Shri Rama Puja

कोलकाता (भारत)

रामनवमी पूजा – कलकत्ता, २५.३.१९९१

रामनवमी के अवसर पे एकत्रित हुए है, और सबने कहा है कि श्री राम के बारे में माँ आप बताइये।

आप जानते हैं कि हमारे चक्रों में श्री राम बहुत महत्वपूर्ण स्थान लिए हुए हैं। वो हमारे राइट हार्ट पर विराजित हैं।  श्रीराम एक पिता का स्थान लिये हुए हैं, इसलिये आपके पिता के कर्तव्य में या उसके प्रेम में कुछ कमी रह जाये तो ये चक्र पकड़ सकता है।  सहजयोग में हम समझ सकते हैं कि राम और सब जितने भी देवतायें हैं, जो कुछ भी शक्ति के स्वरूप संसार में आये हैं, वो अपना-अपना कार्य करने आये हैं।  उसमें श्रीराम का विशेष रूप से कार्य है। जैसे कि सॉक्रेटिस ने कहा हआ है कि संसार में बिनोवेलंट किंग आना चाहिए।  उसके प्रतीक रूप श्रीरामचन्द्रजी इस संसार में आये हैं।  सो वो पूरी तरह से मनुष्य रूप धारण कर के आये थे।   वे ये भी भूल गये थे कि मैं श्रीविष्णु का अवतार हूँ, भुला दिया गया था।  किन्तु सर्व संसार के लिए वो एक पुरुषोत्तम राम थे। ये बचपन का जीवन सब आप जानते हैं और उनकी सब विशेषतायें आप लोगों ने सुन रखी हैं।  हम लोगों को सहजयोग में ये समझ लेना चाहिए कि हम किसी भी देवता को मानते हैं, और उसको  अगर हम अपना आराध्य मानते हैं तो हमारे अन्दर उसकी कौनसी विशेषताऐं आयी हुई हैं?  कौन से गुण हमने प्राप्त किये हैं?  श्रीरामचन्द्र जी के तो अनेक गुण हैं। क्योंकि वो तो पुरूषोत्तम थे। उनका एक गुण था कि वो जिस राजकारण को करते थे उसमें सबसे ऊँचा उन्होंने जन का मत रखा, न कि अपनी पत्नी या अपने बच्चे इनका ख्याल किया। 

आजकल के हमारे अगर राजकीय लोग पॉलिटिशियनस (politicians)  इस चीज़ को यदि समझ लें तो उंनसे स्वार्थ ही निकल जायेगा।  वो नि:स्वार्थ हो जाएंगे, धर्मपरायण हो जाएंगे। किन्तु श्रीराम की जो प्रतिमा है वही आज तक किसी ने भी अपनाने का प्रयत्न नहीं किया।  उलटे उनके भजन जरूर गाएंगे, उनके नाम से बहुत बड़े बड़े ओर्गनइजेशन्स बने हैं।  राम मंदिर बनाएंगे, लेकिन ये सब बना लेने से क्या  श्रीराम आपके अन्दर प्रवेश कर सकते हैं?  क्या आपके जीवन में उनका प्रकाश आ सकता है या नहीं?  यह सिर्फ सहजयोगी ही कर सकते हैं कि अपने अन्दर बसे हुए श्रीराम को अपने चित्त के प्रकाश में लाएं।  वो अत्यन्त निर्पेक्ष थे, ऐसे तो सभी देवता लोग किसी भी पाप पुण्य से रहित होते हैं। कोई सा भी पाप जिसे हम लोग पाप कहते हैं वो अगर करें तो वो पाप नहीं होता है।  जैसे श्रीकृष्ण ने इतने लोगों को मारा, श्रीराम ने रावण का वध किया। ये हमारे दुनियायी दृष्टि से हो सकता है कि पाप हो, किंतु परमात्मा की दृष्टि से नहीं हो सकता।  क्योंकि इन्होंने दष्टों का नाश किया है, इन्होंने बुराई को हटाया है। और इनको अधिकार है कि ये इस कार्य को करने के लिए जो कुछ भी कर सकते हैं वो करे। जैसे देवी ने राक्षसों का संहार किया है, राक्षसों का संहार किया,  तो कोई कहेगा कि देवी ने ये पाप किया। किन्तु उनका कार्य ही ये है कि वो राक्षसों का संहार करें और जो साधू हैं उन लोगों को संभालें।  

श्रीरामचन्द्र के जीवन में एक अहिल्योद्धार बहुत बड़ी चीज़ है। उन्होंने अहिल्या का उद्धार किया था। क्योंकि उसके पति ने उसे शापित कर दिया था। उस जमाने में भी कोई स्त्री किसी भी तरह से वाम मार्ग में चली जाती थी तो उसका पति अगर साधु हो और उसकी स्थिति अगर ऊँची हो, तो उसे शापित कर देता था।  किंतु अहिल्या पर झूठा ही उन्होंने आरोप लगाया गया था, इल्जाम लगाया गया था और इस तरह से उन्होंने उसको भी पत्थर बना दिया था।  तो श्रीराम ने उस अहिल्या का भी उद्धार कर दिया था।  विशेषकर उनकी जो पत्नी के प्रति प्रेम की,  जो एक पत्नी व्रत के प्रति जो एक उनका व्रत था वो बहुत समझने लायक है।  हालांकि वो जानते थे कि सीताजी महालक्ष्मी स्वरूपा हैं वे स्वयं देवी हैं।  किन्तु मनुष्य के रूप में उन्होंने अपने पत्नी के सिवाय किसी और स्त्री की तरफ आँख उठा कर भी नहीं देखा। जब हम राम की बात करते हैं तो हमारे अन्दर जो पतित्व है वो भी हमारा स्वच्छ होना चाहिए।  अगर कोई स्त्री श्री राम के बारे में सोचती है तो उसको भी अपने पति के प्रति वैसी ही श्रद्धा होनी चाहिए कि जैसी सीता जी को अपने पति के प्रति थी।  और उसी प्रकार पति को भी श्रीराम जैसे एक पत्नी व्रत होना चाहिए। सहजयोग में ये बात कठिन नहीं है, स्त्री का मान रखना चाहिए। अपने पत्नी को मान से रखना चाहिए।  और हालाँकि  रावण उनको उठा ले गये थे तो भी श्रीराम ने ये कर्तव्य समझा कि सीताजी को वहाँ से छुड़ाकर लाएं।  और लोक नंदा के लिए, जनमत को रखने के लिए  कितना उनमे संतुलन था। उसी सीता को जिसके लिए इतने वर्ष मेहनत करके वे उसको छुड़ा कर लाए थे, उन्होंने त्याग दिया।  अर्थात सीताजी स्वयं साक्षात् देवी थी, तो उन का त्यागने का तो कोई विशेष परिणाम नहीं होने वाला था और उन्होंने उन्हें त्याग दिया था।  कारण लोग ऐसी बातें करते हैं जो जनहित के खिलाफ हैं।  क्योंकि उनका आदर्श किसी तरह से ऐसा न बन जाए कि जिससे लोग अपने यहाँ इस तरह की औरतों को पनपाएं, जिन पर कि लोग शक करते हैं।  हालांकि वो निष्कलंका थी और देवी स्वरूपा, स्वच्छ और निर्मल थी। उनको त्यागने  पर भी फिर सीताजी ने उनका एक तरह से त्याग  कर दिया।  उन्होंने, स्त्री के जैसे सीताजी ने रामचंद्रजी का त्याग किया और श्रीराम ने एक पुरुष के जैसे उनका त्याग दिया।   सीताजी स्वयं ही पृथ्वी में समा गयी और फिर अन्त में श्रीराम जी ने भी सरयु नदी में अपना देह त्याग दिया।  इस प्रकार इनका जीवन अत्यन्त घटनात्मक और बड़ा चमत्कारपूर्ण है।  सारे जीवन में देखिये तो सीता और राम का आपस का व्यवहार और उनका एक दूसरे के प्रति श्रद्धामय रहना।  हालांकि उन्होंने सीताजी का त्याग किया था पर सीताजी ने सोचा कि ये उनका परम कर्तव्य है और उन्होंने कभी उनकी बुराई नहीं की। उनके बारे में कभी बुरा नही कहा। और बड़ी सुगमता से अपने बच्चों को चलाया, उनको पनपाया, और उनको बढ़ावा दिया। इस श्रीराम के जो दो बच्चे हुए, जिनको हम लव और कुश कहते हैं।  वो भी एक भक्त स्वरूप, कहना चाहिए कि जो इस संसार में आए और उनको हम शिष्य की तरह से देख सकते हैं। ये शिष्य की द्योतक है ये और हमारे लिये भी शिष्यत्व की एक शक्ति हैं कि जिससे हम किसी के शिष्य हो सकते हैं। शिष्य स्वरूप इन लोगों ने बहुत छोटी उम्र में धनुष विद्या सीख ली थी।  और इस छोटेपन में ही उन्होंने रामायण आदि और संगीत पर बहुत ही कुछ प्रावीण्य पाया था। इसका मतलब ये है कि शिष्य को पूरी तरह से अपने गुरु को समर्पित होना चाहिए।  ये शिष्य का जो स्वरूप है ये हमारे अन्दर भी सबमें स्थित है।  और माँ जो कि शक्ति थी,  उसके प्रति वो पूरी तरह से समर्पित थे।  उस वक्त श्रीराम से भी लड़ने के लिए वो तैयार हो गए, क्योंकि अपनी माँ के लिए। तो माँ को उन्होंने दुनिया में सबसे ऊँची चीज़ समझी और उस माँ ने भी अपने बच्चों को पालना, उनका संवर्धन करना और उनको धर्म में खड़ा करना, उनकी पूरी प्रगति करना एकमेव कर्तव्य समझा। नहीं तो अपने आज कल की पत्नियाँ तो रात दिन रोती रहेंगी कि मेरे पति ने छोड़ दिया, मेरे छोड़ दिया।  और जब पति मिलेगा तो उससे लड़ती रहेंगी हर समय।  छोड़ दिया तो कोई बात नहीं, मेरे बच्चे हैं, इनको मुझे सम्भालना है। और इसके प्रति कोई भी ऐसी बात नहीं होनी चाहिए कि जिससे मेरे बच्चों का कुछ कम रह जाये। ये एक सीताजी की एक विशेष जीवनी है कि उनकी वीरता और उनका साहस, ये हर स्त्री को अपने अन्दर बसाना चाहिये।  कि अगर पति से अगर विछोह भी हो गया और किसी तरह से उनसे दूर भी अगर हट गये तो भी पति के कारण अपना नुकसान नहीं कर लेना चाहिये। अपने बच्चों का नुकसान नहीं कर लेना चाहिये। क्योंकि उनके लिए अपना जो कर्तव्य है वही परम चीज़ है।  उस परम चीज़ पे अटूट रहना चाहिये। यही हमारे सहजयोग में, शक्ति में जो पाया है, उसे हर स्त्री को प्राप्त कर लेना चाहिए।  

