Dyan Ki Avashakta, On meditation

New Delhi (भारत)

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Dhyan Ki Avashayakta   ध्यान की आवश्यकता 

Date:27th November 1991 Place: Delhi   

Seminar & Meeting Type: Speech Language Hindi 

[Original transcript, scanned from Hindi Chaitanya Lahari] 

आज आप लोगों से फिर से मुलाकात हो रही है और सहज योग के बारे में हम लोगों को समझ लेना चाहिए।  सहज योग,  ये सारे संसार के भलाई के लिए संसार में उत्तपन्न  हुआ है, कहना चाहिए और उसके आप लोग माध्यम हैं।  आपकी जिम्मेदारियाँ बहुत ज़्यादा हैं क्योंकि आप लोग इसके माध्यम हैं, और कोई नहीं है इसका माध्यम।    कि  हम अगर पेड़ को वाईब्रेशन्स (Vibrations) दें या किसी मन्दिर को वाईब्रेशन्स दें या कहीं और भी वाईब्रेशन्स दें तो वो चलायमान नहीं हो सकते,   वो कार्यान्वित नहीं हो सकता।  आप ही की धारणा से और आप ही के कार्य से यह फैल सकता है।  फिर हमें यह सोचना चाहिए कि सहजयोग में एक ही दोष है। ऐसे तो सहज है, सहज में प्राप्ति हो जाती है। प्राप्ति सहज में होने पर भी उसका संभालना बहुत कठिन है क्योंकि हम कोई हिमालय पर नहीं रह रहे हैं। हम कहीं ऐसी जगह नहीं रह रहे हैं, जहाँ और कोई वातावरण नहीं है, बस सब  आध्यात्मिक वातावरण है। हर तरह के वातावरण में हम रहते हैं। उसी के साथ-साथ हमारी भी उपाधियाँ बहुत सारी हैं जो हमें चिपकी हुई हैं। तो सहजयोग में शुद्ध बनना,  शुद्धता अंदर लाना ये कार्य हमें करना पड़ता है। जैसे कि कोई भी चैनल (Channel)हो वो अगर शुद्ध न हो, तो उसमें से जैसे बिजली का चैनल है उसमें से बिजली नहीं गुज़र सकती। अगर पानी का नल है उसके अंदर कुछ चीज़ भरी हुई है उसमें से पानी नहीं गुज़र सकता। इसी प्रकार ये चैतन्य भी जिस  नसों में बहता है उनको शुद्ध होना चाहिए। और इन नसों को शुद्ध करने की जिम्मेदारी आप लोगों की है । हालांकि आपने कितनी बार कहा है कि माँ हमें भक्ति दो। माँ हमें निताँत आपके प्रति श्रद्धा दो किन्तु ये चीज आपको खुद ही समझदारी में जानना है। पहली तो बात है कि शुद्ध जब नसे हो जाएँगी तो आप आनंद में आ जाएंगे। आपको लगेगा ही नहीं कि आप कोई कार्य कर रहे हैं। आप काई सा भी कार्य करते जाएंगे उसमें आप यश प्राप्त करेंगे। बहुत सहज में सारे कार्य होते जाएंगे जो दुनियाई कार्य हैं। सब तरह की सहूलियते आपके आपके अंदर आएगी। हर तरह के लोग आपके पास आ करके आपको मदद करेंगे।  आपको कभी-कभी आश्चर्य होगा कि किस तरह से बिगड़ी बन रही है और किस तरह से हम ऊँचे उठते जा रहे हैं।  इसमें लक्ष्मी जी की भी कृपा निहित है।  कला की भी उन्नति निहित है। हर तरह की उन्नति,  प्रगलभता इसमें आ जाती है। पर ये सारे एक तरह के प्रलोभन हैं ये समझ लेना चाहिए।   क्योंकि कभी-कभी मैं देखती हूँ कि किसी आदमी ने बिज़नेस (Business)  किया, सहजयोग में।  उसको बहुत रुपया मिल जाता है फिर वो गिर जाता है। और इतने बुरी तरह से  गिरता है कि उठाना मुश्किल हो जाता है। तो नसों की स्वच्छता हमें करनी चाहिए। उसमें सवेरे का ध्यान अवश्य करना चाहिए।  

