Shri Rama Puja

कोलकाता (भारत)

1991-03-25 Rama Puja Talk, Calcutta, India (Hindi), 56' Download subtitles: EN,TR,ZH-HANS,ZH-HANTView subtitles: Add subtitles:
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रामनवमी पूजा कलकत्ता, २५.३.१९९१

आप जानते हैं कि हमारे चक्रों में श्री राम बहुत महत्वपूर्ण स्थान लिए हुए हैं। वो हमारे राइट हार्ट पर विराजित हैं। श्रीराम एक पिता का स्थान लिये हुए हैं, इसलिये पिता के कर्तव्य या प्रेम में कुछ कमी रह जाये तो ये चक्र पकड़ सकता है। सहजयोग में हम समझ सकते हैं कि राम और सब जितने भी देवतायें हैं, जो कुछ भी शक्ति के स्वरूप संसार में आये हैं, वो अपना अपना कार्य करने आये हैं। उसमें श्रीराम का विशेष रूप से कार्य है। जैसे कि सॉक्रेटिस ने कहा हआ है कि संसार में बिनोवेलंट किंग आना है । उसके प्रतीक रूप श्रीरामचन्द्रजी इस संसार में आये हैं। श्रीराम पूरी तरह से मनुष्य रूप धारण कर के आये थे| वे ये भी भूल गये थे कि मैं श्रीविष्णु का अवतार हूँ। उन्हें भुला दिया गया था। किन्तु सर्व संसार के लिए वे एक पुरुषोत्तम राम थे। हम लोगों को सहजयोग में यह समझ लेना चाहिए कि हम किसी भी देवता को जब हम अपना आराध्य मानते हैं तो हमारे अन्दर उसकी कौनसी विशेषताएऐं आयी हुई हैं? कौन से गुण हमने प्राप्त किये हैं। श्रीरामचन्द्र जी के तो अनेक गुण हैं। ये बचपन का जीवन आप सब यह जानते हैं और उनकी सब विशेषतायें आप लोगों ने सुन रखी है । वह खुद भी तो पुरूषोत्तम थे। उनका एक गुण यह भी था कि राजकारण में सबसे ऊँचा उन्होंने जनमत को रखा, न कि अपनी पत्नी और बच्चे का ख्याल किया। आजकल के राजकीय लोग गर इस चीज़ को यदि समझ लें तो वो नि:स्वार्थ हो जाएंगे, धर्मपरायण हो जाएंगे। श्रीराम की जो प्रतिमा है उसे आज तक किसी ने अपनाने का प्रयत्न नहीं किया। उनके भजन गा लेने से, उनके नाम से संस्थाएं तथा राम मंदिर बना लेने से क्या श्रीराम आपके अन्दर प्रवेश कर सकते हैं? क्या आपके जीवन में उनका प्रकाश आ सकता है या नहीं? यह सिर्फ सहजयोगी ही कर सकते हैं कि अपने अन्दर बसे श्रीराम हुए को अपने चित्त के प्रकाश में लाएं। वो अत्यन्त निर्पेक्ष थे। ऐसे तो सभी देवता लोग किसी भी पाप पुण्य से रहित होते हैं। जैसे कि श्रीकृष्ण ने इतने लोगों को मारा, श्रीराम ने रावण का वध किया। ये हमारे दुनियावी दृष्टि से हो सकता है कि पाप हो किंतु परमात्मा की दृष्टि से नहीं हो सकता। क्योंकि इन्होंने दष्टों का नाश किया है, इन्होंने बुराई को हटाया। और इनको अधिकार है कि ये इस कार्य को करने के लिए जो कुछ भी कर सकते हैं वो करे । जैसे देवी ने राक्षसों का संहार किया है, तो कोई कहेगा कि देवी ने पाप किया। परंतु उनका कार्य ही ये है कि वो राक्षसों का संहार करें और जो साधू हैं उन लोगों को संभालें । श्रीरामचन्द्र के जीवन में एक अहिल्योद्धार बहुत बड़ी चीज़ है। उन्होंने अहिल्या का उन्होंने उद्धार किया था । क्योंकि उसके पति ने उसे शापित कर दिया था। उस जमाने में कोई भी स्त्री किसी भी तरह से वाम मार्ग में चली जाती थी तो उसका पति अगर साधु हो और उसकी स्थिति ऊँची हो, तो उसे शापित कर देता था। किंतु अहिल्या पर झूठा ही उन्होंने आरोप लगाया गया था और इस तरह से उसे भी उन्होंने पत्थर बना दिया था। तो श्रीराम ने उस अहिल्या का भी उद्धार कर दिया था। विशेषकर उनकी जो एक पत्नी के प्रति प्रेम की, उनका जो एक व्रत था वो बहुत समझने लायक है। हालांकि वो जानते थे कि सीताजी महालक्ष्मी स्वरूपा हैं वे स्वयं देवी है। किन्तु मनुष्य के रूप में उन्होंने अपने पत्नी के सिवाय किसी और स्त्री की तरफ आँख उठा कर भी नहीं देखा । जब हम राम की बात करते हैं तो हमारे अन्दर जो पतित्व है वो भी स्वच्छ होना चाहिए। अगर कोई स्त्री श्री राम के बारे में सोचती है तो उसको भी अपने पति के प्रति वैसी ही श्रद्धा होनी चाहिए कि जैसी सीता जी को अपने पति के प्रति थी। और उसी प्रकार पति को भी श्रीराम जैसे एक पत्नी व्रत होना चाहिए। सहजयोग में ये बात कठिन नहीं। स्त्री का मान रखना चाहिए । जब रावण सीताजी को उठा ले गये थे तो श्रीराम ने ये कर्तव्य समझा कि सीताजी को वहाँ से छुड़ाकर लाएं। पर जनमत को रखने के लिए महालक्ष्मी सीता को जिन्हें इतने वर्ष मेहनत करके वे उसे छुड़ा कर लाए थे, उन्होंने त्याग दिया। सीताजी स्वयं साक्षात् देवी थी उनको त्यागने का तो कोई विशेष परिणाम नहीं होने वाला था पर फिर भी श्री राम ने उन्हें त्याग दिया था ताकि लोग ऐसी बातें न करें कि जो जनहित के खिलाफ हो और उनका आदर्श किसी तरह से ऐसा न बन जाए कि जिससे लोग अपने यहाँ इस तरह की औरतों को पनपाएं, जिस पर भी लोग शक करते हैं । हालांकि वो निष्कलंका थी और देवी स्वरूपा, स्वच्छ और निर्मल थी। त्यागे जाने पर सीताजी ने भी श्रीराम का एक तरह से त्याग