श्रीराम का जीवन भी जैसे अत्यंत शुद्ध और निर्मल था और उन्होंने अपने पत्नी के लिए सब चीज़ त्याग दी थी।  जब से उनकी पत्नी वनवास में रह गयी या जब उन्हें अकेला रहना पड़ा और जब उन्होंने उसका त्याग कर दिया। तो उन्होंने भी दुनिया के जितने भी आराम थे, उन्हें छोड़ दिये।  उसके लिए आप जानते हैं कि वो कुश (घास) पे सोते थे, जमीन पर सोते थे।  और बैगैर कुछ  पैर में पहने हुए और बहुत साधु पुरुष जैसे कपड़े पहन के घूमते थे।  ये सब कहानियाँ नहीं है, ये सत्य है।  अपने, दुनिया में इस भारत वर्ष में ऐसे अनेक लोग हो गये हैं जिनका जीवन एक बहुत ऊँचे किस्म का रहा और उन्होंने कभी ऐसी छोटी, ओछी बातें सोची ही नहीं है।  पर ये सारे आदर्श हमारे देश में आने के बाद ये हो गया है कि जब हम इन आदर्शों को देखते हैं तो हमारे  अन्दर ढोंग आ गया है। कि राम तो हमारे हैं हम तो राम को मानते हैं।  हमने राम का भजन कर लिया और हो गया। तो यह एक तरह का ढोंगीपना बहुत आ गया हमारे  अन्दर।  जिन देशों में ऐसे आदर्श नहीं हैं तो वो कोशिश करते हैं कि हम आदर्श कैसे बने,  हम कैसे अपने को ठीक बनायें?  क्योंकि आप के सामने एक आदर्श हो गये हैं, बन गये राम और अब हम तो श्रीराम नहीं हो सकते हैं।  बन गये श्रीकृष्ण, अब हम श्रीकृष्ण नहीं बन सकते। और ये बन गये वो बन गये और हमारा इससे कोई ताल्लुक नहीं है।  इस तरह की भावनायें हम ले लेते हैं। लेकिन अगर हमारे अन्दर अगर श्रीराम हैं तो उनका प्रकाश हमारे चित्त में तो आ ही सकता है।  क्यों नहीं आ सकता?   हम क्यों नहीं इसे प्राप्त करें?   हम उस स्थिति को जानने की क्यों न कोशिश करें जिस स्थिति में श्रीराम इस संसार में आए थे। 

एक सहजयोगी को ये विचार कर लेना चाहिए कि श्रीराम की स्थिति अगर हम प्राप्त कर लें तो अपने यहाँ का राजकारण ही खत्म हो जाएगा। अपने यहाँ की जितनी परेशानियाँ हैं ये सब खत्म हो जायेंगी।  जिस दिन सहजयोगी ये अपने मन में ठान ले कि हम ही रामचंद्र जी जैसे हो गये।  अपने देश में जहाँ वो राज्य करते थे उसका बिल्कुल निरिछ भाव से, विदेह रूप से वो लालन-पालन करते थे। और सब तरह की अच्छाइयाँ लोगों में आ जाये। उनमें धर्म आ जाए, पहली चीज़, उनके अन्दर शिक्षा हो जाये, उनकी उन्नति हो जाए, उनके अन्दर महान आदर्शों की स्थापना हो, ऐसा उन्होंने पूरे समय प्रयत्न किया और उस लिये अपना जीवन बहुत आदर्शमय बनाया। अगर समझ लीजिए कि जो आदमी आपको कुछ कह रहा है और वो स्वयं ही वैसा नहीं है, तो आपको उसके प्रति कभी श्रद्धा हो ही नहीं सकती।  और आप उसके गुण ले ही नहीं सकते।  किन्तु बहुत से लोग हमेशा कहते हैं कि हम उनको मानते हैं इनको मानते हैं लेकिन मैं देखती हूँ कि वो उसके बिल्कुल उल्टे होते हैं। जो राम को मानते हैं हैं वो सबसे बड़े चोर पॉलिटिशनस होते हैं या फिर उनकी दस-दस बीबियाँ होती हैं। तो फिर राम को आप कैसे मानते हैं?  इसी प्रकार जीवन में एक सहजयोगी का कर्तव्य क्या होता है?  कि हमें भी इन देवताओं के प्रकाश को हमारे चित्त में लाना चाहिये।  हर चीज़ की ओर उसी तरह से देखना चाहिए कि श्रीराम, श्रीराम क्या करते थे?   इस वक्त अगर ऐसा प्रश्न आता तो श्रीराम क्या करते?   ऐसा अगर प्रश्न आता तो सीताजी क्या करती?  सीताजी क्या कहती?  सीताजी का क्या बर्ताव होता?  इस तरह से अगर कोई सोचे स्त्री तो वो घर की गृहलक्ष्मी हो ही जाएगी।  

आप तो जानते हैं सहजयोग  में कि सीताजी ने अनेक जन्म उसके बाद लिये।   और उसमें से एक गृहलक्ष्मी का स्थान जो है उन्होंने वह फातिमा बी के तरह से किया।  वो घर में घूंघट में, पर्दे में रहती थी, पर वो सारा धर्म का कार्य उस शक्ति ने किया था।  उसके लिये जरूरी नहीं कि आप बाहर जाकर के बहुत बड़े लेक्चर दे और या बहुत बड़े कोई लीड़र हो जाये।  ये कोई जरूरी नहीं है। आप घर में रह करके भी ये कार्य कर सकते हैं।  अपने बाल-बच्चे हैं, और आप के और इष्ट जो हैं और आप के जो ज्येष्ठ हैं उन सबमें आप सहजयोग फैला सकते हैं। लेकिन पहले आपमें ये चीज़ आनी चाहिए। उसके बाद जब ये सब कार्य होने के बाद आप फिर समाज में भी आ सकती हैं। और उसके बाद और भी कही जाना चाहें तो जा सकते हैं।  पर पहले औरतों को सीताजी के जैसे शुद्ध आचरण की होना चाहिए । शुद्ध आचरण में पहली चीज़ है ममता और प्यार।  वो जब जंगलों में रहती थीं अपने पति के साथ तो कभी उन्होंने यह नहीं कहा कि मेरा पति ये पैसा नहीं कमाता, वो पैसा नहीं कमाता जैसे हमारे यहाँ औरतों की आदत होती है।  ये चीज़ नहीं खरीदता, वो नहीं खरीदता। वो जंगल में है तो मैं भी जंगल में हूँ। वो जो खाते हैं वो मैं खाती हूँ। उनके खाने से पहले मैं खा लेती हूँ, ऐसा तो नहीं, न करती।  वो खा लें, उनको खाना खिला दें, अपने देवर को खाना खिला दें, उसके बाद मैं खा लूंगी। इस पर औरतें ये सोचती हैं कि हमारे ऊपर बहुत ज्यादा हमारे ऊपर इससे दबाव (pressure) आ जाता है,  ये बात नहीं है। ये पृथ्वी तत्व जैसी स्त्री होती है। इसमें इतनी शक्ति है कि ये बहुत दबाव को खींच सकती है। और सारी दुनिया को देखिये। कितने फल–फूल आदि, पत्तियाँ पृथ्वी सब दे रही है।  इसी प्रकार  इस पृथ्वी तत्व के जैसे ही हम स्त्रियाँ हैं। हमारे अन्दर इतनी शक्तियाँ हैं, कि हम सब तरह की चीज़ अपने अन्दर समा सकते हैं और अपने अन्दर से हम हमेशा प्रेम की वर्षा दे सकते हैं। ये हमारे अन्दर परमात्मा ने शक्ति दी है।  तो ये शक्ति आपके अंदर है समझ लीजिये अगर पंखा चल रहा है तो इसकी शक्ति जहाँ से आ रही है वो शक्ति का स्थान ज्यादा बड़ा है कि पंखा।  अगर  ये सोचे कि ये पंखा चल रहा है दुनियां के सामने पंखा चल रहा है तो ये बड़ा है तो आप समझ सकते हैं ये गलत फहमी है।  