अगर आपका सवेरे ध्यान नहीं लगता है तो कुछ न कुछ खराबी हमारे अंदर आ गई है।  कोई न कोई गड़बड़ी हमारे अंदर हो गई है कोई न कोई अशुद्ध विचार हमारे अंदरं आ आ गए हैं उनको देखना चाहिए जानना चाहिए समझना चाहिए और सफाई करनी चाहिए। जिसे कि हम इंट्रोस्पेक्शन (introspection)  कहते हैं हमें अपनी ओर मुड़ के देखना चाहिए। ये आपके हित के लिए मैं कह रही हूँ।   किसी और के हित के लिए नहीं। पहले तो अपना ही हित आप साध्य कर लीजिए। अगर आपके अंदर कोई दोष है  बहुत वजह से उपाधियाँ होती हैं,  आदतें होती हैं, वातावरण होता है तौर तरीके होते हैं।  तरह-तरह की चीजों से मनुष्य में ये षडरिपु बैठे रहते हैं। ये जो हमारे अंदर छेह,  हमारे दुश्मन हैं वो छिपे रहते हैं। और वो बार- बार अपना सर उठाते हैं इसलिए आवश्यक है कि हम अपने को कोसे नहीं, अपने को पापी न कहें,  अपने को ख़राब न कहें। अपने को किसी तरह से लॉछित न करें। लेकिन इसमें से निकलने का प्रयत्न करना चाहिए। जैसे कमल है किसी भी गंदे बिल्कुल सड़े हुए जगह में पैदा होता है और वो सब में से निकल के वो फिर जब खिलता है तो सुरभित होकर के जो सारा जो कुछ भी वातावरण है उसे सुरभित कर देता है। इसी प्रकार सहजयोग की विशेषता है आप भी उसी कमल जैसे हैं न होते तो न आप सहज में आते और न ही इसे आप प्राप्त करते। आप कीड़े मकौड़े तो हैं नहीं,  आप अवश्य ही कमल हैं। लेकिन इस कमल को सुरभित होने के लिए थोड़ी सी मेहनत करनी पड़ती है, अपनी ओर नज़र करने से। सवेरे का जो ध्यान है वो अपनी ओर नज़र करने का ध्यान है कि में क्या करता हूँ । मेरे अंदर क्या दोष है मेरे अंदर क्रोध आता है। इस क्रोध को मैं कैसे नष्ट करूँ। मुझे और  ऐसी इच्छाएँ होती हैं जो कि मेरे लिए दुःखदायी हैं मुझे नष्ट करेंगी, उधर मैं क्यों जाता हूँ।  इस तरफ ध्यान देने से आपको पता   हो जाएगा कि आपके अंदर कौन सी चक्र की पकड़ है उसे आपको साफ करना है। उसको साफ करके,  ठीक-ठाक करके और फिर आप ध्यान में बैठें। जैसे कि इसको प्रत्याहार कहते हैं। माने ये कि सफाई, इसकी सफाई पहले करनी चाहिए। अपने मन की सफाई करनी है,  उस थोड़े से समय के लिए हमको अपने मन की सफाई करनी चाहिए।    अपने से अगर हमें प्रेम है अगर वाकई हमारे अंदर स्वार्थ है तो स्व का अर्थ जान लेना चाहिए।  और सोच लेना चाहिए कि इस खरावियों से हमें क्या फायदा होता है?  क्षणिक कोई होता है आनंद मिला, क्षणिक कोई उससे सुख लाभ हुआ।  समझ लीजिये कोई बात हुई भी तो भी उससे मैंने अपना तो जरूरी ही कोई न कोई बड़ा भारी नुकसान कर दिया है। क्योंकि ध्यान नहीं लगा माने ये हुआ कि आपकी एकाकारिता अभी साध्य नहीं हुई।   

