Birthday Puja

मुंबई (भारत)

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जन्म दिवस पूजा मुम्बई मार्च 21, 1991

सारे विश्व में आज हमारे जन्म दिवस की खुशियां मनाई जा रही हैं। यह सब देखकर जी भर आता है कि क्या कहें आज तक किसी भी बच्चों ने अपनी माँ को इतना प्यार नहीं किया होगा जितना आप मुझे देते हैं। ये श्री गणेश की महिमा है जो अपनी माँ को सारे देवताओं से भी ऊंचा समझते थे और उनकी सेवा में लगे रहते थे। इसलिए वह सर्व सिद्धि प्राप्त कर गये यह तो नैसर्गिक है कि हर माँ को अपने बच्चों से प्यार होता है और वह अपने बच्चों के लिए हर तरह का त्याग करती है। और उसे उनसे कोई अपेक्षा भी नहीं होती। लेकिन हर माँ चाहती है कि मेरा बेटा चरित्रवान हो, नाम कमाये, पैसा भी कमाये। इस तरह की एक सांसारिक माँ की इच्छाएं होती हैं। लेकिन आध्यात्मिक माँ का स्थान जो आपने मुझे दिया है मुझे तो कोई भी इच्छा नहीं । मैं सोच रही थी कि मैं कौन सी बात कहूं क्योंकि मुझे कोई इच्छा नहीं। शायद इस दशा में कोई इच्छा न रह जाये लेकिन बगैर इच्छा किए ही सब कार्य हो जायें, इच्छा के उदभव होने से पहले ही आप सब कुछ कर रहे हैं, तो मैं किस चीज़ की इच्छा करुं? जैसा मैंने चाहा था और सोचा था, मेरे बच्चे अत्यंत चरित्रवान, उज्जवल स्वभाव, दानवीर, शूरवीर, सारे विश्व का कल्याण करने वाले- ऐसे व्यक्तित्व वाले महान गुरु होंगे। सो तो मैं देख रही हूं कि हो रहा है। किसी में कम हो रहा है, किसी में ज्यादा हो रहा है, दुनिया भर घूमकर, दुनिया भर में जा जा कर, संसार के सब प्राणियों में आत्म साक्षात्कार देने का कार्य भी मैं देख रही हूं कि हो रहा है। कितने ही लोग कला में उतर गये, कवि हो गये और जितने भी उनके पास थे उनका प्रयोग सहजयोग गुण के कार्य में हो रहा है। कुछ कहना नहीं पड़ा, कुछ बताना नहीं पड़ा। सब लोगों ने न जाने कैसे उस बात को ले लिया कि हमें सहजयोग को फैलाना है। सहजयोग को फैलाने में कोई कठिनाई भी नहीं होनी चाहिये क्योंकि आप आशीर्वादित हैं, ऐसे आशीर्वाद किसी भी सन्तों को नहीं मिले। सन्तों ने तो बहुत

तकलीफें उठाईं। आपके लिए कोई तकलीफ नहीं। लेकिन आपके अन्दर अनन्त शक्तियां हैं। उन सब शक्तियों को जान लेना चाहिए, उन शक्तियों के पूरी तरह से उपयोग में लाना चाहिए। जब तक आप उनको उपयोग में नहीं लायेंगे तो जैसे एक मशीन यदि आप उपयोग में न लायें तो सड़ जाती है, उसी प्रकार ये शक्तियों भी सड़ जाएँगी। ये शक्तियां आप में जागृत हुई हैं और जागृति से ही किसी किसी में तो इनका बहुत ज्यादा प्रादुर्भाव है और वो कार्यान्वित भी हैं। पर इसके लिए हमें क्या करना चाहिए? ऐसा अगर आप मुझसे पूछे तो वो मैं आपसे बात कहना चाहती हूं। सबसे पहले हमें अपनी ओर नज़र करनी चाहिए कि हम सहजयोग के लिए क्या कर सकते हैं। सुबह से शाम तक हम बस हमारे बच्चे, हमारा घर-बार, यही कुछ हम करते हैं या कुछ और हम कर रहे हैं। ये भी विचार आना चाहिए कि हमारी माँ इस उम्र