स्त्री शक्ति स्वरूपिणी, बहुत शक्ति का सागर है और उसके सहारे ही पुरुष जो है वो अपने कार्य को करता है। एक जैसे उसको कहते हैं कि पोटेंशिअल और एक काइनेटिक।   तो पोटेन्शिअल तो स्त्री है और पुरूष जो है वो काइनैटिक है। लेकिन पुरूष को देखकर के क्योकि वो दौड़ ज्यादा सकता है, उसे देख कर तो यदि औरत भी दौड़ने लग जाये।. तो उसको  दौड़ने की कोई जरूरत नहीं है,  उसको तो बैठने की जरूरत है।  दोनों की दोनों ही क्रियाएं अलग-अलग हैं। और उस क्रिया में दोनों को समाधान होना चाहिए। और दोनों ही क्रिया में स्त्री बहुत पनप सकती है। और जब समय आता है तो स्त्री पुरुषों से भी ज्यादा काम कर सकती है। आपको मालूम होगा कि महाराष्ट्र में ताराबाई नाम की एक सत्रह साल की विधवा थी, सत्रह साल की और शिवाजी की वो छोटी बहू थी छोटी वाली। सब हार गए औरंगजेब से और इसने औरंगजेब को हरा दिया। सत्रह साल की उमर में और उसकी कब्र बना दी औरंगाबाद में। तो आप समझ सकते हैं कि जब औरत अपनी शक्ति को पूरी तरह से समा देती है, जब उसमें समान्वित कहते हैं न।  उसमें उस तरह से सब अपने अंदर समाये रखती है तो वो बड़ी प्रचंड होती है।  और तो ऐसी अगर इधर -उधर अपनी शक्ति को फेंकती रहे ( flitter away) , कहीं इधर शक्ति फेंक दी,  कहीं उस लड़ने में गई, कहीं झगड़े में गई, किसी की बुराई में गई, ओछेपन में गई, तो उसकी शक्ति सारी नष्ट हो जाती है।  तो स्त्री जो है, वो इतनी शक्तिशालिनी है कि वो चाहे तो पुरुषों से कहीं अधिक कार्य कर सकती है। पर सबसे पहली चीज़ है वो अपनी शक्ति का मान रखे।  उसको इधर-उधर फेंक ने से उस  शक्ति को नष्ट कर देने से फिर वो शक्तिहीन हो जाती है।  और ऐसी शक्तिहीन स्त्री किसी  काम की नहीं है।  तो स्त्री का कार्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है, गौरवपूर्ण है। और बहुत लज्जाशील और बहुत सूझबूझ वाली होनी चाहिए। जैसे आदमी लोग गाली बकते हैं, बकने दों। औरतें नहीं बक सकती हैं। आदमी लोगों का बहुत झगड़ा हुआ तो मारपीट कर लेंगे, करने दें। औरतें नहीं कर सकती। इनका कार्य शान्ति देने का है, इनका कार्य है संरक्षण का। इनका काम है लोगों को बचाने का। अब  जैसे कि एक ढाल है।  ढाल तलवार का काम नहीं कर सकती और तलवार ढाल का काम नहीं कर सकती। पर ढाल बड़ी कि तलवार?   ढाल ही बडी है। जो तलवार का वार सहन कर ले वो बड़ी कि तलवार बड़ी?   एकाद बार तलवार भी टूट जाएगी पर ढाल नहीं टूटती।  इसलिए औरतों को भी अपनी शक्ति में समा लेना चाहिए।  और इस शक्ति की सबसे बड़ी जो धुरा है वो है नम्रता।  नम्रतापूर्वक अपनी शक्ति को अपने अन्दर समा लेना चाहिए।  ये कार्य कठिन नहीं है सहजयोगियों के लिये।  सहजयोगियों के लिये बिल्कुल ही यह कार्य कठिन नहीं है। 

मैं देखती हूँ कि बहुत सी सहजयोगिनी औरतें इतनी बकवास करती हैं। उनको पता नहीं क्या, कभी जाएंगी तो आदमियों से बक-बक करेंगी।  एक साहब दौड़े दौड़े आये माताजी मुझे बचाओ-बचाओ मैंने कहा क्यों ? कहने लगे वो मेरे पीछे लग गयी मैंने कहा कौन?  कहने लगे वो जो बहुत बोलती है।  अरे मैंने कहा बोलती है बहुत!  कहने लगे हाँ माँ मुझे बचाओ, मैं तो  तंग आ गया।   तो आ कर के मेरे कमरे में छिप गए!   तो ज्यादा आदमियों से बात करने की कोई जरूरत ही नहीं ह। बेकार की बकवास करने की जरूरत ही क्या है?   औरतों में भी एक बेकार की बकवास करने की कोई जरूरत नहीं है।  सहजयोग में मैंने ये देखा है कि आदमी लोग सीखते हैं, वैसे ही औरतों को भी सीखना चाहिए।  सहजयोग क्या है?   इसके चक्र क्या हैं?   कौन से चक्र से आदमी चलता है?   कौन से चक्र से उसकी क्या दशा होती है?   क्या होती है?   इसका पूरा ज्ञान होना चाहिए।  ये सब आदमी सीखेंगे तो औरतें पीछे रह जाएंगी।  ये सब औरतों को सीखना चाहिए।  