अब कोई लोग होते हैं वो ये भी कह लेते हैं  कि हमारा तो ध्यान लगता है पर होता नहीं।  तो अपने साथ सच्चाई रखना बहुत ज़रूरी चीज़ है।   अगर  हम अपने साथ नहीं सच्चाई रखंगे तो फिर हम किसके साथ सच्चाई रख सकते हैं। ये अपने हित के लिए है, हमारे अच्छाई के लिए है, हमारे भलाई के लिए है। अधिकतर लोगों को मैं देखती हूँ एक सहजयोग में आने के बाद कोई बीमारियाँ अधिकतर नहीं होती। अधिकतर लोगों को सहजयोग में आने के बाद हर तरह का लाभ हो जाता है और अधिकतर लोगों को मैं बहुत आनंद में भी पाती हूँ। उनके घर के जो प्रश्न हैं वो भी छूट जाते हैं। सब कुछ व्यवस्थित हो जाता है। सब ठीक हो जाता है। तो भी कभी-कभी ऐसा होता है कि कोई न कोई वजह से किसी न किसी पुरानी त्रुटि की बजह से सहज का ध्यानं लगता नहीं है।  सवेरे उठ कर ध्यानं करना बहुत आवश्यक है। जो लोग सवेरे उठ कर ध्यान नहीं करेंगे वो सहज में कितने भी क्रियान्वित रहे और सब कुछ करते रहें, उनकी गहराई वो पा नहीं सकते। क्योंकि आपकी गहराई में ही सारा सुख,  समाधान,  सारी संपत्ति,  ऐश्वर्य, श्री सब कुछ उसी गहराई में है। उस गहराई में उतरने के लिए बीच की जो कुछ रुकावटें हैं उनको आपको निकाल देना चाहिए। अपने को प्रेम करके, अपनी ओर दृष्टि करके, अपने को समझ के कि मेरे अंदर यह दोष है। इस दोष को मुझे निकाल देना चाहिए। दूसरों के दोषों की ओर बहृत जल्दी हमारी नजर जाती है। ये काम आपका नहीं है ये मेरा काम है। ये आप मेरे ऊपर काम छोड़ दीजिए। आप अपने दोषों की ओर देखिए। और उसके बाद शाम का जो ध्यान है  वो शाम के ध्यान में समर्पण होना चाहिए।   तब फिर आगे की बात आती है कि आप किस तरह से समर्पित हैं। माने उस वक्त ये सोचना चाहिए कि मैंने सहज योग के लिए क्या किया।  मैंने सहज योग के लिए कौन सा कार्य किया है।  आज दिन भर में मैंने सहज योग पे कौन सा कार्य किया है,  शरीर से,  मन से,  बुद्धि से।  

एक अंधे गायक हैं बहुत मशहूर हैं, विद्वान हैं, बहुत पढ़े-लिखे तो हैं ही। पता नहीं जाने कैसे अंधी आँख से इतना पढ़ा है उन्होंने। वे मुझसे तीन चार बार मिले बस। और ऐसी कविता उनकी फूट पड़ी कि मैंने सोचा ये कैसे एकदम धँस गए अपनी गहराई में। ऐसी कविताएँ फूटी कैसे इनके हृदय से। ऐसी- ऐसी बातें कि जो हज़ार देवी के नाम में भी नहीं नहीं लिखी हुई वो भी उन्होंने बर्णित करीं, और बिल्कुल सही मायने में।   ऐसा उन्होंने वर्णन कैसे किया। तो उनकी गहराई पहले थी जैसे आप सबकी है लेकिन वो घुस पड़े उसमें, उसको प्राप्त किया उन्होंने, पहुँच गए वहां। सबके अंदर यह संपदा है,  अब सब ही पूरी तरह से उसे प्राप्त भी कर सकते हैं। तो शाम का ध्यान है वो बाहर की ओर होना चाहिए, माने मैने औरों के लिए क्या किया?  मैने सहजयोग के लिए क्या किया?  मैंने माँ के लिए क्या किया?  ये सब विचार आपको रखना चाहिए। जब आप ऐसा बैठ के सोचेंगे तो सोचना चाहिए इस तरह से कि वो मुझे कितना प्यार करते हैं,  उन्होंने मुझे कितना प्यार दिया। मैंने उन्हें दिया इतना प्यार।  वो कितने मेरी तरफ सिंसियर (sincere) हैं।  मैं इतना उनकी तरफ सिंसियर  रहा?   इस तरह की बात सोचने से फिर आपको आनंद आने लग जायेगा। जब आप साचंगे कि मैंने इतना प्यार किया।   