में भी कितना सफर करती है, इधर- उधर जाती है। कम से कम हम अपने अड़ोस-पड़ोस में इधर-उधर जाकर के और थोड़ा बहुत अपने शहर से बाहर जाकर लोगों को ये बातें बतायें। अगर आज आप इन्हें नहीं बताते तो कल वो आपको दोषी ठहरायेंगे कि क्यों नहीं बताया हमें? यदि आपने हमें बताया होता तो हम भी इस अमृत को पा सकते थे। तो एक तरह की जिम्मेदारियां आप पर आ गयी हैं । क्योंकि आप लोग इसे पहले ही पा गये हैं। इसलिए बहुत जरूरी हैं कि आप इसे दूसरों को भी दें । अपने पास ही न रखें। आप लोगों के लिए भी वैसे देखा जाये तो मैंने कोई खास काम नहीं किया। किन्तु आपके अन्दर ये शक्तियां ज़रूर जागृत हो गई हैं। वो शक्तियां इस तरह से कार्यान्वित हैं कि आप स्वयं आश्चर्यचकित हैं कि ये कैसे चमत्कार हो गया-वो कैसे चमत्कार हो गया। क्योंकि आप परमात्मा के साम्राज्य में आ गये हैं सब काम अपने आप हो रहे हैं। फिर भी हमें सोचना चाहिए कि हम परमात्मा के साम्राज्य में क्या करने आये हैं? जैसे आप देखते हैं राजनीति में एक निर्वाचन क्षेत्र से एक आदमी निर्वाचित होकर आता है और जब वो जाकर के लोक सभा में बैठ जाता है। उसे लोक सभा के अधिकार और सुविधायें भी मिल जाती हैं। पर उस पर एक बन्धन और भी पड़ जाता है कि जिस निर्वाचन क्षेत्र से वो आया है उसके लोगों को जाकर के देखना, सम्भालना, उनको बढ़ावा देना और उनकी प्रगति करना। अब आप भी समझ लीजिए कि आप एक निर्वाचन क्षेत्र से आये हैं। ये सारी शक्तियां आपको प्राप्त हो गई। अब

इन शाक्तियों को बढ़ावा देना उनकी प्रगति करना बहुत ज़रूरी है। अगर आपने यह नहीं किया तो शाक्तियां लुप्त हो जायेंगी और जिन लोगों को ये शाक्तियां आपने देनी हैं वो भी रह जायेंगे, उन्हें कुछ नहीं मिलेगा। इसलिए हमको ये सोचना चाहिए कि अब हमें क्या करना है। सहजयोग में ध्यान धारणा से अपनी गहराह्ह बढ़ा ली। लेकिन जब तक आप बांटियेगा नहीं तब तक ये गहराई एक सीमा तक पहुंचकर रूक जायेगी। बहुत से लोग बहुत सुन्दर गाना गाते हैं। आप गाते तो अच्छे से हैं लेकिन ये गाना आप बाहर क्यों नहीं ले जाते। आप दूसरों को जाकर क्यों नही सुनाते? और जगह जाइए, आयोजन कीजिये वहाँ यह गाना सुनाईये। लोग इसे सुनकार बहुत ऐसे ही अनेक चीजें हैं जो लोगों के पास हैं लेकिन वो बस घर में ही बैठकर सब करते है | ही आनन्द उठायेंगे। से लोग अच्छा भाषण देते हैं, प्रवचन करते हैं। मैंने उनसे कहा कि आप बहुत सिर्फ बम्बई और दिल्ली शहर में ही क्यों रहते हैं आप जाईये बाहर और प्रयत्न बहुत कीजिए। बाहर के लोगों को सुनाईये भाषण। वो ज़्यादा अच्छा रहेगा, बनिस्बत इसके कि सहज योगी, जिन लोगों को हम पार कर चुके हैं उनको सुनाने से क्या फायदा। तो समझना यह है कि हमें जितना बाहर फैलना है उतना गहरा भी उतरना है। बाहर फैलने में जो सामूहिकता है उसको समझना चाहिए। उसमें अनेक प्रश्न भी खड़े हो सकते हैं, अनेक तरह के झगड़े भी खड़े हो सकते हैं अनेक तरह के लोग आपको हर तरह से चैलेंज भी कर सकते है ऐसे लोगों से भिड़ने की जरूरत नहीं। उनसे सीध ॥ कहना चाहिए कि यदि आपको कुण्डलिनी का जागरण चाहिए तो आप आईये । और अगर झगड़ा ही करना है तो वो बेकार की बात है। यदि वो चिल्लायें तो उनसे कहिए कि आपका विशुद्धि चक्र खराब हो जायेगा और फिर कभी आत्मसाक्षात्कार न मिल सकेगा। इस तरह से बहुत ही सूझबूझ के साथ समझदारी के साथ उनसे बातचीत करनी चाहिए। अब मैं सुन रही हूं कि अलवर में सहजयोग चल रहा हैं। पता नहीं कैसे लोग वहां गये। एक साहब का तबादला वहां हुआ और वही सहजयोग चल पड़ा। पटना में भी मुझे बताया गया कि दो सौ सहजयोगी हैं। बड़े आश्यर्च की बात है। पटना तो मैं कभी गई ही नहीं। कानपुर में इतने सहजयागी हैं। एक शर्माजी वहां गये और उन्होंने इतने लोगों को आत्मसाक्षात्कार दे दिया। पूर्ण रूप से यही कार्य कर रहे हैं। किसको साक्षात्कार देना है, किसको ठीक करना है, पूरा उनका यही काम चल रहा है। एक मिनट

भी वो ऐसा सोचते नहीं हैं कि चलो कुछ देर बठ जायें या मुझे तो करना नहीं है या ठीक है मैं जितना चाहता हूं उतना कर लेता हूँ। इस तरह की बात वो कभी सोचते ही नहीं है। इसी प्रकार हमें भी सोचना चाहिए कि रात दिन हमें सहजयोग ही के बारे में सोचना हैं और जब उसी में हमें मज़ा आता है तो हम आगे जायें और काम बन सकते हैं | आपने मेरा जन्म दिन इतने प्यार से मनाया। पता नहीं आप लोग क्यों मनाते हैं मेरा जन्म दिन? मैं यही समझ पाती कि आप लोग सोचते हैं कि मेरे संसार में आने हूं से कोई बहुत बड़ी बात हो गयी है। जो मैं नहीं सोचती। मैं तो यह सोचती हूं कि जिस दिन आप लोग पार हो जायेंगे बहुत बड़ा दिन होगा। जिस दिन मैंने पहले इन्सान को पार किया था उस दिन मैंने सोचा था कि बहुत बड़ा दिन है। जब मैं पैदा हुई थी तो चारों तरफ अन्धकार था, देखती थी कि किस तरह से मैं ये बातें लोगों से कहूंगी। लोगों की तो बुद्धि कुंटठित है । और संत-साधु तो कोई है नहीं। अधिकतर लोग बिल्कुल अन्धकार में, अज्ञान में फंसे हैं। इनको मैं किस तरह से बात समझाऊंगी? इनसे मैं क्या कह सकूंगी। तब मैंने सोचा कि जब तक मैं सामूहिक चेतना को जागृत नहीं करूंगी, तब तक मेरी बात कोई नहीं सुनेगा। शुरू से मैंने जान लिया कि कोई और बात कहने से पहले मुझे सामूहिक चेतना जागृत करने की व्यवस्था करनी है। इस पर मैंने विचार किया, मैंने प्रयोग किये, जितने लोगों को जानती थी उनके चक्रों को मैंने देखा और सोचा कि उनके चक्र कैसे ठीक हो सकते हैं। किस तरह से ये सब के सब लोग एक सामूहिकता में आ जायें और पार हो जायें । लेकिन अगर कोई कहे कि मैंने इसके लिए बहुत तपस्या की आदि तो भी मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि मैंने बहुत सारा कार्य किया। सवेरे चार बजे उठने की वैसे ही आदत थी। उठकर मैं विचार करती थी, अन्दर में। विचार को अन्दर डालकर कि किस प्रकार कुण्डलिनी का जागरण हो सकता है। अब ये सारे तरीके जो हैं अभी शायद आपके पास आये नहीं हैं पर ६ ीरे-धीरे आपके अन्दर ये विचार अन्दर डालने की, चित्त में डालने की जो एक व्यवस्था है उसे आप सीख जायेंगे| फिर जो भी विचार आयेगा उसे आप चित्त में डाल सकते हैं। जैसे कम्प्यूटर में प्रोग्रामिंग करते हैं उसी प्रकार जो हम सहजयोगी हैं, एक