अब पुरुषों की बात कहना है तो श्रीरामचन्द्र का हमारे सामने आदर्श है।  मुझे लगता है कि इस मामले में मुसलमानों ने हमारे ऊपर बड़ा गजब किया हुआ है। मैं उनको बूरा नहीं कहती। उनके देश में ये बात नहीं है। जैसे कि आप अगर रियाद जाएं तो कोई मुसलमान आपके ऊपर आँख उठा कर नहीं देखेगा। मैंने नहीं देखा किसी को, कोई औरत होगी उसकी बड़ी इज्जत करेंगे । रास्ते से अगर कोई जा रही है औरत तो वो मोटर रोक लेगा।  वहाँ औरतों की इतनी इज्जत होती है। और हमारे यहाँ जो है पता नहीं कि क्या हो गया है कि इतना इनका ऐसा उलटा असर पड़ा है कि हम लोग सोचते हैं कि औरत बिल्कुल एक उपभोग की वस्तु है।   हर औरत की तरफ देखना चाहिए। उनकी गर्दन मुड़ जायेगी पर देखते रहेंगे।  हर स्त्री की ओर नज़र डालना ये महापाप है।  और सहजयोग में निषिद्ध माना जाता है। बिल्कुल निषिद्ध है, इससे आपकी आँख खराब हो जाएगी, पहली चीज़।  और सहजयोग में तो और भी नुकसान हो जाएगा और सहजयोगी को और भी नुकसान हो जायेगा। अगर वो नहीं हुआ तो अन्धे भी हो सकते हैं।  कभी कभी में देखते हूँ की लोगों की आंख ऐसे खट्ट खट्ट घूमती रहती है।  बात एक से करेंगे और आंख घुमाते रहेंगे।  अब औरतें भी सीख रही हैं तो इससे सबसे बड़ा जो नुकसान होता है वो आपका चित्त है। आपका जो चित्त है वो इधर-उधर चल-विचल हो रहा है। चित्त अगर चल-विचल हो गया तो आत्मसाक्षात्कार का क्या फायदा होगा?  क्योंकि जो चित्त एकाग्र नहीं होगा तो वो कार्यान्वित नहीं हो सकता। एकाग्र चित्त ही कार्यान्वित होता है। एकाग्रता को साध्य करना चाहिए। अब विदेश में ये बीमारी बहुत ज्यादा आदमियों को है।  आरतों को भी है, पर आदमियों को बहुत ज़्यादा है। वो अपने जैसे नहीं हैं, वो उसे बहुत अच्छी बात नहीं समझते हैं ।   उसको वो गंदी चीज़ समझते हैं, जब से सहजयोग में आये हैं, ‘माँ, इसका इलाज बताओ।’  मैंने कहा बेटे देखो तुम लोग सिर्फ जमीन की तरफ देख के चलो और तीन फुट से ऊपर देखने की जरूरत नहीं है। उससे ऊपर देखने की जरूरत नहीं है। और जमीन पे देख के चलो।  सहजयोगी आप पहले पहचान लेंगे किसी भी आप देश में प्रदेश में वो आँख नीचें करके चलते हैं।  तीन फुट तक सब अच्छी चीज़ें दिखायी देती हैं। फूल भी तीन फुट तक होते हैं, बच्चे भी सब तीन फुट तक होते हैं। उससे ऊपर देखने लायक है ही क्या?   सो इस तरह से अपने चित्त को कट्रोल ( control) करना चाहिए । अब श्रीराम को तो जरूरत नहीं थी  लेकिन अगर आप के पास श्रीराम का मान है  तो आपको उनके जैसे अपने चित्त को कट्रोल  (control)  करना चाहिए।  और अपनी पत्नी से भी यही समझाना चाहिए कि तुम शक्ति हो और हम तुम्हारी इज्जत करते हैं। पर तुम उसके योग्य भी होना चाहिए। जैसे ‘यत्र नार्या पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवता:’: जहाँ स्त्री पूजी जाती है वहीं देवता रहते हैं। पर वो पूजनीय भी होनी चाहिए।  सो अगर स्त्री पूजनीय है, पूज्यन्ते माने पूजनीय होना चाहिए। किसी गन्दी औरत की कोई पूजा करेगा क्या?   किसी दुष्ट औरत की कोई पूजा करेगा क्या?  या कोई राक्षसी स्वभाव की औरत की कोई पूजा करेगा क्या?  तो जो औरत पूजनीय है वहीं पर उसकी पूजा होनी चाहिये और वहीं देवता रहते हैं।  और सबसे पहले बात  ये भी जान लेना चाहिए कि ये हमारे बच्चों की माँ है।  गर पति अपनी औरत को बच्चों के सामने डाँटना, फटकारना शुरू कर दे, उसकी कोई इज्जत न रखे तो कभी भी बच्चे उसका मान नहीं करेंगे। तो इस तरह से जैसे पहले समझ लीजिये कि पहले प्राइम मिनिस्टर है फिर डिप्टी मिनिस्टर है।  स्त्री को भी पति का कभी भी अपमान नहीं करना चाहिए। तो प्राइम मिनिस्टर से डिप्टी मिनिस्टर पे सत्ता आती है फिर वो सत्ता बच्चों में भी आ सकती है।  पर अगर आप दोनों भी इस तरह के हो की उनको अंदाज़ ही नहीं, औरत चाहती है कि मेरी चले, आदमी चाहता है कि मेरी चले।  

आदमियों को चलाना अगर औरत को आ जाये तो कभी झगड़ा न हो। लेकिन ये समझ लेना चाहिए कि आदमी को चलाना बहुत ही आसान चीज़ है क्योंकि वह बिल्कुल बच्चों जैसे होते हैं। उनको चलाना बहुत ही आसान है। उनका स्वभाव बच्चों जैसा होता है, भोले-भाले होते हैं। उनको बेकार की बातों से परेशान करने से आप उन्हें चला नहीं सकते। लेकिन उनको भी एक बच्चों  जैसे माफ कर दिया जाये।  अब बाहर जाते हैं, सबसे लड़ाई झगड़ा करते हैं, आफ़त उनकी रहती है।  घर में आकर तो बीवी पर नहीं बिगड़ेंगे, तो बाहर वालों पर बिगड़ेंगे तो मार ही खायेंगे। चलो बीवी पर बिगड़ गए, चलो छोड़ो चलो क्या है इसमें?  इस तरह की भावना जब तक स्त्री की पति की तरफ नहीं होगी तब तक आपस में सामंजस्य नहीं आ सकता, प्यार नहीं आ सकता। लेकिन पति को भी चाहिए कि अपनी पत्नी को क्या चाहिए, क्या नहीं चाहिए इसका विचार रखें। लेकिन ये नहीं कि अब पत्नी है वो कुछ गलत बात बताये या वो कोई गलत सलाह दे, उसपे जरूर पति को कहना चाहिए कि ये गलत है ये नहीं मैं करने वाला।  ये झूठी बात है मैं करने वाला नहीं। लेकिन छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करने की कोई जरूरत नहीं है। और ये छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करना सहजयोगियों को बिल्कुल नहीं शोभा देता।  और मुझे बड़ा आश्चर्य होता है कि सहजयोगी भी आपस में लड़ते रहते हैं, और फिर मुझे आकर बताते हैं की मेरी बीबी ऐसी और मेरा हस्बैंड ऐसा।    भई अगर दो आदमी दुनियां में सहजयोगी एक स्थान पर प्रेम से से नहीं रह सकते। तो ये सारे संसार को मैं रही हूँ कि हमको प्रेम से रहना है तो फिर हम सब कैसे प्रेम से रहेंगे बताओ। ऐसे ही झगड़ा अगर होता रहा तो किस तरह से हो सकता है।

तो पहली चीज़ है कि पति को पूरी तरह एक जिसे कहते हैं पत्नी के प्रति जागरूक रहना चाहिए। और ये जान लेना चाहिए कि सारे संसार की औरतें जो हैं आपके लिए माँ और बहन के बराबर हैं।   ये अगर सहजयोग में आकर नहीं आ तो वो कहीं भी नहीं हो सकता है।  अभी एक साहब थे वो भी स्विस, अपने हिंदुस्तानी नहीं हैं।   तो एक लड़की के बाप थे वो सहजयोगी नहीं थे । तो वो जरा ऐसे ही थे,  इधर उधर उनका बहुत चलता थाl   तो वो सहज योग में भी आये बीवी उनकी बहुत अच्छी शालीन बहुत अच्छी लड़की थी।   वो जहा भी जाये यही धंदे करते रहें।   तो उनके बाप जो की सहज योगी नहीं थे उन्होंने कहा कि देखो बेटी तुम इसको छोड़ ही दो।  क्योंकि जो सहजयोग में भी आकर वो धंदा नहीं छोड़ता है वो कभी भी ठीक नहीं होगा,  तुम छोड़ दो इसको।  कहने लगे थोड़ा सा ढीक हो गया, कहने लगे थोड़ा सा नहीं अगर वो पूरा  ढीक नहीं हो सकता तो ये सहज योगी है ही नहीं इसको तुम छोड़ो, इससे तुम रिश्ता ही छोड़ दो।  जबकि एक आदमी सहज योगी नहीं है वो भी इस बात को सोचता है कि सहज योग में आने पर भी अगर इसकी आंखे स्थिर नहीं होती, इसका अगर  चित्त स्थिर नहीं होता तो ये गलत बात है।