कर दिया। उन्होंने, सीताजी ने एक स्त्री के जैसे रामचंद्रजी का त्याग किया और श्रीरामचन्द्र जी ने एक पुरुष के जैसे उनका त्याग दिया। धर्म के लिए श्रीरामचन्द्र और सीताजी ने एक दूसरे को त्याग दिया, सीताजी स्वयं ही पृथ्वी में समा गयी और फिर अन्त में श्रीराम जी ने भी अंत में सरयु नदी में अपना देह त्याग दिया। इस प्रकार इनका जीवन अत्यन्त घटनात्मक और बड़ा चमत्कारपूर्ण है। सारे जीवन में देखिये तो सीता और राम का आपस का व्यवहार और उनका एक दूसरे के प्रति श्रद्धामय रहना। हालांकि उन्होंने सीताजी का त्याग किया था पर सीताजी ने सोचा कि ये उनका परम कर्तव्य है और उन्होंने कभी उनकी बुराई नहीं की। अत: उन्होंने कभी उनकी बुराई नहीं की। और बड़ी सुगमता से अपने बच्चों को चलाया, उनको पनपाया, उनको बढ़ावा दिया। इस श्रीराम के जो दो बच्चे हुए, जिनको हम लव और कुश कहते हैं, वो भी एक भक्त स्वरूप, कहना चाहिए कि जो इस संसार में आए और उनको हम शिष्य की तरह से देख सकते हैं। ये शिष्य की द्योतक है ये और हमारे लिये भी शिष्य की एक शक्ति हैं कि जिससे हम किसी के शिष्य हो सकते हैं। शिष्य स्वरूप इन लोगों ने बहुत छोटे उम्र में धनुष विद्या सीख ली थी और इस छोटेपन में ही उन्होंने रामायण आदि और संगीत पर बहुत ही कुछ प्रावीण्य पाया था। इसका मतलब ये है कि शिष्य को पूरी तरह से अपने गुरु को समर्पित होना चाहिए। ये शिष्य का जो स्वरूप है वो हमारे अन्दर भी उपस्थित है। और माँ जो कि एक शक्ति है, उसके प्रति वो पूरी तरह से समर्पित थे। उस वक्त श्रीराम से भी लड़ने के लिए वे तैयार हो गए, उनकी अपनी माँ के लिए। तो माँ को उन्होंने दुनिया में सबसे ऊँची चीज़ समझी और उस माँ ने भी अपने बच्चों का पालना, उनको आश्रय देना, उनको धर्म में खड़ा करना और उनकी पूरी प्रगति करना एकमेव कर्तव्य समझा। नहीं तो आज कल की पत्नियाँ तो रात दिन रोती रहेंगी कि मेरे पति ने मुझे छोड़ा, मेरे पति ने मुझे छोड़ दिया। और जब पति मिल गया तो लड़ती रहेंगी उनसे हर दम और जब पति ने छोड़ दिया तो लड़ती रहेंगी हर दम। छोड़ दिया तो कोई बात नहीं, मेरे बच्चे हैं, जिनको मुझे सम्भालना है और इसके प्रति कोई भी ऐसी बात नहीं होनी चाहिए कि जिससे मेरे बच्चों का कुछ कम रह जाये । ये एक सीताजी की एक विशेष जीवनी है कि उनकी वीरता और उनका साहस। ये हर स्त्री को अपने अन्दर बसाना चाहिये कि अगर पति से अगर विछोह भी हो गया और किसी तरह उनसे दूर भी अगर हट गये तो भी पति के कारण अपना नुकसान नहीं कर लेना चाहिये। अपने बच्चों का नुकसान नहीं कर लेना चाहिये। क्योंकि उनके लिए अपना जो कर्तव्य है वही परम चीज़ है। उस परम चीज़ पर अटूट रहना चाहिये। यही हमारे सहजयोग में, शक्ति में जो पाया है, उसे हर स्त्री को पा लेना चाहिए। श्रीराम का जीवन भी जैसे अत्यंत शुद्ध और निर्मल था और उन्होंने अपने पत्नी के लिए सब चीज़ त्याग दी थी। जब से उनकी पत्नी वनवास में रह गयी या जब उन्हें अकेला रहना पड़ा और जब उन्होंने उसका त्याग कर दिया तो उन्होंने भी दुनिया के जितने भी आराम थे, उन्हें छोड़ दिये। उसके लिए आप जानते हैं वो कुश (घास) पे सोते, जमीन पर सोते, नंगे पैर चलते और साधु पुरुष जैसे कपड़े पहन कर घूमते थे । ये सब कहानियाँ नहीं है। ये सत्य है। अपने भारत वर्ष में, दुनिया में भी ऐसे अनेक लोग हो गये हैं जिनका जीवन एक बहुत ऊँचे किस्म का रहा है और उन्होंने कभी ऐसी छोटी, ओछी बातें सोची नहीं है । पर ये सारे आदर्श हमारे देश में आने के बाद ये हो गया है कि हमारे | अन्दर ढोंग आ गया है कि हम तो राम को मानते हैं। हमने राम का भजन कर लिया और हो गया। तो यह एक तरह का ढोंगीपना हो गया। जिन देशों में ऐसे आदर्श नहीं हैं तो वो कोशिश करते हैं कि हम आदर्श कैसे बने, हम कैसे अपने को ठीक करें? क्योंकि आप के सामने एक आदर्श हो गये हैं और अब हम तो श्रीराम नहीं हो सकते हैं। ये बन गये श्रीकृष्ण, अब हम श्रीकृष्ण नहीं बन सकते । ये बन गये वो बन गये और अब हम वो न ही बन सकते है। इस तरह की भावनायें हम ले लेते हैं। लेकिन अगर हमारे अन्दर श्रीराम हैं। तो उनका प्रकाश हमारे चित्त में तो आ ही सकता है। हम क्यों नहीं इसे प्राप्त करें ? हम उस स्थिति को जानने की क्यों न कोशिश करें जिस स्थिति में श्रीराम इस संसार में आए थे। एक सहजयोगी को ये विचार कर लेना चाहिए कि श्रीराम की स्थिति अगर हम प्राप्त कर लें तो अपने यहाँ का राजकारण ही खत्म हो जाएगा। अपने यहाँ की जितनी परेशानियाँ हैं ये सब खत्म हो जायेंगी जिस दिन लोग ये ठान ले कि हम ही रामचंद्र जी जैसे हो गये। अपनी प्रजा का वे बिल्कुल निरिछ भाव से, विदेह रूप से वे लालन-पालन करते थे। और सब तरह की अच्छाइयाँ लोगों में आ जाये ऐसा पूरी तरह से वे प्रयत्न करते थे। उनमें धर्म आ जाए, पहली चीज़ उनकी उन्नति हो जाए, उनके अन्दर शिक्षा हो जाये, महान आदर्शों की स्थापना हो, ऐसा उन्होंने पूरे समय प्रयत्न किया और उस लिये अपना जीवन बहुत आदर्शमय बनाया। गर समझ लीजिए कि अगर कोई आपको कुछ कह रहा है और वह स्वयं ही वैसा नहीं है, तो आप