कम्प्यूटर हैं और उसी प्रकार हम चित्त में प्रोग्रामिंग कर सकते है विचार की प्रोग्रामिंग करके यदि हम चित्त में डाल दें तो वो सब कार्यान्वित हो सकता है। परन्तु उसके लिए कम्प्यूटर भी प्रगल्भ होना चाहिए और जो कर रहा है उसके अन्दर भी सफाई होनी चाहिए। समझ लीजिए कि कम्प्यूटर में कोई खराबी हो गई तो कोई लाभ नहीं । इसलिए आपको अपने को बहुत स्वच्छ, निर्मल बनाना चाहिये। सबसे बड़ी बात जो बहुत सुखदायी बात है, वो ये कि विश्व निर्मला धर्म की स्थापना हुई। आज कम से कम मेरे ख्याल से, पांच-छह साल हो गये। तब से विश्व १ निर्मला धर्म बढ़ता जा रहा है और लोग इसमें पूरी तरह से आ गये। अब जो सहजयोगी पहले किसी भी तरह से नहीं मानते थे, उसी (पुराने) धर्म पर चलते थे , और वही रट लगाये रहते थे, गलत गुरूओं के पास जाते थे , मन्दिरों में, मस्जिदों में घूमते थे, अब आकर के जम गये हैं। वे कोशिश कर रहे हैं कि हम किसी तरह से, हम अपने अन्दर इस धर्म को पा लें। विश्व निर्मला धर्म को। ये नया धर्म ऐसा है कि इसमें सारे पुराने धर्म समाये हैं। हर धर्म के बारे में इसमें जानकारी होती हैं और उसके तत्व को समझाया जाता है। इसके कारण मनुष्य यह जान जाता है कि ये सारे तत्व एक ही धर्म के हैं और जो शुद्ध धर्म है उसमें ये सारे ही धर्म पूरी तरह से निहित हैं। उसी में बैठे हुए हैं उसी में जमे हुए हैं । इस प्रकार जब हम देखते हैं तब जो दूसरे लोग हैं, जो किसी भी धर्म का अनुसरण करते हैं, उसके पीछे पागल जैसे भागते हैं उनके बारे में हम सोचते हैं कि वो पार नहीं हैं । उनका छ र्म और है। हम उनके धर्म के नहीं है। इस धर्म में आने से हमारे अन्दर अहंकार जो था वो चला गया। हमारे अन्दर जो दुष्ट भावनायें थीं वो चली गईं और सबसे बड़ी बात हमारे अन्दर जो अन्ध विश्वास कथे, वो खत्म हो गये क्योंकि ये धर्म प्रकाश है, ये धर्म प्रेम है। ये धर्म शक्ति का है। शक्ति के बगैर कोई कार्य नहीं हो सकता । शक्ति प्रेम हो जाये और जब ये प्रेम कार्यान्वित होता है तो शक्ति इस तरह से दौड़ती है जिससे कोई भी ऐसी बात नहीं हो सकती जो परमात्मा की दृष्टि से गैरकानूनी हो क्योंकि उस दृष्टि में ज्ञान है, इसमें प्रेम छिपा है और पूर्ण सूझ बूझ के साथ ये शक्ति कार्यान्वित है। सहजयोग में आकर जो लोग शक्ति सम्पन्न हो गये उनके अन्दर अहंकार