दूसरे हमारे संस्कृति की जो विशेषता है कि स्त्री-पुरुष का आपस में मेल-जोल बस भाई-बहन तक का होना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता है।  मैं देखती हूँ कि फौरन कोई औरत है और बक-बकिया वो जो करके फिर किसी आदमी को भिड़ जाएँगी और उससे बकना शुरू कर देगी।  उसको पता नहीं क्या जरूरत है मेरी समझ में नहीं आता औरतों के साथ नहीं बैठेगी आदमियों के साथ बैठेगी।  ऐसे ही कुछ आदमी भी होते हैं, स्त्रीलम्पट। बस कोई दिखाई दी औरत तो बस लग गये उसके साथ। कोई भी औरत दिखाई दी, चाहे वो नौकरानी हो चाहे कोई हो बस उनके हाथ में कोई आ जाये लग गए उसके पीछे में।  कोई उनको अपना आत्मसम्मान ही नहीं होता है और इसको वो पुरुषार्थ समझते हैं। अरे भई, पुरुषार्थ करने वाले जो पुरुषोत्तम हैं वो तो श्रीराम हैं। वो तो वहाँ बैठे हुए हैं जिन को कि कहना चाहिए कि पुरुषार्थी हैं। और जो बिल्कुल ही पाताल में हैं वो अपने को पुरुषार्थी समझते हैं | इसमें कौनसा पुरुषार्थ है?  या तो फिर श्रीराम को मत मानो।  फिर एक शैतान को मानो। अगर श्रीराम को मानते हो तो उनके आयडियल्स (ideals) पर चलो। और इसी लिए अपने यहाँ अपने बच्चे भी खराब हो रहे हैं, औरतें भी खराब हो रही हैं। पर तो भी भी मैं भारतीय संस्कृति की विशेषता कहुँगी कि औरतों ने बहुत सम्भाल लिया है। अभी अगर अमेरिकन जैसी औरतें होती तो आपको सब पहुँचा देती, ठिकाने। उन्होंने तो सबको ठिकाने कर दिया, अमेरिकन औरतों ने वहाँ।  आदमियों का जो हाल है वो अगर मैं आपसे   बताऊँ  तो अगर दो शादियाँ उस बेचारे की हो गईं, दो-तीन शादियाँ हो गईं तो वो तो हाथ में झोलियाँ लेकर के घूमने लगता है। और औरत ने दो-तीन शादियाँ कर ली तो वो महल बना के बैठ जाती हैं वहाँ। पर वहाँ है क्या?   बच्चे घर छोड़ कर भाग जाते हैं। वहाँ के समाज की ही अवस्था क्या है?  तो अपने हिन्दुस्तान की औरतों की यह विशेषता है कि वो भारतीय ढंग से रही हैं वो अपने घर को सम्भालती हैं। अपने बच्चों को सम्भालती हैं और पति को सम्भालती हैं। अपने कर्त्तव्य को जानती हैं पर ये चीज़ बदल रही है। वो भी देख रही हैं कि अगर हमारा आदमी ऐसा है तो हम क्यूँ न करें। वो अगर दस औरतों के साथ दौड़ता है तो हम पन्द्रह आदमियों के साथ दौड़ेंगे । वो अगर गन्दे काम करता है और वो अगर नर्क में जा रहा है तो मैं उससे पहले नर्क में जाऊंगी। इस तरह कि बातें औरतों को नहीं करना चाहिए।   और धर्म की धूरा जो है वो स्त्रियों के हाथ में है। वो स्त्री को सम्भालना है, स्त्री को ही पति को धर्म के रास्ते पे लाना है। समझा कर के बुझा कर के उसको अपने पास रखना है। ये स्त्री का बड़ा परम कर्तव्य है। और उसके अन्दर ये शक्ति है।  पर अगर वो ही स्वयं धर्म में बैठी नहीं है, और धर्म में सबसे बड़ा धर्म है क्षमा।  क्षमा करना यदि अगर स्त्री में न आये तो वो कोई सा भी धर्म करे उससे कोई फायदा नहीं। पहली चीज़़ उसमें क्षमा होनी चाहिए। बच्चों को क्षमा करना, पति को क्षमा करना, घर के नौकरों को चाकरों को सबको आश्रय देना, ये स्त्री का कर्तव्य है। तो कुछ ऐसा आ जाता है अब देखो कि, जो हम भी कार्य कर रहे हैं ये राम भी नहीं कर सकते थे, कृष्ण भी नहीं कर सकते थे, ईसामसीह भी नहीं कर सकते थे। अगर राम होते तो बस वो (अस्पष्ट) छेद कर देते सबका। तुम सबको मार ही डालते थे कहते चलो जाओ तुम कि तुम सब बेकार हो। तुम अधर्मी हो, औरतों के पीछे में भागते हो, तुम स्त्री लम्पट हो चलो न जाने कितने लोगों को पहले ही खतम कर देते। दूसरे, अगर कृष्ण आते तो वो सुदर्शन चक्र चलाते, वो भी गड़बड़ हो जाती, ईसा आते तो अपने को  सूली (क्रुसीफिकेशन) पर चढ़ा देते। ये तो बहुत ही अच्छा है, एक बार में क्रूसीफिकेशन पे चले जाओ। काम ख़तम है रोज का क्रुसीफिकेशन तो नहीं होता । ये तो माँ ही कर सकती है, माँ ही कर सकती है।  उसके अन्दर प्यार की शक्ति इतनी जबरदस्त है कि कोई भी चीज़ हो वो उसके प्यार की शक्ति के सहारे पार हो जाती है। वो सब चीज़ उठा लेती है और उसके तरीके ऐसे प्यारे होते हैं कि फिर बच्चे उसको बुरा नहीं मानते। कोई बात हो गई, समझ लो कि कुछ गडबड़ हो गई कुछ, तो माँ है वो जानती है  किस तरह से टाल देना है और फिर डाँट भी सकती है। क्योंकि बच्चे जानते हैं कि माँ हमें प्यार करती है। वो हमारे हित के लिए कहती है। बच्चे उसका बुरा नहीं मानते। अगर बाप डाँट दे तो हो सकता है कि बच्चे उनसे मुँह मोड़ लें, पर माँ से नहीं। क्योंकि माँ का प्यार जो है वो ऐसा है कि निर्वाज्य, वो कुछ नहीं चाहती अपने लिए। वो ये चाहती है कि मेरे बच्चे ठीक हो जायें। मेरी सारी शक्तियों को प्राप्त करें। अपने अन्दर जो भी कुछ मेरा अच्छा है वो प्राप्त करें ऐसे अगर माँ समझे तो बच्चें ठीक हो जाएं जायेंगे। 

पर बहुत सी माँयें बहुत बहुत ही (forward) आगाऊ होती हैं, सब चीज़़ में घुसते जायेंगी। सब चीज़ में बोले जायेंगी।   उसका पति तो बेचारा चुपचाप बैठा रहेगा, ये ही देवी जी सामने खड़ी होंगी। ऐसे जब होता है तो बच्चे ख़राब  हो जायेंगे| तब ऐसे संसार में रह कर औरतों को ऐसे बच्चे पैदा भी हो सकते हैं जो बड़े उत्पाती ज़ज्बाती भी हो सकते हैं और जो बहुत हानिकारक भी हो सकते हैं । तो स्त्री को पोटेंशियल (potential) पीछे रहना चाहिए और पति को आगे रखना चाहिए।  ठीक है, जो कुछ भी है पति करे, पत्नी पीछे से उसकी मदद करते रहे। उसी के शक्ति का स्रोत ही स्त्री है। ये समझ लेना चाहिए तो एक स्त्री को कितना शुद्ध होना चाहिए। कितनी मेहनत करनी चाहिए। आप सब कहेंगे कि माँ सब स्त्रियों पर छोड़ते हैं, क्योंकि मैं जानती हूँ आप शक्तिशाली हैं। मैं जानती हूँ हमारे अन्दर बड़ी शक्तियाँ हैं, क्योंकि मैं माँ हूँ। अब देखिये मेरे ऊपर सबने छोड़ दिया कि हजारों लोगोंको पार करो।  इतनों की बीमारियाँ ठीक करो, सुबह से शाम बीमारियां ढीक करते हैं फिर लोगों को पार करो।  ऐसे किसी ने काम किये थे?  एक अहिल्या का उद्धार कर दिया हो गया। उसके बाद किसका उद्धार किया?   ईसामसीह ने सिर्फ कुल मिलाके इक्कीस लोगों को ठीक किया होगा। अभी तो मैंने इक्कीस हज़ार लोगों को ठीक किया होगा अभी तक।  और दुनियाभर में घूमो, फिरो, सबका ये काम करो, वो करो, ये सब चल रहा है, पर कुछ नहीं लगता क्योंकि वो शक्ति है न प्यार की। तो वो प्यार की शक्ति मेरे से आगे दौड़ती है।  अभी बाहर निकलने से पहले मैं सोचती हूँ कि एक बार बन्धन ले लूं कि न जाने कैसे लोग मेरे पैर पकड़ ले, लेकिन भूल जाती हूँ। और जैसे ही सामने कोई ऐसा वैसा आ जाता है, मैं झट से उनकी सब परेशानियाँ अपने अन्दर खींच लेती हूँ।  वो प्यार ऐसा है कि वो अपने आप ही कार्यान्वित करता है। उसको मैं जानती हूँ कि ये प्यार है और इसी के सहारे से सारा कार्य हो रहा है, तो मैं नहीं बुरा मानती। जो भी हो रहा है, ठीक है। थोड़ी तकलीफ होगी ना, तो होने दो, कोई हर्ज नहीं, ये सब माँ ही कर सकती है। और इसलिए मेरा विशेष आप लोगों की तरफ रूख है कि आप समाधान और स्थिरता के साथ कार्य करें। और पुरुषों को भी चाहिए कि वे अब अपनी औरतों की पूरी सहायता करें, और उनको समझें, और उनका आदर करें। और जब तक दोनों भी पहिये एक रथ के एक जैसे नहीं होते हैं तो रथ घूमता ही रहता है। रथ आगे नहीं जायेगा। दोनों एक ही जैसे होने चाहिए पर एक (left) बांये को है, एक (right) दांये को है। लेफ्ट वाला अगर राइट में लगाओ तो वो लगेगा नहीं और राइट वाला लेफ्ट में नहीं लगेगा। इसलिये ये दो तरह के चक्के हैं और ये दोनों तरह के चक्के चल रहे हैं इसलिए क्योंकि ये एक जैसे भी हैं और एक जैसे हैं भी नहीं। एक दूसरो के बिलकुल जैसे हैं माने ऊँचाई में, लम्बाई में, बढ़ाई में, लेकिन इनका कार्य जो है वो अलग-अलग है। इसी प्रकार हमारे भी जीवन में होता है।  