क्रोध करना,  नाराज होना,  झगड़ा करना,  दूसरों के दोष देखना, इसमें अपना समय बर्बाद करने से देखना चाहिए कि उन्होंने किस तरह से मुझे प्यार किया। हमारे सहज योग में इस प्यार बहुत शुद्ध हैं,  इसमें कोई गंदगी नहीं होनी चाहिए। और अगर  इस प्यार में गंदगी आ जाए तो वो सहज का प्यार नहीं है। बिल्कुल देने वाला जिसे निर्वाज्य कहा गया है।  निर्वाज्य माने जिसमें व्याज भी नहीं माँगा जाता।  ऐसा प्यार मैंने किसे दिया। फिर जब आप सोचेंगे कि मैं इतना प्यार करता हूँ या करती हूँ,   बड़ा आनंद आएगा।   न कि तब जब आप कहते हैं कि मैं उससे नफरत करता हूँ,  वो ऐसा है, वो खराव है ये है तब आनंद नहीं आने वाला।  आनंद तभी आता है जब हम यह सोचते हैं कि ये प्यार का आंदोलन चल रहा है।   बड़ी सुन्दर भावना मन में उठती है फिर।    और ये सुन्दर भावना एक तरह की प्रेरणा स्वरुप होती है।  उसका वर्णन तो करना मुश्किल ही है किन्तु उसकी झलक चेहरे पर दिखाई देतो है। उसकी झलक आपके शरीर में दिखाई देती है। आपके गृहस्थी में दिखाई देती है। बातावरण में दिखाई देती है और सारे ही समाज में दिखाई देती है।  इसलिए दोनों समय का ध्यान अवश्य सबको चाहिए। एकाध दिन अगर नहीं खाना खाया तो कोई बात नहीं एकाध दिन अगर बाहर घूमने नहीं गए तो कोई बात नहीं। एकाध दिन आराम नहीं हुआ तो कोई बात नहीं । लेकिन ध्यान सहजयोगियों को अवश्य करना चाहिए।  क्योंकि ध्यान ही में पाया जाता है। तो सवेरे का ध्यान अगर हम कहें की ज्ञान का है तो शाम का ध्यान भक्ति का है। इस तरह से अपने को जब आप बिठाते जाएगे तो आप समझ लेंगे कि आप कितने महत्वपूर्ण हैं। आपका महत्व इंतिहास में कितना है।  ये इतना बड़ा कार्य जो हो रहा है सहज योग में ये सब आप ही के माध्यम से हो जाएगा।   

आप अपने को औरों से मत तोलिये।  जो लोग बड़े यशस्वी होते हैं जो बड़ी- बड़ी जगहों में रहते हैं,  वो लोग ये काम करने वाले नहीं हैं।  इरपोक लोगों से भी ये काम नहीं होने वाला।  लेकिन वैसा बनना होगा। पहले लोग हिमालय पे जाते थे हज़ारों में से एक आद कोई को आत्मसाक्षात्कार की अनुभूति होती थी और बाकी तो सव ऐसे ही रह जाते थे उनको बड़ी तपस्या करनी पड़ती थी। अब आपको तपस्या करने की जरूरत नहीं है।  हिमालय पर जाने की ज़रूरत नहीं है। भूखे रहने की जरूरत नहीं है।  कुछ करने की जरूरत नहीं है।  तो आपकी सफाई का कौन सा मार्ग सहजयोग में है, शायद अपने जाना नहीं, तो जान लीजिए कि सामूहिकता।  सामूहिकता ही आपकी सफाई होने का मार्ग है। जो लोग सामूहिक हो सकते हैं निर्वाज्य, फिर  निर्वाज्य तरीके से जो लोग  सामूहिक हो सकते हैं उनकी सफाई अपने आप होती जाएगी।  उनको कोई विशेष तपस्या करने की जरूरत नहीं है।  सामूहिकता को भी एक तपस्या की की तोर से नहीं आनंद की तोर से मानना चाहिए। उसमें अगर ये सोचें की भई कैसे इन लोगों के साथ रहा जाये ये तो ऐसे लोग हैं वो तो वैसे लोग हैं।  क्योकि सहजयोग में सबके लिए ही द्वार खुले हैं तो वो आपके लिए कठिन जायेगा, अगर आप सोचेंगे।     तपस्या के मामले में उसको मजे से जो उठा सकता है वही सहज की तपस्या है।  सब चीज़ हो ही रहा है। उसमें करने का क्या है। सब चीज़ बन ही रही है। उसके बनाने का क्या है।   