आने के बजाय अत्यन्त नम्रता आती है, अत्यन्त सौम्यता आती है ओर बहुत माधुर्य आ जाता है। ये सब चीजें जब होती हैं तो मनुष्य कभी-कभी सोचता है कि मैं ऐसा हो गया? मुझे ये सब कैसे प्राप्त हो गया? ये सब तो तुम्हारे अन्दर ही था पर तब तुम अपने को जानते नहीं थे और अब तुमने जान लिया है । जन्म दिवस के दिन यही ख्याल आता है कि एक माँ अपने बच्चे को जन्म देकर किस प्रकार से रखे कि मेरे बच्चे को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए। मुझे चाहे कोई तकलीफ हो जाये, मेरे बच्चों को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए। कुछ भी हो, कैसा भी हो, मेरा बच्चा है। उसे किसी भी तरह तकलीफ न हो। चाहे वो मुझे सताता भी हो, परेशान भी करता हो, तो भी मेरे बच्चे को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए। इस प्रकार जब आप सोचते हैं कि मुझसे ये गलती हो गई, वो गलती हो गई और इस प्रकार जब आप अपने अन्दर ममत्व (लिपसा) की भावना लाते हैं तो मुझे आपको यह कहना है कि इस तरह की कोई बड़ी गलती आप कर ही नहीं सकते जिसे मैं माफ नहीं कर सकती। इसलिए इस प्रकार की ममत्व (लिपसा) की भावना लाने की कोई ज़रूरत नहीं। परन्तु यदि आपको अपना ही गौरव बढ़ाना है और अपना ही जीवन विशेष बनाना है तो आवश्यक है कि हम अपने आपको किसी गरिमा से, किसी बड़प्पन से देखें जैसा हम जानना चाहते हैं। सिर्फ हम माताजी को मानते हैं, उनके हमने फोटो लगा लिये, उनका हमने बैज लगा लिया और हम माताजी को मानते हैं मैंने अभी किसी भाषण में कहा था कि किसी को मानने से भी, यदि आप किसी को मानते हैं तो अच्छी बात है। इससे ये तो पहचान है कि आपने कम से कम किसी अच्छे आदमी को मान लिया। लेकिन उस अच्छे आदमी का जो भी व्यक्तिव, जो भी है वो आपके अन्दर कुछ कितना है? आपने उससे कितना प्राप्त किया या आपने उसके लिए कितना त्याग किया। कुछ ये विचार करना है। किसी को मानने मात्र से क्या फायदा? समझ लीजिए कि एक गवर्नर है, आप कहिए कि मैं गवर्नर साहब को मानता हूं तो क्या वे आपको अन्दर आने देंगें? वो कहेंगें ठीक है आप गवन्नर साहब को मानते हैं, आप यहां बैठिये। इसी प्रकार आध्यात्म में भी किसी को मानने से कार्य नहीं होने वाला। मान्यता से, आप जानते है कि वाइब्रेशन (लहरियां) बढ़ते हैं। लेकिन आपकी जो प्रगल्भता है वो तो आप ही के ऊपर निर्भर है, आप ही की मेहनत है। आपने अगर हमें मान लिया तो आपने

ये तो स्वीकार कर लिया कि ये व्यक्ति कुछ विशेष है, कुछ आदर्श है। पर उस आदर्श को भी अपने जीवन में हमने उतारना है? कहां तक हमने उतारा है? कहां तक हम पहुंचे हैं? जैसे सहजयोग में बहुत सी शिकायतें होती है। और हमें दुःख लगता है कि कुछ जो बहुत पुराने सहजयोगी हैं, जो जिस तरह से चल रहे हैं वो ज़रा कुछ अजीब सी बात है। सहजयोग जो है वो आपके हित के लिए है, आपकी शक्ति के लिए है, आपके गौरव के लिए है, मुझे इसमे क्या है? मेरे पास तो है ही। मुझे सहजयोग करने की क्या ज़रूरत है। सहजयोग आपको करना है। अब माँ है वह बच्चे को कहती है दूध पी ले। बच्चा कहता है कि नहीं। माँ उससे कहती है कि दूध पीने से तन्दुरूस्ती ठीक हो जायेगी। वो हर समय इसी चिन्ता में लगी रहती है कि इस बच्चे का हित किस चीज़ में है? अगर बच्चा अपने हित को समझ लेगा तो माँ का भी कर्तव्य पूरा हो जायेगा। हालांकि मेरे अन्दर कोई इच्छा नहीं