तो श्रीरामचन्द्रजी ने केवल सिर्फ पति-पत्नी का ही विचार नहीं किया। बच्चों का और अपने कुटुम्ब व्यवस्था का ही विचार नहीं किया,  अपने भाई, बहन, माँ, बाप सब का विचार  रखा।  जैसे एक मनुष्य को होना चाहिए। और उसके बाद उन्होंने समाज का भी विचार रखा। जन का विचार रखा, देश का विचार रखा, राज्य का विचार रखा।  जैसे कि एक मनुष्य की सारी ही गतिविधियाँ होती हैं वो सारी गतिविधियों में उन्होंने दिखाया कि मनुष्य को किस तरह से होना चाहिए। जो मनुष्य अपनी पत्नी को इतना प्यार करता था और जो जानता था कि वो सम्पूर्णतया शुद्ध है उसको उन्होंने त्याग दिया। 

आजकल तो पत्नी के नाम ये बनाओ, पत्नी को वो चाइये पत्नी को ये करना है, ये बनाना है ये देना है, वो देना है। और अगर कहा जाये कि गरीब को थोड़ा दो, पैसा दो, तो नहीं देंगे। नहीं तो अपने बच्चों को दो, नहीं तो अपने (nephews) भांजों को दो, ये तो राजकीय लोगों की बीमारी है। और इन्होंने अपनी वो पत्नी की जो स्वयं साक्षात् देवी स्वरूपा अत्यंत शुद्ध थीं उसका तक त्याग कर दिया। तब फिर हमें सोचना चाहिए कि ये हमारा ममत्व है  और रिश्तेदारी है कि ये मेरा घर, ये मेरा है। कुछ लोग तो अब जैसे विदेश में पहले पति-पत्नी का कुछ ठीक नहीं होता था । अब जो वो ठीक हो गया है सहजयोग में तो अब वो पत्नी ही सब कुछ हो गई। हमारे यहाँ कम से कम चार या पाँच लीडर ठीक पत्नी की वजह से निकल गये है। क्योंकि उनकी पत्नी ठीक नहीं हुई, पति ठीक थे।  पत्नी ने  पढ़ा-पढ़ा कर के, पढ़ा-पढ़ा कर के बिचारों का सत्यानाश कर दिया। कम से कम पाँच लोग पत्नियों की वजह से बाहर निकल गये। सो, यहाँ भी मैं कहूँगी कि पत्नी को समझना चाहिए कि सहजयोग क्या है। और उसमें अपना क्या स्थान है। और पति को भी ऐसे मामले में पत्नी से जरा सा भी नहीं सहमत होना चाहिए । उससे कहना चाहिए कि  तुम बहुत ज्यादा बोलती हो-बहुत ज्यादा दौड़ती हो, तुम चुप बैठो। तुम किसी काम की नहीं हो। तुम्हारे चक्र ठीक ठीक करो।  जब पति इस तरह से उसके साथ इस तरह का व्यवहार करेगा तभी न तो वो ठीक होगी। पर ये कि उसके चक्र ख़राब तो मेरे भी चक्र ख़राब हो जाये।  उसने कहा कि चलो तो तुम ये करो तो मैं वो करूँ।  अगर पत्नी ने कहा कि कुछ पैसा मार लो तो पैसा मार लें।  सहजयोग में आने पर भी कुछ सूक्ष्म अपनी जो खराबियाँ हैं वो चिपक जाती हैं। उधर आपको बहुत अच्छे से ध्यान देना चाहिए। 

तो आज श्रीराम के इसमें तो हमें हनुमान जी का तो जरूरी विचार करना चाहिए कि हनुमानजी किस तरह से एक श्रीराम के दास थे। और किस तरह से उनकी सेवा चाकरी में लगे रहते थे। और हर समय उनके ही सेवा में रहने से ही वो जानते थे कि उनका पूरा जीवन सार्थक हो जायेगा। उनके जैसे वृत्ति भी सहजयोग में हमें अपनानी चाहिए।  इसका ये नहीं मतलब कि आप मेरे लिए खाना बना-बना कर भेजें, बिल्कुल भी नहीं।  क्यूंकि मैं तो खाना खाती नहीं हूँ, और मुझे खाना बना-बना कर के और परेशानी में आप लोग डाल देते हैं। इसने ये बना करके भेज दिया उसने ये बनाकर के भेज दिया।  भई भगवान को कहते हैं न कि (अशपष्ट) जो खाता नहीं भगवान उसको क्यों परेशान करना खाने से। खाना नहीं चाहिए कुछ नहीं चाहिए तो क्या चीज़ चाहिए, तत्पर?  सेवा करने में तत्परता चाहिए। हनुमानजी क्या कोई खाना बना कर के भेजते थे क्या श्रीरामचन्द्रजी के लिए?   दिल्ली वालों ने मुझे इतना परेशान किया है खाना बना-बना कर के, कि मैंने अब शर्त लगा दी है कि अगर तुम लोग खाना बनाओगे तो मैं आऊंगी ही नहीं दिल्ली। जो चीज़़ करनी है वो करो। ये तो बेकार की चीज़़ है कि जो आदमी खाना नहीं खाता उसे जबरदस्ती आप खाना खिला रहे हैं। या जिस आदमी कोई (अशपष्ट) चूड़ी  ले कर आ गए,  तो कहीं कुछ चीज़ ले कर के आ गए। कोई चीज़ की जरूरत नहीं है तुम्हारी माँ को। सारा भरा पड़ा हुआ है। मैं तंग आ गई हूँ इन सब चीज़ों से। इतना मैं कहती हूँ मेरे लिए कुछ चीज़ मत लाओ। बस फूल ही लाओ। और कुछ  नहीं चाहिए फूल भी बहुत हो गए, फूल भी जब लगाओगे तो हजारो रूपये के मत लगाओ भई। (अशपष्ट) कभी कभी तो में घबरा ही जाती  हूँ इतने फूल आप लोग लगाते हो।  सो  जो कुछ करना है वो संतुलन में, जैसे माँ को पसन्द आये।   माँ तुम्हारी सीधी साधी औरत है। उसको क्या अक्कल है इन सब चीज़ों की। 

तो खास करके अब ये कहना है कि आपको हनुमान जी से सीखना है कि सेवा में तत्पर।  अब सेवा में तत्परता क्या हो?  अब मेरी तो ऐसी खास सेवा नहीं है। क्योकि हट्टी-कट्टी हूँ मैं, मुझे कुछ कोई खास सेवा की जरूरत नहीं है। पर जो मेरी सेवा करनी है तो सहजयोग की सेवा करनी चाहिए। जो सहजयोग में जो सेवा करेंगे, वही मेरी सेवा है। कितने लोगों को आपने को आपने रेअलिज़शन  दिया, कितनी औरतों को आपने रेअलिज़शन  दिया, कितनों को आपने पार कराया?   कितनों में आपने इंटरेस्ट (interest) लिया।  जैसे कोई आ जाता है प्रोग्राम में, तेरे अन्दर ये भूत है, तेरे अन्दर ये भूत है’ बस उसके पीछे पड़ गये। वो भाग खड़े हो गए । मैंने एक साहब से पूछा कि आप इतने अच्छे से पार हो गये थे आप सहजयोग से क्यों भाग गये। तो कहने लगा, ‘किसी सहजयोगी ने बताया कि तुम्हारे अन्दर तीन भूत बैठे हैं।’ अभी नंबर भी उन्होंने बता दिए। मैंने कहा कि, ‘आपने विश्वास क्यों कर लिया?’  कहने लगे,  वो तो वहाँ के बड़े महारथी लग रहे थे। दौड़-दौड़ के बता रहे थे कि आपके अन्दर तीन भूत हैं। अब वो कौन साहब थे कौन नहीं ये तो पता नहीं, पर वो तो भाग खड़े हो गए।’ 