को क्यों उसके प्रति श्रद्धा होगी ? स्वयं आदर्शों पर न चलने वाले व्यक्ति के प्रति कभी श्रद्धा हो ही नहीं सकती और आप उसके गुण ले ही नहीं सकते । बहुत से लोग हमेशा कहते हैं कि हम उनको मानते हैं लेकिन मैं देखती हूँ कि वो उसके बिल्कुल उल्टे होते हैं। जो रामभक्त होते हैं वो सबसे बड़े चोर पॉलिटिशन होते हैं या फिर उनकी दस बीबियाँ होती हैं। तो फिर आप राम को कैसे मानते हैं? इसी प्रकार जीवन में एक सहजयोगी का कर्तव्य क्या होता है कि हमें भी इन देवताओं के प्रकाश को हमारे चित्त में लाना चाहिये। हर चीज़ की ओर उसी तरह से देखना चाहिए कि श्रीराम, श्रीराम क्या करते थे ? ऐसा अगर प्रश्न आता तो सीताजी क्या करती? सीताजी क्या कहती ? सीताजी का क्या बर्ताव होता ? इस तरह से अगर कोई सोचे तो वह घर की गृहलक्ष्मी हो ही जाएगी। आप तो जानते हैं कि सीताजी ने अनेक जन्म लिये| उसमें से एक गृहलक्ष्मी का स्थान जो है वह फातिमा बी के रूप में था। वह घर में घूंघट में, पर्दे में रहती थी, पर सारा धर्म का कार्य उस शक्ति ने किया था । उसके लिये जरूरी नहीं कि आप बाहर जाकर के बहुत लेक्चर्स दे और बहत बड़े कोई लीड़र हो जाये। ये कोई जरूरी नहीं है । आप घर में रह करके ये कार्य कर सकते हैं। अपने बाल-बच्चे हैं, जान – पहचान हैं, इष्ट मित्र हैं उन सबमें आप सहजयोग फैला सकते हैं। लेकिन पहले आपमें ये चीज़ आनी चाहिए। उसके बाद ये सब कार्य होने के बाद आप समाज में भी आ सकती हैं। पर पहले औरतों का सीताजी के जैसे शुद्ध आचरण का होना चाहिए । शुद्ध आचरण में पहली चीज़ है ममता और प्यार। अपने पति के साथ जब वो जंगलों में रहती थीं अपने पति के साथ तो कभी उन्होंने यह नहीं कहा कि मेरा पति पैसा नहीं कमाता, वो नहीं करता (जैसा हमारे यहाँ औरतों की आदत होती है) ये चीज़ नहीं खरीदता, वो नहीं खरीदता। वो जंगल में है तो मैं भी जंगल में हूँ। वो जो खाते हैं वो मैं खाती हूँ। उनके खाने से पहले मैं खा लेती हूँ, ऐसा तो नहीं, न मैं करती हूँ। वो खा लें, उनको खाना खिला दें, अपने देवर को खाना खिला दें, उसके बाद मैं खा लूंगी। आज औरतें ये सोचती हैं कि हमारे ऊपर बहुत ज्यादा दबाव आ जाता है। ये बात नहीं है। स्त्रीपृथ्वी तत्व जैसी होती है। इसमें इतनी शक्ति है कि ये बहुत दबाव को खींच सकती है। सारी दुनिया को देखिये । कितने फल – फूल आदि, पत्तियाँ पृथ्वी सब दे रही है। इसी प्रकार | इस पृथ्वी तत्व के जैसे ही हम स्त्रियाँ हैं। हमारे अन्दर इतनी शक्तियाँ हैं, कि हम सब तरह की चीज़ अपने अन्दर समा सकते हैं और अपने अन्दर से हम हमेशा प्रेम की वर्षा दे सकते हैं। ये हमारे अन्दर परमात्मा ने शक्ति दी है। स्त्री शक्ति स्वरूपिणी है, शक्ति का सागर है और उसके सहारे पुरुष जो है वो अपने कार्य को करता है। एक जैसे कि उसको कहते हैं कि पोटेंशिअल और एक काइनेटिक, तो पोटेन्शिअल तो स्त्री है और पुरूष जो है वो काइनैटिक है । लेकिन पुरूष को देखकरके कि अन्तः शक्ति गति-मूलक (काइनैटिक), पुरुष ज्यादा दौड़ सकता है, उसे देख यदि औरत भी दौड़ने लग जाये तो ठीक नहीं। उसको तो बैठने की जरूरत है । दोनों की क्रियाएं अलग-अलग हैं। और उस क्रिया में दोनों को समाधान होना चाहिए। दोनों ही क्रिया में स्त्री बहुत पनप सकती है और जब समय आता है तो स्त्री पुरुषों से भी ज्यादा काम कर सकती है। आपको मालूम होगा कि महाराष्ट्र में ताराबाई नाम की सत्रह साल की एक विधवा थी, शिवाजी की वो छोटी बहू थी। सब हार गए औरंगजेब से और इसने औरंगजेब को हरा दिया। सत्रह साल की उमर में और उसकी कब्र बना दी औरंगाबाद में। तो आप समझ सकते हैं कि जब औरत अपनी शक्ति को पूरी तरह से समा लेती है, तो वो बड़ी प्रचंड हो जाती है। और अगर वो इधर -उधर अपनी शक्ति को फेंकती रहे, कहीं लड़ने में गई, कहीं झगड़े में गई, बुराई में गई, ओछेपन में गई, तो उसकी शक्ति सारी नष्ट हो जाती है। स्त्री जो है, वो इतनी शक्तिशाली है कि वो चाहे तो पुरुषों से कहीं अधिक कार्य कर सकती है। पर सबसे पहली चीज़ है कि वो अपनी शक्ति का मान रखे। तो स्त्री का कार्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है, गौरवपूर्ण है । स्त्री बहुत लज्जाशील और बहुत सूझबूझ वाली होनी चाहिए। जैसे आदमी लोग गाली बकते हैं, बकने दों। औरतें नहीं बक सकती हैं । आदमी लोगों का बहुत झगड़ा हुआ तो मारपीट कर लेंगे । औरतें नहीं कर सकती। इनका कार्य जो है वो शान्ति देने का है, इनका कार्य है संरक्षण का। इनका काम है लोगों को बचाने का। जैसे कि एक ढाल है। ढाल तलवार का काम नहीं कर सकती और तलवार ढाल का काम नहीं कर सकती। पर ढाल बड़ी या तलवार ? ढाल ही बडी है। जो तलवार का वार सहन कर ले वो बड़ी कि तलवार बड़ी? एकाद बार तलवार भी टूट जाएगी पर ढाल नहीं टूटती। इसलिए औरतों को भी अपनी शक्ति में समा लेना चाहिए। इस शक्ति की सबसे बड़ी जो धुरा है वो है नम्रता । नम्रतापूर्वक अपनी शक्ति को अपने अन्दर समा लेना चाहिए। यह कार्य कठिन नहीं है सहजयोगियों के लिये। सहजयोगियों के लिये बिल्कुल ही यह कार्य कठिन नहीं। मैं देखती हूँ कि बहुत सी सहजयोगिनी औरतें इतनी

बकवास करती हैं। कहीं जाएंगी तो आदमियों से बक-बक करेंगी। तो आदमियों से ज्यादा बात करने की कोई जरूरत नहीं। बेकार की बकवास करने की जरूरत ही क्या है ? औरतों में भी बेकार की बकवास करने की कोई जरूरत नहीं। सहजयोग में मैंने देखा है कि जैसे आदमी लोग सीखते हैं, वैसे ही औरतों को भी सीखना चाहिए। सहजयोग क्या है? इसके चक्र क्या हैं? कौन से चक्र से आदमी चलता है? कौन से चक्र से उसकी क्या दशा होती है? इसका पूरा ज्ञान होना चाहिए । ये सब आदमी सीखेंगे तो औरतें पीछे रह जाएंगी। ये सब औरतों को सीखना चाहिए । अब पुरुषों की बात करना है तो श्रीरामचन्द्रजी का हमारे सामने आदर्श है। मुझे लगता है कि इस मामले में मुसलमानों ने बड़ा गजब किया हुआ है। मैं उनको बूरा नहीं कहती। उनके देश में ये बात नहीं है। जैसे कि आप रियाद जाएं तो कोई मुसलमान आपके ऊपर