आपकी स्थिति देवताओं जैसी है ये समझ लेना चाहिए, उससे कम नहीं है। क्योकि जैसे देवता लोग हम उनसे कहें या न कहें वे अपने आप अपने  कार्य को करते ही रहते हैं  उसी प्रकार आपका भी हो जाना चाहिए।  उस स्थिति में आप बहुत आसानी से जा सकते हैं। कोई कठिन नहीं है और कोई मुश्किल नहीं है लेकिन थोड़ा सा समय तो हमें अपने को भी देना चाहिए।  पूरी समय हम बेकार की चीजों के लिए समय बिताते हैं तो कुछ समय तो हमें अपने को भी देना चाहिए।  और सवेरे और शाम प्रतिदिन ध्यान ये करना चाहिए, प्रतिदिन।  इसमें अगर ये नहीं हुआ तो ये नहीं कि मैने बड़ा  गलत कर दिया।  ऐसी बात नहीं ध्यान अगर नहीं  हुआ तो कोई बात नहीं, पर ध्यान करना चाहिए ये मैं जो कह रही हूँ ये कोई एक order की तरह से नहीं है। एक सूझबूझ की बात, एक विचार है कि जिससे हम स्थिर(…अष्पष्ट) रहते हैं। मुझे फौरन पता चल जाता है कि कौन लोग ध्यान करते हैं रोज़, और कौन नहीं करते हैं, फौरन।  क्योंकि जैसे कोई कंपड़ा रोज़ धोएँ तो साफ ही रहेगा उसमे गंदगी कैसे रहेगी। और जो नहीं करते हैं उसकी गंदगी फौरन दिखाई दे जाती है। बहुत लोगों के दो-चार  दिन ध्यान न करने से एक दम खराबी आ जाती है।  तो ये स्नान है, अगर स्नान न करें तो भी चलेगा चाहिए।  पर ध्यान जरूर करना चाहिए, अपनी शांति के लिए।  अपने सुख के लिए,  अपने हित के लिए और सारे संसार के हित के लिए हमें करना चाहिए।  अपने से अगर हमें प्रेम है तो हमें चाहिए कि हम जाने कि हम कितने महत्वपूर्ण हैं कितने गौरवशाली हैं और हमारे लिए सबसे कितना बड़ा काम,  कितना ऊँचा काम हमें आता है। आशा है आप लोग मेरा लैक्चर सुन करके उस पर थोड़ा सा विचार करेंगे, मनन करंगे। ये न हो, तो कि मैंने कह दिया उसके बाद माता जी ने कह दिया फिर वो दूसरों पर लगाते हैं, अपने लिए कहा है ऐसा नहीं नहीं सांचते हैं। सोचते हैं माँ ने उनके लिए कहा है  मेरे लिए नहीं कहा है। हरेक को सोचना चाहिए कि ये मेरे लिए ही कहा है और  मुझको कैसे ऊपर चडना चाहिए,  इसमें कैसे मुझे कामयाब होना है,  कैसे मुझे बढ़ना है। सबको अनन्त आशीर्वाद।