सो, सहजयोग के अंदर में  हनुमान जी से हमें सीखना क्या है कि हम तत्पर हैं तत्परता, ‘राम काज करने को तत्पर’। काज कौन सा है हमारा?  मेरा काज है सहजयोग। मेरा कार्य है सहजयोग, कुण्डलिनी का जागरण करना, लोगों को पार करना। उनके अन्दर शांति लाना, प्रेम लाना, प्रेम की बातें करना। उनसे अपने सहजयोग के बारे में सारे चक्र आदि का वर्णन करना। उनको जो चाहिए सो समझाना। अब जब ये कह दिया तो लेक्चर बाजी बहुत होती है। हमारे यहाँ तो कुछ लोग इतने लोग लेक्चर देने लग गए थे।   तो मैंने कहा भैया अगर आपने इस लेक्चर को बंद नहीं किया  तो सहजयोग ही ख़तम हो जायेगा। लोगों ने कहा माँ दो-दो घंटे लेक्चर देते हैं फिर आपका हम भाषण भी नहीं सुन पाते।  आरती भी नहीं कर पाते ऐसे ही घर जाना पड़ता है, फिर उनका लेक्चर बंद करवाया।  वो कहने लगे  कि मैं जाता हूँ तो पता नहीं क्या हो जाता है। मेरा मन करता है कि मैं लेक्चर ही दे दूँ इसको कैसे ठीक करूँ?   मैंने कहा भई देखो मुँह में एक सुपारी रख लो, तो वो पूछते हैं की किंतनी बड़ी रखूँ?   जितना बड़ा मुँह उतनी बड़ी रखो।   तो मैंने कहा जब आपको ये भी नहीं पता कि कितनी बड़ी सुपारी रखो।  तो आप सहज योग पे बात क्या करते हैं?  इसकी भी तो आपके पास अक्कल नहीं है।

तो सहजयोग पर बात करना लोगों को बहुत अच्छा लगता है, मतलब लेक्चर देना। जैसे एक प्लेटफार्म मिल गया है। बस माईक मिल गया है चलिए माईक पे बोलना है।  उनका माईक ही नहीं छूटता नहीं है, एक बार माईक पकड़ लिया तो छूटता नहीं है, ये भी एक नई बीमारी है। अब उसमें समझ ये लेना है कि काहे को लेक्चर देना है। माँ के इतने लेक्चर हैं भई ये ही सुन लें। तो अब जब भी आप लोगों का यहाँ ये कोई ये हो,  प्रोग्राम हो उसमें चाहें तो एक मेरा वीडियो लगा दो या चाहे तो मेरा एक टेप सुना दो।  उसके बाद उनको एक कागज पेन्सिल दे दो।  कि भई जिसपे तुमको जो कुछ लिखना है लिखो कि कोई प्रश्न हो तो बता दो। और उसके बाद में उनकी जागृति कर दो और उनसे कहना कि नेक्स्ट टाइम (next time) आपको जो कुछ प्रॉब्लम ( problem) है उसको आप लिख कर लाईये।  तो शुरू उनका जो कुछ प्रॉब्लम है, किसी को बीमारी है, किसी को तकलीफ है, कुछ है। अब ऐसे भी लोग हैं कि जो एक आदमी है अब वो अगर कलकते भी आएगा किसी को ठीक करने। वो जायेगा, अब उसे रूस बुला रहे हैं ठीक करने के लिए । एक ही आदमी हनुमान जी जैसे दौड़ता रहता है इधर से उधर ठीक करने के लिए, इधर से उधर, उधर से इधर। सब लोग आप ठीक कर सकते हैं। सब औरतें ठीक कर सकती हैं। आदमी ठीक कर सकते हैं। पर कोई हाथ ही नहीं डालता। लेक्चर देने से ये देखें की कितने लोगों की बीमारी ढीक कर दी है पता नहीं क्या बात है कि अभी तक एक ही आदमी सारे हिन्दुस्तान में है कि जो लोगों को ठीक कर सकता है। हालाँकि लण्डन में कम स कम १५- २० लोग हैं कि जो लोगों को ठीक करते हैं। फ्रांस में लोग हैं वो लोगों को ढीक करते हैं तो ये ठीक करने का तरीका क्या है? ये सीख लेना चाहिए। और बन्धन लेकर के ठीक करना चाहिए लोगों को। उसके लिए अब आप क्या बाहर से बुलायेंगे लोगों को। और आप सहजयोगी  किस दिन के लिए हैं। आप बैज लगाकर के घूमते हैं, आप ठीक भी नहीं कर सकते हैं?  फिर बैज उतार दो।  अपने को भी नहीं ठीक कर सकते, अपनी भी बीमारी नहींठीक कर सकते तो दूसरों की क्या ठीक करेंगे।  तो ये बात होनी चाहिए कि सबको ठीक करने का अहिहिलयोधार जो है  उसकी सबको शक्ति दे दी गई है। उसको आप लोग सीख लें, उसको मास्टर करें।  और अब बजाए इस कि कलकत्ते कोई आए, कलकत्ते से लोग जाये दूसरों को ठीक करने। इसमें हिम्मत की जरासी बात है, कुछ नहीं होने वाला तुमको।  तुम न तो बीमार हो सकते हो न कुछ हो सकता है। जो लोग जितना सहजयोग में कार्य करेंगे उतने गहरे उतरेंगे।  क्योकि जैसा पेड़ है वो जितना फैलेगा वो उतना ही गहरा उतरेगा। 

सहजयोग में और अवतरणों में एक बड़ा भारी फर्क है कि पहले उन्होंने कोई सामाजिकता से अध्यात्म नहीं किया था। ये शक्तियाँ किसी को दी नहीं थी। समाज के लिए मिली नहीं थी। एक आध आदमी को शक्तियाँ मिली थी। जैसे कि राजा जनक ने नचिकेता को आत्मसाक्षात्कार दिया। लेकिन अब तो आप सबके पास ये शक्तियाँ प्राप्त हैं। बस इसको ऐसा बढ़ाइये कि आपको कोई भी चीज़ की जरूरत ही न रह जाए। आप अपनी तबीयत ठीक कर लीजिए, दूसरों की तबीयत ठीक कर लीजिए। आप सहजयोग समझ लीजिए, सब कुछ आपके पास है। लेकिन अभी भी आपका चित्त पता नहीं कहाँ घूम रहा है। आप लोग पता नहीं किस चीज़ के पीछे में भाग रहे हैं। कि अभी आप ने इस चीज़ को पकड़ा ही नहीं है। सहजयोग में  सबके लिए सिर्फ वरदान के सिवाय कुछ है ही नहीं। आपको कोई चीज़ की भी कमी नहीं रह जायेगी। पर आप सहजयोग के लिए कुछ करे तब तो न! और नही भी करते हैं तो भी वरदान मिलता ही है। जिसको देखता हूँ उसका बिज़नेस बढ़ गया है, किसी की नौकरी बढ़ गयी है। किसी का ये हो गया, किसी का वो हो गया।  सबको कुछ न कुछ कुछ न कुछ चीज़ मिलती ही जा रही है। कोई भी उनको त्याग नहीं करना पड़ा। नहीं तो हम आपसे बताये कि जब ये फ्रिडम का हुआ था कि देश को फ्री करना है, तो हम ही को लोगों ने कितना सताया था। बर्फ़ पर लिटाया, इलेक्ट्रिक के शॉक दिये। हमारे पिताजी जेल में गये कितनी बार, हमारी माँ कितनी बार जेल गयी। हम लोगों  के घर बिक गए, हम लोग झोपड़ियों में रहने लग गए।  कोठियां बिक गयी, कितना कुछ सॅक्रिफ़ाइस किया। अरे वैसा तो कुछ करना ही नहीं है आपको, पर सब लेना ही लेना नहीं होना चाहिए, देना भी होना चाहिये। गर एक दरवाजा खुला है तो दुसरा दरवाजा भी खोलना चाहिये। एक ही दरवाजा खोलने से नहीं होता है। सब बतायेंगे माँ मेरा ये भला हो गया, वो भला हो गया, तुमने  किसका भला किया है। इस चीज़ पर ध्यान देना चाहिये कि हमने कौन सा भला काम किया है। पर अब नेता गिरी के लिये बहुत ही झगड़े हैं कि कौन नेता होगा। ये बड़े झगड़े हैं, सब बना बनाया स्टेज है। (अशपष्ट) आप को ये जान लेना चाहिये कि ये सब माँ का खेल है। जिस दिन आप आप नीचे गिर जायेंगे वहाँ से, आपको पता होना चाहिये। खास कर औरतों को तो बिलकुल ऐसे चक्कर में आना ही नहीं चाहिये। उनको फौरन ऊपर से नीचे गिरना पड़ेगा और आदमियों को भी समझ लेना चाहिये कि इसमें नेता वेता कोई है नहीं। ये सब माँ ने बनाया हुआ खेल है, और इस चक्कर में तो आना ही नहीं है। मैंने कह दिया अच्छा, लीड़र्स आ जायें, काहे के लीडर्स  और काहे का ये?  सब एक खेल बनाया है माँ ने। 