आँख उठा कर नहीं देखेगा। कोई औरत होगी, उसकी बड़ी इज्जत करेंगे । रास्ते से अगर कोई औरत जा रही है तो वो मोटर रोक लेगा। वहाँ औरतों की इतनी इज्जत होती है। और हमारे यहाँ जो है पता नहीं कि क्या है कि इतना इनका ऐसा उलटा असर पड़ा है कि लोग सोचते हैं कि औरत एक बिल्कुल उपभोग की वस्तु है। हर औरत की तरफ देखना चाहिए । उनकी गर्दन मुड़ जायेगी पर देखते रहेंगे। हर स्त्री की ओर नज़र डालना महापाप है। और सहजयोग में निषिद्ध माना जाता है। बिल्कुल निषिद्ध है। इससे आपकी हम आँख खराब हो जाएगी, पहली चीज़। सहजयोग में तो और भी नुकसान हो जाएगा और सहजयोगी को और भी नुकसान हो जायेगा। अगर वो नहीं हुआ तो अन्धे भी हो सकते हैं। जब आँखें इधर-उधर घूमती रहेगी तो इससे सबसे बड़ा जो नुकसान है वो आपका चित्त है। आपका जो चित्त है वो इधर-उधर विचलित हो रहा है। चित्त अगर विचलित हो गया तो आत्मसाक्षात्कार का क्या फायदा होगा? अगर चित्त एकाग्र नहीं होगा तो वह कार्यान्वित नहीं हो सकता। एकाग्र चित्त ही कार्यान्वित होता है। एकाग्रता को साध्य करना चाहिए। अब विदेश में ये बीमारी आदमियों को बहुत ज्यादा है। आरतों को भी है, पर आदमियों को ज़्यादा है। जो विदेशी सहजयोगी हैं वो उसे बहुत अच्छी बात नहीं समझते| उसे वो गंदी चीज़ समझते हैं, जब से सहजयोग में आये हैं। मुझ से पुछा, ‘माँ, इसका इलाज बताओ।’ मैंने कहा कि तुम लोग सिर्फ जमीन की तरफ देख के चलो और तीन फुट से ऊपर देखने की जरूरत नहीं है। तीन फुट तक सब अच्छी चीज़ें दिखायी देती हैं। फूल, बच्चे सब तीन फुट तक होते हैं। उससे ऊपर देखने लायक है ही क्या ? तो इस तरह से अपने चित्त को वश में करना चाहिए । श्रीराम का मान यदि आपके मन में है तो आपको उनके जैसे अपने चित्त को वश में करना चाहिए। अपनी पत्नी से भी यही समझाना चाहिए कि तुम शक्ति हो और हम तुम्हारी इज्जत करते हैं। पर तुम्हें उसके योग्य भी होना चाहिए। जैसे ‘यत्र नार्या पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवता:’ अर्थात् जहाँ स्त्री पूजी जाती है वहीं देवता रहते हैं। पर वो पूजनीय भी होनी चाहिए। किसी गन्दी औरत, दुष्ट या राक्षसी स्वभाव की औरत की कोई पूजा करेगा क्या? तो जो औरत पूजनीय है वहीं पर उसकी पूजा होनी चाहिये और वहीं पर देवता रहते हैं। सबसे पहले ये भी जान लेना चाहिए कि ये हमारे बच्चों की माँ है। गर पति अपनी औरत को बच्चों के सामने डाँटना, फटकारना शुरू कर दे, उसकी कोई इज्जत न रखे तो कभी भी बच्चे उसका मान नहीं करेंगे। स्त्री को भी पति का कभी भी अपमान नहीं करना चाहिए। औरत चाहती है कि मेरी चले, आदमी चाहता है कि मेरी चले । आदमियों को चलाना अगर औरत को आ जाये तो कभी भी झगड़ा न हो। लेकिन ये समझ लेना चाहिए कि आदमी को चलाना बहुत ही आसान चीज़ है क्योंकि वह बिल्कुल बच्चों जैसे होते हैं। उनको चलाना बहुत ही आसान है। उनका स्वभाव बच्चों जैसा होता है, भोले-भाले होते हैं। उनको बेकार की बातों से परेशान करने से आप उन्हें चला नहीं सकते। लेकिन उनको भी एक बच्चों | जैसे माफ कर दिया जाये। आदमी बाहर जाते हैं, सबसे लड़ाई झगड़ा करते हैं, आफ़त उनकी रहती है। घर में आकर बीवी पर नहीं बिगड़ेंगे, बाहर वालों पर बिगड़ेंगे तो मार ही खायेंगे। चलो बिगड़़े तो बिगड़े, तो चलो क्या है इसमें । इस तरह की स्त्री में भावना जब तक पति की तरफ नहीं होगी तब तक आपस में सामंजस्य नहीं आ सकता, प्यार व आनन्द नहीं आ सकता। लेकिन पति को भी चाहिए कि अपनी पत्नी को क्या चाहिए, क्या नहीं चाहिए इसका विचार रखें। लेकिन ये नहीं कि अब पत्नी है और कुछ गलत बात कहे या कोई गलत सलाह दे, उसपे जरूर पति को कहना चाहिए कि ये गलत है ये नहीं करना। लेकिन छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करने की कोई जरूरत नहीं। और ये सहजयोगियों को बिल्कुल नहीं शोभा देता। मुझे बड़ा आश्चर्य होता है कि सहजयोगी भी आपस में लड़ते रहते हैं। दो सहजयोगी एक स्थान पर ठीक से नहीं रह सकते। हर वक्त लड़ते रहते हैं और मैं तो सारे संसार को कहती हैँ कि | हमें प्रेम से रहना है तो फिर हम सब कैसे प्रेम से रहेंगे बताओ। तो पहली चीज़ है कि पति को पूरी तरह पत्नी के प्रति जागरूक रहना

चाहिए और ये जान लेना चाहिए कि सारे संसार की औरतें जो हैं वो आपके लिए माँ और बहन के बराबर है। सहजयोग में आकर भी यदि व्यक्ति की स्थिति स्वच्छ नहीं हुई तो वो कहीं भी नहीं हो सकता है। अभी वो सहजयोगी नहीं हैं। हमारे संस्कृति की जो विशेषता है कि स्त्री-पुरुष का आपस में मेल-जोल बस भाई-बहन तक का होना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं होता। मैं देखती हूँ कोई औरत है फौरन बक-बक करना शुरू कर देगी। औरतों के साथ नहीं बैठेगी। आदमियों के साथ बैठेगी। ऐसे ही कुछ आदमी भी होते हैं। स्त्रीलम्पट। उन्हें औरत अगर दिखाई दी कोई तो बस लग गये उसके साथ । कोई उनको अपना आत्मसम्मान ही नहीं होता है और इसको हम पुरुषार्थ समझते हैं। अरे भई, पुरुषोत्तम तो श्रीराम हैं, वे पुरुषार्थी हैं। वो तो वहाँ बैठे हुए हैं जिन को कहना चाहिए कि पुरुषार्थी हैं और जो बिल्कुल ही पाताल में हैं वो भी अपने को पुरुषार्थी समझते हैं | इसमें कौनसा पुरुषार्थ है? या तो फिर श्रीराम को मत मानो। एक शैतान को मानो। अगर श्रीराम को मानते हो तो उनके