है फिर भी मेरा कर्तव्य है कि मैं आपको बताऊं कि आपको क्या प्राप्त करना चाहिए और आप कौन सी दशा में हैं। अब से झगड़े बहुत और ओछी बातें खत्म हो गयीं। इसमें कोई शक नहीं। आप लोग बहुत आनन्द में आ गये, प्यार के बन्धन में आ गये। फिर भी एक बात मुझे जो लगती है वो ये है कि सहजयोग करने के लिए, सहज योग फैलाने के लिये, हमारे पास फुरसत ही नहीं है । आपने जो पाया है उसे देने की उत्कट इच्छा होनी चाहिये। किस तरह से इसे दूं? किस तरह से मुझे देना है? इस तरह की भावना जब तक आपमें जागृत नहीं होती, इसलिए नहीं कि मैं अपने आपको दिखाना चाहता हूं कि मैं कोई बड़ा भारी वक्ता हूं, इसलिए नहीं कि मैं बड़ा भारी संगीतज्ञ हूं, लेखक हूं या बड़ा भारी कवि हूं, पर इसलिए कि मैं इसे देना चाहता हूँ। इसलिए नहीं कि मैं पैसा या नाम कमाना चाहता हूं पर इसलिए कि मैं इसे देना चाहता हूँ। ऐसे अन्दर से शुद्ध इच्छा होना चाहिए। तब आप देखियेगा कि कुण्डलिनी बढ़ती है। जब ये शुद्ध इच्छा का ये स्वरूप आ जायेगा, मेरी शुद्ध इच्छा कि मुझे आत्मसाक्षात्कार देना है। कौन इसे ले सकता है, कौन नहीं ले सकता है? लोगों को पार कराने की ज़बरदस्त भावना अन्दर होनी चाहिए। ऐसा आदमी बिना दूसरों की आलोचना किये अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होता जाता है। मेरे अन्दर तो ये ज़बरदस्त इच्छा है। ये इच्छा ही मेरी सब कुछ है। सहजयोग में इसी प्रकार एक ज़बरदस्त इच्छा होनी चाहिए कि हम सहजयोग को कायदे से फैलायें। अब आप लोगों

को मैंने छोड़ दिया है आप इसका प्रचार करें। हर जगह जायें, लोगों को बतायें कि सहजयोग क्या है? सहजयोग से क्या-क्या लाभ होता है। खासकर देहातों में आप कार्य करें। जो लोग बम्बई या दिल्ली शहर में बैटे हुए हैं उनसे विनती है कि सब गांव- गांव जायें, लोगों को समझायें। कम से कम भारत वर्ष के हर गांव में क्या आप नहीं सोचते कि मेरा संदेश पहुंचना चाहिए? सब लोगों को इसका पता होना चाहिए या क्या आप ही इसका मुजा उठाते रहें? अतः आप सबको मेरा कहना है कि रोज़ दिनचर्या में आप लिखें कि “आज मैंने सहजयोग के लिए क्या किया ?” कितने लोगों को हमने पार किया? कितने लोगों से हम मिले जिनसे हमने सहजयोग की बात की? इतना ही सब लोग मिलकर, इसको बना सकते हैं कि कितने लोग वहां जाएँगे – इतने लोग वहां जायेंगे। इसी प्रकार आपकी कुण्डलिनी का नया रूप आ जायेगा। आपके अन्दर से चैतन्य बहना शुरू हो जायेगा । आपके अन्दर से चैतन्य की लहरियां ऐसे बहेंगी जैसे सूर्य की किरणें लेकिन उसके लिए सबसे पहली चीज़़ जो मैंने आपको बताई वो ये कि आपके अन्दर देने की इच्छा होनी चाहिए। आज भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो आकर बताते हैं कि उसकी ये तकलीफ ठीक कर दी, उसकी वो तकलीफ ठीक कर दी । तो आपने ये नहीं देखना कि किससे क्या मिल सकता है। आपने देखना है कि किसी को क्या दे सकते हैं। किसकी क्या तकलीफ ठीक कर सकते हैं। किसी का यदि मेरू रज्जू (spinal