सो ये लीडर्स वीडर्स कोई नहीं है। सिर्फ ये है कि देखा जा रहा है कि आप कितना तोल सकते हो। गर आपको अहंकार चढ़ गया तो गये आप, वो फौरन दिखाई देगा। सहजयोग में कोई चीज़ छिपती नहीं है, सब चीज़ सामने आ जाती है। मैं कुछ कहूँ या ना कहूँ, वो अपने आप मूँह पे काला लगा कर उतर आते हैं अपने आप। हम लीड़र हैं और देखा कि सामने मुँह पर काला लगा कर आ गये। मैंने पूछा कि, ये क्या? तो कहने लगे कि, ‘माँ, हमने ये खराब काम कर दिया है ।’ तो ये लीड़र पर और जिम्मेदारी आ जाती है कि आप और अच्छे और नम्र और मीठे और प्यारे बन जायें। और सब को मिलाके, सब की पूछ कर के, सब को लेकर के चलें। अब ये सब चीज़ें आज रामचन्द्रजी के विशेष दिवस पर हमें मानना चाहिये कि उन्होंने जो कुछ भी जीवन में कर के दिखाया है उसका कुछ भी अंश हम कर के दिखायें तो माँ के जीवन को भी चार-चाँद लग जायेगा। उन्होंने इतने दिन वनवास किया। वनवास में रहे, जंगलों में बगैर कुछ पहने हुए घूमे, फिरे, कितनी मेहनत की। और फिर सिर्फ अपने पिता की आज्ञा मानने के लिये उन्होंने ये सब कार्य किया। अब मेरी आज्ञा मानने के लिए आप लोगों को कोई वनवास जाने की जरूरत नहीं है। आप को नंगे पैर रहने की जरूरत है, न ही भूखे रहने की जरूरत है। कुछ करने की जरूरत नहीं है, सब व्यवस्था  है। लेकिन सहजयोग में आपको लोगों को ठीक करना आना चाहिये। लोगों की बीमारियाँ ठीक करनी आनी चाहिये। और आपको सहजयोग के बारे में सब कुछ मालूम होना चाहिये। और सब से बड़ी जाननी चाहिये चीज़, सहजयोग प्रेम है। ये प्रेम की शक्ति है, जो कार्य कर रहा है और कोई नहीं है। और उसी से सब लोगों का भला हो सकता है। ये कोई एक आदमी के लिये नहीं है, एक विशेष लोगों के लिये नहीं है। ये कोई एक देश के लिये नहीं है, ये है सारे विश्व के लिये। 

तो एक ये भी देखना चाहिये कि हमारा चित्त कैसा है?  कहाँ जाता है?  बार–बार अगर हमारा चित्त जाता है, तो उस चित्त को निरोध करना चाहिये, उसे रोकना चाहिये। उसमें आत्मा की शक्ति पूरी तरह से भरनी चाहिये और मनुष्य को एकाग्र हो कर के हर कार्य को करना चाहिये।  भक्ति भाव से, प्रेम से अगर जो करेगा , वो बहुत गहरा उतरेगा।  गर नहीं तो ऐसे ही, कचरा बहुत होता है, और कचरे का जो अंत होता है वो भी आप जानते हैं।  तो आपको अगर कचरा बनना है और आप अपने को बहुत विशेष समझ रहे हैं कि हम तो बड़े अच्छे हैं, हम तो ये कर लेते हैं। हम तो वो कर लेते हैं। तो पहली चीज़ है, कि नम्रता रखो। मेरे प्रति नहीं, सबके प्रति।  नम्रता से बात करो, और प्रेम से बात करो।  देखना यही जो मनुष्य, आज एक मानव है, बेकार चीज़ है, वही सहजयोग में आते ही साथ सब ओर कमल जैसे खिल जाता है। और उसका सुगंध चारो ओर फैलता है। लोग मुझे आकर फौरन बता देते हैं कि माँ ये आदमी है न कमाल का है! ये बस ऐसे आदमी हैं। ऐसे ही आप लेग सब काम करें तो मर्यादा पुरूषोत्तम को जैसे कहते थे कि ‘बड़े कमाल के थे’, ऐसे ही आपके लिये भी कहेंगे। सब से बड़ी चीज़ तो ये है कि मेरे लिये तो आप ही राम का मंदिर हैं और आप ही इस मंदिर को अपने अन्दर बनाये।  और उसकी पूजा हो और उसको सम्भाले, उसको देखें और अपने आत्मसम्मान के साथ रहें। 

अपने आत्मसाक्षात्कार का पूरा फायदा भी उठाना है और उसी के साथ उसकी पूरी इज्जत और उसके प्रति भक्ति होनी चाहिये कि अब हम आत्मसाक्षात्कारी हैं और अब हम ऐसा कैसे कर सकते हैं। हम योगी हैं, हम नहीं कर सकते हैं। हमसे नहीं हो सकता है ये गलत काम है। और आप देखियेगा कि एकदम आशीर्वाद उसी के साथ आ जायेगा। एकदम उसी वक्त! ये तो वो वो रोकडा देवी नाम रख दिया है लोगों ने मेरा, कि बस माँ हमने बस तय कर लिया और फौरन उसका आ गया।  इतना इसका परिणाम, इसका लाभ सबको हो रहा है। सिर्फ उस लाभ के अनुसार आप भी दुनिया को लाभ दें। जैसे कि श्रीराम ने अपनी सारी शक्तियां इसमें लगा दी कि जन का हित हो। संसार में एक आदर्श पुरूष की एक मूर्ति बन जाये, कि जिसको कि लोग देखें। जिस वक्त ये हमारे अन्दर घटित हो जायेगा, आपको आश्चर्य होगा कि आप सब के सब कहाँ से कहाँ पहुँच जायेंगे। आपके अन्दर कोई बीमारियाँ नहीं रहनी चाहिये। सब बीमारियाँ चली जानी चाहिये, उसको साफ़ कर दीजिये।  जो भी आप की आदते हैं, उसको आप बदल लीजिए। जो जरूरत है वो खाईये। जो जरूरत है उतना बोलिये।  सब को आप देखते रहें और इसके लिये अपने अंदर, आप मनस, जिसको कहते हैं, कि इंट्रोस्पेक्शन  (introspection)। अपने ओर देखना, अपने ओर देखना अंतर निरीक्षण करना। जिससे कि देखते रहना कि मैं ये क्यों कर रहा हूँ, वो क्यों कर रहा हूँ?  मुझे क्या करने की जरूरत है?  इसकी कोई जरूरत नहीं है, मैं सहजयोगी हूँ। मैं ऐसा क्यों कर रहा हूँ?  मेरा ये कहाँ जा रहा है दिमाग़?  रूक जाओ। पूरी समय इस तरह से करने से ही आप ध्यान में हो जाएंगे और स्वयं आपकी कुण्डलिनी इस से बहुत संतुष्ट होकर के और आपको ऐसा आनंद प्रदान करेगी, कि आप कहेंगें कि माँ ये क्या मिल गया है हमको। लेकिन जब आप इसमें फ़िसल पड़ियेगा, फिर आप जानियेगा ये चीज़ क्या है। बस इसमें फ़िसल पड़ना है, तभी तक की थोड़ी बहुत मेहनत है। 

आज मैंने कहा था, कि रामचन्द्रजी का तो बारह बजे का जन्म हुआ था तो आराम से ही पूजा होने दो, और ठीक हो रहा है। रामचन्द्रजी के पूजा में तो कोई खास काम नहीं है और बहुत  लम्बी चौड़ी पूजा भी नहीं है, लेकिन इसमें समझने की जरूर बात है। क्योंकि वो मनुष्य स्वरूप थे और मनुष्य स्वरूप जो है वो अपने अन्दर जो मनुष्यता है जिससे हम चीज़ को समझते हैं। जिससे हमारे बुद्धि में, हमारे जिज्ञासा में और हमारे विचारों में परिवर्तन आ जायेगा, वो चीज़ श्रीराम हैं । उन्हीं के ही माध्यम से हमारे विचार बदल सकते हैं। उन्हीं के माध्यम से हमारा स्वभाव बदल सकता है क्योंकि हमारे लिए एक वो एक आदर्श हैं। उनके आदर्श तक पहुँचने के बाद ही दुसरे आप आदर्शों तक पहुँच सकते हैं क्योंकि वो मनुष्य के आदर्श हैं। कितनी बड़ी चीज़ है, कि परमात्मा मनुष्य बनकर इस संसार में आए कि इनके लिए हम आदर्श बन जाएं। और सब विपत्तियाँ उठाईं,  सब आफतें उठाईं,  दिखाने के लिए कि कोई सी भी विपत्ति और आफत आती है मनुष्य को अपना धर्म नहीं छोड़ना चाहिए। विश्व धर्म नहीं छोड़ना चाहिए और अपना योग है उसमें बने रहना चाहिए। आप सबको हमारा अनन्त आशीर्वाद!