आदर्शों (आयडियल्स) पर चलो। और इसी कारण अपने यहाँ अपने बच्चे भी खराब हो रहे हैं, औरतें भी खराब हो रही हैं फिर भी मैं भारतीय संस्कृति की विशेषता कहुँगी कि औरतों ने बहुत सम्भाल लिया है। अगर अमेरिकन जैसी औरतें होती तो आपको सब पहुँचा देती ठिकाने। अगर आदमी की दो-तीन शादियाँ हो गईं तो वो झोली लेके घूमता है। और औरत की दो-तीन शादियाँ हो गईं तो वह महल खड़े कर देती है वहाँ । पर वहाँ है क्या? वहाँ के समाज की ही अवस्था क्या है? बच्चे घर छोड़ कर भाग जाते हैं। अपने हिन्दुस्तान की औरतों की यह विशेषता है कि वो अपने घर को सम्भालती हैं। अपने बच्चों और पति को सम्भालती हैं। पर ये चीज़ बदल रही है। वो भी देख रही हैं कि अगर हमारा आदमी ऐसा है तो हम क्यूँ न करें। वो अगर दस औरतों के साथ दौड़ता है तो हम पन्द्रह आदमियों के साथ जाएंगे। वो गन्दे काम करता है और नर्क में जा रहा है तो मैं उससे पहले नर्क में जाऊंगी। धर्म की धूरा जो है वो स्त्रियों के हाथ में है। स्त्री को सम्भालना है, स्त्री को ही पति को धर्म के रास्ते पर लाना है। समझा बुझा कर के उसको अपने पास रखना है। ये स्त्री का बड़ा परम कर्तव्य है। उसके अन्दर ये शक्ति है। अगर वो ही स्वयं धर्म पर बैठी हुई है, और धर्म में सबसे बड़ा धर्म है क्षमा। क्षमा करना यदि स्त्री में न आये तो वो कोई सा भी धर्म करे उससे कोई फायदा नहीं। पहली चीज़़ उसमें क्षमा होनी चाहिए। बच्चों को क्षमा करना चाहिए, पति को क्षमा करना, घर के नौकरों को आश्रय देना ये स्त्री का कर्तव्य है। तो कुछ ऐसा आ जाता है अपने को कि, जो हम कार्य कर रहे हैं ये राम भी नहीं कर सकते थे, कृष्ण भी नहीं कर सकते थे, तुम ईसामसीह भी नहीं कर सकते थे। अगर राम होते तो बस वो तुम सबको मार ही डालते थे कि तुम सब बेकार हो। तुम अधमी हो, औरतों के पीछे में भागते हो, तुम स्त्री लम्पट हो । ऐसे न जाने कितने लोगों को खतम कर देते । दूसरे, अगर कृष्ण आते तो वो सुदर्शन चक्र चलाते, वो भी गड़बड़ हो जाती, ईसा आते तो हमको सूली (क्रुसीफिकेशन) पर चढ़ा देते । ये तो बहुत ही अच्छा है, एक बार में क्रूसीफिकेशन हो जाता। रोज रोज के क्रुसीफिकेशन से तो बच जाते। ये तो माँ ही कर सकती है। उसके अन्दर प्यार की शक्ति इतनी जबरदस्त है कि कोई भी चीज़ हो वो उसके प्यार की शक्ति के साथ पार हो जाती है। वो सब चीज़ उठा लेती है और उसके तरीके ऐसे प्यारे होते हैं कि फिर बच्चे उसको बुरा नहीं कहते। कोई बात हो गई, समझ लो कि कुछ गडबड़ हो गई तो माँ ही जानती है | किस तरह से टाल देना है और फिर डाँट भी सकती है। क्योंकि बच्चे जानते हैं कि माँ हमें प्यार करती है। वो हमारे हित के लिए कहती है। वो उसका बुरा नहीं मानते। गर बाप डाँट दे तो हो सकता है कि बच्चे उनसे मुँह मोड़ लें, पर माँ से नहीं । क्योंकि माँ का प्यार तो निर्वाज्य है वो कुछ नहीं चाहती अपने लिए । वो ये चाहती है कि मेरे बच्चे ठीक हो जायें । मेरी सारी शक्तियों को प्राप्त करें । अपने अन्दर जो भी कुछ बहुत ही आगाऊ होती हैं। सब चीज़़ में घुसने जायेंगे। सब चीज़ में बोलते जायेंगे। उसका पति तो बेचारा चुपचाप बैठा रहेगा, ये ही देवी जी सामने खड़ी होंगी। ऐसे जब होता है तो बच्चे बिगड़ जायेंगे| तब ऐसे संसार में रह कर औरतों को ऐसे बच्चे पैदा भी हो सकते हैं कि मेरा अच्छा है वो सब प्राप्त करें। ऐसे अगर माँ समझे तो बच्चें ठीक हो जाएं। पर बहुत सी माँयें बहुत ज़ज्बाती भी हो सकते हैं और हानिकारक भी हो सकते हैं । तो स्त्री को पीछे रहना चाहिए और पति को आगे रखना चाहिए। जो ठीक है, जो कुछ भी है पति करे, पत्नी पीछे से उसकी मदद करते रहे। उसकी शक्ति का स्रोत ही स्त्री है। ये समझ लेना चाहिए कि एक स्त्री को कितना शुद्ध होना चाहिए। कितनी मेहनत करनी चाहिए। आप कहेंगे कि माँ सब स्त्रियों पर छोड़ते हैं, क्योंकि मैं जानती हूँ आप शक्तिशाली हैं। मैं जानती हूँ कि हमारे अन्दर बड़ी शक्तियाँ हैं, क्योंकि मैं माँ हूँ। देखिये मेरे ऊपर सबने छोड़ दिया कि आप सब

लोगों को पार करो। इतनों की बीमारियाँ ठीक करो, फिर लोगों को पार कर दो। ऐसे किसी ने काम किये थे ? एक अहिल्या का उद्धार कर दिया फिर हो गया। उसके बाद किसका उद्धार किया ? ईसामसीह ने कुल मिलाके इक्कीस लोगों को ठीक किया। अभी तो मैंने इक्कीस हज़ार लोगों को ठीक किया होगा। दुनियाभर में घूमो, फिरो, सबका ये काम करो, वो करो, ये दुनिया भर में भ्रमण करना, सब चल रहा है, पर कुछ नहीं लगता क्योंकि वो शक्ति प्यार की है। वो प्यार की शक्ति मेरे से आगे दौड़ती है। में घर से बाहर निकलने से पहले सोचती हूँ कि बन्धन ले लूं कि न जाने कैसे लोग आ कर के मेरे पैर पकड़ ले। लेकिन भूल जाती हूँ और जैसे ही ऐसे वैसे आदमी मेरे सामने आते हैं, मैं झट से उनकी सब परेशानियाँ अपने अन्दर खींच लेती हूँ। तो प्यार ऐसा है कि वो अपने आप ही कार्यान्वित करता है। तो मैं उसको जानती हूँ कि ये प्यार है और इसीके सहारे से सारा कार्य हो सकता है। मैं नहीं बुरा मानती। जो भी हो रहा है, ठीक है। तकलीफ होगी, तो होने दो, कोई हर्ज नहीं, ये सब माँ ही कर सकती है और इसलिए विशेष मेरा आपके तरफ रूख है कि आप समाधान और स्थिरता के साथ कार्य करें। और पुरुषों को भी चाहिए कि वे अब अपनी औरतों की पूरी सहायता करें, उनको समझें, उनका आदर