शानदार लोग थे इतने त्याग वाले थे I इतना ही नहीं हम लोगों को तक यही ख्याल कि तुम देश के लिए पूर्णतय: अपने को समर्पित करोI तुम प्राण दे दो तब हम खुश होंगे I इस तरह के मां बाप हम लोगों ने पाए थेI और इस तरह के आज भी हमें लोग चाहिए तभी देश की राजनीति भी ठीक हो सकती हैI सहजयोग में आपके कोई प्राण- व्राण जाने की बात नहींI कोई कुछ भी करें आप लोगों का जीवन बना हुआ है, और हर तरह से आपको सुख हैI सहजयोग में तो सुख ही सुख है, आनंद ही आनंद हैI लेकिन यह सोचना चाहिए कि यह एक तरह का चॉकलेट है जिसको आप खाते हैं इसके अंदर एक गहन चीज वो है जहां आपको तप भी करना होगाI और जब तक यह तपस्या नहीं होती तब तक आप पूरी तरह से सहजयोग को प्राप्त नहीं कर सकतेI यह तपस्या वैसे नहीं है जैसे कि हिमालय पर जाओ कपड़े उतार के ठंड मैं ठिठुरते रहो, उस तरह की नहींI पर यह तपस्या यह की, काया, वॉच, मन से, पूरी तरह से आपको समर्पित होना चाहिए एक बड़े उद्देश्य के लिए, बड़ी चीज के लिएI तब फिर अपने आप बहुत सी चीजें घटित हो जाएंगी आज तक मैंने आप पे कोई चीज का बंधन नहीं डाला, किसी चीज की मनाही नहीं की, सब प्यार प्यार की बातें होती रहीI प्यार ही देती रही और सब प्यार बढ़ता रहा, सब आपस में मजा-मजा होते रहाI लेकिन आज जब आपने जन्मदिन की बात की है, तो एक नया आयाम हमारे जिंदगी में आ जाए, नए इरादे हो जाएI और जिन इरादों पे हम बाद में गर्व करें, ऐसे इरादे हमारे अंदर हो सकते हैंI और आप लोग सहजयोगी है, आपका हर इरादा पूरा हो जाना हैI मेरा तो कुछ इरादा ही नहीं है, और मुझे कोई इच्छा नहीं है लेकिन आप लोग इच्छा अगर करें तो सब चीज ठीक हो सकती हैI और इसलिए आज हमारे देश की स्थिति के लिए आपको मन से प्रार्थना भी करनी चाहिए और आज पूजा भी करनी चाहिएI इसलिए इसको सोच कि हमें अपने देश की स्थिति ठीक करनी है और हमारे अंदर वो शक्तियां आए, जहाँ हम अपनी छोटी सी जो जिंदगी है उसको विशाल करके कम-से-कम देश की ओर नजर करें और इसकी जो हालात है उसको समझ ले और उसमें कार्यान्वित होI आज का दिन आप सबको शुभ हो और आशा है कि मेरे जीते जी ही मैं वो भी दिन भी देख सकूं जब हमारा देश इन सब गंदगियों से आजाद हो जाए पूरी तरह सेI और सहज का झंडा सब जगह फैल जाएI आप सब को अनंत आशीर्वाद.