chord) खराब हो गया है तो उसके बहुत से चक्र खराब हो गये होंगे। इसी प्रकार बहुत लोगों में अनेक प्रकार की दुविधाएँ हैं जिन्हें आप आसानी से मेहनत करके निकाल सकते हैं। हर एक आदमी को मैं नहीं देख सकती, हर एक आदमी को मैं नहीं ठीक कर सकती। लेकिन आपने शुरूआत कर दी तो आप जान लीजिए कि आप सर्वशक्तिशाली हो जायेंगे और आप सबको ठीक कर सकेंगे । ये ज़रूरी नहीं कि मैं ही सबको ठीक करूं, कोई ज़रूरी नहीं। आप थोड़ी सी मेहनत से सबको ठीक कर सकते हैं और आपकी मेहनत से ही आपके अन्दर की शक्ति एक नये स्वरूप में आ जायेगी और आप बैठे – बैठे यहां से ही लोगों के बारे में बता सकते हैं | यही एक आज के दिन मेरी इच्छा है। मेरी एक ही इच्छा है, कि इस चैतन्य से सारे भारतवर्ष में ही नहीं, सारे संसार में अमन चैन होना चाहिए। सारे संसार में शांति होनी चाहिए, सारा संसार ठीक होना चाहिए। ये मेरा अपना पूर्ण विश्वास है। जब आप लोग

इसमें उस इच्छा को लेकर, उस उत्कट इच्छा के साथ गर आप इसमें पड़ जायें तो किसी की मजाल नहीं, कोई कुछ नहीं कर सकता कि आप अपना लक्ष्य न पायें। वो (सहजयोगी) बढ़ता ही जायेगा, बढ़ता ही जायेगा क्योंकि आपके साथ परमात्मा साक्षात् चल रहे हैं, सारे देवदूत चल रहे हैं । इसलिए आप प्रयत्न करके देखिये । इसी प्रकार आपको सोचना चाहिए एक ही बात कि मैं सहजयोग के लिए क्या कर रहा हूं? चलो कहीं जाकर सहजयोग के लिए कुछ करें। और हम लोग जो कुछ भी करें एक जान होकर करें। इसी प्रकार हर एक को सहजयोग के लिए यथाशक्ति कार्य करना चाहिए। हर एक को दूसरे के कार्य की खबर होनी चाहिए कि वो क्या कर रहा है। ये सब आप ही कर सकते हैं। सहजयोग की जो भी प्रगति हुई है वो सब आप की ही वजह से हुई है क्योंकि में तो अब क्या करूंगी प्रगति, मेरी तो प्रगति हो चुकी। ये सब आपके लिये है और इस प्रगति के माध्यम से ही आप और भी प्रगति कर सकते हैं । इसके लिए मैं यही कहूंगी कि अगले जन्म दिन से पहले आप भारत वर्ष में सहजयोग को फैलायें तो आपसे दुरगने लोग सहजयोगी हो सकते हैं और आशा है कि अगले जन्मदिन के वक्त मैं सुनूंगी आपसे कि किस कदर आपने सहजयोगी बढ़ाये। सहजयोग के जो नियम हैं उन्हें ज़रूर पालना चाहिए। जैसे कल एक साहब आये थे उनकी दो पत्नियां हैं । कहने लगे ये सहजयोग में आने से पहले से हैं। मैंने कहा सहजयोग में अगर आपको आना है तो आप एक ही पत्नी के साथ रह सकते हैं, दो के साथ नहीं। इस प्रकार हर आदमी को सोचना चाहिए कि मैं इस नई दुनिया में आया हूं। मेरा चरित्र कितना उज्जवल है। यह बात चरित्र की है। मैं कितना बदल गया हूँ। ये सब ध्यान में आना चाहिए। लेकिन ये सब किस लिये बनाया जाता है। इसका कुछ न कुछ तो कारण होना चाहिए। क्यों आप अपने जीवन को बदलें? बदलना इसलिये आवश्यक है कि आपकी कुण्डलिनी ऊपर आ सके। आज मेरा आपको अनन्त आशीर्वाद है । मेरे बच्चे जो प्यारे हैं वो युग-युग जियें और संसार की भलाई करें। यह मेरा अनन्त आशीर्वाद आप लोगों के साथ है। बहुत