करें और जब तक एक रथ के पहिये एक जैसे नहीं होते तो रथ घूमता ही रहता है। रथ आगे नहीं जायेगा। दोनों एक ही जैसे होने चाहिए पर एक बांये को है, एक दांये को है। बांये वाला दायें में लगाओ तो वो लगेगा नहीं और दायें वाला बायें में नहीं लगेगा। इसलिये ये दो तरह के चक्के हैं और ये दोनों तरह के चक्के चल रहे हैं इसलिए क्योंकि ये एक जैसे भी हैं और एक जैसे हैं भी नहीं। एक जैसे माने ऊँचाई में, लम्बाई में, बढ़ाई में, लेकिन इनका कार्य जो है वो अलग-अलग है। इसी प्रकार हमारे भी जीवन में होता है। श्रीरामचन्द्रजी ने केवल पति-पत्नी का ही विचार नहीं किया। बच्चों का और अपने कुटुम्ब व्यवस्था का ही विचार नहीं किया, | अपने भाई, बहन, माँ, बाप सब का विचार किया। जैसे एक मनुष्य को होना चाहिए। और उसके बाद उन्होंने समाज का भी विचार रखा। जन का विचार रखा, देश का विचार रखा, राज्य का भी विचार रखा। जैसे कि एक मनुष्य की सारी गतिविधियाँ जो होती हैं उन सारी गतिविदियों में उन्होंने दिखाया कि मनुष्य को किस तरह से होना चाहिए। जो मनुष्य अपनी पत्नी को इतना प्यार करता था और जो जानता था कि वो सम्पूर्णतया शुद्ध है उसको उन्होंने त्याग दिया। आजकल तो पत्नी के नाम ये बनाओ, ये देना है, वो देना है और अगर कहे कि गरीब को थोड़ा दो, पैसा दो, तो नहीं देंगे। नहीं तो अपने बच्चों को दो । अपने भांजों को दो| ये तो राजकीय लोगों की बीमारी है। और इन्होंने अपनी पत्नी का जो कि स्वयं साक्षात् देवी स्वरूपा अत्यंत शुद्ध थीं उसका तक त्याग कर दिया। तब फिर हमें सोचना चाहिए कि ये हमारा ममत्व है, रिश्तेदारी है कि मेरा घर, ये मेरा है। विदेश में पहले पति-पत्नी का कुछ नहीं होता। अब जो वो ठीक हो गया है सहजयोग में तो अब वो पत्नी ही सब कुछ हो गई। हमारे यहाँ कम से कम चार-पाँच लीडर ठीक पत्नी की वजह से निकल गये है। क्योंकि उनकी पत्नी ठीक नहीं थी, पति ठीक थे। पत्नी पढ़ा-पढ़ा कर के उनके विचारों का सत्यानाश कर दिया। कम से कम पाँच लोग पत्नी की वजह से बाहर निकल गये। सो, यहाँ भी मैं कहूँगी कि पत्नी को समझना चाहिए कि सहजयोग क्या है। और उसमें अपना क्या स्थान है। और पति को भी पत्नी से ऐसे मामले में जरा सा भी नहीं सहमत होना चाहिए । उससे कहना चाहिए कि, ‘तुम बहुत ज्यादा बोलती हो-बहुत ज्यादा दौड़ती हो। तुम चुप बैठो। तुम किसी काम की नहीं हो। तुम्हारे चक्र ठीक नहीं है।’ जब पति इस तरह से उसके साथ इस तरह का व्यवहार करेगा तभी तो न वो ठीक होगी। सहजयोगी में आने पर भी अपनी कुछ सूक्ष्म अपनी जो खराबियाँ हैं वो चिपक जाती हैं। उधर आपको बहुत अच्छे से ध्यान देना चाहिए। तो आज के श्रीराम के इसमें हमें हनुमान जी का भी विशेष विचार करना चाहिए कि हनुमानजी किस तरह से एक श्रीराम के दास थे और किस तरह से उनकी सेवा चाकरी में लगे रहते थे। और हर समय उनके ही सेवा में रहने से ही वो जानते थे कि उनका पूरा जीवन सार्थक हो जायेगा। उनके जैसे वृत्ति भी सहजयोग में हमें अपनानी चाहिए। इसका ये मतलब नहीं कि आप मेरे लिए खाना बना-बना कर भेजें। बिल्कुल भी नहीं। क्यूंकि मैं तो खाना खाती नहीं हूँ और मुझे खाना बना-बना कर के और भी आप लोग परेशानी में डाल देते हैं। तो क्या चीज़ चाहिए? सेवा करने में तत्परता । हनुमानजी क्या कोई खाना बना कर के भेजते थे क्या? | श्रीरामचन्द्रजी के लिए ? दिल्ली वालों ने मुझे इतना परेशान किया है खाना बना-बना कर के कि मैंने अब शर्त लगा दी है कि अगर तुम लोग खाना बनाओगे तो फिर मैं आऊंगी ही नहीं । जो चीज़़ करनी है वो करो । ये तो बेकार की चीज़़ है कि जो आदमी खाना नहीं खाता उसे जबरदस्ती आप खाना खिला रहे हैं। या कोई कुछ चीज़ ले कर के चला आता है। कोई चीज़ की जरूरत नहीं है तुम्हारी माँ

को। सारा भरा पड़ा हुआ है। मैं तंग आ गई हूँ इन सब चीज़ों से। इतना मैं कहती हूँ मेरे लिए कुछ चीज़ मत लाओ। बस फूल ही लाओ। और फूल भी जब लगाओगे तो हजारो रूपये के मत लगाओ। जो कुछ करना है वो संतुलन में। जैसे माँ को पसन्द आये, माँ आप की सीधी साधी औरत है। तो क्या करना है इन सब चीज़ों का। तो खास हनुमान जी से सीखना है कि सेवा में तत्परता क्या | होती है। मेरी तो ऐसी खास सेवा नहीं है। पर जो मेरी सेवा करनी है तो सहजयोग की सेवा करो। जो सहजयोग में आप सेवा करेंगे, वही मेरी सेवा है। कितने लोगों को आपने साक्षात्कार दिया। कितनों को आपने पार कराया? जैसे कोई आ जाता है प्रोग्राम में, ‘तेरे अन्दर ये भूत है, तेरे अन्दर ये भूत है’ बस उसके पीछे पड़ गये। वो भाग गए। मैंने एक साहब से पूछा कि आप इतने अच्छे से पार हो गये थे आप सहजयोग से क्यों भाग गये। तो कहने लगा, ‘किसी सहजयोगी ने बताया कि तुम्हारे अन्दर तीन भूत बैठे हैं।’ मैंने कहा कि, ‘आपने विश्वास क्यों कर लिया?’ कहने लगे, ‘वो तो वहाँ के बड़े महारथी लग रहे थे। दौड़ दौड़ के बता रहे ते कि आपके अन्दर तीन भूत हैं। अब वो कौन साहब थे ये तो पता नहीं, पर ये तो भाग गये।’ सो, हनुमान जी से हमें सीखना क्या है कि तत्परता, ‘राम काज करने को तत्पर’। काज कौन सा है हमारा? मेरा काज है सहजयोग। मेरा कार्य है सहजयोग । कुण्डलिनी का जागरण करना। लोगों को पार करना। उनके अन्दर शांति लाना, प्रेम लाना, प्रेम की बातें करना। उनसे अपने सहजयोग के बारे में सारे चक्र आदि का वर्णन करना। उनको जो चाहिए वो समझाना। इसका ये मतलब नहीं कि भाषण देना शुरू कर दें। दो-दो घंटे भाषण देते हैं फिर हम आपका भाषण भी नहीं सुन पाते। लागों को सहजयोग पर भाषण देना बहुत अच्छा लगता है। उनका माईक ही नहीं छूटता। एक बार पकड़ लिया तो छूटता नहीं। यह भी एक नई बीमारी है। तो समझ लेना चाहिए कि काहे को इतना भाषण देना है। माँ के इतने भाषण हैं वो ही सुन लें। तो अब जब भी आप लोगों का कोई | प्रोग्राम हो उसमें आप चाहें तो एक मेरा वीडियो लगा दो या चाहे तो मेरा एक टेप सुना दो| उसके बाद एक कागज पेन्सिल दे दो| जिसपे तुमको जो कुछ लिखना है लिखो कि कोई प्रश्न हो तो बता दो। और उसके बाद में उनकी जागृति कर दी और उनसे कहना कि अगली बार आपको जो कुछ समस्या है उसको आप लिख कर लाईये। किसी को बीमारी है, किसी को तकलीफ है। अब ऐसे भी लोग हैं कि जो एक आदमी है वो अब अगर कलकते भी आएगा तो किसी को ठीक करने। अब उसे रूस बुला रहे हैं। एक ही आदमी हनुमान जैसे दौड़ता रहता है इधर से उधर ठीक करने के लिए, इधर से उधर, उधर से इधर। आप सब लोग ठीक कर सकते हैं। सब औरतें ठीक कर सकती हैं। सब आदमी ठीक कर सकते हैं। पर कोई हाथ नहीं डालता। पता नहीं क्या बात है कि अभी तक एक ही आदमी सारे हिन्दुस्तान में है कि जो लोगों को ठीक कर सकता है। लण्डन में १५- २० लोग हैं कि जो लोगों को ठीक करते हैं। ये ठीक करने का तरीका क्या है ये सीख लेना चाहिए। और बन्धन लेकर के ठीक करना चाहिए लोगों को। उसके लिए क्या आप बाहर से बुलायेंगे लोगों को। सहजयोगियों को, अब जो आप बैज लगाकर के घूमते हैं, आप ठीक भी नहीं कर सकते हैं? फिर बैज उतार दो| अपने को भी नहीं ठीक कर सकते तो दूसरों को क्या ठीक करना। तो सबको ठीक करने की सबको शक्ति दे दी गई है। उसको आप लोग सीखें। उसमें निपुण बनें। बजाए इसमें कि कलकत्ते कोई आए दूसरों को ठीक करने । इसमें हिम्मत की जरासी बात है, कुछ नहीं होने वाला तुमको। तुम न तो बीमार हो सकते हो न कुछ हो सकता है। जो लोग जितना सहजयोग में कार्य करेंगे उतने गहरे उतरेंगे। जैसे पेड़ जितना फैलेगा उतना ही गहरा उतरेगा। सहजयोग में और अवतरणों में बड़ा भारी फर्क है कि पहले उन्होंने कोई सामाजिकता से अध्यात्म नहीं किया था। ये शक्तियाँ किसी को दी नहीं थी। समाज के लिए मिली नहीं थी। एक आध आदमी को शक्तियाँ मिली थी। जैसे कि राजा जनक ने नचिकेता को आत्मसाक्षात्कार दिया। लेकिन अब तो आप सबके पास शक्तियाँ प्राप्त हैं। बस इसको ऐसा बढ़ाइये कि आपको कोई भी चीज़ की जरूरत ही न रह जाए। आप अपनी तबीयत ठीक कर लीजिए दूसरों की तबीयत ठीक कर लीजिए। आप सहजयोग समझ लीजिए। सब कुछ आपके पास है। लेकिन अभी भी आपका चित्त पता नहीं कहाँ घूम रहा है। आप लोग पता नहीं कि किस चीज़ के पीछे भाग रहे हो। अभी आप ने इस चीज़ को समझा ही नहीं है। सिर्फ वरदान के सिवाय कुछ है ही नहीं। आपको कोई चीज़ की कमी नहीं रह जायेगी। पर आप सहजयोग के लिए कुछ करे तो न! और नही भी करते हैं तो भी मिलता ही है। जिसको देखता हूँ उसका बिज़नेस बढ़ गया है | किसी की नौकरी बढ़ गयी है। किसी का ये हो गया, किसी का वो हो गया। सबको कुछ न कुछ मिलता ही जा रहा है। कोई भी उनको त्याग नहीं करना पड़ा। नहीं तो, मैं आपसे कहँगी कि जब

ये फ्रिडम का हुआ था कि इनको फ्री करना है, तो हम ही को लोगों ने इतना सताया है। बर्फ़ पर लिटाया, इलेक्ट्रिकल शॉक दिये। हमारे पिताजी कितनी बार जेल गये, हमारी माताजी कितनी बार जेल गयी थी। हमारा घर बिक गया, हमें झोपड़ी में रहना पड़ा। कितना कुछ सॅक्रिफ़ाइस किया। अरे वैसा तो कुछ करना ही नहीं है आपको पर सब लेना ही लेना नहीं होना चाहिए आपको । आपको कुछ देना भी चाहिये। गर एक दरवाजा खुला है तो दुसरा दरवाजा भी खोलना चाहिये। एक ही दरवाजा खोलने से कुछ नहीं होता है। इस चीज़ पर ध्यान देना चाहिये कि हमने कौन सा भला काम किया है। पर अब नेता गिरी के लिये बहुत ही झगड़े हैं कि कौन नेता होगा। सब बने बनाया स्टेज है। आप को ये जान लेना चाहिये कि ये सब माँ का खेल है। जिस दिन आप गिर जायेंगे वहाँ से, आपको पता होना चाहिये। खास कर औरतों को तो ऐसे चक्कर में आना ही नहीं चाहिये। उनको फौरन ऊपर से नीचे गिरना पड़ेगा और आदमियों को समझ लेना चाहिये कि इसमें नेता वेता कोई नहीं है। ये सब माँ का बनाया हुआ खेल है और इस चक्कर में तो आना ही नहीं है। मैंने कहा कि, अच्छा चलो, लीड़र्स आ जायें पर असल में तो कोई लिड़ड्स तो हैं ही नहीं। काय के लीड़्स और काय का ये? सब एक खेल बनाया है माँ ने। सो ये लीड्र्स कोई है ही नहीं। सब एक खेल बनाया है माँ ने। सिर्फ ये है कि देखा जा रहा है कि आप कितना तोल सकते हैं । गर आपको अहंकार चढ़ गया तो गये आप काम से। वो फौरन दिखाई देगा । सहजयोग में कोई चीज़ छिपती नहीं है। सब चीज़ सामने आ जाती है। मैं कुछ कहूँ या ना कहूँ वो अपने आप मूँह पर काला लगा कर आ जाते हैं अपने आप। वो कहते हैं, कि हम लीड़र हैं और देखा कि सामने मुँह पर काला लगा कर आ गये। मैंने पूछा कि, ये क्या? तो कहने लगे कि, ‘माँ, हमने ये खराब काम कर दिया है ।’ तो ये लीड़र पर और जिम्मेदारी आ जाती है कि आप और अच्छे और मीठे और नम्र और प्यारे बन जायें। और सब को मिला कर के, सब की पूछ कर के, सब को लेकर के चलें। अब ये सब चीज़ें श्रीरामचन्द्रजी के विशेष दिवस पर आपको मानना चाहिये कि उन्होंने जो कुछ भी जीवन में कर के दिखाया है उसका कुछ भी अंश हम कर के दिखायें तो माँ के जीवन को भी चार-चाँद लग जायेगा। उन्होंने इतने दिन वनवास किया। वनवास में रहे, जंगलों में रहे बगैर कुछ पहने हुए घूमे, फिरे, कितनी मेहनत की। और फिर सिर्फ अपने पिता की आज्ञा मानने के लिये इन्होंने ये सब कार्य किया। अब मेरी आज्ञा मानने के लिए आप लोगों को कोई वनवास जाने की जरूरत नहीं है। न ही आप को नंगे पैर रहने की जरूरत है, न ही भूखे रहने की जरूरत है। कुछ करने की जरूरत नहीं है। सब व्यवस्थित है। लेकिन सहजयोग में आपको लोगों को ठीक करना आना चाहिये। लोगों की बीमारियाँ ठीक करनी आनी चाहिये। और आपको सहजयोग के बारे में सब कुछ मालूम होना चाहिये। और सब से बड़ी जो जाननी चाहिये वो चीज़ है, कि सहजयोग प्रेम है। ये प्रेम की शक्ति है, जो कार्य कर रहा है और कोई नहीं है। और उसी से सब लोगों का भला हो सकता है। ये कोई एक आदमी के लिये नहीं। एक विशेष लोगों के लिये नहीं है। ये कोई एक देश के लिये नहीं है। ये है सारे विश्व के लिये| तो एक ये भी देखना चाहिये कि हमारा चित्त कैसा है। कहाँ जाता है। बार – बार अगर हमारा चित्त जा रहा है, तो उसका निरोध करना चाहिये, उसे रोकना चाहिये। उसमें आत्मा की शक्ति पूरी तरह से भरनी चाहिये और मनुष्य को एकाग्र हो कर के हर कार्य को करना चाहिये। भक्ति भाव से, प्रेम से जो करेगा , वो बहुत गहरा उतरेगा। गर नहीं तो ऐसे ही, कचरा बहुत होता है। और कचरे का जो अंत होता है वो भी आप जानते हैं | तो आपको अगर कचरा बनना है और आप अपने को बहुत विशेष समझ रहे हैं कि हम तो बड़े अच्छे हैं, हम तो ये कर लेते हैं। हम तो वो कर लेते हैं। तो पहली चीज़ है, कि नम्रता रखो। मेरे प्रति नहीं, सबके प्रति । नम्रता से बात करो। और प्रेम से बात करो। देखना यही जो मनुष्य, आज जो मानव है, बेकार चीज़ है, वही सहजयोग में आते ही सब ओर कमल जैसे खिल जाता है। और उसका सुगंध चारो ओर फैलता है। लोग मुझे फौरन आकर बता देते हैं कि माँ ये आदमी तो कमाल का है! ये बस ऐसे ही है। आप लेग भी गर ऐसे ही सब काम करें तो मर्यादा पुरूषोत्तम को जैसे कहते थे कि ‘बड़े कमाल के थे’, ऐसे ही आपके लिये भी कहेंगे। सब से बड़ी चीज़ तो ये है कि मेरे लिये तो आप ही राम का मंदिर है और आप ही अपने अन्दर इस मंदिर को बनाये और उसकी पूजा हो और उसको सम्भाले, उसको देखें और अपने को आत्मसम्मान के साथ रखें। अपने आप में आत्मसाक्षात्कार का फायदा भी उठाना है और उसी के साथ उसकी पूरी इज्जत और भक्ति होनी चाहिये कि अब हम आत्मसाक्षात्कारी हैं और अब हम ऐसा कैसे कर सकते हैं। हम योगी

हैं। हम नहीं कर सकते हैं। हमसे नहीं हो सकता है। ये गलत काम है और आप देखियेगा कि एकदम आशीर्वाद आपके साथ आ जायेगा। एकदम उसी वक्त! ये तो रोकडा देवी नाम रख दिया है लोगों ने मेरा, कि बस माँ हमने तय कर लिया और बस आ गया। इतना इसका परिणाम, इसका लाभ सबको हो रहा है। सिर्फ उस लाभ के अनुसार आप भी इस दुनिया को लाभ दें। जैसे कि श्रीराम ने अपनी सारी शक्तियों को लगा दिया कि जन का हित हो। संसार में एक आदर्श पुरूष की एक मूर्ति बन जाये, कि जिसको कि लोग देखें। जिस वक्त ये हमारे अन्दर घटित हो जायेगा, आपको आश्चर्य होगा कि आप सब के सब कहाँ से कहाँ पहुँच जायेंगे। आपके अन्दर कोई बीमारियाँ नहीं रहनी चाहिये। सब बीमारियाँ चली जानी चाहिये। जो भी आप की आदते हैं, उसको आप बदल लीजिए। जो जरूरत है वो खाईये। जितना जरूरत है आप बोलिये। सब को आप देखते रहें और इसके लिये आप मनस, जिसको कहते हैं, कि इंट्रोस्पेक्ट करना। अंतर निरीक्षण करना। जिससे कि देखते रहना कि ये मैं क्यों कर रहा हूँ, वो क्यों कर रहा हूँ? इसकी कोई जरूरत नहीं है। मैं सहजयोगी हूँ। मेरा ये दिमाग़ कहाँ जा रहा है। रूक जाओ। इस तरह से करने से ही आप ध्यान में हो जाएंगे और आपकी कुण्डलिनी आप से संतुष्ट होकर के आपको आशीर्वाद प्रदान करती है। फिर आप कहोगे कि माँ ये क्या है। लेकिन जब आप इसमें फ़िसल पड़ियेगा, फिर आप जानियेगा कि ये चीज़ क्या है। बस इसमें फ़िसल पड़ना है । तभी तक बस मेहनत करना है। आज मैंने कहा था, कि श्रीरामचन्द्रजी का तो बारा बजे का जन्म हुआ था तो आराम से ही पूजा होने दो । श्रीरामचन्द्रजी के पूजा में तो कोई खास काम नहीं है और इतनी लम्बी चौड़ी पूजा भी नहीं है, लेकिन इसमें समझने की बात है। क्योंकि वो मनुष्य स्वरूप जो है वो अपने अन्दर जो मनुष्यता है जिससे हम चीज़ को समझते हैं, जिससे हमारे बुद्धि में, जिज्ञासा में और हमारे विचारों में परिवर्तन आ जायेगा। वो चीज़ श्रीराम है। श्रीराम के ही माध्यम से हमारे विचार बदल सकते हैं। उन्हीं के माध्यम से हमारा स्वभाव बदल सकता है क्योंकि हमारे लिए वो एक आदर्श हैं। उनके आदर्श तक पहुँचने के बाद ही आप दुसरे आदर्शों तक पहुँच सकते हैं क्योंकि वो मनुष्य के आदर्श हैं। कितनी बड़ी चीज़ है, कि परमात्मा मनुष्य बनकर इस संसार में आए कि इनके लिए हम आदर्श बन जाएं। उन्होंने सब विपत्तियाँ उठाईं, आफतें उठाईं, दिखाने के लिए कि कोई सी भी विपत्ति और आफत आती है तो मनुष्य को अपना धर्म नहीं छोड़ना चाहिए । विश्व धर्म नहीं छोड़ना चाहिए और जो आपका योग है उसमें बंधे रहना चाहिए । आप सबको हमारा अनन्त आशीर्वाद!